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Sep 5, 2026

अनकहीः नेपाल आपदाः प्रकृति का कहर या...

- डॉ.  रत्ना वर्मा

 नेपाल में हाल की भयावह प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि आखिर हम ऐसी त्रासदियों को किस नजरिये से देखें। पहाड़ों के बीच अचानक उमड़ा पानी, मलबे के साथ बहती नदियाँ, देखते ही देखते उजड़ते घर, टूटते पुल और सड़कें तथा अपनों को खोजते असहाय लोग- यह दृश्य केवल नेपाल की पीड़ा नहीं है; बल्कि उस संकट की तस्वीर है जो बदलते पर्यावरण और जलवायु के साथ पूरी मानव सभ्यता के सामने खड़ी हो गई है। प्रकृति के इस भयावह मंजर के पीछे कई प्रश्न जुड़े हुए हैं, जिसके समाधान तलाशने होंगे। 

नेपाल की भयावहता को सामान्य मौसमी बाढ़ भर नहीं कहा जा सकता। बर्फ और चट्टानों के अचानक खिसकने तथा उसके बाद आई तेज जलधारा ने कुछ ही समय जो रौद्र रूप दिखाया उसे वैज्ञानिक, भूकंपीय गतिविधि, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन, हिमालय का तेजी से गर्म होना, ग्लेशियरों का पीछे हटना और पर्वतीय भूभाग की अस्थिरता आदि ऐसे अनेक कारणों से जोड़ कर देख  रहे हैं। इस आपदा ने यह भी दिखा दिया कि पहाड़ों में घटित कोई घटना केवल उसी स्थान तक सीमित नहीं रहती। उसका प्रभाव नदी के साथ दूर-दूर तक बसे समुदायों, बस्तियों, परिवहन, ऊर्जा परियोजनाओं और आजीविका पर लम्बें समय तक पड़ता है, जिससे उबरना आसान नहीं होता। 

 किसी भी आपदा के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण भी एक साथ काम करते हैं। जैसे- अनियोजित निर्माण, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण, जंगलों का क्षरण, कमजोर बुनियादी ढाँचा और जोखिम वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विस्तार आदि ऐसी आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं। इसलिए हमें प्रकृति को दोष देने के बजाय अपने विकास के तरीके और अपनी तैयारियों पर भी सवाल उठाने होंगे।

सामाजिक दृष्टि से किसी आपदा का सबसे बड़ा प्रभाव केवल जान-माल की क्षति नहीं होता। आपदा सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित करती है। घर खोने वाला व्यक्ति केवल एक मकान नहीं खोता, वह अपनी स्मृतियाँ, सामाजिक सुरक्षा, आजीविका और भविष्य का भरोसा भी खो देता है। बच्चों की पढ़ाई रुकती है, परिवार बिखरते हैं, रोजगार समाप्त होते हैं और मानसिक आघात लम्बे समय तक बना रहता है। इस समय नेपाल में स्वास्थ्य सेवाओं, घरों, बाजारों, सड़कों, पुलों और आवश्यक सुविधाओं के प्रभावित होने से हजारों परिवारों के सामने तत्काल राहत के साथ-साथ लंबी पुनर्वास प्रक्रिया की बड़ी चुनौती है। राहत का अर्थ केवल भोजन, कपड़े और अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए; राहत के साथ सम्मान, सुरक्षा, मानसिक सहारा और भविष्य की पुनः स्थापना भी जुड़ी होनी चाहिए।

पर्यावरण विशेषज्ञों के नजरिए से देखें तो इस तरह की आपदाओं से हमें सबक लेना होगा कि विकास और प्रकृति के बीच संघर्ष का रास्ता हमें कहीं नहीं ले जाएगा। पहाड़ों में सड़कें बनें, बिजली परियोजनाएँ बनें, पर्यटन बढ़े और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार पैदा हों- यह विकास आवश्यक है, लेकिन प्रश्न यह है कि  यह विकास कितना सुरक्षित और पर्यावरण-सम्मत है। किसी नदी, पहाड़ या जंगल को केवल निर्माण की जगह मान लेना अंततः मनुष्य के लिए  जोखिम ही पैदा करता है। 

नेपाल की इसी आपदा में एक स्कूल को अचानक आई सूचना के आधार पर समय रहते खाली कराया गया और सैकड़ों विद्यार्थियों की जान बची। यह घटना बताती है कि कई बार कुछ मिनटों की सूचना भी सैकड़ों जिंदगियाँ बचा सकती है; इसलिए आधुनिक तकनीक, उपग्रह निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, नदी जलस्तर की निगरानी, ग्लेशियरों और हिमानी झीलों की लगातार निगरानी तथा स्थानीय स्तर पर त्वरित सूचना-तंत्र को प्राथमिकता देनी होगी।

साथ ही, आपदा-प्रबंधन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करना होगा। स्कूलों में आपदा से बचाव के अभ्यास होने चाहिए। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि अचानक बाढ़ या भूस्खलन की स्थिति में किस दिशा में जाना है, किससे संपर्क करना है और किन स्थानों को सुरक्षित माना जा सकता है। सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय भी उतना ही आवश्यक है। आपदा के समय जिस समाज में लोग एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं, वहाँ पुनर्वास की संभावना भी अधिक मजबूत होती है।

और सबसे महत्त्वपूर्ण है सीमाओं से ऊपर उठकर मानवीय सहयोग। हिमालय किसी एक देश की संपत्ति नहीं है और न ही उसकी नदियाँ राजनीतिक सीमाओं को पहचानती हैं। आपदा के समय राहत और बचाव में क्षेत्रीय सहयोग को राजनीति से ऊपर रखना होगा। नेपाल की त्रासदी में अलग-अलग देशों और संस्थाओं की सहायता तथा बचाव प्रयासों ने यह दिखाया भी है कि संकट के समय मानवता की साझी शक्ति सीमाओं से कहीं बड़ी होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि नेपाल के उजड़े हुए परिवारों को केवल संवेदना देकर हम अपने दायित्व से मुक्त न हो जाएँ। जिन्हें अपना घर, परिवार और आजीविका खोनी पड़ी है, उनके साथ खड़ा होना हमारी मानवीय जिम्मेदारी है। राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता, पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा और आजीविका की पुनः स्थापना के लिए सरकारों, संस्थाओं और समाज को मिलकर आगे आना होगा; लेकिन इसके साथ ही हमें भविष्य के लिए भी तैयारी करनी होगी। इसलिए समय आ गया है कि विकास की दौड़ में हम यह न भूलें कि धरती केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। आज नेपाल के लिए हाथ बढ़ाना केवल नेपाल की मदद करना नहीं है; यह उन समस्त मानवता के लिए हाथ बढ़ाना है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हम सभी की है। ■

Aug 1, 2026

अनकहीः देश का भविष्य और युवाओं का संघर्ष

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

देश की राजधानी का जंतर-मंतर एक ऐसा स्थान जो कभी जन-आकांक्षाओं, सत्याग्रह और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रतीक हुआ करता था, आज राजनीति की मुख्य प्रयोगशाला बन चुका है। कोई भी मुद्दा हो- चाहे वह किसानों की व्यथा हो, पहलवानों का सम्मान हो या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धाँधली को लेकर छात्रों का आक्रोश- जंतर-मंतर पर लगने वाले झंडे और नारे जल्द ही राजनीतिक दलों के नफा-नुकसान का मंच बन जाते हैं।
किंतु इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है, वह यह है कि क्या ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करना उचित है? या फिर समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि समस्या केवल किसी एक नीति या घटना में नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिस्टम की बुनियादी जड़ों में है?
अक्सर देखा यह जाता है कि जब किसी आंदोलन में राजनीतिक घुसपैठ होती है, तो  ।मूल समस्या दरकिनार हो जाती है।  फिर चाहे समस्या कोई भी हो या नीतिगत कमियाँ, किसी भी आंदोलनों को जब दलगत चश्मे से देखा जाता है, तो सत्ता पक्ष उसे विरोधियों की साजिश मानकर खारिज करने लगता है और विपक्ष उसे भुनाने में लग जाता है; लेकिन इसमें पिसता कौन है? वे जो अपनी समस्या या अधिकार को लेकर न्याय की उम्मीद में आंदोलन पर बैठ जाते हैं।  आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार हैं; लेकिन जब ये आंदोलन केवल सत्ता की चाबी पाने का माध्यम बन जाएँ, तो यह देश की लोकतांत्रिक चेतना के लिए घातक सिद्ध होता है।
यदि ताजा घटनाक्रम पर,  आएँ तो स्वतंत्रता के 75 से अधिक वर्षों बाद भी क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को एक पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत माहौल दे पाए हैं? कड़वी सच्चाई तो यही है कि आज शिक्षा का क्षेत्र सेवा न रहकर एक अति-लाभकारी व्यवसाय बन चुका है।  
आज कोचिंग संस्थानों, निजी विश्वविद्यालयों और प्रश्न-पत्र लीक करने वाले गिरोहों का एक ऐसा मकड़जाल तैयार हो चुका है, जो युवाओं के सपनों का व्यापार करता है। सालों-साल मेहनत करने वालों के भविष्य के साथ जब पेपर लीक या प्रशासनिक गड़बड़ियों के जरिए खिलवाड़ होता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती- यह एक पूरी पीढ़ी के विश्वास की हत्या होती है।
परिणाम आज के युवा मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा के उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता है। क्या यह भारत के युवाओं के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं है? इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करते हुए सबसे पीड़ादायक प्रश्न यह उठता है कि हम उनके भविष्य को लेकर आज कहाँ खड़े हैं?
क्या हमारे तंत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक सिर्फ ऐसे लोग से भर गए  हैं, जो हर फैसले में केवल अपना निजी या राजनीतिक फायदा देखते हैं? जिस देश ने वसुधैव कुटुंबकम् और त्याग का दर्शन दिया, क्या उस देश में अपनी धरती, अपने लोगों और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचने का जज्बा खत्म हो रहा है?
यदि उत्तर हाँ है, तो यह हम पूरी मानव सभ्यता के लिए अत्यंत शर्म की बात होगी। एक समाज के रूप में हमारी सबसे बड़ी असफलता यही होगी कि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित, निष्पक्ष और प्रेरणादायक माहौल तक न दे सकें।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बदलाव आ ही नहीं सकता। आवश्यकता सिर्फ पहल करने की है । अब समय आ गया है कि हम समस्याओं पर केवल ऊपरी लीपा - पोती करना बंद करें और एक नए नजरिये से सोचना शुरू करें। हमें व्यवस्था में आमूल- चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 
शिक्षा में व्यावसायिक माफियागिरी पर नकेल कसने के लिए सख्त कानून और उनका कड़ाई से पालन होना चाहिए। परीक्षाओं में तकनीक का ऐसा पारदर्शी उपयोग हो, जहाँ भ्रष्टाचार की गुंजाइश शून्य हो। धाँधली करने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो उदाहरण बने। और सबसे जरूरी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े मुद्दों को राजनीति से परे रखा जाए। प्रशासनिक अधिकारियों और नीति-निर्माताओं की सीधी जवाबदेही तय हो।  कितना ही अच्छा हो कि ऐसे  मुद्दों पर सभी राजनीतिक दल मिलकर एक राष्ट्रीय सहमति बना पाएँ।  हालाँकि आज के अवसरवादी राजनेताओं  के उद्देश्यहीन प्रलाप के कारण यह सम्भव नहीं है।
इन सबके साथ यदि हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित भविष्य और बेहतर जिंदगी देनी है, तो इसकी शुरुआत केवल सरकार से नहीं, बल्कि समाज और परिवार के स्तर से भी करनी होगी। हमें अपने परिवारों और समुदायों में ऐसे मूल्यों को सींचना होगा जहाँ ईमानदारी, परोपकार और राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा जाए। यही नहीं नागरिकों को भी केवल मूकदर्शक बनने या दलगत राजनीति में बँटने की बजाय एक जागरूक प्रहरी की भूमिका निभानी होगी। 
तो समय आ गया है कि हम सब मिलकर एक ऐसा परिवार, ऐसा समाज और ऐसा समुदाय बनाएँ जहाँ युवाओं के सपनों की कद्र हो। हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जिसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों का नाम पूरी दुनिया में एक मिसाल की तरह लिया जाए। यही उन शहीदों और राष्ट्र-निर्माताओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने हमें एक खुशहाल, आजाद और स्वाभिमानी भारत की नींव सौंपी थी। याद रखिए -जो शिक्षा संस्कार नहीं दे सकती, जो शिक्षा राष्ट्र-प्रेम नहीं सिखा सकती, उस अराजक शिक्षा से  युवा -वर्ग का कोई भला नहीं हो सकता।

यादें/श्रद्धांजलिः तीजन बाई के साथ वे दो घंटे

                               दुनिया भर में गूँजी जिसकी हुंकार

                                                                    - डॉ. रत्ना वर्मा

हाल ही में छत्तीसगढ़ की उस महान पंडवानी लोकगायिका तीजन बाई का निधन हो गया, जिसने छत्तीसगढ़ की लोकगाथा 'पंडवानी' को सिर्फ देश ही नहीं; बल्कि सात समुद्र पार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई। राज्य सरकार ने उन्हें ससम्मान अंतिम विदाई दी और उनके नाम से राज्य सम्मान की घोषणा भी की।

खबर सुनते ही मन लगभग दो दशक पीछे चला गया। तब ‘उदंती’ की शुरुआत भी नहीं हुई थी, जब मैं भिलाई स्थित उनके घर जाकर उनसे एक लंबी और यादगार बातचीत करने पहुँची थी। पिछले कुछ दिनों से मैं अपनी पुरानी फाइलों और हार्ड डिस्क में उस साक्षात्कार को ढूँढ रही थी। पर शब्द भले ही फाइलों की परत में कहीं गुम हो गए थे; लेकिन जब यादों का पिटारा खुला, तो उस दिन का एक-एक दृश्य और बातचीत की पंक्तियाँ स्मृतियों से निकलकर सामने आ गईं।

चलिए मैं आपको अपनी यादों के पिटारे के साथ ले चलती हूँ- तीजन बाई के उस छोटे से क्वाटर 6 बी में- 

भिलाई का वह क्वार्टर और तखत पर बैठी तीजन

बात उस दौर की है जब भारत सरकार से पद्मश्री, और पद्मभूषण पा चुकीं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तीजन बाई भिलाई स्टील प्लांट के सेक्टर-1, सड़क नं. 18 के क्वार्टर नंबर '6बी' में रहा करती थीं। (बाद में तो उन्हें पद्म विभूषण से भी अंलकृत किया गया।) मिलने के तय वक्त पर जब मैं पहुँची, तो पता चला कि वे खाना खा रही हैं। 

मैं उनके छोटे से बैठक खाने में रखी ट्रॉफियों और दीवारों पर टँगी तस्वीरों को देखने लगी। 19 मार्च 1988 को तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन के हाथों पद्मश्री और 3 अप्रैल 2003 को राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों पद्मभूषण ग्रहण करती उनकी तस्वीरें। लाल साड़ी और छत्तीसगढ़ी पारंपरिक जेवरों में सजी, हाथ में तंबूरा लिये पंडवानी गाती उनकी छवि देखकर मुझे स्टेज पर ‘द्रौपदी चीर हरण’ के प्रसंग में उनका रौद्र रूप की याद आने लगा।

समय की रफ्तार के साथ आगे बढ़ते और कई विवादों को झेलते हुए तीजन बाई अपनी पंडवानी गायिका के साथ उसी बुलंदी के शिखर पर विराजमान और उतनी ही व्यस्त भी रहीं। भारत सरकार ने  जब उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया था, तब तीजन बाई को इसका गुमान तक नहीं था कि वे कितनी बड़ी पदवी राष्ट्रपति के हाथों लेकर लौटी हैं। अपने घर में वे उस दिन भी गनियारी गाँव की वही तीजन थीं, जो कभी अपनी संगी-सहेलियों के बीच खेल-खेल में ही महाभारत की कथा को गाकर सुनाया करती थी। मैं उनके जीवन के उतार -चढ़ाव के बारे में सोचते हुए उनका इंतजार कर रही थी कि तभी वे भोजन के बाद बाहर निकलीं। गीले हाथों को अपनी रोज पहनने वाली साधारण सी साड़ी से पोंछते हुए। बाल खुले थे, शायद तुरंत स्नान करके खाने बैठी थीं। हाथ में कंघी लिए वे मेरी बगल में आकर बैठ गईं और बाल सँवारते हुए इतनी सहजता से बातें करने लगीं, मानो परिवार का कोई सदस्य हाल-चाल पूछने आया हो। वे अपने रोज पहनने वाले पारंपरिक गहने पहने हुए थीं- कानों में झुमका और बारी, बाँह में गुदना, गले में हार, हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ , हाँ माथे पर उनकी पहचान वाली बड़ी- सी गोल बिंदी अभी वे लगा नहीं पाई थीं। 

चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लगातार यात्राओं की थकान भी। जब मैंने स्वास्थ्य  के बारे में पूछा, तो एक लंबी साँस लेकर बोलीं- “हाँ, कुछ न कुछ चलता रहता है।” तभी उनके सचिव मनहरण सखा ने उन्हें पान पेश किया। पान चबाते हुए वे आराम से बैठ गईं, जैसे कह रही हों- ‘पूछो, क्या पूछना है?’  वैसे तो वे हिन्दी में बातचीत कर रही थीं; पर  बीच बीच में छत्तीसगढ़ी में बोलते हुए वे इतनी सहज हो गईं  कि न उन्हें और न मुझे समय का भान हुआ। 

वह ऐतिहासिक साक्षात्कार: तीजन बाई की ज़ुबानी

प्रश्न: क्या आपने कभी सोचा था कि गाँव (गनियारी) से शुरू हुआ यह सफर दुनिया तक पहुँचेगा?

तीजन बाई:  हँसते हुए... मुझे नहीं मालूम था कि मैं गाँव से निकलकर इतनी दूर विदेशों तक हवाई जहाज में यात्रा करूँगी। यह तो सब भगवान की कृपा है।

प्रश्न: कौन-सी बात थी, जिसने आपको 13 वर्ष की उम्र में पंडवानी गाने के लिए प्रेरित किया?

तीजन बाई: मेरे नाना महाभारत की कहानी कहते थे। उन्हें महाभारत की पूरी कथा कंठस्थ थी। द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग सुनकर मुझे पूरी कहानी जानने की इच्छा हुई, तो मैं नाना से लुका के (छिपकर) उनको गाते हुए सुनती थी।

प्रश्न: छिपकर क्यों सुनती थीं?

तीजन बाई: मेहर ना, अपन नाना ल अब्बड़ डर्राववं (मैं अपने नाना से बहुत डरती थी)। उनके कमरे के बाहर दरवाजे के पीछे छुपकर बैठती थी। नाना बीच-बीच में उठकर चोंगी (सुलफी/बीड़ी का पारंपरिक रूप) पिया करते थे। एक दिन वे अचानक बाहर आ गए और मैं दीवार से चिपकी पकड़ी गई। उन्होंने पूछा- ‘कौन है तू?’  मैंने डरते हुए कहा- ‘मेह तीजन आंव’ (मैं तीजन हूँ)। उन्होंने पूछा कि - छुपा-छुपी खेल रही है, दाई ह मारीस हे के ददा ह खिसयाईस हे (माँ ने मारा है या पिता ने डाँटा है)? जब मैंने कहा कि नहीं, तो बोले- फिर क्यों छुपी है? मैंने डरते हुए कहा कि मैं आपकी कहानी छिपकर सुन रही थी। नाना बहुत खुश हुए और बोले- ‘चल अंदर बैठकर सुन।’ फिर वे मुझे रोज कथा सुनाने लगे।

प्रश्न: क्या नाना ही आपके गुरु थे? सार्वजनिक मंच पर पहली बार कब आईं?

तीजन बाई: हाँ, नाना ही गुरु थे। जब सीख गई और घर में पता चला तो,  माँ ने खूब मारा और तब मैं भागकर चंदखुरी गाँव आ गई। वहाँ मजदूरी करते हुए शाम को संगी-साथियों को नाना से सुनी सुनाई पंडवानी सुनाती थी। एक दिन गाँव के भूषण दाऊ ने मेरा गाना सुना, तो खुश होकर 10 रुपये दिए। उस ज़माने में 10 रुपये बहुत थे! फिर उन्होंने शाम को चौराहे पर शोलापुरी चादर से स्टेज बनवा दिया। तबला-हारमोनियम और रागी (हुंकार भरने वाला साथी) का इंतज़ाम किया। और इस तरह चंदखुरी गाँव के चौराहे पर मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। 18 दिन तक महाभारत कथा चली। उसके बाद तो गाँव-गाँव से बुलावे आने लगे, तब से गावत हव अऊ आज तक गातेच हव (तब से गा रही हूँ और आज तक गा ही रही हूँ)।

प्रश्न: जनता के सामने पहली बार गाते समय डर नहीं लगा?

तीजन बाई: ‘डर काबर लागही’ (डर क्यों लगेगा), हिम्मत अपने आप आती गई। जितनी ज्यादा पब्लिक आती, उतना ही ज्यादा आनंद आता। (बात करते हुए उनका अंदाज बिल्कुल वैसा ही था जैसे महाभारत का कोई प्रसंग सुना रही हों)

प्रश्न: आप पेरिस गईं, पूरे विश्व में घूम आईं। गाँव की याद नहीं आती? खुशी कहाँ ज्यादा मिलती है?

तीजन बाई: अपने गाँव में जो खुशी मिलती है, वह विदेश में कहाँ! विदेश में चार दिन अच्छा लगता है, फिर मन घर की ओर खींचता है। अपनी धरती पर आते ही लगता है कि घर आ गए। हम तो भारत की संस्कृति और परंपरा लेकर बाहर गए थे और वहाँ से वाह-वाही और ताली अपने देश के लिए लेकर आए। वही हमारी असली कमाई है।

प्रश्न: पेरिस यात्रा से लौटने के बाद भिलाई स्टील प्लांट में आपको पानी पिलाने की नौकरी मिली। इतने बड़े कलाकार के लिए यह काम छोटा नहीं लगा?

तीजन बाई: (बेहद गंभीर और सहज होकर) कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। कोई  समय था जब  हम मजदूरी करते थे न? बड़ा पद मिल जाने पर कोई अपनी मजदूरी के दिनों को तो नहीं भूल सकता- (और वे एक दार्शनिक की तरह बोलने लगीं) ‘कल्याण तभे होही जब पाछू मुड़ के घलो देखबे। जले रोटी के याद जब तक नई आही, तब तक मिठाई में स्वाद नई लागय’ (कल्याण तभी होगा जब पीछे मुड़कर भी देखोगे। जली हुई रोटी की याद जब तक नहीं आएगी, तब तक मिठाई का स्वाद समझ नहीं आएगा)  स्टील प्लांट ने मुझे नौकरी दी, यही बड़ी बात है। उन्होंने मुझे विदेश जाने से कभी नहीं रोका, वहीं से मेरे आगे बढ़ने की सीढ़ी बनी। 

प्रश्न: इतनी व्यस्तता के बाद घर-परिवार कैसे सँभालती हैं?

तीजन बाई: घर का जीवन वैसा ही है, जैसे गाँव में रहता था। खाना बनाती हूँ, सब्जी बनाती हूँ, लइका मन ल देखथव (बच्चों को देखती हूँ)। रंक को राजा और राजा को रंक बनाना प्रभु का काम है। ‘कोनो दिन मोर स्थिति डाँवा-डोल हो जाही, त लोग हांसही न, कि वो दिन तो हीरोइन बने रहीस, अभी जीरो निकल गे! त ये कहे के नौबत झन आवे’ (कल को स्थिति खराब हुई तो लोग हँसेंगे कि कल तक हीरोइन बनी थी, आज जीरो हो गई। यह नौबत न आए, इसलिए जो है उसी में गुज़ारा कर लो)। यह कहते हुए वे भावुक हो गईं- हम बहुत गरीब घर की लड़की हैं। जब हम फटे-पुराने कपड़े पहनते थे, कई बार ब्लाउज तक नहीं होता था... उन दिनों को याद करती हूँ, तो जी थक जाता है। इसलिए हम बड़े घमंड या चरित्र में नहीं जीते।

  मैंने तुरंत प्रसंग बदलना उचित समझा क्योंकि मैं जानती थी तीजन का बचपन कितने मुश्किल दौर से गुजरा है। 

प्रश्न: महाभारत का कौन- सा प्रसंग आपको सबसे प्रिय है?

तीजन बाई: मुझे भीमसेन का प्रसंग सबसे ज्यादा पसंद है। भीम का रौद्र रूप और जोशीला अंदाज मुझे अपनी ओर खींचता है।

प्रश्न: आगे कब तक पंडवानी गाने का इरादा है?

तीजन बाई: वह मालिक की मर्जी। जितनी दूरी की उसने ‘ड्यूटी’ दी है, वहीं तक जाना है। मेरी ड्यूटी खलास, तो मैं चुप हो जाऊँगी।

अमर रहेगी वह हुंकार

इतना कहकर तीजन बाई जी उठने लगीं – “अब मुझे ड्यूटी जाना है” मैंने उनसे थोड़ा रुकने का अनुरोध किया और तस्वीर लेने के लिए कैमरा निकाला। उन्हें समय पर पहुँचना था, वे मुस्कुराते हुए कैमरे की ओर बगैर देखे, कंघी लेकर अपने बाल काढ़ने लगीं । इतने में बीएसपी की गाड़ी उन्हें लेने आ पहुँची थी।  वे भीतर गईं  माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाकर कंधे में एक झोला लटकाकर गाड़ी की ओर बढ़ गईं ... मैं भी उनसे विदा लेकर बाहर निकल आई।

छोटी उम्र में ही घर छोड़ देने से लेकर, गाँव, शहर से होते हुए विदेशों तक पहुँचने वाली तीजन बाई को लेकर भले ही कई विवाद खड़े हुए हों, लेकिन तीजन बाई की माटी से जुड़ी सादगी ने कभी इन विवादों को तूल नहीं दिया। वे अंत तक गनियारी गाँव की वही सहज तीजन बनी रहीं, जिसके लिए ‘भीम की गदा’ बना उनका तंबूरा ही सब कुछ था। 

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं और वे अपनी ‘ड्यूटी’ पूरी करके अनंत की यात्रा पर चली गई हैं, तो लगता है कि कागज़ के पन्नों पर दर्ज साक्षात्कार भले ही कहीं खो जाएँ, लेकिन तीजन बाई की वह हुंकार, तंबूरे की तान और उनका ज़मीन से जुड़ा व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा। तीजन बाई को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!

Jul 1, 2026

अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

तपती हुई धरती पर जब बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो मिट्टी से आती वह सोंधी खुशबू आत्मा को भिगो जाती है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब मौसम करवट लेता है, तो सुकून और सुरक्षा का अहसास होने लगता है। इस बदलते मौसम में जब भी हम घर से बाहर कदम बढ़ाते हैं, तो हमारी सबसे पहली जरूरत बनकर आती है- एक अदद छतरी। वह छतरी जो हमें आसमान से बरसते पानी से बचाती है और सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाती है।

मौसम की इस छतरी को देखते हुए कभी-कभी सोचती हूँ कि हमारी जिंदगी का ताना-बाना भी तो कुछ ऐसा ही है। जीवन के जंजालों के बीच जब दुखों, जिम्मेदारियों, तनाव और अनिश्चितताओं की मुसलाधार बारिश शुरू होती है, तब हमें एक ऐसी ही छतरी की जरूरत होती है; लेकिन वह छतरी  रंग - बिरंगे कपड़े  से नहीं बनी होती, बल्कि वह हमारे बुजुर्गों के अनुभवों, उनके आशीर्वाद और रिश्तों की आत्मीयता से बनी होती है, जो हमें हर मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सुरक्षा देती है। बड़े-बुजुर्गों का हमारे सिर पर हाथ रखना, जिंदगी की किसी भी कड़ी धूप या भारी बारिश में एक मजबूत छतरी की तरह ही तो काम करता है।

कहाँ गया वह दौर, जब हमारे परिवार संयुक्त हुआ करते थे। घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस विशाल बरगद की तरह होता था, जिसके नीचे पूरा कुनबा सुरक्षित रहता था। जिंदगी में कोई भी संकट आए, रिश्तों में कोई कड़वाहट घुले, बुजुर्गों के अनुभवों की वह छतरी तुरंत खुल जाती थी। उनके कहे दो शब्द कि -चिंता मत करो, हम हैं न, सब ठीक हो जाएगा- किसी भी मानसिक तनाव को पल भर में सोख लेते थे। वह केवल शब्द नहीं होते थे, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच होते थे जो नई पीढ़ी को बिखरने नहीं देते थे। उस दौर में अवसाद, अकेलापन या तनाव जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं थे, क्योंकि हमारे ऊपर अनुभवों की छतरी हमेशा तनी रहती थी।

लेकिन आज के इस आधुनिक और महानगरीय दौर में स्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं। अब तो संयुक्त परिवार   ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। दादा-दादी और नाना-नानी की छाँव का मिलना तो बहुत दूर की बात हो गई है।  विडंबना देखिए कि आज के परिवारों में माता-पिता तक पीछे छूटते जा रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें बड़ा करने और इस काबिल बनाने में लगा दी कि वे आसमान छू सकें, उनका नाम रोशन करें; लेकिन वही बच्चे पंख उगते ही उनको छोड़कर दूर कहीं उड़ जाते हैं। आज के भारतीय परिवारों में बेहतर करियर और नौकरी के लिए विदेशों में जाकर बसना एक आम बात हो चुकी है। जो देश में रह रहे हैं, वे भी किसी बड़े मेट्रो शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मजबूरी कहें या जीवनशैली, वे हर जगह अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब पीछे छूट जाते हैं सूने घर और उन बुजुर्गों की बूढ़ी आँखें, जो सिर्फ त्योहारों पर बच्चों के लौटने का इंतज़ार करती हैं।

यह अलगाव केवल उन बुजुर्गों को अकेला नहीं कर रहा, बल्कि नई पीढ़ी को भी असुरक्षित बना रहा है। जब सिर पर बुजुर्गों की मानसिक सुरक्षा रूपी कवच या उनकी तसल्ली देने वाली छतरी की छाया ही नहीं होगी, बच्चों को दादा- दादी का प्यार और उनके अनुभवों के किस्से- कहानियाँ सुनने नहीं मिलेगी तो वे कैसे एकता, सहयोग, प्रेम और मानवता की भावना को आत्मसात कर पाएँगे। इस तरह तो हमारी यह समृद्ध संस्कृति और परंपराएँ सब पीछे छूटती चली जाएँगी।  भला जड़ों से कटकर कोई भी संस्कृति कोई भी परंपरा जीवित रह सकती है?

यह एक अजीब विरोधाभास है कि आज हम अपनी गाड़ियाँ, अपने बैंक खातों की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंश्योरेंस और सुरक्षा कवच खरीदते हैं; लेकिन जो हमारा असली और प्राकृतिक सुरक्षा कवच है -हमारे अपने बुजुर्गों का सानिध्य- जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, उसे हमने खुद ही अपने से दूर कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि किताबें और गूगल आपको ज्ञान दे सकते हैं; लेकिन जिंदगी को जीने की समझ और संकटों से लड़ने का धीरज केवल बुजुर्ग दे सकते हैं, जिन्होंने अपनी उम्र के कई सावन और पतझड़ देखे हैं। उनका अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं; बल्कि जिंदगी की भट्टी में तपा हुआ वह सच है जो हमें सही दिशा दिखाता है।

कहना यही चाहती हूँ कि, सावन की इस रिमझिम फुहारों के बीच, खिड़की से बाहर पानी की बूँदों को गिरते हुए जब देखें, तो जरा ठहरकर अपने भीतर अवश्य झांकें- कि जिंदगी की यह मशीनी जैसी दौड़ और दूसरों से आगे निकलने की अंधी प्रतियोगिता हमें किस ओर ले जा रही है। कहा जाता है कि जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे पहली ही भारी बारिश या तूफान में धराशायी हो जाते हैं। यही बात इंसानी रिश्तों और समाज पर भी लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी इस मशीनी युग में भी हरी-भरी और जीवंत बनी रहे, तो हमें अपने घरों में, अपने समाज में अनुभवों की उस छतरी को फिर से सहेजकर खोलना होगा। बुजुर्गों के आशीर्वाद वाले उन हाथों का सम्मान करना होगा; क्योंकि जब तक वह छतरी हमारे सिर पर तनी है,  तब तक चाहे आँधी- तूफान हो या मूसलाधार बारिश, हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक

  - डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ यात्राएँ केवल जगह देखने के लिए नहीं होतीं - वे आत्मा को छूने, मन को शांत करने और प्रकृति से गहरे जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा रही अमरकंटक की। वह भी बारिश के मौसम में- जब हर पत्ता धुला हुआ लगता है, हर शाख बरखा की बूँदों से झुकी हुई और काले बादल मानों मेघदूत की तरह किसी का संदेश लेकर जाते हुए दिखाई देते हैं।  

मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के मिलन-बिंदु पर स्थित एक सुंदर पहाड़ी क्षेत्र है में स्थित है अमरकंटक। यह छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा हुआ है और नर्मदा का उद्गम स्थल होने के कारण तीर्थराज के रूप में प्रसिद्ध है।  मैकल पर्वत की गोद में बसा यह स्थान किसी रहस्य और आध्यात्मिक शक्ति से भरा लगता है। एक ऐसी पावन भूमि जहाँ से न केवल नदियाँ बहती हैं, बल्कि आस्था, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम भी होता है। 

पूरे भारतवर्ष में ऐसे भौगोलिक क्षेत्र विरले ही देखने को मिलते हैं जहाँ एक ही स्थान से तीन नदियों का उद्गम हुआ हो। इतना ही नहीं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं- नर्मदा जी, जो पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है और अरब सागर में मिलती है; दूसरी सोन नदी, जो पूर्व की ओर बहकर गंगा से मिलती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में समा जाती है; और तीसरी जोहिला, जो दोनों के बीच से होती हुई आगे बढ़ती है और सोनभद्र में समा जाती है। है न यह सब अद्भुत और रहस्यमय? यही कारण है कि अमरकंटक को भारत के आध्यात्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान मिला है।

पेंड्रा से अमरकंटक : हरियाली  और बादलों के संग 

तो ऐसे विशेष स्थान की ओर रायपुर से पेंड्रा तक रेल से हमारा सफर तो सहज रहा; लेकिन असली सौंदर्य तो वहाँ से अमरकंटक की ओर सड़क मार्ग से जाते समय दिखाई दिया। सच ही है बारिश की रिमझिम बूँदों के संग यात्रा का रोमांच ही कुछ और होता है।  पिछले वर्ष पहली जुलाई की  सुबह जब रेल से मैं और मेरी चित्रकार दोस्त सुनीता पेंड्रा स्टेशन पर उतरे तब रिमझिम बारिश हो रही थी। बारिश की हल्की फुहारों के साथ चारों ओर फैले साल के हरे- भरे घने जंगल और खूबसूरत घाटियों को निहारते हुए एक घंटा कैसे बीता पता ही नहीं चला।  

अमरकंटक की वादियों में पहुँचते ही आभास हुआ मानों प्रकृति हमारे स्वागत में कोई गीत गुनगुना रही हो । मिट्टी में एक खास प्रकार की भीनी खुशबू , जो पहाड़ और जंगल में  सिर्फ बारिश में ही उठती है। ठंडी हवाएँ और आसमान में उमड़ते- घुमड़ते बादल... सब कुछ सुखद अहसास से भरा हुआ था। 

रास्ते में हम बाते करते हुए जा रहे थे कि अमरकंटक कैसे मध्यप्रदेश के हिस्से में चला गया और छत्तीसगढ़ को नहीं मिल पाया। दरअसल जब साल 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना, तब अमरकंटक को लेकर दोनों राज्यों में तनातनी की  स्थिति बनी रही। बटवारे के बाद नर्मदा मैया का उद्गम स्थल और मुख्य मंदिर परिसर तो मध्यप्रदेश में था; लेकिन पहाड़ों और जंगलों का एक बड़ा हिस्सा नए राज्य छत्तीसगढ़ में आ गया। धार्मिक महत्त्व और पर्यटन की वजह से दोनों ही राज्य इसे अपने क्षेत्र में शामिल करना चाहते थे। इससे यह उपेक्षित हो गया।  बढ़ता पर्यटन, अव्यवस्थित निर्माण और कचरे ने नर्मदा के उद्गम की पवित्रता पर असर डालना शुरू कर दिया। तब 2016 में दोनों राज्यों ने मिलकर इसे विशेष क्षेत्र घोषित कर एक संयुक्त प्राधिकरण बनाया। मकसद था- नर्मदा के उद्गम और आसपास के जलस्रोतों का संरक्षण करना पर्यटन को बढ़ावा देना साथ ही जंगल और पहाड़ को बचाए रखना।

.... हमारी बातों का सिलसिला चल ही रहा कि हम जंगल और पहाड़ियों के बीच बने एक शांत गेस्ट हाउस; जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था थी,  में कब पहुँच गए पता ही नहीं चला।  काले बादलों से ढँके आसमान के नीचे गेस्ट हाउस की गैलरी में बैठकर गरमागरम चाय की चुस्कियों ने रेल यात्रा की थकान को सुकून में बदल दिया। शाम हो गई थी अंतः कहीं और जाने का विचार नहीं था परंतु चाय पीने के बाद हमें बताया गया कि इस समय नर्मदा कुंड में शाम की आरती चल रही होगी । बस फिर क्या था हम तुरंत ही तैयार हुए और निकल पड़े नर्मदा मैया के उद्गम स्थल की ओर, भला ऐसा शुभ अवसर कौन छोड़ता है। 

चूँकि इस बार अमरकंटक कई बरस के बाद आना हुआ था तो  मुख्य सड़क के चारो ओर का नजारा बहुत कुछ बदला- बदला सा था। बारिश का मौसम होने के कारण पर्यटक तो इस समय बहुत कम थे।  हमने देखा जगह-  जगह अनेक नए भवन, आश्रम और कुछ मंदिरों का निर्माण हो चुका था। ठहरने के लिए धर्मशाला, होटल, आदि में भी बहुत बढ़ोतरी दिखाई दे रही थी। 

 रास्ते में नर्मदा नदी के जन्म को लेकर प्रचलित जनश्रुतियों पर भी बात होने लगी।   लोककथाओं  पौराणिक कथाओं में भी उनके जन्म और विवाह न होने को लेकर कुछ कथाएँ प्रचलित हैं जैसे-  भगवान शिव ने अपने अश्रुओं से नर्मदा को जन्म दिया था, यह भी कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण के समय अपने आशीर्वाद से नर्मदा को अवतरित किया। तभी तो नर्मदा मैया को “स्वयंभू नदी” माना जाता है। इसीलिए मान्यता है कि नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। इस तरह की अनेक कथाएँ सुनते- सुनाते हम कुछ ही किलोमीटर की दूरी तय कर नर्मदा कुंड पहुँच  गए। 

एक समय था कि जब नर्मदा कुंड और उसके आस- पास के मंदिरों का यह समूह दूर से ही नजर आता था पर अब गलियारे, रेलिंग और चबूतरे सब तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बन गए हैं। जूते उतारकर जब हम टाइलों वाले गलियारे से गुजरे तो भीगे फर्श पर फिसलने का डर था, पर मन में उमंग थी अतः मंदिर के समीप पहुँचे तो मंत्रोच्चारण के साथ आरती शुरू हो चुकी थी, अनेक भक्त जन वहाँ इकट्ठा थे। हम भी सबके बीच ध्यान मग्न होकर आरती में शामिल हो गए ....

अँधेरा घिर आया था और बारिश की बूँदे अब कुछ तेज हो गई थीं। उद्गम स्थल पर बना कुंड बहुत ही शांत, आध्यात्मिक और पवित्र अनुभूति से भरा हुआ था। आरती के बाद कुंड के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लगा जैसे जीवन की परिक्रमा नर्मदा मैया के सान्निध्य में पूरी हो रही हो। मंदिर परिसर में थोड़ी देर और ठहर, परिसर के चारो ओर घूमते हुए हम वापस गेस्ट हाऊस लौट आए। 

स्वाद और सुकून की रात

रात के भोजन में गरमागरम फुलके, नारियल की खुशबू से भरी बरबटी की सूखी सब्जी, आलू- गोभी की रसे वाली सब्जी, दाल-चावल और खीर - हर चीज़ स्वाद में लाजवाब। इस स्वादिष्ट भोजन ने दिन भर की भूख और थकान सब कुछ मिटा दिया। पेट तो भर गया, पर मन नहीं। खाने के बाद परिसर में आधे घंटे की चहलकदमी जरूरी हो गई थी, साथ में अमरकंटक के तब और अब में आए बदलाव पर गप-शप भी होती रही ताकि नींद आने में प्रकृति भी साथ दे।

दूसरा दिन : अमरकंटक की वादियों में भ्रमण

रात सुकून भरी नींद आई। चिड़ायों की चहचआहट और पत्तों  और शाखों पर गिरते बारिश की संगीतमय बूँदों की आवाज के साथ नींद खुली। जैसे ही कमरे के पीछे का दरवाजा खुला तो लगा मानों जंगल और पहाड़ के ऊपर उमड़ते – घुमड़ते बादल हमें सुबह की सैर के लिए आमंत्रित कर रहे हों। भला बादलों का आमंत्रण हम कैसे ठुकराते। 

और सच कहूँ... बारिश से भीगी हुई सुबह की यह सैर इस यात्रा में अनमोल रही। बादलों ने ठहर कर जैसे हमें अमरकंटक की शुद्ध और ताजी हवा में सांस लेने का मौका दे दिया। बारिश से धुली सड़क पर चलते हुए जंगल और पहाड़ से उठती सोंधी खूशबू, चारो ओर हरियाली की बिछी चादर, बारिश से भीगे पत्तों से गिरती बूँदें और पक्षियों का मधुर कलरव- सब मिलकर जैसे किसी अनकही कविता की रचना कर रहे थे।

कपिल धारा के रास्ते में चलते हुए आधे घंटे से अधिक समय तक सैर के बाद हम अपने ठिकाने पर लौट आए । आज का मौसम जैसे हमारे लिए ही खुला था, रात भर बरस कर बादल मानों सुस्ता रहे हों। बस फिर क्या था हम तैयार होकर नाश्ते के लिए जैसे ही डाईनिंग टेबल पर पहुँचे, उम्मीद से बिल्कुल विपरीत अमरकंटक की सादगी में इडली, डोसा, सांभर और नारियल की चटनी का दक्षिण भारतीय नाश्ता हमारा इंतजार कर रहा था। सब कुछ इतना स्वादिष्ट कि खाते हुए लगा कहीं हम केरल तो नहीं  पहुँच गए? दरअसल वहाँ का रसोइया दक्षिण भारतीय जो था। 

फिर शुरू हुई हमारी अमरकंटक के कुछ प्रमुख स्थलों की यात्रा: सबसे पहले पँहुचे माई की बगिया में- 

बरसों पहले माई की बगिया का जब भ्रमण किया था तो यहाँ जलधाराओं के कुंड प्राकृतिक रूप में थे, पर अब कुंड के चारो ओर क्रांकीट के मंदिर का निर्माण कर दिया गया है। किसी समय यहाँ साधु संत कुटिया में धुनी रमाए बैठे हुए नजर आते थे। पर अब नजारा कुछ अलग ही है।  फिर भी हरियाली से भरी इस बगिया में चलते हुए एक अलौकिक ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा अपनी सहेली गुलबकावली के साथ यहाँ खेलने आया करती थीं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नर्मदा नदी का वास्तविक उद्गम स्थल माई की बगिया ही है, और यहाँ से निकलने वाली जलधारा आगे जाकर नर्मदा मंदिर में मिलती है। एक अन्य कथा के अनुसार, नर्मदा का विवाह सोनभद्र से तय हुआ था और माई की बगिया में उनका विवाह मंडप भी सजाया गया था; लेकिन नर्मदा की जगह उसकी सहेली जोहिला दुल्हन बनकर बैठ गई। यह देखकर  नर्मदा रूठ गई और उल्टी दिशा में बहना शुरू कर दिया। किंवदंतियाँ तो कई प्रचलित है पर सच्चाई यही है कि यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो जाना ही जाता है, साथ ही कई औषधीय पौधों, विशेष रूप से गुलबकावली के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसका उपयोग आँखों के रोगों के लिए आयुर्वेदिक दवाई बनाने में किया जाता है। 

माई की बगिया से लौटकर हमारे कदम नर्मदा कुंड के पास फैले प्राचीन मंदिरों के समूह की ओर बढ़ चले। यह वे मंदिर हैं, जो अमरकंटक की पहचान हैं और 11वीं शताब्दी के कलचुरी वंश के सुनहरे इतिहास की गवाही देते हैं। राजा कर्णदेव ने इनका निर्माण कराया था। इस परिसर में छह मंदिर और सूरज कुंड नामक एक कुंड भी है। कर्ण मंदिर, केशव नारायण मंदिर, मछेंद्रनाथ मंदिर और पातालेश्वर मंदिर त्रिपुरियों के कलचुरियों द्वारा निर्मित किए गए थे, जबकि पंच मठ और जोहिला मंदिर बाद के काल के हैं। इनकी स्थापत्य शैली में कलचुरी कला का अद्भुत संतुलन दिखता है- बारीक नक्काशी और पत्थरों पर उकेरे गए प्रतीक आज भी जीवंत प्रतीत होते हैं।

इन मंदिरों का संरक्षण भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है। अब विभाग द्वारा परिसर को सँवारकर सुंदर बगीचे, पक्के रास्ते और गलियारे बना दिए गए हैं। पर्यटकों के लिए टिकट प्रणाली भी लागू है, ताकि धरोहर की देखभाल हो सके। ऐसा होने से प्रत्येक मंदिर में जाना और उन्हें करीब से देखना आसान हो गया है। मंदिरों के बीच विचरण करते हुए यही महसूस हुआ जैसे इतिहास फुसफुसा रहा हो- पत्थरों में गूँथा हुआ विश्वास, और आकाश को छूती हुई आस्था।

मंदिरों की सीढ़ियों और कुंड के पास कुछ चित्र खींचकर अगली यात्रा यानी कपिलधारा की ओर जलप्रपात  देखने के लिए निकल पड़े। लगभग 100 फीट ऊँचाई से गिरता यह जलप्रपात नर्मदा का पहला पड़ाव है। मन मोह लेने वाला दृश्य था। कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ कपिल मुनि ने तप किया और सांख्य दर्शन की रचना की। बारिश के कारण नीचे बहते प्रपात तक जाना तो जोखिम भरा था, पर कुछ साहसी तब भी नीचे उतर चुके थे। प्रकृति की गोद में बसे  इस आलौकिक स्थान की पहाड़ियों के आस- पास सदियों पुरानी कई गुफाएँ हैं जहाँ बैरागी कभी तप किया करते थे। तभी तो यहाँ से जलप्रपात को देखते हुए ध्यान करने जैसा अनुभव होता है और आस- पास पहाड़ों और जंगल में  फैली दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ से हवा शुद्ध और ताजगी से भरी हुई।

जब हम यहाँ पहुँचे तो पर्यटकों की थोड़ी भीड़ थी,  वे सब प्रशासन द्वारा बनाए नए व्यू प्वाइंट से झरने के साथ चित्र खिंचवाने में लगे हुए थे। जब भीड़ कुछ छंट गई तो हम भी उसी स्थान से कपिल धारा को देखने पहुँच गए। हमने भी कुछ चित्र लिए । चारों ओर पहाड़ और जंगल से घिरे इस मनोरम स्थान में कुछ समय व्यतीत कर बढ़ चले अगले पड़ाव की ओर.....

हमारा अगला पड़ाव था ज्वालेश्वर मंदिर यहाँ भगवन शिव का विशाल शिवलिंग स्थापित है।  पुराणों में इस स्थान को महारुद्र मेरु भी कहा गया है।  यह भी माना जाता है कि भगवान शिव पार्वती से साथ इस रमणीय स्‍थान पर निवास करते थे। ऐसा भी माना जाता है गंगोत्री का जल रामेश्वर में चढ़ाने में जितना पुण्य फल मिलता है उतना ही फल नर्मदा का जल ज्वालेश्वर महादेव में चढ़ाने से मिलता है।  इस विशाल शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए सीढ़ियों से ऊपर चढ़ना पड़ता है हमने भी ऊपर जाकर जल चढ़ाया और प्रणाम कर नीचे आ गए। 

तीसरे दिन सुबह भी बेहद खुशनुमा थी।  सुबह की सैर के लिए हमने आज दूसरा रास्ता चुना, थोड़ी चढ़ाई वाला।  लौटते हुए सुनीता ने वहाँ के जंगलों से कुछ जंगली फूल के पौधे चुन लिये। जिनमें गुलाब के कलम भी शामिल हैं। चूँकि कटीले गुलाब की डालियों को तोड़ पाना मुश्किल हो रहा था तो पास ही गाँव के एक घर में कलम काटने के लिए औजार माँगने के इरादे से आवाज लगाई। दुबली पतली सुंदर सी महिला ने बाहर आकर सवालिया निगाहों से हमें देखा तो झट हमने अपने आने का मकसद बता दिया । उस महिला ने तुरंत अपने पति को हमारी मदद के लिए भेज दिया । उस नौजवान ने अपनी कुल्हाड़ी से ढेर सारे गुलाब के कलम काटकर हमें दे दिए। सुनीता इस गुलाब के कलम को अपने नए स्टूडियो में लगाना चाहती है। पौधे लेकर हम लौट आए; क्योंकि तैयार होकर हमें  फिर कुछ और प्राकृतिक स्थानों  की ओर जाना था। 

लेकिन हमारी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। जैसे बादल हमसे कह रहे हों कि आज तो मुझे यहीं बैठकर आराम से निहारना होगा। और हुआ भी वही बारिश तेज हो गई और लगातार दिन भर होती रही। गरमा- गरम चाय का आनंद लेते हुए हम कमरे के पीछे गलियारे में बैठ बारिश का भरपूर आनंद लेते रहे। नाश्ता किया, भोजन लिया और दिन भर जंगल और पहाड़ों को बारिश में भीगते देखते रहे। 

आखिर इसी मौसम का आनंद लेने तो हमने अमरकंटक को चुना था । प्रकृति ने भी जैसे हमारा मन भाप लिया था। भला ऐसे मनोहारी दृश्य को देखकर सुनीता का चित्रकार मन कैसे न मचलता उसने तुरंत अपनी ड्राइंग कॉपी और पेन निकाली और रम गई,  लगा जैसे उसने प्रकृति को कागज पर उतार लिया हो ...और मैं इस अलौकिक अनुभव को शब्दों में ढालने के बारे में सोचती रही। 

धरमपानी और प्रकृति की गोद में विश्राम

दोपहर का भोजन लेकर हमने थोड़ी देर आराम किया और जब बारिश कुछ थमी, तो हम फिर निकल पड़े छतरी लेकर यह कहते हुए कि अब तो चाहे जितना बरसो चाहे हमें भी भिगो दो । थोड़ी देर वहाँ का स्थानीय बाजार घूमते रहे और जब बारिश पूरी तरह थम गई तो बताया गया कि आज तेज बारिश के कारण सोन मुड़ा, दूधधारा और कबीर चौरा आदि जाना मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि दूरी कुछ ज्यादा है और वहाँ से अँधेरा होने से पहले लौट भी नहीं सकते; लेकिन पास ही धरमपानी जा कर आराम से  वापस आया जा सकता था। 

धरमपानी, छत्तीसगढ़ की सीमा में स्थित एक रमणीय स्थान है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और पहाड़ों की अलोकिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह वास्तव में एक गर्म पानी का झरना है जिसे धुनी पानी भी कहा जाता है।  यह झरना औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है और माना जाता है कि इसमें स्नान करने से कई रोग ठीक हो जाते हैं।   

धरमपानी पहुँच कर तो आनंद ही आ गया। प्रकृति का बेहद खूबसूरत नजारा । हमने एक चट्टान पर बैठकर प्रकृति का शांत संगीत सुनते हुए पूरी शाम बिता दी।  दूर पहाड़ों पर बादलों की लुकाछिपी, हवाओं से झनकर आती आवाज, मानों कोई मघुर गीत गुनगुना रहा हो... रोज शाम आती थी, मगर ऐसी न थी, रोज रोज घटा छाती थी मगर ऐसी न थी.... यहाँ आकर बैठना जीवन की व्यस्तता से दूर, एक तरह का ध्यान का अनुभव करना था। सच है प्रकृति के साथ कुछ समय हर व्यक्ति को बिताना ही चाहिए। मन तो नहीं था पर अँधेरा घिरने वाला था अतः वहाँ से भी  लौटना ही पड़ा।  

प्रकृति, आत्मा और आस्था के मिलन की इस भूमि में तीन दिन तक समय बिताने के बाद ऐसा महसूस हुआ मानो सौन्दर्य से आच्छादित यह पवित्र तपोभूमि किसी ऋषि की कथा सुना रहा हो। प्रकृति जब अपने पूर्ण सौंदर्य में होती है, तब मनुष्य के सारे प्रश्न, सारी थकान और सारी बेचैनी जैसे खुद-ब-खुद शांत हो जाती हैं। अमरकंटक की बारिश में भीगी यह यात्रा एक तीर्थ से कहीं अधिक एक आध्यात्मिक अनुभव थी- एक ऐसा अनुभव जिसे न कैमरे में कैद किया जा सकता न शब्दों में समेटा जा सकता, पर आत्मा में हमेशा के लिए अवश्य दर्ज हो जाता है। कैमरे ने तस्वीरें तो कई ली; लेकिन सही माने में मन ने जो चित्र बनाए, वे कहीं गहरे तक अंकित हो गए हैं। बारिश में भीगते जंगल, प्राचीन मंदिरों की शांति और नर्मदा की पवित्रता ने हमें भीतर तक स्पर्श किया। सच है, नर्मदा केवल एक नदी नहीं, एक भाव है- जिसमें बहते ही मन पावन हो जाता है।

Jun 1, 2026

अनकहीः वर्तमान की धूप और भविष्य के बादल

- डॉ.  रत्ना वर्मा 

 जून का महीना आते ही हम सभी आसमान की तरफ टकटकी लगाए देखने लगते हैं कि काश, बस एक बार अच्छी बारिश हो जाए, ताकि इस झुलसाने वाली गर्मी और लू से राहत मिले। गर्मी में राहत की चाह रखना बहुत स्वाभाविक है; लेकिन यह भी सच है कि हम हमेशा जो नहीं है उसकी चाहत में इतने व्याकुल रहते हैं कि, जो सामने है उसकी खूबी को देखना भूल जाते हैं। आज जून की इस चिलचिलाती धूप में हम जुलाई-अगस्त की बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं।  लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जैसे ही बारिश आएगी, वे सब जो आज पानी की एक बूँद के लिए तरस रहे हैं, कल जलभराव, रास्तों के कीचड़, सीलन और उमस को कोसने लगेंगे। तब हर कोई कहेगा कि इससे तो जून की सूखी गर्मी ही भली थी!

वैसे, ध्यान से देखें तो आज ये मौसम भी अपने पुराने और स्वाभाविक चक्र में कहाँ रहे? चाहे यह रिकॉर्ड तोड़ती भीषण गर्मी हो, प्रलय जैसी बाढ़ लाने वाली भारी बारिश हो या हाड़ कँपाने वाली कड़ाके की ठंड- यह सब प्रकृति का बदला हुआ रूप है, जो हमें चेतावनी दे रहा है। असल में तरक्की के नाम पर और 'अंधाधुंध विकास' के मुखौटे के पीछे जो बर्बादी हमने खुद अपने हाथों की है, हमारी उसी लालच और गलतियों के कारण ही यह मौसम चक्र बुरी तरह टूट रहा है। हम कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं, जंगलों को काटकर सड़कें बिछा रहे हैं, नदियों का दम घोंट रहे हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि मौसम हमें अपनी ठंडी छाँव दे। यह भला कैसे संभव है? अपनी ही धरती को भीतर तक झुलसा कर हम सुखद और शांत मौसम की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर हम चाहते हैं कि आने वाले समय में हमें ये सारे मौसम अपने सही चक्र में चले और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ इनका स्वागत आनंद मनाते हुए कर सकें, तो  पहले हमें  अपनी धरती को, प्रकृति को सिर्फ भुनाना बंद करना होगा। 

  दरअसल हम कभी उस पल को जीना ही नहीं सीखते जो हमारे हाथ में है। यही वजह है कि हम बहुत तेज दौड़कर सबकुछ बहुत जल्दी पा लेना चाहते हैं और यही छटपटाहट आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का सच बन चुकी है- जब हम बच्चे होते हैं तो हमें बड़े होने की जल्दी रहती है कि कब स्कूल की बंदिशें, होमवर्क का बोझ और बड़ों की डाँट-डपट खत्म हो और आज़ादी का आसमान मिले। फिर जब पढ़ाई के उस सुनहरे दौर से बाहर निकलते हैं, तो दिन-रात एक ही धुन सवार हो जाती है कि कब एक अच्छी- सी नौकरी मिल जाए, खूब पैसा कमाएँ, अपनी मनमर्जी से जीवन जिएँ,  समाज में रुतबा बन जाए। इसके बाद जब नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों का वह मनचाहा मुकाम मिल जाता है, तब हम उस पल का आनंद लेने के बजाय फिर अतीत की ओर मुड़कर देखने लगते हैं कि हमारा वह बेफिक्री वाला बचपन ही सबसे अच्छा था, जहाँ न कोई ईएमआई का तनाव था और न ही कोई जिम्मेदारी। कहने का तात्पर्य यही है कि हम हमेशा अगले पड़ाव की अंधी तलाश में वर्तमान को अधूरा छोड़ते चले जा रहे हैं। 

इस निरंतर आगे भागने और जो हाथ में है उसे कमतर आँकने की आदत ने हमें भीतर से बहुत अधीर, असंतुष्ट और रोबोट जैसा बना दिया है। हमने जिंदगी को एक मशीन समझ लिया है, जहाँ बस चौबीसों घंटे बिना रुके, बिना सोचे-समझे किसी अनजानी रेस के पीछे भागते चले जाना है। जबकि यह सनातन सत्य है कि जीवन जीने की अपनी एक बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। जैसे प्रकृति किसी बीज को रातों-रात पेड़ बनाकर फल देने के लिए मजबूर नहीं करती, वह उसे हर मौसम को सहने और धीरे-धीरे पनपने का समय देती है, वैसे ही हमें भी अपनी उम्र के हर पड़ाव को, उसकी हर खूबी और कमी के साथ स्वीकार करते हुए सहजता से पार करते चले जाना चाहिए। लेकिन आज का इंसान अपनी इस सहजता को भूलकर दूसरों के साथ एक ऐसी आत्मघाती होड़ में शामिल हो गया है, जिसकी न तो कोई मंजिल है और न ही कोई अंत। पड़ोसी की गाड़ी, सहकर्मी का प्रमोशन या सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली चमक देखकर हम अपने आज के सुकून को दांव पर लगा देते हैं।

प्रकृति का अपना एक अटूट नियम है। जून की यह तपिश और लू भी हमारे जीवन के लिए उतनी ही ज़रूरी है, जितनी जुलाई की रिमझिम बौछारें। यह धूप सिर्फ हमारे बदन को नहीं तपाती, बल्कि खेतों में खड़ी फसलों को पकाने, मिट्टी के भीतर के हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने और पूरी पृथ्वी के जल-चक्र को संतुलित रखने के लिए बेहद आवश्यक है। यदि जून में यह प्रचंड गर्मी नहीं पड़ेगी, तो समुद्र का पानी भाप बनकर आसमान में नहीं जाएगा और अगर भाप नहीं बनेगी तो सावन के बादल कहाँ से आएँगे? ठीक इसी तरह, जिंदगी के संघर्ष, कठिनाइयाँ और हमारे हिस्से में आई जिम्मेदारियों की धूप भी हमें भीतर से तपाकर परिपक्व बनाती है। अगर हम इस धूप की तपन को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर लें, तो इसके बाद मिलने वाली सफलता या सुख का आनंद अपने आप दोगुना हो जाएगा।

दरअसल भविष्य के सुंदर और काल्पनिक ख्वाब बुनने में हम इतने मशगूल रहते हैं कि आज के यथार्थ की धूप को सहने का हौसला और धीरज खो देते हैं। जो बीत गया वह सिर्फ यादें हैं, उन पर हमारा कोई वश नहीं है। जो आने वाला है वह केवल एक अनिश्चित संभावना है, जिसके बारे में हम सिर्फ कयास लगा सकते हैं। लेकिन जो पल, जो दिन और जो रिश्ते इस समय हमारे ठीक सामने मौजूद हैं, वही हमारा वास्तविक जीवन है। तो जब तक हम हर स्थिति और हर मौसम के साथ सामंजस्य बिठाना नहीं सीखेंगे, तब तक हम चाहे मनचाही बरसात पा लें या जीवन का कोई बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लें, हमारे मन के किसी कोने में एक छटपटाहट हमेशा बनी रहेगी। और यह छटपटाहट तभी दूर होगी जब हम कहीं पहुँचने की हड़बड़ी छोड़कर, इस सुंदर सफर की खिड़की से बाहर देखते हुए आज पर ठहरकर खुलकर सांस लेना नहीं सीख जाएँगे। जिंदगी कल नहीं, बल्कि इसी वक्त, इसी पल में है। 

May 1, 2026

अनकहीः गर्मी से भागते हुए… क्या 'सच' से भी भाग रहे हैं?

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

इन दिनों मैं पहाड़ों की ओर रोड ट्रिप पर हूँ। जब भी घर या दोस्तों से बात होती है और वे जब उधर का हाल बताते हैं कि यहाँ तो पारा 45-46 डिग्री से भी ऊपर पहुँच गया है, तो एक अजीब-सी द्वंद्वात्मक स्थिति मन में जन्म लेती है। एक ओर मैं हूँ, जो इस भीषण गर्मी से राहत पाने, अपने घुमक्कड़ी शौक को पूरा करने, पहाड़ों की ठंडी हवा में सुकून ढूँढने निकल पड़ी हूँ; दूसरी ओर वे लोग हैं, जो उसी तपिश में झुलस रहे हैं।

सच तो यह है कि मुझे घूमने का शौक है। मौका मिले, साथ मिले, तो बस निकल पड़ती हूँ। इस बार की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है- रायपुर से सिलीगुड़ी, फिर कालिम्पोंग, गंगटोक में चंगू लेक और नाथुला दर्रा होते हुए दार्जिलिंग की ओर बढ़ रही हूँ। यहाँ का मौसम मन को हर पल ठंडक देता है। बादलों की ओट में लिपटे पहाड़, हल्की बारिश की फुहारें और ठंडी हवा के झोंके- सब कुछ किसी स्वप्नलोक जैसा लगता है। यहाँ आकर मन प्रसन्न है, आत्मा जैसे तरोताज़ा हो गई हो।

लेकिन जैसे ही नीचे के इलाकों का हाल सुनती हूँ, मन ठहर जाता है। सोचने को विवश हो जाती हूँ- क्या हम सिर्फ़ इस ठंडक का आनन्द लेने के लिए यहाँ आए हैं, या उस तपिश से आँख चुराने के लिए भी, जो अब हर साल और भयावह होती जा रही है?

छह दशक का जीवन बीत चुका है। बचपन से लेकर अब तक हर साल गर्मियाँ देखी हैं। लू के थपेड़े भी नए नहीं हैं; लेकिन पिछले एक- दो दशकों में जो बदलाव आया है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। अब गर्मी सिर्फ़ असहनीय नहीं रही, बल्कि खतरनाक होती जा रही है। हाल ही में देश के कई हिस्सों से खबरें आई हैं- राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़- जहाँ तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच गया। कई शहरों में ‘हीट वेव’ को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। कुछ जगहों पर तो मौत की खबरें भी सामने आई हैं।

वैज्ञानिक भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं। बदलते मौसम और धरती के लगातार गर्म होने की समस्या अब कोई भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज की सच्चाई बन चुकी है। दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है, बर्फ के पहाड़ पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है- ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है।

पर सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उत्तर बहुत जटिल नहीं है- हम स्वयं हैं।

विकास की दौड़ में हमने प्रकृति को पीछे छोड़ दिया है। सड़कों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को चीर दिया जा रहा है, रेल लाइन बिछाने के लिए पहाड़ों पर कंक्रीट के भारी भारी पिलर खड़े किए जा रहे हैं।  बिजली बनाने के लिए अब भी कोयले पर ज्यादा निर्भरता है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं; लेकिन उनके लिए पर्यावरण के कड़े नियमों का पालन अक्सर नहीं दिखता।

विडंबना यह है कि जिन पहाड़ों की ओर हम गर्मी से राहत पाने आते हैं, वहाँ भी वही कहानी दोहराई जा रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों को कंक्रीट से ढका जा रहा है। होटल, रिसॉर्ट, सड़कें- सब कुछ इस तरह बढ़ रहे हैं कि पहाड़ों की असली बनावट ही खतरे में पड़ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ी इलाकों में अंधाधुंध निर्माण से भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जल- स्रोत सूख रहे हैं। जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता भी खतरे में पड़ रही है।


मौसम विभाग और दुनिया की कई संस्थाएँ बार-बार कह रही हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में लू और भी तेज़ और लंबे समय तक पड़ सकती है। सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सब चिंता सिर्फ़ पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सरकारों की जिम्मेदारी रह गई है, क्या हमारी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। हम अक्सर कहते हैं- “सरकार कुछ नहीं कर रही।” लेकिन क्या हम स्वयं कुछ कर रहे हैं?

क्या हमने अपने स्तर पर पेड़ लगाने की कोशिश की? क्या हमने बिजली और पानी के इस्तेमाल में संयम बरता? क्या हमने प्लास्टिक का उपयोग कम किया? क्या हमने अपने शहरों में हरियाली बचाने की कोशिश की? सच यह है कि हम समस्या को समझते हैं, उस पर चर्चा भी करते हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कदम उठाने से बचते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएँ।

विकास जरूरी है; लेकिन वह प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना होना चाहिए। तरक्की तो हर किसी को चाहिए; पर हमें ऐसी तरक्की करनी होगी, जिसमें हम आगे भी बढ़ें और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। सरकारों को भी कड़े नियम बनाने होंगे- जंगलों की कटाई पर नियंत्रण, निर्माण कार्यों के लिए कठोर पर्यावरणीय स्वीकृति, सूरज, हवा और पानी से मिलने वाली ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना होगा;  लेकिन इसके साथ-साथ, आम नागरिक के रूप में हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जैसे- जब हम यात्रा पर निकलें, तो प्रकृति का सम्मान करें। कूड़ा न फैलाएँ, स्थानीय संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग न करें। ऐसे पर्यटन को अपनाएँ , जिससे घूमना भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।

आज जब मैं इन पहाड़ों की ठंडी हवा में साँस ले रही हूँ, तो यह सोचकर संतोष होता है कि अभी भी प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है और देती ही जा रही है; लेकिन यह संतोष तभी तक है, जब तक हम इसे सहेज कर रख सकें। यदि हमने अभी भी चेतावनी को अनसुना किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब ये पहाड़ भी तपने लगेंगे और हमें राहत पाने के लिए कोई ठिकाना नहीं मिलेगा।

इसलिए जरूरी है कि हम सिर्फ़ चिंतित न रहें, बल्कि सक्रिय भी हों; क्योंकि यह सिर्फ़ मौसम का बदलाव नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।

Apr 1, 2026

अनकहीःआस्था, परंपरा और हमारा विश्वास

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

  भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वह हमारे घर- परिवार, समाज और पूरे देश के लोगों की दिनचर्या में रचा- बसा हुआ है। अभी- अभी हमने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण  पर्व  रंगारंग होली का त्योहार मनाने के बाद नवसत्संवर, नवरात्रि और फिर रामनवमी का त्योहार बड़े ही धूम- धाम से मनाया है। पूरा देश रंगों से सराबोर होकर श्रद्धा, भक्ति और आस्था में डूबा हुआ था; परंतु क्या आपने कभी ये सोचा है कि हमने नौ दिनों तक जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा अर्चना की, देवी के लिए लाल चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर, आलता और जेवर चढ़ाकर हवन - पूजन किया और पूजा समाप्ति के बाद इनमें से बहुत कुछ पूजा सामग्री जैसे-  फूल- मालाएँ, कपड़े, प्लास्टिक, थर्माकोल, रंग- रोगन वाली मूर्तियाँ और भी बहुत सारी चढ़ावे की सामग्री नदी और तालाब में यह कहते हुए विसर्जित कर देते हैं कि यह पूजा की पवित्र सामग्री है, इसे यूँ ही कहीं भी नहीं फेंका जा सकता। 

 यहीं एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। क्या हमने कभी गंभीरता से यह सोचा है कि जिन जलस्रोतों को गंगा मैया और नर्मदा मैया कहते हुए पूजते हैं, वे हमारे ही हाथों से धीरे-धीरे विषैले बनते जा रहे हैं? वे आज दुर्गंध और गंदगी के कारण उपयोग के योग्य भी नहीं बचे। आखिर यह स्थिति आई क्यों? यह सब  किसी एक व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक उपेक्षा का परिणाम है।

दरअसल समस्या आस्था में नहीं है, समस्या आस्था की हमारी समझ में है। हमारी परंपराओं में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि पूजा के नाम पर प्रकृति को नुकसान पहुँचाया जाए; बल्कि इसके उलट भारतीय दर्शन में तो प्रकृति को देवतुल्य माना गया है- पृथ्वी माता, जल देवता, वायु देव और अग्नि देव। जब हम इन्हें देव या माता के रूप में पूजते हैं, तो इन्हें प्रदूषित करने का विचार भी मन में नहीं ला सकते।  

आज आवश्यकता है कि हम आस्था और अपने धार्मिक विश्वास को इस अंधविश्वास में न बदलें कि पूजन- सामग्री का जल में विसर्जन ही अनिवार्य है। इस सोच को बदलना जरूरी है। पूजा के बाद जो सामग्री प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकती है- जैसे फूल, पत्ते, लकड़ी, राख, मिट्टी के दीपक और मूर्तियाँ- उन्हें मिट्टी में ही मिलाया जा सकता है। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य का सरल और सम्मानजनक तरीका है, जिससे न आस्था को ठेस पहुँचती है और न पर्यावरण को हानि होती है। और जो वस्तुएँ नष्ट नहीं होतीं- जैसे भगवान के वस्त्र, सजावटी आभूषण, मुकुट, चुनरी, कृत्रिम फूल- उन्हें नदी या तालाब में डालना किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। आज देश भर में कई सामाजिक संस्थाएँ और स्वयंसेवी संगठन ऐसी पूजा- सामग्री को एकत्र कर उसका पुनः उपयोग या रिसाइक्लिंग कर रहे हैं। इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं; बल्कि जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने में भी मदद मिलती है। यह एक व्यावहारिक और सकारात्मक समाधान है, जिसमें आस्था भी सुरक्षित रहती है और पर्यावरण भी। कुछ मंदिरों में अलग- अलग डब्बे रखकर भक्तों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है, पर यह कार्य अभी इतने प्रारंभिक स्तर पर है कि इस छोटे से प्रयास मात्र से नदी तालाब को प्रदूषित होने से बचाया नहीं जा सकता। 

अतः यह विषय केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार, समाज और आम नागरिक-  सभी को इसमें अपनी - अपनी भूमिका निभानी होगी। पूजा स्थलों के पास संग्रह केंद्र, स्पष्ट दिशानिर्देश और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए और उनके पालन में भी सख्ती बरतनी चाहिए। कुछ वैसे ही सख्त नियम कि एक दिन हमारा देश भी न्यूजीलैंड की तरह उदाहरण के रूप में रेखांकित किया जा सके। ज्ञात हो कि न्यूजीलैंड में पर्यावरण को लेकर नियम और कानून इतने सख्त हैं कि वहाँ कोई व्यक्ति पानी को प्रदूषित करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। 

सोशल मीडिया जागरूकता का अच्छा माध्यम हो सकता है; लेकिन वास्तविक बदलाव तब आएगा जब हम अपने घरों में, अपने बच्चों को छोटी उम्र से यह सीख देंगे कि पूजा का अर्थ प्रकृति को कष्ट देना नहीं; बल्कि उसका सम्मान करना है। जिस दिन यह समझ आम हो जाएगी, उस दिन नदियाँ भी स्वच्छ होंगी और हमारी आस्था भी। इसके लिए हमें आज अपने पूजा-पाठ के तरीकों में थोड़ा-सा बदलाव लाने की आवश्यकता है। भगवान को फूलों से ढकने की बजाय उनके चरणों में एक फूल चढ़ाकर भी हम अपनी आस्था व्यक्त कर सकते हैं। हवन- पूजन के बाद जली हुई राख को आपने बगीचे या गमलों में डालकर मिट्टी को और अधिक उपजाऊ बना सकते हैं। यदि प्रतिवर्ष आप अपने भगवान के वस्त्र और आभूषण बदलते हैं, तो उन्हें नदी या तालाब में विसर्जित मत कीजिए, इन सबको इकट्ठा कीजिए और उनके लिए रोजगार का माध्यम बनिए, जो इन वस्तुओं का उपयोग करके आपके लिए खूबसूरत सजावटी सामान तैयार करते हैं। 

यदि हमने अपनी आस्था में इन छोटी- छोटी कुछ बातों को जीवन में ढाल लिया, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, जीवित नदियाँ और सच्ची आस्था- तीनों सौंप सकते हैं। तो आइए, हम यह संकल्प लें कि भक्ति निभाते समय प्रकृति की रक्षा करेंगे, क्योंकि नदियाँ तभी माँ की तरह हमें स्नेह करेंगी, जब हम उन्हें साफ- सुथरा रखते हुए,  कल – कल कर बहते हुए रहने देंगे।■

Mar 1, 2026

अनकहीः विरोध प्रदर्शन की यह कैसी परंपरा?

डॉ. रत्ना वर्मा
जब हम किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर होने वाली घटना की बात करते हैं, तो बात केवल एक कार्यक्रम या कुछ लोगों की हरकत तक सीमित नहीं रहती। वह सीधे-सीधे देश की छवि से जुड़ जाती है। हाल में एआई समिट के दौरान जो फूहड़ प्रदर्शन हुआ, उसे देखकर एक सामान्य नागरिक के मन में यही सवाल उठता है- क्या विरोध जताने का यही तरीका बचा है? क्या कपड़े उतारकर या मंच की मर्यादा तोड़कर अपनी बात रखना हमारी परंपरा है?
हम सब जानते हैं कि भारत में विरोध दशाने की परंपरा कोई नई परंपरा नहीं है। यहाँ आंदोलन हुए, धरने हुए, जेल यात्राएँ हुईं। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में विरोध की सबसे सशक्त धारा सत्याग्रह रही, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। उनका विरोध तीखा था, पर शालीन और संयमित उद्देश्य स्पष्ट था।  यही परंपरा लोकतंत्र की आत्मा है- विचारों का टकराव, पर आचरण में मर्यादा। जो आज के लोगों में तो है ही नहीं।

 पर उनमें भी एक सीमा होती थी। लोग अपनी बात पर अडिग रहते थे; पर व्यवहार में एक शालीनता, एक मर्यादा दिखाई देती थीं। आज अगर किसी को सरकार की नीति से शिकायत है, किसी निर्णय पर गुस्सा है, तो विरोध जताना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है; पर सवाल यह है कि क्या उस विरोध को इस तरह कपड़े उतारकर दिखाना जरूरी है कि पूरी दुनिया उसे देखे और भारत के बारे में गलत धारणा बनाए?

एआई समिट कोई सामान्य राजनीतिक सभा नहीं थी। वहाँ दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और निवेशक मौजूद थे। ऐसे मंच पर अगर कोई समूह अचानक अशोभनीय तरीके से प्रदर्शन करे, तो चर्चा मुद्दे से हटकर उसी घटना पर आ जाती है। तकनीक, विकास और सहयोग की बात पीछे छूट जाती है और सुर्खियाँ बनती हैं- “भारत में ऐसा हुआ।” यह चिंता की बात है।

कुछ अख़बारों ने लिखा कि यह सीमित लोगों का प्रदर्शन था, इसे बढ़ा-चढ़ाकर राष्ट्रीय संकट की तरह पेश नहीं करना चाहिए। उनकी बात में भी एक तर्क है। किसी देश की छवि इतनी कमजोर नहीं होती कि कुछ लोगों के व्यवहार से हमेशा के लिए खराब हो जाए। दूसरी ओर कई अख़बारों और चैनलों ने इसे शर्मनाक बताया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए था। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। घटना छोटी हो सकती है, पर मंच बड़ा था; इसलिए असर भी बड़ा लगा।

अब सवाल उठता है- क्या केवल गिरफ्तारी, धरपकड़ और सजा देने से बात खत्म हो जाएगी? कानून अपना काम करेगा, करना भी चाहिए। अगर किसी ने नियम तोड़े हैं तो कार्रवाई होना स्वाभाविक है। पर क्या इससे सोच बदल जाएगी? अगर राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझाएँगे कि देश की छवि सबसे ऊपर है, तो ऐसी घटनाएँ फिर हो सकती हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि देश की संस्कृति महान है; पर संस्कृति केवल त्योहार मनाने से नहीं दिखती, वह सार्वजनिक व्यवहार में भी दिखती है। जब हम वैश्विक मंच पर होते हैं, तो हम किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, पूरे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। ऐसे में थोड़ा संयम, थोड़ा धैर्य, थोड़ा सोच-विचार बहुत मायने रखता है।

यह भी सही है कि लोकतंत्र में विरोध को देश विरोधी कह देना भी ठीक नहीं। हर असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है; पर उसी तरह यह भी सही है कि विरोध के नाम पर ऐसा व्यवहार, जो देश को असहज स्थिति में डाल दे, वह भी ठीक नहीं कहा जा सकता। दोनों पक्षों को संतुलन सीखना होगा।

मीडिया की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। अगर हर घटना को सनसनी बनाकर दिखाया जाएगा, तो वह और फैलती है। कभी-कभी संयमित रिपोर्टिंग भी देशहित में होती है। वहीं राजनीतिक बयानबाजी से आग और भड़कती है। एक घटना को लेकर दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं और असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

हम आम नागरिक के तौर पर क्या चाहते हैं? बस इतना कि अगर आपकी किसी बात पर असहमति है, तो उसे दर्शाने का तरीका मर्यादित हो; ताकि दोनों पक्षों की गरिमा भी बनी रहे। देश की छवि किसी दल की जीत या हार से बड़ी है। दुनिया हमें हमारी उपलब्धियों से पहचाने, न कि हमारे विवादों से।

शायद हमें फिर से अपने आप से पूछना चाहिए- क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें ध्यान खींचने के लिए किसी भी हद तक जाया जाए? या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं, जिसमें विचारों की टकराहट हो; पर आचरण में शालीनता हो? अगर हम दूसरी राह चुनें, तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा और देश की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।
आखिरकार देश हम सबका है। सरकारें आती-जाती हैं, पार्टियाँ बदलती रहती हैं, नेता बदलते रहते हैं; पर देश की छवि और सम्मान महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए जब भी हम किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़े हों—चाहे सरकार की तरफ से हों या विरोध में- यह याद रखना चाहिए कि हम सबसे पहले भारतीय हैं। बाकी सब उसके बाद।

एक और बात, यदि भारत से बाहर के कुछ देशों में टकराव हो, तो उसकी प्रतिक्रिया में देश की सम्पत्ति में आग लगा देना सरासर देशद्रोह है। इस तरह के  नकारात्मक आन्दोलनजीवियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए।

Feb 1, 2026

अनकहीः आज के दौर में एक शादी ऐसी भी ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

महाराष्ट्र के लातूर ज़िले में हाल ही में संपन्न हुई एक शादी ने समाज को ठहरकर सोचने का अवसर दिया है। यह अवसर किसी भव्य आयोजन या असाधारण खर्च के कारण नहीं, बल्कि सादगी और सामाजिक चेतना के कारण सामने आया है ।

परभणी निवासी इंजीनियर शेखर माधव शेजुल और ऋतुजा शिंदे ने अपने विवाह को सादगी और अर्थपूर्ण मूल्यों के साथ सम्पन्न कर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया। केवल 25 करीबी परिजनों की उपस्थिति में, बिना किसी तामझाम के, उनका यह विवाह एक मंदिर में सम्पन्न हुआ।

दरअसल इस विवाह की चर्चा हम सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे कि यह सादगी से सम्पन्न हुआ है, बल्कि इसलिए कर रहे हैं; क्योंकि इस शादी में खर्च होने वाले दस लाख रुपये उन्होंने अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय में आधुनिक कंप्यूटर कक्ष की स्थापना के लिए दे दिए, ताकि ग्रामीण बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जा सके। 

एक सार्थक और सराहनीय कदम इन्होंने उठाया है, तो उल्लेखनीय तो है ही, क्योंकि देखा तो यही जाता है कि इन दिनों वे शादियाँ ही मीडिया में अधिक चर्चा का विषय बनती हैं, जो भव्य और खर्चीली होती हैं, जबकि यहाँ तो शादी में खर्च होने वाली राशि को भी उन्होंने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उपयोगी बना दिया। 

इन दिनों देखा यही जा रहा है कि आज के समय में शादियाँ धीरे-धीरे संस्कार से अधिक प्रदर्शन का रूप लेती जा रही हैं और वे पवित्र संस्कार जैसे- हल्दी, मेहंदी, सप्तपदी जो सब घरेलू आँगनों में लोकगीतों और ढोलक- मंजीरे के साथ पारिवारिक सहभागिता के साथ संपन्न होती थीं, वे अब इवेंट मैनेजमेंट के माध्यम से भव्य रिसॉर्ट्स और डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में आयोजित की जाती हैं तथा बाज़ार और दिखावे का माध्यम बनकर महँगे और भव्य आयोजनों में बदल गई हैं। 

इस बदलाव को बढ़ावा देने में उन शादियों की भी बड़ी भूमिका है, जहाँ पैसे का मोल गौण हो जाता है - चाहे वह उद्योग जगत के बड़े नाम हों या फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध। जब इस प्रकार होने वाली करोड़ों की शादियाँ सार्वजनिक रूप से भव्यता के साथ प्रस्तुत की जाती हैं, तो समाज के एक वर्ग भी उसी होड़ में शामिल हो जाता है। परिणाम यह होता है कि अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके वे भी अपनी शादियों को दिखावे की शादी में बदल देते हैं। यहाँ तक कि अब तो देखा- देखी पैसे के बल पर फ़िल्मी सितारों  और नामी- गिरामी गायकों और कलाकारों को शादी में आमंत्रित करने लगे हैं। 

शादियों के इस भव्य माहैल में शेखर माधव और ऋतुजा शिंदे की यह शादी कोई आंदोलन नहीं है; लेकिन सादगी से की गई उनकी शादी और उस पैसे का शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका सहयोग यह अवश्य बताती है कि खुशी पैसे खर्च करने से नहीं, सोच से बनती है। और जब सोच बदलती है, तो एक शादी केवल रस्म नहीं रहती - वह समाज के लिए दिशा संकेत भी बन जाती है।

 बस दुख तब होता है जब ऐसे नेक उदाहरण से बहुत कम लोग सीख लेते हैं। ऐसे नेक कदम की सराहना तो हर कोई करता है; पर अमल करना नहीं चाहते। यह सवाल अक्सर अभिभावकों के सामने रखा भी जाता है कि इतनी फिज़ूलखर्ची क्यों - तो वे यह कहते हुए सामने वाले का मुँह बंद कर देते हैं कि मेरा इकलौता बेटा या बेटी है और शादी कौन रोज- रोज होती है, एक बार खुशियाँ मना लेने दो। या फिर यह भी कि बच्चे चाहते हैं कि उनकी शादी यादगार बने या सब उनकी भव्य शादी को याद रखें। आज के डिजीटल युग में युवाओं की सोच भी बदलती दिखाई देती है – वे अपनी काबिलियत पर धन अर्जित कर रहे हैं तो उन्हें खर्च भी उसी अंदाज में करने की इच्छा रखते हैं। 

समाज में अक्सर ऐसी फ़िज़ूलखर्च के विरुद्ध बातें तो होती हैं, कई सामाजिक आयोजनों में प्री- वेडिंग जैसे समारोह पर रोक लगाने की बात भी हुई है; पर एक दो उदाहरण को छोड़ व्यवहार में बदलाव कम ही दिखाई पड़ता है। कारण यही है कि आज दिखावे को सामाजिक सम्मान से जोड़ कर देखा जाने लगा है।  

आज ज़रूरत इस बात की है कि माधव शेजुल और ऋतुजा ने जिस सादगी और सामाजिक उत्तरदायित्व का रास्ता चुनते हुए विवाह किया है, उनके इन प्रयासों की सामाजिक मंचों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए। उन्हें केवल सराहना ही नहीं, सम्मान भी मिलना चाहिए। आज का सोशल मीडिया यदि चाहे तो दिखावे की संस्कृति को बढ़ावा देने की बजाय ऐसे सकारात्मक उदाहरणों को व्यापक रूप से समाज तक पहुँचा सकता है। सही उदाहरणों को साझा करना, उन्हें चर्चा का विषय बनाना और उनसे प्रेरणा लेना - यही डिजिटल युग की वास्तविक शक्ति और सकारात्मक परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव बन सकती है। 

तो आइए हम और आप मिलकर इस नींव को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाएँ और विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भव्यता और दिखावे की संस्कृति से दूर रखते हुए इस पवित्र रिश्ते को समाज के उत्थान से जोड़ते हुए कुछ नेक काम भी करते जाएँ। 

Jan 1, 2026

अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

पिछले दिनों एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की स्मृति में दिए गए अपने व्याख्यान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि ‘भारत की शैक्षिक और सांस्कृतिक नींव को खोखला करने के लिए मैकाले द्वारा किए गए अपराध को 2035 में 200 वर्ष पूरे हो जाएँगे, अतएव आने वाले दस सालों में गुलामी की इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने के राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है।’ उनके इस कथन को केवल राजनीतिक वक्तव्य की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि  हम देशवासियों के लिए यह चिंतन और विचार करने का समय है, कि क्या हम इस मानसिक गुलामी में ही जीते रहना चाहते हैं या कि अपनी संस्कृति अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं। 

यह तो आप सब जानते ही हैं कि मैकाले की शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना था, जो अपने ही अतीत को पिछड़ा, अपनी भाषा को हीन और अपनी संस्कृति को अवैज्ञानिक समझने लगे। हुआ भी वही, इस शिक्षा प्रणाली ने हमें रोजगार तो दिया, हम कुशल कर्मचारी तो बन गए; लेकिन सजग नागरिक नहीं बन सके। परिणामस्वरूप, हमने ज्ञान को केवल नौकरी, रोजगार और पैसा कमाने का जरिया माना; लेकिन इसके साथ ही अपने ही जीवन-मूल्यों को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि आज हम तकनीकी रूप से तो बहुत आगे निकल गए  हैं; लेकिन सामाजिक रूप से असंवेदनशील बन गए हैं। हम वैश्विक बाज़ार के लिए तो तैयार हैं; लेकिन अपने समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन हैं। यह सब उसी शिक्षा का परिणाम है, जो हमें अपने परिवेश से काट देती है।

मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने सबसे गहरा आघात हमारी भाषाओं पर किया। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और  अपनी ही मातृभाषा को बोलने में झिझक महसूस होने लगी। हम अपने बच्चों को गर्व से कहते हैं- अंग्रेज़ी बोलो; लेकिन  यह कभी नहीं कहते- अपनी भाषा को जानो। नतीजा यह हुआ कि नई पीढ़ी अपने साहित्य, लोककलाओं, दर्शन और इतिहास से कटती चली गई। भाषा के साथ ही सांस्कृतिक स्मृति भी धूमिल होती गई। इतना ही नहीं मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने धर्म को अंधविश्वास और संस्कृति को रूढ़ि के रूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप, हमने अपने पर्व, उत्सव, परंपराएँ और जीवन-पद्धति को पुराना और ग़ैर-आधुनिक मान लिया। पश्चिमी जीवनशैली की नकल को ही  प्रगति समझ लिया। 

विडंबना यह है कि जिन समाजों की नकल हम कर रहे हैं, वे तो अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में हमसे कहीं अधिक जागरूक और सजग हो गए हैं, जबकि हम अपने ही संस्कारों को बोझ समझने लगे। आप किसी भी दूसरे देश में चले जाइए, वहाँ पहले अपनी ही भाषा में बातचीत की जाती है। जब सामने वाला नहीं समझता तब या तो दुभाषिए की मदद ली जाती है या फिर यदि उन्हें अंग्रेजी आती है, तो वे टूटी फूटी अंग्रेजी से काम चलाते हैं; लेकिन उन्हें कभी इसकी वजह से हीनता का आभास नहीं होता; पर हमारे यहाँ यदि हम अंग्रेजी नहीं जानते तो हम हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक मंचों पर भी वे अपनी ही भाषा में वक्तव्य देंगे, दुभाषिया ही उनकी सहायता करते है; लेकिन हम अपनी बोली भाषा को बोलने में छोटा महसूस करते हैं मानो हमसे कोई अपराध हो गया हो।

भले ही हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो; पर आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए हैं। हमारी सोच तो अब भी उधार की ही है। हम अपने ही परखे और माने हुए  ज्ञान पर संदेह करते हैं और विदेशी मान्यताओं को सहज स्वीकार कर लेते हैं। यह  एक प्रकार की गुलामी ही तो है। यह गुलामी तब और गहरी हो जाती है, जब हम अपने बच्चों को भी वही मानसिकता सौंप देते हैं। बिना प्रश्न किए वही पाठ्यक्रम, वही मूल्य और वही दृष्टिकोण आगे बढ़ते रहता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी शिक्षा की दिशा बदलने के लिए तैयार हैं? क्या हम ज्ञान को रोजगार से आगे जीवन-दृष्टि से जोड़ना चाहते हैं? नई शिक्षा नीति इस दिशा में एक प्रयास है; लेकिन नीति से अधिक जरूरी है मानसिक परिवर्तन। जब तक शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर यह स्वीकार नहीं करेंगे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार और पैसे कमाना नहीं, चरित्र निर्माण भी है, तब तक परिवर्तन अधूरा रहेगा।

अतः हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो आधुनिक हो; लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हो। जो विज्ञान और तकनीक सिखाए; लेकिन साथ ही दर्शन, साहित्य और नैतिकता भी, जो वैश्विक दृष्टि दे; लेकिन स्थानीय चेतना को मिटाए नहीं। भारतीय ज्ञान, परंपरा, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, भक्ति आंदोलन, लोक साहित्य, ये सब केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक जीवन-दृष्टियाँ हैं। इन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाना पिछड़ापन नहीं, आत्मसम्मान है।

राजनीतिक स्वतंत्रता तो हमने प्राप्त कर ली; लेकिन बौद्धिक स्वतंत्रता अभी पानी बाकी है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली को समाप्त करने का अर्थ पाठ्यक्रम बदलना नही; बल्कि सोच बदलना है। प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह आह्वान हमें याद दिलाता है कि आने वाले दस वर्ष केवल विकास के नहीं, आत्म- निर्माण का होना चाहिए। यदि हम सचमुच मानसिक गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और ज्ञान परंपरा को हेय नहीं, गौरव का विषय बनाना होगा; क्योंकि जो समाज अपने अतीत से कट जाता है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल नहीं हो सकता।

Dec 3, 2025

अनकहीः AI के नए दौर में आज के युवा...

-डॉ. रत्ना वर्मा

आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ तकनीक, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमारे काम-काज, शिक्षा, रोजगार और सोच को तेज़ी से बदल रही है। दुनिया ही नहीं, भारत भी इस परिवर्तन के केंद्र में है। इन दिनों इसे लेकर एक बड़ी चिंता देश के सामने उपस्थित है- युवा बेरोज़गारी की।

 निजी क्षेत्रों में, विशेषकर आईटी कंपनियों में पिछले महीनों में बड़ी संख्या में युवाओं की नौकरियाँ प्रभावित हुई हैं। यह स्थिति चिंतनीय भी है और सच्चाई भी। तकनीक के तेज़ बदलाव ने कई ऐसे काम कम कर दिए, जिन्हें मशीनें तेज़ और कम कीमत में कर सकती हैं। जब बड़ी कंपनियाँ मशीनों को इंसानों की जगह लगाने लगती हैं, तो यह एक सामाजिक संकट का भी आरंभ होता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है- जो युवा अभी प्रभावित हो रहे हैं, उनका क्या होगा?

आधुनिकता और तकनीक का समर्थन करने वालों का तर्क यह होता है  कि यह सब विकास का संकेत है, आगे इससे नई नौकरियाँ आएँगी; लेकिन यह भी सच्चाई है कि आज जिन युवाओं की नौकरी छीनी जा रही है, वे इस तरह के तर्क को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।  कोई उनकी वेदना नहीं समझता, आज नौकरी से जो  बाहर हो रहे हैं-  जिनके परिवार उनकी आय पर निर्भर हैं, जिन्होंने घर के लिए, शिक्षा के लिए ऋण लेकर रखा है, जिनपर और न जाने कितनी जिम्मेदारियाँ हैं,  उनको अचानक जब नौकरी के लायक नहीं हो कहकर बाहर कर दिया जाएगा, तब सोचिए- उनपर क्या बीतेगी। यह उनके लिए हताशा, अविश्वास और आर्थिक असुरक्षा का दौर होगा, जो समाज में अपराध और नशे जैसी अनेक प्रकार की विसंगतियों को जन्म देगा।  यह स्थिति आने वाली पीढ़ी के आत्मविश्वास को भी कमजोर करेगी। निजी क्षेत्र को यह समझना होगा कि  मनुष्य की मेहनत देश की आर्थिक उन्नति में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। तकनीक की यह रफ्तार समाज की तैयारी से कहीं अधिक तेज चाल से चल रही है, जो चिंतनीय है।

 सवाल यह भी उठता है कि जब इस नई तकनीक से रोजगार की संभावनाएँ और बढ़ेंगी, तो फिर जो पहले से ही आपके पास नौकरी कर रहे हैं, उन्हें निकालने के बजाय आप उन्हें इस नई तकनीक में प्रशिक्षित क्यों नहीं करते? आखिर क्यों किसी कर्मचारी का 8–10 वर्ष का अनुभव तकनीक की एक नई लहर के सामने इतना बेकार हो जाता है? आपने उन्हें अपनी कंपनी में उनकी काबिलीयत को देख- परखकर ही नौकरी पर रखा था ना? फिर अचानक वे नाकाबिल कैसे हो जाते हैं?

मुझे याद है, जब कम्प्यूटर का आगमन  हुआ था, तब हम समाचार- पत्र में काम करने वाले लोग कलम और कागज पर ही काम करने के आदी थे;  परंतु हमें इस नई तकनीक को सीखने का समय दिया गया; बल्कि कहना चाहिए काम करते हुए ही हमें उसकी ट्रेनिंग दी गई और हमने इस नई तकनीक को सीखा। आज देखिए पूरी दक्षता से समाचार- जगत् में नई तकनीक से काम हो रहा है। शुरू में दिक्कतें आईं थीं; पर बाद में सबने स्वीकारा और सीखा। य बात अलग है कि जो लोग इस नई तकनीक को अपना नहीं पाए, वे सब पिछड़ गए। आप यह भी देख ही रहे हैं कि कम्प्यूटर ने किस तरह शिक्षा से लेकर नौकरी, व्यवसाय सब में अपनी जगह बना ली है।  यह तो तय है कि नई तकनीक को सीखना ही होगा; पर बिना सिखाए ही किसी को नौकरी से निकाल देना, उनको बेरोजगार कर देना, तो सही नहीं कहा जा सकता है।

आज सामने आए इस गंभीर रोजगार के संकट को देखते हुए ही संभवतः सरकार ने 2026–27 से कक्षा 3 से ही AI का पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा की है; ताकि आने वाली पीढ़ी शुरू से ही समय की ज़रूरतों के अनुरूप तैयार हो सके। यह भविष्य की दृष्टि से अच्छा कदम हो सकता है। यह फैसला यह भी दर्शाता है कि अब AI कोई अलग तकनीक नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन का ही हिस्सा बनने जा रही है।

यह तो सर्वविदित है कि इस नई तकनीक को आने से रोका नहीं जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे कंप्यूटर के आगमन पर हुआ था; परंतु AI के सपने दिखाने वालों को यह समझना होगा कि समाज केवल तकनीक से नहीं चलता, भावनाओं, सुरक्षा, सम्मान और स्थिरता से भी चलता है।

जब लोग देख रहे हैं  कि मशीनें उनकी जगह ले रही हैं, कंपनियाँ उन्हें आऊटडेटेड घोषित कर रही हैं और सरकार हर समस्या का समाधान नई तकनीक में ढूँढ रही है, तो असुरक्षा तो बढ़ेगी ही। विकास का रास्ता तकनीक हो सकता है; पर देश के लोग पहले आते हैं। इसलिए ध्यान रखना होगा कि  मशीनें सुविधा तो दें; लेकिन इंसानों का महत्त्व कम न हो। तकनीक विकास की गति तय करे; लेकिन समाज उसकी दिशा तय करे।

एक आधुनिक राष्ट्र अपनी दिशा केवल मशीनों के आधार पर तय नहीं करता। राष्ट्र उस रास्ते को चुनता है, जिसमें मानव सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक तरक्की साथ- साथ चलें।  यदि परिवर्तन को संवेदनशीलता से नहीं सँभाला गया तो, इसका असर सिर्फ रोजगार पर नहीं, पूरी सामाजिक व्यवस्था पर पड़ेगा।  तकनीक को अपनाना समय की ज़रूरत है, पर समाज को अनदेखा करके तरक्की करना कतई उचित नहीं है।