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Nov 2, 2025

यादेंः यादगार एक्सप्रेस

 - विजय विक्रान्त, कनाडा

भारत छोड़े हुए एक लम्बा अरसा हो गया है। कैसे ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा यहाँ कैनेडा में गुज़ार दिया, इसका कोई अन्दाज़ा ही नहीं रहा। वक्त गुज़रता गया और इसी के साथ साथ ज़िन्दगी की गाड़ी ने भी अपनी रफ़्तातार तेज़ करनी शुरू करदी। तेज़ी का, यह न रुकने वाला आलम, हमेशा से ही अपनी भरपूर जवानी पर रहा है। 

फिर भी न जाने क्यों, दिल के किसी कोने में, पुरानी यादों के आगोश में जाकर गुम हो जाने के लिए तबीयत बेचैन रहती है। वो यादें, जो कभी हकीकत हुआ करती थीं, आज उन्हीं को तरोताज़ा करने को जी कर रहा है। जाने अंजाने में आज आपको भी अपने इस सफ़र में मैं ने अपना हमसफ़र बना ही लिया है।

चलो, आज ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार को कीली पर टाँगकर, और कुछ आहिस्ता करके, जीने का मज़ा लिया जाए। यही वो तेज़ रफ़तार है, जिसकी वजह से हम ख़ुदा की बख़्शी हुई नियामतों से महरूम हो गए हैं।

चलो, एक बार थोड़ी देर के लिए बच्चे क्यों न बन जाएँ। याद करें उन लम्हों को जब मुहल्ले के मैदान में दोस्तों के साथ गिल्ली डण्डा, पिट्ठू, कबड्डी और कंचों से खेला करते थे। खुले आसमान में पतंगें उड़ाया करते थे और बारिश में झूम- झूमके नाचते, गाते और नहाते थे। यही नहीं, बारिश के बहते पानी में हम अपनी अपनी कागज़ की किश्तियाँ भी तैराया करते थे।

चलो, एक बार पशु पक्षियों के बीच में जाकर चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की कुहुक, कबूतरों की गुटरगूँ, मुर्गों की बाँग, कौओं की कौं कौं, कुत्तों की भौं भौं, गऊओं के रँभाने और घोड़ों के हिनहिनाने में जो एक छुपा हुआ संगीत है उसे बड़े ग़ौर से ध्यान लगाकर सुनें। यही नहीं मोर को नाचता, ख़रगोशों को फुदकता और हिरनों को उछलता देखकर क्यों ना हम भी आज एक ठुमका लगाएँ।

चलो, एक बार खेतों में जाकर माटी की सुगन्ध, सरसों के पीले फूलों की चादर, गेहूँ की बालियों, बाजरे का सिट्टा, ज्वार और मक्की के भुट्टों में कुदरत का करिश्मा देखें।

चलो, एक बार फिर से उन्हीं खेतों में जाकर हल जोतते हुए किसान, बैलों का कुएँ से पानी निकालते हुए रहट की चर्रक चूँ, क्यारियों में पानी का चुपचाप गुमसुम बहना और पास के तालाब में तैरती हुई मछलियों के नाच को सराहें।

चलो, एक बार फिर से वो पुस्तकें पढ़ें, जिन पर बुकशेल्फ़ में रखे रखे धूल जम गई है। गुम हो जाएँ उन ख़्यालों में, जब इन्हीं किताबों की सोहबत में वक्त का पता ही नहीं चलता था। याद करें- अमीर ख़ुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब, बुल्ले शाह, वृन्दावन लाल वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंशराय बच्चन, धर्मवीर भारती, महीप सिंह, भीष्म साहनी और बहुत सारे दिग्गज लेखकों को, जिन्होंने अपने साहित्य की सारी दुनिया में एक बहुत बड़ी छाप छोड़ दी है।

चलो, एक बार फिर से याद करें उन दिनों को जब फ़ॉउन्टेन पैन या फिर स्याही वाली दवात और कलम से लिखाई किया करते थे और स्याही को सुखाने के लिए ब्लॉटिंग पेपर का इस्तेमाल होता था। कभी -कभी तो इसी स्याही से किताबें और हाथ पैर काले- नीले हो जाते थे। कैसे भूल सकते हैं उन लम्हों को जब फ़ॉउन्टेन पैन लीक कर जाता था और जेब के ऊपर दुनिया का नक्शा बन जाता था।

चलो, एक बार फिर से छत पर जाकर बिस्तर के ऊपर पानी का छिड़काव किया जाए। उसके बाद सफ़ेद चादर ओढ़कर लम्बी तानकर सोया जाए। 

चलो, एक बार फिर से कुछ दोस्तों को साथ लेकर बस्ती से दूर पटेल पार्क में जाकर पिकनिक मनाई जाए। यादों की दुनिया को तरोताज़ा करते हुए दोराहा जाए, उन लम्हों को, जब ठण्डा करने के लिए देसी आमों को पानी की भरी हुई बाल्टी में डाला जाता था और देसी आम चूसने का मज़ा ही कुछ और होता था।

चलो, एक बार फिर से शहर के कोलाहल से दूर, पास वाले गाँव में तालाब किनारे बैठा जाए, वहाँ पर पानी में ठीकरों को ऐसे फेंका जाए कि वे तैरते नज़र आएँ। पत्थरों पर बैठकर पैरों को पानी में डालकर ठण्डा किया जाए। आसपास के खेतों में हल चलाते हुए किसान से कुछ अपने दिल की बात कही जाए और कुछ उसकी सुनी जाए। मौका मिले तो सर्सों के साग और मक्की की रोटियों के ज़ायके का भी लुत्फ़ उठाया जाए।

चलो, एक बार फिर से उन वाईनल रिकार्डों को, जिन्हें याद करके सुनना तो दूर रहा हाथ लगाए हुए भी एक बहुत लम्बा अरसा हो गया है, बड़ी मुद्दतों के बाद सुना जाए। इसी बहाने कुछ देर के लिए अपने आपको के.एल.सहगल, पंकज मलिक, लता मंगेशकर, सी.एच.आत्मा, बेग़म अख़्तर, किशोर कुमार, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर, सचिनदेव बर्मन, आशा भोंसले, शान्ति हीरानन्द, शमशाद बेग़म, कमल बारोट, सुधा मल्होत्रा, ज़ोहरा बाई अम्बाला, मुकेश, मुहम्मद रफ़ी, जगजीत सिंह, तलत महमूद, गीता दत्त, रहमत कव्वाल, शंकर-शंभू कव्वाल, यूसफ आज़ाद, रशीदा ख़ातून, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, सी. रामचन्द, हेमन्त कुमार, नूरजहाँ और सुरैया जैसे फ़नकारों के भूले बिसरे सदा बहार गीतों के आनन्द में डुबो दिया जाए। 

काश ज़िन्दगी की इस दौड़- धूप में यह सब मुमकिन हो पाता और हमें गुज़रे हुए दिनों के साथ थोड़ा वक्त गुज़ारने का मौका मिलता; लेकिन इन ख़ुशगवार पुरानी यादों के साथ- साथ ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा कड़वा सच भी जुड़ा हुआ है। कुछ यादें तो हम हमेशा- हमेशा के लिए भुला देना चाहते हैं। ऐसी यादों के लिए तो यही कहना वाजिब होगा।

भूली हुई यादों, मुझे इतना न सताओ,

अब चैन से रहने दो, मेरे पास न आओ।

Nov 17, 2018

यमराज की डायरी का पन्ना

यमराज की डायरी का पन्ना
विजय विक्रान्त
अपने बारे में अब तो मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि धरती के बोझ का संतुलन रखने के लिये ही मेरा जनम हुआ है और शिवजी महाराज मेरे बड़े साहब (बॉस) हैं। धरती पर जब कभी भी किसी का जनम होता है, ब्रह्माजी के दफ़्तर से एक पत्र विष्णु जी को जाता है और दूसरा पत्र शिवजी महाराज के देखने के बाद मेरे पास
आता है। अब जब धरती पर जन्म हो ही गया है तो किसी को तो लालन पालन करना है। इसकी ज़िम्मेवारी का महकमा विष्णु जी के पास है। हर प्राणी की धरती पर रहने की एक लीज़ होती है और उस लीज़ के पूरा होने के बाद उसको धरती से उठाने की ज़िम्मेवारी शिवजी की होती है। अब शिवजी महाराज तो कैलाश पर्वत पर मस्त रहते हैं। इस उठाने बिठाने के लिए ना तो उनके पास समय है और न ही कोई रुचि। बस यही एक कारण है कि यह काम उन्होंने मुझे सौंपा है। देखा जाए, तो लोगों को ऊपर लाने की पूरी ज़िम्मेवारी अब मेरी ही है; क्योंकि मैं अकेला इतना सब काम नहीं कर सकता ;इसलिए मेरे पास पूरा डिपार्टमैण्ट है और उस में काम करने वाले यमदूतों के अपने अपने क्षेत्र बँधे हुए हैं।
रोज़ सुबह दफ़्तर खुलने पर सारे यमदूतों को उनके इलाकों के कार्ड दे दिए जाते हैं। इन कार्डों पर हर ऊपर लाने वाले प्राणी का नाम, पता और प्राण निकालने का समय दर्ज होता है। प्राण खींचने के समय में कोई भूल न हो जाए ,इसीलिए हर कार्ड पर नंबर होते हैं । हम नंबरों के हिसाब से ही काम करते हैं।
एक दिन अचानक मेरे एक यमदूत की तबियत ख़राब हो गई। खाँसी और ज़ुकाम के मारे बुरा हाल था। उसकी हालत नीचे जाने लायक नहीं थी। मेरे पास वैसे भी स्टाफ़ की कमी थी, क्योंकि कुछ यमदूत छुट्टी पर गए हुए थे।
स्टाफ़ कम होने के साथ -साथ आज की लिस्ट भी काफ़ी लंबी थी। यही सोचकर मैंने फ़ैसला किया कि आज धरती पर यमदूतों के साथ मैं स्वयं जाऊँगा। इस बहाने मेरा भी कुछ सैर- सपाटा हो जाएगा और मेरे यमदूत कैसा काम करते हैं, इसकी भी रिपोर्ट मिल जाएगी।
दफ़्तर की गाड़ियों में बैठकर हम ठीक समय पर अपने अपने इलाकों में पहुँच गए। हमारे दफ़्तर का एक नियम था कि किसी के प्राण लेने से पहले हम उसका इंटरव्यू लेते थे। मरने से पहले वह अपने सब चाहने वालों से मिल ले इसलिए हम उसे दो घण्टे का समय देते थे। शाम के पाँच बजे तक हम कोई पन्द्रह जानें ले चुके थे।
सोलह नम्बर कार्ड चुलबुलीनाम की एक महिला का था। जब हम उसे लेने पहुँचे, तो देखा कि वह एक क्लब में किसी मित्र की पार्टी में बड़े ज़ोर- शोर से नाच रही थी। उसे देखकर ऐसा लगता था कि उसे दुनिया का कोई ग़म नहीं है और वह पूरी मस्ती से हर पल को जी रही है।
इन्टरव्यू के दौरान जब चुलबुली को हमारे आने का कारण पता चला ,तो वो बहुत गिड़गिड़ाई और कहने लगी कि अगर उसको कुछ दिन और जीने का मौका मिल जाए, तो हमारी उस पर बहुत बड़ी कृपा होगी। मैंने उसे बताया कि हम ब्रह्मा जी और शिवजी के नियमों से बँधे हुए हैं और इस मामले में नियम के उलंघन करने की कोई भी गुंजाईश नहीं है। मेरे हाथ में कार्डों की मोटी गड्डी देखकर चुलबुली समझ गई कि हम लोग अपने कार्डों के हिसाब से ही अगला प्राणी चुनते हैं। एकाएक उसकी आँखों में एक चमक -सी आ गई । वह कहने लगी कि  अगर हम अपने अगले प्राणी कार्ड की ढेरी के नीचे से चुनेंगे ,तो उसका नंबर सब से बाद में आएगा और उसे जीने और नाचने का कुछ और समय मिल जाएगा।
हालाँकि ऐसा करना हमारे डिपार्टमैन्ट के कायदे कानून के बिल्कुल ख़िलाफ़ था फिर भी न जाने क्यों मुझे चुलबुली पर तरस आगया और मन ही मन मैंने यह फ़ैसला कर लिया कि अगले प्राणी हम चुलबुली के सुझाव से ही चुनेंगे। यह बात मैं ने किसी को भी नहीं बताई। मुझे यह भी पता था कि हमारा अगला प्राणी भी इसी क्लब में है।
चूँकि खाने का समय हो गया था, इसलिए उसी क्लब में एक कोने में बैठ कर खाने का आर्डर कर दिया। इस बीच चुलबुली भी मेरे वाली मेज़ पर आगई। कार्ड की ढेरी को मेज़ पर छोड़कर मैं हाथ धोने के लिये वाशरूम गया।
समय आने पर मैंने चुलबुली को बुलाया और कहा कि मैने उसकी बात मान ली है और आगे के सब प्राणी मैं नीचे से ही चुनूँगा। कहाँ तो मैं सोच रहा था कि चुलबुली यह सुनकर बहुत ख़ुश होगी; लेकिन जैसे ही मैं ने सब से नीचे वाल कार्ड निकाला चुलबुली के चेहरे की हवाइयाँ उड़ चुकी थीं और वो हक्का -बक्का हो कर मेरी तरफ़ देख रही थी। वो रह रहकर गिड़गिड़ा रही थी कि मैं नीचे वाले कार्ड से अपना अगला इंसान न चुनूँ। उसका कहना था कि मैं अपने बनाए हुए हिसाब से ही चलूँ। मैं बहुत परेशान हो गया। क्या हो गया है इस औरत को जो थोड़ी देर पहले कही अपनी बात का ही खण्डन कर रही है। हालाँकि कार्ड ढेरी में से निकाला जा चुका था और मुझे कार्ड वाली आत्मा को अपने साथ ले जाना था फिर भी मैं ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि आख़िर माजरा क्या है।
मेरा सवाल सुनकर रोते हुए चुलबुली बोली - यमराज जी, जब आप वाशरूम गए थे ,उस समय मैं ने अपना कार्ड चुपके से गठ्ठी के सब से ऊपर से हटाकर सब से नीचे रख दिया था। मुझे क्या पता था कि आप मेरा सुझाव मान लेंगे।


सम्प्रतिः  सह-संस्थापक निर्देशक, हिन्दी राइटर्स गिल्ड