मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label कमला निखुर्पा. Show all posts
Showing posts with label कमला निखुर्पा. Show all posts

May 1, 2023

कविताः पर तुम नहीं बदले

 - कमला निखुर्पा

सब कुछ बदल रहा है

बदलते समय के साथ- साथ

तकनीक की तरह

खून के रिश्ते भी 

बदल रहे रंग हर रोज।

2जी से 5जी के सफर में भाग रहे हैं सब

अनजानी दिशा की ओर।

अपनी-अपनी मंजिल की सबको तलाश है

काँधों पर सबके अपने-आने  रिश्तों की लाश है ।

आभासी दुनिया है

अन्तरंगी मुखौटे हैं

जाने कितनों ने

कितनों के चैन लूटे हैं

फिर भी अपनी नजर में

वो तो बड़े काबिल हैं।

अभी कल तक जो

अपनों के ही कातिल थे।

सचमुच सब कुछ बदल रहा है

बदलते समय के साथ- साथ ।

पर तुम नहीं बदले

हिमालय की तरह हो अडिग खड़े

अपनों की भीड़ कम हो जाए, तो गम नहीं

पर तुम हर पल साथ हो

इस एहसास में बहुत बड़ी बात है

सचमुच इस एहसास में

कुछ खास है!

सम्पर्क: प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय पिथौरागढ़, 2/12 praachaar, पोस्ट ऑफिस – भरकटिया, (उत्तराखंड )-262520

Mar 1, 2022

पर्व - संस्कृति- कहाँ गई वो गाँव की होली

 - कमला निखुर्पा
(प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय पिथौरागढ़)

  मार्च का महीना है...आज होली का त्योहार है... मोबाइल में होली मनाई जा रही है (भई दो दिनों से लगातार मोबाइल पर होली के एक से बढ़ के एक मैसेज, पिक्चर, और वीडियोज आ रहे हैं), फेसबुक पर होली मन रही है। दनादन स्टेटस अपलोड हो रहे हैं, रंग-बिरंगे मुस्कराते चेहरे और अबीर-गुलाल की थालियाँ स्क्रीन पे सजी हुई है। घर का सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्य, जिसके पास कोई न कोई हमेशा बैठा रहता है। अरे वही अपना बुद्धू बक्सा (टीवी), वो भी आज होली के गीत सुना रहा है।

   बस एक मैं ही हूँ , जो बार-बार खिड़की से बाहर झाँककर देख रही हूँ। सड़क पर इक्का-दुक्का लोग नजर आ रहें हैं, कोई कार में सरपट भाग रहा है, तो कोई स्कूटी में दुपट्टा लहराते हुए उड़ रही है। सामने के घरों में कुछ बच्चे गुब्बारे और पिचकारियों से खेल रहे हैं। मेरे घर भी कुछ मित्र और सहकर्मी आए, औपचारिक सी शुभकामना देकर, टीका लगाकर चले गए, सब कुछ फीका- फीका सा। मन अभी भी उदास है अभी भी मेरी आँखें ढूँढ रही हैं गाँव के हुरियारों की टोली को...जो बसंत पंचमी से होली की बैठक जमा लेती थी। केवल रंगों से नहीं संगीत के रागों से भी होली खेलती थी। हारमोनियम, ढोलक, तबला लेकर शास्त्रीय राग धमार से होली का आह्वान करते हुए  राग भैरवी से समापन करती थी। बसंत पंचमी को भक्तिमय गीतों से प्रारंभ हुई होली शिवरात्रि तक शृंगार रस में भीग जाती थी और मदमस्त होकर झूम उठाते थे होल्यार ..

जल कैसे भरूँ जमुना गहरी

ठाड़े भरूँ राजा राम देखत हैं

बैठे भरूँ जमुना गहरी

जल कैसे भरूँ  जमुना गहरी

  हुरियारों की टोली.. गाँव में होली गाते हुए प्रवेश करती थी... कोई स्वांग धरकर आया है, घूँघट डालकर मूँछों को छुपा रहा है, तो कोई बड़ी सी तोंद बनाकर नाच रहा है। गोल घेरे में खड़े होकर एक ताल में होली गाते हुए नाच रहे हैं।

हो हो हो मोहन गिरधारी, 

हाँ हाँ हाँ मोहन गिरधारी

ऐसो अनाड़ी चूनर गयो फाड़ी,

हँसी हँसी दे गयो मोहे गारी

हाँ हाँ हाँ ... मोहन गिरधारी,

हो हो हो मोहन गिरधारी

    सफ़ेद कुरते -पजामे और टोपी में सजे हुरियार, जिन्हें  हम पहाड़ी में ‘होल्यार’ कहते थे, जिनके ढप की थाप, ढोलक की धमक और होली है...है है  की गूँज सबको रोमांचित कर देती थी, हर कोई घर से बाहर आने को मजबूर हो जाता था। बाहर आते ही सब एक रंग में रँग जाते थे... होली का रंग, मिलन का रंग और खुशी-आनंद का रंग।

   आँगन में होल्यारझूम- झूमके गा रहे हैं, खिड़कियों, छतों से होल्यारों पर रंगों की बौछार हो रही है। हँसी-ठिठोली और एक दूसरे को भिगो देने की चाह... पक्के रंग में रँग देने की कामना ... यूँ लगता है नेह का समंदर उमड़ रहा हो...बच्चों का उत्साह तो निराला है। कोई  अपनी नन्ही हथेलियों को रँगे है, किसी ने मुठ्ठी में गुलाल छुपाया है, तो कोई पिचकारी की धार से सराबोर कर देना चाहता है। इसी बीच होल्यारो के लिए चाय, नाश्ता, सौंफ और सुपारी के साथ पेश किया जाता है। छककर सब, होली है... के उद्घोष के साथ अगले घर की ओर बढ़ जाते हैं एक और  नई उमंग के साथ।

कहाँ गई वो होली... जहाँ मैं दादा की गोद में बैठकर उनके गुरु गंभीर स्वर में बैठकी होली सुनती थी...।

शिवजी चले गोकुल नगरी... 

शिवजी चले गोकुल नगरी...

   आज भी लगता है अभी- अभी चाचाजी ने कान में गाया है

झुकि आयो शहर में व्योपारी,

इस व्योपारी को भूख बहुत है

पुरिया पका दे नथ वारी,

झुकि आयो शहर में व्योपारी

  आज होली, बस स्क्रीन पर है, (टीवी का स्क्रीन, मोबाइल का स्क्रीन, कंप्यूटर का स्क्रीन)। हमारे जीवन से होली विदा हो रही है बाकी सभी विरासतों की तरह... रह गए है बस जहरीले रसायनों वाले रंग, जिनका जहर हमारे मन के जहर से तो शायद कम ही होगा।

Jan 1, 2022

हाइकुः मन के पूरब में सूरज उगा


कमला निखुर्पा

1

रात ओढ़ाए

मोतियों की चादर

ठिठुरी धरा।

2

किससे कहे

कसक गलन की

जमें हैं सब।

3

ढूँढती रही

बर्फीली नगरी में

नेह की आँच।

4

सोया है जग

कोहरे से लिपट

रोया है कोई।

5

लम्बी है रात

कोई तो सुलगा दे

यादों की आग।

6

धरा के माथे

रवि नेह चुम्बन

पुलका मन।

7

स्वर्णिम हुई

कलरव कूजित

चारों दिशाएँ।

8

हारेगा शीत

मन के पूरब में

सूरज उगा।

Nov 1, 2021

बाल एकांकीः चक्रव्यूह

-कमला निखुर्पा

पात्र 

1-माँ, 2-शिवम (बेटा, उम्र 16 साल), 3-दिव्या (बेटी उम्र 14 साल), 4-डाक्टर, 5-पुलिसवाला, 6-आशीष (शिवम का दोस्त), 7-हिमांशु (शिवम का दोस्त)

दृश्य एक

 घर के बैठक कक्ष का दृश्य है। माँ सोफ़े पर बैठी अखबार पढ़ रही है। शिवम का प्रवेश।

माँ- अरे शिवम क्या हुआ? इतना परेशान क्यों है? आज तुम्हारा यूनिट टेस्ट था ना? पेपर कैसा हुआ? शिवम क्या हुआ? कुछ बोलता क्यों नहीं? किसी से लड़ाई हुई है क्या?

(शिवम बैग सोफ़े पर  फेंककर अपनी टाई खोलता है)

शिवम (अनमने  स्वर में)-कुछ नही माँ मेरा खाना लगा दो जल्दी, मुझे ट्यूशन के  लिए देर हो जाएगी।

माँ- ठीक है ठीक है, लगा रही हूँ मैं खाना। अब बताओ भी पेपर कैसा हुआ? 90% से  अधिक ही  हैं ना?

शिवम (झल्लाकर) पेपर पेपर पेपर लो देखो पेपर ।  90% नहीं केवल 40% अंक ही  आए हैं मेरे फ़िजिक्स में। मैं अच्छा नहीं कर पाया माँ।

माँ- (  हैरान होकर) 40% !! तुमने तो फ़िजिक्स की ट्यूशन भी लगाई है, वो भी शहर के  सबसे महंगे ट्यूटर से फ़िर भी इतने कम नंबर? क्यों …?

 शिवम- (दुखी स्वर में) माँ मुझे नहीं पता…क्यों? मैं तो पूरी मेहनत करता हूँ  फ़िर भी  मेरे नंबर कम क्यों आते हैं। कितनी बार बताया आप लोगों को, मुझे ये फ़िजिक्स, कैमिस्ट्री समझ नहीं आती। मुझे तो कैनवस और रंगों से प्यार है पर आप और  पापा…

 माँ- शिवम हमने भी कितनी बार समझाया है, हम तुम्हें आर्किटेक्ट इंजीनियर बनाना  चाहते हैं और तुम एक मामूली शौक के लिए पेंटर बनकर अपनी जिंदगी बरबाद  करना चाहते हो ? ये रंग कागज में ही अच्छे लगते हैं , असल जिंदगी में नहीं। चलो  अब खाना खा लो।

शिवम (झल्लाकर) ओफ़्फ़ो…फ़िर भाषण... रहने दो खाना-वाना मै जा रहा हूँ । मुझे  फ़िजिक्स की ट्यूशन के लिए  देर हो रही है। (शिवम अपना बैग उठाकर चला जाता है)

माँ- अरे  शिवम बेटा! खाना तो खा ले, सुबह से कुछ नही खाया। शिवम शिवम!!!!   हे भगवान! आज फ़िर बिना खाए भूखा चला गया ये लड़का। दिव्या , ओ दिव्या! कहाँ  गई  ये लड़की भी…

दिव्या- क्या हुआ माँ, भैया नही आए क्या?

माँ- अरे बेटा शिवम आया था और बिना खाए ही ट्यूशन चला गया, बताओ खाने की भी  फ़ुर्सत नहीं है।

दिव्या- खाने की फ़ुर्सत कहा होगी माँ, पता है, भैया आज फ़िर टिफ़िन लेकर नही गए थे, स्कूल कैंटीन में खाकर आए होंगे। बर्गर, पिज्जा या समोसा।

माँ- हाँ, आज फ़िर बाहर से उल्टा-सीधा खाकर आया होगा।  क्या होगा आज की पीढ़ी का? सुबह से घोड़े की तरह दौड़ रहा है, रुकने का तो नाम  ही नहीं ।

दिव्या- हुँह भागता रहता है, कान में मोबाइल की लीड डालकर बाइक में सवार होकर, इतनी तेज चलाता है कि … आपको तो मालूम है ना कि 18 साल से कम  उम्र के बच्चों को गियर वाला वाहन चलाना गैर कानूनी है। आपने उसे बाइक दिलाई ही क्यों? साइकिल तो थी न उसके पास?

माँ- कैसी बातें करती हो दिव्या, तुम्हें तो मालूम है न कितनी व्यस्त दिनचर्या है तुम्हारे भाई की। पहले स्कूल फ़िर तीन-तीन विषयों के ट्यूशन । साइकिल से आते-जाते  कितना थक जाता था बेचारा; इसीलिए तो उसे मोटर साइकिल दिलाई हमने और  रही बात कानून की तो बेटा, सारे नियम कानून व्यावहारिक नहीं होते, जीवन में कई  समझौते करने पड़ते हैं। तुम्हें क्या पता? तुम्हें तो ट्यूशन नहीं जाना पड़ता है ना।

दिव्या- मैं क्यों जाऊँ ट्यूशन ? मैं स्कूल में मन लगाकर पढ़ती हूँ  जो समझ में नहीं आता अपने टीचर से पूछ लेती हूँ । हर बार अव्वल आती हूँ  अपनी कक्षा में। अरे  हाँ… माँ मुझे आपको कुछ दिखाना है… अपनी आँखें बन्द करो ना… प्लीज माँ हाँ अब देखो… मुझे आज प्राइज मिला…।

माँ- अरे वाह! प्राइज! कितना सुंदर है, दिव्या अब प्राइज के बारे में जल्दी से बता दो।

दिव्या- बताती हूँ, बताती हूँ। माँ, मैने कविता लेखन- प्रतियोगिता में भाग लिया था, मेरी  कविता ‘जलसंचय’ को फ़र्स्ट प्राइज मिला।

माँ- अरे वाह! मेरी मुनिया तो कवयित्री  बन गई। शाबाश बेटा! तुम ये सब काम कब करती हो भई ? दिव्या- मैं ट्यूशन जाकर समय बरबाद नहीं करती माँ । इसीलिए पढ़ाई के साथ-साथ  अपनी रुचि के काम  करने के लिए वक्त मिल जाता है मुझे।

 माँ- भई हमें भी सुनाओ अपनी कविता-

दिव्या- सुनो-

पानी है अनमोल,

इसका मोल जान लीजिए।

आने वाली पीढ़ी का

कुछ तो खयाल कीजिए।

बूँद-बूँद से बनता जल

जल से बनता जीवन

पानी धरती की जान है

बेकार न बहाया कीजिए.।

 

पानी है अनमोल,

इसका मोल जान लीजिए।

आने वाली पीढ़ी का

कुछ तो खयाल कीजिए।

 

जलसंचय ना किया अभी तो

जल्दी वो दिन आएगा।

हर पौधा हर एक जीव

तड़प तड़प रह जाएगा।

पानी पानी चिल्लाकर

इंसा प्यासा मर जाएगा।

 

आने वाली पीढ़ी का

कुछ तो खयाल कीजिए।

पानी है अनमोल,

इसका मोल जान लीजिए।

 माँ, कैसी लगी आपको मेरी कविता………?

माँ-बहुत सुन्दर, प्रेरक रचना है। इसी बात पर आज मैं तुम्हें अपने हाथ से हलवा बनाकर खिलाऊँगी।

 (तभी फ़ोन की घण्टी बजती है)

माँ- हैलो! जी हाँ मैं शिवम की माँ बोल रही हूँ । क्या?? (परेशान हो जाती है) कौन से अस्पताल में? मैं आ रही हूँ । ( फ़ोन रखकर रुआँसी आवाज में) दिव्या ! जल्दी चलो शिवम का एक्सीडेंट हो गया है। (दोनों माँ बेटी तेजी से निकल जाती हैं।)

दृश्य परिवर्तन

  अस्पताल का कमरा, शिवम बिस्तर पर लेटा कराह रहा है, माथे से खून बह रहा है। उसके दोनों दोस्त परेशानी की मुद्रा में खड़े हैं। डाक्टर, शिवम की जाँच कर रहा है। वही एक पुलिसवाला भी चहलकदमी कर रहा है। तभी माँ और दिव्या का प्रवेश होता है।

माँ-(घबराई हुई है)- शिवम , क्या हुआ बेटा!!  शिवम!, डाक्टर क्या हुआ है मेरे बेटे को? (शिवम के दोस्तों से) आशीष बेटा!, हिमांशु क्या हुआ है शिवम को, और तुम दोनों को भी ये खरोंचे कैसी? ( दोनों अपना सिर झुका लेते हैं) बताओ बेटा…।

पुलिसवाला- ये क्या बताएंगे मैडम!, मैं बताता हूँ । आपका बेटा बिना हैलमेट पहने मोटरसाइकिल चला रहा था, फ़ुल स्पीड में। वो भी अपने दोनों दोस्तों को पीछे बैठाकर, ऐसे में दुर्घटना तो होनी ही थी। आपके बेटे की मोटरसाइकिल जब्त हो गई है। यातायात के नियमों का उल्लंघन करने के जुर्म में आपका बेटा इस वक्त हिरासत में है और (शिवम के दोस्तों से) तुम दोनों इसी वक्त चलो मेरे साथ थाने, दोपहिया वाहन में तीन तीन लोग सवारी करते हो? अपने साथ-साथ सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जिंदगी से भी खेलते हो?

आशीष और हिमांशु- (रोते हुए) हमें माफ़ कर दीजिए सर, फ़िर कभी ऐसी गलती नही होगी।

माँ- हे भगवान ये क्या हो रहा है!! (पुलिसवाले से) भाई साहब बच्चे हैं माफ़ कर दीजिए इनको, (डाक्टर से) डाक्टर साहब! बताइए ना कैसा है मेरा शिवम?

(पुलिसवाला दोनों बच्चों को लेकर बाहर चला जाता है)

डॉक्टर- देखिए मैने इंजेक्शन दे दिया है, चोटें गहरी नहीं है। ठीक होने में हफ़्ता भर लगेगा इसे पर अंदरूनी कमजोरी बहुत है । आपके बेटाेको एनीमिया है,

माँ- एनीमिया???

डॉक्टर हाँ... एनीमिया यानी खून की कमी,  मैं पेशेंट से कुछ सवाल पूछ्ना चाहूँगा।

हाँ शिवम बेटा! बताइए ये  एक्सीडेंट कैसे हुआ? क्या आप किसी से टकरा गए थे?

शिवम- नहीं, बाइक चलाते-चलाते अचानक मुझे चक्कर आ गया था।

डाक्टर- आपने आज सुबह क्या खाया था?

शिवम- मैगी।

डॉक्टर- और दिन में?

शिवम- स्कूल के कैंटीन में बर्गर ले लिया था।

डॉक्टर- छुट्टी के बाद घर पहुँचकर आपने लंच लिया होगा  क्यों?

शिवम- जी  कभी- कभी । अक्सर समय ही नही मिलता। ट्यूशन जाना होता है।

डॉक्टर- स्कूल टाइम क्या है आपका?

शिवम- जी सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक ।

डॉक्टर- ट्यूशन कितने बजे से जाते हो?

शिवम- 2:30 बजे घर पहुँचता हूँ  फ़िर 3 बजे से मेरी ट्यूशन क्लासेज़ शुरु हो जाती है।

डॉक्टर- वापस घर कब पहुँचते हो?

शिवम- 7:30 या 8 बजे।

डॉक्टर- इतनी देर से क्यों?

शिवम- 3 से चार बजे तक फ़िजिक्स का ट्यूशन,  4 से 5 मैथ्स, 5 से 6 कैमिस्ट्री फ़िर 

6 से 7 बजे तक कंप्यूटर क्लासेस। इसीलिए घर आते आते 7:30 , 8 बज जाते हैं। घर  जाकर पहले स्कूल का होमवर्क, फ़िर ट्यूशन का होमवर्क।

(डॉक्टर शिवम की माँ के साथ अलग जाकर बात करता है)

डाक्टर- (शिवम की माँ को) – देखिए मैडम ! एक बात मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूँ । आप अपने बच्चे की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रही हैं । पहली बात, आपका बेटा जंक फ़ूड ले रहा है और इसी फ़ास्ट फ़ूड की वजह से उसकी आँतों में सूजन आ गई है। आप उसे सब्जी फ़ल खिलाइए नहीं तो एनीमिया घातक सिद्ध हो सकता है। दूसरी बात,  वो एक टीन एज बच्चा है कोई रोबोट नहीं। पढ़ाई के साथ-साथ उसे आराम, खेलकूद और मनोरंजन की शक्त जरूरत है। क्या आपका बेटा खेलने जाता है?

माँ- नहीं डाक्टर साहब, खेलने का समय ही नहीं होता  उसके पास। हाँ पहले पेंटिंग  बनाता था पर पढ़ाई के बोझ से वो भी छूट गया।

डाक्टर- देखिए मैडम! पढ़ाई व्यक्तित्व के विकास के लिए है, विनाश के लिए नहीं। अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए आपने बच्चे की रुचियों का गला घोंटकर उसपर पढ़ाई का बोझ डाल दिया। आपका बेटा भयंकर तनाव और दबाव में जी रहा है। उसका स्वास्थ्य तो चौपट हो ही रहा है, अगर अभी भी आपने ध्यान नहीं दिया तो एक दिन वह अपना मानसिक संतुलन भी खो बैठेगा।

 माँ- ( सिसकते हुए) ओह ! डाक्टर आपने मेरी आँखें खोल दीं। अब हम अपनी महत्त्वाकांक्षा के बोझ तले अपने बच्चों को नहीं दबने देंगे।  उनका बचपन नहीं छिनने देंगे।

 [ पर्दा गिरता है ]

Oct 3, 2021

ताँका- लेके तेरा संदेशा

कमला निखुर्पा

1

मैं तो ये चाहूँ 

बूँद बन बरसूं

मोती न बनूँ

पपीहा कोई पुकारे

प्यास मैं बुझा पाऊँ। 

2

चाहत मेरी 

कस्तूरी सुगंध सी

छुप के रहूँ 

महकाऊँ जो यादें 

खोजें जग हिरन  ।

3

 पावन तुम

वैदिक ऋचाओं सी

जीवन यज्ञ 

समिधा बन जली 

पूर्णाहुति दे चली ।

4.

लो आई हवा 

लेके तेरा संदेशा 

रोये जो तुम 

भीगा मेरा आँचल 

गुमसुम मौसम ।

Sep 15, 2019

रच ली मैंने फिर नई कविता ( शिक्षक दिवस पर )

चित्रः प्रीति अग्रवाल
रच ली मैंने फिर नई कविता 

-कमला निखुर्पा


हाथों में थमा

सृजन की लेखनी

नेह सियाही 

भर यूँ छिटकाई


उठी लहर 

भीगा-भीगा अंतर

तिरते शब्द

उड़े क्षितिज तक 


मिलन हुआ

धरा से गगन का

रच ली मैंने

फिर नई कविता


निकल पड़ी

अनजानी राह पे

मिलते रहे

पथ में  साथी –संगी


कोई हठीली

अलबेली सहेली

हवा वासंती 

बदरी सावन की


टप्प से गिरे

सिहरा के डराए

भिगो के माने

रिमझिम की झड़ी 


राह में मिली 

नटकेली कोयल 

छिप के छेड़े

कूक हूक जगाए


बागों में मिली

तितली महारानी

फूलों का हार

पाकर इतराई 


गुंजार करे 

भाट भँवर -टोली

सृजन राह

अनुपम पहेली


नई -सी भोर

निशा नई नवेली 

नवल रवि

चंद्रिका-सी सहेली


मुड़के देखूँ

दूर क्षितिज पार 

तुम्हें ही पाऊँ

गहन गुरु–वाणी


थामे कलम

नेह भर सियाही

बूँदे छिटकी

सुधियों की सरिता 

उमगी बह आई।

प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय, पिथौरागढ़- उत्तराखण्ड

Aug 10, 2019

नेह की डोर

नेह की डोर 
-कमला निखुर्पा

ढूँढे बहिन
भैया की कलाइयाँ
नेह की डोर
बाँधती चहूँ ओर
छूटा पीहर
बसा भाई विदेश
सूना है देश
आओ घटा पुकारे
राह निहारे
गाँव की ये गलियाँ
नीम की छैयाँ
गर्म चूल्हे की रोटी
गागर-जल
आँगन की गौरैया
बहना तेरी
लगे सबसे न्यारी
सोनचिरैया
पुकारे भैया-भैया !!
सज-धजके
रँगी चूनर लहरा
घर भर में
पैंजनिया छनका
बिजुरी बन

ले हाथों में आरती
रोली-तिलक
माथे लगा अक्षत
भाई दुलारे
डबडबाए नैन
छलक जाए 
पाके एक झलक
जिए युगों तलक !!!

प्राचार्या, केन्द्रीयविद्यालय, पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड)