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Feb 23, 2018

पाँच कविताएँ

आवारा सड़क पे
-डॉ. जया 'नर्गिस’
नए दर्द के कपड़े पहने
फिरता है आवारा सड़क पे
भर-भर धूप का प्याला पीकर
गिरता है आवारा सड़क पे

शाम ढले जब पंछी लौटें
दिल उसका रोता है
तारों के पंडाल तले
बीज आँसू के बोता है
घर तो उसका कोई नही
सोता है आवारा सड़क पे

बादल का गमछा है गले में
भरी हवा से जेबें
मन मतवाला स्वप्न सँजोए
खाकर सौ-सौ चोटें
धूल की लहरों पर कश्ती -सा
बहता हूँ आवारा सड़क पे

जी नहीं करता

रात की थाली में
परोसा हुआ
पूरा चाँद
चखने का आज
जी नहीं करता
मन पहले ही
अघाया हुआ है
दिन भर तोड़ी
सूरज की गर्म रोटी से।

बनाएँ रंग ऐसा

आओ चुल्लू भर पानी में
घोलें
बादल और धूप
बनाएँ रंग ऐसा
हालात हो कैसे भी
जिंदगी को जो
न होने दे बदरंग।

स्वाद वाली चटनी

माँ पीसती थी
सिल बट्टे पर
लाल मिर्च और प्याज के साथ
अपना दर्द
बनाती थी इनसे
ऐसी स्वादिष्ट चटनी
कि आँखों में आँसू
और जीभ पर स्वाद के
फूल खिल उठते थे
एक साथ।
कोई जान नहीं पाता था
स्वाद में बेमिसाल क्यों है
माँ की बनाई चटनी
अगली बार
जब फिर होती फर्माइश
'माँ बनाओ न लाल चटनी’
तो माँ चुपचाप
अपना दर्द पीसने बैठ जाती
और बनाती
फिर एक बार
अनोखे स्वाद वाली चटनी।

आसान नहीं होता

जो पहचान बनाई
खून-पसीने से
कैसे रख दूँ उसे गिरवी
जो खुद्दारी
पाई सौगात कुदरत से
उस पर
धूल कैसे जमने दूँ
जीने का मतलब तलाशने के बाद
मरना आसान नहीं होता
और
कौन सा मसला है ऐसा
जिंदगी के पास
जिसका हल नहीं होता

लेखक के बारे में- शिक्षा-पीएचडी, विधा-कविता, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य, व्यंग्य, अब तक 15 पुस्तकें प्रकाशित। सम्मान- हिन्दी सेवी सम्मान, प्रथम विपिन जोशी प्रतिभा सम्मान। सम्प्रति-नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ टेक्निकल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च भोपाल में म्यूजिक प्रोफेशनल के पद पर कार्यरत। सम्पर्क: इलेक्ट्रानिक डिपार्टमेंट, N ITTTR, शामला हिल्स भोपाल- 462002, मो. 9827624212, email- jayanargis@gmail.com

Sep 15, 2017

दो ग़ज़लें

कश्ती माँझी की...
- डॉ. जया 'नर्गिस’
1
कायदे हैं अजब तेरे घर के
मोम के होंठ, बोल पत्थर के

कश्ती माँझी की भूल से डूबी
सर पे इल्ज़ाम क्यूँ समुंदर के

सच बहरहाल मेरा साथी है
जीना आता, नहीं मुझे डर के

धूप का ताज पहनने वाले
कब भरोसे रहे मुकद्दर के

उसकी आँखों का देख मैखाना
सर झुके आज जामो-सागर के

मोल क्या देगी ये मुफलिस दुनिया
उसकी आँखों से गिरे गौहर के

पूछते क्या हो हाल 'नर्गिस’ का
उसको जीना पड़ा है मर-मर के

तन्हा  पानी...


2
मेरी पलकों पे ये ठहरा पानी
देखता है तेरा रस्ता पानी

अपनी लपटों में घेर लेता है
उसकी आँखों का सुलगता पानी

दो किनारों के बीच बनता है
झिलमिलाता हुआ पर्दा पानी

खत्म मेला हुआ तो ऐसा लगा
रह गया घाट पे तन्हा पानी

आने वाले समय में क्या मालूम
बनके रह जाए न किस्सा पानी

दिल की धरती हो भला नम कैसे
सबकी आँखों का है सूखा पानी

मरहबा मरहबा ऐ प्यास मेरी
खुद उतारे तेरा सदका पानी

सम्प्रति- नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नि·ल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च भोपाल में म्यूजि· प्रोफेशनल के पद पर कार्यरत। सम्पर्क- इलेक्ट्रानि· डिपार्टमेंट, N ITTTR, शामला हिल्स भोपाल- 462002, मो. 9827624212, jyanargis@gmail.com