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Oct 1, 2026

उदंती.com, अक्टूबर- 2026

वर्ष- 19, अंक- 3

   जब तक हम अपने किसानों के अधिकारों का समर्थन नहीं करेंगे, तब तक विकास संभव नहीं।     -लाल बहादुर शास्त्री


इस अंक में 

अनकहीः कब मिलेगी नारी को वास्तविक बराबरी ? - डॉ. रत्ना वर्मा

धरोहरः दुनिया के आश्चर्य को समेटे सरगुजा - रविन्द्र गिन्नौरे

लघुकथाः उम्मीद के पंख - अनीता पंडा ‘अन्वी’

व्यक्तित्वः देश के बेमिसाल लाल, लाल बहादुर शास्त्री - हरी राम यादव

विज्ञानः मनुष्य बनने की ओर कृत्रिम बुद्धि रोबोट - प्रमोद भार्गव  

आलेखः आधी दुनिया की पूरी कहानी - डॉ. योगिता जोशी

शोधः नींद पूरी होने का हिसाब रखता है मस्तिष्क – स्रोत फीचर्स

कविताः तू रहना माँ - डॉ. कनक लता मिश्रा 

कविताः माँ तुम थी तो - अनीता सैनी         

यादेंः मीठी नींद, मीठे सपने - शशि पाधा

सॉनेटः मुक्त हो जाओ - अनिमा दास 

लघुकथाः ज़रूरत - आनन्द हर्ष

कहानीः स्कूल-ट्रिप - कुलबीर बड़ेसरों, पंजाबी से अनुवाद- सुभाष नीरव

व्यंग्यः गुमशुदा और शादीशुदा - अख़तर अली

लघुकथाः स्मृतियाँ - नमिता सिंह ‘आराधना’ 

किताबेंः रचना के आंतरिक सौंदर्य और संवेदना का रेखांकन - डॉ. सुरंगमा यादव

लघुकथाः अनुत्तरित प्रश्न - नमिता सिंह ‘आराधना’

कुण्डलियाः पंख फैलाती रहना - परमजीत कौर ‘रीत’

अनकहीः कब मिलेगी नारी को वास्तविक बराबरी?

 डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ ही दिनों में आदिशक्ति की आराधना का पावन पर्व नवरात्र का शुभारंभ होने वाला है। इन नौ दिनों में पूरा देश देवी दुर्गा की भक्ति, गरबा की उमंग और अनुष्ठानों के उल्लास में सराबोर हो जाता है। कन्या पूजन और कन्या भोज के द्वारा मासूम बच्चियों में साक्षात् जगद्जननी का रूप निहारना हमारी सांस्कृतिक सभ्यता और सदियों पुरानी समृद्ध विरासत का हिस्सा रहा है। हमारे संस्कारों ने स्त्री को हमेशा जननी और देवी के सर्वोच्च पद पर आसीन किया है।

लेकिन इस पावन आस्था के आवरण के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई बहुत भयावह है। जिस देश में देवी की पूजा की परंपरा रही है, उसी समाज में सदियों से नारी की अवहेलना, उस पर अत्याचार और दोहरे दर्जे का अन्याय भी समानांतर चलता आ रहा है। जब 21वीं सदी और बराबरी के इस आधुनिक दौर में भी हम नारी के साथ बर्बर भेदभाव और उत्पीड़न की ख़बरें पढ़ते हैं, तो मन अफ़सोस और ग्लानि से भर जाता है।

हाल ही में आई कुछ खबरों ने समाज के इस दोहरे चरित्र को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से आई एक दिल दहला देने वाली घटना में एक माह की मासूम बच्ची को सिर्फ इसलिए पानी से भरे टब में डुबोकर मार दिया गया और पीठ पर भारी ईंट रख दी गई; क्योंकि वह परिवार की दूसरी बेटी थी। हत्या के बाद चुपचाप अंतिम संस्कार करने की कोशिश की गई; लेकिन स्थानीय आशा कार्यकर्ता की सतर्कता से यह खौफनाक सच सामने आ गया। इस अमानवीय कृत्य पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने आरोपी दादा की जमानत याचिका खारिज करते हुए जो टिप्पणी की, वह समाज के मुँह पर करारा तमाचा है। माननीय कोर्ट ने अत्यंत दुख व्यक्त करते हुए कहा- ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 80 साल बाद भी देश में लोग लड़के को प्राथमिकता देते हैं।’

 जिस देश में नवरात्र के दिनों में हम नौ दिनों तक छोटी-छोटी कन्याओं के पैर धोकर उन्हें भोजन कराते हैं, उसी देश में आज भी बेटी होने के अपराध में एक माह की मासूम को तड़पा-तड़पाकर मार दिया जाता है। यह घटना साबित करती है कि आधुनिकता और विकास की बातें केवल कागजी हैं; हमारी सामाजिक जड़ों में आज भी बेटा और बेटी का भेदभाव गहराई तक समाई हुई है।

पर यह सिर्फ नवजात बच्चियों के जीने के अधिकार का मुद्दा नहीं है, बल्कि जो बेटियाँ जीवित बच जाती हैं, उनके साथ भी जीवन के हर मोड़ पर भेदभाव किया जाता है। यदि हम सोचते हैं कि शिक्षा और आधुनिकता ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा कर दिया है, तो वैश्विक आँकड़े हमारी इस गलतफहमी को दूर कर देते हैं।

हाल ही में जारी यूएन वीमेन की जेंडर स्नैपशॉट 2026 की रिपोर्ट हमारी आँखें खोलने के लिए काफी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, यदि दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और अवसर मिलने की मौजूदा रफ्तार यही रही, तो पूरी दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार पाने में 171 साल और लगेंगे। वहीं, दुनिया भर की संसदों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर प्रतिनिधित्व मिलने में लगभग 63 साल का समय लग जाएगा।

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि जीवन के हर क्षेत्र में- चाहे वह राजनीति हो, कॉर्पोरेट जगत् हो या विज्ञान और तकनीक का क्षेत्र- महिलाओं को पीछे ही धकेला जा रहा है।- दुनिया भर की संसदों में महिलाओं के पास केवल 27.4 प्रतिशत सीटें हैं वहीं सरकार के बड़े मंत्रालयों में महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है -वित्त व आर्थिक मामलों में 19 प्रतिशत, कानून व न्याय में 18 प्रतिशत, और रक्षा में मात्र 11 प्रतिशत। 

कॉर्पोरेट लीडरशिप में वैश्विक स्तर पर महिलाएँ आज भी बहुत पीछे हैं। इतना ही नहीं, दुनिया के 80 प्रतिशत देशों में समान पद पर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम तनख्वाह मिलती है। टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में महिलाओं की मौजूदगी मात्र 22 प्रतिशत है और बड़े पदों पर केवल 14 प्रतिशत। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि हम 21वीं सदी में प्रवेश तो कर चुके हैं, लेकिन महिलाओं को नेतृत्व, निर्णय लेने की शक्ति और समान अवसर देने के मामले में हमारी मानसिकता आज भी बहुत संकुचित है।

यूएन रिपोर्ट का एक बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस देश की संसद में महिलाओं की भागीदारी 20 प्रतिशत से अधिक होती है, वहाँ बच्चों की सेहत, टीकाकरण और माँ-बच्चे का स्वास्थ्य काफी बेहतर रहता है। यानी जब महिला को नीति-निर्माण और शासन में बराबरी की जगह मिलती है, तो पूरा समाज और आने वाली पीढ़ी स्वस्थ बनती है। अफसोस इसके बावजूद हम महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर आगे बढ़ने से रोकते हैं।

हमारे समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम स्त्री को देवी का दर्जा देकर उसे आसमान पर बिठा देते हैं, लेकिन जमीन पर उसे एक सामान्य मनुष्य का अधिकार देने से भी कतराते हैं। जब तक हम स्त्री को केवल भक्ति का पात्र मानेंगे और व्यावहारिक जीवन में उसे बराबरी, सुरक्षा और स्वतंत्रता नहीं देंगे, तब तक नवरात्र के ये उत्सव और कन्या-पूजन केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएँगे। यदि हमें वास्तव में माँ दुर्गा की भक्ति और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना है, तो हमें अपनी सोच को बदलना होगा- बेटियों के जन्म पर मातम मनाने या उन्हें बोझ समझने की घटिया मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा, घर के फैसलों से लेकर देश की संसद और कॉर्पोरेट तक, महिलाओं को पुरुषों के बराबर निर्णय लेने का अधिकार देना होगा, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव खत्म कर उन्हें समान काम के लिए समान वेतन और सुरक्षित माहौल देना होगा।

नवरात्र का पावन पर्व हमें केवल उपवास रखने या गरबा खेलने का संदेश नहीं देता, बल्कि वह नारी शक्ति के सम्मान और भेदभाव को भी दूर करने का भी संदेश देता है। आज समय आ गया है कि हम ढोंग और दिखावे से बाहर निकलें; क्योंकि जब तक आजादी के 80 साल बाद भी मासूम बच्चियों की बलि चढ़ती रहेगी और महिलाओं को अपना हक पाने के लिए सदियों का इंतजार करना पड़ेगा, तब तक हमारी संस्कृति और विकास के दावे अधूरे रहेंगे। सच्चे अर्थों में कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब हर बेटी को इस धरती पर जन्म लेने, पढ़ने, बढ़ने और बराबरी से काम करने का पूर्ण अधिकार मिलेगा।

धरोहरः दुनिया के आश्चर्य को समेटे सरगुजा

- रविन्द्र गिन्नौरे 

सरगुजा में एशिया की सबसे पहली रंगशाला है, सीता बेंगरा। सोलह सौ फीट ऊँचे पहाड़ की चट्टान को तराश कर बनी है यह रंगशाला। ऐसे मुक्ताकाशी रंगमंच (ओपन एयर थिएटर) की परंपरा वैदिक काल से शुरू हुई थी। त्रेतायुग में राम का वनवास काल और कालिदास का रामगिरि सहित ईसा पूर्व तीसरी सदी की समृद्ध सभ्यता एवं संस्कृति को समेटे हुए हैं रामगढ़ की पहाड़ियाँ।

छत्तीसगढ़ का सरगुजा अपने आगोश में युगों की गाथा, ऐतिहासिकता और पुरा-अवशेष संपदा समेटे हुए है। कहा गया है कि त्रेतायुग में राम ने वनवास काल में यहाँ विश्राम किया था। महाकवि कालिदास की रामगिरि भी यही है, जहाँ बैठकर कवि ने ‘मेघदूत’ की रचना की थी। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की सभ्यता के पुष्ट प्रमाण रामगढ़ की पहाड़ियों में विद्यमान हैं। यही है सीता बेंगरा, जहाँ नाटक और गीत-संगीत के आयोजन होते थे।

सरगुजा अर्थात ‘सुर’ और ‘गजा’ - अर्थात देवता या सुर-संगीत और हाथियों वाली धरती। ‘स्वर्गजा’- स्वर्ग और जा अर्थात स्वर्ग के समान वाला प्रदेश। तीसरा नाम ‘सुरगुंजा’- सुर और गुंजा अर्थात गीतों के मधुर स्वरों का गुंजन। सभी नाम सरगुजा की विशिष्टता को साकार करते हैं। सुर और संगीत की तान यहाँ के गुफा रंगमंच में कभी गूंजती थी। सुरम्य वन-प्रकृति में हाथियों के स्वच्छंद विचरण वाली यह धरती है। मुगल काल में सेना के लिए यहीं से हाथी भेजे जाते थे। रामायण काल में ‘दंडकारण्य’ और 10वीं सदी में ‘डांडोर’ के नाम से जाना जाता रहा आज का सरगुजा।

सरगुजा का गुफ़ा नाट्यालय

सरगुजा के गुफा रंगमंच को सबसे पहले कर्नल आउसुले ने 1848 में देखा। इसी आधार पर 1904 में डॉ. टी. ब्लास ने रामगढ़ की पहाड़ियों के पुरावशेषों का अध्ययन किया। ब्लास ने गुफा रंगमंच को भारत के महान आश्चर्यों में शामिल किया और जर्मन भाषा में इस पर विस्तृत विवरण लिखा।

पुराविद् डॉ. टी. ब्लास ने अपनी रिपोर्ट में इसे प्राचीन नाट्यशाला बताया। ब्लास ने कहा है, “रामगढ़ की पहाड़ी में अवस्थित सीता बेंगरा गुफा स्पष्ट तौर पर ऐसे तपस्वी का आश्रय नहीं हो सकती, जो संसार से विरक्त होकर यहाँ पुण्यशील क्रियाओं में संलग्न थे; बल्कि यह एक ऐसी जगह थी जहाँ काव्य-पाठ होता था, प्रणय-गीत गाए जाते थे और रंगमंच में अभिनय होता था।”

छत्तीसगढ़ में गीत-संगीत, अभिनय और कला ईसा पूर्व तीसरी सदी में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी थी। इस काल में रामगढ़ और उसके आसपास समृद्ध नागर सभ्यता रही थी। ईसा पूर्व तीसरी सदी में रामगढ़ की पहाड़ियों को तराश कर तीन वृहत् निर्माण किए गए- पहला नाट्यशाला सीता बेंगरा, दूसरा गुफा-चित्रकारी जोगीमारा, और तीसरा आवागमन के लिए बनाई गई हाथीपोल सुरंग।

अरण्य का गोपन

रामगढ़ की नाट्यशाला पर ममगैन लिखते हैं, “रामगढ़ की नाट्यशाला निश्चित ही एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला है। यहाँ पंच विधान, पर्ण परिधि, दर्शक दीर्घा, कौतुक मंडल, कर्णाक्ष छिद्र, ध्वनि रूपक आदि की सारी व्यवस्था का ध्यान नाट्यशाला के निर्माण में सुनिश्चित किया गया है। विशेष अवसरों पर यहाँ नाटकों का मंचन किया जाता रहा होगा।”

कालिदास का रामगिरि

कवि कालिदास ने राम के यहाँ आने का उल्लेख करते हुए 'मेघदूतम्' के प्रथम श्लोक में लिखा है:

दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन्निवत्स्यसि।

चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसन्निभः॥

(वाल्मीकि रामायण)

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः

शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।

यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु

स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेशु॥

(मेघदूतम्, पूर्वमेघ - श्लोक 1)

महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ की रचना यहीं की थी। कालिदास ने निर्वासित यक्ष बनकर स्वयं अपनी विरह-वेदना को जिस स्थल पर लिखा, वह यही रामगिरि है। यक्ष ने अपना प्रणय-संदेश मेघ को दूत बनाकर मानसरोवर स्थित अलकापुरी में अपनी प्रियतमा के पास भेजा था।

कालिदास ने ‘मेघदूत’ में 'सीता कुंड' का वर्णन किया है- यही रामगढ़ के कालिदास की रामगिरि होने का पुख्ता आधार है। हाथीपोल सुरंग के भीतर पहाड़ से रिसकर एक शीतल जल कुंड बना है, जिसे सीता कुंड कहा जाता है।

लोकगीत में राम

सरगुजा के लोकगीतों और किंवदंतियों में राम की महिमा गाई जाती है। राम को महिमामंडित करते हुए यहाँ के कई स्थलों के नाम भी रखे गए हैं- रामगढ़ की पहाड़ियाँ, सीता बेंगरा, जोगीमारा, लक्ष्मण बेंगरा, सीता कुंड आदि राम से ही जुड़े हैं।

त्रेतायुग में सरगुजा क्षेत्र घनघोर जंगलों से परिपूर्ण था। जंगलों में ऋषि-मुनि आश्रम बनाकर रहते थे। वनवास काल के दौरान राम ने उन राक्षसों का वध किया जो ऋषि-मुनियों को सताते थे। सरगुजा के लोकगीतों में ऐसा ही वर्णन मिलता है:

"चउदह बछर विपत्ति ला बितावें

रामगढ़ परबत में घर ला बनावें

बनवासे करण बने राम चले।"

सीता बेंगरा रंगमंच

सीता बेंगरा नाट्यशाला आज के आधुनिक थिएटर जैसी बनी है, जहाँ नेपथ्य, रंगपीठ, रंगशीर्ष आदि विद्यमान हैं। सीता बेंगरा गुफा नाट्यालय तक पहुँचने के लिए 15 सीढ़ियाँ बनी हैं। इन सीढ़ियों से चढ़कर गुफा में पहुँचते हैं, तो सामने 17 फुट चौड़ा गुफा नाट्यालय का प्रवेश द्वार दिखाई पड़ता है, जिसका ऊपरी भाग गोलाई लिए हुए है। नाट्यशाला 46 फीट लंबी, 15 फीट चौड़ी और 9 फीट ऊँची है। पर्दे और खंभे लगाने के लिए दीवारों में दोनों ओर गड्ढे बने हुए हैं। नाट्यालय की दीवारों से सटकर दर्शकों के बैठने के लिए पत्थरों की आसंदियाँ (बैठने की जगह) बनी हैं। मंच का निर्माण तीन मेढ़ियों पर किया गया है जो ढालनुमा हैं।

सीता बेंगरा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित रंगशाला के अनुरूप बनाई गई है। ईसा पूर्व तीसरी सदी में यहाँ नाटक एवं गीत-संगीत के आयोजन होते थे। यह एक ऐसा स्थान था जहाँ काव्य-पाठ होता था, प्रणय-गीत गाए जाते थे और रंगमंच पर अभिनय होता था।

सीता बेंगरा की गुफा में उत्कीर्ण पंक्तियों में ऐसी परिकल्पना की गई है, जहाँ मनुष्य कोलाहल से दूर एकांत में, रात्रि के नृत्य-संगीत और हास-परिहास की दुनिया में स्वर्गीय आनंद में लीन होकर पुष्पों की भीनी खुशबू से मोहित हो उसका आलिंगन करता है।

जोगीमारा गुफा

सीता बेंगरा के बगल में पहाड़ी के दक्षिणी ढलान पर स्थित है जोगीमारा गुफा। यहाँ ईसा पूर्व तीसरी सदी के जनजीवन के भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। जोगीमारा गुफा 30 फुट लंबी, 15 फुट चौड़ी और 9 फुट ऊँची है। गुफा की भीतरी दीवारों पर चिकना लेप लगाकर उस पर तरह-तरह के भित्तिचित्र बनाए गए हैं। गुफा की छत भी आकर्षक रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित है।

ज्यामितीय अलंकरणों के साथ गुफा की दीवारें पशु-पक्षी, मछली, मकराकृति, देव और दानवों के चित्रों से सुसज्जित हैं। गुफा की छत व दीवारों पर लाल, पीले, हरे व काले रंगों से अलंकरण किया गया है। जोगीमारा के गुफा-चित्रों को निहारने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं। इन्हें देखकर प्रतीत होता है कि तत्कालीन साहित्य, कला, सामाजिक वातावरण, मानवीय कला-संवेदना और भावनाओं का उत्कर्ष अत्यंत वैभवशाली रहा होगा।

प्रेम-अभिलेख

नाट्यशाला का संचालन देवदासी सुतनुका के हाथों में था। सुतनुका को रूपदक्ष/शिल्पकार देवदीन से प्रेम हो गया। नाट्यशाला की मर्यादा के विपरीत ऐसा प्रेम-संबंध उस समय राजकीय कोप का कारण बना। तत्कालीन राज्य अधिकारियों ने चेतावनी स्वरूप उनकी इस प्रणय-गाथा को गुफा की दीवार पर अंकित करवा दिया ताकि भविष्य में ऐसे संबंध की पुनरावृत्ति न हो। देवदीन और सुतनुका की प्रणय-गाथा ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में गुफा की दीवार पर अंकित है, जो इस प्रकार है:

सुतनुका नाम देवदसिं।

तं कमयिथ बलानसेए।

देवदिने नाम लुपदखे॥

अर्थात्: "सुतनुका नाम की देवदासी से वाराणसी के श्रेष्ठ रूपदक्ष (शिल्पकार) देवदीन ने प्रेमासक्त होकर प्रणय किया।"

प्राचीन शिल्पकार देवदत्त (देवदीन)

देवदासी सुतनुका की ओर आकर्षित होकर शिल्पकार देवदीन (देवदत्त) उन पर मोहित हो गए थे। सुतनुका अपने समय की प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। जोगीमारा गुफा के भित्तिचित्र पर उत्कीर्ण पंक्तियाँ देवदीन और सुतनुका की स्मृतियों को संजोए हुए हैं।

देवदीन अपने समय के प्रसिद्ध शिल्पकार थे। डॉ. हीरालाल शुक्ल कहते हैं, “प्रदेश के कलात्मक वैभव के आदि पुरुष देवदत्त हैं, जिन्हें भारत के प्रथम ज्ञात ‘रूपदक्ष’ (शिल्पकार) होने का गौरव हासिल है, जो ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में रामगढ़ अभिलेख में सादर स्मरण किए गए हैं। भारत के शेष कलाकार इन्हीं देवदत्त के उत्तराधिकारी हैं।”

हाथीपोल सुरंग

सीता बेंगरा के पार्श्व भाग में आवागमन के लिए हाथीपोल सुरंग बनाई गई है। सुरंग का प्रवेश द्वार 55 फीट ऊँचा है, जिससे हाथी भी आसानी से गुजर सकता है। यह सुरंग 180 फीट लंबी है। रामगढ़ की पहाड़ी के पार से सीता बेंगरा पहुँचने के लिए इसी सुरंग का उपयोग किया जाता है।

रामगढ़ की पहाड़ी का वैभव

रामगढ़ की पहाड़ी के आसपास ईसा पूर्व तीसरी सदी की उन्नत नागर सभ्यता विद्यमान थी। समृद्ध नगर होने के प्रमाण सर्वेक्षणों में मिले हैं- ईंटों की दीवारें, बर्तनों के टुकड़े, मनके और प्राचीन सिक्के पाए गए हैं। यहीं पर लोहा गलाने वाली भट्टी भी मिली है, जिससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में यहाँ धातुकर्म (लोहा गलाई) का कार्य होता था।

बीसवीं सदी की शुरुआत में जिस रामगढ़ को पुराविदों ने भारत के महान आश्चर्यों में गिना था, उस रामगढ़ के संपूर्ण वैभव से दुनिया आज भी काफी हद तक अनजान है। छत्तीसगढ़ की प्राचीन विरासत को सँजोए सरगुजा के इस गौरवशाली इतिहास को नए सिरे से खँगालने और विश्व पटल पर स्थापित करने की आवश्यकता है।

लघुकथाः उम्मीद के पंख

- अनीता पंडा ‘अन्वी’ (यू एस)

रात में धमाका हुआ। बारूद की गंध बिना छत की पत्थर की दीवारों से अब भी आ रही थी। मेहर शेष बचे अपने लकड़ी के घर के पास खड़ी थी। पास ही रखा सिर्फ एक जूता भरे-पूरे परिवार कहानी बता रहा था। वह डरी नहीं पर आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने अपनी दोनों बाँहें फैलाईं। उसने देखा कि उसकी परछाई पक्षी के समान दिखाई दे रही थी। उसने परछाई से पूछा, “क्या आसमान में बम का डिब्बा है?”

परछाई मौन रही पर रेस्क्यू टीम के एक सैनिक अंदर आया और  उसे देखकर कहा,”बेबी! तुम अकेली हो? सुरक्षित जगह पर जल्दी चलो।”

“अंकल! हम अपने घर कब लौटेंगे?”

“पता नहीं बेबी। आओ चले। वहाँ तुम्हारे जैसे कई बच्चे हैं। उनके साथ मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा,” रेस्क्यू टीम में एक वयोवृद्ध ने रोती हुई मेहर को चुप कराते हुए कहा। 

आँसू पोंछते हुए मेहर बोली, “अंकल! आसमान से  बोलो अगली बार बम नहीं खिलौने गिराना और ढेर सारे सफेद कबूतर भी।”

aneeta.panda@gmail.com

व्यक्तित्वः देश के बेमिसाल लाल, लाल बहादुर शास्त्री

 - हरी राम यादव

 जय जवान, जय किसान का नारा 1965  के बाद देश के हर बच्चे, बूढ़े और युवा की जबान पर था, बच्चे गलियों में चलते हुए यह नारा लगाया करते थे। एक बच्चा जय जवान बोलता था तो साथ का दूसरा बच्चा जय किसान बोलता था।  इस नारे को देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल  बहादुर शास्त्री ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान दिया था, उस समय देश के सैनिक  सीमा पर देश की सुरक्षा के लिए लड़ रहे थे और किसान खेतों में अन्न उपजाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उस समय  देश को एकजुट और आत्मनिर्भर बनाने की सख्त ज़रूरत थी।  शास्त्री जी ने अपने इस नारे के द्वारा किसानों और जवानों  दोनों का सम्मान बढ़ाया और देश के नागरिकों  को यह एहसास कराया कि जवान और किसान दोनों देश के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। इस नारे के द्वारा उन्होंने पूरे देश को एक नई दिशा दी और इस दिशा ने कुछ  ही वर्षों में देश की दिशा और दशा बदल कर रख दी। देश खाद्यान्न के  मामले में आत्मनिर्भरता की और  बढ़ चला और 06 वर्षों बाद ही सन 1971 में देश ने अपनी सैनिक शक्ति और मजबूत इरादे  के बलबूते  पाकिस्तान के दो टुकड़े कर 'जय जवान और जय किसान' के नारे को सार्थक कर दिया।

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आकस्मिक मृत्यु  के पश्चात् शास्त्री जी  09 जून 1964 को देश के प्रधानमंत्री बने।  वह  अपने सादे जीवन और नैतिक मूल्यों के लिए जाने जाते थे।  वे बहुत ही सामान्य जीवन जीते थे और दिखावे से सदैव दूर रहते थे। देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी, उनके पास न तो ज्यादा धन-संपत्ति थी और न ही कोई दिखावे वाली जीवनशैली।   उनका जीवन एक साधारण व्यक्ति जैसा रहा, कार्यकाल के दौरान मिलने वाले  वेतन और भत्ते से ही अपने पूरे परिवार का भरण पोषण करते थे। सच्चाई और ईमानदारी उनकी रग- रग में बसी थी। एक बार उनके बेटे ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गाड़ी का उपयोग कर लिया, जब यह बात  शास्त्री जी को पता चली तो उन्होंने सरकारी खाते में गाड़ी जितनी दूर चली थी उसका किराया जमा करवाया। उनके  पास न तो खुद का घर था और न ही कोई अन्य संपत्ति। जब उनका  निधन हुआ तो उनके पास जमीन जायदाद नहीं बल्कि एक ऋण था, जो उन्होंने प्रधानमंत्री बनने पर कार खरीदने के लिए सरकार से लिया था। इस सरकारी ऋण से उऋण होने के लिए परिवार ने उनकी पेंशन की राशि से यह राशि जमा की। वह हमेशा खादी की धोती और कुर्ता  पहनते थे। वह 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। 1965 के भारत पाकिस्तान के मध्य हुए युद्ध में उन्होंने ऐसे ठोस और दूरदर्शी निर्णय लिये कि सैन्य कमांडर भी हतप्रभ थे।

प्रधानमत्री बनने से पूर्व वह रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृह मंत्री रहे। उनके रेल मंत्री रहते हुए 02 सितंबर, 1956 को आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में हुई सिकंदराबाद-द्रोणाचलम पैसेंजर ट्रेन दुर्घटना में 125 लोग मारे गए, इस दुर्घटना के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश तथा संसद में उनकी  इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए शास्त्री जी की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी सराहना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने “लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं; बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी”। रेल दुर्घटना पर  बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा- “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ़ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं है; लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।” ऐसे थे लाल बहादुर शास्त्री। जहाँ आज एक तो क्या दस बीस दुर्घटनाएँ होने के बाद और नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा मांगने के बाद भी लोग कुर्सी छोड़ने का नाम नहीं लेते हैं।

 लालबहादुर शास्त्री का जन्म 02 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय  में श्रीमती  रामदुलारी और मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे इसलिए गांव के  सब लोग उन्हें मुंशीजी  कहते थे। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण गाँव के बड़े बुजुर्ग लालबहादुर शास्त्री को प्यार में नन्हे कहकर बुलाया करते थे। अठारह महीने की छोटी सी उम्र में इनके पिता का निधन हो गया। पिता के निधन के पश्चात  उनकी माँ श्रीमती रामदुलारी अपने मायके मिर्ज़ापुर चली गईं। कुछ समय बाद उसके नाना का भी निधन हो गया। शास्त्री जी की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उनकी माँ का बहुत सहयोग किया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा अपने ननिहाल के गाँव में  ग्रहण की और उसके पश्चात उनकी आगे की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से जब उन्हें शास्त्री की उपाधि मिली तब उन्होंने अपने नाम के पीछे से श्रीवास्तव शब्द  हमेशा के लिए हटा दिया और नाम के साथ  'शास्त्री' लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द उनके  नाम का पर्याय बन गया। सन 1927 में उनकी शादी मिर्जापुर की ललिता देवी से हुई। इनके परिवार में इनके चार बेटे – हरिकृष्ण शास्त्री , सुनील शास्त्री , अनिल शास्त्री तथा अशोक शास्त्री एवं दो बेटियाँ कुसुम शास्त्री और सुमन शास्त्री हैं। सन 1966 में भारत सरकार द्वारा उन्हें भारत रत्न से विभूषित किया गया।

वर्तमान समय में सत्ता और विपक्ष में बैठे देश के नीति निर्माताओं को लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान, जय किसान के 61 वर्ष पहले दिए नारे के बारे में गंभीरता से  सोचने की आवश्यकता है। आज न तो किसान सुखी है और ना जवान । दोनों वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित है । आये दिन किसान लाइनों में लगे रहते हैं। कभी अपनी फसल को बेचने के लिए , कभी खाद खरीदने के लिए, कभी फॉर्मर रजिस्ट्री के लिए । सरकारी बाबू वर्ग हर स्तर पर इनका शोषण करता है । यही हाल देश की सीमा पर अपनी जवानी देकर आये जवानों का भी है। सरकारें साल में सैनिक कल्याण के नाम पर दस बीस पत्र निकालती हैं; लेकिन धरातल पर कोई परिणाम नजर नहीं आता । जरूरत इस बात की है कि जवान की जड़ किसान को खेती के लिए जरूरी साधन और सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जाएँ , उनके बच्चों को पढ़ने के लिए गाँवों में बढ़िया स्कूल खोले जाएँ । उनकी चिकित्सा के लिए गाँव में चिकित्सालय हों, रेफरल केंद्र नहीं और उन अस्पतालों में समुचित दवा  और स्टाफ भी हो । यह सब आवश्यक इसलिए है कि भारत गाँवों  का देश है और गाँव में किसान बसते हैं, धनवान नहीं।  

विज्ञानः मनुष्य बनने की ओर कृत्रिम बुद्धि रोबोट

  - प्रमोद भार्गव

  महात्मा गांधी और विनोबा भावे के अहिंसक विचारों के समर्थक ऑस्ट्रेलियाई मूल के एक दार्शनिक हुए हैं, इवान इलिच, जो अंग्रेजी के अलावा तमाम भाषाओं के साथ हिंदी भी जानते थे। इलिच का विचार था कि वाहनों ने मनुश्य के पैरों की ताकत छीन ली है। मशीनी तकनीक ने मनुष्य के हाथों के हुनर छीन लिए हैं और मनुष्य के विरुद्ध एक प्रति  मनुष्य  ‘रोबोट‘ के रूप में विकसित कर व्यक्ति को सीमेंट, कंक्रीट और यंत्रों के जंगल में अकेला छोड़ देने के उपक्रम हो गया है। अब ताजा जानकारियाँ  मिल रही हैं कि ओपनएआई यानी कृत्रिम बुद्धि (एआई) आधारित रोबोट का प्रति मानव स्वरूप ऐसी हरकतें करने लगा है कि ये कंपनी प्रबंधकों के प्रतिकूल जा रही हैं। यानी ये रोबोट वास्तविक मनुष्य के आदेश का सटीक पालन नहीं कर रहे हैं। इसे विज्ञान की भाषा या रोबोट की प्रकृति के मुताबिक ‘मिसअलाईमेंट’ कहा जा रहा है। सीधी भाशा में कहें तो यह स्थिति रोबोट द्वारा पालक व्यक्ति की आज्ञा की अवहेलना है। क्योंकि ये भूलें किसी तकनीकी खराबी की वजह से होने की बजाय एआई ने जानबूझकर कीं, जो हरकत की श्रेणी में आती हैं। ये भविष्य में खतरनाक साबित हो सकती हैं ? 

रोबोट में एआई के बढ़ते प्रयोग के चलते इसके संकट में डालने वाले भाव-विचार स्पष्ट  दिखाई देने लगे हैं। इसकी एक गलत जानकारी अमेरिका और चीन को परस्पर सैन्य टकराव के निकट ले आई थी। अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान सामने आई इस घटना का पर्दाफाश अब हुआ है। दरअसल पश्चिम एशिया में मौजूद चीन के एक समुद्री जहाज को लेकर अमेरिकी सेना के सायबर सिस्टम में एक गुप्त रिपोर्ट पहुँची, जिसमें कहा गया कि चीनी जहाज में परमाणु हथियार कार्यक्रम को तैयार करने वाले कल-पुर्जे ले जाए जा रहे हैं। यह परिणाम चैटबॉट की सहायता से सामने आया था। रिपोर्ट मिलने के साथ ही अमेरिकी सेना का हरकत में आना स्वाभाविक था। अतएव जहाज को रोकने की रणनीति बनाई जाने लगी। हथियारबंद सैनिक चढ़ाई के लिए तत्पर हो गए। लेकिन यह अच्छा रहा कि हमला बोलने से पहले अधिकारियों ने एक बार फिर रिपोर्ट की गंभीर जांच कर ली। तब संज्ञान में आया कि एआई ने जहाज पर उपलब्ध कलपुर्जों की गलत पहचान कर ली थी। नतीजतन हमले की कार्यवाही पर विराम लगा दिया गया। एआई द्वारा ऐसे मामलों में सामने आ रहा है कि वे इंटरनेट द्वारा नियंत्रित अनुशासन का उल्लंघन कर रहे हैं। यानी एआई उपकरणों में इंसानी समझ और हरकत करने की इच्छाएँ  अंगड़ाई लेने लगी हैं। एआई की निजी पहचान निर्मित कर लेने की यह महत्वाकांक्षा भविष्य में बड़े संकट का कारण बन सकती है?

 रोबोट में बुद्धि डालकर उसे हम मनुष्य का शासक बनाने में लगे हुए हैं। अभी तक रोबोट को नए-नए रूपों में विकसित करने का काम वैज्ञानिक रूपी मनुष्य करता था, लेकिन प्रौद्योगिकी के आकाश में कृत्रिम बुद्धि ने ऐसे पंख दे दिए हैं कि रोबोट अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से स्वयं अद्यतन (अपडेट) होने लगे हैं और जो जीवित रोबोट अस्तित्व में आए हैं, वे स्वयं रोबोट पैदा करने लगे हैं। रोबोट के स्वमेव परिवर्तन और नए रोबोट पैदा करने की इस ताकत के परिणाम फलदायी होने की बजाय घातक होने की आशंकाएँ  ज्यादा दिखाई दे रही हैं। इसीलिए एआई विशेषज्ञ आल्टमेन से लेकर एलन मस्क तक इस तकनीक को मानवता के अस्तित्व पर बड़ा खतरा मान रहे हैं।  

   भविष्य का रोबोट यांत्रिक-मानव भर नहीं रह जाएगा, उसे यंत्र और कृत्रिम बुद्धि के बूते एक जीवित मानव में बदलने के प्रयास हो रहे हैं, अर्थात कालांतर में जीवित रोबोट हमारे समक्ष होगा? इस दिशा में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने जीवित रोबोट का एक प्रतिदर्श (मॉडल) आविष्कृत भी कर लिया है। वैज्ञानिकों के एक समूह ने मेंढक के भ्रूण की जीवित कोशिकाओं को अन्य नूतन जीवन रूपों के रूप में अवतरित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। इसे ‘एक्सर्नाबॉट्स‘ रोबोट नाम दिया गया है। इसमें न्यूनतम वजन की युक्ति (डिवाइस) के जरिए इंद्रिय बोध कराया जा सकता है। इसमें 24 संवेदी यंत्र (सेंसर) संलग्न हैं। यह मांसपेशियों की गतिविधियों और दिमागी अनुभव करके काम को अंजाम देता है। इसे तकनीकी नाम ‘एस्पर बायोनिक्स प्रोस्थेटिक हैंड’ दिया गया है। इसे क्रियाशील बनाए रखने में एआई और क्लाउड प्रौद्योगिकी अर्थात क्लाउड कंप्यूटिंग का प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक के जरिए हार्डडिस्क या ड्राइव की बजाय इंटरनेट पर उपलब्ध डाटा और प्रोग्राम ग्रहण कर लिए जाते हैं। हम जानते हैं किसी हार्डडिस्क में सूचनाओं की उपलब्धता की एक सीमा है, लेकिन सूचना अंतर्जाल में असीमित हैं। क्लाउड टेक्नोलॉजी को सरल रूप में यूं भी समझ सकते हैं कि जिस तरह से बादलों में पानी भरा होता है, उसी तरह क्लाउड (बादल) कंप्युटिंग में सूचनाएँ भरी होती हैं। मसलन इस तरह का मशीनी रोबोट मानव वास्तविक मनुष्य के समानांतर प्रति मानव के रूप में खड़े होने की तैयारी में आ गए हैं। 

   यह अद्वितीय आविष्कार आरंभिक अवस्था में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के समन्वय से निर्मित उपकरण भर था। शुरूआत में इसकी उपयोगिता  मनुष्य   की पहुँच से बाहर कठिन और खतरनाक कामों से जुड़ी थी। इसके प्रभावी उत्पादकता के मद्देनजर इसमें बदलाव होते रहे और इस तकनीक को नाम दिया गया रोबोटिक्स कालांतर में डिजिटल, एआई और इंटरनेट तकनीक के समन्वय की युक्तियों से जीवित रोबोट की एक प्रजाति चलन में आ रही है, जिसे बायोनिक्स और एक्सनोबाट्स नाम दिए गए हैं। ये रोबोट मानव प्रजाति और उसकी स्वाभाविक जन्मजात बुद्धि के लिए बड़े खतरा माने जा रहे हैं। 

   हालांकि कृत्रिम बुद्धि के आविष्कारक निर्माता और व्यापारी के बीच अजीब विडंबना देखने में आ रही है। एक तरफ तो कंपनियाँ  दावा कर रही है कि एआई मनुष्य  की कार्य क्षमता को नए ढंग से बढ़ाएँगी। नई खोजों को गति देंगी। ये उपलब्धियाँ  भविष्य की दुनिया को सुविधाजनक बनाने वाली साबित होंगी? दूसरी तरफ इन्हीं कंपनियों के प्रबंधक चेतावनी दे रहे हैं कि एआई दुनिया को खतरनाक मोड़ पर ले जाने की दस्तक दे रही हैं। अब यह एआई विषेशज्ञों का ही दायित्व बनता है कि जब एआई मानव जाति के लिए खतरा है, तो वही लोग इसे नए-नए उपयोगी रूपों में आगे क्यों बढ़ा रहे हैं ? उनके लिए आर्थिक लाभ जरूरी है या मनुष्यों का अस्तित्व ? 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 9981061100


आलेखः आधी दुनिया की पूरी कहानी

 - डॉ. योगिता जोशी 

“स्त्री केवल जीवन को जन्म नहीं देती, 

वह जीवन को अर्थ भी देती है।”

सृष्टि का समूचा विस्तार यदि किसी एक शब्द में समाहित किया जा सकता है, तो वह शब्द है- ‘स्त्री’। वह प्रकृति की सबसे सुंदर रचना है, सृजन का मूल स्रोत है, संवेदना की सबसे गहन अभिव्यक्ति है और मानव सभ्यता के विकास की अनिवार्य आधारशिला है। उसके बिना संसार की कल्पना उतनी ही अधूरी है, जितनी सूर्योदय बिना प्रकाश के या नदी बिना जल के। फिर भी विडंबना यह है कि जिस स्त्री के अस्तित्व से जीवन की धड़कन चलती है, उसी को अपने अस्तित्व की स्वीकृति के लिए युगों तक संघर्ष करना पड़ा। इसलिए जब हम कहते हैं -  'आधी दुनिया' , तो यह केवल जनसंख्या का अनुपात नहीं, बल्कि उस समूची चेतना का प्रतीक है, जिसके बिना मानव समाज का कोई भी अध्याय पूर्ण नहीं हो सकता।

भारतीय संस्कृति में स्त्री को आदिशक्ति, जगज्जननी और देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी और अन्नपूर्णा के रूप में उसकी पूजा की जाती है। हमारे शास्त्र उद्घोष करते हैं—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।” अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है। किंतु इतिहास के अनेक पन्ने इस आदर्श और यथार्थ के बीच की दूरी भी दिखाते हैं। सम्मान के शब्दों और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में अक्सर गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। पूजा के मंच पर प्रतिष्ठित स्त्री अनेक बार सामाजिक जीवन में उपेक्षा, असमानता और अन्याय का सामना करती रही है।

स्त्री का जीवन अनेक रूपों और भूमिकाओं का विराट समन्वय है। वह बेटी है तो घर की मुस्कान है, बहन है तो विश्वास की डोर है, पत्नी है तो जीवन-संघर्ष की सहभागी है और माँ है तो समूची मानवता की प्रथम शिक्षिका। उसकी गोद में संस्कार जन्म लेते हैं, उसके स्नेह में परिवार का भविष्य आकार पाता है और उसके त्याग में समाज की स्थिरता छिपी होती है। आश्चर्य यह है कि वह जितना देती है, उतना अपने लिए कभी माँगती नहीं। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका धैर्य है और सबसे बड़ा आभूषण उसकी करुणा।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज कठिन दौर से गुज़रा, स्त्रियों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। वैदिक युग में गार्गी और मैत्रेयी ने ज्ञान के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। मध्यकाल में मीरा ने भक्ति को नया आयाम दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। आधुनिक भारत में सावित्रीबाई फुले ने स्त्री शिक्षा का दीप जलाया, सरोजिनी नायडू ने राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया और असंख्य महिलाओं ने समाज सुधार तथा राष्ट्र निर्माण में अप्रतिम योगदान दिया। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि अवसर मिलने पर स्त्री ने हर युग में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दिया है।

समकालीन समय में स्त्री ने जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। विज्ञान, चिकित्सा, प्रशासन, न्यायपालिका, साहित्य, पत्रकारिता, सेना, खेल, अंतरिक्ष, राजनीति और उद्योग—हर क्षेत्र में उसकी उपस्थिति प्रभावशाली है। आज की स्त्री निर्णय लेती है, नेतृत्व करती है, नवाचार करती है और समाज को नई दिशा देती है। वह आत्मनिर्भर है, आत्मविश्वासी है और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी है। किंतु इन उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं।

आज भी अनेक बालिकाएँ शिक्षा से वंचित हैं। भ्रूण हत्या जैसी अमानवीय प्रवृत्तियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। दहेज, घरेलू हिंसा, कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न और सामाजिक असुरक्षा जैसी समस्याएँ आधुनिक समाज के माथे पर प्रश्नचिह्न बनकर उपस्थित हैं। विडंबना यह है कि तकनीकी प्रगति के इस युग में भी मानसिकता का विकास उसी गति से नहीं हो पाया है। कानून बदल सकते हैं, व्यवस्थाएँ बदल सकती हैं, परंतु जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं होगा।

स्त्री सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है। सच्चा सशक्तिकरण तब होगा, जब उसे बिना भय के जीने का अधिकार मिले, अपनी पसंद से निर्णय लेने का अवसर मिले, शिक्षा और रोजगार में समान अवसर प्राप्त हों तथा उसके विचारों का सम्मान किया जाए। अधिकारों की लड़ाई पुरुष-विरोध नहीं है; यह मानवीय गरिमा और समानता की स्थापना का संघर्ष है। स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जीवन की पूर्णता दोनों के संतुलित सहयोग से ही संभव है।

हिंदी साहित्य ने स्त्री जीवन के अनेक आयामों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। प्रारंभिक साहित्य में जहाँ स्त्री प्रायः सौंदर्य, प्रेम और करुणा का प्रतीक बनकर उपस्थित हुई, वहीं आधुनिक साहित्य में वह स्वयं अपनी कथा की नायिका बनी। उसने अपनी पीड़ा, संघर्ष, सपनों और आकांक्षाओं को अपनी भाषा में व्यक्त किया। महादेवी वर्मा ने स्त्री के अंतर्मन की वेदना और आत्मगौरव को स्वर दिया। सुभद्रा कुमारी चौहान ने वीरांगना का रूप प्रस्तुत किया। मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं ने स्त्री जीवन के विविध सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पक्षों को नई दृष्टि से देखा। उनके साहित्य ने यह सिद्ध किया कि स्त्री केवल साहित्य का विषय नहीं;  बल्कि स्वयं साहित्य की सृजक और विचारक भी है।

आज का स्त्री-विमर्श केवल अधिकारों की चर्चा तक सीमित नहीं है। यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्णय, समान अवसर, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाओं की पुन: स्थापना का विमर्श है। इसका उद्देश्य पुरुष और स्त्री के बीच दूरी पैदा करना नहीं, बल्कि दोनों के बीच परस्पर सम्मान और विश्वास का संबंध स्थापित करना है। जिस समाज में स्त्री को बराबरी का स्थान मिलता है, वहाँ लोकतंत्र अधिक सशक्त, संस्कृति अधिक समृद्ध और भविष्य अधिक उज्ज्वल होता है।

परिवार इस परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यदि बचपन से बेटी और बेटे को समान अवसर दिए जाएँ, समान शिक्षा मिले, समान संस्कार दिए जाएँ और दोनों के प्रति समान दृष्टि रखी जाए, तो भविष्य का समाज अधिक न्यायपूर्ण बन सकता है। बच्चों के मन में स्त्री के प्रति सम्मान का संस्कार विद्यालय और परिवार दोनों की साझा जिम्मेदारी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि संवेदनशील नागरिक तैयार करना भी है।

स्त्री स्वयं भी परिवर्तन की वाहक है। उसने विपरीत परिस्थितियों में भी हार मानना नहीं सीखा। वह टूटती है, पर बिखरती नहीं; संघर्ष करती है, पर संवेदनाएँ नहीं छोड़ती; आँसू बहाती है, पर आशा का दीप भी जलाए रखती है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उसके भीतर धैर्य की नदी है, साहस का पर्वत है और प्रेम का अथाह सागर है। यही कारण है कि वह जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी परिवार और समाज को संभालने की क्षमता रखती है।

आज आवश्यकता केवल महिलाओं को अवसर देने की नहीं, बल्कि उनकी उपलब्धियों को स्वाभाविक रूप से स्वीकार करने की भी है। हमें ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनानी होगी जहाँ किसी बेटी को अपने सपनों के लिए संघर्ष न करना पड़े, जहाँ किसी माँ को अपने सम्मान के लिए आँसू न बहाने पड़ें और जहाँ किसी महिला को अपनी क्षमता सिद्ध करने के लिए पुरुष से अधिक मेहनत न करनी पड़े। समानता का अर्थ विशेषाधिकार नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसर है।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम स्त्री को किसी पूर्वाग्रह, रूढ़ि या सीमित भूमिका में बाँधकर न देखें। वह केवल रिश्तों की परिभाषा नहीं है; वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, एक विचार है, एक चेतना है और एक सृजनात्मक शक्ति है। उसकी पहचान केवल किसी की बेटी, पत्नी या माँ होने तक सीमित नहीं, बल्कि उसके अपने व्यक्तित्व, प्रतिभा और उपलब्धियों से भी है।

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि आधी दुनिया की कहानी वास्तव में पूरी मानवता की कहानी है। जब स्त्री मुस्कुराती है, तो परिवार में सुख का संचार होता है; जब वह शिक्षित होती है, तो पीढ़ियाँ शिक्षित होती हैं; जब वह आत्मनिर्भर बनती है, तो समाज मजबूत होता है; और जब उसे सम्मान मिलता है, तभी राष्ट्र सच्चे अर्थों में विकसित होता है।

स्त्री का सम्मान केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि सभ्यता की पहचान है। आइए, हम ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें जहाँ स्त्री को देवी बनाकर पूजने से पहले उसे मनुष्य मानकर सम्मान दिया जाए; जहाँ उसके सपनों को उड़ान मिले, उसकी प्रतिभा को पहचान मिले और उसके अस्तित्व को बिना किसी शर्त के स्वीकार किया जाए; क्योंकि सच तो यही है कि आधी दुनिया की यह कहानी, पूरी दुनिया के भविष्य की कहानी है।

शोधः नींद पूरी होने का हिसाब रखता है मस्तिष्क

 नींद की कमी एक बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है। 

वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ की तरह काम करते हैं। 

शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) नामक एंज़ाइम के असर की जाँच की। इसके असर को वास्तविक समय में जाँचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जाँच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुँच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।   

शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है। 

अलबत्ता, टैगिंग का स्तर किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है। 

जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊँघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोजाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता की जाँच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जाँच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स) 

कविताः तू रहना माँ

  -  डॉ. कनक लता मिश्रा

माँ तू रहना 

तू रहना माँ 

तब भी, जब मैं हताश हो जाऊँ,

चाहूँ आसमान छुना 

पर ख़ुद को बहुत छोटा पाऊँ 

चाहूँ स्वच्छंद उड़ना 

पर पंखों में उड़ान न पाऊँ 

जमाना चाहूँ अपनी अस्मिता की जड़ें 

पर ख़ुद की गहराई न पाऊँ 

बहुत कुछ करना चाहूँ 

पर कुछ भी न कर पाऊँ 

तब भी तू रहना माँ 

तू तो रहना माँ 

तू ही तो है,   

जिसकी आँखों में मै सूरज, हूँ मैं चंदा, हूँ 

मैं दुनिया का सबसे नेक बंदा, हूँ 

नहीं जानता मैं कि मैं सुन्दर, 

सुरूप हूँ या कि मंदा हूँ 

पर माँ तेरे लिए तो मैं तेरा चुनिंदा हूँ 

बड़ा ही सामान्य सा हूँ,  

कुछ भी तो खास नहीं मुझमें 

पर एक तू ही तो है जो नहीं कहती

 कि तेरे होने से शर्मिंदा हूँ

तू पास हो या दूर रहे 

मेरी चेतना में तू बसी है माँ 

तेरे होने से मेरा होना है

तू है तो मैं हर हाल में ज़िन्दा हूँ 

मेरे लिए तो मेरा ईश्वर,

मेरा रहबर तू ही, तू ही मेरा ख़ुदा 

तू तो सबसे प्यारी है, तू है सबसे अलहदा 

हरेक कुसूर की सज़ा

सबको ही बराबर दिया करता है ख़ुदा 

पर तू तो मेरी हर खामियों की सज़ा

ख़ुद पे ही लिया करती है सदा 

तू कहे मुझे मेरा हीरा, मेरा मोती, 

मेरी सारी धन संपदा 

पर मैं तो तेरी कोख में ही पला बढ़ा

तू तो मेरी अन्नपूर्णा तू ही मेरी अन्नदा।

कविताः माँ तुम थी तो

  - अनीता सैनी 

माँ

तुम्हारे जाते ही रीत गई थी

मेरे भीतर की गागर 

एक झटके में धुँधला गईं थीं आँखें 

और अटक कर रह गईं थीं साँसें 

आज समझ में आया था क्या होता है

कमर टूटने का असल अर्थ 

सारी खुशियाँ जा बैठी थीं 

तालाबंद कोठरी में 

जड़ों से कटी मेरी देह 

घिरकर रह गई थी अनाम ख़ौफ़ में 

जाते हुए इतना भी न सोचा तुमने

कौन सुलझाएगा मेरी मुड़ी-तुड़ी

उलझी मुश्किलों को 

तुम थीं तो जब-तब कुम्हार सी

थपथपा दिया करती थीं मेरे अंतर्मन को

भले कैसी भी रही हों परिस्थितियाँ

बचाती रहीं तुम 

ऊबड़-खाबड़ होने से मेरा अंदर

बातों-बातों में कैसे माप लेती थीं तुम 

मेरे मन की थाह

अपनी दूरदर्शिता की मथनी से मथकर

कैसे छाँट देती थीं सारी परेशानियों को

शायद कोई जादू थीं तुम 

कैसे मेरे हारे मन को भी 

दिला देती थीं जीत का अहसास 

तुम थीं तो निश्चिंत थी मैं 

तुम्हारे होते कभी ढूँढा ही नहीं मैंने

अपने होने का अर्थ

तुम्हें खोकर जाना कीमती वस्तु का मोल

आती-जाती साँसों सी तुम

पल-पल स्मृतियों में रहती हो माँ 

तुम्हारे जाने से बाद बढ़ गई है मेरे

अव्यक्त शब्दों की भीड़ और सूख गए हैं 

मेरे आँसू  दुख की सघनता में।

यादेंः मीठी नींद, मीठे सपने

  - शशि पाधा

नींद तो बेशक मीठी होती है लेकिन मीठे सपने? आश्चर्यचकित तो नहीं हो रहे आप ? सच कहूँ तो मुझे कई बार एक सपना आता है जो मेरी जिह्वा पर मिश्री घोल के रख देता है।  आँख खुलते ही ऐसा लगता है जैसे कोई मिठाई मुँह में घुल रही हो। सपनों की कोई आयु नहीं होती। वे देश-काल लाँघकर आपकी आँखों के बिछौने पर आकर चुपचाप बैठ जाते हैं और ले जाते हैं आपको एक ऐसे स्थान पर, उन गलियारों में जहाँ कभी आपने कोई सुखद पल बिताए हों।

कहते हैं सपनों का आपके अवचेतन मन से सम्बन्ध रहता ही है। वो मन के किसी गिरह में बँधे रहते हैं और कभी कभी गहरी नींद में उस गिरह से झाँककर आपके साथ खेलते हैं। भला सपनों की बात के साथ मैं खेल का क्यों रिश्ता जोड़ रही हूँ? इस लिए कि जो मीठा सपना मैं इस उम्र में भी देखती हूँ वो मुझे मेरे खोए हुए बचपन में ले जाता है, जिस उम्र में मैं बहुत मीठा खाती थी और बस खेल में ही अपना समय बिताती थी। अब तक तो आपकी जीह्वा पर भी मिश्री घुलने लगी होगी। तो चलिए, ले जाती हूँ आपको अपने बचपन के उस घर में जहाँ के सपने देखती हूँ।

जम्मू शहर की पंचतीर्थी गली में हमारा घर था। यह गली बाज़ार और राज महलों को जोड़ती थी। गली तो क्या मानो एक भरा-पूरा परिवार ही इसमें रहता था। मुझे बड़ी देर बाद इस बात की समझ आई थी कि आस-पास रहने वाले सभी को मैं मामा-मामी या मौसा-मौसी क्यों पुकारती थी। सुना था कि मेरी ननिहाल का घर भी कभी इसी गली में था। तो रिश्ता तो ननिहाल का ही जुड़ेगा न? उन दिनों दिन भर तो कई लोग कुछ न कुछ बेचने के लिए आते थे। कभी खिलौने वाला, कभी गुब्बारे वाला, कभी कचालू वाला और कभी मलाई बर्फ वाला। मज़े की बात यह थी कि हर एक बेचने वाले का आवाज़ लगाने का अपना अलग ही ढंग होता था। हम बच्चे उनकी आवाज़ सुनकर ही पहचान जाते थे कि क्या बिकने आया है। 

लेकिन एक आवाज़ थी जो सब से मीठी थी। बिलकुल मिश्री में घुली हुई। यह याद नहीं आ रहा कि मौसम कौन सा होता था। शायद सर्दियों का मौसम होगा। रात के समय लगभग 8 या 9 बजे हमारे घर से थोड़ी दूर से एक आवाज़ आती थी जो घंटी की आवाज़ के साथ ही सुनाई पड़ती थी ----- 

खंड दे खिलौने 

घड़ी दे परौने

निक्के निक्के मिट्ठे 

ते किन्ने सौने सौने 

 ----टन-टन – टन –टन ---

 ( खांड के खिलौने 

घड़ी भर के मेहमान

  छोटे- छोटे मीठे 

  कितने मन भाने

टन – टन टन--------)

उन घंटियों की मीठी आवाज़ सुनते ही मैं अपने पिता की अँगुली पकडकर बड़े दरवाज़े के पास खड़ी हो जाती थी और बड़ी बेसब्री से उस खिलौने बेचने वाले की प्रतीक्षा करती थी। धीरे-धीरे और भी बच्चे गली में पहुँच जाते थे। 

यह खिलौने बेचने वाला अन्य खिलौने बेचने वालो से बिलकुल भिन्न था। यह रात को आता था। इसके पास जो खिलौने होते थे वे खांड और खोये के मिश्रण से बने होते थे। अधिकतर ये  बच्चों के प्रिय खिलौने या पक्षियों की सूरत में बने होते थे। इन पर हल्का रंग भी चढ़ा होता था। स्वाद ऐसा कि शब्दों में बता पाना अभी तक मेरे लिए कठिन। जैसे कबीर ने कहा है न –‘गूँगे केरी सरकरा, खाए और मुस्काए’। 

उसका खंड के खिलौने बेचने का ढंग भी सब से भिन्न था। वे अपने काँधे पर एक कांवर रखकर आता था।( ‘कांवर’ यानी बांस डंडी के दोनों ओर डोरियों से बँधी दो बड़ी-बड़ी टोकरियाँ)। अगर पाठकों ने श्रवण कुमार की कथा पढ़ी हो तो जैसी कांवर में श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को बिठाकर तीर्थ कराए थे, बिलकुल वैसी ही थी इसकी भी कांवर। अब समझ आता है कि वो खंड के खिलौनों को घड़ी भर के परौने (मेहमान) क्यों कहता था। क्योंकि मुँह में धरते ही वे मिनटों में घुल जाते थे।

हम बच्चे और बड़े सभी मीठे खिलौने वाले को भैया कहकर पुकारते थे। शायद इस लिए भी कि वो जम्मू से नहीं थे और डोगरी नहीं बोलते थे। हम सब के साथ वो भोजपुरी में बात करते थे। हमारे लिए वो यूपी वाले भैया थे।

उन की कांवर की एक और विशेषता थी। दोनों टोकरियों में दो छोटी-छोटी लालटेनें रखी होती थीं ताकि बच्चे अपनी मनपसंद का खिलौना देख सकें। भैया के हाथ में एक घंटी होती थी जिसकी मधुर आवाज़ हमें आकर्षित करती थी।

भैया बोलते भी बहुत मीठे थे। एक तो उनकी बोली हमारी डोगरी से अलग और फिर वो हम बच्चों को गुड्डी, मुनिया, रानों, परी आदि प्यारे-प्यारे नामों से पुकारते थे। यह खिलौने पत्ते के दोने में सजे होते थे। भैया बड़े प्यार से दोना उठाकर बड़े नाज़ुक ढंग से हमारे हाथ में रख देते थे। उन्हें शायद यह बात पता थी कि इस लेन-देन में मिठाई कहीं नीचे न गिर जाए।; क्योंकि उन दिनों हमारे हाथ तो उस दोने से भी छोटे होते थे।

 मुझे याद है मेरे पिता जी कुछ देर यूपी वाले भैया से बतियाते थे, हाल-चाल पूछते थे और फिर वो मीठी हाँक लगाता हुआ अपनी काँवर लेकर अगली गली की ओर बढ़ जाता था। जब तक मैं अपने कमरे में बैठ के उस मिठाई को चाव से खा रही होती थी तब तक अगली गली से भी घंटियों के मीठे सुर सुनाई देते रहते थे--- खंड दे खिलौने ---घड़ी दे परौने---टन—टन—टन—टन।

मीठे खिलौने वाले भैया बोली से तो मीठे थे ही, दिल से और भी मीठे। पता है क्यों ? उनकी कांवर की टोकरी में रंगीन कागज़ में लिपटे खांड के छोटे-छोटे मोर, गुड़िया, तितली, फूल आदी की शक्ल में बने खिलौने होते थे जो वे हमें अपनी खुशी से बिना माँगे दे देते थे। हमारी डोगरी भाषा में इस छोटी सी, बिना मोल चुकाए मिली भेंट को ‘चुंगा’ कहा जाता था। यह  ‘चुंगा’ हमारी उस दिन की सब से बड़ी उपलब्धि थी। अब क्या बताऊँ कि उस चुंगे का स्वाद बड़े खिलौने से भी अधिक होता था। हम पहले उसे खाते थे और फिर बड़े वाले को।  मुझे याद आता है कि हम बच्चे जब भी किसी दुकानदार से टॉफ़ी वगैरह लेने जाते थे तो पैसे देने के बाद चुपचाप खड़े रहते थे। उदार दुकानदार बच्चों को छोटी सी एक टॉफ़ी या चूर्ण की गोली बिना मोल के दे देता था। हमारा और दुकानदार के बीच चुंगे का भी एक रिश्ता था )

एक बात और याद आती है। कई बार मैं सो जाती थी भैया की प्रतीक्षा करते हुए। लेकिन सुबह उठते ही पिता सब से पहले वो दोना मुझे थमाते और कहते, “ कहा भी था उस भैया को कि गुड्डी सो गई है, आज नहीं चाहिए। पर घर के अंदर आकर दे गया तुम्हारे लिए। पता नहीं कैसा है, आज तो पैसे लेने से भी इनकार कर दिया। कहता था – गुड्डी तो सो गई तो पैसे किससे लेने।”

अब यह बातें याद करती हूँ तो मन भर आता है। हम बड़े हो गए। शहर छूट गया, देश छूट गया। अब बाज़ार में अनगिन प्रकार की मिठाइयाँ मिलती हैं। लेती भी हूँ, खाती भी हूँ और बनाती भी हूँ। लेकिन इन सब मिठाइयों में न वो रिश्तों की मिठास है, न नेह की घंटियों की टन-टन और न भैया की वो दुलार।

 मीठा तो सब जगह मिलता है पर..... वो मीठे वाला मीठा नहीं जो उन खंड के खिलौनों में था। उनके सपनों से अब भी नींद शहद घुली हो जाती है।  

सॉनेटः मुक्त हो जाओ

- अनिमा दास 


त्याग दूँ.. स्मृतियों की भावपूर्ण उर्मियों को

कि हृदयार्णव हो जाए निश्चल व गरलमय 

अभेद्य अध्वर की असहायता में है श्वास जो

हो भस्म में सुगंध श्मशान हो मेरा निलय 

 

मैं नहीं ककुंजल जो करूँ प्रतीक्षा सुधा वृष्टि की 

अनंत काल रहूँ नीरव मुद्रा में तीव्र निदाघ लिये 

प्रश्न करती रहूँगी कि 'शेष जन्म में क्या मैं थी?'

त्याग दूँ वे प्रश्न भी जो मुझे निसर्ग से कभी मिले।

 

मेरे अंतः के अतल गह्वर में उद्विग्न शाखाओं पर 

अपवादों के पक्षिदल करते अनवरत कोलाहल

कुहेलिका से पूर्ण चतुर्पार्श्व चित्रित व्यथा का नगर 

विक्षिप्त विरहिणी है विश्वास की वैशाली विह्वल

 

शीघ्र हो जाओ दूरत्व में मिलित ऐ व्यथा -अनुक्त 

हो जाओ शून्य में ॐ..नील शिखा से सदा मुक्त।


लघुकथाः ज़रूरत

  - आनन्द हर्ष

रंग-बिरंगे सजे पंडाल, सफेद और लाल- हरी- गुलाबी रोशनियों से नहाई हुई कनातें, एकदम असली लगने वाले प्लास्टिक के फूल और गुलदस्तों से सजा स्टेज, बारातियों के लिए सजाई गए स्टाल, जहाँ तरह–तरह के पकवान थे हर पाँच कदम की दूरी पर एक वेटर और सारी व्यवस्थाओं पर निगाह रखते सातों यार, मजाल है कामिनी की शादी में एक भी कमी बाकी रह जाए। बारात आने से लेकर सुबह विदाई तक उन सातों ने पलक तक नहीं झपकाई और जब विदाई हुई, तो सातों दोस्त यकायक गायब हो गए।

रमन गुस्से से उन्हें यहाँ वहाँ खोजता हुआ लाल–पीला होता रहा; लेकिन वे नहीं मिले। रमन और माँ–बाबा के अलावा वहाँ कोई नहीं था, जल्द ही दूसरी शादी की बुकिंग वाले आने वाले थे। ऐसे में सारी व्यवस्थाएँ देखना सामान इकट्ठा करवाना उस अकेले के बस की बात नहीं थी, रमन के हाथ–पाँव फूल गए। हड़बड़ाता हुआ कवीश को फोन लगाकर कहता है, अरे भाई कहाँ हो तुम सब लोग? यहाँ कितना काम बाकी पड़ा है, नहीं भई मैं तो ऑफिस निकल रहा हूँ, और बाकी लोग भी यही कर रहे होंगे तू उन्हें फोन मत करना, कोई नहीं आने वाला। कवीश ने उत्तर दिया। 

यह सब क्या हो रहा है? क्या ऐसे कोई अपनी जिम्मेदारी से भाग सकता है! मैं अकेला ये सब कैसे व्यवस्थित करूँगा? कुछ तो सोचा होता। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, आखिर कामिनी तुम्हारी भी तो बहिन ही है, तुम्हारा फर्ज…। 

बीच मैं ही कवीश ने रोकते हुए कहा, फर्ज की बात और तुम कर रहे हो… हअ हअ हअ…जो अमित की बहिन की शादी में रात को ही खाना खाकर भाग गया था। क्या तुम्हे वहाँ अपना फर्ज याद नहीं रहा? कहाँ गई थी तुम्हारी जिम्मेदारी? फोन कट गया।

रमन नि:शब्द, बेनकाब हुआ बिखरे सामानों के बीच सारे ब्रह्माण्ड में खुद को अकेला पाता अपने किए पर विचार कर ही रहा था कि इतने में मुख्य द्वार से सातों के हँसी- ठिठौली की आवाजें आने लगीं । सातों दोस्त आपस में बतिया रहे थे और । कोई सामान इकट्ठा करवाने में एक दूसरे की मदद कर रहा था तो कोई टेंट वाले को फोन घुमाकर सामान ले जाने के लिए कोताही कर रहा था। वे लोग ऐसे जता रहे थे जैसे रमन वहाँ पर था ही नहीं । रमन पास पहुँचकर बोला- अभी तो तुम- !

कवीश बोला, अरे पगले हम तो सामने थड़ी पर चाय पी रहे थे । तुझे क्या लगा हम तुझे ऐसे ही अकेला छोड़ देंगे? नहीं! अकेला तो हमने तुझे पहले भी नहीं छोड़ा, जब तू हमारे साथ कंचे खेला करता था और तब भी नहीं छोड़ा जब तू कस्टम ऑफ़िसर बन गया। समय बदलता है मेरे भाई ; क्योंकि समय में बदलाव निरंतरता का प्रतीक है, लेकिन उसे देखकर साथ चलना समझदारी है। सबकी जरूरतें और सामाजिक सरोकार एक से रहते हैं, उनमें बदलाव नहीं आने चाहिए।

लगा समय फिर से पुराने दौर में जैसे लौट गया हो ।अब उनके रिश्तों में बनावटीपन की बजाय बेतकल्लूफी और संतुष्टि साफ झलक रही थी।

सम्पर्कः असिस्टेंट प्रोफेसर, ऐश्वर्या कॉलेज ऑॅफ एज्युकेशन, जोधपुर); निवास: 815, नानक मार्ग गांधी कॉलोनी, जैसलमेर (राज.)

कहानीः स्कूल-ट्रिप

  - कुलबीर बड़ेसरों, पंजाबी से अनुवाद - सुभाष नीरव

“मम्मी, इस बार हमारे स्कूल का ट्रिप जा रहा है -पिंक सिटी… प्लीज़, इस बार मुझे भेज दो। पिछली बार आगरा गया था, तब तुमने मुझे नहीं भेजा था।’’
“हाँ, तू छोटी है न, तो मुझे डर लगता है। इसलिए नहीं भेजा था।’’
अंजली ने अपनी छोटी बेटी को टालने के लिए कहा। वैसे वह जानती है कि डर से अधिक उसे पैसों की चिंता थी कि ट्रिप के इतने सारे पैसे देने पर पूरे महीने का बजट गड़बड़ा जाएगा।
“पर अब तो मैं छोटी नहीं हूँ, आठवीं कक्षा में हूँ, चौदह साल की हो गई हूँ।’’ छोटी बेटी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा।
“कितने पैसे लगेंगे ट्रिप के?’’ अंजली का दिल जानता था, वह बस यूँ ही पूछ रही है। उसने तो बेटी को किसी न किसी तरह मना ही लेना था, ट्रिप पर ना जाने के लिए, पर पूछने में क्या हर्ज़ है। 
“चार हज़ार…।’’  बेटी ने थोड़ी झिझक के साथ कहा। वह भी जानती थी कि इतनी रकम सुनकर माँ परेशान हो जाएगी। वह जानती है माँ को। माँ तो छोटी-सी रकम सुनकर भी परेशान हो जाती है। 
फिर ये तो चार हज़ार हैं!
“चार हज़ार!’’  अंजली सचमुच परेशान हो गई थी, सोच में पड़ गई थी।
“कौन-कौन जा रहा है? तेरी फ्रेंड माधुरी भी जा रही है?’’  यूँ ही उसने पूछा। अंदर से जानती थी कि यह सवाल ही व्यर्थ है, बिल्कुल खोखला है, चले हुए कारतूस जैसा… भला इस सवाल का क्या मतलब है?  स्कूल-ट्रिप जा रहा है तो बच्चे तो जाएँगे ही, प्रिंसीपल भी जाएगी, सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम भी होगा, सब कुछ सही होगा… फिर भी… फिर भी क्या?  बस, यही कि ट्रिप के पैसे बहुत ज्यादा हैं… हज़ार के करीब होने चाहिए। स्कूल वालों को खुद भी तो सोचना चाहिए, आखि़र फीस लेते हैं… डोनेशन लेते हैं, फिर ये अलग से इतने पैसे?
“मम्मी, क्या हुआ? अच्छा ठीक है? मैं नहीं जाऊँगी,बस। वैसे मुझे भी डर लगता है… फिर भी, भविष्य में मौका मिला तो मैं तुम्हारे साथ जाऊँगी, साथ में दीदी भी होगी, ओ.के.।’’ छोटी बेटी ने माँ के गले में लाड़ से दोनों बाहें डालकर कहा, चेहरे पर मुस्कराहट लाकर। 
“मगर तू फ्रेंड्स के साथ एन्जॉय करना चाहती है न?’’ 
माँ बेटी के दिल की बात जानती थी, पर बेटी भी कहाँ कम थी, वह भी माँ के दिल की बात खूब जानती-समझती थी। माँ के अभाव, माँ की मज़बूरियाँ, माँ की जिम्मेदारियाँ।
“ओ नहीं मम्मी… मैंने तो यूँ ही कहा था कि मैं जाना चाहती हूँ। असल में, मैं नहीं जाना चाहती… आय स्वेयर… मैं तेरे और दीदी के साथ ही जाना चाहती हूँ… सचमुच… ओ.के.!’’
बेटी माँ के साथ और भी अधिक लाड़ जताने लगी। हमेशा ऐसा ही क्यों होता हे? अंजली उदास हो गई। वह सदैव कोशिश करती है कि दोनों बेटियों की हर खुशी पूरी करे, हर ज़रूरत पूरी करे, परंतु जब कभी अधिक पैसों की ज़रूरत पड़ जाती है तो वह कमज़ोर पड़ जाती है। जैसे जब बढ़िया रेस्तरां में खाना खाने की बात आती है या जब मार्किट में आए नए मोबाइल, लैपटॉप, आई-पैड, आई-पॉड या एल.ई.डी. टीवी लेने की बात चलती है या जब बढ़िया क्लबों में स्वीमिंग पूल अथवा स्केटिंग ज्वाइन करने की बात करती हैं, अपनी सखी-सहेलियों की मिसालें देती हैं, तो वह असहाय-सी अनुभव करने लगती है स्वयं को। फिर लगता है कि उसके हाथ-पाँव फूल रहे हैं घबराहट में, परेशानी में… तब उसको लगता है, वह कितनी अकेली है, हालाँकि वह नौकरी करती है, अच्छी पोस्ट पर है, अच्छा वेतन है, पर ये अतिरिक्त सुख, अतिरिक्त सुविधाएँ-खुशियाँ? काश! एक और इतनी ही तनख्वाह होती… पर किसकी? उसके पति की?  हाँ?  पति की… है न। पर वह तनख्वाह उसके खुद के लिए है, उसकी अपनी ऐश के लिए है। काश! तलाक के समय वह थोड़ी-सी हिम्मत दिखाती, कोर्ट में केस करती, पति से खर्चा लेने का… पर सबने कहा,  ‘छोड़ भी… न पड़ इन झंझटों में। तू खुद कमाती है, इसलिए तुझे खर्चा मिलेगा भी नहीं… और खर्चा देने वाला इंसान तो बिना किसी केस के भी, फर्ज़ समझकर दे सकता है। क्या वह नहीं जानता कि बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर आजकल कितना खर्चा होता है?  स्कूल, कालेज की फीस और ट्यूशन का खर्च ही दम नहीं लेने लेते… उस पर अन्य सौ प्रकार के खर्चे।’’
“मम्मी, तू क्यों उदास हो गई?  कुछ मत सोच। बिलीव मी, तुमने हमारे लिए कोई कमी नहीं रहने दी… यू आर ए वंडरफुल मदर…।’’  छोटी बेटी ने अंजली को पूरा विश्वास दिलाने का यत्न किया कि उसे स्कूल-ट्रिप में न जा सकने का ज़रा-भी अफ़सोस नहीं हो रहा।
‘कितनी समझदार है मेरी बेटी! मेरा कितना ध्यान रख रही है और मैं… मैं इसकी छोटी-सी खुशी भी पूरी नहीं कर सकती। लानत है मेरे पर… लानत है उस घड़ी पर जब मैं जन्मी थी, अपने काले, अभावों भरे करम लेकर। काश! मैं जन्म ही न लेती… काश!…।’  अंजली का मन हुआ कि वह जी भरकर अपने आप को कोसे, लानत है मेरे सुंदर होने पर, कैसी सुंदरता?... जब मेरा पति ही मुझे छोड़कर किसी दूसरी सुंदर स्त्री पर मोहित हो गया… हमें छोड़कर चला गया। मेरे जैसी बदसूरत तो कोई नहीं होगी। अंजली उठकर रसोई में चली गई, रात के खाने का प्रबंध करने लगी। पर मन था कि उखड़ चुका था, टिक नहीं पा रहा था।
हमेशा ही ऐसा होता है, जब रूटीन से हटकर कोई खर्चा करने की बात होती है तो उसका मन उखड़ जाता है। कई बार तो छोटी-छोटी बात पर भी ऐसा हो जाता है। जैसे, जब बेटियाँ पीज़ा आर्डर करने की बात करती हैं, मैकडोनल्ड जाना चाहती हैं या पी.वी.आर में जाकर फिल्म देखना चाहती हैं, जहाँ एक व्यक्ति की टिकट ही तीन-साढ़े तीन सौ से शुरू होती है या वे ब्रैंडिड ड्रैसिज लेना चाहती हैं, या फिर कुछ भी जैसे मिडिल क्लास से अपर क्लास की ओर जाने वाली बात करती हैं तो उसका मन उखड़ जाता है। तब वह सोचने लगती है कि वह इन्हें लेकर महानगर में क्यों बैठी है, जहाँ सब कुछ महंगा है, जहाँ का लाइफ़-स्टाइल बच्चों को आकर्षित करता है, उनकी मांगों को बढ़ाता है। यद्यपि वह बहुत कोशिश करती है कि वह अपनी बेटियों की मांगें पूरी करे। अपने आप पर खूब कंजूसी करती है। अपनी पसंद की ड्रैसिज़ को हाथ लगाकर उस पर टंगा कीमत का टैग पढ़कर छोड़ देती है। खुद थियेटर, सिनेमा, कन्सर्ट्ज़ न जाकर, बेटियों को ही भेज देती है। कभी ब्यूटी पॉर्लर नहीं जाती, स्पॉ में जाना तो बहुत दूर की बात है। खर्चे ही इतने हैं, वह करे तो क्या करे?
असल में, हर समय असुरक्षा की भावना ही हावी रहती है, यदि कभी वह बहुत बीमार हो गई? अगर कहीं एक्सीडेंट हो गया फिर?  यदि होस्पीटल में एडमिट होना पड़ा तो?...  बस, इन्हीं सब डरों के चलते उसने हैल्थ पॉलिसियाँ ले रखी हैं, अपने नाम पर, बच्चों के नाम पर। उनकी किस्तें भरती है वह। फिर मकान लिया तो बैंक से लोन उठाना पड़ा, उसकी किस्तें अलग हैं। छोटी-सी डीज़ल पर चलने वाली टाटा की कार ले ली थी, उसकी भी किस्तें भरती रहती है। और मकान जिसे फ्लैट कहना अधिक उचित है, की मैंटेनेंस हर महीने देनी पड़ती है। इसके अलावा, मोबाइलों के बिल, इंटरनेट और कंप्यूटर का बिल, बिजली और गैस का बिल। बस, बिल ही बिल। किस्तें ही किस्तें। तनख्वाह बेचारी क्या करे। पर्स में पैसे होते हैं, सेविंग अकाउंट में होते हैं, फिर भी डर बना रहता है… अगर ख़त्म हो गए?  फिर वह कंजूसियाँ न करे तो क्या करे? कंजूसियाँ भी ऐसी जो ज्यादातर उसके अपने पर ही लागू होती हैं। जैसे कई सालों से वह सवेरे-सवेरे उठकर सैर करने जाती है। घर की बिल्डिंग की पिछली तरफ तो पार्क है। सैर के बाद पार्क से बाहर निकलती है तो सामने नारियल वाले की रेहड़ी लगी होती है और दूसरी तरफ तरह तरह के सूप बिक रहे होते हैं जैसे गेहूँ  का सूप, करेले का सूप,  मिक्स सूप… हैल्थ के लिए लाभदायक, पर हर साल उसको लगता है कि सूप बहुत महंगे हैं और नारियल पानी भी बहुत महँगा है - ‘भला बताओ, छोटा-सा नारियल पानी और पच्चीस रुपये! अगले महीने से शुरू करूँगी।’
फिर अगला महीना तो क्या, अगला साल आ जाता है। एक घंटे की सैर के बाद गला सूख जाता है। दिल करता है कि नारियल पानी पी ले, पर अब तो वह पैंतीस रुपये का हो चुका है। अब क्या पीना… पता नहीं ये लाग कौन है जो सफ़ेद क्रीज वाल ट्रैक सूट या थ्री-फॉर्थ निक्करें पहनकर सैर करते हैं और फिर सूप या नारियल पानी वाली रेहड़ियों के इर्दगिर्द रीलैक्स होकर जा खड़े होते हैं और जो इच्छा होती है, पीते हैं। वह कब होगी रीलैक्स, बेफिक्र… कब इस रूटीन से उभरेगी। कभी वह बेटियों के संग किसी सस्ते-से रेस्टोरेंट में चली भी जाए तो दो ही प्लेटों का आर्डर देगी। और फिर जब दो प्लेटें आ जाएँ तो बेटियो के आगे सरका देगी और खुद बीच-बीच में एक-आध ग्रास तोड़कर खा लेगी। बेटियाँ भी जिद्द नहीं करतीं, अलग से प्लेट मंगवाने के लिए, बल्कि अपनी-अपनी प्लेट माँ की तरफ सरका कर कहती रहेंगी, “लो न मम्मा… खाओ न मम्मी…।’’ 
शुक्र है, उसकी बेटियाँ समझदार हैं, अंजली सोचती और आह भरती। लगता है, पूरी ज़िन्दगी सिकुड़कर एक आह बनकर रह गई है।
परंतु, जब वह बेटियों को चहक-चहक कर बातें करती देखती है, स्कूल-कालेज की डिबेट में,  नाटकों में,  डांस प्रतियोगिताओं में फर्स्ट आते देखती है तो उसे लगता है, ‘हाँ, मैं अपनी बच्चियों का बढ़िया पालन-पोषण कर रही हूँ।… तभी तो वे खुश हैं, पढ़ाई में, कल्चरल प्रोग्रामों में आगे हैं।’
फिर, कभी कोई शिकायत भी तो नहीं करतीं। हमेशा यही जताती हैं कि उन्हें कोई कमी नहीं है… और वह भी उनके अंदर यही कान्फीडेंस भरना चाहती थी कि उन्हें कोई कमी नहीं, रिश्तों में भी नहीं… पापा का, दादा-दादी का, चाचा-चाची का, ताया-ताई का या बुआ-फूफा का प्यार उनके लिए नहीं तो क्या हुआ, उनके मामा तो हैं, मामियाँ हैं, मौसियाँ हैं, मौसा हैं… वह इंटरनेट पर उनकी तस्वीरें बेटियों को दिखाती।
“परमात्मा की कृपा से तुम्हारे चार मामा है, मामियाँ हैं,  तीन मौसियाँ हैं, मौसा हैं, कज़न हैं… सभी विदेशों में वैल-सैटल्ड हैं।’’ 
बेटियाँ खुशी-खुशी फेसबुक पर सबके टच में रहती हैं। ससुराल के रिश्ते नहीं हैं तो चलो, मायके के तो हैं। सब अपने अपने कामों में बिजी रहते हैं। कोई हैल्प नहीं करते तो क्या हुआ, वह गर्व से कह तो सकती है कि उसके अपने हैं।
“मम्मी, ये डॉ. करनजीत भी हमारे मामा जी हैं?’’  एक दिन जब डॉ. करनजीत का फोन आकर हटा था तो छोटी बेटी ने पूछा था। 
“हाँ, मामा जी ही हैं। मेरे भाइयों जैसे दोस्त। बस, फोन पर ही दोस्ती हो गई। मैं उनसे कभी मिली भी नहीं हूँ। वह दूसरी स्टेट में रहते हैं, हमारे आफिस के हैड-आफिस में काम करते हैं।’’ 
फिर उसने विस्तार के साथ बेटियों को बताया कि कैसे एक दिन डॉ. करनजीत के साथ आफिस के काम के सिलसिले में ही बात करनी पड़ी थी। ख़ास तौर पर जब वह बुखार के कारण आफिस नहीं जा पा रही थी, तो डॉ. करनजीत ने उसके मोबाइल पर बात की थी, हालचाल पूछा और कहा था, “घबराना नहीं,  विदाउट पे भी छुट्टी लेनी पड़ी तो ले लेना, आराम करो। रुपये-पैसे की ज़रूरत पड़े तो मुझे बताना, मैं हूँ न।’’ 
उस दिन से उसके मन में उस शख़्स के लिए बहुत इज्ज़त पैदा हो गई थी। अंजली को वह दिन याद आ गया,  वह मन ही मन उस पल को याद करने लगी। उसे याद है कि जब डॉ. करनजीत ने इस तरह हौसला दिया तो उसका मन किया कि वह कहे,  ‘आपने इतना हौसला दिया है, ऐसा तो कभी मेरे अपने सगे बहन-भाइयों ने भी नहीं दिया।’ पर वह यह सोच कर कि ऐसा कहने पर मेरे बहन-भाइयों की इज्ज़त डॉ. करनजीत की नज़रों में क्या रह जाएगी?  अंजली सिर्फ़ इतना ही कह सकी -
“आप तो ऐसे हौसला दे रहे हैं, जैसे मेरा कोई बहन-भाई मेरे साथ खड़ा हो।’’ 
“बस, तुम मुझे अपना भाई-बहन ही समझो।’’ 
उस घटना के पश्चात अंजली को सचमुच ही लगने लगा मानो डॉ. करनजीत उसके कोई अपने ही हों। बस, उस दिन के बाद डॉ. करनजीत हमेशा उसकी खै़र-ख़बर पूछते रहते थे, हौसला देते रहते थे।
अंजली डॉ. करनजीत के बारे में सोचती, ‘दुनिया में ऐसे इंसान भी होते हैं- हमदर्द, निस्वार्थ, ज़िंदादिल, हौसला देने वाले, पॉजिटिव बातें करने वाले और ज्यादा पर्सनल गहराई में न जाने वाले…।’  वह अंजली से उसकी बेटियों का हालचाल पूछते रहते हैं तो अंजली भी उनसे उनकी तीन बेटियों के बारे में पूछती थी। इस पर वह खुशी में, उत्साह में भरकर अपनी बेटियों की बातें सुनाते थे, अपनी पत्नी की, अपनी माँ की, अपने नए मकान की बातें करते रहते थे। ‘अजीब रिश्ता है ये फोन का…’ अंजली सोचती।
“मम्मी, जब मैं पिछले साल पास हुई थी तो डॉ. करनजीत ने मुझे हज़ार रुपया भेजा था न?  कहा था कि मेरी तरफ से इनाम है।’’ 
छोटी बेटी के प्रश्न ने अंजली को ख्यालों से बाहर निकाला। रसोई के दरवाज़े पर आकर छोटी बेटी खड़ी थी। अचानक यह सवाल क्यों? अंजली समझ नहीं पाई। पिछले वर्ष जब छोटी बेटी सातवीं कक्षा में पास हुई थी तो बातों-बातों में अंजली ने बताया था कि डॉ. करनजीत ने उन्हें हज़ार रुपये का चैक भेजा है कि मेरी तरफ से बेटी को इनाम…।
हज़ार रुपये…! देखा जाए तो कुछ भी नहीं, पर देखा जाए तो बहुत बड़ी रकम है। कौन देता है आज के ज़माने में किसी को हज़ार रुपये?...  न कोई रिश्ता, न कोई नाता, न कभी मिले। पता नहीं क्या सोचकर उन्होंने हज़ार रुपये का चैक भेजा कि अंजली और उसकी बेटियाँ खुश हो गईं। आज अंजली हैरान भी हो गई कि छोटी बेटी को इतने महीनों के बाद भी यह बात याद है। शायद इसलिए कि कभी उसको किसी ने इस तरह इनाम भेजा ही नहीं।
पता नहीं क्या सोचकर डॉ. करनजीत ने उसकी छोटी बेटी को हज़ार रुपये भेजे थे। शायद सोचा होगा, कन्या है, पुण्य लगेगा। या शायद इसलिए कि चलो, क्या फर्क़ पड़ता है, साठ हज़ार तनख्वाह है, उसमें से हज़ार रुपये दे भी दूँगा तो क्या फर्क़ पड़ जाएगा?  या शायद यह सोचा होगा कि…
‘हज़ार ही है ना… अगर हज़ार भेजकर बच्ची की मम्मी का दिल जीत लूँगा तो भी सौदा महँगा नहीं… कैसे वह विनम्रता में भीग-भीग कर धन्यवाद करेगी… कैसे?... कितना मज़ा आएगा उस धन्यवाद को सुनने में।‘
“मम्मी?“
अंजली चौंक  गई।
“हाँ, बेटा। सचमुच पैसे भेजना बहुत बड़ी बात है… बहुत बड़ी। बाचतीत करना तो बड़ी बात नहीं, वह तो सभी करते रहते हैं।’’ 
अंजली ने अपनी सोच से बाहर निकल कर कहा।
“मम्मी, मैं आठवीं के फाइनल एक्ज़ाम में बहुत मेहनत करूँगी, बहुत अच्छी परसेंटेज़ लाऊँगी। फिर तुम डॉ. करनजीत अंकल को बताना, वह ज्यादा पैसे भेजेंगे। फिर मैं अगले साल स्कूल-ट्रिप पर जा सकूँगी, है न? ’’ 
अंजली को लगा, उसके हाथ-पैर फूल रहे है फिर से…।