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Jul 1, 2026

यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक

  - डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ यात्राएँ केवल जगह देखने के लिए नहीं होतीं - वे आत्मा को छूने, मन को शांत करने और प्रकृति से गहरे जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा रही अमरकंटक की। वह भी बारिश के मौसम में- जब हर पत्ता धुला हुआ लगता है, हर शाख बरखा की बूँदों से झुकी हुई और काले बादल मानों मेघदूत की तरह किसी का संदेश लेकर जाते हुए दिखाई देते हैं।  

मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के मिलन-बिंदु पर स्थित एक सुंदर पहाड़ी क्षेत्र है में स्थित है अमरकंटक। यह छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा हुआ है और नर्मदा का उद्गम स्थल होने के कारण तीर्थराज के रूप में प्रसिद्ध है।  मैकल पर्वत की गोद में बसा यह स्थान किसी रहस्य और आध्यात्मिक शक्ति से भरा लगता है। एक ऐसी पावन भूमि जहाँ से न केवल नदियाँ बहती हैं, बल्कि आस्था, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम भी होता है। 

पूरे भारतवर्ष में ऐसे भौगोलिक क्षेत्र विरले ही देखने को मिलते हैं जहाँ एक ही स्थान से तीन नदियों का उद्गम हुआ हो। इतना ही नहीं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं- नर्मदा जी, जो पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है और अरब सागर में मिलती है; दूसरी सोन नदी, जो पूर्व की ओर बहकर गंगा से मिलती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में समा जाती है; और तीसरी जोहिला, जो दोनों के बीच से होती हुई आगे बढ़ती है और सोनभद्र में समा जाती है। है न यह सब अद्भुत और रहस्यमय? यही कारण है कि अमरकंटक को भारत के आध्यात्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान मिला है।

पेंड्रा से अमरकंटक : हरियाली  और बादलों के संग 

तो ऐसे विशेष स्थान की ओर रायपुर से पेंड्रा तक रेल से हमारा सफर तो सहज रहा; लेकिन असली सौंदर्य तो वहाँ से अमरकंटक की ओर सड़क मार्ग से जाते समय दिखाई दिया। सच ही है बारिश की रिमझिम बूँदों के संग यात्रा का रोमांच ही कुछ और होता है।  पिछले वर्ष पहली जुलाई की  सुबह जब रेल से मैं और मेरी चित्रकार दोस्त सुनीता पेंड्रा स्टेशन पर उतरे तब रिमझिम बारिश हो रही थी। बारिश की हल्की फुहारों के साथ चारों ओर फैले साल के हरे- भरे घने जंगल और खूबसूरत घाटियों को निहारते हुए एक घंटा कैसे बीता पता ही नहीं चला।  

अमरकंटक की वादियों में पहुँचते ही आभास हुआ मानों प्रकृति हमारे स्वागत में कोई गीत गुनगुना रही हो । मिट्टी में एक खास प्रकार की भीनी खुशबू , जो पहाड़ और जंगल में  सिर्फ बारिश में ही उठती है। ठंडी हवाएँ और आसमान में उमड़ते- घुमड़ते बादल... सब कुछ सुखद अहसास से भरा हुआ था। 

रास्ते में हम बाते करते हुए जा रहे थे कि अमरकंटक कैसे मध्यप्रदेश के हिस्से में चला गया और छत्तीसगढ़ को नहीं मिल पाया। दरअसल जब साल 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना, तब अमरकंटक को लेकर दोनों राज्यों में तनातनी की  स्थिति बनी रही। बटवारे के बाद नर्मदा मैया का उद्गम स्थल और मुख्य मंदिर परिसर तो मध्यप्रदेश में था; लेकिन पहाड़ों और जंगलों का एक बड़ा हिस्सा नए राज्य छत्तीसगढ़ में आ गया। धार्मिक महत्त्व और पर्यटन की वजह से दोनों ही राज्य इसे अपने क्षेत्र में शामिल करना चाहते थे। इससे यह उपेक्षित हो गया।  बढ़ता पर्यटन, अव्यवस्थित निर्माण और कचरे ने नर्मदा के उद्गम की पवित्रता पर असर डालना शुरू कर दिया। तब 2016 में दोनों राज्यों ने मिलकर इसे विशेष क्षेत्र घोषित कर एक संयुक्त प्राधिकरण बनाया। मकसद था- नर्मदा के उद्गम और आसपास के जलस्रोतों का संरक्षण करना पर्यटन को बढ़ावा देना साथ ही जंगल और पहाड़ को बचाए रखना।

.... हमारी बातों का सिलसिला चल ही रहा कि हम जंगल और पहाड़ियों के बीच बने एक शांत गेस्ट हाउस; जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था थी,  में कब पहुँच गए पता ही नहीं चला।  काले बादलों से ढँके आसमान के नीचे गेस्ट हाउस की गैलरी में बैठकर गरमागरम चाय की चुस्कियों ने रेल यात्रा की थकान को सुकून में बदल दिया। शाम हो गई थी अंतः कहीं और जाने का विचार नहीं था परंतु चाय पीने के बाद हमें बताया गया कि इस समय नर्मदा कुंड में शाम की आरती चल रही होगी । बस फिर क्या था हम तुरंत ही तैयार हुए और निकल पड़े नर्मदा मैया के उद्गम स्थल की ओर, भला ऐसा शुभ अवसर कौन छोड़ता है। 

चूँकि इस बार अमरकंटक कई बरस के बाद आना हुआ था तो  मुख्य सड़क के चारो ओर का नजारा बहुत कुछ बदला- बदला सा था। बारिश का मौसम होने के कारण पर्यटक तो इस समय बहुत कम थे।  हमने देखा जगह-  जगह अनेक नए भवन, आश्रम और कुछ मंदिरों का निर्माण हो चुका था। ठहरने के लिए धर्मशाला, होटल, आदि में भी बहुत बढ़ोतरी दिखाई दे रही थी। 

 रास्ते में नर्मदा नदी के जन्म को लेकर प्रचलित जनश्रुतियों पर भी बात होने लगी।   लोककथाओं  पौराणिक कथाओं में भी उनके जन्म और विवाह न होने को लेकर कुछ कथाएँ प्रचलित हैं जैसे-  भगवान शिव ने अपने अश्रुओं से नर्मदा को जन्म दिया था, यह भी कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण के समय अपने आशीर्वाद से नर्मदा को अवतरित किया। तभी तो नर्मदा मैया को “स्वयंभू नदी” माना जाता है। इसीलिए मान्यता है कि नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। इस तरह की अनेक कथाएँ सुनते- सुनाते हम कुछ ही किलोमीटर की दूरी तय कर नर्मदा कुंड पहुँच  गए। 

एक समय था कि जब नर्मदा कुंड और उसके आस- पास के मंदिरों का यह समूह दूर से ही नजर आता था पर अब गलियारे, रेलिंग और चबूतरे सब तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बन गए हैं। जूते उतारकर जब हम टाइलों वाले गलियारे से गुजरे तो भीगे फर्श पर फिसलने का डर था, पर मन में उमंग थी अतः मंदिर के समीप पहुँचे तो मंत्रोच्चारण के साथ आरती शुरू हो चुकी थी, अनेक भक्त जन वहाँ इकट्ठा थे। हम भी सबके बीच ध्यान मग्न होकर आरती में शामिल हो गए ....

अँधेरा घिर आया था और बारिश की बूँदे अब कुछ तेज हो गई थीं। उद्गम स्थल पर बना कुंड बहुत ही शांत, आध्यात्मिक और पवित्र अनुभूति से भरा हुआ था। आरती के बाद कुंड के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लगा जैसे जीवन की परिक्रमा नर्मदा मैया के सान्निध्य में पूरी हो रही हो। मंदिर परिसर में थोड़ी देर और ठहर, परिसर के चारो ओर घूमते हुए हम वापस गेस्ट हाऊस लौट आए। 

स्वाद और सुकून की रात

रात के भोजन में गरमागरम फुलके, नारियल की खुशबू से भरी बरबटी की सूखी सब्जी, आलू- गोभी की रसे वाली सब्जी, दाल-चावल और खीर - हर चीज़ स्वाद में लाजवाब। इस स्वादिष्ट भोजन ने दिन भर की भूख और थकान सब कुछ मिटा दिया। पेट तो भर गया, पर मन नहीं। खाने के बाद परिसर में आधे घंटे की चहलकदमी जरूरी हो गई थी, साथ में अमरकंटक के तब और अब में आए बदलाव पर गप-शप भी होती रही ताकि नींद आने में प्रकृति भी साथ दे।

दूसरा दिन : अमरकंटक की वादियों में भ्रमण

रात सुकून भरी नींद आई। चिड़ायों की चहचआहट और पत्तों  और शाखों पर गिरते बारिश की संगीतमय बूँदों की आवाज के साथ नींद खुली। जैसे ही कमरे के पीछे का दरवाजा खुला तो लगा मानों जंगल और पहाड़ के ऊपर उमड़ते – घुमड़ते बादल हमें सुबह की सैर के लिए आमंत्रित कर रहे हों। भला बादलों का आमंत्रण हम कैसे ठुकराते। 

और सच कहूँ... बारिश से भीगी हुई सुबह की यह सैर इस यात्रा में अनमोल रही। बादलों ने ठहर कर जैसे हमें अमरकंटक की शुद्ध और ताजी हवा में सांस लेने का मौका दे दिया। बारिश से धुली सड़क पर चलते हुए जंगल और पहाड़ से उठती सोंधी खूशबू, चारो ओर हरियाली की बिछी चादर, बारिश से भीगे पत्तों से गिरती बूँदें और पक्षियों का मधुर कलरव- सब मिलकर जैसे किसी अनकही कविता की रचना कर रहे थे।

कपिल धारा के रास्ते में चलते हुए आधे घंटे से अधिक समय तक सैर के बाद हम अपने ठिकाने पर लौट आए । आज का मौसम जैसे हमारे लिए ही खुला था, रात भर बरस कर बादल मानों सुस्ता रहे हों। बस फिर क्या था हम तैयार होकर नाश्ते के लिए जैसे ही डाईनिंग टेबल पर पहुँचे, उम्मीद से बिल्कुल विपरीत अमरकंटक की सादगी में इडली, डोसा, सांभर और नारियल की चटनी का दक्षिण भारतीय नाश्ता हमारा इंतजार कर रहा था। सब कुछ इतना स्वादिष्ट कि खाते हुए लगा कहीं हम केरल तो नहीं  पहुँच गए? दरअसल वहाँ का रसोइया दक्षिण भारतीय जो था। 

फिर शुरू हुई हमारी अमरकंटक के कुछ प्रमुख स्थलों की यात्रा: सबसे पहले पँहुचे माई की बगिया में- 

बरसों पहले माई की बगिया का जब भ्रमण किया था तो यहाँ जलधाराओं के कुंड प्राकृतिक रूप में थे, पर अब कुंड के चारो ओर क्रांकीट के मंदिर का निर्माण कर दिया गया है। किसी समय यहाँ साधु संत कुटिया में धुनी रमाए बैठे हुए नजर आते थे। पर अब नजारा कुछ अलग ही है।  फिर भी हरियाली से भरी इस बगिया में चलते हुए एक अलौकिक ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा अपनी सहेली गुलबकावली के साथ यहाँ खेलने आया करती थीं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नर्मदा नदी का वास्तविक उद्गम स्थल माई की बगिया ही है, और यहाँ से निकलने वाली जलधारा आगे जाकर नर्मदा मंदिर में मिलती है। एक अन्य कथा के अनुसार, नर्मदा का विवाह सोनभद्र से तय हुआ था और माई की बगिया में उनका विवाह मंडप भी सजाया गया था; लेकिन नर्मदा की जगह उसकी सहेली जोहिला दुल्हन बनकर बैठ गई। यह देखकर  नर्मदा रूठ गई और उल्टी दिशा में बहना शुरू कर दिया। किंवदंतियाँ तो कई प्रचलित है पर सच्चाई यही है कि यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो जाना ही जाता है, साथ ही कई औषधीय पौधों, विशेष रूप से गुलबकावली के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसका उपयोग आँखों के रोगों के लिए आयुर्वेदिक दवाई बनाने में किया जाता है। 

माई की बगिया से लौटकर हमारे कदम नर्मदा कुंड के पास फैले प्राचीन मंदिरों के समूह की ओर बढ़ चले। यह वे मंदिर हैं, जो अमरकंटक की पहचान हैं और 11वीं शताब्दी के कलचुरी वंश के सुनहरे इतिहास की गवाही देते हैं। राजा कर्णदेव ने इनका निर्माण कराया था। इस परिसर में छह मंदिर और सूरज कुंड नामक एक कुंड भी है। कर्ण मंदिर, केशव नारायण मंदिर, मछेंद्रनाथ मंदिर और पातालेश्वर मंदिर त्रिपुरियों के कलचुरियों द्वारा निर्मित किए गए थे, जबकि पंच मठ और जोहिला मंदिर बाद के काल के हैं। इनकी स्थापत्य शैली में कलचुरी कला का अद्भुत संतुलन दिखता है- बारीक नक्काशी और पत्थरों पर उकेरे गए प्रतीक आज भी जीवंत प्रतीत होते हैं।

इन मंदिरों का संरक्षण भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है। अब विभाग द्वारा परिसर को सँवारकर सुंदर बगीचे, पक्के रास्ते और गलियारे बना दिए गए हैं। पर्यटकों के लिए टिकट प्रणाली भी लागू है, ताकि धरोहर की देखभाल हो सके। ऐसा होने से प्रत्येक मंदिर में जाना और उन्हें करीब से देखना आसान हो गया है। मंदिरों के बीच विचरण करते हुए यही महसूस हुआ जैसे इतिहास फुसफुसा रहा हो- पत्थरों में गूँथा हुआ विश्वास, और आकाश को छूती हुई आस्था।

मंदिरों की सीढ़ियों और कुंड के पास कुछ चित्र खींचकर अगली यात्रा यानी कपिलधारा की ओर जलप्रपात  देखने के लिए निकल पड़े। लगभग 100 फीट ऊँचाई से गिरता यह जलप्रपात नर्मदा का पहला पड़ाव है। मन मोह लेने वाला दृश्य था। कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ कपिल मुनि ने तप किया और सांख्य दर्शन की रचना की। बारिश के कारण नीचे बहते प्रपात तक जाना तो जोखिम भरा था, पर कुछ साहसी तब भी नीचे उतर चुके थे। प्रकृति की गोद में बसे  इस आलौकिक स्थान की पहाड़ियों के आस- पास सदियों पुरानी कई गुफाएँ हैं जहाँ बैरागी कभी तप किया करते थे। तभी तो यहाँ से जलप्रपात को देखते हुए ध्यान करने जैसा अनुभव होता है और आस- पास पहाड़ों और जंगल में  फैली दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ से हवा शुद्ध और ताजगी से भरी हुई।

जब हम यहाँ पहुँचे तो पर्यटकों की थोड़ी भीड़ थी,  वे सब प्रशासन द्वारा बनाए नए व्यू प्वाइंट से झरने के साथ चित्र खिंचवाने में लगे हुए थे। जब भीड़ कुछ छंट गई तो हम भी उसी स्थान से कपिल धारा को देखने पहुँच गए। हमने भी कुछ चित्र लिए । चारों ओर पहाड़ और जंगल से घिरे इस मनोरम स्थान में कुछ समय व्यतीत कर बढ़ चले अगले पड़ाव की ओर.....

हमारा अगला पड़ाव था ज्वालेश्वर मंदिर यहाँ भगवन शिव का विशाल शिवलिंग स्थापित है।  पुराणों में इस स्थान को महारुद्र मेरु भी कहा गया है।  यह भी माना जाता है कि भगवान शिव पार्वती से साथ इस रमणीय स्‍थान पर निवास करते थे। ऐसा भी माना जाता है गंगोत्री का जल रामेश्वर में चढ़ाने में जितना पुण्य फल मिलता है उतना ही फल नर्मदा का जल ज्वालेश्वर महादेव में चढ़ाने से मिलता है।  इस विशाल शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए सीढ़ियों से ऊपर चढ़ना पड़ता है हमने भी ऊपर जाकर जल चढ़ाया और प्रणाम कर नीचे आ गए। 

तीसरे दिन सुबह भी बेहद खुशनुमा थी।  सुबह की सैर के लिए हमने आज दूसरा रास्ता चुना, थोड़ी चढ़ाई वाला।  लौटते हुए सुनीता ने वहाँ के जंगलों से कुछ जंगली फूल के पौधे चुन लिये। जिनमें गुलाब के कलम भी शामिल हैं। चूँकि कटीले गुलाब की डालियों को तोड़ पाना मुश्किल हो रहा था तो पास ही गाँव के एक घर में कलम काटने के लिए औजार माँगने के इरादे से आवाज लगाई। दुबली पतली सुंदर सी महिला ने बाहर आकर सवालिया निगाहों से हमें देखा तो झट हमने अपने आने का मकसद बता दिया । उस महिला ने तुरंत अपने पति को हमारी मदद के लिए भेज दिया । उस नौजवान ने अपनी कुल्हाड़ी से ढेर सारे गुलाब के कलम काटकर हमें दे दिए। सुनीता इस गुलाब के कलम को अपने नए स्टूडियो में लगाना चाहती है। पौधे लेकर हम लौट आए; क्योंकि तैयार होकर हमें  फिर कुछ और प्राकृतिक स्थानों  की ओर जाना था। 

लेकिन हमारी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। जैसे बादल हमसे कह रहे हों कि आज तो मुझे यहीं बैठकर आराम से निहारना होगा। और हुआ भी वही बारिश तेज हो गई और लगातार दिन भर होती रही। गरमा- गरम चाय का आनंद लेते हुए हम कमरे के पीछे गलियारे में बैठ बारिश का भरपूर आनंद लेते रहे। नाश्ता किया, भोजन लिया और दिन भर जंगल और पहाड़ों को बारिश में भीगते देखते रहे। 

आखिर इसी मौसम का आनंद लेने तो हमने अमरकंटक को चुना था । प्रकृति ने भी जैसे हमारा मन भाप लिया था। भला ऐसे मनोहारी दृश्य को देखकर सुनीता का चित्रकार मन कैसे न मचलता उसने तुरंत अपनी ड्राइंग कॉपी और पेन निकाली और रम गई,  लगा जैसे उसने प्रकृति को कागज पर उतार लिया हो ...और मैं इस अलौकिक अनुभव को शब्दों में ढालने के बारे में सोचती रही। 

धरमपानी और प्रकृति की गोद में विश्राम

दोपहर का भोजन लेकर हमने थोड़ी देर आराम किया और जब बारिश कुछ थमी, तो हम फिर निकल पड़े छतरी लेकर यह कहते हुए कि अब तो चाहे जितना बरसो चाहे हमें भी भिगो दो । थोड़ी देर वहाँ का स्थानीय बाजार घूमते रहे और जब बारिश पूरी तरह थम गई तो बताया गया कि आज तेज बारिश के कारण सोन मुड़ा, दूधधारा और कबीर चौरा आदि जाना मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि दूरी कुछ ज्यादा है और वहाँ से अँधेरा होने से पहले लौट भी नहीं सकते; लेकिन पास ही धरमपानी जा कर आराम से  वापस आया जा सकता था। 

धरमपानी, छत्तीसगढ़ की सीमा में स्थित एक रमणीय स्थान है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और पहाड़ों की अलोकिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह वास्तव में एक गर्म पानी का झरना है जिसे धुनी पानी भी कहा जाता है।  यह झरना औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है और माना जाता है कि इसमें स्नान करने से कई रोग ठीक हो जाते हैं।   

धरमपानी पहुँच कर तो आनंद ही आ गया। प्रकृति का बेहद खूबसूरत नजारा । हमने एक चट्टान पर बैठकर प्रकृति का शांत संगीत सुनते हुए पूरी शाम बिता दी।  दूर पहाड़ों पर बादलों की लुकाछिपी, हवाओं से झनकर आती आवाज, मानों कोई मघुर गीत गुनगुना रहा हो... रोज शाम आती थी, मगर ऐसी न थी, रोज रोज घटा छाती थी मगर ऐसी न थी.... यहाँ आकर बैठना जीवन की व्यस्तता से दूर, एक तरह का ध्यान का अनुभव करना था। सच है प्रकृति के साथ कुछ समय हर व्यक्ति को बिताना ही चाहिए। मन तो नहीं था पर अँधेरा घिरने वाला था अतः वहाँ से भी  लौटना ही पड़ा।  

प्रकृति, आत्मा और आस्था के मिलन की इस भूमि में तीन दिन तक समय बिताने के बाद ऐसा महसूस हुआ मानो सौन्दर्य से आच्छादित यह पवित्र तपोभूमि किसी ऋषि की कथा सुना रहा हो। प्रकृति जब अपने पूर्ण सौंदर्य में होती है, तब मनुष्य के सारे प्रश्न, सारी थकान और सारी बेचैनी जैसे खुद-ब-खुद शांत हो जाती हैं। अमरकंटक की बारिश में भीगी यह यात्रा एक तीर्थ से कहीं अधिक एक आध्यात्मिक अनुभव थी- एक ऐसा अनुभव जिसे न कैमरे में कैद किया जा सकता न शब्दों में समेटा जा सकता, पर आत्मा में हमेशा के लिए अवश्य दर्ज हो जाता है। कैमरे ने तस्वीरें तो कई ली; लेकिन सही माने में मन ने जो चित्र बनाए, वे कहीं गहरे तक अंकित हो गए हैं। बारिश में भीगते जंगल, प्राचीन मंदिरों की शांति और नर्मदा की पवित्रता ने हमें भीतर तक स्पर्श किया। सच है, नर्मदा केवल एक नदी नहीं, एक भाव है- जिसमें बहते ही मन पावन हो जाता है।

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