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Jan 1, 2025

दोहेः मन में रहे उजास...

  -  सुशीला शील स्वयंसिद्धा 

1. 

हमने तेरा ज़िंदगी, खूब किया शृंगार।

तेरा भी तो फ़र्ज है, तू भी मुझे सँवार।।

2. 

आते-जाते साल से, पूछूँ यही सवाल।

सीधी क्यों होती नहीं, टेढ़ी जग की चाल।।

3. 

बदल गया है साल जी, बदल गई तारीख।

पाठ पढ़ाए खूब ही, खूब सिखाई सीख।।

4.

छोड़ गया यह वर्ष कुछ, खट्टी-मीठी याद।

कुछ छीनीं कुछ दे गया, रिश्तों की बुनियाद।।

5.

 लाना नूतन वर्ष तुम, हर्ष और उल्लास।

 जीवन में शुचिता रहे, मन में रहे उजास।।

6.

पलक सजे सपने नए, बाँध नई उम्मीद।

नए साल तू सुन ज़रा, खुशियों की हो दीद।।

7.

नए साल से कर रहा, दिल इतना इसरार।

ग़ुल हों ग़ुल- सा साथ हो, चुभे न कोई खार।।

8.

जीवन हमने यूँ जिया, ज्यों नदिया के पाट।

कुछ कदमों की दूरियाँ, जीवन भर की बाट।।


कविताः अंतराल

 -  भावना सक्सैना 



एक स्मृति की खोह है 

काली अँधेरी- सी कहीं 

मैं निकल आई हूँ उससे 

खींचती फिर वो वहीं…

 

कुछ अधूरे पन्ने हैं 

जिन पर लिखा जाता नहीं 

है कलम अब मौन प्रतिपल 

स्याही भी सूखी हुई- सी। 

 

गीत कुछ भूले हुए से 

मन की तह को टोहते 

विस्मृत किसी कंदरा से

स्वर उभरते वेदना के 

 

कैसे लौटूँ उस जगह 

दर जहाँ अब है नहीं 

लौटने का अर्थ होगा 

छोड़ना फिर खोह नई  


भूलना वह सब भी जो 

राहें सिखाती चल रहीं 

जो वहाँ से थी चली 

वो तो अब हूँ भी नहीं। 

 

समय रथ के पहिए संग 

विवर फैलते रहे 

विगत और वर्तमान को

कोई कैसे लेकर संग चले

 

मन ये अक्सर सोचता है  

कुछ नहीं अब है वहाँ 

कोई स्वर दबा फिर पूछता 

क्या सच में सब चुक गया?


अब वहाँ चेहरे हैं जो 

समय के सब चिह्न लिये 

पहचानते मुझको नहीं 

ज्यों अजनबी उनके लिए 

 

बरसों की इस राह ने 

बदला मुझे बदला उन्हें 

चली थी जो वहाँ से 

वो तो अब मैं हूँ नहीं। 

 

बरसों के अंतराल 

पाटने सरल नहीं 

फिर भी नित गहरे भीतर 

आस तो पलती रही। 

 


आस की कश्ती पकड़

चल समय संग बहते रहें 

कौन जाने कब कहाँ 

बिछुड़े हुए आकर मिलें।


उर्दू व्यंग्यः मुझे मेरे धोबी से बचाओ

 मूल लेखक- मुजतबा हुसैन , अनुवाद-  अखतर अली 
कल मिर्ज़ा से मुलाक़ात हुई तो वो बहुत उखड़े- उखड़े से नज़र आने लगे। मैं परेशान कि आखिर इन्हें हुआ, तो हुआ क्या, क्यों मुँह फुला कर बैठे है? मैंने कारण पूछा तो कहने लगे- कल सदर बाज़ार में तुमको कितनी आवाज़ दी; लेकिन तुम तो ऐसे अनजान बन कर चले गए, जैसे चुनाव जीतने के बाद उम्मीदवार चला जाता है। मैं तुमको सामाजिक आदमी समझता था; लेकिन तुम तो राजनैतिक प्राणी निकले।

मैं परेशान हैरान कि मिर्ज़ा आवाज़ दे और मैं न पलटूँ? लेकिन कल उनकी आवाज़ पर मैं पलटता तो पलटता कैसे? मैं तो पिछले आठ दिन से सदर बाज़ार गया ही नहीं हूँ। मैंने मिर्ज़ा को बहुत समझाने की कोशिश की कि कल सदर बाज़ार गया ही नहीं था; लेकिन वे तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं। बस एक ही बात कहे जा रहे हैं- मैंने तुमको अपनी आँखों से वहाँ देखा था, जहाँ तुम अपना वही एकमात्र भूरे रंग का सूट पहन कर तेज़ कदमों से जा रहे थे।
अब मिर्ज़ा को समझाऊँ, तो समझाऊँ कैसे, कैसे यकीन दिलाऊँ कि न तो मैं कल सदर बाज़ार गया था और न ही अपना वह एकमात्र सूट ही पहना था; क्योंकि वह सूट तो धोबी को धोने के लिए दिया है । लेकिन मिर्ज़ा तो इस कदर नाराज़ थे, मेरी बात पूरी सुने भी नहीं और चले गए।
वे तो निकल गए; लेकिन मैं यह सोचकर टेंशन में आ गया कि मिर्ज़ा तो पाँच वक्त का नमाज़ी है। वह तो झूठ बोल नहीं सकते। पर ये कैसे हो सकता है कि कल मैं सदर बाज़ार गया और यह बात मु्झे ही मालूम नहीं और गया भी तो वह सूट पहनकर गया, जो मेरे पास है ही नहीं। कल तो मैं अपने घर पर अपनी बीवी के साथ था, अगर मैं सदर में था तो घर में मेरी बीवी के साथ कौन था और अगर मैं घर में था, तो फिर सदर में कौन था? अगर मैं भूरा सूट पहनकर गया था, तो धोबी को किसका भूरा सूट धोने के लिए दिया  हूँ? बस तभी दिमाग़ की खिड़की खुली और उसमें समझ की रौशनी आई और सारा मामला साफ़ हो गया कि न मिर्ज़ा झूठे न मैं झूठा। मिर्ज़ा ने मुझे देखा यह भी सच और वह मैं नहीं था, यह भी सच। मिर्ज़ा जिसे 'मैं हूँ' समझ रहे थे, वह मैं नहीं बल्कि मेरा सूट था और आवाज़ मुझे नहीं, मेरे सूट को दी जा रही थी, जिसे मेरा धोबी पहनकर सदर बाज़ार में घूम रहा था।
धोबी के इस कपड़ा पहनो अभियान से कई बार मैं मुसीबत में पड़ चुका हूँ । उसे डाँटा भी और प्यार से भी समझाया कि तुम्हें कपड़े धोने के लिए दिए जाते हैं, पहनने के लिए नहीं; लेकिन वह अपनी आदतों से बाज़ आता ही नहीं है। वह तो मेरे कपड़े पहन मस्त घूम रहा है और यहाँ मेरे मिर्ज़ा जैसे अच्छे लोगों से सम्बंध ख़राब हो रहे हैं। एक दिन तो मेरे बच्चे मेरे धोबी के पीछे पापा- पापा कहकर दौड़ पड़े थे। जब उसने उन्हें गोद में लिया, तब उन्हें पता चला कि ये पापा नहीं है।
एक दिन जब मैं सिर्फ टॉवेल लपेटे छत पर टहल रहा था, तो क्या देखता हूँ- नीचे सड़क पर मेरा धोबी मेरे ही कपड़े पहने शान से चला आ रहा है। मेरी तो जान जल गई। जी कर रहा था कि अभी जाऊँ और अपने कपड़े उतारकर उसे सरे राह नंगा कर दूँ;  लेकिन मैं उसे नंगा करने नहीं जा सकता था; क्योंकि उस समय मैं ख़ुद नंगा था।
जब मेरे ढंग के कपड़े मेरा धोबी पहनकर शान से घूमता है, उस वक्त मैं अपने बेढंगे कपड़ों में टहल रहा होता हूँ। जी करता है, अगर अब कभी धोबी मेरे कपड़े पहने दिखा तो उसकी वह हालत करूँगा कि उसका जिस्म कपड़े पहनने लायक ही नहीं रहेगा। और एक दिन यह मौका मेरे को मिल ही गया- मैंने लपककर उसका कॉलर पकड़ लिया। इसपर वह चिल्लाकर बोला- ''कॉलर मत खींचिए। आपका ही कमीज़ है, फट गया, तो उसके ज़िम्मेदार आप ख़ुद होंगे, मैं नहीं।'' उसकी धमकी सुनते ही मेरा हाथ ढीला पड़ गया और वह भाग गया। एक दो बार तो उसने मेरे प्रकाशित लेख की बधाई भी स्वीकार कर ली है।
जब भी मैं अपने धोबी को अपने कपड़े पहने देखता हूँ, तो मुझे सुना हुआ एक किस्सा याद आ जाता है कि एक साहब अपने रिश्तेदार के घर मेहमान होकर गए और जितने भी दिन रहे, उनकी  ही चीज़ें  इस्तेमाल करते रहे। उनका रिश्तेदार उनकी इस हरकत से इतना परेशान हो गया था कि एक दिन अपने पड़ोसी को बताने लगा कि यह तो अजीब आदमी है्। इसको दाढ़ी बनानी होती है, तो मेरा शेविंग सेट इस्तेमाल करता है। नहाने के बाद मेरे टॉवेल से बदन पोंछता है, बाहर जाता है, तो मेरे जूते पहनकर जाता है। मुझे यह सब मंजूर है;  लेकिन कम से कम पान चबाने के लिए तो मेरे दाँतों का सेट इस्तेमाल न करें, लेकिन वह तो दाँतों का सेट भी मेरा ही इस्तेमाल करता है और मुझ पर मेरे ही दाँत दिखाकर हँसता है।
मुझे मेरे धोबी ने इतना परेशान कर दिया है कि जी करता है- धोबी को धो डालूँ और निचोड़कर सुखा दूँ। उसकी हिम्मत तो दिन- ब- दिन बढ़ती ही जा रही है। एक दिन मैंने उसको अपनी काली पेंट धोने के लिए दी, तो कहता है इसके साथ का सफ़ेद शर्ट भी दीजिए। मैंने कहा- ''अभी सफ़ेद शर्ट इतनी गंदी नहीं हुई है।'' मेरा जवाब सुनकर वह नाराज़ हो गया और कहने लगा- ''कपड़े धुलवाने का यह ठीक तरीका नहीं है। मुझे एक शादी में जाना है। अब वहाँ काली पेंट के ऊपर नीला पीला शर्ट पहनूँगा, तो क्या अच्छा लगेगा? 
किसी मनचले ने धोबी के सम्बंध में कहा है- धोबी वह शख्स होता है, जो कपड़ों से पत्थर को फोड़ता है, अतः जब भी धोबी मेरे कपड़े धोकर लाता, मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता कि लो मेरे कपड़े पत्थर फोड़कर आ गए। मेरे कपड़ों की हालत इस बात की गवाह होती कि उन्होंने पत्थर तोड़ा है। कभी शर्ट का कॉलर मुड़ा हुआ हो, तो कभी पेंट फटी हुई होती। एक दिन धोबी मेरा पाजामा धोकर लाया, तो मैं अपना पाजामा देखकर सकते में आ गया, मैंने धोबी से कहा- ''भाई इसमें पहले दो पाँयचे हुआ करते थे। तुम तो एक ही लाए हो, दूसरा कहाँ गया?"
धोबी ने लापरवाही से कहा- "अरे किसी के पास चला गया होगा। मैं फिर जब आऊँगा, तो लेता आऊँगा।'' लेकिन फिर वह कभी उसे लेकर नहीं आया। वह अकेला पाँयचा अपने साथी पाँयचे से बिछड़कर उदास- सा अलमारी में पड़ा रहता है। एक वक्त था,  जब दोनों की जोड़ी ने कितनी ही महफ़िलों में धूम मचाई थी, लेकिन इस धोबी की वजह दोनों एक दूसरे से बिछड़ गए। जब भी मैं उस पाजामे को देखता हूँ,  तो गाने लगता हूँ “दो हंसो का जोड़ा बिछड़ गयो रे ....”
इस धोबी की हरकतों के कारण मैं कई बार अपमानित हो चुका हूँ। एक बार धोबी कपड़े धोकर लाया,  तो उसमें मेरी सफ़ेद शर्ट नहीं थी। मैं जिद में अड़ गया कि मुझे मेरी सफ़ेद शर्ट चाहिए< तो बस चाहिए। तो उसने मुझे एक लाल शर्ट लाकर दे दी कि फ़िलहाल इस शर्ट को बतौर ज़मानत रख लीजिए। मैंने बहुत मना किया कि मुझे  किसी और की शर्ट अपने पास नहीं रखनी है: लेकिन वह माना नहीं और वह लाल शर्ट मुझे देकर ही माना। एक दिन मेरे पास कोई धुली हुई शर्ट नहीं थी,  तो वही लाल वाली शर्ट पहनकर बाज़ार चला गया। अभी चार कदम ही चला था कि पीछे से एक साहब ने मेरा कॉलर पकड़ लिया और कहा – ''क्यों बे कपड़ा चोर, उतार मेरी शर्ट या चल पुलिस थाने। पुलिस का नाम सुनते ही मेरी तो पुई हो गई। मरता क्या न करता, बीच बाज़ार में शर्ट उतारकर उन साहब को दे दी और खुद नंगा घर आया। 
एक दिन तो धोबी ने हद ही कर दी। कपड़े की दुकान पर मुझे कपड़े खरीदते देख लिया। मैं कपड़े लेकर दर्जी की दुकान पर गया, तो दर्जी ने कपड़े लेकर कहा बुधवार को दे दूँगा। मैंने कहा- वह तो ठीक है; पर पहले मेरा नाप तो ले लो। दर्जी बोला- उसकी कोई ज़रूरत नहीं है; क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले ही आपका धोबी अपना नाप देकर गया है। सच कहता हूँ पाठकों उस दिन से हर रोज़ मैं यही दुआ माँगता हूँ- “या अल्लाह मुझे मेरे धोबी से बचाओ!'  
                                                                            ■
सम्पर्कः निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल , आमानाका , रायपुर ( छत्तीसगढ़ ) 492010, मो. 9826126781

लघुकथाः जिम्मेदारी

 -  अनिता मंडा 
   नेहा को प्रसव-पीड़ा उठी तो मारे दर्द के उसने आँखें भींच ली, पर होंठ मुस्कुरा रहे थे। नौ महीने की अनवरत तपस्या का फल अब देखने को मिलेगा, इस भाव से मन आह्लादित हो उठा। घर-भर को जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। सासू माँ शारदा देवी ने जरूरी सामान जल्दी-जल्दी थैले में भरा और वह कस्बे के सरकारी अस्पताल ले गई।  भर्ती की औपचारिकता पूरी की। नेहा को नर्स भीतर ले गई। सास-ससुर बाहर प्रतीक्षा में बैठ गए। भीतर से कभी नेहा के छटपटाने आवाज़ बाहर आती, तो कभी नर्स की डाँट-डपट भरी गला-फाड़ निकलती आवाज़, बरामदे  में गूँज उठती। 

        कस्बे में अच्छे अस्पताल की कमी ही थी। फिर भी घर में जचकी सुरक्षित नहीं थी। यही सोचकर उन्होंने अस्पताल आने का चुनाव किया था; लेकिन नर्स का लगातार बड़बड़ाना सुनकर शारदा जी का मन कच्चा-पक्का हो रहा था वह भीतर जाकर नेहा को तसल्ली दे रही थी-  "हिम्मत रखो बेटा, बड़ी खुशी के लिए दर्द भी बड़ा सहना पड़ता है।"

नर्स का बोलना एक ट्रैक पर चल रहा था- "अब क्यों चिल्लम-चिल्ली मचा रखी है । उस टाइम तो बड़ा मज़ा आया होगा।" 

असहज करने वाली बातें पसीने से तर नेहा के माथे पर किसी हथौड़े की तरह  पड़ रही थी। 

   गला सूखने पर नेहा ने पानी माँगा, तो फिर नर्स ने आकर बाल खींच दिए और बोली- "तू ही है एक नाजुक कली; पहले तो मज़े उठाते हो और अब फ़रमाइशी गीत गा रही हो।" 

नेहा के माथे पर पड़े बल देखकर, शारदा जी समझ गई कि नेहा से नर्स की जली-कटी नहीं सुनी जा रही।

नर्स फिर चिल्लाई- "बच्चा पैदा कर रही हो, तो दर्द तो होगा ही, पहले नहीं पता था क्या?"  सप्तम स्वर में कही गई बातें, दरवाजे की मर्यादा तोड़ बाहर बरामदे में तैर रही थी। शारदा जी ने बहुत संयत स्वर में कहा- "बहन जी आप तो बहुत अनुभवी लगती हैं। बहुत सारे बच्चे आपकी आँखों के सामने जन्मे होंगे।" 

नर्स को थोड़ा अभिमान हो आया- "और नहीं तो क्या, आधा गाँव मेरे सामने ही पैदा हुआ है।" 

"बहन जी आप तो बहुत बड़ा पुण्य का काम कर रहे हैं, सेवा करना सबके नसीब नहीं मिलता न,"शारदा जी ने नर्स को साधते हुए कहा। 

"सही कह रही हो माता जी; यह नौकरी नहीं होती, तो मेरे बच्चे भूखे मर जाते। आज इंजीनियर हैं बड़ी-बड़ी कंपनियों में,"नर्स का सीना गर्व से फूल गया।

"तब तो आप पक्का ही समझते हो इस समय स्त्रियों को कितना प्यार-दुलार चाहिए। सृष्टि रचयिता ईश्वर ने यह महान जिम्मेदारी स्त्री को दी है। यह गौरव के पल हैं बहन जी!  हौसला बढ़ाओ इस पल। यूँ जली-कटी सुनाने से आपका मन भी तो दुखता होगा।" शारदा जी अपनी बहू नेहा के माथे से पसीना पौंछते हुए नर्स से कहती जा रही थी।" प्यार और सम्मान से बात करना हम सबकी जिम्मेदारी है।"

"माफ कर दो माताजी, इस तरह तो हमें कभी किसी ने समझाया ही नहीं।  हमने तो जैसा होता देखा, वही कर रहे थे।" नर्स के चेहरे पर ग्लानि साफ झलक रही थी। 

"तो आपकी यह जिम्मेदारी है कि आप यह सिखाओ अपने स्टाफ को।" शारदा जी ने नर्स की हथेली दबाते हुए कहा । 

परेशान नेहा के चेहरे पर सुकून की मुस्कान खिल गई। ■

लघुकथाः लूट

  - हरीश करमचन्दाणी

लम्बे, कँटीले, सूखे झाड़ हाथों में ऊँचा किए, वे लड़के आकाश में टकटकी लगाए मैदान में खड़े थे। हवा उस तरफ की नहीं थी, जिधर बड़े मकान थे, उस तरफ हवा बह रही थी। पतंग भी उस ओर ही उड़ रही थी। फटे पुराने मैले कुचले कपड़े पहने वे लड़के निराश नहीं थे। हालाँकि पतंगें उनकी ओर नहीं थी, मगर वे उत्साह से चीखते- चिल्लाते हवा के रुख बदलने का इन्तजार कर रहे थे।

लड़के पतंग उडा़ना चाह रहे थे; पर उनके पास पतंगें नहीं थीं। उन्हें इन्तजार था कि कोई पतंग कटकर उनकी तरफ गिरे। उन्होंने आपस में यह तय सा कर लिया था कि पतंगें मैदान में गिरेंगी तो बारी-बारी से वे आपस में बाट लेंगे; क्योंकि यदि छीनाझपटी करेंगे, लूटने से तो पतंग कटफट जाएगी।

हवा रुख बदलने लगी थी। अचानक एक पतंग कटकर मैदान की तरफ आती दूर से दिखी। पतंग बड़े मकानों को उलाँघती मैदान के ऊपर आ रही थी। लड़के भागते उसी दिशा की और पहुँचे। उन्होंने अपनी झाड़ियाँ पतंग में अड़ाने के लिए ऊँची करने के बजाय नीचे कर ली थीं कि कहीं पतंग फँसकर फट न जाए। बड़ी मुश्किल से तो कोई पतंग आई थी। लड़के खुशी से उछल रहे थे। 

पतंग ठीक उनके सिर पर से होती हुई आगे बढ़ रही थी, बादल के टुकड़े की तरह लगती। वे चाहते, तो जरा झाड़ ऊँचा करके पतंग लूट लेते; पर वे झूमते- से सिर उठाए पतंग के पीछे थोड़ा- सा तेज चाल से हो लिये।

एकाएक गिरती पतंग थोड़ी ऊँची उठी और देखते-देखते तनकर लहराने लगी। लड़कों ने मुड़कर पीछे देखा, ऊँचे मकान की छत से एक लम्बे बाँस की मदद से पतंग की डोर को किसी ने पकड़ लिया था। पतंग अब उनकी पहुँच से परे थी।

कविताः रिश्ते बोनसाई नहीं बनते

   - मंजु मिश्रा


जीवन में प्यार

रूठना मनाना सब

सही समय पर

सही अनुपात में ...

बिलकुल सब्ज़ी में

मसालों-सा रखो

तो जीवन में

खुशियों का स्वाद

बरकरार रहता है

जरा-सा कुछ

ऊपर नीचे हुआ नहीं

कि बस

मामला गड़बड़ा ही जाता है ...

जिंदगी का मज़ा खतम हो जाता है


कब

कितना

बाँधना है

कब

कितना

स्वतंत्र करना है

इसका भी

सही समय और

सही अंदाजा

सही-सही माप-तौल

बहुत ज़रूरी है

वरना बोनसाई बनाने के चक्कर में

रिश्ते मर ही जाते हैं

जीवन दर्शनः बनिये उत्साह का कारण

  - विजय जोशी 

- पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

     पेरिस के ऑपेरा हाउस में वर्षों पूर्व घटित इस कहानी ने मुझे कई बार अंदर तक छुआ है, जब एक मशहूर गायक का कार्यक्रम आयोजित किया गया था और जिसके टिकट काफी समय पूर्व ही बिक चुके थे। लोगों में प्रस्तुति को  लेकर बहुत उत्सुकता थी तथा हॉल समय पूर्व ही खचाखच भर चुका था।
    उन्हीं पलों में कार्यक्रम आरंभ होने से ठीक पहले आयोजक ने मंच पर आकर यह घोषणा की कि हमारे आज के मशहूर गायक अचानक बीमार हो गए हैं; अतः स्टेज पर नहीं आ पाएँगे, लेकिन उनके स्थान पर एक अत्यंत प्रतिभाशाली नौजवान अब अपने संगीत की प्रस्तुति देंगे।
       यह सुनते ही भीड़ बैचेन हो गई; किन्तु इसके बावजूद नए कलाकार ने बगैर हतोत्साहित हुए पूरी तन्मयता के साथ शोर- शराबे के बीच अपना संगीत पेश किया। समाप्ति पर किसी ने भी ताली नहीं बजाई।
     तभी एक चमत्कार हुआ और वह यूँ कि भीड़ में से एक बच्चा अचानक खड़ा होकर बोला : अद्भुत, अद्भुत, अद्भुत। मैं मानता हूँ आपका संगीत बेहद सुंदर था और यह कहते हुए उसने अपने दोनों हाथों से ताली बजाकर नए कलाकार का अभिनंदन किया। तभी एक और चमत्कार हुआ और वह यह कि पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
       बात का संदर्भ यह है कि हममें से हर एक को जीवन ऐसे अवसर देता है, जिसे सार्थक कर पाना हमारे वश में होता है और उन पलों में ऐसे ही लोगों की जरूरत रहती है< जो धारा के विरुद्ध खड़े होकर अच्छे तथा सच्चे लोगों का उत्साह बढ़ा सकें। सो अगली बार न तो सोचिए और न ही किसी भेड़ चाल के अनुगामी बनकर अवसर की अस्मिता को व्यर्थ कीजिए। अच्छाई का पूरा सम्मान करते हुए उसके साथ खड़ा हो जाइए एकला चालो की तर्ज पर।
भलाई कर भला होगा, बुराई कर बुरा होगा।
कोई देखे न देखे पर ख़ुदा तो देखता होगा ।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Dec 1, 2024

उदंती com, दिसम्बर - 2024

वर्ष- 17, अंक- 5

जो फूलों को देखकर मचलते हैं

 उन्हें काँटे भी जल्दी लगते हैं।

        - सुभाष चंद्र बोस

इस अंक में 

अनकहीः गाँव के सरकारी स्कूल ... - डॉ. रत्ना वर्मा

संस्मरणः शांतिदूत की झलक - शशि पाधा

कविताः 1.प्यार, 2. नदी बन जाऊँ 3. उधार की जिंदगी - सुदर्शन रत्नाकर  

स्वास्थ्यः छोटी झपकियों के बड़े फायदे

आलेखः सुवाक्यों की अनोखी दुनिया - डॉ. महेश परिमल

आलेखः उठने लगी आबादी बढ़ाने की माँग - प्रमोद भार्गव

प्रेरकः द्वार पर सत्य - निशांत

शब्द चित्रः हाँ धरती हूँ मैं - पुष्पा मेहरा

हाइकुः हवा बातूनी - डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

स्मरणः रोहिणी गोडबोले - लीलावती की एक बेटी - अरविन्द गुप्ता

लघुकथाः  1. नागरिक, 2.  हैड एंड टेल, 3. अंन्ततः - सुकेश साहनी

लघुकथाः खाली-खाली भरा-सा - प्रगति गुप्ता

कविताः नदी नीलकंठ नहीं होती - निर्देश निधि

संस्मरणः मेरी, वे दो शिक्षिकाएँ - अंजू खरबन्दा

कविताः बंद किताब - नन्दा पाण्डेय

व्यंग्यः मुझे भी वायरल होना है - डॉ. मुकेश असीमित

लघुकथाः जूते और कालीन - चैतन्य त्रिवेदी

कविताः उठो स्त्रियो! - डॉ. सुरंगमा यादव

बालकथाः बहादुर चित्रांश - निधि अग्रवाल

कविताः शुक्रिया नन्ही दोस्त! - डॉ. आरती स्मित

किताबेंः ‘लघुकथा- यात्रा’ लघुकथाओं का दस्तावेज -  रश्मि विभा त्रिपाठी

जीवन दर्शनः रोवन एटकिंसन उर्फ़ मिस्टर बीन - विजय जोशी


अनकहीः गाँव के सरकारी स्कूल ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

पिछले दिनों एक ऐसी खबर पढ़ने को मिलीं जिससे यह सोच और बलवती हुई कि यदि मन में ठान लें तो क्या कुछ हासिल नहीं कर सकते। खबर छत्तीसगढ़ में घने जंगलों के बीच बसे रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड में संचालित एक शासकीय प्राथमिक विद्यालय लामीखार गाँव की है। समाचारपत्रों में यह खबर कुछ इस तरह प्रकाशित हुआ था कि- ‘सरकारी विद्यालय होने के बावजूद कई निजी विद्यालय को पछाड़ कर लामीखार में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थी सबको मात दे रहे हैं।’ यद्यपि इस प्रकार टिप्पणी करने से सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता और हमारी शिक्षा व्यवस्था पर कई सवाल उठ खड़े होते हैं। 
परंतु लामीखार के इस स्कूल ने अन्य सरकारी स्कूलों के समक्ष एक उदाहरण पेश किया है।  जिले के अंतिम छोर पर बसा लामीखार गाँव बहुत पिछड़ा हुआ है, जहाँ जंगली हाथियों का आतंक भी छाया रहता है।  पहले लोग इस गाँव को जानते भी नहीं थे। लेकिन अब इस प्राथमिक विद्यालय के बच्चों की विशेष उपलब्धि के बाद इसकी एक नई पहचान बनी है। खास बात यह है कि इस प्राथमिक शाला के 8 बच्चों का चयन नवोदय विद्यालय में हो चुका है। इतना ही नहीं शाला के स्वच्छ वातावरण और अच्छी पढ़ाई को देखते हुए आस- पास के शहरों में रहने वाले अभिभावक गाँव में किराए का मकान लेकर अपने बच्चों को इस विद्यालय में पढ़ने भेज रहे हैं। 
यह सब इसलिए संभव हुआ है क्योंकि इस विद्यालय के शिक्षकों ने पढ़ाई के तरीकों में बदलाव तो किया ही साथ ही विद्यालय के वातावरण को भी विद्यार्थियों के लिए रुचिकर बनाया। पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयों के अलावा भी बच्चों को सामान्य ज्ञान की शिक्षा  खेल- खेल में  दी जाती है।  धरती, आकाश, नदी, जंगल, जानवर, यहाँ तक कि गणित जैसे विषय को समझाने के लिए स्कूल परिसर में ही उनकी कलाकृतियाँ या मॉडल बना दिए गए हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि यहाँ के  शिक्षकों नें अपने निजी खर्च से बच्चों के लिए प्रयोगशाला और लाइब्रेरी सहित कई अन्य संसाधन भी जुटाए हैं। 
इस पाठशाला के शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए शिक्षक निरंजन लाल पटेल  पिछले कई वर्षों से प्रयास करते आ रहे हैं। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले बच्चों के अभिभावकों को तैयार किया ताकि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित हों। आस- पास के पर्यावरण और स्वच्छता के लिए गाँव के लोगों को भी जागरुक किया। परिसर में किचन गार्डन, ऑक्सीजोन और बागवानी के साथ अनुपयोगी वस्तुओं से गणित और विज्ञान की पढ़ाई के लिए विभिन्न उपकरण तैयार किए गए हैं। कुल मिलाकर इस स्कूल का भवन भले ही छोटा है पर पूरा परिसर बच्चों को पढ़ाई के प्रति आकर्षित करने वाले संसाधनों से भरा भड़ा है।  
 सवाल यही उठता है कि जब एक छोटे से गाँव का यह शासकीय स्कूल कम संसाधनों में भी बेहतर शिक्षा का वातावरण बना सकते हैं तो फिर अन्य स्कूल ऐसा क्यों नहीं कर सकते। आवश्यकता सिर्फ दृढ़ इच्छा शक्ति और लगन की है; परंतु यह दुर्भाग्य है कि आजादी के के बाद हम शासकीय स्कूलों की स्थिति को बजाय सुधारने के बिगाड़ते ही जा रहे हैं। 
एक तरफ तो ऐसे हजारों निजी स्कूल हैं, जिन्होंने अच्छी पढ़ाई और सुविधाओं के नाम पर लाखों की फीस वसूलते हुए शिक्षा के मंदिर को व्यवसाय बना दिया हैं। इन स्कूलों में वही बच्चे पढ़ाई कर सकते हैं, जिनके अभिभावक उतना खर्च उठाने के काबिल होते हैं और जो इस काबिल नहीं होते उनके लिए होते हैं यही सरकारी स्कूल, जहाँ सरकार न सुविधा देती न साधन न शिक्षक। हमारे देश के अनेक ऐसे ग्रामीण स्कूल हैं जहाँ एक या दो शिक्षक ही कई - कई कक्षाओं को पढ़ाते हैं।   
ऐसे ही कई कारण हैं कि शासकीय स्कूल से पढ़ाई कर उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या गिनती में होती है और सिर्फ उदाहरण के रूप में उनका नाम लिया जाता है। आज भी हम बिल्कुल उसी तरह  धरमजयगढ़ स्कूल का उदाहरण पेश कर रहे हैं। यह हमारे लिए और हमारी सरकार के लिए कितने शर्म की बात है कि, यह कहकर हम खुश होंते हैं कि देखो यह बच्चा शासकीय स्कूल में पढ़ाई करने के बावजूद आज इतनी ऊँचाईं  पर पहुँचा है। जबकि होना तो यह चाहिए कि शासकीय स्कूल में पढ़ने वाला हर बच्चा एक उदाहरण बने ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।  
सबसे पहले तो स्कूल प्रशासन को मजबूत बनाया जाए ताकि शिक्षा की गुणवत्ता पर नियमित निगरानी हो सके और शिक्षा नीति का सही क्रियान्वयन हो, शिक्षकों को शिक्षण विधियों और तकनीकों के बारे में नियमित प्रशिक्षण दिया जाए, शिक्षकों की पर्याप्त संख्या हो ताकी शिक्षक प्रत्येक छात्र पर पर्याप्त ध्यान दे सकें। इसके साथ ही स्थानीय समुदाय को स्कूलों के विकास और निगरानी में शामिल करना चाहिए, ताकि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने और उनकी शिक्षा में सहयोग करने के प्रति जागरूक हों सकें।  स्कूल के लिए पर्याप्त भवन हो, साफ-सफाई की व्यवास्था हो, पेयजल, बिजली, शौचालय और खेल-कूद की सुविधाओं को गंभीरता से लिया जाए, स्कूलों में किताबों के अलावा कंप्यूटर, स्मार्ट क्लासरूम, प्रोजेक्टर आदि आधुनिक शैक्षिक सामग्री और तकनीकी साधनों की व्यवस्था हो। 
इन बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद ही हम प्रत्येक शासकीय स्कूल को उदाहरण योग्य बना सकते हैं। लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य है कि व्यवस्था के अंतर्गत उपर्युक्त सभी बातें आती तो हैं परंतु उनपर अमल करने में कोताही बरती जाती है। या तो इन स्थानों पर राजनिति होती है या सारी योजनाएँ भ्रष्टातार की भेंट चढ़ जाती हैं। यही वजह है कि जब धरमजयगढ़ जैसे शासकीय स्कूल के कुछ शिक्षक अपने प्रयास से ऐसा कुछ उदाहरण पेश करते हैं तो वह खबर बन जाती है।

संस्मरणः शांतिदूत की झलक

  - शशि पाधा     

यह प्रसंग वर्ष 1998 के आस-पास का है। कारगिल के भयंकर युद्ध में कितने ही शूरवीरों ने अपनी  जान की आहुति दी थी। पूरे देशवासियों का हृदय दुःख, क्षोभ एवं ग्लानि के मिले जुले भावों से छलनी था। युद्ध पहले भी होते रहे हैं, सीमाएँ पहले भी रक्तरंजित होती रही हैं, किन्तु यह युद्ध सीमाओं के साथ- साथ जनता के घरों में, टीवी स्क्रीन पर भी लड़ा जा रहा था। हरेक क्षण का वृत्तांत सामने देखकर शत्रु के प्रति आक्रोश और युद्ध में विजयी होने की प्रबल भावना हर भारतीय के खून में खौल रही थी। उन्हीं दिनों भारत-पाक सीमा से सटी हुई एक चैक पोस्ट पर मैंने जो दृश्य देखा, उसने मेरे मन- मस्तिष्क पर एक अमित छाप छोड़ दी।

पंजाब राज्य के फिरोजपुर शहर की छावनी में स्थित है ‘हुसैनी वाला ‘चेक पोस्ट’। इस पोस्ट पर भारत –पाक सीमा को निर्धारित करते हुए लोहे की सलाखों वाले दो बड़े –बड़े से काले रंग के प्रवेश द्वार हैं। प्रवेश द्वारों में से एक के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है भारत और दूसरे के ऊपर पाकिस्तान। दोनों के बीच परेड स्थल है, जिसे सैनिक भाषा में  ‘ज़ीरो लाइन’ कहा जाता है। सादी भाषा में वो ज़मीन का टुकड़ा किसी देश की सम्पत्ति नहीं। द्वार के ठीक पीछे दोनों देशों की दर्शक दीर्घा बनी हुई है, जहाँ बैठ के दर्शक हर शाम अपने-अपने देश का राष्ट्रीय झंडा उतारने की परेड देख सकते हैं।

इस परेड का विशेष आकर्षण यह है कि दोनों देशों के सुरक्षा बलों के सैनिक  छह फुट से भी लम्बे, बड़ी ही आकर्षक वर्दी में आकर अस्त्र- शस्त्रों के साथ अपने जूतों को ज़मीन पर पटक–पटककर परेड करते हुए अपने-अपने देश के झंडे को सलामी देने का बाद उसे उतारकर रात के लिए सहेज देते हैं। इन सैनिको के जूतों मे लोहे की प्लेटें लगी होती हैं और जब यह पैर को जोर से उठाकर जमीन पर मारते हैं तो ऐसा लगता है कि शत्रु के सामने अपने बल का प्रदर्शन कर रहे हों। जब दोनों ओर के सैनिक आमने-सामने होते हैं तो एक दूसरे की आँख में ऐसी नोकीली नज़रों से देखते हैं मानों आँखों से निगल जायेंगे।  

परेड आरम्भ होने से पहले दोनों देशों की दर्शक दीर्घाओं के आस-पास देश भक्ति और सेना के शौर्य का बखान करते हुए फ़िल्मी गाने पूरे जोर शोर से लाउडस्पीकर पर बज रहे होते हैं। कुछ दर्शकों के हाथ में अपने अपने देश का झंडा होता है जिसे वे बड़े गर्व के साथ लहराते हैं। कुल मिलाकर एक उत्सव का वातावरण सा हो जाता है। और, हो भी क्यूँ नहीं? वह एक ऐसा स्थल है जिस पर किसी का अधिकार नहीं। वहाँ पर जमीन के चप्पे-चप्पे के लिए मनुष्य-मनुष्य को मारने के लिए घात लगाये नहीं बैठा है। वो तो प्रेम और सौहार्द बाँटने का स्थल है।

यह पूरा कार्यक्रम लगभग आधे घंटे का होता है।  वहाँ का दृश्य भी बड़ा रोमांचक सा होता है। जब भारतीय सैनिक बल प्रदर्शन करते हैं तो पाक दर्शक दीर्घा में सन्नाटा होता है और भारतीय दर्शक ज़ोर-जोर से करतल ध्वनि के साथ अपने सैनिकों का अभिवादन करते हैं। जब पाक सैनिकों का बल प्रदर्शन होता है तो हमारी ओर  चुप्पी होती है लेकिन उस ओर के दर्शक और भी जोर से ताली बजाकर अपने सैनिकों को शाबाशी देते हैं।  यह एक सैनिक परम्परा है, इसे वर्षों से निभाया जा रहा है।

 हम उन दिनों फिरोजपुर में ही रहते थे। हमारे पास  बहुत से मेहमान इसलिए भी आते थे ताकि इस आकर्षक परेड का आनन्द ले सकें। हुसैनी वाला के इस गेट के थोडा सा पहले सतलुज नदी के किनारे एक बाग़ है, जिसमें  भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन को होम करने वाले तीन स्वतंत्रता सेनानियों अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव का समाधि स्थल है, जिसे ‘राष्ट्रीय शहीद स्मारक’ के नाम से जाना जाता है।  कालान्तर में यहीं पर उनके साथी बटुकेश्वर दत्त का भी 1965 में अन्तिम संस्कार किया गया। भगतसिंह की माँ विद्यावती की इच्छा का मान रखते हुए उनका  अन्तिम संस्कार भी यहीं किया गया था। 

सतलुज नदी के इस पुल का सामरिक महत्त्व भी है। तीन दिसंबर, 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान हुसैनीवाला पुल ने ही फिरोजपुर को बचाया था। उस समय पाकिस्तानी सेना ने भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के शहीदी स्थल तक कब्जा कर लिया था। तब अपनी जान पर खेलकर भारतीय सेना ने पुल उड़ाकर पाकिस्तानी सेना को अपने देश की सीमा में प्रवेश करने से रोका था। उसके बाद यहाँ लकड़ी का पुल बनाकर हुसैनीवाला सीमा पर जाने का रास्ता तैयार किया गया था। इन अमर वीरो का समाधि स्थल पुल के उस पार स्थित था और सीमा का वह भू भाग पाकिस्तान के अधीन हो गया था। वर्ष 1973 में भारतीय सरकार ने पाकिस्तान के साथ समझौता कर फाजिल्का के 10 गाँवों को पाकिस्तान को सौंपकर शहीदी स्थल को पाक के कब्जे से मुक्त करवाया था। तब से लेकर अब तक सैंकड़ों दर्शक परेड देखने से पहले स्वतंत्रता सेनानियों के इस गौरवशाली स्मारक पर जाकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

मैंने हुसैनीवाला सीमा पर ध्वज उतारने की परेड को कई बार देखा है और हर बार मुझे कुछ नया ही अनुभव होता है। भले ही पाकिस्तान और हिंदुस्तान में युद्ध का वातावरण बना हो, लेकिन हुसैनीवाला बार्डर पर दोनों देशों के बीच दोस्ती और सम्मान की अद्भुत मिसाल रोजाना देखने को मिलती है। यह  देश का वो बार्डर है, जहाँ भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज सूर्योदय के समय फहराए जाते हैं और सूर्यास्त के समय अपनी अपनी धरती पर सम्मान के साथ उतारे जाते हैं। इस रस्म का निर्वाह कई दशकों से हो रहा है। 

इस बार जो दृश्य मैंने देखा वो मेरे मानस पटल पर सदैव के लिए अंकित हो गया। अगर उस समय मेरे पास कैमरा होता, तो उस अद्भुत दृश्य को कैद करके दोनों देशों की सरकारों को तस्वीरें इस आशा से  भेजती कि शायद यह देखकर मानवता का संहार करने वाली, युद्ध जैसी क्रूर  भावनाएँ सदा – सदा के लिए समाप्त हो जातीं।

उस शाम भी परेड हो रही थी। दोनों देशों के सैनिक आकाश को चीरने वाली ध्वनि से अपने पैर पटक-पटककर, शस्त्रों को पूरे बल के साथ उठाकर एक दूसरे को खूँखार दृष्टि से घायल करते हुए परेड कर रहे थे। दोनों ओर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बज रही थीं।  अचानक मेरा ध्यान पाकिस्तान की दर्शक दीर्घा में बैठे हुए एक बच्चे की ओर चला गया। उस नन्हे-मुन्ने की आयु लगभग चार वर्ष होगी। उसने  हरे रंग की कमीज़ पहनी हुई थी (पाकिस्तान का  राष्ट्रीय रंग)। उस दीर्घा में बहुत सी स्त्रियों ने भी हरे दुप्पट्टे और आदमियों ने हरी टोपियाँ पहनी  हुई थीं। उस समय मैंने जो देखा और अनुभव किया वह अपने पाठकों के साथ साझा करने में मेरे शब्द भी शायद कम पड़ जाएँ ...

जब भारतीय सैनिक अपने पूर्ण बल से परेड कर रह थे, तो उस समय भारतीय दर्शक दीर्घा में आकाश भेदती तालियों की गूँज थी, लेकिन पाकिस्तान की पूरी दर्शक दीर्घा में सन्नाटा था। केवल यही मासूम नन्हा-मुन्ना बड़े उत्साह से, ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजा रहा था। मैं अब परेड नहीं देख रही थी। मैं केवल यही देख रही थी कि बच्चा ताली बजा रहा था और उसके अभिभावक बार–बार उसे रोक रहे थे। वह बड़े उत्साह से तालियाँ बजा रहा था और लोग मुड़–मुड़कर उसे देख रहे थे। वह मासूम, नि:छल हृदय क्या जाने कि कौन उसका अपना है और कौन पराया! शायद उसे भारतीय सैनिकों की वर्दी आकर्षक लग रही थी, या पाकिस्तानी सैनिकों की पीठ उनकी दीर्घा की तरफ़ थी और वह उन्हें ठीक से देख नहीं सकता था। या वह भारतीय सैनिकों के चेहरे के हाव–भाव देखकर प्रसन्न हो रहा था। या......वही जाने।

उस शाम मैंने उस बच्चे में उस शान्ति दूत की झलक देखी जिसके अन्दर धर्म, जाति, सीमा, भाषा के विषय में कोई भेदभाव नहीं था। वह , तो एक योगी की तरह केवल सौहार्द और प्रेम का प्रतीक बनकर वहाँ बैठा था। उस मासूम ने वर्ष 65 और वर्ष 71 के भारत-पाक युद्ध की भयानक कहानियाँ भी नहीं सुनी होंगी। वह तो यह भी नहीं जानता होगा कि कुछ माह के बाद ही कारगिल का दिल दहला देने वाला युद्ध होने वाला था।

और ... वहाँ चुपचाप बैठी मैं उसकी तालियों की प्रतिध्वनि में विश्व शान्ति की उद्घोषणा का संदेश सुन रही थी। 

                              

कविताः 1.प्यार, 2. नदी बन जाऊँ 3. उधार की जिंदगी

- सुदर्शन रत्नाकर

1.प्यार

प्यार से छू लो तो

कलियाँ

निखर आएँगी

मौसम की

पत्तियाँ हैं

लहराने दो

पतझड़

आने पर स्वयं ही

बिखर जाएँगी।

2.नदी बन जाऊँ।

मैं बरसों से

प्रतीक्षा कर रही हूँ

उस उजली धूप और

हरी दूब के लिए,

जहाँ एक नदी बहती हो

और मैं भी हिमखंड-सी पिघलती

नदी बन जाऊँ।

निरन्तर गतिशील बहती

अँजुरी-अँजुरी प्यार बाँटती

सागर की गहराइयों में

कहीं खो जाऊँ।

3. उधार की जिंदगी

घोंसला बनाने की चाह में

ज़िन्दगी भर वह

जिंदगी को ढोता रहा

पर

न तो उसे ज़िन्दगी मिली

और

न घोंसला।

टूटता रहा

वह पल-पल

जीता रहा उधार की जिंदगी।