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Aug 1, 2025

साक्षात्कारःप्रेरणा देती हैं विज्ञान कथाएँ- डॉ. जयंत नार्लीकर

  - चक्रेश जैन

वर्ष 2008 में डॉ. जयंत नार्लीकर का इंदौर आना हुआ था। तब विज्ञान संचारक चक्रेश जैन ने ‘विज्ञान कथा’ विषय पर उनके साथ भेंटवार्ता की थी। प्रस्तुत है उनकी यह भेंटवार्ता...

सवाल: विज्ञान कथाएँ लिखने की प्रेरणा किससे मिली? 

जवाब: देखिए, प्रेरणा मुझे अपने गुरू फ्रेड हॉयल से मिली है। उन्होंने बहुत अच्छी विज्ञान कथाएँ लिखी हैं। उनकी पहचान एक विख्यात वैज्ञानिक के रूप में भी है। मैंने सोचा कि यदि एक वैज्ञानिक विज्ञान कथाएँ लिखे तो वह लोगों को विज्ञान की वास्तविकताओं के बारे में काफी अच्छी तरह से बता सकता है। 

सवाल: आपकी पहली विज्ञान कथा कौन-सी है? 

जवाब: मेरी पहली विज्ञान कथा ‘कृष्ण विवर’ (ब्लैक होल) थी। यह मैंने मराठी में लिखी है। मुम्बई की मराठी विज्ञान परिषद ने एक कथा प्रतियोगिता आयोजित की थी। इसमें मैंने अपनी विज्ञान कथा भेज दी। मैं यह नहीं चाहता था कि आयोजकों पर मेरी लोकप्रियता का प्रभाव पड़े। इसलिए मैंने एक नकली नाम नारायण विनायक जगताप चुना। शायद वे मेरी हैंडराइटिंग से परिचित होंगे, ऐसा सोचकर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि वे इस कहानी को अपनी हैंडराइटिंग में लिखे। हुआ यह कि उस विज्ञान कथा को पहला पुरस्कार मिला। आयोजकों ने नारायण विनायक जगताप को पत्र लिखा कि आपको पुरस्कार के लिए चुना गया है। परिषद के अधिवेशन में आप आमंत्रित हैं, लेकिन आपको टीए-डीए नहीं दिया जाएगा। उसके बाद मैंने सोचा कि मैं अपने नाम से ही लिखूँ। 

मुम्बई से किर्लोस्कर नाम की एक पत्रिका निकलती है। तब उसके संपादक श्री मुकुन्दराव किर्लोस्कर थे। उन्होंने कहा कि आप हमारी पत्रिका के लिए विज्ञान कथाएँ लिखिए, तब मैंने पहली विज्ञान कथा लिखी। 

सवाल: ऐसी कोई घटना जिसने आपको विज्ञान कथा लिखने के लिए प्रेरित किया हो? 

जवाब: मेरी अधिकांश विज्ञान कथाएँ, हम जो कुछ देखते या अनुभव करते हैं, उन विषयों पर हैं। जैसे भोपाल में गैस त्रासदी हुई या कोई अभिनव कम्प्यूटर मिल गया तो उसका प्रभाव मन पर पड़ा और ऐसा लगा कि उसे कथा के रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाए।

सवाल: आपकी विज्ञान कथाओं की थीम क्या है? 

जवाब: मेरी कहानियों की कोई एक विशेष थीम नहीं है। मैं भविष्य की ओर देखता हूँ। विज्ञान का रूप आगे चलकर क्या होगा, उस रूप को लिखता हूँ। 

सवाल: आप कितनी विज्ञान कथाएँ लिख चुके हैं? 

जवाब: मैंने 25 से अधिक विज्ञान कथाएँ और उपन्यास लिखे हैं। हिंदी उपन्यास आगंतुक नाम से प्रकाशित हुआ है। इसकी मुख्य थीम है कि पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर भी जीवन हो सकता है। मेरा अंग्रेज़ी में एक उपन्यास दी रिटर्न आफ वामन नाम से है। इसमें पृथ्वी पर पहले भी कोई अति विकसित संस्कृति होने और उसके विनाश के कारणों की चर्चा की गई है। 

सवाल:  विज्ञान कथाओं का उद्देश्य क्या है? 

जवाब: देखिए, विज्ञान कथा लिखने के कई उद्देश्य हैं। पहला, स्वान्त: सुखाय है। लिखने से एक तरह का सुकून मिलता है। दूसरा, समाज में विद्यमान अंधविश्वासों को विज्ञान कथाओं के माध्यम से दूर किया जा सकता है। तीसरा, भावी विज्ञान के स्वरूप के बारे में लोगों को बताया जा सकता है।

सवाल: क्या विज्ञान कथाओं से अनुसंधान की नई दिशा या प्रेरणा मिलती है? 

जवाब: हाँ मिल सकती है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड हॉयल ने जो पहली विज्ञान कथा लिखी थी, उसमें उन्होंने कल्पना की थी कि अंतरिक्ष में वायु के विशाल मेघ हैं, लेकिन तब लोगों को विश्वास नहीं हुआ था कि इस तरह के मेघ हो सकते हैं। बाद में माइक्रोवेव टेक्नॉलॉजी से ऐसे मेघ दिखाई दिए। हो सकता है विज्ञान कथाओं से अनुसंधान को नई दिशा मिले। हालांकि, कोई नई कल्पना साइंटिफिक जर्नल में नहीं छप सकती, क्योंकि वह मनगढंत भी हो सकती है। 

सवाल: बच्चों को परी कथाओं से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। वे चांद-सितारों के जन्म-मरण, रोबोट आदि के बारे में जानना चाहते हैं। बच्चों के लिए किस तरह की विज्ञान कथाएँ होनी चाहिए? 

जवाब: दूरदर्शन पर कुछ वर्षों पहले स्टार ट्रैक नाम की विज्ञान कथा दिखाई गई थी। इसे सभी ने देखा, लेकिन बच्चों ने इसे बहुत पसंद किया। वे पूरे सप्ताह इस सीरियल का इंतज़ार करते थे। दरअसल, इस सीरियल में विभिन्न ग्रहों की रोमांचक यात्राओं की रोचक कहानी है। इन यात्राओं की कथाओं को कई विज्ञान लेखकों ने मिलकर लिखा है। इसमें अंतरिक्ष यान, लेज़र आदि के प्रयोगों के बारे में दिखाया गया है। इससे वैज्ञानिक कल्पनाओं को बढ़ावा मिला। मुझे लगता है कि आधुनिक युग में बच्चों के लिए विज्ञान कथाएँ होनी चाहिए, जो उनका दिल बहला सकें और साथ ही उन्हें विज्ञान की ओर आकर्षित भी कर सकें। 

सवाल: आप यह सोचते हैं कि विज्ञान कथाएँ लोगों में विज्ञान में रुचि पैदा करती हैं? 

जवाब: मेरा अनुभव है कि पहले लोग विज्ञान कथाओं के बारे में यही सोचते थे कि वे केवल विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी हैं। उसमें मनोरंजन जैसी कोई चीज़ नहीं है। यदि अच्छी विज्ञान कथाएँ लिखी जाएँ तो इनसे लोगों के मन में विज्ञान के प्रति जो भय है, उसे दूर किया जा सकता है। 

सवाल: विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के प्रयास हो रहे हैं। हमें इस दिशा में किस तरह के प्रयासों पर ज़ोर देना चाहिए?

जवाब: वास्तव में देखा जाए तो ये प्रयास अनेक दिशाओं में किए जा सकते हैं। टेलीविज़न, रेडियो आदि पर इस तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा सकते हैं। समाचार पत्रों में विज्ञान का एक पूरा पृष्ठ दिया जा सकता है, लोकप्रिय व्याख्यानों का आयोजन किया जा सकता है। रोज़मर्रा के वैज्ञानिक उपकरणों की जानकारी रोचक ढंग से दी जा सकती है। प्रदूषण, ऊर्जा संकट के दुष्परिणामों की तस्वीर भी लोगों के बीच रखी जा सकती है। कुल मिलाकर विज्ञान के वास्तविक चेहरे से लोगों को अवगत कराया जा सकता है।

सवाल: अच्छी विज्ञान कथाओं की कसौटी क्या है? 

जवाब: पहले यह बताता हूँ कि क्या नहीं होना चाहिए। विज्ञान कथाएँ ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसमें केवल परियों के जादू की चर्चा हो। उनमें भय और आतंक की घटनाओं का भी उल्लेख नहीं होना चाहिए। वास्तव में विज्ञान कथाएँ ऐसी होनी चाहिए जो विज्ञान के नियमों की जानकारी दें और भविष्य की ओर देख सकें। विज्ञान कथाओं के सकारात्मक पक्ष के बारे में यही कहा जा सकता है कि विज्ञान में हुई उन्नति से समाज पर जो प्रभाव पड़ेगा, उसे कथा के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाए। 

सवाल: हिंदी में विज्ञान कथाओं का अभाव क्यों है? 

जवाब: मैं सोचता हूँ, अधिकांश साहित्यकार ऐसे हैं जिन्होंने विज्ञान नहीं पढ़ा है। वे अत्यंत प्रभावशाली साहित्यकार भले हों, लेकिन विज्ञान सम्बंधी साहित्य को ज़रा डर से देखते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसी कोई नई बात है, जो साहित्य में नहीं बैठती। यह सोच धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। यह मराठी का परिदृश्य है। हिंदी में भी यही स्थिति है। कुछ प्रतिष्ठित साहित्यकार जिनकी कलम में ताकत है, यदि वे वैज्ञानिकों से चर्चा करके विज्ञान की जानकारी लें और उसे कथा या उपन्यास के रूप में लिखें, तो निश्चित रूप से विज्ञान कथा साहित्य समृद्ध होगा। मुझे ऐसा नहीं लगता कि विज्ञान कथाएँ लिखने के लिए विज्ञान में पीएच.डी. होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

Jan 1, 2025

विज्ञान राउंड अपः वर्ष 2024 अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान जगत - चक्रेश जैन

  - चक्रेश जैन

साल 2024 में कृत्रिम बुद्धि यानी एआई के उपयोग का दायरा बढ़ता रहा - मौलिक कविता लेखन से लेकर चुनाव में मतदाताओं को लुभाने तक इसका इस्तेमाल हुआ। कहना मुश्किल है कि यह विस्तार कहाँ पहुँचकर थमेगा। 

यह वही वर्ष है, जब जनरेटिव एआई से सृजित लार्ज लैंग्वैज मॉडल द्वारा शोध पत्रों की समकक्ष समीक्षा (पीयर रिव्यू) ने नए सवालों को जन्म दिया। 2024 के भौतिकी और रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों ने एआई आधारित अनुसंधान कार्य को मुहर अचंभित कर दिया।

इस वर्ष पेरिस में आयोजित ओलंपिक खेलों में एआई का जलवा दिखा। खिलाड़ियों के प्रशिक्षण से लेकर कार्यक्रमों के प्रसारण में एआई शामिल रहा। वर्जीनिया युनिवर्सिटी के गणितज्ञ केन ओनो ने गणितीय मॉडलिंग के ज़रिए अमेरिकी तैराकों को इस लायक बनाया कि वे शानदार प्रदर्शन करते हुए पदक बटोरने में कामयाब रहे।

वर्ष 2024 में जापान ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दो ऐतिहासिक सफलताएँ हासिल कीं। 20 जनवरी को वह चंद्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पाँचवा देश बन गया। 5 नवंबर को लकड़ी से बना उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर इतिहास रचा। ऐसा कर जापान ने इको फ्रेंडली उपग्रहों का मार्ग प्रशस्त किया है। इस उपग्रह को ‘लिगनोसैट’ नाम दिया गया है। 

इसी वर्ष साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन में यह खुलासा किया गया कि मंगल ग्रह पर अरबों साल पहले पानी मौजूद था। सच तो यह है कि काफी समय से यह माना जाता रहा है कि मंगल ग्रह के आरंभिक इतिहास में पानी की अहम भूमिका रही है।

साल की शुरुआत में ही नासा ने आर्टिमिस चंद्र मिशन कार्यक्रम एक वर्ष के लिए स्थगित कर दिया। इस मिशन का उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर पुन: उतारना है।

वर्ष 2024 में अंतरिक्ष में पहली बार एक निजी कंपनी ने अपने शक्तिशाली रॉकेट से एक केला भेजा, इसका उद्देश्य अंतरिक्ष में शून्य गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का अध्ययन करना है।

इसी वर्ष चीन का अंतरिक्ष यान चांग-ए-6 यान 53 दिनों की यात्रा पूरी कर चंद्रमा के सुदूर क्षेत्र से मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र करके पृथ्वी पर लौट आया है। चीन को इस दिशा में पहली बार बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका और सोवियत संघ पहले ही चंद्रमा के निकटस्थ भाग से नमूने ला चुके हैं।

विदा हो चुके वर्ष 2024 में पहली बार प्रतिपदार्थ (एंटी मैटर) को प्रयोगशाला से बाहर ले जाने का प्रयास किया गया। इस असाधारण उपलब्धि के लिए सर्न प्रयोगशाला के अनुसंधानकर्ताओं की दो टीमों में होड़ जारी रही। हर पदार्थ-कण का एक प्रतिपदार्थ होता है। भौतिकशास्त्र के अध्येताओं का मानना है कि बिग बैंग के दौरान प्रतिपदार्थ और पदार्थ समान मात्रा में बने थे। प्रतिपदार्थ को पृथ्वी पर सबसे महँगा पदार्थ माना जाता है। एक ग्राम प्रतिपदार्थ बनाने की लागत खरबों डॉलर आएगी।

इसी वर्ष अनुसंधानकर्ताओं ने एक फोटॉन से दुनिया का सबसे छोटा क्वांटम कंप्यूटर बनाने में सफलता हासिल की। क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम यांत्रिकी सिद्धांत पर आधारित होते हैं।

साल 2024 में पहली बार मनुष्य में जेनेटिक रूप से संशोधित सुअर के गुर्दे का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण किया गया। अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में इसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है।

वर्ष 2024 में जीवविज्ञान की सबसे महत्त्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी परियोजना मानव कोशिका एटलस का पहला मसौदा जारी किया गया। इस परियोजना का उद्देश्य मनुष्य की प्रत्येक कोशिका का जेनेटिक मानचित्र तैयार करना है। फिलहाल इसमें 620 लाख मानव कोशिकाओं का डैटा है। इस अनुसंधान से आगे चलकर गंभीर बीमारियों के बारे में सटीक जानकारियां उपलब्ध हो सकेंगी। ‘विकिपीडिया फॉर सेल्स’ नाम की इस परियोजना की शुरुआत 2016 में हुई थी। दस वर्षीय परियोजना पूरी होने की दहलीज पर है। इसमें 102 देशों ने सहभागिता की है।

नेचर के अनुसार पहली बार माइटोकॉन्ड्रिया के दो प्रकारों का पता चला। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा भण्डार कहा जाता है। वहीं अनुसंधानकर्ताओं ने टमाटर में से दो जीन हटाकर मीठे टमाटर का सृजन किया, जिसका उपयोग मधुमेह रोग से लड़ने में हो सकता है।

नेचर पत्रिका के अनुसार पहली बार एक महिला वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में वायरस का सृजन कर अपने कैंसर का इलाज किया। यह अपने ढंग का अनूठा और चुनौतीपूर्ण प्रयोग था।

इसी साल जनवरी में कंपनी न्यूरालिंक ने पहली बार किसी मनुष्य में इलेक्ट्रॉनिक चिप प्रत्यारोपित किया। यह पहला मानव परीक्षण था। 

पुरस्कार व समारोह

साल 2024 के विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों के लिए सात वैज्ञानिकों का चयन किया गया। चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार के लिए विक्टर एम्ब्रोस और गैरी रूवकुन को संयुक्त रूप से चुना गया। दोनों वैज्ञानिकों को यह सम्मान माइक्रो आरएनए पर अनुसंधान के लिए दिया गया है। 

भौतिकशास्त्र में नोबेल सम्मान जेफ्री हिंटन और जॉन हाॅपफील्ड को मशीन लर्निंग को सक्षम बनाने के लिए मिला है। वस्तुत: दोनों अनुसंधानकर्ताओं ने आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क को प्रशिक्षित किया है ताकि वह मनुष्यों की भांति सोच सके और सीख सके। 

इस साल का रसायन विज्ञान का नोबेल सम्मान डेविड बेकर, डेमिस हस्साबिस और जॉन जम्पर को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। जहां डेविड बेकर ने कंप्यूटेशनल प्रोटीन डिज़ाइन पर अनुसंधान किया है, वहीं डेमिस हस्साबिस और जॉन जम्पर ने प्रोटीन संरचना की भविष्यवाणी को लेकर शोधकार्य किया है। 

ब्रिटिश भौतिकीविद सर रिचर्ड हेनरी फ्रेंड को अर्द्ध चालक पदार्थों के क्षेत्र में शोध के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ फिज़िक्स द्वारा आइज़ैक न्यूटन मेडल से पुरस्कृत किया गया।

साल 2024 का बुनियादी चिकित्सा अल्बर्ट लास्कर पुरस्कार चीनी-अमेरिकी जैव रसायनविद ज़िजियान जेम्स चेन को दिया गया है। इस वर्ष का लास्कर ब्लूमबर्ग लोकसेवा पुरस्कार कुरैशा अब्दुल करीम और सलीम अब्दुल करीम को संयुक्त रूप से दिया गया है। दोनों ही अध्येता कोलंबिया युनिवर्सिटी में रोग प्रसार विज्ञान के विशेषज्ञ हैं।

साल 2024 का एबेल पुरस्कार फ्रांसीसी गणितज्ञ मिशेल पियरे टैलाग्रेंड को दिया गया है। उन्हें यह सम्मान गणितीय भौतिकी और सांख्यिकी में संभाव्यता सिद्धांत व कार्यात्मक विश्लेषण में विशेष योगदान के लिए मिला है।

अजरबैजान की राजधानी बाकू में 29वाँ संयुक्त राष्ट्र वार्षिक शिखर सम्मेलन हुआ। इसमें जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदायी विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। सबसे ज़्यादा ज़ोर जलवायु वित्त पोषण पर रहा। सम्मेलन को दी फाइनेंस कॉप नाम दिया गया है। सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेदों के कारण प्रमुख मुद्दों पर प्रगति अवरुद्ध रही।

वर्ष 2024 ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ कैमेलिड्स’ के रूप में मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के आव्हान पर अंतर्राष्ट्रीय ऊँट वर्ष मनाने का मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में ऊँट की अहम भूमिका उजागर करना था। 

इस वर्ष अमेरिकन केमिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका केमिकल रिव्यूज़ के सौ साल पूरे हुए। यह रसायन विज्ञान का शीर्षस्थ जर्नल है, जिसका प्रकाशन 1924 में शुरू हुआ था।

इसी साल 25 नवंबर को दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि पर आयोजित वार्ता में दुनिया भर के देशों के प्रतिनिधि जुटे। इस बार कुछ प्रस्तावों पर सहमति दिखाई दी, लेकिन महत्त्वपूर्ण मुद्दे नहीं सुलझे और वार्ता बिखर गई।

इसी साल मेक्सिको में चुनाव संपन्न हुए, जिसमें देशवासियों ने पहली बार महिला वैज्ञानिक क्लॉडिया शीनबॉम को राष्ट्रपति चुना। उन्होंने वैज्ञानिक से राष्ट्रपति पद तक पहुंचने के सफर में कई चुनौतियों का सामना किया है।

स्मृतिशेष

साल 2024 में हमने कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं को खो दिया। 8 अप्रैल को ब्रिटिश भौतिकशास्त्री और तथाकथित गॉड पार्टिकल के खोजकर्ता पीटर हिग्ज़ का निधन हो गया। उन्हें 2013 में भौतिकशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

अतिचालकता सिद्धांत के अनुसंधानकर्ता लियान कूपर का 23 अक्टूबर को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें इस क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए 1972 में नोबेल सम्मान मिला था।

इसी वर्ष 4 अगस्त को विख्यात भौतिकीविद प्रोफेसर त्संग दाओ ली का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें 1957 में भौतिकी का नोबेल सम्मान मिला था। वे सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार के लिए चुने गए दूसरे वैज्ञानिक थे। उन्होंने कण भौतिकी में विशेष योगदान दिया था। 

स्वीडिश जैव रसायनज्ञ बेंग्ट सैमुएलसन की 5 जुलाई और जे. रॉबिन वारेन की 23 जुलाई को मृत्यु हो गई। दोनों वैज्ञानिकों को चिकित्सा विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

17 अक्टूबर को चिकित्सा विज्ञान में नोबेल विजेता एंड्रयू वी. स्काली का देहांत हो गया। उन्होंने दो दशकों तक मस्तिष्क में मौजूद हारमोन की भूमिका पर अनुसंधान किया था। उन्हें इस शोधकार्य के लिए 1975 में अल्बर्ट लास्कर पुरस्कार और 1977 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान प्रदान किया गया था। (स्रोत फीचर्स)

Aug 14, 2013

स्वाधीनता से साढ़े छह दशक और हमारा विज्ञान

स्वाधीनता से साढ़े छह दशक और हमारा विज्ञान
- चक्रेश जैन
   

भारत ने 15 अगस्त 1997 के दिन अपनी स्वाधीनता के 50 वर्ष पूरे होने पर स्वर्ण जयंती मनाई थी। एक स्वाधीन राष्ट्र के इतिहास में विज्ञान यात्रा के लिहाज़ से यह अवधि बहुत छोटी है। समीक्षकों के अनुसार हम स्वाधीनता का पूर्वार्द्ध पार कर उत्तरार्द्ध में प्रवेश कर चुके हैं। इस वर्ष आबादी के लगभग साढ़े छह दशक पूरे हो चुके हैं। यह वही वर्ष है, जब जनवरी में भारत सरकार ने साइंस कांग्रेस के शताब्दी समारोह में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति की घोषणा करते हुए नवाचारों को विशेष घटक के रूप में सम्मिलित किया है। भले ही हमने बीते दशकों में अंतरिक्ष विज्ञान, प्रक्षेपास्त्र, परमाणु ऊर्जा और एक-दो अन्य क्षेत्रों में उपलब्धियों के नए अध्याय रचे हैं, लेकिन नवाचारों के मामले में हमारा हाल चिन्ता की परिधि में है। विज्ञान जगत के विश्लेषकों के अनुसार स्वाधीनता के साढ़े छह दशकों में भारत ने वैज्ञानिक तरक्की तो की है, लेकिन तरक्की की रफ्तार बेहद धीमी है।
स्वाधीन भारत में विज्ञान की चर्चा करते समय दो सवाल हमेशा प्रासंगिक होते हैं। पहला, स्वाधीनता के बाद आर्थिक-सामाजिक बदलावों में विज्ञान की कितनी भूमिका रही है? दूसरा, विज्ञान में हुई रिसर्च का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचा है अथवा नहीं? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर हाल के दशकों में प्रौद्योगिकी अर्थात व्यावहारिक विज्ञान के रूप में हमारे सामने हैं। आज जो 'आधार संख्या करोड़ों देशवासियों को मिली है, वह विज्ञान की समाज को देन है। बॉयोमेट्रिक्स असल में जीव विज्ञान की शाखा है, जिसने आम आदमी की आधार संख्या बनाने में अहम भूमिका निभाई है। दिल्ली की मेट्रो रेल परियोजना प्रौद्योगिकी का अनुपम उदाहरण है। ऐसा लगता है, स्वाधीन भारत के उत्तरार्द्ध में विज्ञान और समाज के रिश्ते प्रगाढ़ होते जा रहे हैं।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक शोध पर विशेष ज़ोर दिया था। उनका कहना था कि वैज्ञानिक संस्थान आधुनिक भारत के मंदिर हैं और राष्ट्र के विकास और निर्माण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हमारे यहां स्वाधीनता के बाद सुनियोजित विकास का दौर 1952 में प्रथम पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ, जो अब बारहवीं योजना तक पहुँच  गया है। योजनाकारों ने विज्ञान को विकास की कुंजी मानते हुए सभी पंचवर्षीय कार्यक्रमों में वैज्ञानिक अनुसंधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार मार्च 1958 में संसद ने विज्ञान नीति को मंज़ूरी दी थी। इस नीति का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसका उद्देश्य देश में विज्ञान को प्रोत्साहन देना और इसका लाभ आम जनता को प्रदान करना है।
1950-51 में शोध और विकास का बजट 4.7 करोड़ रुपए था, जो आज की तुलना में बहुत कम था। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन वर्षों बाद अधोसंरचना के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई। स्वाधीन भारत में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) देश का सबसे बड़ा रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट संगठन है, जिसके झण्डे तले 37 प्रयोगशालाएँ हैं।
आज़ादी के बाद सभी सरकारों ने वैज्ञानिक अनुसंधान को आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों से जोड़ा है। आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के लिए समावेशी विकास को महत्त्व दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने आधुनिक शोध के ज़रिए जो प्रौद्योगिकी विकसित की है, उसका उपयोग ग्राम संसाधन केन्द्रों और दूर चिकित्सा कार्यक्रम में हो रहा है। स्वदेशी उपग्रहों का उपयोग संचार, प्रसारण, मौसम और आपदा प्रबंधन में हो रहा है। यही नहीं हमारा शैक्षणिक उपग्रह एडुसैट अंतरिक्ष में गुरुजी की भूमिका निभा रहा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनों में कृषि के विकास और वैज्ञानिक विधियों से उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ज़ोर दिया गया। स्वाधीनता के बाद भारत में संचार क्रांति हुई है। 1947 के आसपास देश में टेली घनत्व 0.02 प्रतिशत था, जो 2012 में बढ़कर 79.28 प्रतिशत तक पहुँच  गया। स्वतंत्र भारत में हरित, नील और श्वेत क्रांति का सूत्रपात हुआ। हमारे यहाँ जैव प्रौद्योगिकी क्रांति अस्सी के मध्य दशक में आरंभ हुई। वर्तमान में भारत टीकों के उत्पादन में सक्षम हो चुका है। हाल के दशक में हम बीटी कॉटन की खेती में सबसे बड़े उत्पादक देश बन चुके हैं।
अलबत्ता, आज़ादी के 66 वर्षों बाद भी वैज्ञानिक शोधकार्य प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों के कैम्पस तक सीमित है। इसका लाभ जनसामान्य के बीच नहीं पहुँचा है। युवा प्रतिभाओं की मूलभूत विज्ञान में कैरियर बनाने में रुचि नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में शोध पत्रों की प्रकाशन संख्या बहुत कम है। भारत में आज़ादी के साढ़े छह दशकों के दौरान हुए आविष्कारों और खोजों की संख्या न के बराबर है। स्वाधीनता प्राप्ति के छह दशक बाद कृषकों को पता नहीं है कि 'जीएम बीज किस चिड़िया का नाम है। सच पूछा जाए तो जेनेटिक साक्षरता के मामले में हमारी हालत बुरी है। आज भी ग्रामीण लोग गरीबी, कुपोषण, स्वच्छ जल और बीमारियों के संदर्भ में वैज्ञानिक तरीकों से अनजान व अछूते ही हैं।
सब मिलाकर कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक बिरादरी के सामने एक प्रश्न यही है कि वह आज़ादी का जश्न कैसे मनाएँ? हर वर्ष की तरह अपनी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों को याद करते हुए खुश महसूस करें या फिर ऐसा प्रयास करें कि स्वाधीनता से पहले भारत ने जिस तरह नोबेल सम्मान प्राप्त किया था, वैसा सम्मान आज़ादी की सौवीं सालगिरह यानी 2047 से पहले फिर मिले? स्वाधीनता के उत्तराद्र्ध में हम विश्व के वैज्ञानिक मानचित्र पर जगह बना चुके हैं, लेकिन विशिष्ट जगह बनाने की मंज़िल दूर है। (स्रोत फीचर्स)

Jan 18, 2013

विज्ञानः गॉड पार्टिकल का साल

 -चक्रेश जैन

मानव जीनोम और हिग्ज़ बोसान रिसर्च को वर्ष 2012 की विज्ञान जगत की अति महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों मे शुमार किया जा सकता है। दुनिया की 32 प्रयोगशालाओं के 400 जीव विज्ञानियों ने यानी एनसाइक्लोपीडिया ऑफ डीएनए एलिमेंटस ('एनकोड’) महाशोध परियोजना के माध्यम से यह साबित कर दिया कि 'जंक डीएनएनिष्क्रिय नहीं है। सरल भाषा में कहें तो 'जंक डीएनएउस स्विच का काम करते हैं, जिससे प्रत्येक जीन की क्रिया चालू- बंद होती है। भावी शोध में इस स्विच की कार्यप्रणाली पर रोशनी डाली जाएगी। यह परियोजना वर्ष 2003 में मानव जीनोम के प्रत्येक अवयव की भूमिका खोजने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
वर्ष के उत्तरार्द्ध में विज्ञान की शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वनस्पतिविदों ने पहली बार केले के डीएनए का अनुक्रमण पूरा कर लिया। केला पहला गैर-घासीय एकबीजपत्री पौधा है, जिसके 36,000 जीन्स वाले जीनोम का अनुक्रमण किया गया है।
डीएनए अणु पूरे साल सुर्खियों में रहा। यह वही अणु है, जिसने एन.डी. तिवारी का पितृत्व विवाद सुलझाने में अहम भूमिका निभाई और डीएनए छाप से सिद्ध हो गया कि रोहित शेखर के जैविक पिता एन.डी. तिवारी ही हैं।
इस वर्ष 4 जुलाई को जिनेवा स्थित सर्न प्रयोगशाला में एक प्रेस कांफ़्रेंस में हिग्ज़ बोसान कण खोजे जाने की विधिवत् घोषणा की गई। इस कण को लोकप्रिय भाषा में 'गॉड पार्टिकलभी कहा जाता है। वास्तव में हिग्ज़ बोसान के साथ गॉड पार्टिकल नाम जुडऩे से हमारी जिज्ञासा बढ़ गई है। भौतिक शास्त्री तथा नोबेल विजेता लियोन लेडरमैन इस कण को 'गॉडडैम पार्टिकल’ (अभिशप्त कण) नाम देना चाहते थे, क्योंकि यह आज भी रहस्यपूर्ण है। उन्होंने बाद में इस विषय पर एक किताब लिखी और प्रकाशाक की इच्छा के अनुसार इसे 'गॉड पार्टिकलशीर्षक दे दिया।
इस कण का ईश्वर से कोई लेना देना नहीं है। बीते वर्षों में इस महाप्रयोग ने ब्राहृांड सम्बंधी हमारी समझ को समृद्ध किया है और पार्टिकल फिजि़क्स को ठोस आधार दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिग्ज़ बोसोन रिसर्च से भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटिंग और चिकित्सा के क्षेत्र में नई सँभावनाओं का मार्ग प्रशास्त होगा।
इसी वर्ष 6 जून को शुक्र ग्रह ने सूर्य का हाल-चाल जाना और आगे बढ़ गया। इसे विज्ञान की भाषा में शुक्र पारगमन कहा जाता है। प्रकृति के इस विलक्षण नज़ारे को लाखों लोगों ने जी भरकर देखा। अब यह खगोलीय घटना 105 वर्ष बाद देखी जा सकेगी। वैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से शुक्र पारगमन का अपना महत्त्व है। इस दौरान शुक्र और पृथ्वी के बीच की निश्चित दूरी ज्ञात करने और अन्य तारों की चमक के अध्ययन का मौका मिला।
बीते वर्ष मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं की पड़ताल जारी रही। 6 अगस्त को नासा का क्यूरिऑसिटी यान मंगल की सतह पर उतरा। मंगल की मिट्टी से प्राप्त कार्बनिक यौगिकों की पहचान से शोधार्थी उत्साहित हैं। इस वर्ष भारत ने मंगल ग्रह की जानकारियाँ जुटाने के लिए अपने मंगल ऑर्बाइटर अभियान को मंजूरी प्रदान कर दी। इसके लिए 450 करोड़ रुपए का प्रावधान है।
विदा ले चुके साल में चीन के अंतरिक्ष विज्ञान कार्यक्रम में नए अध्याय जुड़े। चीन की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री लिउ यांग तेरह दिनों की यात्रा के बाद 29 जून को पृथ्वी पर लौटीं। वर्ष के उत्तरार्द्ध में चीन को अंतरिक्ष में सब्ज़ियाँ उगाने में बड़ी सफलता मिली। भविष्य में मानव सहित अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए इस प्रयोग का महत्त्व है। गुज़रे साल भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में चार महीनों तक अभिनव और रोमांचक प्रयोग पूरे करने के बाद सकुशाल पृथ्वी पर लौट आर्इं। वे किसी अंतरिक्ष टीम का नेतृत्व करने वाली पहली महिला हैं।
इस वर्ष 26 अप्रैल को पीएसएलवी-19 की पीठ पर सवार होकर स्वदेशाी तकनीक से निर्मित दूरसंवेदी उपग्रह रीसैट-1 अंतरिक्ष में पहुँचा। यह उपग्रह बादलों की ताज़ा स्थिति से अवगत करा रहा है। यह वही वर्ष था जब भारतीय वैज्ञानिकों ने 9 सितंबर को फ्रांस तथा जापान के उपग्रहों को अंतरिक्ष में विदा करते हुए अपने 100वें अंतरिक्ष मिशन की सफलता का जशन मनाया। 18 अप्रैल 1975 को अपने ही देश में बनाए गए आर्यभट् उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ इसरो ने अंतरिक्ष यात्रा आरम्भ की थी। 29 सितंबर को देश का सबसे भारी और अत्याधुनिक संचार उपग्रह जीसैट-10 सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। 750 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित जीसैट का वज़न 3.4 टन है।
गुज़रे साल हबल दूरबीन ने ब्राहृांड के कुछ दुर्लभ चित्र भेजे, जिसमें अनेक आकाशगंगाएँ  विद्यमान हैं। इसी दूरबीन से प्लूटो के एक और चंद्रमा होने का संकेत मिला, जिसे पी-5 नाम दिया गया है। इसी दूरबीन से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर वैज्ञानिकों ने एक वलयाकार आकाशागंगा खोजने का दावा किया था।
हबल दूरबीन के ज़रिए खगोल शास्त्रियों ने बौने लाल तारे ग्लीन 163 के समीप मानव के रहने लायक एक ग्रह की खोज की। 2009 में इस दूरबीन का पुनर्जन्म हुआ था। इस छोटी-सी अवधि में हबल ने ब्राहृांड के रहस्यों पर रोशानी डालते महत्त्वपूर्ण चित्र भेजे हैं। वर्ष के उत्तरार्द्ध में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की रिसर्च टीम ने सबसे बड़ा ब्लैक होल खोजने का दावा किया। ब्लैक होल से जुड़े अध्ययन पर इस खोज का गहरा प्रभाव पड़ेगा। एक अनुमान के अनुसार ब्रह्माण्ड में 400 से अधिक ब्लैक होल हो सकते हैं।
भारत में गणित जगत की विलक्षण प्रतिभा श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाई गई। इसका उद्देश्य स्कूल से लेकर उच्चतर शाोध तक गणित को प्रोत्साहित करना और आम लोगों में गणित के प्रति जागरूकता पैदा करना था। सभी विज्ञानों में गणित को 'क्वीनका स्थान प्राप्त है।
बीते वर्ष भी स्टेम कोशिकाओं पर शोध जारी रहा और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अध्येताओं ने रक्त से ही स्टेम कोशिकाएँ बनाने में सफलता प्राप्त की।
जून में रियो डी जेनेरो में पृथ्वी सम्मेलन हुआ, जिसे रियो प्लस 20 नाम दिया गया। इसमें टिकाऊ विकास, हरित अर्थ व्यवस्था और पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार मंथन किया गया। इसी वर्ष अक्टूबर में हैदराबाद में जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र का 11वाँ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 19 दिनों तक चला, जिसमें 192 देशों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में जैव विविधता से जुड़े 30 प्रस्तावों पर विचार-विनिमय हुआ, लेकिन दो पर सहमति नहीं बनी। ये दोनों ही प्रस्ताव जैव विविधता के आर्थिक पक्ष से सम्बंधित हैं।
वर्ष 2012 में भौतिक शास्त्र का सबसे बड़ा और पहला पुरस्कार भारत के प्रोफेसर अशोक सेन को दिया गया। उन्होंने ङ्क्षस्ट्रग थ्योरी पर महत्त्वपूर्ण शोध किया है। प्रोफेसर सेन इलाहाबाद के हरीशचंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं। 56 वर्षीय सेन को पुरस्कार के रूप में तीस लाख डॉलर मिले हैं  ; जो नोबेल पुरस्कार से तीन गुना अधिक है।
 विदा हो चुके वर्ष में विज्ञान का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार तीन अमरीकी वैज्ञानिकों सहित छह अनुसंधानकर्ताओं को प्रदान किया गया। समीक्षकों का मानना है कि विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों में अमेरिका का वर्चस्व कायम है। इस बार चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान जापानी शोधार्थी शिनाया यामानाका और ब्रिटेन के जॉन गर्डन को स्टेम कोशिकाओं पर महत्त्वपूर्ण शोधकार्य के लिए संयुक्त रूप से दिया गया। यामानाका पहले ही विज्ञान के दो प्रतिष्ठित सम्मान अल्बर्ट लास्कर अवार्ड 2009 एवं वुल्फ पुरस्कार 2011 ग्रहण कर चुके हैं। जापान को दो दशकों बाद यह सम्मान मिला है।
रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दो अमरीकी अध्येताओं रॉबर्ट लेफकोविज तथा ब्रायन कोबिल्का को जी-प्रोटीन युग्मित ग्राहियों पर अनुसंधान के लिए दिया गया है।
भौतिकी का नोबेल पुरस्कार फ्रांस के सर्ज हरोशा तथा अमरीकी डेविड जे. वाइनलैंड को क्वांटम भौतिकी में योगदान के लिए प्रदान किया गया।
विदा हो चुके साल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के ध्वज को फहराने का प्रयास भी जारी रहा। इसी थीम पर दिल्ली में पहली बार हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसका आयोजन सीएसआईआर के 'निस्केयरसंस्थान ने किया था।
गुज़रे वर्ष में एक्स-रे क्रिस्टेलोग्रॉफी की खोज के सौ साल पूरे हुए और शाताब्दी वर्ष मनाया गया। इस वर्ष यूनेस्को के कलिंग पुरस्कार की हीरक जयंती भी मनाई गई। विज्ञान लोकप्रियकरण के इस अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार की शुरुआत 1952 में की गई थी। वर्ष 2012 में इंडियन बॉटेनिकल गार्डन ने अपनी स्थापना के 225 वर्ष पूरे किए।
वर्ष 2012 में हमने विज्ञान जगत की कई महान हस्तियों को खो दिया। 5 जून को प्रख्यात अमरीकी विज्ञान लेखक रे डगलस बेरी का निधन हो गया। उन्होंने विज्ञान कथाओं को साहित्य की मुख्यधारा में लाने में विशिष्ट भूमिका निभाई थी।
इसी वर्ष 6 फरवरी को हिंदी में विज्ञान के प्रतिष्ठित लेखक रमेश दत्त शर्मा नहीं रहे। उन्होंने विज्ञान लेखन में नए मुहावरों का प्रयोग किया और अपनी विशिाष्ट पहचान बनाई। वे कई वर्षों तक खेती पत्रिका के संम्पादक रहे।
23 जुलाई को अमेरिका की प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री सैली राइड का निधन हो गया। वे अंतरिक्ष यात्रा पर जाने वाली सबसे युवा महिला थीं। चंद्रमा पर कदम रखने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति नील आर्मस्ट्रांग ने 25 अगस्त को विदा ले ली। उन्होंने 38 वर्ष की उम्र में 20 जुलाई 1969 को चंद्रमा पर कदम रखा था। पहली बार किडनी का सफल प्रत्यारोपण करने वाले डॉ. जोसेफ ई. मुरे 26 नवम्बर को चल बसे।
जीनोमिक्स, पार्टिकल फिजि़क्स, नैनो टेक्नॉलॉजी, सिंथेटिक बॉयोलॉजी, पुनर्मिश्रित डीएनए टेक्नॉलॉजी जैसे अग्रणी विषयों में अनुसंधान से प्रौद्योगिकी समृद्ध होती जा रही है, जिसकी झलक विदा हो चुके साल में भी दिखाई दी। (स्रोत फीचर्स)