मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label अविनाश वाचस्पति. Show all posts
Showing posts with label अविनाश वाचस्पति. Show all posts

Dec 14, 2013

चूहों से पंगे लेना संगीन अपराध

   चूहों से पंगे लेना संगीन अपराध

        - अविनाश वाचस्पति

 देख चुनावों का असर, चूहे मस्त दिखाई दे रहे हैं। अब उन्हें नहीं,उनकी वजह से इंसान को जान के लाले पड़े हुए हैं। आप सोच रहे होंगे कि इसमें लाल रंग की कौन-सी बात है। सातवें वेतन आयोग का गठन देर-सवेर तो होना ही था, सरकार ने देर नहीं की और सवेरे ही कर दिया। पर इससे चूहे क्यों खुश होने लगे। दरअसल चूहों की अँगड़ाई की वजह सातवें वेतन आयोग की घोषणा नहीं है, यह झुनझुना तो बजना ही था, सो बजने लग गया है। सभी सरकारी कर्मचारी रात के अंधेरे में भी उल्लुओं की माफिक अँधेरे में भी नज़रें गड़ाए उलटे लटक कर स्वहित को सर्वोपरि स्वीकारते हुए उल्लू धर्म का निर्वाह कर रहे होते हैं।
मैं यहाँ पर चुनावों की वजह से चूहों को मिलने वाली खुशी की बात कर रहा हूँ। आप सोच रहे होंगे कि भला चुनावों से चूहे क्यों खुश होने लगे। कुतरने का मौका तो उन्हें यूँ ही खूब मिलता रहता है फिर भी चाहकर वे नेताओं को कुतर नहीं पाते हैं। चूहे नेताओं की जेबों में बलात् घुसकर कुतरने की मंशा पालते हैं, पर सुरक्षा घेरे के कारण सफल नहीं हो पाते। वैसे भी कुत्ते, बिल्ली पालने के लिए सब तैयार रहते हैं और चूहों को पालने से सब परहेज करते हैं।
आपने पढ़ी है या नहीं पर मैंने खूब ध्यान से पढ़ी है कि चूहों को पकडऩे पर जेल हो सकती है; जबकि बलात्कारियों पर सरकार अभी तक इतनी सख्ती नहीं कर पाई है। मैं अपने लैपटॉप को गतिशील रखने के लिए माउस नामधारी चूहे पर भरोसा करता हूँ; क्योंकि मुझे उँगली या अँगूठा करना कभी पसंद नहीं रहा है, विसंगतियों को भी मैं सीधी उँगली से ही ट्रीट करता हूँ वहाँ भी टेढ़ी उँगली करना मुझे अच्छा नहीं लगता। खबर के मुताबिक चूहों को पकडऩे के लिए 'वन्यजीव संरक्षण संशोधित कानून, 2013 में दंड का प्रावधान कर दिया गया है, जिसके तहत आवारा पशु भी वन्य जीव की श्रेणी में शुमार किए जाएँगे। उन्हें जान से मारने और डराने की बात अपने दिमाग से निकाल दीजिए। यह घोषणा ऐन चुनावों के वक्त पर की गई है जिससे चूहों में जश्नी खुमार तारी हो गया है। मैंने खुद अपने घर में लैपटाप और डेस्कटाप के माउस रसोईघर के चूहों से इस बाबत मंत्रणा करते देखा है पर उन्हें टोकने की मेरी हिम्मत नहीं हुई कि खफा होकर वे न जाने किस दफा में मेरे खिलाफ़ एफ़आईआर पुलिस में दर्ज करवा दें।
चाहे उन्हें वोट डालने का हक नहीं मिला पर इंसान द्वारा उन्हें पकड़ने, छेड़ने और मारने और तो और पिंजरा दिखलाने के अधिकार तक पर रोक लगा दी गई है। इससे अधिक चूहों के लिए खुशी की बात और क्या हो सकती है। अभी तक तो वे सिर्फ साहसी थे, पर अब उन्हें दुस्साहसी बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। अब तक केवल महिलाओं की ही चूहे को देखते ही घिग्घी बंध जाया करती थी ; पर अब पुरुष और नेताओं में भी इनके कारण भय का माहौल व्याप्त हो गया है। वजह साफ है कि अब वे नेताओं के कुर्ते में घुसकर उधम मचाने से बाज नहीं आएँगे और उनकी तूती वहाँ पर भी बोला करेगी।
श्रीगणेश जी जैसे देवता तक उन्हें सम्मान देते आए हैं। कम्प्यूटर के जनक ने उन्हें कम्प्यूटर के साथ जोड़कर इनके रुतबे में जो बढ़ोतरी की थी, रही सही कसर इस अध्यादेश से पूरी हो गई है। इसी वजह से पिंजरे की बिक्री, इन्हें मारने और भगाने वाली दवाई की सेल में घनघोर गिरावट आई है। ऐसे में जबकि देश आर्थिक संकट के दौर में है, इससे देश की अर्थव्यवस्था पर संकट बढ़ गया है। चूहों की आज़ादी में खलल डालना अपराध की श्रेणी में जुड़ गया है; इसलिए सावधान रहिएगा और कोई गलती अनजाने में भी मत कर बैठिएगा, वरना इसका खमियाजा ताउम्र भुगतते रहेंगे आप। इस पूरे मामले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है,नि:संकोच लिखिएगा।

सम्पर्क: साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्त नगर, नियरईस्ट ऑफ कैलाश,नई दिल्ली - 110065     Email-nukkadh@gmail.com

Dec 18, 2012

व्यंग्य



मच्छर से मुन्नाभाई की चैटिंग

  - अविनाश वाचस्पति
कसाब को काटने वाला मच्छर ऑनलाइन था। वह फेसबुक पर मेरे साथ चैटिंग में आया। लीजिए आप भी होइए मच्छर से चैटिंग के बहाने कई हकीकतों से रूबरू
मच्छर: मुन्नाभार्ई सलाम
मुन्नाभार्ई: मैं सबका हो सकता हूं किंतु मच्छर का भाई होना मुझे गवारा नहीं है।
मच्छर: किंतु मैंने तो उसको काटा है जिसने मुंबई में आतंकी वारदात करके समूचे देश को हिला दिया था।
मुन्नाभाई: देश को कोई नहीं हिला सकता, इतना मजबूत देश है मेरा। इसे आज तक घपले और घोटालों में संलिप्त नेता तक नहीं हिला पाए तो उस आतंकी कसाब की क्या मजाल।
मच्छर: हिलाने से मेरा मतलब नुकसान पहुँचाने से था।
मुन्नाभाई: नुकसान तो इंसान को और पूरी मानव जाति को तुम पहुँचा रहे हो। तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो सदियों से तुम उसके खून के प्यासे बने हुए हो और नई-नई तरह की बीमारियों के वायस बन रहे हो।
मच्छर:  खून तो मेरी खुराक है।
मुन्नाभाई: खून आजकल के सत्ताधारी नेताओं की भी खुराक है। जबकि वे मच्छर नहीं हैं। वे जनता के वोट चूसने के लिए फेमस हैं।
मच्छर: मैंने देखा कि सरकार कसाब को फाँसी पर लटकाने में बे-वजह की टालमटोल कर रही है इसलिए मैंने उसे काटने का फौरी एक्शन लिया।
मुन्नाभाई: फौरी तो तुम ऐसे कह रहे हो, मानो बीते कल उसने वारदात की और अगले दिन तुमने उसे काट लिया। कसाब तो जेल में रहकर खूब मौज ले रहा है।
मच्छर: मेरा काटा मौज ले ही नहीं सकता। उसे तो अपनी जान तक के लाले पड़ जाते हैं। बुरी तरह से उसकी खून के प्लेटलेट्स गिर जाते हैं।
मुन्नाभाई: लेकिन कसाब की गर्दन तो तुम्हारे काटने से भी नहीं कटी।
मच्छर: क्योंकि खबर बनाकर तुम्हारे भाइयों ने फिर से उसकी जान बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है
मुन्नाभाई: इस सृष्टि पर भाई ही तो भाई का सगा दुश्मन है।
मच्छर:  लेकिन मच्छर, मच्छर का दुश्मन नहीं, हितैषी होता है। काश, इंसान मच्छरों से यह गुण सीख पाता। सामूहिक स्वर में मच्छर गान गाता।
मुन्नाभाई: सीखने के लिए जब बुराईयाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं तो कोई क्यों अच्छाइयों और सच्चाइयों का बोरिंग पाठ पढ़े और सीखे।
मच्छर: मच्छर प्रजाति की लोकप्रियता में अभिनेता नाना पाटेकर के संवादात्मक योगदान को कोई मच्छर कभी नहीं भूल सकता।
मुन्नाभाई: सो तो है उस पर तुर्रा यह भी है कि न तो किसी इंसान ने और न किसी हिजड़े ने ही नाना पाटेकर के संवाद का विरोध किया।
मच्छर: वह दिन और आज का दिन है, हमारी रातें फिर गई हैं और हमारे जलवे निराले हैं, आजकल हम दिन में रक्त चूसने का शगल कर रहे हैं।
मुन्नाभाई: किस मुगालते में जी रहे हो तुम मच्छर महाशय। इंसान तुम्हारी प्रजाति के खात्मे के लिए सदैव युद्ध स्तर पर लगा रहेगा।
मच्छर:  लेकिन हमें नष्ट करना, दुष्ट मानव के बस का नहीं है। अगर ऐसा होता तो आज मैं जिंदा न होता।
मुन्नाभाई: इसका मतलब मच्छर और कसाब को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। दोनों ही अपने कारनामों के कारण बुरी तरह लोकप्रिय हैं।
मच्छर: अपनी-अपनी किस्मत है।
मुन्नाभाई: क्या खाक किस्मत है, मेरा भी तो खूब नाम है। मेरे कारनामे सबको मोहित करते हैं। तुम्हें भी किया है इसलिए तो तुम मुझसे चैटिंग करने फेसबुक पर नमूदार हुए हो।
मच्छर: यह मैं स्वीकारता हूँ।
मुन्नाभाई: किंतु मूर्ख मच्छर, कसाब को तो किसी सामान्य मच्छर ने ही काटा था। फिर उसे डेंगू कैसे हो सकता है
मच्छर: जानता हूँ, इस खबर को उड़ाने में भी किसी धूर्त नेता का ही हाथ है जो इस खेल में भी घपला करके नोट कमाने में जुटा हुआ है।
मुन्नाभाई: तुम मच्छर हो या किसी खुफिया एजेंसी के एजेंट अथवा खुलासामैन की तर्ज पर खुलासामच्छर।
मच्छर: जो चाहे मान लो। पर यह भी जान लो कि अभी तक मच्छरों के किसी गैंग ने इस कारनामे की जिम्मेदारी नहीं ली है। फिर भी उसके सुरक्षा बंदोबस्तों से इस मामले में घोटालों का संदेह जरूर जाहिर हुआ है।
मुन्नाभाई: तुम्हें क्या लगा था कि कसाब के रक्त की जानलेवा चुसाई करने पर तुम्हें देशभक्त मान लिया जाएगा अथवा किसी राष्ट्रीय उपाधि यथा पद्ममच्छरश्री, पद्ममच्छरविभूषण, पद्ममच्छरशिरोमणि इत्यादि से नवाजा जाएगा। जब आज तक शहीद भगतसिंह तक को कई ऐरे-गैरे स्वयंभू संगठन शहीद और देशभक्त नहीं मानते हैं तो तुम्हें कौन तवज्जो देगा।
मच्छर:  यह तो मैं भी जानता हूँ  कि कसाब को जिंदा रखने के पीछे देशी-विदेशी राजनीतिक सौदेबाजियाँ हैं। उसे जानबूझकर जिंदा रखा गया है। उसके जिंदा रखने से कई मलाई कूट रहे हैं।
फिर भी एक आखरी कोशिश मैंने की है। क्या मच्छर जन-जन और देशहित के अच्छे कार्य करने की कोशिश नहीं कर सकते, आखिर वे भी इस देश की हवा में साँस लेते हैं। यहाँ की जनता का रक्त चूसते हैं। उन्हीं से हमारी रोजी रोटी मतलब खून की प्यास बुझती है।
मुन्नाभाई: इस तथ्य से परिचित होने पर भी तुमने कसाब को मारने की जुर्रत की
मच्छर:  मैं यह भी जानता हूँ कि किसी को भी मारना किसी भी राज्य की पुलिस के लिए सबसे आसान कार्य है। वह किसी को भी निरपराध और मासूमों को मौत के घाट उतार सकती है। फिर वह उस खूनी घाट के आस-पास न तो दिखाई देगी और अगर दिखाई देगी तो कह देगी कि उसे तो खून होता दिखाई नहीं दिया है। कई बार तो मरने वाले का अता-पता ही नहीं मिलता और पुलिस तो वहाँ से लापता हो जाती है। आप इसे अता-पता लापता फिल्म की कहानी मत समझ लीजिएगा।
मुन्नाभाई: अता-पता लापता मतलब तुम फिल्मों के ग़ज़ब के शौकीन हो।
मच्छर:  फिल्म हॉल के अँधेरे में भी हमें कई शिकार मिलते हैं। इस बहाने हम फिल्में भी देख लेते हैं।
मुन्नाभाई: फिर तुमने सबसे सुरक्षित जेल में सेंध लगाकर शिकार ढूँढने की गुस्ताखी क्यों की, जबकि इस शाँतिप्रिय देश में किसी अपराधी का जिंदा रहना कोई मुश्किल काम नहीं है। तुमने कसाब को काटकर यूँ ही जान का जोखिम लिया है मच्छर। वह तुम्हारे चपत मारने में सफल हो गया होता तो शहीद हो गए होते और तुम्हारा कोई नामलेवा भी नहीं मिलता। तुम्हारे इस कारनामे से न तो देशी और न ही विदेशी मच्छर समुदाय का कोई भला होने वाला है।
मच्छर: लेकिन जो मैं जानता हूँ , उसे तुम नहीं जानते मुन्नाभाई। शुद्ध पानी से जीवन पाने वाले लोकप्रिय डेंगू मच्छर का जनता को डर दिखला-दिखला कर नगर निगम के कर्मचारी अवैध वसूली करने में इस हद तक लिप्त हैं कि तुम्हें आश्चर्य होगा, निगम इस बात के लिए कटिबद्ध है कि कहीं पर भी साफ पानी खुला नहीं दिखाई देना चाहिए, नहीं तो हमें पनपने के लिए माहौल मिल जाता है। इस तथ्य की आड़ में निगम के जाँच दस्ते किसी की भी रसोई में घुस जाते हैं और जहाँ उन्हें पीने का साफ पानी अनढका मिल जाता है, या किसी गिलास में पिए पानी की बची हुई एक बूँद भी दिखलाई दे जाती है तो वे उसका चालान काटने के लिए कमर कस लेते हैं और कुछ दक्षिणा हासिल करके छोड़ देते हैं। निगम के कर्मचारी इस बहाने लोगों से अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला भी ले रहे हैं। उनकी इस ज्यादती की कहीं अपील भी नहीं सुनी जा रही है।
मुन्नाभाई: यह इस मुल्क की विडंबना है कि जिस कसाब को तुमने मारना चाहा सरकार ने उसके चारों और डॉक्टरों की फौज तैनात कर दी। अब इसमें भी डॉक्टरों और दवाइयों के लाखों के बिल एडजस्ट किए जाएँगे और घोटाला प्रधान भारत देश में घपले संपन्न होते रहेंगे। अगर तुम आम आदमी को काटते रहो तो सरकार को इस बहाने घोटाले करने की आजादी मिली रहेगी।
मच्छर: लेकिन मुझे कोई सम्मान ...
मुन्नाभाई: अगर तुम्हारे मन में सचमुच किसी राष्ट्रीय सम्मान को पाने की आकांक्षा जोर मार रही है तो आम आदमी के हिमायती खुलासामैन को काट लो, तुम्हें निश्चित तौर पर सम्मानित कर दिया जाएगा। इस सम्मान समारोह के लिए सरकार गणतंत्र दिवस का इंतजार भी नहीं करेगी और दीपावली पर्व पर ही तुम्हें सम्मानित कर आतिशबाजी चलाने को अपराध घोषित कर देगी। जिससे तुम्हारी मच्छर प्रजाति उस दिन पटाखेबाजी से पैदा होने वाले धुँए के असर से सुरक्षित रहे।
मच्छर: बात तो तुम्हारी दमदार है।
मुन्नाभाई: पिछले दिनों एक कानून प्रिय मंत्री पर तुम्हारी खून चूसने की आदत का असर देखा गया और उसने खुलासामैन को, उसका लहू पी जाने का डर दिखलाकर डराने की पुरजोर कोशिश की। मुझे नहीं लगता कि उस वारदात में तुम्हारा कोई संगी साथी अथवा नाते रिश्तेदार मंत्री के साथ मिला हुआ होगा। परंतु विश्वास न सही तुम्हारे ऊपर मंत्री के साथ मिलीभगत का संदेह तो किया ही जा सकता है। तुमने कसाब को काटकर सबूत मिटाने की धृष्टता की है जिसके लिए पड़ोसी देश चाहे तुम्हें शहीद का दर्जा दे दें किंतु अपना देश तुम्हारे इस कुकृत्य की निंदा ही करेगा।
मच्छर: ऐसा क्या।
मुन्नाभाई: तुम जानते तो हो कि आम आदमी तुम्हें देखकर ताली भी बजाता है तो तुम्हारा स्वागत करने के लिए नहीं, अपितु तुम्हें जान से मारने के लिए, चाहे तुम यह सोचकर आनंदित होते रहो कि वह तुम्हारी इस कथित वीरता पर ताली बजाकर खुशी जाहिर कर रहा है।
मच्छर: मैं सोच रहा था कि आतंकवादी के खून के स्वाद का जायका अलग होता होगा। मैंने इसलिए भी यह रिस्क मोल लिया है।
मुन्नाभाई: मच्छर, यह तुम्हारी सोच नहीं, गलतफहमी है जिससे ग्रसित तुम अकेले ही नहीं हो। आजकल गलतफहमियों का दौर है, तुम भी उसके शिकार हो गए हो, तो इसके दोषी तुम नहीं, आजकल मौसम ही ऐसा है। मुन्नाभाइयों को इस देश में हाशिए पर रख दिया गया है, जिसके कारण देश की यह दुर्गति हुई है लेकिन हमारी बहुमूल्य सलाहों को मानता कौन है...
संपर्क: साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्त नगर, नियर ईस्ट ऑफ कैलाश, नई दिल्ली 110065  मो. 9213501292,                     Email- nukkadh@gmail.com

Sep 27, 2012

'सॉरी'हिन्दी दिवस पर अंग्रेजी बोली

- अविनाश वाचस्पति

प्रकाशक और अखबार छापने वाले हिन्दी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्य पर भेंट देते हैं। 

हिन्दी दिवस है हिन्दी का जन्मदिन। जिसे मनाने के लिए हम ग्यारह महीने पहले से इंतजार करते है और फिर 15 दिन पहले से ही नोटों की बिंदिया गिनने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। अध्यक्ष और जूरी मेम्बर बनकर नोट बटोरते हैं और उस समय अंग्रेजी बोल-बोल कर सब हिन्दी को चिढ़ाते हैं। हिन्दी की कामयाबी के गीत अंग्रेजी में गाते हैं। कोई टोकता है तो 'सॉरी' कहकर खेद जताते हैं। सरकारी कार्यालयों में हिंदी के लिए सितम्बर माह में काम करने पर पुरस्कारों का अंबार लग जाता है। जिसे अनुपयोगी टिप्पणियां, शब्दों के अर्थ-अनर्थ लिखकर, निबंध, कविताएं लिख-सुना कर लूटा जाता है। लूट में हिस्सा हड़पने के लिए सब आपस में घुलमिल जाते हैं। हिन्दी को कूटने-पीटने और चिढ़ाने का यह सिलसिला जितना तेज होगा, उतना हिन्दी की चर्चा और विकास होगा।
हिन्दी के नाम पर सरकारी नौकरी में चांदी ही नहीं, विदेश यात्राओं का सोना भी बहुतायत में है किंतु सिर्फ हिन्दी में लेखन से रोजी-रोटी कमाने वालों का एक जून की रोटी का जुगाड़ भी नहीं होता है, खीर खाना तो टेढ़ी खीर है। प्रकाशक और अखबार छापने वाले हिन्दी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्य पर भेंट देते हैं। गजब का सम्मोहन है कि लेखक इसमें मेहनत की कमाई का निवेश कर गर्वित होता है। किताबें अपने मित्र-लेखकों, नाते-रिश्तेदारों को फ्री में बांट-बांट कर खुश होता है कि अब उसका नाम बेस्ट लेखकों में गिन लिया जाएगा।
छपास रोग इतना विकट होता है कि लेखक मुगालते में जीता है, कि जैसा उसने लिखा है, वैसा कोई सोच भी नहीं सकता, लिखना तो दूर की बात है। बहुत सारे अखबार, पत्रिकाएं, लेखक को क्या मालूम चलेगा, की तर्ज पर ब्लॉगों और अखबारों में से उनकी छपी हुई रचनाएं फिर से छाप लेते हैं। इसका लेखक को मालूम चल भी जाता है किंतु वह असहाय सा न तो अखबार, मैगजीन वाले से लड़ पाता है और न ही अपनी बात पर अड़ पाता है। लेखक कुछ कहेगा तो संपादक पान की लाल पीक से रंगे हुए दांत निपोर कर कहेगा कि 'आपका नाम तो छाप दिया है रचना के साथ, अब क्या आपका नाम करेंसी नोटों पर भी छापूं।' उस पर लेखक यह कहकर कि 'मेरा आशय यह नहीं है, मैं पैसे के लिए नहीं लिखता हूं।' 'जब नाम के लिए लिखते हैं तब आपका नाम छाप तो दिया है, रचना के साथ।' फिर क्यों आपे से बाहर हुए जा रहे हैं और सचमुच संपादक की बात सुनकर लेखक फिर आपे के भीतर मुंह छिपाकर लिखना शुरू कर देता है। इससे साफ है कि हिन्दी का चौतरफा विकास होता रहेगा और हम सब राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी का जन्मदिन मना साल भर खुशी बटोरते रहेंगे।
संपर्क- साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल,  सन्त नगर, नई दिल्ली- 110065 
        मो. 9213501292  E mail nukkadh@gmail.com

Mar 23, 2012

होली, चुनाव और हाईटेकीय धमाल

- अविनाश वाचस्पति

इस बार होली हाई टेक होकर आई है। हाई टेक और चुनावी भी। इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनें कितने ही तरह के रंग उगल रही हैं। चुनावों से पहले ही उनका अलग तरह के रंग खौफ छाया हुआ है। वोटर के मन में शंका है कि वोट राम को दूंगा तो कहीं मशीन उसे श्याम के खाते फारवर्ड तो नहीं कर देगी, इसकी क्या गारंटी है।
चुनाव और होली। नेता भर रहे हैं वोटों से झोली। वाह जनाब वाह। हाथी ढक दिए गए हैं। परदे कस दिए गए हैं। फेंकने वाले तो परदे लगने पर भी तानों के रंग फेंक रहे थे। तानों के रंग कौन से गुब्बारे में भरे जाते हैं और कौन सी पिचकारियों से फेंके जाते हैं। इस बारे में चाइना वाले भी नहीं बतला पा रहे हैं। इस पर शोध कार्य जारी हैं, कुछ रोषपूर्वक कर रहे हैं और अधिकतर धौंस में आकर कर रहे हैं। बच्चे बचपने के दवाब में करके खुश हैं और मजा मार रहे हैं। इस बार होली हाई टेक होकर आई है। हाई टेक और चुनावी भी। इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनें कितने ही तरह के रंग उगल रही हैं। चुनावों से पहले ही उनका अलग तरह के रंग खौफ छाया हुआ है। वोटर के मन में शंका है कि वोट राम को दूंगा तो कहीं मशीन उसे श्याम के खाते फारवर्ड तो नहीं कर देगी, इसकी क्या गारंटी है। जब इस जमाने में वारंटी किसी चीज की नहीं है। गारंटियों वाले जमाने तो ईद का चांद हो गए हैं। गारंटी- वारंटी की बात भर कर लो तो मंगल पर दंगल हो जाता है। जब होली के रंग ही गारंटिड नहीं रहे हैं कि आप लाल रंग डालेंगे तो लाल ही करेंगे, हो सकता है वो थोबड़े को हरा रंग दें। इसे होली का पर्यावरण कहा जा सकता है। नतीजे काले, लाल या स्याह सफेद भी आएंगे। वे भी तो होली मनाएंगे। आखिर चुनावी नतीजों के बीच में होली का आ धमकना, अकारण ही तो नहीं है। गुब्बारे का फूटना अब स्टिकी रंगीय बम का कमाल है। जो अपने आप में अपनी मिसाल है।
कभी आपने एक मेंढक को दूसरे मेंढक को गुब्बारा मारते देखा है, देखा तो आपने एक विजयी नेता को पराजित नेता को गुब्बारा मारते भी नहीं होगा। चाहे वे ऊपर से हार जीत जाएं पर उनके भीतर विजयी भाव सदा समाया रहता है। उस समाने में रंग काले नहीं होते, वे रंगीन होते हैं। जो सबको मुग्ध करते हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि नीला रंग करेंसी नोटों की नीली छटा बिखेर रहा है, लाल रंग भी करेंसी नोटों की लालिमा निखार रहा है और हरा रंग तो हरियाली सदा बिखेरने में सदा से निपुण ही है। सबने मिलकर सब तरफ सिर्फ धन और धन की बरसात ही कर रखी है और इसमें नहाने को हर कोई बेताब है। जब धन लबालब दिखलाई दे रहा हो तो फिर कोई भी कहीं ओर क्यों जाएगा। सब एक बार होली बिना खेले तो काम चला लेंगे परंतु नोटों की झोली भरे बिना उनके मन और तन को चैन नहीं मिलेगा। गुझिया और कांजी के बिना भी एक बार होली मना लेंगे परंतु धन पाने के बिना वासना का ज्वार कैसे शांत होगा।
अब तो कम्प्यूटर का जमाना है। आप कौन से रंग की होली खेलना चाहते हैं। बस एक बार जाहिर करें, आपका मोबाइल वही रंग उगलने लगेगा. आप घबरा रहे हैं कि सामने वाले के ऊपर रंग डाला तो उसका मोबाइल भीग जाएगा, लेकिन वही मोबाइल आपको ऊपर रंग उगलने लगता है। जिसका बटन दबाए बिना सिर्फ सोचने भर से ही सामने वाले के चेहरे की रंगीन फेसबुक बन जाती है। आप उस मोबाइल से संदेश भेजते हैं, तो उसमें से बतौर संदेश रंग भरे गुब्बारे निकलते हैं और पूछते हैं, बोल मुझे भेजने वाले, मेरे स्वामी, मेरे बिल को भुगतने वाले, जल्दी बतला मुझे, किसके फेस को रंगीन करना है, या रंगहीन करना है। मैं दोनों काम करने में भली- भांति सक्षम हूं। आजकल जिन्न दीये को रगडऩे से नहीं, मोबाइल के बटन को क्लिकाने से, निकलता है। होली का यह हाईटेकीय स्वरूप मोबाइल और कम्प्यूटर के मेल से ही संभव हो पाया है। होली पर रंग इतने नहीं होते हैं, जितनी उनकी उमंगें हसीन होती हैं। भंग की तरंग उतना असर नहीं करती जितना असर कंप्यूटर की वायरस की जंग करती है। उमंगों में बसी तरंगें उन्हें सदा युवा रखती हैं। उमंगों पर बुढ़ापे का असर नहीं होता है। जिस तरह काले रंग पर कोई दूसरा रंग असर नहीं करता है, बिलकुल उसी प्रकार उमंगों में सदा जवानी उफनती रहती है। होली हो या न हो, उमंग शरीर के प्रत्येक अंग से फूट पड़ती है किसी गीले रंग भरे गुब्बारे की तरह और आपको मस्ती से सराबोर कर देती है। इन उमंगों को लूटने के लिए सभी तैयार रहते हैं। आप भी तैयार हैं न सभी के अपने अपने रंग हैं। अलग- अलग स्टाइल हैं। आप कितनी ही होली खेल खिला लें, अगर आपने साली को रंग नहीं लगाया तो काहे की होली। वैसे महंगाई और भ्रष्टाचार मिलकर खूब भर रहे हैं झोली। होली खेल खिला रहे हैं। महंगाई इतरा रही है। सबने जबकि उसका चौखटा काला कर डाला है पर उससे बच न सका कोई साली या साला है। महंगाई अब पूरे वर्ष होली खेलती है, कभी प्याज से, कभी आलू से, कभी टमाटर से, आजकल नींबू से खेल रही है।
महंगाई जिससे भी होली खेले पर निचोड़ी जनता जाती है। वो होली खेलने में मगन रहती है। पर अपने ऊपर रंगों की फुहार से वो इतना ओत- प्रोत हो जाती है कि चारों तरफ से लिप- पुत जाती है। कहीं से कुछ नजर नहीं आता है। अंधाता नहीं है पर खुली आंखें भी मुंदी रहती हैं। चैन पल भर नहीं लेने देती है महंगाई, न होली पर, न दिवाली पर दिवाली की होली और होली की दिवाली ऐसे ही मनती है और जनता मतवाली रहती है और उसका दिवाला निकल जाता है। वह ईद के इंतजार में लगन लगा लेती है। सभी को ऐसे उत्सव ही भाते हैं। सभी रंगाते हैं और साथ में होली के फिल्मी गीत गुनगुनाते हैं। कहीं भांग सॉन्ग बनकर ओठों से फूटती है। होली अभी दरवाजे पर है। माहौल बन रहा है, मैं भी सोच ही रहा हूं कैसे इस बार हाईटेक होली का बेनिफिट उठाऊं। फेसबुकिया फ्रेंड्स को रंगों से कैसे नहलाऊं। कोई आइडिया हो तो बताना, मैसेज टाइप कर सेंड का बटन दबाना और अन्ना हमारे हैं परेशान, इस बार उनकी होली और तबीयत दोनों ढीली ढीली हैं। भ्रष्टाचार का रंग लाल गुलाल है, देखकर सारा देश अब हैरान है लेकिन यह सब हाईटेकीय होली का कमाल धमाल है। बच्चा देश के गुब्बारे फोड़ कर बन रहा नौनिहाल है। फेसबुक को लेकर मच रहा बवाल है।

संपर्क- साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल, 195 सन्त नगर, नई दिल्ली 110065 मोबाइल 9718750843,
Email- nukkadh@gmail.com

May 25, 2010

आईपीएल बोले तो...


- अविनाश वाचस्पति
खिलाडिय़ों को तो नोट मिल रहे थे जिससे इनके दिल रबर की गेंद के माफिक बल्लियों उछाल रहे थे क्योंकि उछलने उछालने में रबर की गेंद में ही बेहतरी पाई जाती है। फिर चाहे उसे बल्लियों उछालो या डबल-ट्रिपल बल्लियों की ऊंचाई तक उछालो, अगर आपमें उनकी वापसी में संभालने का गुर आता है तो आप सफल हैं, आपने मनी मंत्र सिद्घ कर लिया है।
डूबती क्रिकेट विधा को बचाने का श्रेय पहले वन डे मैचों को गया और स्टेडियम फुल रहने लगे थे। उसके बाद आईपीएल इस विधा का सच्चा तारणहार बना। तीन बरस पहले क्रिकेट खिलाडि़यों की यूं बोली लगाई जा रही थी मानो खिलाड़ी न हुए प्रोफेशनल पशु हो गए। पशु भी आम नहीं खास। खास मतलब जो सब्जी मंडियों में विचरण करते हैं। खाते पीते तो सब्जियां ही हैं और सड़ी गली, दुर्गन्धयुक्त सब्जियों का भाग्य संवारते विचरते हैं वैसे उसमें से भी बेहतर की तलाश में जुटे रहते हैं जैसे इंसान सबसे बेहतर पा लेना चाहता है और उसके लिए सब कुछ कर गुजरता है। सब्जी मंडी की गंदगी पटी रहती है सब्जियों की लाश से क्योंकि सब्जियां लाश होने पर ही दुर्गंध छोड़ती हैं। दुर्गंध छोडऩा किसी भी लाश का स्वाभाविक गुण है। पर इस दुर्गंध में ही इन पशुओं को महक मिलती है और इनकी तृप्ति होती है। शहर के पशु तो दूर की बात है, गांव में भी पशुओं को अच्छी सब्जियों की ओर निगाह भी नहीं डालने दी जाती है। वे या तो अपने चारे में खुश रहें और स्वाद बदलना चाहें तो कचरे में तलाशें।
आईपीएल भी कचरे में नोट बटोरने जैसा है क्योंकि तलाशने की जरूरत यहां नहीं है। यहां तो सब पूर्व नियोजित है। सट्टा भी, खेलना भी, बिकना भी और खरीदना भी। जो नियत नहीं है वो नीयत है कि न जाने कब बिगड़ जाये।
पशु मेले में पशुओं की बोलियां लगती हैं इसमें अंतर सिर्फ यही था कि सब्जियां और पशु जिस तरह से इस मौके पर अपनी बोलियों पर खुशी या दुख जाहिर नहीं कर पाते हैं, खिलाड़ी अपने खिलंदडे अंदाज में कर जाते हैं। ये लोग कह सकते हैं- दुख तो खैर क्यों होता, इन्हें तो नोट मिल रहे थे जिससे इनके दिल रबर की गेंद के माफिक बल्लियों उछाल रहे थे क्योंकि उछलने उछालने में रबर की गेंद में ही बेहतरी पाई जाती है। फिर चाहे उसे बल्लियों उछालो या डबल-ट्रिपल बल्लियों की ऊंचाई तक उछालो, अगर आपमें उनकी वापसी में संभालने का गुर आता है तो आप सफल हैं, आपने मनी मंत्र सिद्घ कर लिया है। वापसी में वे गेंदे नोट बनकर बिखरती नहीं हैं, विदेशी खातों में समा जाती हैं। उछलने के बाद विदेशी खातों में समाना फिक्सिंग का ही एक अन्य रोचक पहलू है।
मन से पशु हैं पर तन से नहीं इसलिए नोट पाने पर, बोली लगने पर दुम हिलाकर अपनी
कृतज्ञता ज्ञापित नहीं कर पाते हैं। सिर्फ अंखियां नचा- मटकाकर ही दुदुंभियां बजाते हैं। वैसे दुदुंभियों और दुरभि- संधियों में इन्हें महारत हासिल होती है। इसी फिक्सिंग की बदौलत सट्टे का बेरूका रट्टा चलायमान है और चियर्स बालाओं ने अपने हुस्न के जलवे लुटा- लुटा कर इनमें रोमांच की रवानगी तक बिठाया और लिटाया है। इनके खरीददार इनके गले, गले नहीं बदन पर चिपका देते हैं अपना विज्ञापन, कमीज की शक्ल में, टोपी पर, पैंट पर, बैट पर और जहां- जहां उनका बस चलता है, वे विज्ञापन फहरा देते हैं। वही विज्ञापन इनकी अक्ल पर पड़े पत्थरों की कहानी गाते हैं। सामान्य तौर पर गीत गाए जाते हैं जबकि विशेष तौर पर कहानी गाई जा सकती है। आजकल वही कहानी गाई जा रही है। सुर भी अनेक हैं किसी के लिए नेक और बाकियों के लिए देख भाई देख।
क्या हुआ गर कहानी में ऐसे मोड़ आते हैं कि बिना मोड़े ही सब मुड़ जाते हैं जबकि इनमें कुछ तो एकदम से तुड़ जाते हैं। कोई निलंबित हुआ, कोई सस्पेंड हुआ, क्या फर्क पड़ता है इनकी साख ही नहीं होती है जिन पर आंच आए। इनकी साख नोट होते हैं वे ही इनको गरमी पहुंचाते रहते हैं। जिनको नहीं मिलते वे इन नोटों को राख मानते हैं। पर उनके राख मानने से नोटों का गुण राख नहीं होता, उसका गुण सदा कंचन है और कंचन की तरह ही निखरता रहता है।
यह सत्य है कि धन से ही पशुता का उन्नयन होता है। जिससे सब मान- मर्यादाएं भुलाना या बहाने करना सहज हो जाता है। धन का नहीं पशुता का साम्राज्य बढ़ रहा है और बढ़ रहे हैं पशु। आप सिर्फ बोलियां लगाने भर की घोषणा कर दीजिए एक से एक नायाब बोलियां लगवाने के लिए हाजिर मिलेंगे। लगाने वाले तो पशुत्व को पहले ही सिद्घ कर चुके हैं।
इंडियन पालतू लीग में पालतू बनाने की प्रक्रिया सदा चलती रहती है जिसमें पैसे की अहम भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है, सरेआम लगती सार्वजनिक बोलियां इसमें डेमोक्रेसी की अद्भुत मिसाल हैं। पालतू बनना पालना से बिलकुल भिन्न है जबकि पालतू बनाना पालना का ही समदर्शी बोध है। जिसे पालेंगे पालतू वही हो सकता है उसे ही पाला जाता है। पर कई बार पालने पर भी खूंखारत्व सक्रिय हो उठता है जैसे नौकरों द्वारा स्वामी के साथ दगा करना क्योंकि अपवाद तो प्रत्येक के अनेक मिलते हैं। असल में पालतू बनाने की बोली प्रक्रिया से गुजर कर खिलाड़ी जो सोचता है कि जब इतना पशु बनना ही पड़ा है तो थोड़ा सा भी चूका क्यों जाए और वो फिक्सिंग से जुड़ जाता है।
इसी प्रकार प्रकारांतर में इंडियन पशु लीग अंत में इंडियन पैसा लीग में समृद्घि को प्राप्त होती है। पालतू जिसमें बेईमानी है। इसे पछतावा लीग भी कहा जा सकेगा पर किसी को पछतावा हो तो अपने पाप पर, अंत में पछताना पब्लिक को ही पड़ता है। इंडियन पिटाई लीग में खिलाडि़यों की चाहे कितनी ही पिटाई हो जाए फिर भी इंडियन पापी लीग इंडियन पवित्र लीग बनने की ओर अग्रसर है।
देखने में गरूर वाला खेल लगता है पर वे जरूर जानते हैं कि इसमें कितना ललित शेष है। सरूर इसमें सिर्फ पैसे का है-इसी खेल के कारण पैसे को पाप समझा जाने लगा है। पैसे और खेल भावना की जितनी दुर्गति इस खेल के जरिए पैदा हुई है उसकी कहीं कोई दूसरी मिसाल हाल-फिलहाल नहीं है।
यहां प्यार सिर्फ पैसे से है। पैसे के सामने पैसे बढ़कर कुछ नहीं है। शक्ल जरूर भोली दिख रही हैं पर मन में फिक्सिंग के गोले फूट रहे, आवाजें कैद हैं। सबको लाभ मिलना है। सब सच है। पब्लिक के विश्वास को इस खेल ने इतना बेरहमी से छला है कि नेताओं की छलावट भी छोटी पड़ गई है। यह छलछलाहट प्यार की नहीं, पैसे की है। स्वार्थ की है, लोभ और लालच की है। इंडियन लीग अब पैसे की है, पाप की है, पंगे की है, पतन की है। लीग तो पागल है रे मतलब आई पी एल वही मतबल इंडियन पागल लीग।
संपर्क : साहित्यकार सदन, पहली मंजिल, 195 सन्त नगर, नई दिल्ली 110065 मोबाइल 09868166686/ 09711537664
Email: avinashvachaspati@gmail.com

Mar 18, 2010

चीनी और महँगाई की जुगलबंदी


- अविनाश वाचस्पति
इस शताब्दी का सबसे बड़ा त्योहार महंगाई है और हर त्योहार पर हावी है। इसने अपनी भरपूर जुगलबंदी से त्योहारों की ऐसी की तैसी कर रखी है बट विद डेमोक्रेसी। बिना डेमोक्रेसी के राष्ट्र में तो पत्ता तक नहीं हिलता, कहना समीचीन नहीं होगा क्योंकि राष्ट्र कोई पेड़ नहीं है बल्कि यूं कहा जाएगा कि नेता और पब्लिक बिन डेमोक्रेसी बेचैन रहती है।
होली से ठीक पहले फिजा में चीनी के ऐसे रंग की बरसात हो रही है जो चीनी को मीठा होने से रोक रही है। रंग भरपूर हों पर मिठास न मौजूद हो तो होली होते हुए भी आनंद नहीं देती है। होली होली होती है। होली डायबिटिक नहीं होती। होली ऐसा रंग है जो बेरंग नहीं है पर हालात यह हैं कि प्रत्येक त्योहार पर बेरंगीनियत भीतर तक रंग कर गई है। बेरंगीनियत का यह जश्न मन के भावों में समाने वाला नहीं है। यह तो मन में जश्ने- रंग की बलात् घुसपैठ है। होली पर मनमाफिक रंग और सिर्फ पसंदीदा ही सुहाते हैं। होली में भरपूर मिठास के समावेश के सबब बनते हैं। रंग ही होली को मिलन बनाता है, इसे अनुभूति के सुखद संसार में ढालता है और इसे अनंत इन्द्रधनुषीय विस्तार देता है।
होली तो मन के रोम- रोम को बींधती है। होली खेलना इसके खुलने के अहसास का उल्लसित होना है, न कि खुजलाहट का सबब बनना है। उल्लास को समेटने के लिए बिखरना और खुलना-खिलना ऐसी शर्तें हैं जिनका पूरा होना नितांत जरूरी है बिना किसी प्रकार के अंत के मतलब बेअंत। होली होली ही रहे- दिवाली न बने। होली का दिवाली होना- भाता नहीं है और दिवाला होना तो दीवाली का भी नहीं सुहाता।
राजनेताओं का तो हर पल होली खेलते हुए बीतता है। किसी भी साथी को किसी भी जानवर का नाम दे देते हैं। अब यहां पर उल्लू और उसके प_ों की बादशाहत डांवाडोल हो गई है और हरे पीले नीले लाल रंग के सांप फनफना रहे हैं, फुफकार रहे हैं। इस मुगालते में रहकर कि आपके इस प्रकार के रहस्योद्घाटन से पब्लिक आपके बारे में भी अपनी वैसी ही राय कायम नहीं करेगी, जबकि ऐसा ही होता है। आप जो चश्मा पब्लिक को पहनाते हो तो फिर उसी चश्मे से आपको भी देखा जाता है। यह कटु सत्य है जिससे बचना संभव नहीं है। आपको अब बस अपने देखने के नजरिये को एक नये संदर्भ में देखना होगा। अगर नजरिया बदलोगे तो राजनीतिज्ञों की हर रात को ही दीवाली सा चमकीन (चमकता हुआ) पाओगे और अपने उजालों को भी अमावस्या के अंधेरों से सराबोर।
इस बात से असहमति नहीं की जा सकती है कि होली और दीवाली की यह प्रवृत्ति दिनोंदिन पब्लिक के लिए घातक बनती जा रही है और उसे छलती जा रही है। दिन दोगुना और रात हजारगुना यानी हर पल यह जोखिम बढ़ रहा है। होली में दिवाली की चमकीनता और दीपावली पर होली की रंगीन पर संगीन उत्सवीय जंग अपनी विशिष्टता में विकसित हो रही है। इस रंग की पहुंच से पब्लिक तो बाहर ही है।
चीनी के साथ होली पहले ही खेली जा रही है। नेताओं के साथ होली तो साल भर चालू रहती है। वही कभी दीवाली बन जाती है कभी होली और अब तो शेयर बाजार भी अपने निवेशकों के साथ होली खेलन में सिद्धहस्त हो गया है। इस बार की होली राजधानी के रिक्शाचालकों के लिए मनमाफिक रंग में आई है। रिक्शावालों पर मस्ती छाई है।
मिलावट की करवट ने जिंदगी के प्रत्येक पायदान को, सेहत तक को पहले ही अपनी चपेट से, अपने चंगुल में कस रखा है और चाहे कितना ही कसमसाया जाये पर मिलावट की यह ऊंटिया करवट हलचलविहीन ही रहती है। उस शिला के माफिक जिसका पब्लिक की सेहत की कीमत पर रोजाना शिलान्यास होता है। पब्लिक बेबसी से इसकी अभ्यस्त हो चुकी है।
कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन के मद्देनजर सड़कों पर वाहन हर समय जाम की होली खेलते दिखलाई दे रहे हैं। इस जाम की सरेआम मस्ती से लुटते हुए सब इस पर चिंता तो प्रकट करते हैं पर चिंतित नहीं होते। चिंता प्रकट करना समस्या के उपर से ही बिना सरसराये ही गुजरना है- यहां सरसराहट की आहट भी नहीं होती है। अगर चिंतित होते तो इस जाम का और अधिक विकास न होने देते। जाम का विकास न होने से परोक्ष तौर पर देश का विकास रूकता है जबकि जाम के विकास में राष्ट्र का विकास समाहित है।
इस शताब्दी का सबसे बड़ा त्योहार महंगाई है और हर त्योहार पर हावी है। इसने अपनी भरपूर जुगलबंदी से त्योहारों की ऐसी की तैसी कर रखी है बट विद डेमोक्रेसी। बिना डेमोक्रेसी के राष्ट्र में तो पत्ता तक नहीं हिलता, कहना समीचीन नहीं होगा क्योंकि राष्ट्र कोई पेड़ नहीं है बल्कि यूं कहा जाएगा कि नेता और पब्लिक बिन डेमोक्रेसी बेचैन रहती है। महंगाई एक ऐसा त्यौहार है जो अपनी ऊर्जास्विता से चैन का संचार करता है। न चाहते हुए भी हम सब यही चाहते हैं कि महंगाई का त्योहार मनाया जाता रहे। हर समय हाहाकार करने में तल्लीन रहते हैं। कभी पगार में बेतहाशा बढ़ोतरी की चाह करके और कभी ...।
जिस प्रकार पहले राशन कार्ड पर सस्ती चीनी मुहैया कराई जाती रही है। अब सबकी चाहना है सस्ती चीनी चाहे न मिले पर तनख्वाह भरपूर बढ़े, चाहे ख्वामखाह ही बढ़े पर इतनी बढ़े कि लाखों के सैलेरी पैकेज भी छोटे ही नजर आते रहें। हमारी इन्हीं बलवती इच्छाओं के बलबूते पर महंगाई के फल, फूल रहे हैं और फुला रहे हैं। एक बानगी देखिये सब्जी सेलर (गौर कीजिएगा) सब्जियों का उत्पादन करने वाले मेहनतकश किसान नहीं, उगाने वालों हाथों से उपयोग करने वालों हाथों तक पहुंचाने की एवज में महंगाई अपना त्योहार अपनी विराटता में मनाती है। महंगाई को मसलने- कुचलने के जितने उपक्रम किए जाते हैं उनका असर हमारे जिस्म और जेब पर होता है। जेब हमारी मसली जा रही है और जिस्म कुचला जा रहा है। महंगाई की सभी चालें खूब होली खेल रही हैं और दिवाला निकाल रही हैं। महंगाई के इस त्रिकोणीय मेल से कोई अछूता नहीं रहा। छूत के रोग को छूट (सेल) में तब्दील होने से कोई नहीं रोक सका। महंगाई के उत्सव का यही जलवा हलवे का स्वाद दे रहा है और हलवे को मिठास देने के लिए इसमें डाला गया चीनी का प्रत्येक कण चीख- चीखकर संभवत: यही घोषणा कर रहा है कि कौन कहता है कि चीनी में अंकुर नहीं फूट सकते, आप एक बार हमें गमले में बोकर तो देखो। जब हमारा जिक्र करके वोट बैंक में भी अंकुर फूट आते हैं तो हमारे उपजाऊपन पर संदेह भरी नजर क्यों?

संपर्क: साहित्यकार सदन, पहली मंजिल,
195 सन्त नगर, नई दिल्ली- 110065
मोबाइल- 09868166586, 09711537664
Email- avinashvachaspati@gmail.com

Jun 12, 2009

जूते की जंग

- अविनाश वाचस्पति
जूता पहले काटने के लिए खूब कुख्यात रहा है परन्तु अपने नएपन में। जैसे नया आया कुत्ता सभी को काटने के लिए उद्यत मिलेगा। उसी तरह नया नया जूता पैर की खूब किसिंग करता है पर आजकल ब्रांडिड जूतों में यह गुण नहीं पाया जाता है। आज कल के जूते में नए गुणों की भरमार हो गई है। जूते की मार व्यापार हो गई है। जूते की मार से चैनलों की टी आर पी बढ़ती है।
जूता एक बारहमासी उपयोगी मस्त चीज है। पहना जाता है पर वस्त्र नहीं है। चमकाया जाता है पर आईना नहीं है। इसके बिना चलना दूभर है, बिना इसके पैरों के तलवे पर संकट है। कड़ी धूप, कड़ाके की ठंड, रेतीला सफर और पथरीला मार्ग इस पर सवार होकर यानी इन्हें धारण करके सरलता से पार किए जा सकते हैं। जूता पहले काटने के लिए खूब कुख्यात रहा है परन्तु अपने नएपन में। जैसे नया आया कुत्ता सभी को काटने के लिए उद्यत मिलेगा। उसी तरह नया नया जूता पैर की खूब किसिंग करता है पर आजकल ब्रांडिड जूतों में यह गुण नहीं पाया जाता है। आज कल के जूते में नए गुणों की भरमार हो गई है। जूते की मार व्यापार हो गई है। जूते की मार से चैनलों की टी आर पी बढ़ती है। अखबारों की जगह घिरती है। सुर्खियां बनती हैं। जूता आजकल चुनाव की नाव को डुबोने में सक्षम हो चुका है।  कुत्ते के तरह जूते के काटने की पर इंजेक्शन नहीं लगवाए जाते क्योंकि इससे रैबीज नामक बीमारी नहीं होती।
जूते को पैरों में पहने जाने के कारण नीचे दर्जे का माना गया है। जूते की मरम्मत के काम को पहले से ही दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। पर अब जूते के नए कर्मों को पत्रकार, नाखुश पार्टी सदस्य इत्यादि अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। जूते पैर नीचे होने पर भी उपर ले जाने का काम करते हैं। यदि आदमी चल ही न पाए तो सारी प्रगति धरी रह जाए। बढऩे, चढऩे, लडऩे और अंगद की तरह अडऩे के लिए पैर जरूरी हैं। पैरों की उपयोगिता पर सवाल उठाना भी बेमानी है। पैरों के बिना इधर से उधर और उधर से इधर होना सरकना संभव नहीं है। पैर न हों तो बचपन में घुटनों के बल सरकने का आनंद नहीं लिया जा सकता जो कि चलने की पहली सीढ़ी है। बिना पैर न तो आदमी खुद ही चल सकता है और न किसी प्रकार का वाहन ही चला सकता है, चलवाने की बात छोडि़ए। अगर जानवरों द्वारा खिंचित सवारी को वाहन न माना जाए। उसके उपर तो किसी को भी पटक दो तो ले ही जाएगा।
पैर भी उपयोगी और उसमें पहने जाने वाले जूते और उपयोगी अब तो उसके चलने से असंभव कार्य भी सहजता से संपन्न होने लगे हैं। जूतों पर बने हुए सभी मुहावरों और लोकोक्तियों को दोबारा से सृजित करना पड़ेगा। जूते के संबंध में होती प्रगति जूता जनार्दन की आवाज को अमली जामा पहना रही है। नेताओं को धमकिया रहा है। उनके सपनों में आ रहा है। पर जूते वाली जफ्फी से नेता वंचित हैं। लगता है जूतों को नेता नहीं भा रहे हैं। इसलिए नेता के अगल-बगल से सरक जाते हैं। एक भी वाक्या ऐसा नहीं हुआ कि जूता नेता के गले मिला या मुंह चढ़ा हो। ऐसा लगता तो नहीं है कि जूता अपनी साख बचा रहा हो। जूता नेताओं के लिए खौफ का पर्याय हो गया है।
कहा तो यह भी जाता है कि नेता तो कर्म ही ऐसे कर रहे हैं कि उन्हें जूते खाने चाहिए। पर जूते खाने की चीज न होते हुए भी खूब खाए जा रहे हैं और खाते हुए भी बेखाए हुए हो रहे हैं। जूता और नेता का चोली दामन का अनचाहा साथ हो गया है।
जूता कंपनी का उद्घाटन भविष्य में जूता खाकर ही करना अनिवार्य होने वाला है। इससे रिहर्सल भी हो जाएगी और बचने के गुर भी सीखे जा सकते हैं। जूते के निशाने से बचने के गुर सिखाने के लिए किसी जूता विश्वविद्यालय में जूता डिप्लोमा या जूता कोर्स आरंभ किया जा सकता है। जूता खा चुके नेताओं के भाषण सत्र आयोजित किए जा सकते हैं। दोपहिये पर सवारी करने पर हेलमेट पहनने की अनिवार्यता अब ट्रांसफर होकर भाषण या प्रेस कांफ्रेंस करने वाले के लिए आवश्यक होती दिखलाई दे
रही है।
जूता पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू करने की मांग की जा रही है। जूता मंत्रालय की स्थापना का मुद्दा घोषणापत्र में स्थान पा चुका है। जूते के जलवे पर शोध प्रबंध लिखवाए जा रहे हैं। जूते की जवानी पर, उसकी रवानी पर और जूते का जश्न मनाया जा रहा है। जूते के हुस्न के चर्चे विषय पर कविता प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है। जूता चेहरे के आगे दौड़ के बोलता है। भाषण देते समय नेता की आंखों में जूते के खौफ का जायजा लिया जा सकता है। आतंकवादी जूता बम बना सकते हैं। जूते के कहर के आगे जूता बम का भविष्य सुनहरा है। जूते की सदाबहार जंग चुनावों में विजयी रही। क्या विदेश क्या देश सब कुछ जूतामय हो गया है। जूते की एक नई संस्कृति जन्म ले चुकी है जिसके विकास की भरपूर संभावनाएं हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र बदलकर जूतातंत्र के रूप में ख्याति पा जाए। जबकि सूरते हाल यही बयां कर रहे हैं।