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Sep 15, 2017

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ...

मुझे गर्व है कि मैं 
एक ऐसे देश से हूँ...
स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था। विवेकानंद का जब भी जि़क्र आता है उनके इस भाषण की चर्चा जरूर होती है। पढ़ें विवेकानंद का यह भाषण...
अमेरिका के बहनो और भाइयो !
आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूँ और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूँ। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।
मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियाँ संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोडक़र खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयो, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है-  जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियाँ अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।
वर्तमान सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है- जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुँचता हूँ। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुँचते हैं।
साम्प्रदायिकताएँ, कट्टरताएँ और इसके भयानक वंशज हठधर्मिताएँ लम्बे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।
अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते ,तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

Mar 10, 2013

स्वामी विवेकानंद- ये साक्षात् जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं


ये साक्षात् जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं   

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद सामाजिक जीवन की मूर्खता तथा अखबारी हो-हल्ले से ऊब चुके थे। अमेरिकी लोगों में स्वामीजी की सुविधाओं का ध्यान रखने वाले उनके अनेक प्रशंसक एवं भक्त थे, जो अभाव के समय उन्हें धन देते थे तथा उनके निर्देशों पर चलते थे। अमेरिकी महिलाओं के वे विशेष कृतज्ञ थे, और उनकी प्रशंसा करते हुए स्वामी जी ने अपने भारतीय मित्रों को कई पत्र लिखे।

एक पत्र में उन्होंने लिखा- इस देश की महिलाएँ दुनिया भर में नहीं हैं। वे कैसी पवित्र, स्वावलम्बिनी और दयावती हैं। महिलाएँ ही यहाँ की सब कुछ हैं। विद्या, बुद्धि आदि सभी उनके अंतर्गत हैं।
एक अन्य पत्र में वे लिखते हैं- (अमेरिकी लोग) महिलाओं के प्रति अतीव सम्मान का भाव रखते हैं और वे भी इन लोगों के जीवन में काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। तात्पर्य यह कि इस तरह की पूजा यहाँ पूर्णता तक पहुँच चुकी है। खैर- इस देश की नारियों को देखकर मेरी तो बुद्धि ही ठिकाने आ गई।
ये रूप में लक्ष्मी और गुण में सरस्वती हैं- ये साक्षात् जगदम्बा की प्रतिमूर्ति हैं इस तरह की माँ जगदम्बा अगर अपने देश में एक हजार तैयार करके मर सकूँ, तो निश्चिंत होकर मर सकूँगा। तभी हमारे देश के आदमी आदमी कहलाने लायक हो सकेंगे।
1894 ई. में खेतड़ी नरेश को लिखे एक पत्र में उनकी यह प्रशंसा शायद सर्वोच्च सुर तक पहुँची थी -
अमेरिकी महिलाओ! सौ जन्म में भी मैं तुमसे उऋण न हो सकूँगा- गत वर्ष ग्रीष्म में दूर देश से नाम-यश-धन विद्याविहीन बंधरहित असहाय दशा में प्राय: खाली हाथ जब मैं एक परिव्राजक प्रचारक के रूप में इस देश में आया, उस समय अमेरिका की महिलाओं ने मेरी सहायता की, मेरे ठहरने तथा भोजन की व्यवस्था की, वे मुझे अपने घर ले गईं तथा उन्होंने मेरे साथ पुत्र तथा सहोदर जैसा बर्ताव किया।
जब उनके पुरोहितों ने इस भयानक विधर्मी को त्याग देने के लिए उन्हें बाध्य करना चाहा, जब उनके सबसे अंतरंग बंधु इस संदिग्ध भयानक चरित्र के अपरिचित विदेशी व्यक्ति का संग छोडऩे के लिए उपदेश देने लगे, तब भी वे मेरी मित्र बनी रहीं। ये महिलाएँ ही चरित्र तथा अंत:करण के संबंध में कोई निर्णय देने की अधिकारी हैं- क्योंकि स्वच्छ दर्पण में ही प्रतिबिंब पड़ता है।
कितने ही सुंदर पारिवारिक जीवन मैंने यहाँ देखे हैं, कितनी ही ऐसी माताओं को मैंने देखा है, जिनके निर्मल चरित्र तथा नि:स्वार्थ संतान-स्नेह का वर्णन भाषा के द्वारा नहीं किया जा सकता। कितनी ही ऐसी कन्या तथा कुमारियों को देखने का मुझे अवसर मिला है, जो कि डायना देवी के मंदिर पर स्थित तुषारकणिकाओं के समान निर्मल, असाधारण शिक्षिता तथा मानसिक एवं आध्यात्मिक सब दृष्टि से उन्नत हैं। तब क्या अमेरिका की सभी नारियाँ देवी स्वरूपा हैं?
यह बात नहीं, भले-बुरे सभी स्थानों में होते हैं। किंतु दुर्बल व्यक्तियों द्वारा जिसे हम दुष्टों के नाम से अभिहत करते हैं, किसी जाति के बारे में किसी प्रकार की धारणा नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि वे तो व्यर्थ के कूड़े-करकट की तरह पीछे रह जाते हैं जो लोग सत्, उदार तथा पवित्र होते हैं, उनके द्वारा ही राष्ट्रीय जीवन का निर्मल तथा शक्तिशाली प्रवाह निर्धारित हुआ करता है। (विवेकानंद एक जीवनी से)


Feb 21, 2013

सभी धर्मों में शाश्वत एकत्व है


सभी धर्मों में शाश्वत एकत्व है

महापुरुषों के पत्रों से उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं के दर्शन होते हैं। इस दृष्टि से स्वामी विवेकानंद के पत्र उनके सर्वतोमुखी प्रतिभा संपन्न दिव्य जीवन पर प्रकाश डालते हैं। उन्होंने अपने पत्रों के द्वारा भारतीय संस्कृति और धर्म के कलेवर में नव चैतन्य का संचार किया था। स्वामीजी ने अपने अल्प जीवन में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और प्रगतिशील समाज की परिकल्पना की थी।
अपने भारत भ्रमणकाल के दौरान स्वामीजी ने विभिन्न धर्मों के मूल को समझा और उन्होंने पाया कि सभी धर्मों में उन्हें शाश्वत एकत्व दिख रहा है। श्री रामकृष्ण जो कहा करते थे कि खाली पेट धर्म नहीं होता, इस कथन की सत्यता को उन्होंने प्राणों ही प्राणों में अनुभव किया। हिन्दू, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि धर्मों में विचार धन चारों ओर बिखरा हुआ था उसका उन्होंने संग्रह किया।
स्वामी विवेकानंद के पूना प्रवास के दौरान एक विलक्षण घटना घटी, जिससे उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। गाड़ी में स्वामीजी को द्वितीय श्रेणी से भ्रमण करते देख कर कुछ शिक्षित लोग अंग्रेजी भाषा में संन्यासियों की निंदा करने लगे।
उन्होंने सोचा स्वामीजी को अंग्रेजी नहीं आती है। उनका सोचना था कि भारत के अध:पतन के लिए एकमात्र संन्यासी-संप्रदाय ही उत्तरदायी है। चर्चा जब पराकाष्ठा पर पहुँच गई तब स्वामीजी चुप नहीं रह सके।
वे बोले- युग-युग से संन्यासियों ने ही तो संसार की आध्यात्मिक भाव धारा को सतेज और अक्षुण्ण बना रखा है। बुद्ध क्या थे, शंकराचार्य क्या थे? उनकी आध्यात्मिक देन को क्या भारत अस्वीकार कर सकता है, स्वामीजी के मुख से धर्म का क्रम विकास, देश विदेश के धर्मों की प्रगति का इतिहास तथा अनेक गंभीर दार्शनिक बातें सुनकर सहयात्रियों को विवश होकर हथियार डाल देना पड़ा।
यह वही समय था जब स्वामीजी को शिकागो की विश्व धर्म परिषद सम्मेलन का पता चला था और यह सर्वविदित है कि उस धर्म सभा में स्वामीजी ने किसी भी धर्म की निंदा या समालोचना नहीं की अपितु उन्होंने कहा- ईसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं बनना होगा, और न हिन्दू अथवा बौद्ध को ईसाई ही। पर हाँ प्रत्येक धर्म को अपनी स्वतंत्रता और वैशिष्टय को बनाए रखकर दूसरे धर्मों का भाव ग्रहण करते हुए क्रमश: उन्नत होना होगा। उन्नति या विकास का यही एकमात्र नियम है।
स्वामी की शिकागो वक्तृता भारत वर्ष की मुक्ति का संक्षिप्त लेखा है। भगिनी निवेदिता लिखती हैं- शिकागो की धर्म महासभा में जब स्वामीजी ने अपना भाषण आरंभ किया तो उनका विषय था- हिन्दुओं के प्राचीन विचार, पर जब उनका भाषण समाप्त हुआ तो आधुनिक हिन्दू धर्म की सृष्टि हो चुकी थी।

Jan 18, 2013

150वीं जयंती

अपनी शक्ति को पहचानो
-स्वामी विवेकानंद 

* विश्व की समस्त शक्तियाँ हमारी हैं। हमने अपने हाथ अपनी आँखों पर रख लिये हैं और चिल्लाते हैं कि चारो ओर अँधेरा है। जान लो कि हमारे चारों ओर अँधेरा नहीं है, अपने हाथ अलग करो, तुम्हे प्रकाश दिखाई देने लगेगा, जो पहले भी था। अँधेरा नहीं था, कमजोरी कभी नहीं थी। हम सब मूर्ख हैं जो चिल्लाते हैं कि हम कमजोर हैं, अपवित्र हैं।
* कमजोरी का इलाज कमजोरी का विचार करना नहीं, पर शक्ति का विचार करना है। मनुष्यों को शक्ति की शिक्षा दो, जो पहले से ही उनमें हैं।
* अपने आप में विश्वास रखने का आदर्श ही हमारा सबसे बड़ा सहायक है। सभी क्षेत्रों में यदि अपने आप में विश्वास करना हमें सिखया जाता और उसका अभ्यास कराया जाता, तो निश्चिय है कि हमारी बुराइयों तथा दु:खों का बहुत बड़ा भाग तक मिट गया होता।
* कर्म करना बहुत अच्छा है, पर वह विचारों से आता है...इसलिए अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और उच्चतम आदर्शों से भर लो, उन्हें रात-दिन अपने सामने रखो; उन्हीं में से महान कार्यों का जन्म होगा।
* संसार की क्रूरता और पापों की बात मत करो। इसी बात पर खेद करो कि तुम अभी भी क्रूरता देखने को विवश हो। इसी का तुमको दु:ख होना चाहिए कि तुम अपने चारों ओर केवल पाप देखने के लिए बाध्य हो। यदि तुम संसार की सहायता करना आवश्यक समझते हो, तो उसकी निन्दा मत करो। उसे और अधिक कमजोर मत बनाओ। पाप, दु:ख आदि सब क्या है ? कुछ भी नहीं, वे कमजोरी के ही परिणाम हैं। इसी प्रकार के उपदेशों से संसार दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक कमजोर बनाया जा रहा है।
* बाल्यकाल से ही अपने मस्तिष्क में निश्चित, दृढ़ और सहायक विचारों को प्रवेश करने दो। अपने आपको इन विचारों के प्रति उन्मुक्त रखो, न कि कमजोर तथा अकर्मण्य बनाने वाले विचारों के प्रति।
* यदि मानव जाति के आज तक के इतिहास में महान पुरुषों और स्त्रियों के जीवन में सब से बड़ी प्रवर्तक शक्ति कोई है, तो वह आत्मविश्वास ही है। जन्म से ही यह विश्वास रहने के कारण कि वे महान होने के लिए ही पैदा हुए हैं, वे महान बने।
* मनुष्य को, वह जितना नीचे जाता है जाने दो; एक समय ऐसा अवश्य आएगा, जब वह ऊपर उठने का सहारा पाएगा और अपने आप में विश्वास करना सीखेगा। पर हमारे लिए यही अच्छा है कि हम इसे पहले से ही जान लें। अपने आप में विश्वास करना सीखने के लिए हम इस प्रकार के कटु अनुभव क्यो करे?
हम देख सकते हैं कि एक और दूसरे मनुष्य के बीच अन्तर होने के कारण उसका अपने आप में विश्वास होना और न होना ही है। अपने आप में विश्वास होने से सब कुछ हो सकता है। मैंने अपने जीवन में इसका अनुभव किया है अब भी कर रहा हूँ और जैसे-जैसे मैं बड़ा होता जा रहा हूँ मेरा विश्वास और दृढ़ होता जा रहा है।
* असफलता की चिन्ता मत करो; ये बिल्कुल स्वाभाविक है, ये असफलताएँ जीवन का सौन्दर्य हैं। उनके बिना जीवन क्या होता ? जीवन का काव्य। संघर्ष और त्रुटियों की परवाह मत करो। मैंने किसी गाय को झूठ बोलते नहीं सुना, पर वह केवल गाय है, मनुष्य कभी नहीं। इसलिए इन असफलताओं पर ध्यान मत दो, ये छोटी-छोटी फिसलनें हैं। आदर्श को सामने रखकर हजार बार आगे बढ़ऩे का प्रत्यन करो। यदि तुम हजार बार भी असफल होते हो, तो एक बार फिर प्रयत्न करो।
* तुम अपने जीवाणुकोष की अवस्था से लेकर इस मनुष्य-शरीर तक की अवस्था का निरीक्षण करो; यह सब किसने किया, तुम्हारी अपनी इच्छाशक्ति ने। यह इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है, क्या यह तुम अस्वीकार कर सकते हो ? जो तुम्हें यहाँ तक लाई वही अब भी तुम्हें और ऊँचाई पर ले जा सकती है। तुम्हें केवल चरित्रवान् होनो और अपनी इच्छाशक्ति को अधिक बलवती बनाने की आवश्यकता है।
* क्या तुम जानते हो, तुम्हारे भीतर अभी भी कितना तेज, कितनी शक्तियाँ  छिपी हुई हैं ? क्या कोई वैज्ञानिक भी इन्हें जान सका है? मनुष्य का जन्म हुए लाखों वर्ष हो गये, पर अभी तक उसकी असीम शक्ति का केवल एक अत्यन्त क्षुद्र भाग ही अभिव्यक्त हुआ है। इसलिए तुम्हें यह नहीं कहना चाहिए कि तुम शक्तिहीन हो। तुम क्या जानों कि ऊपर दिखाई देने वाले पतन की ओट में शक्ति की कितनी सम्भावनाएँ  हैं ? जो शक्ति तुममें है, उसके बहुत ही कम भाग को तुम जानते हो। तुम्हारे पीछे अनन्त शक्ति और शान्ति का सागर है।

* 'जड़’ यदि शक्तिशाली है, तो 'विचार’ सर्वशक्तिमान है। इस विचार को अपने जीवन में उतारों और अपने आपको सर्वशक्तिमान, महिमान्वित और गौरवसम्पन्न अनुभव करो। ईश्वर करे तुम्हारे मस्तिष्क में किसी कुसंस्कार को स्थान न मिले। ईश्वर करे, हम जन्म से ही कुसंस्कार डालने वाले वातावरण में न रहें और कमजोरी तथा बुराई के विचारों से बचें।
देश के लिए कुछ करने का संकल्प लें
स्वामी विवेकानंद देश की महान और महत्त्वपूर्ण विभूतियों में से हैं। जब देश शारीरिक और मानसिक रूप से भयंकर दासता में जकड़ा था उस समय स्वामीजी ने 'उतिष्ठ जाग्रत’ का आह्वान किया। जन-जन को जाग्रत करने का बीड़ा उठाया। एक नई बौद्धिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना पैदा की। विश्वभर में जब भारत को किसी प्रकार भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, ऐसे में उन्होंने अपने को सभ्य और सुशिक्षित समझने वाले पाश्चात्य देशों को आईना दिखाया। भारत की सोच, उसके दर्शन, उसकी सभ्यता-संस्कृति और आध्यात्मिक महानता का संदेश दिया। देश के भीतर घूम-घूमकर भी उन्होंने सभी युवकों और नर-नारियों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि उनमें अदम्य शक्ति है। और यदि वह अपनी धरोहर व सामर्थ्य को पहचानें तो वह एक बार फिर विश्वगुरु के आसन पर बैठ सकते हैं। आज स्वामी विवेकानंद के आने के 150 वर्ष बाद भी उनके संदेश की उतनी ही आवश्यकता महसूस होती है जितनी तब थी। स्वाधीनता के बाद आज हम जिस दुर्दशा और दिशाहीनता का अनुभव कर रहे हैं, उसमें स्वामी विवेकानंद, उनके विचार, उनके आह्वान और उद्घोष का व्यापक प्रचार-प्रसार ही संभवत: हमें पुनर्जीवित कर सकेगा। इसी को ध्यान में रखते हुए 'स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह समिति’ ने स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती वर्षभर मनाने का निर्णय किया है। आयोजन का उद्देश्य है कि देशवासी स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनके विचारों से प्रेरणा लेकर समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारी समझें और देश के लिए कुछ करने का संकल्प लें। वर्षभर समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों के लिए आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का उद्देश्य समाज को जागरूक करना ही है और जागरूक समाज को किसी राजनीतिक दल में कार्य करने के लिए नहीं लगाया जाएगा, बल्कि वे समाज के प्रति अपना कुछ दायित्व समझकर देश के लिए कुछ कार्य करें इसलिए यह समारोह आयोजित किया जा रहा है।
  -डा. सुभाष चंद्र कश्यप, मानद अध्यक्ष, स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह समिति