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May 1, 2022

किताबेंः यथार्थ से साक्षात्कार कराती लघुकथाएँ

- नमिता सचान सुंदर

समीक्ष्य कृति- धूप के गुलमोहर  (लघुकथा-संग्रह), प्रथम संस्करण- 2021 लेखकः ऋता शेखर’मधु’, प्रकाशक: श्वेतांशु प्रकाशन- नई दिल्ली, पृष्ठ: 188, मूल्य: 340/-

अपने नाम को सार्थक करता ऋताशेखर का लघुकथा संकलन, ‘धूप के गुलमोहर’ कहीं धूप में गुलमोहर हो जाने की प्रेरणा देता है तो कहीं जेठ की आग उगलती दोपहरिया में रस-रंग की धार सा अंतस को गहरे तक सिंचित करता है।

पाँच श्रेणियों में सलीके से वर्गीकृत की गयीं 138 लघुकथाओं से सुसज्जित यह संकलन हमें वैचारिक एवं भावनात्मक दोनों ही स्तर पर प्रभावित और समृद्ध करता है।

सामाजिक सरोकार की श्रेणी वाली कथाएँ हमें मात्र मानवीय सरोकारों की ओर अँगुली पकड़कर ही नहीं ले चलती हैं, वरन् हमारी सोच में कुछ डिग्री का फर्क लाने की भी क्षमता रखती हैं।

ममता के बेपनाह विस्तार में भी संबंधों के दायरे हमारी सोच में झुकाव, वरीयता स्वाभाविक रूप से ले ही आते हैं।  यह बात संकलन की प्रथम कथा, ‘माँ’ में लेखिका ने कुछ इस अंदाज में कही है कि कथा समाप्त करते ही मेरे भीतर का पाठक चमत्कृत हो मुस्कुराया।

 ‘डील’ हमारे बदलते सामाजिक परिवेश की कथा है। ‘नेग’ में समय के साथ आया परिवर्तन तो परिलक्षित है ही, किंतु साथ ही है पुरानी रूढ़िवादी मानसिकता भी।  इन दोनों कथाओं का चुस्त-दुरुस्त चुहल- भरा अंत ही कथाओं को रोचक बना जाता है।  कथन और कहन का संतुलन बखूबी बनाए रखा है लेखिका ने।

 दोहरी मानसिकता वाले आचरण पर चोट करती कथा ‘नैतिकता’ का कसाव इसका मुख्य आकर्षण हैं। ‘प्रैक्टिकल नॉलेज’ की कथा-वस्तु थोड़ा हटकर है और यही ताजापन इस कथा की विशेषता भी है।

‘रिटायर्ड’- नौकरी की सेवा अवधि समाप्त होने पर व्यक्ति के भीतर उपजे खालीपन, अनुपयोगी होने के अहसास को दर्शाती कथा है। न लेखिका ने कहीं उस खालीपन का जिक्र किया, न पात्र विशेष ने व्यक्त किया, कथा के अन्य पात्रों का व्यवहार भी पात्र विशेष के प्रति अत्यंत सौहार्द पूर्ण रहा; फिर भी कथा समाप्त कर मन भीग गया। अनकहे ही सब कुछ कह देने का कौशल ही इस कथा को विशेष बना जाता है।

इस श्रेणी में लेखिका ने कुछ ऐसे सरोकारों की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिन पर हम बात करने से बचना चाहते हैं, जिन्हें हम हमेशा कालीन के नीचे खिसका देते हैं। ऐसी ही एक कथा है ‘कासे कहूँ ’।

लघुकथा- ‘युग परिवर्तन’ और ‘बेतार संदेश’ में हमारी युवा पीढ़ी की संवेदनशीलता को सटीक प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया गया है। इसी प्रकार सामाजिक सरोकार की श्रेणी में कुल मिला कर 41 कथाएँ हैं जो अपने-अपने ढंग से पाठक मन पर अपनी छाप छोड़ती हैं।

दूसरी श्रेणी ‘रिश्तों की लघुकथाएँ’ की है, जिसके अंतर्गत 45 कथाएँ हैं। माता- पिता- बच्चे, भाई- बहन, सास- ससुर- बहू, देवरानी- जिठानी, बहन- बुआ, सखियाँ। लेखिका ने हर रिश्ते के ताने-बाने को बुना है इन कथाओं में।

संप्रेषण किसी भी रचना की आत्मा होती है और लघुकथा में शब्द सीमा की अनिवार्यता के कारण भावों, विचारों का संप्रेषण तो रस्सी पर चलती नटी- सा संतलुन का कौशल माँगता है। कथा ‘काठ की हांडी’ में लेखिका का यह कौशल बखूबी उभर कर आया है।

‘शापित फल्गु’ कई कारणों से एक बहुत ही खास कथा है। ननद- भाभी के रिश्ते को नारी की पारस्परिक समझ से जोड़ना लेखिका की विकसित सोच का परिचायक हैं। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता है एक पौराणिक संदर्भ को सामाजिक विचारधारा से लघुकथा के चोले में कुछ इस तरह फिट कर देना कि कहीं भी न असहजता लगे, न ढीलापन नजर आए।

‘संक्राति की सौगात’, ‘मनमर्जी’ आदि लघुकथाएँ सास-ससुर और बहू के रिश्ते में एक नया मोड़ लेकर सामने आती हैं और मन को कुछ ऐसी ठंडक पहुँचाती है, जैसे जेठ की तपती धरती पर पहली बारिश की फुहार।

‘बीज का अंकुर’, ‘सागर की आत्महत्या’, ‘पिता की कोख’, ‘ठोस रिश्ता’ आदि कुछ ऐसी कथाएँ हैं, जो अपने- अपने विशिष्ट अंदाज में हमसे यह कहती हैं कि हर पारिवारिक रिश्ता दूसरे रिश्तों को मजबूती देता है यदि हम समझदारी से काम लें।

कहते हैं लघुकथा में एक संदेश, एक उद्देश्य का निहित होना उसकी शक्ति का परिचायक होता है। इस श्रेणी की लघुकथाओं में पारिवारिक संबंधों में समस्याएँ और उनके निराकरण का संदेश निहित है।

मानवेतर लघुकथाओं की श्रेणी की पाँचों संदेशपरक कथाओं में लेखिका ने अलग- अलग और कुछ तो बड़े अनूठे प्रतीक चुने हैं । ‘प्यासी आत्मा’, दोधारी तलवार सी हमारे सिर पर लटकती है, तो ‘व्यवस्था का नकाब’, हमें आईना दिखाती है।

अगली श्रेणी की चार लघुकथाएँ को ऋता जी ने कोरोनाकाल की लघुकथाओं के अंतर्गत रखा है। इन लघुकथाओं की पृष्ठभूमि भले ही कोरोनाकाल है, किंतु उनकी कथावस्तु सार्वकालिक है, फिर वह ‘दाग अच्छे हैं’ की सास-बहू का परस्पर सांमजस्य हो या ‘भीड़-निर्माता’ की प्रिया की संवेदनशीलता।

पाँचवी और आखिरी श्रेणी है विविध कथाओं की। इस श्रेणी में 43 लघुकथाएँ हैं। एक तरफ ‘मरियम’, ‘समझौता’, आदि लघुकथाएँ अपनी संवेदनशीलता से भीतर तक उतर जाती हैं, तो  दूसरी तरफ ‘प्रतिकार’ जैसी कथा पीड़ा और अट्टहास दोनों को एक साथ ही उपजा जाती है। हर कथा का अपना विशिष्ट कथ्य है और विशिष्ट ही कहन भी।

कुल मिलाकर ‘धूप के गुलमोहर’ से हो कर गुजरना संवेदनाओं, भावों, सरोकारों की एक ऐसी यात्रा है, जिसमें एक तरफ यथार्थ हमारी बाह थामे चलता है, तो दूसरी ओर हालात को बदलने की संभावनाएँ भी हमारा साथ नहीं छोड़ती। जो निभा पाए, उसके लिए लघुकथा अभिव्यक्ति का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। लघुकथा विधा के प्रति ऋता जी की गंभीरता और उसके निर्वाह के प्रति उनकी सजगता का परिचय तो इस संकलन के प्रारम्भ में उनके द्वारा लिखी गई ‘मेरी बात’ से ही मिल जाता है।

 धूप के गुलमोहर की भूमिका लिखी है प्रेरणा गुप्ता जी ने।  जो ईमानदारी इस विधा के प्रति उनकी स्वयं की लघुकथाओं में परिलक्षित होती है, उसी ईमानदारी का निर्वाह उन्होंने इस संकलन की भूमिका लेखन में किया है।

सम्पर्कः 5 /138 विकास नगर, लखनऊ - 226022, Email: namitasachan9@gmail.com

May 3, 2021

किताबेंः बहुआयामों वाली कथाओं से सुसज्जित

- नमिता सुंदर

सूरज डूबने से पहले (लघुकथा-संग्रह ): प्रेरणा गुप्ता, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन – जयपुर, : सुंदर अय्यर ,पृष्ठ : 220, मूल्य : 250/-

'सूरज डूबने से पहले', सुश्री प्रेरणा गुप्ता का प्रथम लघुकथा संग्रह है। संग्रह प्रथम है पर लघुकथा लेखन के क्षेत्र में प्रेरणा गुप्ता खासा परिचित हस्ताक्षर है। बहुत ही कम समय में इस विधा के पटल पर अपनी पहचान स्थापित कर लेने के लिए लेखिका बधाई की पात्र तो हैं ही, साथ ही यह तथ्य सुस्पष्ट करता है कि आपकी लघुकथाओं में ‘बात’ तो है।

121 लघुकथाओं के संकलन 'सूरज डूबने से पहले' की लघुकथाओं में कथा तत्त्व की विविधता के साथ ही साथ विषय के अनुसार कहन को ढालने का लेखिका का कौशल भी सहज रूप से परिलक्षित होता है। इन लघुकथाओं से गुरते हुए आपको अनुभव होगा कि बहुत आम-सी बात, घटना में भी कथा तत्व खोज लेना लेखिका की विशेषता है। हमारे आस-पास ही उगती हैं ये कथाएँ। अविरल बहती दिनचर्या में काँटा डाल, ध्यान लगा बैठने की जरूरत नहीं होती लेखिका को कथा का फ्रेम बुनने में वरन् बहती धार में इनका निशाना ठीक वहीं लगता है, जहाँ कथा डूब-उतरा रही होती है।

गूढ़ बातों, सिद्धांतों और आदर्शों को जन साधारण के मानस में गहरे पैठाने के लिए कथा, कहानियों और किस्सों को हमेशा से ही माध्यम बनाया जाता रहा है, लेकिन लघुकथा जैसे शब्द सीमा से बँधे माध्यम के जरिए सामाजिक विसंगतियों को उकेरना, उनके दुष्परिणामों को सामने लाना आदि को कुशलता पूर्वक कर गुरना आसान नहीं है और वह भी बहुत ही सहज भाषा में कुछ इस ढंग से कि बात, कथा पढ़ते-पढ़ते मर्म तक सीधे पहुँचे और घर भी करे, किंतु इस संकलन की लघुकथाओं ने यह बखूबी कर दिखाया है।

संकलन में एक कथा है, ‘कृष्णा प्यारी’। गोरे रंग के प्रति आसक्ति की हद तक लगाव हमारे समाज की बहुत बड़ी विडम्बना है, जिसके चलते न जाने कितनी साँवली-सलोनी लड़कियाँ बहुत कुछ झेलती हैं। इस विडम्बना को इस कथा में बच्चे की मालिश करती माँ और बुआ सास के बीच की बातचीत के माध्यम से बहुत कलात्मकता से उभारा गया है और इतना ही नहीं बहुत सहजता से यह संदेश भी दे दिया गया है कि महत्वपूर्ण बाह्य सौंदर्य़ नहीं वरन् विचार और मन है।

आदम खुदा तो नहीं’, कथा में गृहिणी घर में काम करने वाली से करवा चौथ की पूजा के लिए बाजार से करवा लाने को कहती है। गहरे बैठी सामाजिक धारणाओं और प्रथाओं के चलते विधवा नौकरानी यह काम करने को सहमत नहीं होती किंतु गृहिणी द्वारा उसी से करवा मँगवाना और करवा पर शुभ चिह्न बनवानामानव संवेदनाओं को घायल करती रूढ़ियों को तोड़ने और सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित करता है। विधवा स्त्री को अपशकुन मानना हमारी बहुत बड़ी सामाजिक कुरीति है और इस सोच को तोड़ने के लिए समय-समय पर बड़े आंदोलन हुए हैं, किंतु यह कथा न बहुत सहज रूप से अंधकार में रोशनी की अलख जगाती है।

पति-पत्नी के नाजुक संबंध के संवेदनात्मक पहलुओं को बहुत सटीक एवं सशक्त प्रतीकों के माध्यम से उजागर किया गया है, कथा ‘धुआँ’ और ‘चमगादड़’ में। 'धुआँ' में सब्जी बनने जैसी रोजमर्रा और साधारण-सी प्रक्रिया को उपेक्षित पत्नी के मन में खदबदाते दर्द से लेखिका ने इतनी खूबसूरती से जोड़ा है कि कथा का कलात्मक पक्ष हमें प्रभावित कर जाता है।

कथा में प्रतीक के प्रभावी उपयोग का एक और उदाहरण है, 'चमगादड़'। पत्नी का दर्जा दोयम होने की सामाजिक विसंगति, पत्नी को डरा-धमकाकर रखने को पति होने की अनिवार्यता मानने की सोच को बहुत प्रभावी ढंग से कहा गया है इस कथा में। अंत में अपने भीतर बैठे भय को बाहर करने के लिए पत्नी का कमर कसना तथा सारा घटना क्रम, उतार- चढ़ाव चमगादड़ के माध्यम से जिस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, वह कथा को एक अलग आयाम दे जाता है।

एंटी रिंकल’ और ‘आई लव यू दादी’, बाल मन की कोमलता तथा द्वंद्व को बहुत एहतियात से बरतती कथाएँ हैं। यह कथाएँ यह भी समझा जाती हैं कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए घर में बुजुर्गों की कितनी अहम भूमिका होती है। स्वस्थ सामाजिक ढाँचे के लिए सभी पीढ़ियों का आपस में जुड़ाव अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

हौसले की पतवार’, यह कथा जीवन दर्शन और ध्यात्म का पुट लिये हुए है। नायिका आत्महत्या के उद्देश्य से नदी की ओर भागी जा रही है और किनारे पहुँचकर अचानक ही उसकी मुलाकात हो जाती है निर्जन में डोलती इकलौती नाव में बैठे एकाकी नाविक से। यह नाविक जीवन नैया का खेवनहार है, जो समझा जाता है, न जीवन आपके हाथ हैं, न मृत्यु। मनुष्य के हाथ है मात्र जीवन कर्म। अपनी परिस्थितियों से फिर जूझने का साहस ले लौटती नायिका, जीवन के किसी कमजोर क्षण में हम सबका मार्गदर्शन करने में सक्षम है।

प्रेम के दो मोती’ में दो सहेलियों की बातचीत के माध्यम से जीवन के एक अनमोल सच से हमारा साक्षात्कार होता है - सच्चा और निस्वार्थ प्रेम हमारे जीवन की सबसे मूल्यवान पूँजी है। धन-दौलत, भौतिक सुख सुविधाएँ, शारीरिक सौंदर्य सब तुच्छ हैं प्रेम की निर्मल मिठास के सम्मुख।

इतना ही नहीं हमारे पर्यावरण पर मंडराते खतरे, प्रदूषण के दुष्परिणाम, सम्भावित भयावह स्थितियों की ओर हमारा ध्यानाकर्षण करती कथाएँ जैसे - 'भय की कगार पर', 'कल की आहट' आदि भी हिस्सा हैं इस संकलन की।

कथ्य की विविधता, संदर्भों के बहुआयामों वाली कथाओं से सुसज्जित प्रेरणा गुप्ता का लघुकथा संग्रह 'सूरज डूबने से पहले' एक संग्रहणीय पुस्तक बन पड़ी हैं।

Namitasachan9@gmail.com