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Sep 10, 2011

पत्रकारिता महज धन्धा न रह जाये...

- एल. एन. शीतल
कोई शक नहीं कि समाचार पत्र को चलाने के लिए विज्ञापन अनिवार्य हैं, लेकिन ऐसा भी हरगिज न हो कि विज्ञापनों की भीड़ में समाचार ढूंढऩे पड़ें। पाठकों को गुमराह करने, फुसलाने तथा उकसाने के लिए उत्पादों की प्रचार सामग्री को खबरों के रूप में परोसे जाने के चलन पर रोक लगाने का काम भी वह आयोग करे।
पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत और अंधकारमय वर्तमान से गुजरते हुए जब हम भविष्य की चुनौतियों पर दृष्टिपात करते हैं तो हमें संभावनाओं के अनेक टापू दिखायी देते हैं। कहीं ये टापू, बाजारवाद के मौजूदा ज्वार में न डूब जायें इसके लिए हमें उन सवालों के माकूल जवाब देने होंगे जिनकी वजह से इन टापुओं के दरकने या बेवक्त डूबने का
अंदेशा है।
एक अच्छा अखबार होने का मतलब है- लोगों के लिए, लोगों का अखबार। हर अखबार लोगों का हो, महज सत्ता प्रतिष्ठान या विज्ञापनदाता का न हो, लोगों के लिए हो, सत्ता प्रतिष्ठान या विज्ञापनदाता या फिर किसी व्यक्ति विशेष के लिए न हो। लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। ऐसा हो, इसके लिए जरूरी है कि हम और ज्यादा समय गंवाये बगैर ऐसे उपाय करें, जिनके कारआमद नतीजे हासिल हों और जो पत्रकारिता के भविष्य को उज्ज्वल बनायें।
इन उपायों की शृंखला में सबसे पहले एक ऐसा स्वायत्तशासी, उच्चाधिकार प्राप्त नीति नियामक आयोग बनाया जाना चाहिए जो मुख्य रूप से दो काम करे। एक तो यह, कि वह बेलगाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से होड़ ले रहे प्रिंट मीडिया द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता पर रोक लगाये। चूंकि, हमारे पाठक संगठित नहीं हैं, इसलिए उनके दीर्घकालकि सरोकारों से जुड़ी सामग्री के लिए, इस नियामक निकाय की भूमिका अत्यंत सार्थक रहेगी। वह निकाय तय करे कि कोई अखबार चित्रों या अन्य सामग्री ('लिंग वर्धक यंत्र', 'कंडोम के मजे', 'फुल बॉडी मसाज', 'दोस्ती करो और दिल खोलकर बातें करो' आदि के जरिये अश्लीलता न परोसे। दूसरे, उक्त नीति नियामक आयोग का दायित्व यह सुनिश्चित करना भी हो कि किसी भी अखबार में विज्ञापनों के लिए दिये जा रहे स्थान तथा समाचारों को मिलने वाले स्थान का अनुपात तर्कसंगत हो। जो अनुपात निर्धारित किया जाये उसका सख्ती से पालन भी हो।
कोई शक नहीं कि समाचार पत्र को चलाने के लिए विज्ञापन अनिवार्य है लेकिन ऐसा भी हरगिज न हो कि विज्ञापनों की भीड़ में समाचार ढूंढऩे पड़ें। पाठकों को गुमराह करने, फुसलाने तथा उकसाने के लिए उत्पादों की प्रचार सामग्री को खबरों के रूप में परोसे जाने के चलन पर रोक लगाने का काम भी वह आयोग करे। वह आयोग यह भी सुनिश्चित करे कि कोई भी सत्ता- प्रतिष्ठान 'मित्र' और 'शत्रु' अखबारों की आंतरिक तथा गुप्त सूची बनाकर विज्ञापनों की बंदरबांट न कर पाये। चुनावों के समय मीडिया के एक बड़े वर्ग की शर्मनाक हरकतों पर तो खुद शर्म भी बेहद शर्मसार है। ऐसी स्थिति में यदि यह सुझाव अमल में लाया जाता है तो पाठकों को मिलने वाली सामग्री का स्तर सुधरेगा उन्हें ज्यादा सामग्री मिलेगी तथा अखबारों की आजादी अप्रभावति रह सकेगी।
यह आरक्षण का दौर है। वंचितों को तर्कसंगत आरक्षण का विरोध नहीं किया जा सकता। इसलिए अखबारों में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्रामीण जनता तथा मजदूरों के दीर्घकालिक हितों को पोषित करने वाली सामग्री को समुचित तयशुदा स्थान अनिवार्यत: मिले, भले ही वे अखबारों को विज्ञापन देने की स्थिति में नहीं हैं। इसके लिए यदि कोई कानून भी बनाना पड़े, तो बनाया जाना चाहिए।
कहने के लिए अखबारों की ज्यादती के शिकार पाठकों और सरकारों के मनमाने रवैये से पीडि़त अखबारों की व्यथा-कथा सुनने के लिए एक संस्था है- प्रेस कौंसिल। लेकिन यह अधिकारविहीन संस्था एक तमाशा-मात्र बनकर रह गयी है। यह दोषियों को सिर्फ चेतावनी दे सकती है, दंड देने का हक इसे नहीं है। पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल हो, इसके लिए जरूरी है कि इस संस्था को, निर्वाचन आयोग की तरह, अखिल भारतीय स्तर पर 'प्रेस नियामक आयोग' का व्यापक स्वरूप दिया जाये और प्रदेशों में भी इसका राज्य स्तरीय ढांचा तैयार हो। यह आयोग जिला स्तर पर निगरानी जत्थे तैनात करे, जो शुरूआती स्तर पर पाठकों की शिकायतों की पड़ताल करके उन्हें अंतिम सुनवाई के लिए अग्रेषित कर सकें। इससे पाठकीय सरोकारों के प्रति अखबारों की जवाबदेही बढ़ेगी। चूंकि, प्रेस को अनौपचारिक तौर पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है, इसलिए परम आवश्यक है कि हमारे अखबारों की उत्पादन-प्रक्रिया पारदर्शी हो और उसमें पाठकीय सरोकारों के प्रति जवाबदेही भी तय हो। इसे सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि अखबारों में ऐसे लोग आयें, जो योग्य हों, अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति वचनबद्ध हों तथा वे अन्य व्यवसायों में कार्यरत लोगों की तुलना में मिशनरी जज्बे से ज्यादा भरे हों। ऐसे युवाओं को पत्रकारिता में लाने के लिए एक प्रतिस्पर्धी माहौल, सुनिश्चित भविष्य, तथा अच्छे वेतन अनिवार्य हैं। सभी समाचार पत्र अपने मशीनी संसाधनों जितनी तवज्जो अपने इंसानी संसाधनों को भी दें, यह निहायत जरूरी है। वर्तमान में अखबारों के आंतरिक ढांचे में सबसे बड़ा ग्रहण यही लगा है कि पत्रकारों की गुणवत्ता को तिरोहित कर प्रबंधनपरस्त नरमुंडों को प्रश्रय देने की परिपाटी चल पड़ी है। ऐसे पालित पत्रकारों के वेतन पर विशेष जोर न देने के पर्याप्त निजी कारण होते हैं। इसके लिए मौजूदा दोषपूर्ण कानूनी प्रावधानों को बदलना होगा। सभी विज्ञापनदाताओं के लिए यह अनिवार्य करना होगा कि वे सिर्फ उन्हीं अखबारों को विज्ञापन दें जो अपने पत्रकारों को निर्धारित वेतनमान दे रहे हैं।
चूंकि, अखबार नाम की संस्था के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है, इसलिए यही पारदर्शिता अखबारों के संसाधनों पर भी लागू होनी चाहिए। किसी भी पत्र-पत्रिका को शुरू करने की अनुमति दिये जाने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अखबार के प्रकाशन पर कितनी राशि खर्च होगी, वह कहां से आयेगी और अखबार चलाने वाले का आर्थिक आधार क्या है। ज्यादा उचित तो यह होगा कि अखबार चलाने वाले प्रतिष्ठान केवल अखबार ही चलाये, कोई और धंधा न करे, क्योंकि अखबार धंधा तो हो गये हैं, लेकिन उन्हें महज धंधा ही नहीं माना जा सकता। अन्य धंधों की तुलना में वे अंतत: एक मिशन भी हैं, चौथा स्तंभ भी हैं और जन-प्रतिष्ठान भी।
बाजारवाद की अंधी होड़ में मुख्य उत्पाद के साथ एक अन्य उत्पाद मुफ्त देने के भ्रामक विज्ञापन, दरअसल उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी है। यह धोखाधड़ी तमाम धंधों में धड़ल्ले से चल रही है। हालांकि यह होनी तो इन धंधों में भी नहीं चाहिए, लेकिन अखबारों में तो हरगिज नहीं। आज अखबारों में ऐसी लंबी- चौड़ी विज्ञापनबाजी को पाठक-प्रोत्साहन का नाम दिया जाता है। उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि यदि उनके पास पांच या पचास करोड़ रुपये के पुरस्कार देने के लिए धन हैं तो वे क्यों नहीं अखबार की कीमत कम कर देते, क्यों नहीं अखबार की सामग्री को ज्यादा पठनीय बना देते, क्यों नहीं विज्ञापनदाता की देहलीज पर माथा रगडऩे या विज्ञापन ऐंठने के लिए कमजोर विज्ञापनदाताओं को धमकाने की हरकतें बंद कर देते। यानी, यह तय किया जाना चाहिए कि कोई भी अखबार इस तरह के छद्म प्रलोभनों से अपने पाठकों को हरगिज नहीं भरमायेगा।
हमारे पत्रकारिता संस्थान पत्रकार नहीं, पीआरओ पैदा कर रहे हैं और वह भी अधकचरे। इस पर भी उन्हें मुगालता यह कि उनकी आधी- अधूरी जानकारी ही अंतिम सच है। जब वे किसी अखबार का हिस्सा बनने की प्रक्रिया से जुड़ते हैं तो उनके उस ज्ञान की पोल पहले दिन ही खुुल जाती है। यह दुरावस्था भविष्य के लिए एक भयावह संकेत है। आज दरकार इस बात की है कि मौजूदा पाठ्यक्रम में, बदलती चुनौतियों के अनुरूप आमूलचूल परिवर्तन किया जाये। शिक्षकों और शिक्षण-शैली को भी बदलने की जरूरत है। ऐसे शिक्षक लाये जाने चाहिए जिन्हें समुचित व्यावहारिक ज्ञान हो।
वर्तमान में पूरा भारतीय समाज पश्चिम के सांस्कृतिक हमले और आर्थिक घुसपैठ की चपेट मेें है। वह दरक रहा है। विडम्बना यह है कि लगभग सभी अखबार इस हमले और घुसपैठ को रोकने तथा पाठक को उससे आगाह करने के बजाय खुद उसके वाहक बन बैठे हैं। चूंकि, अखबार निकालने वाले लोग वही हैं, जो उस घुसपैठ से लाभान्वित हो रहे हैं, इसलिए वे पहरुए की भूमिका निभाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। भविष्य में पश्चिम का बाजार और ज्यादा हावी होगा, सांस्कृतिक हमला और ज्यादा तेज होगा, नतीजतन हमारे मूल्य तिरोहित होंगे, समाज विखंडित होगा और कुल मिलाकर हम कमजोर होंगे। अंदेशा इस बात का है कि अखबार अपने मौजूदा चरित्र को पकड़े रहने पर आमादा रहेंगे। मात्र पाठकीय दबाव ही ऐसा अकेला जरिया है, जिसके बूते अखबारों को सही रास्ते पर लाया जा सकता है। इसलिए भविष्य के वास्ते पाठकों की दोहरी जिम्मेदारी है कि वे न केवल उस खतरे से खुद आगाह रहें बल्कि अखबारों की दशा और दिशा को भी नियंत्रित रखें।
एक अंगेरजी अखबार के संपादक ने पद मुक्त होने के अवसर पर लिखे अपने 'विदा- लेख' में पाठकों को 'मी लॉर्ड' से संबोधित किया। कितना अच्छा लगता है पाठक के लिए 'मी लॉर्ड' का यह संबोधन! लेकिन इसी के साथ दु:ख भी होता है कि हमारे ज्यादातर अखबार अपनी कथनी और करनी के जरिये पाठकों के इस सम्मान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। हमें जागरूक पाठक होने के नाते अपनी इस अपमानजनक स्थिति को खत्म करना होगा। इसके लिए एक पाठकीय यज्ञ वक्त का तकाजा है जिसमें समिधा डालना हम सभी का युगधर्म है। तभी पत्रकारिता की उज्ज्वल संभावनाओं के जगमग टापू फैलते नजर आयेंगे।
संपर्क: 12, टाइप-4, सेक्टर बी, पिपलानी, भोपाल 462021 मो. 093018 20315

Jul 11, 2010

बाजारवाद से हारे जन- सरोकार

बाजारवाद से हारे जन- सरोकार
- एल. एन. शीतल
पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या इस कदर घट रही है कि घर चलाने के लिए स्त्रियां पशुओं की मानिंद खरीदकर लायी जा रही हैं। पुरुषों की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा होने के फलस्वरूप महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं।
श्रेष्ठ मीडिया वह होता है, जो लोगों को सही, सटीक और बेबाक सूचनाएं दे, आने वाले खतरों से आगाह करे, समाज में व्याप्त विसंगतियों को खत्म करने का माहौल बनाये, लोगों को उनसे जूझने के लिए प्रेरित करे, और एक सच्चे मित्र की तरह मानव-मात्र के दीर्घकालिक हितों का संवद्र्धन करे। यही वे कसौटियां हैं, जिनके जरिये हम मीडिया के खरेपन की जांच कर सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि बाजारवाद के इस दौर में शाश्वत मूल्य निरंतर क्षीण हो रहे हैं और अस्थायी महत्व की बिकाऊ चीजें उत्तरोत्तर हावी होती जा रही हैं। हरियाणा की मीडिया ने माटी के प्रति अपने तकाजों को कहां तक पूरा किया है, इसकी तर्कसंगत पड़ताल के लिए हमें यह जानना होगा कि मौजूदा वक्त में ऐसे कौन से मसले हैं, ऐसी कौन-सी समस्याएं हैं, जिनसे हमें दो-चार होना पड़ रहा है। यदि हम सर्वोच्च प्राथमिकता वाली सामाजिक विसंगतियों को सूचीबद्ध करें, तो पायेंगे कि बेकाबू भ्रष्टाचार, लैंगिक विषमता, उत्तरोत्तर बढ़ती नशाखोरी, लोक- धरोहर की उपेक्षा, मातृ- शक्ति की आपराधिक अवमानना, तात्कालिक चिंता एवं चिंतन का विषय हैं।
सबसे पहले लैंगिक विषमता को लीजिए। देश में स्त्री-पुरुष अुनपात में विषमता निरतंर बढ़ती जा रही है। हम यह भूल जाते हैं कि जिन समाजों में मातृ-शक्ति का निरादर होता है, वे मिट जाया करते हैं। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या इस कदर घट रही है कि घर चलाने के लिए स्त्रियां पशुओं की मानिंद खरीदकर लायी जा रही हैं। पुरुषों की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा होने के फलस्वरूप महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। यदि मीडिया पर चौकस निगाह डालें तो इस समस्या के बारे में शायद ही कुछ ऐसी सामग्री छपी मिले, जिसे पढ़कर जनमानस में नारी- अपमान के प्रति घृणा पैदा हो। हां, अखबारों में कन्या-भ्रूण हत्या के लिए ऐसे छद्म विज्ञापन अवश्य मिलेंगे, जो प्रकटत: सिर्फ यह बताते हैं कि गर्भ परीक्षण से जान लें कि गर्भस्थ शिशु स्वस्थ है या नहीं।देश में नशे का प्रचलन बढ़ा है। यह, हमारे युवा वर्ग को किस तरह तबाह कर रही है, यह जगजाहिर हकीकत है। यह भी स्थापित सत्य है कि सामाजिक अभिशापों को ताकत के बूते खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए सामाजिक सोच अनिवार्यत: बदलनी होती है। इसमें मीडिया की भूमिका निस्संदेह कारगर होनी चाहिए। अफसोस की बात है कि मीडिया शराब के खिलाफ जनमत तैयार करने वाली सामग्री ढूंढ़े नहीं मिलती।
हर राज्य की अपनी एक सांस्कृतिक धरोहर होती है। वहां के समाज का दायित्व होता है कि वह केवल उस धरोहर को सुरक्षित रखे, बल्कि उसे ज्यादा समृद्ध भी बनाये। लोक-कलाओं, लोक-शिल्पों और लोक साहित्य की जितनी उपेक्षा हमारे यहां है, उतनी शायद ही किसी अन्य राज्य में हो। अखबारों में आपराधिक घटनाओं की चटखारेदार खबरों, पतियों को खुश रखने के फार्मूलों तथा खुद को आकर्षक बनाने के तरीकों जैसी सामग्री तो धड़ल्ले से छपती है, लेकिन लोक-कलाकारों लोक प्रतिभाओं तथा लोक-शिल्पकारों को बढ़ावा देने वाली सामग्री बहुत कम और सतही होती है। मीडिया का काम जन-रुचि को परिष्कृत करना और सकारात्मक बातों के प्रति रुझान पैदा करना भी होता है। लेकिन मीडिया समाज की सामूहिक सोच को विकृत करने और उसे बाजारू बनाने पर आमादा है, क्योंकि उपभोक्तावाद का यही तकाजा है। ...और हमारा मीडिया बाजारवाद को बढ़ावा देने वाला कारगर औजार साबित हुआ है। ऐसे अनेक अंधविश्वास और रूढि़य़ां आज भी प्रचलित हैं, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए सर्वथा त्याज्य हैं। किंतु, हमारा मीडिया, ऐसे अंधविश्वासों को या तो महिमामंडित करता नजर आता है या फिर मूकदर्शक बना दिखता है। निंदा तो वह कभी करता ही नहीं।
यों तो, जातिवाद की आदिम प्रवृत्ति लगभग सभी राज्यों में विद्यमान है। लेकिन हमारे राज्य में जातीयता जिस व्यापकता के साथ मौजूद है, वह एक स्वस्थ समाज की निशानी नहीं कही जा सकती। खेद की बाद है कि लोग रहन-सहन तथा दिखावे की अन्य तमाम बातों में तो बहुत तरक्की कर गये हैं, लेकिन जातिवाद और गोत्रवाद के मामले में वे आदिम युग की तरह ही संकीर्ण मानसिकता में जी रहे हैं। साक्षरता बढ़ी है, और तथाकथित शिक्षा भी, लेकिन उसी अनुपात में जातिवाद भी बढ़ा है। जबकि इसे निरंतर कम होना चाहिए था। समाचार-पत्र जातिवाद की घृणित राजनीति पर कारगर प्रहार करने में अभी तक तो नाकाम ही रहे हैं।
शॉर्टकट अपना कर रातोरात करोड़पति बनने की ललक ने हमारे युवाओं को कुछ ज्यादा ही पथभ्रष्ट कर दिया है। आज इसके कारणों की तह में जाने और उन्हें निर्मूल करने की जरूरत सबसे ज्यादा है। यहां भी, फिर वही अफसोस कि हमारे अखबारों में अपराधों की रिपोर्टें तो आकर्षक ढंग से छपती हैं, लेकिन उन प्रवृत्तियों पर विचार-पूर्ण सामग्री नहीं छपती, जो हमारे समाज को एक अपराधी-समाज के रूप में परिणत कर रही है।
अंत में, एक अत्यंत नाजुक और बेहद संवेदनशील मसला है- जातीय और गोत्रीय पंचायतों का। यह अभिशाप पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान को बुरी तरह से अपने चंगुल में जकड़े हुए है। दर्जनों युवा जोड़ों की जानें खाप पंचायतों के फतवे ले चुके हैं। ये क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा हैं। एक प्रगतिशील लोकतंत्र होने के नाते हमारे देश में संविधान के अंतर्गत अदालतें, पुलिस प्रणाली और मानव-अधिकार आयोग जैसी सभी नियामक व्यवस्थाएं विद्यमान हैं। किंतु, इन क्षेत्रों में जातीय एवं गोत्रीय पंचायतों की दखलंदाजी बदस्तूर जारी है। पहले छोटी पंचायत होती है, फिर उसके फैसले को उलटने के लिए बड़ी पंचायत। ...और इस तरह वर्चस्व हासिल करने के लिए पंचायतों का अंतहीन सिलसिला जारी रहता है। जरा गौर कीजिए। मुसलमानों के
कबाइली समाज में भी यही होता रहा है। वहां, कबाइली सरदारों की आस्था तो अदालतों में है, और अपने देश के कानूनों में। किसी भी लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं के समानांतर व्यवस्था की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस तरह के पंचायती फतवों से, और उन पर अमल के लिए लट्ठ का जोर इस्तेमाल किये जाने से हम उसी व्यवस्था का समर्थन करते प्रतीत होते हैं, जो अतिवादी इस्लामी तत्त्व बंदूक के जोर पर मध्यकालीन प्रथाओं को जारी रखने के लिए कर रहे हैं। यही नहीं, हम कहीं कहीं संविधान विरोधी कृत्य भी कर रहे होते हैं, क्योंकि वह व्यवस्था संवैधानिक संस्थाओं के समानांतर और उन पर चोट करती नजर आती है। ये पंचायतं महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचारों, शराब के प्रचलन, लैंगिक विषमता, और निठल्लेपन की बढ़ती प्रवृत्ति पर चोट करतीं, तो फिजा कुछ और ही होती। यहां, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हमारी नाइत्तफाकी पंचायतों से नहीं, उनके स्वरूप और उनके एजेंडे से है। पंचायतें किसी जाति अतवा गोत्र- विशेष की होकर पूरे समाज की होनी चाहिए। उनके एजेंडे में सामाजिक अभिशापों का उन्मूलन सबसे ऊपर होना चाहिए। इस प्रसंग में क्या यह चिन्ता का विषय नहीं कि हमारे किसी भी अखबार ने आज तक यह बताने का साहस नहीं दिखाया कि पंचायतों का वास्तविक स्वरूप और एजेंडा क्या होना चाहिए।
चिन्ता की सबसे अहम वजह है- अर्श से लेकर फर्श तक फैला भ्रष्टाचार, जिसे सबसे पहले राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की थी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने, जिन्होंने कहा था- ऐसा कौन सा देश है जहां भ्रष्टाचार नहीं है। आज हालात इस कदर बिगड़ गये हैं कि जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है, उसे 'लल्लू' मान लिया जाता है। तमाम बड़े मीडिया घराने भ्रष्टाचार से दौलत के टापू खड़े करने में सबसे आगे हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद रखना निरी मूर्खता ही मानी जायेगी कि वे देश के सबसे बड़े शत्रु-'भ्रष्टाचार' के खिलाफ कोई मुहिम छेड़ेंगे अथवा ऐसी किसी मुहिम का हिस्सा बनेंगे।
निष्कर्ष यह कि मीडिया नित नये उत्पादों की बिक्री बढ़ाने का माध्यम मात्र बनकर रह गया है, और वह आम आदमी की चिंताओं को कारगर ढंग से पेश नहीं करके उनकी आपराधिक उपेक्षा कर रहा है। वह उच्च वर्ग में शामिल होने को आतुर मध्यम वर्ग का नुमाइंदा ज्यादा नजर आता है। समाज के दीर्घकालिक सरोकारों से उसका कहीं कोई वास्ता नजर नहीं आता। लगभग सभी अखबार अपने पाठक को तटस्थ सूचनाओं और निष्पक्ष विश्लेषण से वंचित रखकर समाचार और विचार में पूर्वाग्रह ठूंस रहे हैं। वे विज्ञान के नये आविष्कारों से अवगत कराने के स्थान पर विज्ञापनी उत्पादों को महिमामंडित करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं। उनकी यह भूमिका एक बड़े अशुभ का संकेत है। वे शहरी पाठकों को अपनी सुविधा से सामग्री परोसते हैं। परोसने की इस शैली का उद्देश्य पाठकों के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करना कम, विज्ञापनदाता के हितों की रक्षा करना ज्यादा है। दूसरी तरफ, वे ग्रामीण क्षेत्र की घोर उपेक्षा कर रहे हैं। ऐसा, वे अनजाने में नहीं, जानबूझकर कर रहे हैं। ग्रामीणों की कौन-सी समस्याएं हैं, इसकी बहुत कम चिंता अखबारों को है। जीवन के हर क्षेत्र में क्षुद्र राजनीतिक दखलंदाजी जिस खतरनाक हद तक बढ़ी है, उसका प्रतिकार करने में अखबार नाकाम रहे हैं। मीडिया की मौजूदा दशा के मद्देनजर तो यही लगता है कि-
बरबाद गुलिस्तां करने को
बस एक ही उल्लू काफी है,हर शाख पर उल्लू बैठा है,अंजामे गुलिस्तां क्या होगा।