मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label प्रियंका गुप्ता. Show all posts
Showing posts with label प्रियंका गुप्ता. Show all posts

Aug 1, 2026

हाइबनः अगले जनम...

  -  प्रियंका गुप्ता 

आज सुबह सोकर उठी तो आँगन में दीदी की अजीब सी गुनगुनाहट आ रही थी...अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो...। आवाज़ कुछ रुँधी थी या फिर माँजे जा रहे बर्तनों और नल के पानी का शोर था, तुरन्त समझ नहीं पाई। पास जाकर देखा तो दीदी की आँखों से टपाटप आँसू गिर रहे थे। मैं घबरा गई थी...दी और आँसू...इम्पॉसिबिल...। मेरी दी तो कितनी हँसमुख हैं...हमेशा खिलखिलाने वाली...फिर आज क्या हो गया?

उनके हाथ से भगौना छीनकर मैंने किनारे डाल दिया, "बताओ दी, क्या हुआ...? रो क्यों रही...?"

कुछ बोलने की बजाय दी की सुबकियाँ बँध गई। मेरा जी घबराने लगा...कहीं किसी प्यार-व्यार का चक्कर तो नहीं? पर नहीं...अगर ऐसा होता तो दी मुझे तो ज़रूर बताती...तो फिर...?

"तुम्हें मेरी कसम दी, बताओ तो...मेरा दिल घबरा रहा है...।" मैंने अपने हाथों में उनका चेहरा लेकर जबरिया अपनी ओर घुमा दिया।

किसी तरह शान्त होकर दी ने जो बताया, उसका लब्बोलुआब ये था- कल शाम को जब दी ऑफ़िस से लौट रही थी, तो रिक्शे की तलाश करते-करते वो पैदल ही चली जा रही थी। थोड़ा झुटपुटा हो गया था, सो सावधानीवश उन्होंने सूट की चुन्नी से अपना सिर और मुँह भी लपेट लिया था। तभी जाने कहाँ से पीछे से आता एक साइकिल सवार मानो जानबूझकर उनके ऊपर गिर पड़ा। इस गिरने की एक्टिंग के दौरान उसके लिजलिज़े हाथ दी के शरीर पर जिस तरह से रेंग गए, बताते-बताते दी गिनगिनाहट से भर गई।

"तुम्हें उसे घुमाकर एक थप्पड़ देना था दी...वो कमीना भी याद रखता ज़िन्दगी भर...।" सुनकर मैं गुस्से से तमतमा गई।

"मारा था गुड़िया, उस समय मेरा भी यही इंस्टेण्ट रियक्शन था...पर जानती हो, उस बेशर्म, घिनौने इंसान ने क्या किया...? मेरा हाथ पकड़कर चूम लिया और फिर जो कहा न...वो मैं बोल नहीं पाऊँगी। मेरे मन और तन दोनों से उसके गन्दे, घिनौने स्पर्श की याद नहीं जा रही। मुझे अपने लड़की होने से नफ़रत हो रही। न मैं लड़की होती, न कोई मेरे साथ ऐसा करता। क्या जीवन में आगे बढ़ने, कुछ करने का सपना देखना एक लड़की के लिए गुनाह है...? क्या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, जन्म से लेकर मौत तक हम सिर्फ भय में जीते रहेंगे? क्या तन-मन से जीवन भर किसी पुरुष के अधीन रहकर, उसकी चाकरी करना ही हमारी नियति है...? क्या हम इंसान नहीं...? इंसान के नाम पर हमारे समाज में खुले घूम रहे हैवानों को काबू में करने की बजाए सिर्फ हम लड़कियों पर बन्दिशें क्यों लगाई जाती हैं...? क्यों सिर्फ हमें सिखाया जाता है कि हम कैसे हँसे-बोलें, कैसे पहने ओढ़ें, कैसे घुटकर जिएँ...? क्यों नहीं लड़कों को बचपन से सिखाया जाता कि एक लड़की भी जीने का हक़ रखती है, खुली हवा में साँस लेने की चाहत होती है उसे...और सबसे बड़ी बात...एक लड़की भी इंसान है...।"

मैं तो दी की बात से निरुत्तर हूँ अब तक...आप के पास इसका जवाब है कोई...?

अगले जन्म

बेटी होकर जीना

चाहेगा कौन?

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम आई जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र)


Mar 1, 2026

कहानीः अकालग्रस्त इलाका

 - प्रेम गुप्ता ‘मानी’/ प्रियंका गुप्ता

चंद लम्हों पहले ही तो आसमान एकदम साफ़ था। उसकी आसमानी नीली चादर पर काले बादलों के कुछ नन्हे टुकड़े तैर रहे थे, पर पल भर बाद हवा के झोंके उन्हें कहीं दूर धकेल देते, तो लगता, सब कुछ ठीक है...। मौसम विभाग कहीं-न-कहीं गड़बड़ा गया लगता है...उसके अनुसार तो तेज़ बारिश की संभावना है। 

यद्यपि, हफ्ते भर पहले ही तेज़ आँधी के बाद इतनी ज़ोर की बारिश हुई थी कि बहुत कुछ अस्त-व्यस्त हो गया था। धूल-भरी आँधी ने घर के नक्शे को इस कदर बेरंग कर दिया था कि सफ़ाई करने का सोचकर ही मैना घबरा गई थी। आँधी के कारण पूरे इलाके की बत्ती जो गुल हुई, सो अलग... उस पर बला की गर्मी...?

उस समय उलझन के एक अजीब माहौल ने सबको जकड़ रखा था कि तभी बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ धरती पर झमाझम गिरती बारिश की बूँदों ने जैसे सबको एकदम निहाल कर दिया था। घर की साफ़-सफ़ाई के बाद मैना भी उस सकून से भर गई थी। 

उस दिन जमकर पानी बरसा। लगा, जैसे आकाश उसी दिन अपना पूरा भरा घड़ा खाली कर देगा...। सड़कें घुटने-घुटने पानी से भर गई थीं, तिस पर जहाँ-तहाँ कीचड़...गंदगी...। शुक्र था कि उस दिन इतवार था। सब घर पर ही थे। मौसम का मज़ा लेने के लिए मैना ने ढेर सारी बेसन की पकौड़ियाँ बनाई थीं और साथ में गर्मागर्म चाय भी...। बड़े इत्मीनान से सबने खाया। 

पकौड़ियों का मज़ा बरसात के मौसम में ही तो है, पर उसके बाद हफ्ते भर तक कुछ भी नहीं...। अपना घड़ा एक ही दिन में खाली करके आकाश तो शांत हो गया था; पर नीचे धरती पर सारे जीव कुलबुला उठे थे। कितनी अजीब बात थी...बारिश की ठंडी-ठंडी बूँदें धरती का ताप कम कर देती हैं, पर उसके थमते ही धरती फिर झुलसने लगती है...। मैना को वैसे भी गर्मी बहुत लगती है, तिस पर गोकुल की ज़िद, “एसी नहीं चलेगा...बिजली का बिल बहुत ज़्यादा आता है...।”

इधर मैना की उलझन...पंखे की गर्म हवा किसी तरह दिन में तो झेल लेती है, पर रात में...?

पंखे की गर्म हवा राहत देने की बजाय उसे बेचैन कर देती। पूरा बदन अजीब तरह से चिपचिपा उठता। ऐसे में नींद कैसे आती? इस चिपचिपी उमस भरी रात में गोकुल पता नहीं कैसे सो जाता और वह पूरी रात बालकनी में काट देती। एसी लगे होने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पाती। एक-दो बार जबरिया उसने एसी चलाया भी, लेकिन गोकुल ने झुँझलाते हुए उसे बंद कर दिया। गर्मी का मौसम वैसे भी उसके लिए काल बन जाता है, तिसपर गोकुल से रोज-रोज रात को उलझना...। ज़िद में आकर वह दूसरे कमरे में सोने को भी तैयार नहीं होता था। हारकर उसे ही चुप रहना पड़ता था। 

आज भी खाना-पीना निबटाकर वह बालकनी में बैठी ही थी कि अचानक आसमान पर काले बादलों के विशाल टुकड़ों ने हमला बोल दिया। पहले तो वे पूरे ज़ोर से गरजे और फिर बरस पड़े...पर उनका यह गरजना-बरसना भी बस चंद घंटों के लिए ही था, लेकिन यह वक़्त भी उसके लिए बेहद सकून भरा था। 

सकून से भरी वह आराम करने की सोच ही रही थी कि तभी उसका मोबाइल कुनमुना उठा...कोई अनजान नंबर था। आमतौर पर वह कोई अनजान नंबर रिसीव नहीं करती, पर इस समय...?

पता नहीं क्या सोचकर उसने मोबाइल उठा ही लिया। उधर की आवाज़ सुनते ही वह चौंक गई। पूरे साल भर बाद यह क्या...? रीमा को उसकी याद कैसे आ गई? इतने समय से तो जैसे रीमा ने उससे सारे रिश्ते-नाते ही तोड़ लिये थे। उसने यह भी नहीं सोचा कि माँ के जाने के बाद मैना ने बड़ी बहन का ही नहीं, बल्कि एक माँ का भी फ़र्ज़ अदा किया था। उसे जब भी कोई ज़रूरत पड़ती, मैना तुरंत हाज़िर हो जाती...। हारी-बीमारी में उसके पास पहुँच ही जाती थी। अपने खर्चे से कटौती करके, गोकुल से छिपाकर पैसे-रुपये से भी उसकी मदद करती, लेकिन यह रीमा...? 

रीमा को इन सबसे जैसे कभी कोई सरोकार रहा ही नहीं। वह कहाँ से और कैसे उसकी मदद कर पाती है, यह जानने की उत्सुकता उसमें कभी थी ही नहीं। कभी भूले-भटके बातों के दौरान अगर मैना अपनी तकलीफ़ों का ज़िक्र करना भी चाहती, तो अगले ही पल रीमा किसी-न-किसी बहाने फोन काट देती। ऐसे में मैना को हल्की कोफ़्त भी होती थी। कितनी अजीब और मतलबपरस्त लड़की है...अपनी जरूरतों और कष्टों की रामकहानी सुना डाली; लेकिन उसकी बारी आई तो बस्स...अच्छा दीदी, थोड़ा काम है, बाद में बात करती हूँ...कहकर कॉल रख दिया? कई बार मैना का दिल भी करता, अगली बार जब यह अपना दुखड़ा रोएगी तो वह भी ऐसे ही काम का बहाना करके फोन रख देगी...न तो उसका दुखड़ा सुनेगी, न उसकी मदद करने के लिए खुद को परेशानी में डालेगी। लेकिन मैना तो बस मैना थी...। माँ-बाप के दिए संस्कारों का सबसे ज़्यादा असर शायद उसी पर हुआ था, तभी तो किसी की परेशानी सुनी नहीं कि सबसे पहले सहायता करने को तैयार...। जब बाहरी लोगों के साथ मैना ऐसी थी तो रीमा तो फिर भी अपनी सगी छोटी बहन ही थी न...। उसकी मदद से भला वो कैसे पीछे हट सकती थी। 

0000

आज भी फोन उठाते ही रीमा का चिर-परिचित लहजा...हम हैं...मानो उसके इस ‘हम’ में समस्त ब्रह्मांड समाया हो। मैना अक्सर उसके इस तरीके पर चुटकी ले चुकी थी, पर उसकी तमाम दूसरी बातों की तरह रीमा इस बात को भी हमेशा अनसुना करके निकल जाती थी। 

‘यह किसका नंबर है?”

“अरे, यह मेरे मोहल्ले की पार्लर वाली का नंबर है। एक शादी में जाना है, तो बाल-आइब्रो सब करवाने आए हैं। दीदी, मेरे मोबाइल का रिचार्ज खतम हो गया है, ज़रा पाँच सौ वाला करवा दो...। वहाँ जाएँगे तो ज़रूरत पड़ेगी न...। अच्छा, सुनो, हम फटाफट सब करवा लें, नहीं तो पहुँचने में बहुत लेट हो जाएगा। बाद में बात करते हैं।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन काट दिया। कुछ पल के लिए मैना फोन वैसे ही हाथ में पकड़े सन्नाटे-सी अवस्था में बैठी रह गई। साल भर बाद फोन किया भी तो अपने मतलब से...? न हाल, न चाल, बस रिचार्ज करा दो। मन हुआ, अभी पलटकर उसे इसी नंबर पर कॉल करे और खरी-खरी सुना दे। तुम्हारा ठेका ले रखा है क्या? अपने आदमी से जो पैसा पार्लर के लिए लेकर आई हो, उससे खुद रिचार्ज कराओ...। कौन सा पहले की तरह मेरे रिचार्ज करने के बाद मुझसे बात करने वाली हो?

पर मन की बात मन में ही रखते हुए मैना ने एक लंबी साँस भरते हुए खुद को संयत किया और दस मिनट बाद ही रिचार्ज के लिए रीमा का नंबर सेलेक्ट कर लिया। क्या पता, कहाँ जा रही हो। कम-से-कम पास में हाड़े-गाढ़े काम आने के लिए मोबाइल चालू तो रहना चाहिए न। हाँ, इतना ज़रूर पक्का था कि इस बार वो सबसे कम कीमत का ही रिचार्ज कराएगी। बस इतना भर कि कहीं भी बात कर सके। 

रिचार्ज होने के बाद भी रीमा की तरफ से कोई कॉल, तो कौन कहे, एक मैसेज तक नहीं आया। हमेशा की तरह बस एक चुप्पी...जो जाने कितने दिनों तक चलेगी। 

मैना अभी भी बालकनी में बैठी थी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन रेलिंग से बूँदें थोड़ा-थोड़ा करके रिस रही थी...। मैना को लगा, ये बारिश की बूँदें नहीं, बल्कि उसका रिश्ता हो जो धीरे-धीरे रिसता जा रहा था। 

मैना ने मोबाइल मेज पर रखा और चाय का प्याला उठा लिया। इतनी देर में चाय पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर फिर भी उसकी इच्छा नहीं हुई उसे गरम करने की..। एक साँस में ही वह ठंडी चाय गटक गई। 

कुछ देर यूँ ही बैठी वह आसमान ताकती रही, फिर पता नहीं क्या सोचकर मोबाइल उठाकर रीमा का नंबर डायल कर दिया। लगातार बजती घंटी सुनकर वह फोन रखने ही वाली थी कि तभी रीमा ने कॉल उठा लिया, “रिचार्ज हो गया दीदी...बताया था न कि अभी इनके एक फ्रेंड के यहाँ शादी में जा रहे हैं, तो पार्लर आए हैं तैयार होने...बाद में बात करते हैं...और हाँ, अगली बार ज़्यादा नेट वाला रिचार्ज कराना...यह एक जीबी बहुत जल्दी खत्म हो जाता है...ठीक है? चलो रखते हैं...।”

इससे पहले कि मैना कुछ कह-सुन पाती, रीमा ने फोन रख दिया। मैना को लगा, वह अंदर तक आसमान में घिरे काले बादलों की तरह भारी हो गई है...अगर जल्दी ही ना बरसी तो फट जाएगी। 

पर बरसे भी तो कहाँ जाकर...? माँ-बाप हैं नहीं, मायके के नाम पर एक भाई-भाभी, पर वे भी बस अपनी दुनिया में मस्त...और रीमा...? उसके जैसी मतलबपरस्त इंसान से तो कोई उम्मीद रखना ही बेमानी था। कहने को पति के रूप में गोकुल उसके साथ थे, पर वे भी अति-व्यावहारिक और आत्मकेंद्रित...संवेदना शायद अंश-मात्र भी नहीं थी उनमें...। दुनिया के लिए वे बेहद व्यवहारकुशल व्यक्ति थे; लेकिन उनके साथ भावात्मक संवाद कर पाने की गुंजाइश कहीं से भी नहीं थी। ऑफिस, पैसे की चिंता और घर एक निश्चित बजट में चलाने तक ही उनकी दुनिया सीमित थी; इसलिए गर्मी में एसी ना चलाने देने की ज़िद हो या सर्दियों में हीटर और गीज़र के लिए होने वाली बहसें हों, मैना हर परिस्थिति में सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न करती। वह जानती थी, फालतू की लड़ाइयों में कुछ नहीं रखा। हरेक बात पर लड़ना जितना आसान होता है, चुप रहकर निभा ले जाना उतना ही कठिन...। वैसे भी वह रिश्तों को निभाने में यकीन रखती थी, सो अधिकतर चुप ही रह जाती। 

अचानक ही मैना की आँखों के सामने जैसे रीमा की पूरी ज़िंदगी घूम गई। उसके स्कूल में रहते ही पहले पापा, और फिर माँ का जाना...। भाई-भाभी को तो तब भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा था, पर रीमा के लिए अगर वो दुखद घटनाएँ थीं, तो मैना के लिए तो जीवन-भर का खालीपन और अकेलापन था। रीमा का बोझ उठाने के लिए भाभी तैयार नहीं हुई तो बेहद चिरौरी करके मैना ने किसी तरह गोकुल को मनाया था, रीमा को अपने साथ रखने के लिए...। संवेदनाओं से कोसों दूर रहने वाले गोकुल जाने कैसे उस घड़ी थोड़े द्रवित होकर उसकी बात मान गए थे, यह मैना आज भी नहीं समझ पाई; पर जो भी हो, गोकुल की सहमति से मैना के दिल से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। 

गोकुल पैसे को दाँत से पकड़ने वाले लोगों में से थे; इसलिए रीमा के पालन-पोषण के लिए मैना ने खुद पार्ट-टाइम नौकरी कर ली। उसके कालेज के फॉर्म भरने से लेकर उसकी नौकरी लगने और शादी तक की सारी ज़िम्मेदारी मैना ने बड़ी बहन बनकर नहीं, बल्कि माँ की तरह पूरी शिद्दत से निभाई। 

डेढ़ साल पहले उसकी एक बड़ी बदतमीजी पर जब मैना ने उसे यही सब याद दिलाकर समझाना चाहा था, तब रीमा ने बड़ी तल्खी से और उल्टा जवाब दे दिया था, “दीदी, तुमने जो भी किया, अपनी मर्ज़ी से किया था। मैंने नहीं कहा था तुमसे कि मेरी ज़िम्मेदारी उठाओ...। खुद की यह महानता अपने पास रखो। अपनी औलाद नहीं थी, तो मुफ़्त में मेरी माँ बनने की कोशिश न करो। अपने मन से किए गए कामों के लिए मुझ पर अहसान न जताओ...” कहते हुए रीमा ने फोन पटक दिया था। 

मैना अवाक्-सी चुप रह गई थी। रीमा की बातों के हंटर से उसका दिल छलनी हो गया था। कुछ देर के लिए मानो उसके दिल-दिमाग पर लकवा मार गया। जब ऑफिस से आए गोकुल ने कई बार आवाज़ देने के बाद उसे झिंझोड़ा, तो जैसे उसे होश आया। गोकुल चाहे जैसे रहे हों, पर शादी के इतने सालों बाद भी औलाद न हो पाने का कोई तंज या दोषारोपण उन्होंने उस पर नहीं किया। पर रीमा...? 

मैना अक्सर अपने जीवन में संतोष अपने आसपास ही ढूँढती थी...पड़ोस की बिल्लियों को दूध डाल देना, मंदिर की सफाई में हाथ बँटाना, या कॉलोनी की बस्ती की लड़कियों को खाली समय में पढ़ा देना। ये सब काम उसे सुकून देते थे, जैसे वह अपने भीतर की रिक्तता को भर रही हो। पर उस दिन रीमा की बातों की वजह से उसका मन इन सबसे भी उचाट-सा हो गया। क्या फायदा किसी के लिए कुछ करके अपने अंदर सुकून और शांति महसूस करने का...?

इस घटना के लगभग चार-पाँच महीने बाद रीमा का फोन आया भी तो अपनी बदतमीजी के लिए माफी माँगने नहीं, बल्कि अपने पति की आर्थिक सहायता के लिए...। मैना ने जैसे ही अपनी असमर्थता जताई, रीमा ने फिर फोन काट दिया और आज लगभग एक साल बाद फिर अपने मतलब के लिए ही फोन किया। 

मैना का दिल तो चाहा था, वो भी कटी-कटी सुना दे और रिचार्ज करने से साफ इंकार कर दे, पर उसके अंदर की ममता ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। वैसे भी रीमा पहले ही एक-दो बार बता चुकी थी कि उसका पति जाने क्यों उसका फोन रिचार्ज करने में बड़ी आनाकानी करता है। आज भी मैना को हमेशा की तरह लगा, रात में निकलेगी, कम-से-कम सुरक्षा के लिए मोबाइल में बैलेंस तो होना ही चाहिए। 

अचानक मैना की आँखें भर आईं। वह गोकुल के सामने ऐसे रोने से बचती है। पिछली बार रीमा के इतने दिनों से संपर्क न करने की बात कहकर रो दी, तो गोकुल ने इस बात पर तो कटाक्ष कर ही दिया था, “तुम उसकी बड़ी बहन थोड़े न हो...तुम तो उसकी एटीएम हो, जब चाहेगी, तुमसे पैसे निकाल लेगी। अपनी तनख्वाह से करती हो; इसलिए नहीं बोलता, वरना मैं तो कब का ऐसे मतलबी लोगों को लात मारकर अपनी ज़िंदगी से बाहर कर चुका होता...।” 

गोकुल ने कुछ गलत तो नहीं कहा था; लेकिन मैना को तब भी हल्का अपमानित-सा महसूस हुआ। कुछ भी हो, रीमा थी तो उसका ही खून...उसके मायके का एक हिस्सा...। यही कारण था कि मैना कभी भी अपने भाई-भाभी या रीमा से जुड़ी कोई भी बात गोकुल से शेयर नहीं करती थी। 

अचानक से बारिश फिर शुरू हो गई। आसपास का वातावरण भीगा हुआ था...। सामने के पार्क का हरेक पेड़-पौधा हरा-भरा था। मैना की नज़र अपनी बालकनी में रखे गमलों पर गई। उन पर हवा के साथ उड़कर आई बारिश की कुछ बूँदें ही पड़ी थी, जिन्हें गमलों की भुरभुरी-सूखी मिट्टी ने पल भर में सोख लिया था और अब भी वे वैसे ही सूखे और प्यासे थे। उनमें लगे पौधे मुरझा रहे थे। 

मैना को लगा, उसका मन भी तो उसी मिट्टी की तरह है...जिसके आसपास अगर कहीं से रिश्तों, भावनाओं और अपनेपन की बारिश की बौछारें पड़ती भी हैं तो भी उसे पूरी तरह भिगो नहीं पाती। बाद में बस वही सूखापन...वही सूनापन...। वह भी तो इन्हीं पौधों की तरह मुरझाती जा रही है। बाहर की बारिश के साथ-साथ उसकी आँखों से भी बरसात शुरू हो गई थी। 

उसके मन में उठा तूफ़ान धीरे-धीरे थम रहा था, लेकिन भीतर की सूखी धरती अब भी हरियाली से महरूम थी। सहसा, पता नहीं क्या सोचकर मैना एक झटके से उठ खड़ी हुई। एक-एक करके सूखे गमलों को उठाकर उसने रेलिंग के पास रख दिया। अभी बारिश की बूँदों से उनको जितना जीवन मिल सकता है, मिलने देगी...वरना कल सुबह वह खुद उनको पानी से नहलाकर फिर से ज़िंदगी जीने का एक मौका ज़रूर देगी। 

मैना ने अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस की। जरूरी तो नहीं कि इन फूलों को खिलने-खिलाने के लिए बारिश का ही मुँह ताका जाए। अपने चारों तरफ पनप गए उस अकालग्रस्त इलाके में हरियाली लाने जितना पानी तो उसके पास भी मौजूद है ही न...।

 000 (स्व. प्रेम गुप्ता मानी जी की अधूरी कहानी को उसी संवेदनशीलता के साथ पूरा किया है उनकी बेटी प्रियंका गुप्ता ने )

 सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र)

ईमेल- priyanka.gupta.knpr@gmail.com, ब्लॉग- www.priyankakedastavez.blogspot.in


Oct 1, 2025

पर्व संस्कृतिः जाने कहाँ गए वो दिन...

  - प्रियंका गुप्ता 

लीजिए जी, एक बार फिर से आ गया दीपावली का त्योहार...रोशनी, फुलझड़ियाँ, पटाखे, दीए और तरह-तरह के पकवानों का मौसम...। बाहर का मौसम भी तो जैसे गुलाबी होने लगा है। गुनगुनी धूप से गमकते दिन और झुरझुरी भरी कोमल-सी रातें...खुशियों के दिन जैसे अन्दर तक महसूस करने का वक़्त होता है ये...। त्योहार तो होते ही हैं न ऐसे...? पर क्या आपको सच में लग रहा कि हमारे आसपास दीपावली या आम भाषा में बोलें तो, दिवाली का त्योहार अपनी शिद्दत से नज़र आ रहा?

यूँ लगता है मानो अभी ज़्यादा साल नहीं बीते हैं, जब दशहरे के पहले से ही हम बच्चे पटाखों का कलेक्शन शुरू कर देते थे। माँ-बाप की ताकीद के बावजूद मौका पाते ही कभी सुरसुरी बम, तो कभी चुटपुटिया, कभी लहसुनिया और कभी-कभी तो रस्सी बम भी फोड़कर पूरे मोहल्ले को हिला डालते थे। ज़्यादा अहिंसावादी टाइप बालक अपने किसी साथी के पीछे चुपके से थैली में हवा भरकर उसके बम भी फोड़कर उसी की आवाज़ से दहलकर उसके काँप उठने के दृश्य को याद कर-करके घण्टों पेट पकड़कर हँसा करते थे।  

पूरे साल चाहे माँगने पर भी नए कपड़ों के लिए माँ कितना भी टालती रहें; पर दीपावली पर पूजा में नए कपड़े ही पहनने हैं, इस मान्यता के चलते मिले नए कपड़े को माँ के सो जाने पर चुपके से पहनकर घण्टों तक भी खुद को शीशे में निहारकर खुद ही की तारीफ़ से फूले नहीं समाते थे। पूजा के समय के लिए आए खील- बताशे- चीनी के खिलौने और मिठाइयाँ हम सब से बचाकर छुपाने में माँ को किसी देश के ‘टॉप- सीक्रेट’ राज़ छुपाने का ही एहसास होता रहा होगा...और उन्हें ढूँढने में हम खुद को करमचन्द और व्योमकेश बक्षी के चेले ही मानते थे।  

बिजली की झालरें हाँलाकि तब भी हुआ करती थी, पर वे ज़्यादातर रईसों के शौक़ माने जाते थे।  आम परिवारों में तो दीए, मोमबत्तियाँ और कंदीलें ही रौशन होकर अपनी छटा बिखरा देती थी। पूजा के समय भी कौन कम्बख़्त भगवान को याद करता था...? भगवान भी तब सिर्फ़ इम्तिहानों में ही याद आते थे न...? हम बच्चों की तो एक आँख मिठाइयों पर होती थी और दूसरी पटाखों पर...। 

हाँ, एक बात हम सब के लिए तब भी रहस्य थी...आखिर ये गुब्बारे के अन्दर जलता दिया रखते कैसे हैं? ऐसे दीयों से भरे गुब्बारे हवा में उड़ाने वालों के हुनर के प्रति हमारा मन एक अनाम श्रद्धा से भर जाता था। 

फिर घर में जैसे ही सफ़ाई शुरू होती, पूरा घर किसी युद्धभूमि जैसा नज़ारा पेश करता था—बक्से-बिस्तर छत पर, किताबें यहाँ-वहाँ, और माँ की सख़्त निगरानी में हर कोना चमकाया जाता था। उस बीच हम बच्चों के हिस्से में कुछ-न-कुछ काम आता ही था - दीयों को पानी में भिगोकर तैयार करना, रुई की बत्तियाँ बनाना और फिर गिनती करना कि इस बार कितने ज़्यादा दीये जलेंगे। मोहल्ले के बच्चों में भी होड़ मचती थी...किसके आँगन में ज़्यादा दीए सजे हैं, किसके दरवाज़े पर कंदील सबसे ख़ूबसूरत लग रही है। सच कहिए, उन टिमटिमाते दीयों की पंक्तियों में जो सादगी और अपनापन था, वह आज के बिजली की चकाचौंध भरे लाइट्स में कहाँ?

आज दुनिया बहुत बदल गई है। आज न तो नए, महँगे कपड़े खरीदने के लिए बच्चों में किसी त्योहार के इंतज़ार का धैर्य है, न पिज़्ज़ा-बर्गर के मायाजाल से निकलकर खील-बताशे और मिठाइयाँ ढूँढने में मिलने वाले उस सुख का एहसास ही...। आज के बच्चे बहुत जल्दी बड़े होकर इस पटाखे-फुलझड़ियों की दुनिया से बाहर निकल आए हैं। आज की ये कच्ची-अधपकी पीढ़ी वर्च्युअल दुनिया के मकड़जाल में उलझकर वहीं सारे तीज-त्योहार मनाकर मशीनी खुशियाँ ही मना लेने को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान रही है। 

आज तो अक्सर दीपावली की रात भी जैसे सन्नाटे में डूबी होती है, बस बीच-बीच में कहीं दूर से किसी पटाखे की धमक सुनाई दे जाए तो और बात है। मानते हैं कि इन सब पटाखों-फुलझड़ियों से वातावरण प्रदूषित होता है, कई शारीरिक तकलीफ़ें भी होती हैं। बारूद-भरे पटाखों की जगह किसी और तरह के पटाखों की ईजाद हो जाए, इसमें कुछ दिक्कत की बात नहीं है। पर आपस में मिलने-जुलने, खुशियाँ बाँटने और ढेर सारी यादें बटोरने में तो कोई बुराई नहीं न? फिर क्यों आज के समय में त्योहारों से ये सब भी कहीं गायब हो गई हैं?

अच्छी बात है कि आज हम पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ज़्यादा सतर्क-सचेत हो गए हैं, पटाखों से दूर हो ही गए हैं, पर कभी फ़ुर्सत मिले तो सोचिएगा...इस सतर्कता और सजगता के चलते हमारे अन्दर खुशियों की हहराती नदी से खिली हरियाली कहीं असमय ही तो काल-कवलित नहीं हो रही है?

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या-एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र), ईमेल: priyanka.gupta.knpr@gmail.com ब्लॉग: www.priyankakedastavez.blogspot.com


Aug 1, 2025

प्रेरकःआपन तेज सम्हारो आपे

 - प्रियंका गुप्ता

आज आपको एक कहानी सुनाने का दिल कर रहा। बहुत पहले की बात है, जब किसी जंगल में एक बेहद ज़हरीले साँप का सामना एक बहुत सिद्ध महात्मा से हुआ। साँप अपनी फितरत का मारा...महात्मा को भी उसने कोई साधारण इंसान समझकर डँसना चाहा। अब सिर्फ हमसे-आपसे ही थोड़ी न भूल होती है इंसान पहचानने में...कभी-कभी जानवर भी ऐसे ही गलतियाँ कर जाते हैं। अब जब उसने अपनी शक्ति के दंभ में बाबाजी से पंगा लेने की कोशिश की, तो उन्होंने भी अपनी ताक़त दिखा दी, और उसे मन्त्र के बल पर अवश कर दिया। अब साँप बहुत रोया-तड़पा, हाथ- पैर जोड़े तो महात्मा ने उसे इस वायदे के साथ बंधनमुक्त किया कि अब आइन्दा वो किसी निर्दोष को नहीं सताएगा। 

काफी वक्त बीत गया। साँप ने अपना वायदा निभाया और किसी को भी नहीं डँसा। धीरे-धीरे आसपास के इलाकों में यह बात फैल गई और फिर तो सब एकदम ढीठ हो गए। अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी मज़े के लिए उसके पास जाते, उसे कोंचते...वह जान बचाकर भागना चाहता तो ईंट-पत्थर मार-मारकर उसे लहूलुहान कर देते...। हालात इतने बिगड़े कि साँप बिलकुल मरणासन्न हो गया। उसमे इतनी ताक़त भी नहीं बची थी कि वह अपने बिल के अन्दर भी जा सकता। आखिरकार उसे मरा जानकर बच्चों ने उधर आना छोड़ दिया।

साँप अपनी आख़िरी साँसे गिन रहा था कि उन्हीं महात्मा का फिर उसी रास्ते से गुज़रना हुआ। साँप की ऐसी दुर्दशा देखकर वे चकित रह गए। पहले तो उसका इलाज किया, फिर सब हाल सुनकर उन्होंने माथा पीट लिया। जब साँप के होशो-हवास दुरुस्त हुए तब उन्होंने समझाया- ‘‘मैंने तुम्हें किसी निर्दोष को बेवजह सताने को मना किया था। अपनी शक्ति का अहसास दुनिया को कराने से थोड़े न रोका था। इस दुनिया की नब्ज़ पकड़ना सीखो, यहाँ तुम जितना झुकोगे, दुनिया तुमको उससे ज़्यादा झुकाएगी, इतना कि एक दिन तुम खुद भूल जाओगे कि तुम असल में थे क्या।’’

साँप को बाबाजी की बात समझ आ गई। उसके बाद से उसने दोनों काम किए। पहला तो यह कि उसने किसी को बेवजह सताया या डँसा नहीं, और दूसरा किसी को बिना बात खुद पर हावी होते देख उसने फन काढ़ने के साथ ही फुफकारना शुरू कर दिया। उस दिन से जैसे सबके दिन बहुर गए। न तो साँप के काटने से कोई अकारण मरा, और न साँप का जीवन किसी खतरे में पड़ा...।

अब आप यह सोच रहे होंगे कि आज मैं यह कहानी आपको क्यों सुना रही हूँ? इसकी एक वजह है। अक्सर हम-आप भी इसी साँप की तरह हो जाते हैं। सामने वाले के आगे विनम्र होते-होते हम अपनी शक्ति पहचानना और दर्शाना भी भूल जाते हैं, जबकि सामने वाला हमें कमज़ोर समझकर हम पर हावी ही होता चला जाता है, कुछ इतना कि हमारा दम घुटने लगे।

तो बस याद रखिए- जब और जहाँ ज़रुरत हो, अपना फन भी काढ़िए और एक ज़ोरदार फुफकार भी मारिए, ताकि सामने वाले को भी आपकी शक्ति का अहसास हो सके।  

कभी-कभी नाग होने में कोई बुराई नहीं। 

Apr 1, 2025

हाइबनः तुम बहुत याद आओगे

  - प्रियंका गुप्ता

उस रात जाने क्यों मन थोडा उदास- सा था...अजीब सी बेचैनी। बहुत सारी बातें थी मन में; पर समझ नहीं आ रहा था कि बेचैनी थी आखिर किस बात पर। अजीब- सा अहसास। बहुत हद तक कारण अगले दिन समझ आ गया,जब शैडो के जाने की ख़बर मिली।

शैडो, कहने को किसी को जो हिकारत से कहा जाता है, वह था। यानी कि गली का कुत्ता, स्ट्रीट डॉग था वह। मेरी गली का एक वफादार बाशिंदा। बहुत सारे इंसानों से ज्यादा भावनाएँ मैंने उसमें देखी थी। इंसानी हिसाब से देखा जाए, तो वो एक दीर्घायु जीकर गया। तेरह साल की उम्र, जब कुत्तों की अधिकतम आयु शायद चौदह साल ही होती है।

अंतिम के तीन दिन, जब उसने खाना-पीना छोड़ा, उसके पहले तक वो सचमुच शैडो बनकर मेरे साथ चला। नाम उसका वैसे मोती था; पर जब वह इस मोहल्ले में आया था, जाने कैसे चुनमुन ने उसे `शैडो' बुलाना शुरू कर दिया था। वह अपने दोनों नाम पहचानता था, बातें समझता था। रात को मेरे गेट का ताला बंद होने से पहले अगर किसी दिन वो कहीं लापता होता और रोटी न खा पाता, तो दूसरे दिन सुबह गेट खोलते ही एक ख़ास अंदाज़ में शिकायत होती मुझसे और मेरे इतना कहते ही-हाँ-हाँ, समझ गए, कल खाना नहीं मिला था न, अभी देते हैं। बिलकुल शांत हो जाता था।

लम्बाई-चौडाई यूँ थी कि अपनी जवानी के दिनों में कि मजाल है कोई अनजान मोटरसाइकिल वाला भन्नाटे से सही सलामत गली से गुज़र सके। इसलिए बच्चों का लाडला था शैडो; क्योंकि गली क्रिकेट में फील्डिंग के साथ-साथ वो इस तरह के घुसपैठियों से भी सबको बचाता था।

एक वफादार साथी की तरह न जाने कितनी दूर तक वो अक्सर मेरे साथ चला है, एक बच्चे की तरह न जाने कितनी बार दो पैरों पर खड़े होकर गले लगा है और जाने कितनी बार किसी अनजान को मेरे दरवाज़े पर ऐंवेही फटकने से भी रोका था।

लोगो को अपनी भयानक आवाज़ से कँपा देने वाला शैडो हमारे झूठमूठ धमकाने पर यूँ दुबक जाता था कि बरबस हँसी आ जाती थी। जिसने उसे कुछ सालों पहले तक देखा था, वो उसे ‘गली का कुत्ता’ कहने की बजाय ‘गली का शेर’ ही कहते थे।

वह किसी एक का नहीं था, फिर भी सबका था। मौत को अपना बना वो तो अपने कष्टों से मुक्ति पा गया; पर आज भी जब मेरी ही तरह उसे इस गली के कई लोग याद करते हैं, तो ऐसे में मुझे उन लोगों पर तरस आता है, जो अपने कर्मों के कारण ऐसी याद से भी वंचित हैं, उस प्यार से वंचित हैं, जो एक ‘गली का कुत्ता’ पा गया।

शैडो के जाने के बाद उसकी विदाई में बस एक ही बात दिल में गूँजी थी- तुम बहुत याद आओगे, हमेशा याद आते रहोगे, हर उस पल में जब कोई साया साथ चलेगा।

वफ़ा की सीख

बेजुबान दे जाते

नेह से भरे।

Feb 1, 2025

बाल कविताः प्यारे मामा

 - प्रियंका गुप्ता






प्यारे मामा आओ न,

खेल-खिलौने लाओ न,

छुट्टी हुई है खेलेंगे अब,

पढ़ने को समझाओ न।


नई कहानियाँ सुनाओ न,

हँसी-मजाक में उलझाओ न,

तितली, फूल, और तारों की,

दुनिया हमें दिखाओ न।


चॉकलेट और मिठाई लाओ,

साथ में मिलकर खाओ न,

बाग-बगीचे घूमें हम सब,

झूला हमें झुलाओ न।


गाना-गाना सिखाओ न,

ढोलक पर थिरकाओ न,

खेल-खेल में सीखें हम,

प्यारी बातें बताओ न।


रात को तारे गिनते हैं,

चाँद की बातें करते हैं,

नींद की रानी आएगी,

परियों की कथा सुनाओ न।


मामा, मामा प्यारे मामा,

हमको कभी ना भूलो न,

छुट्टियों में तो मिलते रहना,

सपनों में भी आओ न।

priyanka.gupta.knpr@gmail.com, 

www.priyankakedastavez.blogspot.com



Oct 1, 2024

कहानीः दहेज की रकम

  - प्रियंका गुप्ता

जाने कब किस मुहूर्त से शन्नो ज़िद पकड़े बैठी थी कि वह शादी करेगी, तो सिर्फ़ एहसान से, वरना ज़िंदगी भर कुँवारी बैठी रहेगी। घरवालों ने कितना समझाया, साम, दाम, दंड, भेद, हर फंडा अपनाकर देख लिया; पर लड़की को न मानना था, वह न मानी। गाहे- बगाहे माँ ने घूँसे थप्पड़ लगाए, भाइयों ने गालियाँ दीं...बाप चप्पल उतारकर मरने-मारने पर उतारू हो गया, पर मज़ाल है, करमजली टस से मस हुई हो। बात घर परिवार के बीच तक रहती, तो भी ग़नीमत थी, पर बेशर्म ने तो पूरे समाज में ढिंढोरा पीटकर रख दिया था। 

कितना अच्छा लड़का मिला था, उसके लिए...। दान-दहेज भले थोड़ा हैसियत से बढ़कर देना पड़ता, पर घरवाले अपनी इकलौती लाडली के लिए, ये भी करने को तैयार थे। थोड़ा कर्ज़ा चढ़ भी जाता, तो क्या, सिर से बोझ तो उतर जाता...और फिर किस बेटी के ब्याह पर थोड़ा बहुत जोड़-तोड़ नहीं बिठाना पड़ता? वह कोई अनोखी तो थी नहीं। न ही कहीं की राजकुमारी... न कोई हूर की परी, जिसे देखते ही कहीं का राजकुमार अपना दिल हार बैठे और मुफ़्त में ही उसे अपनी रानी बना ले...। 

पर शन्नो को तो मानो बहाना मिल गया उस लड़के को भगाने का...। पूरे परिवार को वो पसंद आ गई थी, पर जहाँ लेनदेन की बात शुरू हुई, एकदम बेहया की तरह लड़की बीच मे कूद पड़ी- सुनिए आप लोग, माँ-पिताजी चाहते थे कि मैं एक बार आपका लड़का देख लूँ, सो देख लिया...। आप लोगों ने मुझे पसंद कर लिया, इसका मतलब ये थोड़े न कि आपका ये छछून्दर जैसी पैदाइश मुझे भी पसंद है। ऊपर से आप लोग जितने दहेज की डिमांड कर रहे न, उतने में तो कोई अपनी दो बेटियों की शादी अच्छे तरीके से निपटा दे...। बेहतर होगा, अपनी तशरीफ़ का टोकरा अपने सिर पर रखिए और चुपचाप चलते-फिरते नज़र आइए।

शन्नो के माँ-बाबा ‘हें-हें, अरे-अरे’ करते हुए उसे रोकने की कोशिश करते रहे, पर उसे न रुकना था, न वह रुकी...। बंदी ने अपनी बात पूरी करके ही दम लिया। उसके बाद वे लोग लड़के वालों से हाथ जोड़-जोड़कर माफ़ी माँगते रहे, पर अपने औलाद के लिए ‘छछुन्दर’ और खुद के लिए ‘महा लालची’ जैसे सम्बोधन सुनने के बाद भला कौन माफ़ी देता है या रुकता है?

लड़के वाले तो जवाबी गालियाँ देते और उसकी सात पुश्तों को चिर कुँवारा मरने का शाप देते चले गए, पर उसके बाद शन्नो ने एहसान नाम रूपी जो एटम बम फेंका, उसका प्रहार झेल पाने में घरवालों को बहुत समय लगा जैसे...।

इकलौती लड़की ने नाक के नीचे से छुपकर नैन-मटक्का कर डाला, इतना बड़ा चैलेंज माँ को गश देकर गिराने के लिए काफी था। पिता शेर की तरह दहाड़ना चाहते थे, पर एक तो उनकी शेरनी बेहोश थी...दूसरे अभी-अभी रुख़सत हुए लड़के वालों के ज़ोर-ज़ोर से गरियाने की आवाज़ अभी भी फ़िज़ाओं में इस क़दर घुली थी कि आस-पड़ोस वालों ने सर्द मौसम की ज़रा भी परवाह किए बिना, न केवल अपने घरों की खिड़कियाँ खोल रखी थी; बल्कि कुछ अति-उत्साही लोगों ने 'हेल्थ इज़ वेल्थ' का अक्षरशः पालन करने के विचार से रात्रिकालीन भोजन के पश्चात् बाहर टहलकर उसे पचाने का भी अटल इरादा कर लिया था। शन्नो के दोनों बड़े भाइयों का खून तो शायद दो सौ डिग्री सेंटीग्रेड तक खौल गया था। पहली बात तो यह कि जो काम इतने दिनों से वे दोनों न कर सके, वह उनकी बहन ने जाने कब कर लिया...दूसरे, उससे भी बड़ी बात यह कि, इश्क़ किया सो किया...मुसलमान से काहे किया? उन दोनों का वश चलता, तो अभी ही शन्नो और उसके प्रेमी दोनों के हाथ पैर तोड़ डालते, पर एक तो अम्मा लुढ़की पड़ी थी, दूसरे बाऊजी का रवैया थोड़ा कंफ्यूजिंग था। किसी भी झमेले में सबसे पहले तो उनकी चिंघाड़ सुनाई पड़ जाती थी, लेकिन इतने बड़े मसले पर चुप्पी साधे वे सिर झुकाए अम्मा के सिरहाने बैठे थे।

जब घर का मुखिया ही ऐसे सन्नाटे में बैठा था, तो वो दोनों काहे फ़िज़ूल में उछल-कूद मचाते? पहले ये भी तो देखना था कि तेल किधर है और तेल की धार किधर है? पता चला वो दोनों बवाल मचा दें और इधर बाऊजी एकदम चुप्पे बने हुए, सिर झुकाए हुए अपनी लाडली की बात मान लें। फालतू में वे लोग ही दोनो तरफ की गुड बुक्स से बाहर हो जाएँ। यही सब सोचकर दोनों भाइयों ने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को चुप रहने का इशारा किया और जल्दी जल्दी अम्मा के हाथ पैर मलकर उन्हें होश में लाने की जुगत में लग गए।

असली बवाल तो अम्मा के होश में आने पर हुआ, जब उन्होंने आँख खोलते ही शन्नो को सामने देखा और चीते की फुर्ती से बिस्तर से उठते ही, उस पर लपक पड़ी। घर के तीनों पुरुष सदस्य भी उनकी ऐसी लपक-चमक देख के जैसे मुँह बाये रह गए। माँ ने आव देखा न ताव, जो हाथ में समाया, उसका निशाना ताक- ताककर लड़की पर मारा। क्या जूता-चप्पल, क्या कुशन तकिए या फिर क्या गिलास कटोरी...हरेक चीज़ उस पर अस्त्र बनाकर फेंकी...। 

कुछ पल तो सब हतप्रभ थे, पर इससे पहले कि पड़ोसियों का पूरा जत्था यह फैमिली म्यूजिकल देखने उनके घर घुस आए, उन तीनों ने मिलकर उन्हें सम्हाल लिया। शन्नो इतने हमलों से जाने थोड़ा सदमे में थी, या ज़िद में...पर वो बिना हिले-डुले वहीं बैठी रही। पिता से ‘सुबह उससे बात करता हूँ, तुम चिंता न करो...’ का आश्वासन पाकर ही माँ सोई। न भी सोई हो, तो किसे पता, पर अभी दुनिया के सामने घर का तमाशा न बने, पिता की इतनी बात और मानकर वह चुपचाप आँख बंद करके लेट गईं। भाई लोग भी अपने कमरे में चले गए और शन्नो वहीं मूर्ति बनी हुई चुपचाप आँसू बहाती बैठी रही।

दूसरे दिन पिता अपनी आदत के विपरीत सचमुच शांत रहे। शन्नो को प्यार से समझाया, फिर थोड़ा कड़ाई से डाँटा... और उसके बाद भी जब वह न मानी, तो समाज की ऊँच-नीच समझाते हुए एहसान को लड़की बरगलाने के आरोप में जेल भिजवा देने की भी धमकी दे डाली; लेकिन शन्नो पर किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा था। वो अपनी जिद पर अड़ी थी। वो और अहसान दोनों बालिग़ थे, सो कानून कुछ नहीं कर पाएगा। समाज में बदनामी की उसे कोई चिंता नहीं थी। घर परिवार छोड़ने को भी वो पूरी तरह तैयार थी... और अगर एहसान पर हल्की- सी आँच भी आई, तो वो सबको खुद जेल भिजवा देगी, पिता के डराने पर उसने बेधड़क यह धमकी भी दे डाली। 

"आप लोग हमें नहीं रोक सकते। ज़्यादा ज़ोर-जबरदस्ती कीजिएगा, तो पहला मौका मिलते ही भाग जाएँगे हम दोनों...कहीं दूर अनजान जगह जाकर शादी कर लेंगे। मेरी शक़्ल देखने तक को तरस जाइएगा... बता दे रहे बस...।" शन्नो अब तक इकलौती होने के कारण पिता के दिए लाड़ का नाजायज़ फायदा उठाने पर तुल आई थी।

बात सच भी थी। पूरे खानदान में दो पीढ़ियों बाद कोई लड़की हुई थी, तो वो थी शन्नो...। पर अगर वो बहुत दुलारी थी, तो खानदान की इज्ज़त उससे भी ज़्यादा अजीज़ थी उनको...। कोई तो हल निकालना ही पड़ेगा, जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। 

दूसरा दिन बीता, फिर तीसरा भी बीत गया। घर में मनहूसियत छाई हुई थी। इस बीच भाई लोगों ने एहसान का भी पता लगा लिया था। कहाँ रहता है, क्या करता है, घर में कौन-कौन है...सारी कुंडली एकदम डिटेल में...। अब रात को माँ -बेटी जब चुप्पी की चादर ओढ़े सो जातीं, बाप और दोनों भाई सिर से सिर जोड़कर बैठ जाते। कई सुझाव रखे जाते और तीनों में से कोई न कोई उसमें कोई ख़ामी निकालकर खारिज़ कर देता। जैसे जैसे दिन ख़त्म होते जा रहे थे, शन्नो की ज़िद बढ़ती जा रही थी। खानदान की इज्ज़त पर सरेआम बट्टा लगने का भी ख़तरा दुधारी तलवार की तरह पिता के सिर पर लटक रहा था। जिस तरफ भी झुके, घायल तो होना ही था।

आखिरकार क़िस्मत ने ही एक दिन इसका हल निकाल दिया। सुबह- सवेरे जब मोहल्ले वालों को उनके घर से माँ के रोने-पीटने की आवाज़ सुनाई दी, तो दरयाफ़्त करने पर पता चला, रात में जाने कब बिटिया रसोई में पानी पीने के लिए अपने कमरे से नीचे आ रही थी कि पैर फिसला और वो हमेशा के लिए सबको छोड़कर बहुत दूर चली गई। सुबह माँ जब सोकर उठी, तब  बेटी की जगह उसकी ठंडी लाश देखकर अपने होशो-हवास खो बैठी।

सुनने वालों के दिल से आह निकल गई। जवान-जहान बेटी की डोली की जगह घर से अर्थी निकलने की नौबत आए, तो भला कौन ऐसा पत्थर दिल होगा जिसका कलेजा चाक न हो जाए...?

दस्तूर और कायदे के हिसाब से दुनियावाले भी आए और पुलिस भी...। सब काम नियमानुसार निपटने के बाद पुलिस ने भी इसे महज एक एक्सीडेंट मानते हुए केस बंद कर दिया। कुछ दिन बीतते-बीतते सब कुछ सामान्य हो गया। 

शन्नो की मौत के बारे में पता चलने पर एहसान उसे आखिरी विदा देने आया या नहीं, इस पर मोहल्ले वालों की दबी जुबान में अलग-अलग राय थी...।

एहसान वाली बात तो चाहे कुछ भी रही हो, पर उससे भी ज़्यादा विश्वास के साथ कुछ भरोसेमंद लोगों की एक राय तो बिल्कुल पक्की थी...भले ही आपस में फुसफुसाहट के रूप में वह राय बाहर आती हो कि सीढ़ियों पर पुलिस को तेल के निशान मिले तो थे, पर आखिरकार दहेज की जोड़ी हुई रकम उसी के काम निपटाने में ही काम आई...।

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या-एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र) ,  मो. 09919025046

Jul 7, 2024

चिंतनः वह एक पल और ज़िन्दगी...

  -  प्रियंका गुप्ता 

आजकल आए दिन अख़बारों, न्यूज़ चैनल्स पर हम कहीं-न-कहीं किसी आत्महत्या की ख़बर पढ़ते-देखते रहते हैं। कभी सूखे या बाढ़ जैसी किसी प्राकृतिक आपदा के चलते कर्ज़े में डूबा किसान अकेला या अपने पूरे परिवार समेत अपनी इहलीला समाप्त करने को मजबूर होता है, तो कहीं कुछ अलग तरह की पारिवरिक समस्याओं से जूझता कोई इंसान मौत को गले लगा लेता है। बोर्ड के इम्तिहान के बाद रिज़ल्ट आने तक तो कुछ वर्ष पूर्व तक जाने कितनी कच्ची उम्र के बच्चे दुनिया ठीक से देखने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह जाते थे। आखिर हारकर CBSE बोर्ड समेत कई राज्यों के बोर्ड ने ग्रेडिंग प्रणाली लागू की ताकि इस तरह की मर्मान्तक घटनाओं पर कुछ हद तक काबू पाया जा सके।

ऊपर की बहुत सारी घटनाओं की वजह तो कहीं-न-कहीं आर्थिक स्थिति पर आकर रुक जाती हैं। जब इंसान को रोटी के ही लाले पड़ जाएँ, तब तो उसका हार मानना कुछ समझ भी आता है (हालाँकि एक अमूल्य इंसानी ज़िन्दगी को ख़त्म कर देने के लिए यह वजह भी किसी तरह से जायज़ नहीं ठहराई जा सकती); पर जब आर्थिक रूप से ठीक- ठाक या सम्पन्न और बहुत हद तक नामी- गिरामी शख़्सियतें अपनी मर्जी से इस बेशकीमती ज़िन्दगी से पल्ला झाड़ लेते हैं, तो मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वो ऐसा कौन- सा पल होता है जिसमें इंसान यह कायरतापूर्ण, लेकिन कठिन फ़ैसला ले लेता है...?

यह तो मानी हुई बात है कि आत्महत्या का फ़ैसला लेना एक मानसिक स्थिति का परिणाम है, और इस मानसिकता का एकमात्र कारण है-डिप्रेशन यानी कि अवसाद...।

बहुत लोगों का यह मानना है कि आत्महत्या एक क्षणिक भावावेश में उठाया गया कदम है। कुछ मामलों में यह बात सही भी है, पर सभी मामलों में नहीं...। कई बार इस अंतिम फ़ैसले पर पहुँचने से पहले व्यक्ति बहुत चिन्तन- मनन करता है। खुद को इस दुनिया से विदा करने के लिए तैयार करता है। तभी ऐसे कई सारे मामलों में हम पाते हैं कि ऐसा व्यक्ति अपने अन्तिम समय में बेहद बदला हुआ महसूस होता है। कुछ दिनों पहले तक एकदम चुप सा हो चुका, कटा-कटा रहने वाला वही व्यक्ति आम दिनों से ज़्यादा खुशनुमा, मिलनसार और आत्मीय हो जाता है। ज़रूरी नहीं कि यह बदलाव सिर्फ आत्महत्या की पूर्वसूचना हो, शायद यह उसकी स्थिति में सुधार का भी संकेत हो। पर जो भी हो, ऐसे व्यक्ति के आसपास जो अपने हों, उन्हें सतर्कता की बेहद ज़रूरत है। सिर्फ बड़े ही नहीं, आज की बदलती जीवनशैली और गला-काट प्रतियोगी युग में बच्चे भी इस डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं, जो उनकी आधी-अधूरी समझ और संघर्ष की कम क्षमता के मद्देनज़र और भी भयानक बात है।

एक आम इंसान जब ऐसा कोई कदम उठाता है, तो सिर्फ़ उसके आसपास या उसको जानने वाले लोगों तक ही यह सीमित रह जाता है, पर जब कोई सेलिब्रिटी की हैसियत रखने वाला ऐसा करता है, तो पूरे देश, समाज और मीडिया के साथ-साथ आम जनजीवन भी उसकी परिस्थितियों के बारे में अपने अपने हिसाब से कयास लगाना शुरू कर देता है, जिसमें से सबसे ज़्यादा अहम रूप से उभर कर सामने आता है-प्रेम सम्बन्ध में मिली असफलता...। मुझसे बहुत सारे लोग ऐसे मिले हैं, जिन्होंने डिप्रेशन का दूसरा नाम ही किसी के प्यार में धोखा खाना मान लिया है। अफ़सोस की बात यह है कि अच्छा-खासा पढ़े लिखे होने के बावजूद वे डिप्रेशन को पीलिया, ब्लडप्रेशर आदि किसी अन्य बीमारी की तरह नहीं देखना चाहते, जिसका इलाज सही दवा और आवश्यक का‍उन्सलिंग और देखभाल से सम्भव है। डिप्रेशन किसी भी मामूली सी लगने वाली वजह से भी हो सकता है, मसलन एक स्कूल, कॉलेज़ या नौकरी से किसी दूसरे स्कूल, कॉलेज़ या नौकरी में जाना...जगह-परिवर्तन, किसी अपने की लम्बी बीमारी या उसकी मौत (इस अपने की मौत में बेहद प्रिय पालतू जानवर की मौत भी शमिल है), किसी सपने का पूरा न हो पाना, किसी दोस्त का साथ छूटना, किसी खास परिस्थिति से सामन्जस्य न बिठा पाना, अपनी इच्छाओं का लगातार गला घोंटते जाना...इत्यादि-इत्यादि बहुत लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है, जो अवसाद या डिप्रेशन की मूल वजह हो सकती है। 

डिप्रेशन भी किसी अन्य बीमारी की तरह अपने कई स्तर पर हो सकता है। शुरुआती स्तर का अवसाद सम्हालना खुद उस व्यक्ति के हाथ में हो सकता है, अगर समय रहते उसे पहचान लिया जाए। ऐसे में वह व्यक्ति खुद अपने हिसाब से अपनी जीवन शैली में परिवर्तन लाकर उससे उबर सकता है। पर अगर यही बीमारी अपने अन्तिम ‘एक्यूट स्टेज़’ तक जा पहुँची, तब इसे सम्हालने के लिए सही इलाज के साथ-साथ उस इंसान के किसी अपने का सहयोग बेहद ज़रूरी है। इसी एक्यूट स्टेज़ में पहुँचकर उस व्यक्ति के दिमाग में आत्महत्या के विचार पनपना शुरू हो जाते हैं, जो धीरे-धीरे बहुत गहरे तक अपनी पैठ बना लेते हैं। समय रहते चेत गए तो ठीक, वरना दिमाग़ में हो रहे विभिन्न रसायनिक असन्तुलन से उपजी यह बीमारी उसे मौत की नींद सुला कर ही दूर होगी।

दुःखद बात यह है कि ऐसे मामलों में उसके आसपास... उसके साथ रहने वाले लोग उसके जाने के बाद ही इस चेतावनी को समझ पाते हैं। उन्हें तब याद आता है कि आम तौर पर बेहद खुशनुमा रहने वाला वो व्यक्ति पिछले कई दिनों से गुमसुम सा...चिड़चिड़ा होकर बात-बात पर रो पड़ने वाला हो गया था। उसकी इस हरकत से इरीटेट होने वाले उसके अपने समय रहते जान ही नहीं पाते कि अपने खोल में सिमट जाने वाला वह व्यक्ति अन्दर से उन अपनों में से किसी भी एक सहारे के लिए किस कदर बेचैनी महसूस कर रहा होता है। एक तरफ़ आप उससे परेशान होकर उसका साथ छोड़ते हैं, दूसरी तरह वह आपको उस परेशानी से मुक्त करने के लिए हमेशा के लिए आपका साथ छोड़ कर चल देता है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि एक्यूट डिप्रेशन से ग्रस्त व्यक्ति खुद बहुत बड़ी दुविधा में जीता है। वह आपका साथ नहीं चाहता, पर आपको साथ छोड़ते देख बर्दाश्त भी नहीं कर पाता। वो नहीं जानता कि अपनी बातों, अपने व्यवहार से वह आपको हर्ट कर रहा, पर आपकी बातों से वह बहुत आसानी से हर्ट हो जाता है। हर छोटी-बड़ी बात का अपराधबोध बेवजह वह अपने अन्दर पालता जाता है, बिना यह समझे कि उसमे उसका कोई दोष था भी नहीं...। यक़ीन मानिए, खूनी और मुज़रिम खुद को भले इस दुनिया का बादशाह समझें, एक्यूट डिप्रेशन का मरीज़ एक चींटी के मरने का अपराधी भी खुद को मानता हुआ अपने आप को इस धरती का सबसे बड़ा बोझ समझता है...और पहला मौका मिलते ही वह इस धरती को अपने बोझ से आज़ाद कर देता है।

एक आम धारणा है कि अकेले रहने वाला या निठल्ला रहने वाला व्यक्ति ही अवसादग्रस्त होता है, परन्तु अधिकतर मामलों में सच होने के बावजूद यह एक सार्वभौमिक सत्य नहीं है। यहाँ हमको ‘अकेले रहने’ और ‘अकेले होने’ का फ़र्क समझना पड़ेगा। हो सकता है हमेशा भीड़ से घिरा रहने वाला...एक भरे-पूरे परिवार में अपनों के बीच रहने वाला बेहद सफ़ल इंसान भी अन्दर से बिल्कुल अकेला हो...और यही अकेला होना बेहद घातक साबित हो सकता है...।

सवाल यह उठता है कि यह अकेलापन कम कैसे हो...? मेरा मानना है कि अगर इस पूरी दुनिया में आपके पास एक भी इंसान ऐसा है, जिसके सामने आप अगर खुलकर हँस सकते हैं, तो समय पड़ने पर ज़ार-ज़ार रो भी सकते हों...उससे बड़ी से बड़ी खुशियाँ बाँटना आप भले भूल जाएँ, पर आपके छोटे-से-छोटे ग़म में अगर आपके आँसू पोंछने और आपको सांत्वना देता हुआ ‘मैं हूँ न’ कहने के लिए वह हमेशा तैयार हो, तब आप सबसे सम्पन्न और भरे-पूरे व्यक्ति हैं। 

दुर्भाग्य की बात यह है कि आम जनता को इस बीमारी की सही और सच्ची जानकारी ही नहीं...। बहुत से आत्मगर्वित लोग किसी अवसादग्रस्त व्यक्ति को ‘पागल’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, और शायद यही वजह है कि कुछ लोग अपनी इस बीमारी को पहचान लेने के बावजूद इसके इलाज के लिए किसी मनोचिकित्सक के पास जाने या किसी अपने से इसका ज़िक्र भी करने में बेहद हिचकते हैं। अन्त क्या होता है, यह कहने की ज़रूरत नहीं...। ऐसे में कितना अच्छा हो यदि दीपिका पादुकोण जैसे ही कुछ और भी खास और आम लोग सामने आकर इस बीमारी के प्रति समाज में जागरूकता फैलाएँ। लोगों को समझाएँ कि यह पागलपन नहीं, बल्कि एक खास तरह का केमिकल लोचा है, जो किसी भी और बीमारी की तरह देखा जाना चाहिए।

आज हमको ज़रूरत है तो सिर्फ़ इतनी कि हम अपने आसपास के किसी अपने को इस बीमारी की गर्त में जाने ही न दें...। जब जितना हो सके, किसी को अपने होने का अहसास दिला सकें...ताकि कोई ज़िन्दगी से कितना भी हैरान-परेशान रहे, पर उससे नाराज़ तो न हो कभी...। ■

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना-एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र) मोबाइल- 9919025046  


Mar 1, 2023

ललित लेखः चिठ्ठी आई है...

 - प्रियंका गुप्ता

अभी दो-चार दिन पहले दरवाज़े पर दस्तक हुई, जाकर देखा तो डाकिया था। सोचा, शायद रजिस्ट्री से कोई पुस्तक आई हो, पर नहीं, डाकिया तो हाथों में एक लिफ़ाफ़ा लिए खड़ा था। ‘लिफ़ाफा देख के मजमून भाँपने’ के ज़माने तो कब के चले गए, फिर भी इतना अन्दाज़ा तो लग ही गया कि वो कोई किताब या मैगज़ीन नहीं, एक ख़त था।

ख़त और इस ज़माने में...? जितनी हैरानी मुझे हुई यह सोच कर कि ऐसा कौन है जो अब भी कागज़-क़लम लेकर पत्र लिखने बैठा होगा, उतना ही हल्का-फुल्का अचरज़ डाकिया के चेहरे पर भी दिखा। जाने क्यों पत्र हाथ में लेकर एक अनजानी-अनचीन्ही खुशी भी महसूस हुई। एक झटके से जैसे पुरानी यादें दिमाग़ में रील की तरह चल गई। बचपन की यादें...किशोरावस्था की यादें...और कुछ साल पहले तक की भी यादें...। चिठ्ठियों का आना और जाना...राह चलते डाकिया के मिल जाने पर पूछना...भैया, कोई चिठ्ठी है हमारी...? और उसका ‘इंकार’ में गर्दन हिलाते हुए आगे बढ़ जाने पर थोड़ा मायूस हो जाना। बिना किसी खास इंतज़ार के भी वो बार-बार जाकर लेटर-बॉक्स खोल कर देखना...सब जैसे सदियों पुरानी बातें लगती हैं। याद नहीं पड़ता, पिछला ख़त कब और किसने लिखा था मुझे। सच कहूँ, तो कागज़-क़लम लेकर मैंने आखिरी ख़त कब और किसको लिखा, मुझे खुद भी यह याद नहीं।

ज़रा याद कीजिए वो पहले के भूले-बिसरे पल...दीवाली हो या फिर नया साल...न केवल ग्रीटिंग कॉर्ड खरीदने या बनाने का शौक परवान चढ़ता था, बल्कि कुछ अपनों को हम महज ग्रीटिंग से ही नहीं, वरन अपने पत्रों से अपनी उपस्थिति जताने के ख़्वाहिशमन्द रहा करते थे। घरवालों के लिए मेरी पूरी कोशिश रहती थी कि उनको मैं अपने हाथ से बना हुआ कॉर्ड दूँ। यह आदत मैंने एक लम्बे समय तक चुनमुन (प्रांजल) के अन्दर भी बरकरार रखी। वैसे भी वह ड्राइंग-पेण्टिंग का इतना शौकीन था कि खुशी-खुशी इस काम को अंजाम देता था। हाँ, कॉर्ड के अन्दर हर व्यक्ति के हिसाब से चुन-चुन के कुछ लिखने का काम तब भी मेरा ही होता था। कारण सिर्फ़ दो हुआ करते थे, पहला यह कि मेरी लिखावट में काटा-पीटी नहीं हुआ करती थी...और दूसरे, चुनमुन के बहाने ही सही, पर मैं भी अपना बचपन एक बार फिर जी लिया करती थी।

बचपन में जब भी किसी भी अवसर पर मुझे ग्रीटिंग कॉर्ड्स मिला करते थे, मुझे उन्हें अपनी नज़रों के सामने रखना बहुत भाता था। जाने क्यों उन सबसे एक अपनेपन की खुशबू सी आती थी। अब टेबिल या कमरे की अलमारी पर तो इक्का-दुक्का कॉर्ड ही जगह पा सकते थे न...? (और वैसे भी उस ज़माने में हम दो कमरों के किराए के मकान में हुआ करते थे) तो फिर बाकी के कॉर्ड्स...? इसका एक बहुत बढ़िया हल निकाल लिया था मैंने...एक मोटे कॉर्डबोर्ड पर उनका एक कोलाज़ जैसा बना लेती थी। बाकायदा वेल्वेट पेपर, रंगीन टेप, सितारों और शीशों से उस कोलाज़ को सजाती और फिर एक खूबसूरत कलाकृति तैयार हो जाती। एक अर्सा बीत जाने पर जब नए कोलाज़ का वक़्त आता, तो बड़े सम्हाल कर उन पुराने कॉर्ड्स को निकाल कर अपने ख़ज़ाने का हिस्सा बना लेती। जाने कितने बरसों तक यह सिलसिला चलता रहा, पर जब किराए के मकान से निकल कर अपने मकान में कदम रखा, तो कई दिनों में धीरे-धीरे सैटिल होने के बाद भी जब मुझे अपना ख़ज़ाना नहीं मिल पाया, तब जाकर यक़ीन हुआ कि मकान बदलने की आपाधापी में मेरा वो अनमोल यादों का पिटारा अब सिर्फ़ यादों में ही रह गया था। उसके बाद पता नहीं क्यों, मन कुछ ऐसा उचटा कि कॉर्ड्स हर साल भले सम्हाल के रखती रही, पर उनका कोलाज़ फिर कभी नहीं बना पाई। कभी-कभी बचपन का वो बीता हुआ वक़्त...वो कोलाज़...और वो लम्हें, सब बड़ी शिद्दत से याद आते हैं। पर सच कहूँ...यादों का कोलाज़ तो आज भी सजता है मेरे मन की किसी दीवार पर...और कभी किन्हीं फ़ुर्सत के लम्हों में उन्हें ताक मैं आज भी मुस्करा देती हूँ।

मेरी पीढ़ी के लोग शायद इस धरती पर आखिरी होंगे जिन्होंने चिठ्ठियाँ लिखी होंगी। आठ-दस लाइनों में लिखे जाने वाले पोस्टकार्ड से लेकर एक छोटी-मोटी कहानी जितने पन्नों वाली चिट्ठियाँ भी...। फिर उन चिट्ठियों को डाक में डालने के बाद उनके जवाब का जो एक बेसब्र इंतज़ार का वक़्त होता था, उसकी मीठी कसक की बात ही कुछ और थी। पत्र का जवाब मिलने पर चेहरे का खिल जाना...घर के दूसरे सदस्यों को इकट्ठा कर के उस चिट्ठी को ज़ोर-ज़ोर से बाँचना...फिर उस पर सबकी टीका-टिप्पणी...आज की पीढ़ी कहाँ जानती है ये सब...?

आज के बच्चों ने शायद ही चिट्ठी में बसी उस गंध को महसूस किया हो...एक ही ख़त को बारम्बार पढ़ने का सुख जाना हो। कभी पुराने कागज़ों को टटोलते वक़्त उनके बीच दबे किसी अपने के ख़त के मिल जाने पर होने वाली खुशी को महसूसा हो।

आज कम्प्यूटर-मोबाइल के चटपट-फटाफट मैसेज से हर पल ‘कनेक्टेड’ रहने वाली बेसब्र हो चुकी है और बहुत हद तक सम्बन्धों की गर्माहट के प्रति बेपरवाह भी...। दिनों-हफ़्तों-महीनों किसी अपने के जवाब का इंतज़ार करने का धैर्य नहीं बचा आज ‘टू मिनट्स नूडल्स’ से झट से पेट भरने वाली पीढ़ी के अन्दर। आज मल्टीटास्किंग के युग में रिश्ते निभाना भी बस एक टॉस्क ही रह गया है। यहाँ उँगलियों की जुम्बिश से पट से रिश्ते बनते हैं और चट से टूट भी जाते हैं।

आज मशीन पर लिखे जाने वाले संदेशे भी मानो मशीनी हो गए हैं। हम स्माइली बनाते हैं, पर मुस्कराते नहीं। हम दिल भेजते हैं, पर पत्थर के...। एक ईमेल या मैसेज में हम सब कुछ दर्शा सकते हैं। सुख-दुःख... हँसना-रोना... प्यार-गुस्सा... शायद हर एक भाव...पर फिर भी भावना-रहित...। इनमें फूल ही नहीं, गुलदस्ते भी हैं, पर खुश्बू नही। हँसी है, पर खिलखिलाहट नहीं...रोना है, पर आँसुओं से भीगते पन्ने नहीं...दिल है, पर प्यार नहीं...। हम सिर्फ़ कनेक्टेड हैं, पर हममें जुड़ाव नहीं।

आज भी मुझे कभी चिट्ठियों की याद आती है तो उनसे जुड़े चेहरे याद आते हैं। उसमें लिखी कितनी बातें अब भी दिमाग़ में उतनी ही शिद्दत से ताज़ा हैं। लेकिन आप कभी किसी ईमेल या मैसेज के बारे में सोच कर देखिए...क्या लिखा था, याद भी है आपको? अपनी लिखी चिट्ठियों से मुझे वो अपने याद आते हैं जो वक़्त के बहाव में जाने कहाँ चले गए। अपनी दुनिया में मस्त-मगन...पर फिर भी शायद किन्ही पलों में सिर्फ़ चिट्ठी की वजह से वो भी मुझे याद करते होंगे।

अपनी एक ऐसी ही बिछुड़ी, लगभग हम‍उम्र मौसेरी बहन से लगभग पन्द्रह साल बाद मिली मैं...राह चलते...(राह चलते इस लिए क्योंकि दुनिया की तमाम फ़सादातों की तीन वजहों में से एक के कारण उनसे हमारा रिश्ता ख़तम हो चुका है) तो पुराने सगे रिश्तों की ख़ातिर हम दोनों ही पूरी गर्मजोशी से मिल लिए। हम दोनों ने बरसों एक-दूसरे को लम्बे-लम्बे ख़त लिखे थे। ख़तों के माध्यम से ही हम न जाने कितनी बातें शेयर करते थे। दस मिनट की इस मुलाक़ात में एक बार फिर बिछड़ते वक़्त उनके शब्द यही थे, “तुम्हें याद है...हम लोग खर्रा (लम्बी चिट्टी) लिखा करते थे एक-दूसरे को...। कितने अच्छे दिन थे न वो...?" पल भर के लिए सिर्फ़ इस एक याद से हम दोनो वही पुरानी सहेलियों-सी बहनें हो गई थी...‘आँखों में नमी, हँसी लबों पे...’ वाली स्टाइल में...।

उनसे उस दिन बिछड़ने के बाद शायद हम दोनों फिर कभी न मिल सकें...पर एक सवाल अब भी मेरे मन में आता है। अगर ख़तो-किताबत का सिलसिला हम दोनो के दरमियाँ कायम रहता तो क्या मेरी चिठ्ठियों पर गिरकर सूख चुके मेरे आँसू हमारे रिश्ते को सूखने से बचा लेते...?

आपके उत्तर की प्रतीक्षा तो रहेगी ही न...।

सम्पर्कः एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र), ईमेल:  priyanka.gupta.knpr@gmail.com, ब्लॉग: www.priyankakedastavez.co.in

Jan 1, 2023

कहानीः अजनबी

- प्रियंका गुप्ता

 सुबह के साढ़े छह बज गए थे और मोबाइल में बजती बाँसुरी की मधुर धुन से मेरी नींद पूरी तौर से खुल चुकी थी। जो थोड़ा-बहुत आलस बचा था, वह भी खिड़की से आती सुबह की मुलायम रोशनी ने भगा दिया। बिस्तर से उतरकर मैंने एक भरपूर अँगड़ाई ली, बालों को क्लचर के हवाले करते हुए स्लीपर पहनी और बाथरूम जाने से पहले रोज़ की तरह इलेक्ट्रिक केतली का प्लग ऑन कर दिया।

जब तक बाहर आई, गर्मागर्म भाप उगलती मेरी ब्लैक टी तैयार थी। म्यूज़िक सिस्टम पर धीमी आवाज़ में अपने पसन्दीदा गानों की सीडी चलाकर मैंने चाय का कप और अख़बार उठाया और खिड़की के पास आकर बैठ गई। ये मेरी फ़ेवरेट जगह थी। अख़बार की ख़बरों में डूबने से पहले ब्लैक टी पीते हुए बाहर ताकना मुझे बेहद पसन्द था। चीनी -दूध वाली चाय मैं तब पीती थी, जब किसी बात को सेलिब्रेट करने का दिल करता था ।

दूर आसमान में आवारागर्दी करते बादलों के सफ़ेद टुकड़ों से आकृतियाँ बनाने में मैं इतना मशगूल थी कि मोबाइल की घण्टी ने भी मुझे चौंका दिया। जाने क्यों पहला ख़याल एकदम से यही आया कि ये तुम्हारा फोन होगा...हैप्पी एनीवर्सरी कहने को...तेरह फ़रवरी जो थी...। आज ही के दिन तो हम मिले थे न...। पर शाम्भवी का फोन देखकर एक ठण्डी साँस निकल गई...। अब काहे की हैप्पी एनीवर्सरी...पन्द्रह दिन तो बीत चुके हैं सब ख़त्म हुए...।

पाँच सालों तक हम दोनों के बीच मीलों की ये दूरी उतनी कभी नहीं खली, जितना आज अखर रही थी। तुम पास होते, तो शायद कुछ बातें तय करने की गुंजाइश भी होती, पर तुम तो हर तरह से दूर हो चुके थे...। तन से तो हमेशा थे ही, अब तो मन भी मेरे पास नहीं रहा था ।

कोई और दिन होता, तो अपनी बचपन की सहेली शाम्भवी से पटर-पटर मैं कितनी लम्बी बातें कर लेती...जैसे तुमसे करती थी, पर आज दिल नहीं किया। उसने पूछा भी, पर तबियत ख़राब होने का बहाना करते हुए मैंने नकली मस्ती दिखाई और फिर जितना जल्दी फोन रख सकती थी, रख दिया...। न चाहते हुए भी मेरी आँख से दो बूँद गर्म आँसू निकलकर गालों पर बहते हुए कहीं खो गए...।

रॉकिंग चेयर पर आँख मूँदकर धीमे-धीमे झूलते हुए मुझे ये भी याद नहीं रहा कि अनछुई चाय बिल्कुल ठण्डी हो चुकी है, ठीक मेरी उम्मीदों की तरह...।

तुम जितनी तेज़ी से आए थे मेरी ज़िन्दगी में, उतने ही आहिस्ता से चले भी गए...। शाम्भवी ने जब हमारा परिचय कराया था, तब उस मुस्कराते चेहरे वाले लड़के से हाथ मिलाते वक़्त ये कहाँ सोचा था कि इन हाथों को ज़िन्दगी भर के लिए थामना चाहूँगी...। शाम्भवी तो जैसे ऑब्सेस्ड थी तुमसे...। समीर ये...समीर वो...सुनते-सुनते तुमसे ज़्यादा मिले बिना ही तुमको मानो बहुत जान गई। तुमसे जुड़ी हर बात सुनते हुए मेरे सामने हमेशा तुम्हारा वही मुस्कराता चेहरा आ जाता था...। जिस पार्टी में हम मिले थे, उसमें देखकर ही कोई भी ये बता सकता था कि तुम कितने पॉपुलर हो...। तुम्हारे साधारण से साँवले चेहरे पर भी एक अजब-सी कशिश थी...। सबसे तुम्हारा वह गर्मजोशी से मिलना, शालीनता भरी वह कम बोलने की आदत के बावजूद कितना कुछ कहती वे मुस्कराती आँखें...। अगर तुम्हें अच्छे से जानने वाली शाम्भवी तुम्हारी फ़ैन थी, तो क्या ग़लत था, तुम्हारे सम्मोहन से पहली ही मुलाक़ात में मैं भी कहाँ बची थी।

तुम तो नहीं पीते, पर उस पार्टी में कुछ अधिक पी चुके दो लड़कों से मैं बेहद असहज हो गई थी। एक लापरवाही से तुम टहलते हुए आए और बड़े अधिकार से मुझे अपने लिए कोल्ड-ड्रिंक लाने को बोल दिया था। सच कहूँ, उस पल को जब भी आँख बन्द करके देखती हूँ, आज भी उतना ही अच्छा लगता है।

एक बात बताऊँ ? वैसे मुझे पता है, तुम पहले से ही ये बात जानते हो, पर आज तुमसे कन्फ़ेस कर रही...। तुम्हारे क़रीब आने के बाद मैं कुछ ज़्यादा ही पजेसिव हो गई थी। तभी तो बाद में कभी शाम्भवी जब तुम्हारे बारे में बातें करती, मैं अन्दर से जल-सी जाती। उससे ईर्ष्या होती, वह जब चाहे तुमसे मिल सकती थी...और मैं...? मुझे तो अक्सर कई महीनों का इंतज़ार करना पड़ता, तब कहीं जाकर एक-दो दिनों के लिए हम मिल पाते...। कभी कभी गिल्ट भी होता था, इतना पजेसिव होना भी अच्छा नहीं न...। 

याद है, एक बार मैने मज़ाक-सा करते हुए तुम्हें अपनी इस फ़ीलिंग के बारे में बताया था। सब स्वीकारते हुए अन्दर से एक डर भी था...इतना जलनखोर देखकर तुमने मुझे ग़लत समझ लिया तो...? या फिर इरीटेट हो गए तो...? पर तुमने बेपरवाही से मेरी बात को हँसी में उड़ा दिया था ,"अच्छा है न तुम जेलेस होती हो...प्यार में ऐसा होना बहुत नॉर्मल है...।"

तुम्हारी आवाज़ की खनक से मुझे शक़ भी हुआ था, तुम मेरी इस हालत को शायद एन्ज्यॉय कर रहे थे। हो सकता है, बेआवाज़ हँस भी रहे हो...। दिल किया, सामने होते तो फोन तुम्हारे सिर पर पटक देती। मैं यहाँ जल-जल के मरूँ और तुम्हें मज़े आएँ...?

तुम्हारे लिए मेरे इस पज़ेसिवनेस के ज़िम्मेदार तो तुम खुद थे न...। अपने छोटे-बड़े, जाने कितने अधिकार तुमने मुझे दे दिए थे। मैं इस मामले में थोड़ा भी नखरा दिखाती और सामने तुम्हारा रेडीमेड जवाब होता... मुझे क्या, मेरा कुछ नुकसान हुआ, तो तुम जानना...। ठीक न...? अब इस लहरियादार क्वेश्चन मार्क वाले पॉज़ के बाद कौन होता, जो झक न मार लेता...? शाम की ऑफिशियल पार्टी में क्या पहनना है से लेकर सुबह के ब्रेकफास्ट में क्या खाओगे, सब तय करना मेरे जिम्मे था । ये तो ये, पर अक्सर की तुम्हारी वो ज़िदें...तौबा...! फलाँ-फलाँ काम तुम नहीं करोगी, तो मैं तो किसी हालत में नहीं करूँगा...। पता नहीं, अपनी बात मनवाने के लिए तुम इतने सख़्त कैसे हो जाते थे...।

 तुमसे मिलने तक मैं खुद को लेकर कितना कन्फ़्यूज़्ड थी। हर बात का गिल्ट लेना...मानो दुनिया में सुनामी और भूकम्प भी मेरी वजह से ही आते हों...। बात-बात पर आँसू निकल आना...। तुम्हारे सामने स्काइप पर ही पहली बार रोई थी, तो तुमको यूँ गम्भीर देखकर मैं थोड़ा सहम गई थी...। शायद बाकी मर्दों की तरह तुम भी इरीटेट हो गए हो...और मेरे शान्त होते ही तुमने पूछा था...आज नहाने का इन्तज़ाम हो गया न...? मेरी ट्यूबलाइट जलने तक तुम वैसे ही धीर-गम्भीर चेहरा लिये मुझे ताकते रहे थे, बस तुम्हारी आँखें हँस रही थीं...और मैं किसी खिसियानी बिल्ली की तरह खम्बा नोचते हुए लॉगआउट हो गई थी...।

दुनिया के सामने एक मैच्योर इन्सान तुम्हारे सामने पता नहीं कैसे किसी भी बात पर हँसने-रोने-रूठने वाली बच्ची बन जाती थी। तुम हमेशा मुझे सँभाल जो लेते थे...। गज़ब के मैच्योर थे तुम...अपनी धुन के पक्के...अपने काम में जुनून की हद तक डूब जाने वाले...। जब कभी मेरा फोन कटने के साथ मैसेज आता...आय एम बिज़ी...विल कॉल यू लेटर...मैं अपने मोबाइल पर तुम्हारी फोटो पर अपने फोटोशॉप के सारे हुनर इस्तेमाल कर लेती...। लेकिन तुम भी बड़े ढीठ हुआ करते...। न चिढ़ना, न लड़ना...बस एक स्माइली से काम चल जाता था तुम्हारा...। पर जब तुम  सामने होते, तो तुम्हारी ये क्यूट सी स्माइल भी कुछ न कर पाती और अपनी चिकोटियों से मैं तुम्हें तंग कर ही लेती। उसके बाद की पिलो-फ़ाइट में तुमसे हारकर जीतने की उस बाजीगरी खुशी को तुम क्या जानो समीर बाबू...। तुम्हारा ऐसा बचपना भी शायद सिर्फ मैंने ही देखा है न...?

तुम्हारे साथ के इन पाँच सालों में ऐसी छोटी-छोटी खुशियाँ तो मैंने बहुत इकट्ठा की हैं...। अब उन ढेर सारी तस्वीरों की बात ही देख लो...। तुम्हारी तो आदत थी न शुरू से...एक छोटा- सा रुमाल भी खरीदते, तो उसकी फोटो खींचकर मेरी मेल पर भेज देते...। मेरे लैपटॉप के एक फोल्डर में ऐसी हज़ारों तस्वीरें इकठ्ठा होती गईं...। तुम्हारा अधखाया बर्गर, तुम्हारा टूटा हुआ चश्मा...तुम्हारी फेंके जाने वाली चप्पल से लेकर तुम्हारे नए जूतों तक को उस एक फोल्डर ने अपने अन्दर छुपा रखा है...। पर जाने कब और कैसे उस फोल्डर में तस्वीरें जुड़ने की संख्या कम होती गई...। तुम्हारे साथ शेयर की हुई ऐसी अनगिनत बातें भी मेरे दिल के एक फ़ोल्डर में जमा होती थीं। इतनी दूर होने पर भी हम कब, कहाँ और किसके साथ हैं, कब खाना खाया और कब लंच का गोला मार दिया...सब पता रहती थीं। कभी साथ न रहने की कमी खली ही नहीं...।

पर सब दिन एक-से नहीं होते न...। अब जब मैं तुमसे तुम्हारी नई पिक्चर माँगती, तुमको वो बेहद बचकानी-सी ख़्वाहिश लगती...। तुम्हें टाइम-बेटाइम फोन करने पर मैसेज़ तो उसी तरह आते, पर स्माइली बनाना तुम भूलने लगे थे। उल्टे स्टॉप बिहेविंग लाइक अ चाइल्ड सुनकर मैं जाने कितनी बार फोन ही स्विच ऑफ़ करके रखने लगी। तुम शायद कभी नहीं जान पाओगे कि अक्सर दिन में कई बार मैं मोबाइल उठाकर देखती और फिर पहले से भी ज़्यादा बुझे मन से वापस भी रख देती...। काम की मसरूफ़ियत तुम्हारी याददाश्त पर भी असर डालने लगी थी, तभी तो लंदन से रानो दी के लाए स्वेटर और पापा के नए फ्लैट बुक कराने के बारे में तो तुम बताना ही भूल गए थे...। उस दिन पूरा फोल्डर हार्ड डिस्क में ट्रांसफर करने से पहले पता नहीं क्यों मैंने हरेक तस्वीर को गौर से देखा था...।

हम दोनों ही परिवार के साथ रहते थे, पर एक अर्से बाद पता नहीं तुम अपने घर के ज़्यादा आदर्श बेटे बन गए या मैं ही अधिक नालायक बेटी थी...। तभी तो अक्सर तुम मुझे समझाना शुरू कर देते... अरे यार...ये क्या बात हुई कि मुझसे बात करते हुए ही तुमको अच्छी नींद आ सकती है...। ज़रूरी नहीं है कि रोज़ रात को हम इतनी देर तक बात करें ही...। अच्छी किताबें पढ़ो...मूवी देखो...गाने सुनो...। खुद ही सो जाओगी...।

मैंने हमेशा की तरह बिना बहस किए तुम्हारी बात मान ली थी और कई रातों तक करवटें बदलते हुए रात काट ली...।

मुझे अगर तुमसे बातें किए बिना नींद नहीं आती थी, तो मेरे जगाए बिना तुम्हारी आँखें नहीं खुलती थीं। रात में मुझे सोते हुए चाहे जितनी देर हो जाती, तुम्हारे बताए टाइम पर मैं हमेशा पूरी सजगता से जाग जाती। जिन दिनों हमने रात की बातें बन्द की, उस समय भी तुम्हारे मैसेज से मुझे अगले दिन के अलार्म का पता चल जाता। सुबह जब तक तुम फोन उठाकर मुझे आश्वस्त न कर देते, मैं लगातार तुमको फोन मिलाए जाती...। आखिरकार मेरे इस इम्पल्सिवनेस से भी तुम इरीटेट हो गए थे, "क्या यार...! इतना जीना भी हराम न करो...। एक बार रिंग मार दी, काम ख़तम...। वैसे अब मैं भी अपना अलार्म लगाने लगा हूँ, तो फ़ालतू में मेरी वजह से अपनी नींद न खराब किया करो...। खुद जागने लगा हूँ अब...।"

 मैं बिना बात पड़ी इस डाँट से हमेशा की तरह रुआँसी हो गई तो तुम नर्म पड़ गए थे, पर इस बार काँटा कहीं गहरे धँसा था। सुबह तुमसे पहले जागने के बावजूद मैं तुम्हें जगाने से कतराने लगी थी। उन दिनों मन अजीब-सा उचाट रहने लगा था। मेरा कितना कुछ अनकहा सुना करते थे तुम...। फिर क्यों तुम भी नहीं जान पाए कि सुबह की वह कुछ पलों की गुड मॉर्निंग कॉल मेरे लिए दिन भर किसी टॉनिक का काम करती थी? रात की बेचैनी भरी नींद भी उस कॉल के बाद तरोताज़ा हो जाती थी।

जैसे जैसे वक़्त बीत रहा था, मेरी ज़िन्दगी मानो पीछे भाग रही थी...हम दोनों दिन-ब-दिन अजनबी होते जा रहे थे । अक्सर मुझे यह भी नहीं पता होता कि मेरी कौन सी बात तुमको ख़ुशी देगी और किस बात से तुम नाराज़  होगे...। तुम्हारे ऊपर तुम्हारे कैरियर का प्रेशर था, तो मेरे घरवालों की ओर से मेरी शादी की बेचैनियाँ थी...।

तुमको जब ये बात बताई थी मैंने, तुम कुछ देर बिल्कुल खामोश हो गए। मैं तो अब तुम्हारी ख़ामोशी को तुम्हारी आवाज़ से ज़्यादा पहचानने लगी थी...। मुझे पता था, तुम अपने सामने बस ऐंवेही किसी चीज  को ताकते हुए अपने में गुम हो गए होगे। एक हाथ से कान पर मोबाइल चिपकाए दूसरे हाथ की उँगलियों से कुछ आड़ा-तिरछा खींच रहे होगे...और जब मैं तुम्हारा नाम लूँगी, तुम जैसे किसी ध्यान से जागकर यूँ दिखाओगे जैसे उस दौरान कही गई हर बात तुमने सुनी हो...।

तुम मुझे कितना भी बहला लो;  पर सच तो यही था कि तुम अक्सर मेरी पूरी बात सुनते ही नहीं थे। हाँ-हूँ करने के बावजूद तुम्हारा ध्यान जाने कहाँ होता । मेरे कहे गए कुछ आखिरी शब्दों की चाभी से तुम पूरी बात का ताला खोल लेना चाहते थे...। खूब समझती थी मैं तुम्हारी चालाकी...।

सब कुछ समझने के बावजूद कभी ये नहीं समझ पाई कि दुनिया की हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है...हमारा रिश्ता भी एक्सपायर हो रहा था । उस दिन तुमको ऐसे हिचकिचाते हुए मैंने पहली बार देखा था...। सबसे पहले तो आश्चर्य इस बात से हुआ था कि तुमने अपने आप मुझे स्काइप पर आने को कहा, वरना ये तो मैं थी जो हमेशा विडियो चैट के लिए तुम्हारी मिन्नतें करती । अजीब सी खुशी हुई...साथ ही पता नहीं क्यों एक अनजाना डर भी लगा । शायद इसी को `सिक्स्थ सेंस’ कहते हैं ।

तुम्हें सामने देखकर हमेशा की तरह मैं चहक रही थी, पर तुम सपाट थे । मेरे टोकने पर तुम मुस्कराए तो, पर उस पल वो मुस्कान सिर्फ तुम्हारे होंठों पर ही टिकी रही...आँखों तक गई ही नहीं । मुझे तभी शक़ हुआ था...ठीक हो न तुम...? जवाब में तुमने सिर्फ `हूँ’ किया था, गर्दन की हल्की जुम्बिश के साथ...।

तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं बेवजह अजीब- अजीब मुँह बना कर तुम्हें हँसाने की कोशिश कर रही थी कि तुमने सुनो तो सुनिधि कहकर मेरे बचपने पर एकदम स्टॉप लगा दिया । जाने कितने अरसे बाद तुमने मेरा पूरा नाम लिया था । सुधि फिर से तुम्हारे लिए सुनिधि हो गई, कुछ तो गड़बड़ थी ।

मैं एकदम चुप होकर टुकुर टुकुर तुम्हारा मुँह ताक रही थी, उधर तुम फिर नज़रें चुराए मेज़ पर जाने कौन सी कलाकारी कर रहे थे । अबकी बार मैं इरिटेट हो गई...चलो यार, बाद में बात करते हैं...। जैसे कुछ याद आया हो, कुछ इस तरह तुमने एक साँस में ही विदेश में लगी अपनी नई नौकरी और उसे ज्वाइन करने के अपने निर्णय, दोनों के बारे में बता डाला ।

मैं हैरान भी थी और हर्ट भी...। किसी की याददाश्त क्या इतनी खराब हो सकती है कि वह इतनी बड़ी बात बताना भी भूल जाए...? कब तुमने अप्लाई किया, कब तुमको नौकरी मिली और कब तुमने सारी फोर्मलिटी पूरी कर डाली, ये सब बताना तुम्हारे लिए ग़ैर-ज़रूरी हो गया ?

उस एक पल में ही मुझे लगा, मैं तुम्हें पहचानती ही नहीं...जानना तो बहुत दूर की बात है...। तुम्हारी शायद अपनी मजबूरियाँ रही हों, पर किसी अजनबी के साथ आगे के सफ़र की उम्मीद करना मेरी मजबूरी नहीं थी ।

 मुझे तुम्हारी सफाई सुनने में कोई इंटरेस्ट नहीं था । सच कहूँ तो तुम्हारी किसी बात में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं  बचा था । इसलिए ये भी नहीं जानती कि किसी समझदार, मैच्योर इंसान की तरह अलविदा कहने के साथ मुझे लॉगआउट होते देख तुमको कैसा लगा होगा...।

डोरबेल बजी तो मैं अपने ख़्यालों से बाहर आ गई...इस समय तो मेड ही होगी । ब्लैक टी का कप सिंक पर रख मैं दरवाज़ा खोलने बढ़ गई...। आज इसी को बोल देती हूँ, एक कप बढ़िया दूध और शक्कर वाली चाय बना के पिला दे...।

सम्पर्कः एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र), priyanka.gupta.knpr@gmail.com, मो. 9919025046

Jan 1, 2022

बालकथाः चालाक लोमड़ी और मूर्ख भालू

 स्पेनी लोककथा पर आधारित
-प्रियंका गुप्ता

किसी जंगल में अपने दो छोटे बच्चों के साथ टिक्की नाम की एक लोमड़ी रहती थी । उसी जंगल में उसका एक मित्र भी था-मिक्की भालू । टिक्की जितनी अधिक चालाक थी, मिक्की उतना ही मूर्ख ।

वे लोग लगभग रोज ही मिलते थे । पर एक बार ऐसा हु‌आ कि क‌ई दिन बीत ग‌ए और मिक्की टिक्की से मिला ही नहीं । सो उसका हालचाल जानने के लि‌ए टिक्की उसके घर पहुँच ग‌ई । वहाँ उसने मिक्की को ढेर सारा शहद एक ड्रम में रखते हु‌ए पाया । इतना सारा शहद देख टिक्की का मन ललचा गया । असली बात पूछना भूल वह मिक्की से चिरौरी करने लगी, “अरे मित्र, तुम्हारे पास तो खूब सारा शहद है, इतने शहद का तुम करोगे क्या ? ऐसा करो, इसमे से आधा मुझे दे दो ।”

पर ये क्या? मिक्की ने तो साफ़ इंकार कर दिया, “नहीं टिक्की, ये शहद मैं तुम्हे नहीं दे सकता। क‌ई दिनो की लगातार मेहनत के बाद तो मैं इस जाड़े के लि‌ए शहद इकट्ठा कर पाया हूँ । तभी तो इतने दिनो से तुमसे भी मिलने नहीं आ पाया । अगर मैं तुम्हे शहद दे दूँगा, तो जाड़े में मैं क्या खा‌ऊँगा ?”

टिक्की को बुरा तो बहुत लगा;  पर उसने जाहिर नहीं किया । उस समय तो वह इधर-उधर की बातें करके वापस घर चली आ‌ई;  पर उसका पूरा दिमाग इसी उधेड़बुन में लगा था कि किस तरह वह शहद का ड्रम हथिया सकती है। वह चाहती थी कि उसे मेहनत भी न करनी पड़े और इस जाड़े में उसे भूखा भी न रहना पड़े ।

काफ़ी सोचने के बाद आखिर टिक्की को एक तरकीब सूझ ही ग‌ई । दूसरे दिन वह मिक्की के घर रोते हु‌ए पहुँची और कारण पूछने पर बोली, “भा‌ई मिक्की, तुम तो जानते ही हो कि नदी के उस तरफ वाले जंगल में मेरी बहन रहती है । आज सवेरे ही मेरे पास ख़बर आ‌ई है कि उसके पति की मृत्यु हो ग‌ई है । मेरा इस वक़्त वहाँ जाना बहुत जरूरी है, पर समझ नहीं आ रहा कि अपने बच्चों को किसके सहारे छोड़ कर जा‌ऊँ । मुझे बस एक तुम्हारा ही आसरा है । अगर तुम कुछ दिनों के लि‌ए मेरे घर पर रुककर उनकी देखभाल कर सको, तो बहुत मेहरबानी होगी । मैं तुम्हारा अहसान कभी नहीं भूलूँगी ।” इतना कह कर टिक्की फिर फूट-फूटकर रो पड़ी ।

टिक्की को इस तरह रोते देख कर मिक्की को उसपर बड़ी दया आ‌ई। वह उसके घर जाकर उसके बच्चों की देखभाल करने को राजी हो गया। टिक्की अपनी योजना सफ़ल होते देख मन-ही-मन बड़ी खुश हु‌ई और मिक्की को शीघ्र अपने घर पहुँचने को कह, उसे धन्यवाद देती वहाँ से चली ग‌ई।

दिखाने को तो टिक्की दूसरे जंगल की ओर निकल ग‌ई;  पर असल में वह थोड़ी दूर जाकर मिक्की की नज़र बचाकर घने पेड़ों के पीछे इस तरह से छुप ग‌ई कि वह तो मिक्की को देख सके; पर मिक्की उसे न देख पा‌ए। कुछ देर ही बाद उसने मिक्की को अपने (टिक्की के) घर की ओर जाते देखा। कुछ देर और वहीं छुपी रहने के बाद वह सीधे मिक्की के घर पहुँच ग‌ई। वह निश्चिंत थी कि अपने वायदे का पक्का मिक्की उसके वापस पहुँचने तक वहीं रहने वाला था। सो पूरे दिन आराम करने के बाद टिक्की ने रात होने पर मिक्की के घर से शहद का बर्तन निकाला और उसे दूर एक सुरक्षित स्थान पर छिपा दिया, जिसे उसने इस मकसद के लि‌ए पहले से ही देख रखा था। उसके बाद वह निश्चिंत होकर वापस आकर सो ग‌ई।

दूसरे दिन वह सुबह होते ही अपने घर वापस पहुँच ग‌ई। उसे इतनी जल्दी वापस आया देखकर मिक्की हैरान रह गया, “अरे टिक्की, इतनी जल्दी क्यों लौट आ‌ई? सब ठीक है न?”

अरे कहाँ, मुझसे तो अपनी बेचारी बहन का दुःख देखा ही नहीं गया। फिर यहाँ की भी चिन्ता थी, इसीलि‌ए मैं जल्दी ही लौट आ‌ई।” टिक्की ने बनावटी दुःख से कहा तो मिक्की थोड़ी देर उसके पास रुक उसे सांत्वना देकर वापस आ गया।

घर लौटने पर जब उसने अपना सारा शहद गायब देखा, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। इतने दिनों की अपनी सारी मेहनत बेकार देखकर वह बेहद दुःखी होने के साथ-साथ गुस्से से भी भर उठा। अचानक उसे लगा, हो-न-हो यह करतूत टिक्की की ही है, जो अपनी बहन के घर जाने का बहाना बना उसे बुद्धू बना ग‌ई। ऐसा विचार आते ही वह तुरन्त टिक्की के घर जा पहुँचा, “मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी टिक्की...मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि तुम मेरे साथ ऐसा विश्वासघात कर सकती हो। मुझे यहाँ अपने घर बैठा दिया और खुद मेरा सारा शहद चुरा लिया। सीधे से मेरा सारा शहद वापस कर दो वरना मैं शेर राजा के पास जा रहा हूँ तुम्हारी शिकायत करने।”

टिक्की तो पहले से इस परिस्थिति के लि‌ए तैयार बैठी थी। अतः बिना घबरा‌ए बड़े प्यार से बोली, “कैसी बात करते हो मित्र, मैं भला ऐसा पाप क्यों करूँगी? मैंने तुम पर अपने बच्चों के लि‌ए भरोसा किया और तुम मुझपर ऐसा इल्ज़ाम लगा रहे हो। क्या यही हमारी मित्रता है?” कहते हु‌ए वह रोने लगी।

टिक्की को इस तरह रोते देख मिक्की घबरा गया, “रो मत, मेरा यह मतलब नहीं था। आखिर तुम्ही बता‌ओ मेरा सारा शहद कहाँ जा सकता है?”

अरे और कहाँ...?” अपने आँसू पोछते हु‌ए टिक्की ने पासा फेंका, “तुम इतने तो भुलक्कड़ हो, हो सकता है तुम ही किसी दिन शहद खाकर भूल ग‌ए हो।”

मिक्की को अब भी यक़ीन नहीं हो रहा था। ऐसा कैसे हो सकता है? अगर उसने शहद खाया होता, तो उसे जरूर याद होता। इसी लि‌ए वह अब भी राजा से शिकायत करने को तैयार था। यह देख कर टिक्की मन-ही-मन घबरा ग‌ई। सो उसे समझाते हु‌ए बोली, “ऐसा करो, एक बार मेरी बात मान लो। इस जंगल में एक ऐसा पेड़ है, जिसके नीचे सोने से तुमने जो खाया होता है, उसका पता चल जाता है। आज रात को एक बार उस पेड़ के नीचे सोकर देखो, फिर कल सुबह चले जाना राजा के पास। मैं खुद तुम्हारे साथ चलूँगी फरियाद लेकर।”

टिक्की की बात सुनकर मिक्की सोच में पड़ गया। ठीक है, इसमे हर्ज़ ही क्या है। आज नहीं तो कल शिकायत कर लेगा, सो वह टिक्की की बात मान गया।

रात को मिक्की टिक्की के बता‌ए पेड़ के नीचे जाकर सो गया। मिक्की तो गहरी नींद सो गया;  पर उसे पता नहीं था कि टिक्की भी वहीं छुपी उसे देख रही है। उसे यूँ सोता देख टिक्की ने अपनी छुपा‌ई जगह से थोड़ा शहद लाकर उसके मुँह पर धीरे से मल दिया और वापस अपने घर जाकर सो ग‌ई।

सुबह जब मिक्की सोकर उठा तो अपने मुँह पर शहद लगा देख बहुत शर्मिन्दा हु‌आ। वह सीधे टिक्की के घर पहुँचा और उसपर शक करने के लि‌ए उससे माफ़ी भी माँगी, साथ ही उसे धन्यवाद भी दिया कि उसने राजा के पास झूठी शिकायत पहुँचाने से उसे बचा लिया।

मिक्की के जाने के बाद टिक्की कुछ देर तो उसकी मूर्खता पर हँसती रही, फिर अपनी छुपा‌ई जगह से सारा शहद घर ले आ‌ई। एक तरफ़ मिक्की फिर से शहद जुटाने की मेहनत करता रहा, दूसरी तरफ़ धूर्त टिक्की मजे से शहद की दावत उड़ाती रही।

सच है, धूर्त मित्र का यूँ विश्वास करने वाले मूर्ख का यही हाल होता है।

सम्पर्कः एम.आ‌ई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना सं-एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र), मोबाइल- 9919025046, email- priyanka.gupta.knpr@gmail.com