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Nov 6, 2023

खान- पानः भारी आहार तो बढ़े विकार

 – साधना मदान

बाजार और मॉल की रौनक, रामलीला की रमणीकता, मेले की चमक-दमक, बाज़ार और सड़कों पर आज एक ही लहर का बहाव है और वह है चटखारे और स्वाद की। विद्यालय काल की कक्षा में कभी एक विषय पर भाषण हुआ था- ‘भोजन जीवन के लिए नाकि जीवन भोजन के लिए’। तब तो बस अध्यापिका के बताए तथ्यों पर बेवाक बोलने का अभ्यास ही किया था, पर आज यह विषय स्वास्थ्य और सदाबहार जीवन के लिए विचारणीय है। मैंने बड़े बुजुर्गों को अक्सर यही पूछते देखा है कि खाना खाया या नहीं खाया, नहीं खाया, तो पहले भोजन कर लो। उनके नज़दीक छोटे बच्चे जाएँ, तब भी भई इनको कुछ खिलाओगी भी या नहीं। इतना ही नहीं यह कहते भी सुना जाता है कि अब शादियों के भी क्या मज़े रह गए हैं, न कुछ खा सकते हैं और न ही कुछ पचा सकते हैं। इधर युवा जिह्वा का हाल भी कुछ अच्छा नहीं।‌ देश विदेश के खाने में इंडियन चटोरापन मिला कर एक अलग ही दुनिया का मज़ा लेते हैं। फु़डीज़ की विडियोज़ की तो बात मत पूछें। यह भारी भोगी खाना और न जाने कितने तरह के स्वाद, तरीके और जीभ की ललचाती लार ने जैसे सुखद स्वास्थ्य को चिंदी- चिंदी करके अस्पताल की चौखट पर पटक दिया है।

खाने की आदतें, खाने की वैरायटी, समय बेसमय कुछ भी गटक जाना या देर रात तक की महफ़िलों में खाना और पीना पतित दुनिया से ज़्यादा दूरी पर नहीं है। अंदाज़ अपने हैं, महफ़िल मौज मस्ती है पर बेअंत व्यंजनों का बिखराव, न जाने अब क्यूँ पीड़ादायक लगने लगा है।

खाने के तौर तरीकों से जुड़ते ही मेरी जिह्वा और पाचनशक्ति का विवाद बढ़ने लगा।

जिह्वा…. बत्तीस दाँतों के बीच रहकर अपनी मनमानी करने का हक है मुझे।

पाचनशक्ति…. मनमानी करने का अंजाम कितनी बार देखोगी। खट्टी-मीठी, मिर्च मसाले और तली चीजें तो तुम्हारी दिलकश सहेलियाँ हैं । उन्हें रिझाते रिझाते खट्टे पानी के दरिया में तुम मुझे जबरन जब तक न धकेल दो तो चैन नहीं।

जिह्वा…खिलखिलाती हुई लहरों की तरह अपने मटकते लहज़े में बतियाने लगी।अब छोड़ो भी ये सब ….जब स्वयं आदमी के हाथ ही चाशनी में डूबते-उतरते हैं। जब वे मुट्ठी भर खाने को मेरे तक न लाकर ठसाठस प्लेट भर लाता हैतो भला मेरी क्या मजाल जो ओठों के द्वार से एंट्री न दूँ।

पाचनशक्ति…हम्म..तो इसका मतलब व्यक्ति की आसक्ति और अज्ञानता ही मेरे पाचन-तंत्र को आहत कर रही है।

जी हाँ…  विस्तार की नहीं, सार की आवश्यकता है। आज खाने की ललक, स्वाद की सुरा और रेहड़ी-पटरी से लेकर रेस्तरां तक लपलपाती जीभ ने ही इस अमूल्य शरीर को डॉक्टर और अस्पताल की दलदल में धकेल दिया है। जैसा अन्न वैसा मन… लगता है यह गलत है। होना चाहिए जैसा लोभ, जैसी आसक्ति,जैसी बेपरवाही वैसी तृप्ति। न जाने कितने जिम,कितनी योग शालाएँ और कितने पार्क हैं, लोग सब जगह हैं पर फिर भी ठेलेवालों की और महँगे से महँगे रेस्तरां की जो बहार है वैसा आकर्षण तो कहीं नहीं।

दोस्तों… लगता है जीवन भोजन के लिए विषय पर ज्यादा ही लेखनी फिसल गई है। सुबह से शाम तक …जी हाँ ….शाम तक (रात तक नहीं) की एक अद्भुत लाभकारी खान-पान  प्रक्रिया को अपने रोज़ की दिनचर्या में शामिल करें। अपनी भक्ति, स्वशक्ति, ध्यान योग, योगासन, ज्ञान और प्रसन्न चित्त से स्वयं को समझने का प्रयास करें। योगासन, वर्क आउट, सैर और अन्य यौगिक क्रियाएँ तभी अंजाम देंगी जब हम अपने खान-पान की समझ और नियमित  जीवन शैली पर बल दें। खान-पान को लेकर रोज़ कुछ पल अपनी दृढ़ता, अपनी सूझबूझ और नियंत्रण शक्ति से रूबरू हो जाएँ। अपनी आसक्ति जो भरे-पूरे पेट के बाद भी मेज़ पर माया बन ललचाती है। मीठे की मनाही के बाद भी भंडारा,भोग और प्रसाद के नाम पर फिसल जाती है। सड़कों पर लगी रेहड़ी-पटरी और ठेले देखते ही हम लाखों की कार में बैठे भी ललक उठते हैं।  तो ये समझते देर न लगेगी कि हालात तो अभी भी सुधरे नहीं हैं। बिगड़ती खान-पान की आदतें हमारे आलस्य और भोगी जीवनशैली की ओर इशारा करती हैं।

जब भी भरे पेट के बाद कुछ भी मुख में जाता है वैसे ही समझ में आता है यही तो लपलपाती जीभ है, यही तो कमज़ोरी है, यही तो बीमारी है, यही तो लालच है और यहीं उस पल ये सब न खाने की समझ मेरी जीत है। दिनभर के नफ़ा नुकसान का जायज़ा लेना भी आत्मनियंत्रण का ही तो नाम है। मुख का मौन वाचा से तो होता ही है पर मुख का मौन नपे-तुले भोजन को प्रसन्नता से स्वीकार करने में ही पूरा होता है। किसी की थाली में परोसे गए खाने में या यूँ कहें कि असंख्य खाद्य आकर्षण के बावजूद भी सीमित मात्रा से थाली में रखना भी ...हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वाद दर्शा देता है। कम खाना, क्या खाना और कब-कब खाना भी मेरी आत्मिक संतुष्टि व शक्ति की छाप छोड़ता है। व्रत रखना और फिर खान-पान से दिल्लगी जैसे ये सब कुछ सटकता नहीं है। यह संतुलित आहार शैली का व्रत तो शादी में या मेले ठेले या पांच-सितारा की चमक-दमक में सदाबहार रहना चाहिए। आप स्वयं इस आत्मनियंत्रण की शक्ति से अवश्य वाक़िफ हैं। कम खाना और पौष्टिक आहार …यह पकते भोजन और कढ़ाई की कचौड़ियों से ऊपर की दुनिया का सुखद एहसास है। बस एक बात ज़हन में रहे कि उतना खाएँ कि जब तक है श्वास तब तक स्वस्थ रहें और जब भी मीठा, खट्टा, चटपटा सामने आए तो बस यही याद रहे…

रे मन! खाने की ललक से ऊपर रहूँ मैं, रे मन स्वाद के लगाव से  परे स्वस्थ रहूँ मैं  । रे मन पौष्टिकता की  थाली छप्पन भोग सी सुहाती रहे मुझे। 

संतुलित आहार खाते रहें, तो दूर होंगे सब विकार,

खान-पान अच्छा रहे, तो मन में सदैव भरें सुविचार ।

Oct 1, 2023

यात्राः घुमक्कड़ी आखिर खुशहाल मिठाई का स्वाद ही तो है

 - साधना मदान 

यात्री, यात्रा, घूमना व घुम

क्कड़ी ये सब ऐसे ख्यालों या स्फूर्ति का एहसास है, जो हमें रोज़मर्रा से दूर प्रकृति और सौंदर्य के नज़दीक लेकर आता है। घूमना या फिर एक जगह से दूसरी जगह जाना, हमारे स्वभाव, स्वास्थ्य और अंतर्मन की चेतना को जैसे जीवंत कर देता है।

कहीं भी नई जगह जाना या यों कहें कि एक खोज, सौंदर्य और मनमस्त खुशी से साक्षात्कार करना जीवन की आवश्यकता है । नए अनुभव, नई वाणी और नए रीति-रिवाज का मेल है।

जब भी कबीर, नानक और राहुल सांकृत्यायन जी के साहित्य से मुखातिब होते हैं या मोहन राकेश (आखिरी चट्टान तक), महादेवी वर्मा जी के संस्मरण या सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति रास या फिर कुछ मनचलों और ज़िंदादिलों का लद्दाख की वादियों में दो पहिए पर सवार होकर बर्फ़ को छू लेने का जज़्बा ….ये सभी कुछ एक स्वस्थ और सदाबहार दुनिया की खुशहाल मिठाई का स्वाद ही तो है। सच में प्रकृति या यों कहें कि अपने देश के स्वरूप से मिलना बहुत ज़रूरी है।

देश का स्वरूप क्या है ? यह वास्तव में जान लें , तो सारा पर्यावरण हमारा हो जाएगा। मैं तो इस बात में अटूट विश्वास रखती हूँ कि अपने देश का भूगोल जाने बिना ‘पढ़ा-लिखा होना’ है ही नहीं । बालपन से ही सागर, नदियों, पहाड़ों, पेड़ों, फूलों को देखते हुए उनके नज़दीक चले  जाएँ, तो देश-प्रेम होते देर नहीं लगेगी। हम बचपन को क, ख, ग से लेकर अंग्रेज़ियत तक, सब कुछ ओढ़ा सकते हैं;  लेकिन विडंबना यह कि गंगा या पहाड़ों की हवा में श्वासोछ्वास होने की आदत से महफूज़ रखते हैं। 

चलिए, आज याद करते हैं रेलगाड़ी का वो सुहावना सफ़र,वो खिड़की के पास बैठना, बार-बार चंपक, चंदामामा और विक्रम- बैताल की पत्रिकाओं के लिए भाई -बहनों के संग नोक- झोंक  हो जाना। सभी कुछ जैसे आँखों की नाव में सवार हो जाता है। चलती गाड़ी में पेड़ों का संग संग दौड़ना,गाय, बैलगाड़ी, बकरियों के झुंड,बहती नदियाँ सभी कुछ घूमने-फिरने का एहसास ही तो था। जब भी कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम तय होता है, तो स्वयं में एक स्फ़ूर्ति तो आती ही है; पर साथ ही साथ ले जाने वाले सामान को सहेजना, आवश्यक चीजें याद रखना, समय, तिथि और व्यवस्था पर विचार करना सभी कुछ आपाधापी से दूर नयापन और खुशहाली से जोड़ता है। घर से दूर जब भी हम पहाड़ी या समुद्री यात्रा पर निकले, तो बहुत खूबी से हर लम्हे की जिया है हमने। तभी तो कहते हैं-

Journey is more beautiful than the destination.

पर एक सवाल मन को अकसर टटोलता है कि क्या यात्रा के भी अलग-अलग अंदाज़, प्रकार या फिर सलीका होता है ? जी हाँ होता तो है?

मस्त, बेफिक्र और सदाबहार यात्रा या फिर ऐश्वर्य, विलास या केवल आरामपरस्त यात्रा।

यात्रा सुख-समृद्धि से दूर प्रकृति मिलन की अनूठी चाह भी हो सकती है । घंटों पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए, पक्षियों की चहचहाहट फिर और आगे बढ़ते झरनों की ठंडक भरी बौछारें। इतना ही नहीं, पहाड़ों से गिरते पत्थरों में जानवरों की आवाज़ का गूँजना। बर्फीली हवाएँ या आधी बर्फ़ और आधे पानी वाली लहरों पर पैर रखने का अद्भुत संगम, कमाल की वादियों में दिल झूम -झूम गाने लगता है कि आज मैं आज़ाद हूँ , दुनिया के चमन में। ऐसी प्रकृति की गोद में न भूख, न प्यास और न ही कोई दुनियावी गंध । एक और यात्रा का भी बुलावा हमें रोज़मर्रा से दूर रूहानियत के आह्वान से सराबोर करता है। आप और मैं ऐसी तीर्थ यात्रा को सदा अपने अंतर्मन में सँजोए हुए हैं। यह यात्रा जब भी किसी अदृश्य की खोज का संकेत देती है या फिर साक्षात्कार की अद्वितीय छवि से मिलान कराती है, तो साधक और साधना की पवित्रता और आलोक से चित्तरंजन हो जाता है। यह यात्रा फिर इस लोक से उस लोक का मेल ही तो है।

यात्रा घुमक्कड़ी का भी नाम है। घूमते हुए न केवल नई जगह को देखना होता है, वहाँ की ज़िंदगी, खान-पान,बोली और पहनावा भी एक सुखद अनुभव होता है।


यात्रा के एक अनूठे रंग में आज हमारे युवा भी खूब रंगीन हो जाते हैं। नौकरी की खोज या नौकरी मिलने पर घर से बाहर बार- बार आना और जाना। यह यात्रा खुशहाली और आज़ादी तो देती है,  पर घर, अपनापन और स्वाद सभी कुछ फिर- फिर याद आता है। विदेश यात्रा पर आना और जाना भी स्वदेश प्रेम को स्पर्श  किए बिना रह नहीं पाता। रोमाँ चक यात्राएँ, समुद्री जहाजों की कहानियाँ हमें एक अलग लोक की सैर तो कराती ही हैं। यात्राएँ कभी मजबूरी तो कभी ज़रूरत के लिए भी की जाती हैं। अपनों से मिलने वाली यात्राएँ किसी उत्सव से कम नहीं होती हैं। तभी तो कहते हैं, यात्रा में साथी गंतव्य से भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पर हाँ,  यात्रा को दिखावे और महँगे रिज़ॉर्ट से दूर रखें, तो घूमने-फिरने की गरिमा सलामत रहेगी।

यात्रा सरस, स्वस्थ और स्फ़ूर्ति से भरपूर ज़िंदगानी का मधुर गीत है। बुद्ध की यात्राएँ करुणा और अहिंसा के गीत गाती हैं। यात्रा अंत से बेअंत तक जाने का भी मधुर संगीत है। निरंतर यात्री बने रहना जीवन की निरंतरता को दर्शाता है। कभी- कभी यह चंचल मन भी बिना किसी खर्च के यात्रा की लंबी दौड़ लगवाता रहता है। 

स्वस्थ चित्त, खुशहाल स्वभाव और सबके साथ खुशी बाँटने वाले अकसर लंबी यात्राओं पर निकल जाते हैं। सुस्ती, नीरसता और कंजूसी हमें यात्रा से दूर, प्रकृति से दूर और रुहानियत से अलग कर दिया करती है।

अतः मन के संग जिस्मानी यात्राओं का भी बहुत महत्व है इस छोटी सी ज़िंदगानी में।

दोस्तो! जब भी जहाँ भी मौका मिले घूमने-फिरने के सुहावने अवसर मत खोना।

Sep 1, 2022

चिंतनः जीवन के कुछ पल

 – साधना मदान

खुराक

आज सुबह उठते ही अलमस्त हवाओं में साँस लेने ही लगी थी कि पुरानी बात चाय की प्याली की तरह जीभ पर लहराने लगी। ये बातें कभी कड़वी दवा बनकर , कभी तपते अंगारों सी बैचेन कर देती हैं मुझे, पर सामने बैठे हंसमुख और ज़िंदादिल शख्स को देखकर मैं फिर संभली। मैने मन को आज सुबह ही हिदायत दे दी कि याद वह जो सकून बने, बातें वे जो खुशी की खुराक बन मेरे तन-मन को एक खुशहाल और हरियाली दुनिया की सैर करा दें। अब  मेरा मन फिर से कनखियों से हंसा भी और मुस्कराया भी।

पुड़िया

काला घना अँधेरा, हवा की चुप्पी मानो पेड़ों पर मौन की बेड़ियाँ डाल कहीं गुम हो गई है। लोहे के बड़े काले गेट के अंदर सितारा अपने पिता के साथ गेट की सलाखों के पीछे किसी का बेसब्री से इंतजार कर रही है। पीछे से चीखने कराहाने की आवाज़ें जैसे चुप्पी में टूटते काँच की तरह बिखरने लगी थी। सितारा रोना भी चाहती है और चीखना भी कि कब आएगा वह …..वह आ क्यूँ नहीं रहा। माँ को तड़पते देखने से अच्छा है कि पुड़िया खाए और फिर दो दिन तक दर्द से राहत मिल जाए‌। पिता अपनी लाल और सूजी आँखों से सितारा से जैसे कह रहे थे कि राहत माँ को मिलेगी या हमें।

मुलाकात

हरियाली में पत्तों की महक और पिघलती बर्फ की ठंडक  पहाड़ी रास्तों पर तेज़ दौड़ती कार से जैसे रुक जाने को कह रही थी। फिर हरियाली ने हवा के इक झोंके से कहा कारें दौड़ती ही रहती हैं, रुकती क्यों नहीं। रुकतीं तो देवदार को निहारती, चीड़ की खनकती आवाज़ को सुनती। धीरे- धीरे रिसते हुए पानी की मिट्टी को हाथ में लेकर उसकी ठंडक महसूस करतीं। पर कार अभी भी केवल रास्ते नापती अपने गंतव्य या सिर्फ़ दौड़ और होड़ में ही भाग रही है। हवा का झोंका अब कुछ इतराया और हंसते हुए कहने लगा कि मुलाकात का सलीका भी हर कोई नहीं जानता।

निगाहें

आज सुबह ही आँखे मलती योग्या अपना चश्मा ढूँढने लगी। मैंने कहा ...आज इतनी जल्दी कैसे तुम्हारी सुबह हो गई? कुछ चुस्त आवाज़ में सुनाई दिया 9 बजे मीटिंग है। थोड़ा जूस और पपीता खाने के बाद उँगलियाँ फिर काले की बोर्ड पर ऐसे हिलने लगीं जैसे पहले कभी दाल बीनते हाथ दाएँ से बाएँ घूम जाते थे।

मैं सोचने लगी ये कमसिन उम्र न जाने कौन-कौन से आँकड़ों को ढूँढती हुई नफ़ा नुकसान की रिपोर्ट तैयार करने में सक्षम हैं , उसी पल याद आया गुजरा ज़माना , जब यही उम्र बलखाती कमर, वेणी जैसी चोटी लहराते हुए मंदिर की घंटियों पर झूमती, बालों में फूल लगाते हुए इठलाती थी। वक्त बदला है, नज़ाकत के अंदाज़ भी बदले।तभी योग्या की मिश्री जैसी मीठी आवाज़ में सुनाई दिया मेरी जीन्ज़, शर्ट और कार की चाभी टेबल पर रख दो । दोस्तों के साथ देर रात तक पार्टी में शामिल होना है। मैं भी मुस्करा दी कि निगाहें कम से कम की बोर्ड और स्क्रीन से तो हटेंगी।

इनाम

बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों को बार-बार निहारते हुए  मैं न जाने क्यूँ रिजोर्ट की हरियाली पर ही टकटकी लगाए रही। फूलों का हिलना, अपनी रंगीन अदा से हवा में झूम जाना जैसे किसी मनचले गीत की याद दिला रहा हो.. फूलों की पत्तियों को सहलाते हुए मैं फिर हैरान थी कि यह छोटी-छोटी पौध भी कितनी कोमल है। ये क्यारियां नन्हे बच्चों जैसे मुझे कह रही थीं कि हमें भी तो देखो बड़े जतन से बड़े हो रहे हैं।अभी हमारा रहनुमा आएगा हमें फिर से आकार देगा, बढ़ने की दिशा देगा, तभी पेड़ों की हिलती झालरें देख मैं सोचने लगी ये भला किसकी कीर्ति के गीत गा रही हैं? तभी मैंने  पेड़ की सबसे ऊँची डाल से पूछ लिया इतनी खुशी का, मस्ती का राज़ क्या है…..एक साथ कई लताएँ और वल्लरियाँ मुस्करा कर अपनी पलकों को झुकाने लगीं। मुझे समझते देर न लगी कि आज इनकी मुलाकात अपने प्रिय से हुई है। अचानक रुम से बाहर सामान ले जाते लड़के को देख याद आया कि अब हरियाली और चोटियों की सुनहरी यादों वाली गठरी समेटने का समय आ गया है। तभी मेरे साथियों ने सामान उठाने वाले, खाना बनाने वाले और कमरा साफ़ करने वाले को इनाम देते हुए अलविदा कहा। रिसेप्शन पर रिजोर्ट की प्रशंसा में कमेंट लिखते हुए मेरी कलम रिजोर्ट के माली पर कविता लिखने लगी, तभी कलम रोककर सोचने लगी यहाँ का माली भी तो किसी बड़े इनाम का हकदार है।

ओ! नादान

यूँ ही सुबह खुली हवा में चाय पीते -पीते सोचने लगी कि आज घर में बिखरी चीज़ों को सहेज दूँगी। बस आवश्यक काम खत्म करते ही उलझ गई कपड़ों की अलमारी से, बस अब तो कपड़े इकट्ठा करती तो वहीं पड़ी असंख्य फ़ोटोज़ भी सहेज दीं। वहीं साथ में पड़े दोहर, चादरें और मेकअप का सामान भी दया की भीख सी माँगता गुहार कर हिलने लगा। मैंने भी मुसकरा कर सब सहेज दिया। मुझे अच्छा लगा सबको यथास्थान रखना। दो दिन बाद  दालों के पैकेट समेट रही थी तो सोचा उस दिन सहेज कर रखे सामान को समेट भी दूँ। होश और जोश दोनों प्रबल उछाल भर ही रहे थे कि सोचा समेटा है तो सीमित भी कर दूँ।  अब सार- सार गहि करो तो आवश्यक चीज़ें रखी रहीं बाकी सहयोग के आवेग से दूसरों को देने या बाँटने के भाव से  बैग में भर दीं कि, लगाव, मोह, ममत्व और मेरी है, मेरी चीज़ें सब को तिलांजलि दे  बाँट दीं। दो एक दिन तो हलके पन का एहसास था पर फिर वही व्यर्थ प्रलाप जैसे अभी तो कपड़े नए ही थे, न जाने ये भिखारी भी बेच देते हों चीज़ें, सामान रख ही लेती, क्या था बैग में ही तो पड़ा रहता… बस ऐसा व्यर्थ संकल्प मुझे अपनी चपेट में लेने ही वाला था कि मेरे अंतर की एलईडी ने मुझे फिर से रोशन किया कि ममत्व नहीं महत्त्व का मूल्य समझ… क्योंकि महत्त्व देने और बाँटने का है, इकट्ठा करना तो ममत्व है… ओ नादान

हिलोरे

दादी तख्तपोश पर बैठे- बैठे ही आस- पास बिखरे सामान को समेट ही रहीं थीं कि मैं उनके लिए गुड़ वाला दलिया कटोरे में लेकर आ गई। अपनी दादी की मुसकान और मुख की मिठास को महसूस करना मुझे सबसे प्रिय लगता।  दादी की महकती साड़ी और कसकर बंधी चोटी में उनके व्यक्तित्त्व का सिमटना समाया हुआ था। दादी की न तो किसी वार्ता में, न आवाज़ में, न वाणी में, न बिस्तर पर पड़ी सिलवटों में, न हाव- भाव में और न रिश्तों की माला में …कहीं भी तो बिखराव नहीं था। दादी बुढ़ापे के सच्चे नुस्खे जान चुकी हैं। अरे! यह क्या मैं फिर से दादी को अपने में समाने ही लगी थी कि देखते ही देखते चाचा, चाची, सौम्य भाई और भाभी के संग उनके जुड़वा बेटे और बुआ की दोनों बेटियाँ… हम सभी दादी के वट वृक्ष की छांव में बैठ चुके थे। सारे दिन के हवाले की आवाजें और दादी के ओठों की मुसकान जैसे नसीहतों से परे, अपने ज़माने के हवाले से दूर। हम सबके काम, तौर-तरीकों को सराहाते हुए, हर एक को महत्त्व देते हुए सबकी प्रशंसा के पत्ते अपने स्पर्श और स्नेह से बिखेरते हुए ऐसे लग रहीं थीं मानो छतनार पेड़ अपनी लताओं की झालर में सभी को ठंडी हवा के हिलोरे दे रहा हो।  शायद दादी आज भी सब संग जुड़ने की जड़ों को अपने झुर्रियों वाले हाथों से पकड़े हुए हैं।

May 1, 2022

आलेखः आपकी नज़र में भारत की नई तस्वीर

- साधना मदान, नई दिल्ली

कहते हैं कोई भी देश कभी मानचित्र से बड़ा नहीं होता, देश बड़ा होता है….देश के स्वरूप से……यानि अपनी संस्कृति और सभ्यता से। देश बनता है देशवासी के चरित्र से। खैर अब एक प्रश्न आपसे पूछकर  मैं आपकी सोच -संग में भी शामिल होना चाहूँगी…. आपकी नज़र में भारत की नई तस्वीर कैसी होगी? कुछ क्षण यहाँ रुकिए और अवश्य उस खूबसूरत छवि को निहारिए।

मेरी नज़र और समझ का चश्मा तो एक स्वच्छ और सशक्त भारत की उज्ज्वल रोशनी में एक साथ बहुत कुछ देख रहा है।

भारत की नवीनता नई तकनीक की संगिनी रूप में दिखती है। कंप्यूटर, इंटरनेट, नए सॉफ्टवेयर और नए मशीनकरण की दुनिया से संवर रहा है भारत, अब भारत विज्ञान की पटरी पर विश्व की अन्य तेज़ गाड़ियों के संग गतिमय है। डिजिटल और मीडिया की कश्ती भी संतुलित हो तकनीकी लहरों पर सदाबहार है। विदेशी कंपनियों ने भी अपनी छवि से स्टार्ट अप की चेतन जगाकर भारतीय आईटी संपन्न युवा को नई उड़ान हेतु सक्षम पंख दिए हैं। रेलवे, चिकित्सा, शिक्षा,खेल और कला क्षेत्र में भी नई तकनीक का सिक्का खूब चमक रहा है।

आत्मनिर्भर भारत की बात करें तो समाज की गतिविधियाँ बदलते स्वरूप की महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं। सामाजिक रूढ़ियों की जड़ें भी उखड़ती नज़र आ रही हैं भले ही पूरी तरह से टूटी नहीं हैं। स्त्री-पुरुष समानता, बेटी बचाओ और पढ़ाओ की लहर भी तेज़ गति में लहराती नज़र आती है। करोना की मार ने भले ही देश की अर्थव्यवस्था को हिलाया है पर देश के वैज्ञानिकों की नई खोज और अपनी वैक्सीन की सफलता ने भारत को विश्व में एक नई तस्वीर तो दी है। महिला समाज भी अपनी सेवाओं से एक नए दौर की कहानी कहती है। फैशन हो या बॉलीवुड या मॉडलिंग की दुनिया, इतना ही नहीं सोशल नेटवर्किंग ने भी सभी  तारों को जोड़ा है। ऑनलाइन ने पढ़ाई, दवाई, घरेलू रोज़मर्रा का सामान भी घर देने की सुविधा को भारत की नई तस्वीर में रंग भरने में अपना सहयोग दिया है। आज 90 वर्ष की भारतीय बूढ़ी माँ, जब अपनी विदेश में रहने वाली बेटी को वाट्सअप कॉल करती है और ठीक से बात  होने पर इंटरनेट की और स्मार्ट फोन की वाह-वाह करती है, तो भारत की उभरती छवि समझ आने लगती है।

सभी कुछ बदलता, चमकता और नया-नया लगता है, फिर भी हम भारतवासी ही एक दूसरे को कोसते दिखाई देते हैं। फिर भी विदेशी छवि की माया में लिपटते दिखाई देते हैं।  विदेशी चमक में माता-पिता, घर परिवार को धुँधला कर देश की मिट्टी को नकारा कर वहीं बसने के लिए पत्थर तोड़ कशमकश करते हैं। क्यों आखिर क्यों…

  पूछो, तो क्यों का जवाब है वहाँ quality life है और यहाँ अनुशासन रहित, कम पैसे और गंदगी की अधिकता है। कामचोरी, चालाकी और भ्रष्टाचार की प्रदूषित हवा है। देश वासियों में ज़िम्मेदारी का अभाव है। ऐसा सुनते-समझते और परखते ही माथा ठनका, दिमाग की घंटियाँ बजने लगीं कि देश की स्वच्छता यानी कि देश की सुंदरता तो नई तस्वीर है ही, पर अंतर्मन में शांति, नम्रता, शालीनता, सच्चाई के 24 कैरेट का सोना भी हमारी मानसिकता की तिजोरी में है या नहीं। इसे हम यूँ भी मनन कर सकते हैं कि सम्प्रदाय, जाति, अमीर-गरीब, वैमनस्य, अशिक्षा, गैरत ये सब मैल यदि हम स्वयं अपने जीवन मूल्यों और पौराणिक व वैदिक संस्कृति के किस्सों और कहानियों के मनन वाले साबुन से साफ़ करते रहेंगे, तो नए भारत के उज्ज्वल स्वरूप को देख सकेंगे। तुलना छोड़ स्वपरिवर्तन को या यूँ कहें -खुदपर काम करें तो अच्छा रहेगा। सबसे पहले तो दूसरी भाषा, रीति रिवाजों पर या कमी कमज़ोरियों पर नोंकझोंक से पहले स्वयं को उन परिस्थितियों में रखकर देखें, तो आपसी सम्बन्धों में मधुरता बढ़ेगी। व्यर्थ समय बातों और शुगलमेलों से परे, शिक्षा को अपनी मशाल बनाते ही भारत की तस्वीर विदेशियों को यहाँ का निवासी बनने का निमंत्रण दे सकती है।

 भारत की नई तस्वीर

स्वयं को बदलने वाले कैमरे से देखेंगे तो सोच ही नहीं नज़रिया भी बदल जाएगा। जब हर एक अपने दायित्व की चक्की पीसेगा तो दूसरों पर दोषारोपण के कंकर भी अपने आप ही छँट जाएँगे। जीवन में शांति की और सुख- संतुष्टि की कामना है, तो ईमानदारी की मूठ को दृढ़ता से पकड़ना होगा। भाई-भतीजावाद को छोड़कर , ऊँची-नीची जाति के प्रलोभनों से परे योग्यता और नवीनता को एक साथ अपनाएँगे तो भारत की नई तस्वीर को चार-चाँद लग जाएँगे।

 नए भारत की नई छवि, तकनीक के साथ हम स्वयं को बदलें, तो जग बदलना आसान हो जाएगा।

Oct 6, 2020

आलेखः नदी के द्वीप


-साधना मदान

हवाओं के मिजाज़ बदलते हैं... कभी गर्म तो कभी शीतल या फिर कभी शुष्क तो कभी वासंती।   खाने के दौर भी कभी बेस्वाद तो कभी चटकार....दोस्तो! कभी हालात ज़िंदा कर देते हैं और कभी हमें मिटते ‌-सिमटते या सँभालते हुए एक -एक कदम भी फूँक फूँककर रखना पड़ता है।   कभी जिन रिश्तों पर जान छिड़कने का दावा करते हैं और कभी मुद्दत तक उनकी शक्ल और सीरत से भी दूर हो जाते हैं। कभी अपनों की डफ़ली बजाते और कभी भरी सभा में बाप की पगड़ी चकरी समझकर घुमा देते हैं।
एक और बात ज़िंदगी की उधेड़बुन में ले जाती है कि सागर का जल भले ही खारा है ; पर बादल तो बनाता ही है।
 मैं आप ही सब कुछ हूँ । मैं अपना आपा ही सँवार लेती हूँ;  अतः मेरा अब सब के साथ रहना असंभव है;  क्योंकि किसी की गलत बात मेरी बर्दाश्त से बाहर है।  मैं एक ऐसी बुज़ुर्ग महिला से आपको मिलवाना चाहती हूँ, जिसके तीन बेटे और दो बेटियाँ हैं। बेटियों ने तो शादी के बाद अपनी गृहस्थी  सँभाल ली और कुछ समय बाद बेटों ने भी यही किया।  अब माँ बच्चों के परिवार मे मिश्री- सी घुल जाए , ये हो न सका । मैं बहुत हैरान होकर सोचती हूं कि माँ सबके साथ क्यों नहीं रहती। उत्तर एक नई शैली में मिला कि साथ-साथ रहने में सब मेरे अनुकूल नहीं, सब मेरे काम, सब मेरे स्वाद और मेरे कम से कम खर्चा करने के तरीके में दख्लअंदाज़ी करेंगे। उन्होंने स्पष्ट बताया कि सब मेरे क्या,  क्योंकि जवाब जब नहीं देंगे, तो कैसे साथ रह पाऊँगी।  मैं अकेली ही भली हूँ ।  तब मेरे मन से आवाज़ आई कि क्या साथ- साथ रहना इसलिए ही मुश्किल होता है।  साथ-साथ  स्वयं को लकीर से खिसकाना या दूसरों के लिए स्वयं को न बदलना इतना कठिन हो जाता है कि भले ही घुटना पकड़कर खिसकना पड़े या सोटी लेकर अपनों के होते हुए भी जीना पड़े, तब भी साथ का हाथ गवारा नहीं होता।। अपनी मैं की जय -जयकार करते बस चलते रहना है।  साथियो ! मैं ज़िंदगी के ऐसे दंभ से तब और भी हैरान हो जाती हूँ, जब यह महसूस करती कि अकेले रहना आसान है , बजाय इसके कि अपनों के संग बैठ मिलकर दिल के तार मिला लें।  एक ऐसी बेटियों की माँ को भी जानती हूँ , जो हर बात में यह कहती हैं...हाय! बेटियों के घर जाना मुझे गवारा नहीं। नहीं- नहीं ये कैसे संभव है कि मेरे प्राण कहीं बेटी के घर न निकल जाएँ ,तो मैं फिर हैरान हो सोचती हूँ  कि यह भी अकेली।
शायद आप सोच रहे हैं कि बेटियाँ और बेटों में अब तो कोई अंतर नहीं रह गया।  हाँ , इस जुमले को बार-बार केवल दोहराया ही जाता है।  ऐसे में बेटियाँ बूढ़े माँ -बाप की सँभाल करती हैं तो उनके माँ बाप जब तक दामाद बेटी के शुक्राने की रसधारा न बहा लें तब तक उन्हें सकून नहीं इधर बेटे के माँ बाप तो अपना अधिकार ही समझ लेते हैं कि शुक्राना कैसा ? बेटा है तो पूछेगा ही।।  ऐसे अंतर से एक विचार जैसे अंतर में कुलबुलाता है कि शुक्राने का यह कैसा सलीका है।
  इधर बेटियों के जन्म पर , परवरिश पर, पहनावे पर, उनके जीने के अंदाज़ पर और तो और रिश्ते निभाने न निभाने के दायित्व पर एक नई छत्र छाया का दिखना भी हैरान करता है।  खान-पान की हदें पार कर लेने से आने वाली ज़िंदगी लाचारी में, धुटन में सांस लेकर कैसे वात्सल्य को पाएगी।  हैरान होती हूँ  लड़कियाँ पहले कैसे पारिवारिक जीवन में अपने बड़प्पन को जी लेती थी पर आज हैरान हूँ  बराबरी भी करें तो पुरुष के मदांध की और तो और बराबरी भी करें साथ-साथ सुरा और सुराही की ….ये तो ऐसा लगता हम पुरुष को न बदल पाए तो हम उन्हीं की लड़खड़ाती राह पर उनके पीछे ही चल पड़े। रात-रात घूमना फिर यह कहना कि लड़के घूमें तो मैं क्यों नहीं, सुबह देखी न रात दिन रात काम। ऐसी व्यस्त माँ  के बच्चे भी सोचते होंगे माँ शायद ऐसी ही होती है।  जब सब समान हैं तो न जाने किस अंधी गली में पैर रख लिया है हमने? आज हैरत की एक और बात भी हमारे ज़हन पर दस्तक देती है कि मर्यादा के कोई मायने नहीं,परंपराओं की चिंदियों पर लटक कर बिना शादी या रज़ामंदी के साथ-साथ रहने की तृष्णा को भी जीने लगी हैं।  यदि यह ज़िंदगी का नया पाठ है तो समानता का यह नया दौर जाने किस जिंदगी को निमंत्रण दे रहा है। सच तो यही है कि पतंग भी है और धागा भी पर हवा की कोई निश्चित दिशा नहीं।
भगवान ने लड़की को जो कोख और वात्सल्य का ताज पहनाया है वह तभी शोभित होगा जब उसमें स्नेह, दायित्व और ममत्व के नगीने लगे हों।  यह सब सोच और भी हैरत होती है कि हर कोई अपनी डफ़ली की धुन में मस्त है।
न अपनी प्रकृति का पता है , न कुदरत का।  बस एक होड़ में शामिल होकर पश्चिमी रोशनी में नहाना अच्छा लगने लगा है।  सोचती हूँ  वह कला या वह सलीका कहां से जुटाया जाए कि ज़िंदगी एक पानी के सोते जैसी हो जाए जिसमें अपनी मर्यादाओं की रसधार हो।  एकाकी जीवन से ऊपर उठकर संग, सहयोग और स्नेहकी नमी हो।  अपनी ज़िंदगी जीने में अपनों के भी रंग भी चमकते हों।  आज हम सभी को समझना होगा कि जीवन केवल द्वीप ही नहीं , क्योंकि नदी के बिना द्वीप के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
जीने के अंदाज़ मेरे अपने हों पर शाश्वत मूल्यों के दयारे में।  गिन्नी का सोना चमकता है, मज़बूत है और दाम भी कम पर शुद्धता की कसौटी पर खरा नहीं क्योंकि चौबीस कैरट नहीं।  इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हम लकीर के फ़कीर बन जाएँ नहीं, नहीं जीए अपने शोक और हसरतों के साथ पर समाज को ऊपर उठाते हुए।  मैं अकसर  अपने आपसे पूछती हूँ  कि केवल उपदेशों और मूल्यों की माला हाथ से तो नहीं फेरती मेरे वजूद में , आचरण और तहज़ीब में भी मनकों की झलक दिखती है? अपने व्यवहार में भी जब उथली और बनावटी टहनियों को देखती हूं तो जड़ से अलग होने की बात सोच हैरान हो जाती।  अतः हर उम्र,हर हाल और हर रिश्ते में स्वयं को जाँचना और बदलना ज़रूरी है।  शायद तब हैरानी या परेशानी सकून में बयां हो सके।  अज्ञेय जी की कुछ पंक्तियाँ लिखकर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराना चाहूँ गी… ‌
 हम नदी के द्वीप हैं
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्त्रोतस्विनी बह जाए।
माँ है वह! इसी से हम बने हैं
किंतु हम द्वीप हैं धारा नहीं।
हम बहते नहीं हैं क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं। 

Nov 13, 2019

अपनी हसरतों के साथ जीने का आनंद लें

अपनी हसरतों के साथ जीने का आनंद लें
-साधना मदान
अपने जीवन के चालीस से ज़्यादा वसंत पार करने पर अब मैं स्वयं को वासंती समझने लगी हूँ। अब मैं अपनी हम उम्र के साथ रंगीन बातें करती हूँ तो कभी भी अपनों से छोटों के साथ रंग बिरंगी अदाओं में घुल मिल जाती हूँ। कभी अपनी साड़ी का पल्ला लहरा कर झूम जाती हूँ  तो कभी अपनों से बड़ों के साथ बीते ज़िन्दगी के पलों की खुशबू  लेने लगती हूँ। साथियों ! आप भी सोच रहे हो कि पचास की उम्र में इतना वासंती होने की क्या ज़रूरत है? अब तक तो सारे रिश्तों का रस चख लिया है।अपने पराए को भी समझ लिया है। अब भजन कीर्तन ही करना ठीक है। क्या ज़रूरत है हमें किसी की ज़िन्दगी में घुसने की। बात भी ठीक है पर एक सवाल मेरे ज़हन में कौंधता है कि मैने अब तक एक सुखद बुढ़ापा जीने की क्या तैयारी की है? मैं ऐसा क्या कर जाऊँ कि बुढ़ापा अकेलेपन का पर्याय न बन जाए। हाय! कहीं ऐसा न हो कि अकेली ही अपने कमरे में अपनों की मुसकान को तरस जाऊँ। अपनों के फोन की चाहना में मोबाइल को हाथ में ही लिए रह जाऊँ। हर पल यही उमड़-घुमड़ मची रहे कि फलां ने पूछा नहीं, मुझे घर की कोई भी बात कोई बताता क्यों नहीं । 
 दोस्तों ! ज़िन्दगी का हर लम्हा सीखने के लिए महत्त्वपूर्ण है। बचपन पढ़ने, खेलने और खाने का नाम है। जवानी झूमने और कुछ कर गुज़रने का अभ्यास है और बुढ़ापा सबके बीच बसेरा बनाए रखने का सतत अभ्यास है। बुढ़ापे के खौफ़ से बचने के लिए और अपनों की बगिया में पका हुआ और रसीला फल बनने के लिए यह ज़रूरी है कि पचास की उम्र से ही इसकी तैयारी शुरू कर दें।
वैसे तो यह एक मज़ाक सा लग रहा है कि हम अच्छे बुढ़िया और बूढ़ा कैसे बनेंगे? सीधी सी बात है कि वानप्रस्थ में जाने से पहले वाणी से परे जाने का अभ्यास बहुत ज़रूरी है। कम से कम बोलना और कम से कम प्रश्न पूछना और बेमतलब की दखलंदाजी से दूर रहना। अनावश्यक सुझाव, बेमतलब के किस्से सुनाने से परहेज़ रखना ही बहतर होगा। इस पर दिन में दो तीन बारी अवश्य विचार करना कि कहीं मैं अभी से ही तो अपने आपको बूढ़ा कहकर सहानुभूति के हाथ तो नहीं पसार रही। यह भी पक्का अभ्यास करना कि मेरे लिए बात-बात पर अपने ज़माने की कहानियाँ और अपनी विशेषताओं की किताब सुनाना कतई ज़रूरी नहीं। हर बात में अपने अनुभवों का पिटारा खोलने की भी आवश्यकता नहीं। हम तो ऐसे करते, हम तो कम में भी ऐसे गुज़ारा करते, आजकल तो सारे सुख-साधनआसानी से मिल जाते। हमें पता है हमने कैसे -कैसे मेहनत कर बच्चों की पालना की। अपने ही परिवार में  लेन-देन का बहुत ज़्यादा हिसाब रखना भी भारी पड़ सकता है ।इसका भी हमें अहसास होना चाहिए। जैसे  यह कहना कि बच्चों ...तुम नहीं पूछोगे तो और कौन पूछेगा। नहीं कभी नहीं यह याद रखने की आदत बना लेना कि हम बच्चों के साथ हैं। अब हमें उनकी ज़रूरत है। समय-समय पर परिवार के साथ घूमने जाने पर बेहद खुश होना, उनके बनाए कार्यक्रम को मान देना। प्रशंसा और हाँ जी का गुरुमंत्र सीखना। भूलकर भी तर्क- वितर्क में नहीं उलझना। बूढ़े होने से पहले ही मिलने-मिलाने की और चुप रह शांत स्थिति का अभ्यास करना अति आवश्यक है। अपने घर की कमी खामी का उल्लेख दूसरों के आगे न करने की भी आदत डालनी ही होगी।
पुरानी बातें बार -बार रटने की बजाय वर्तमान में अपनों से  स्नेह -सौहार्द कैसे बनाया जाए …..यह एक विचारणीय बात है। हमें तो अभी से ही दूसरों की ज़िन्दगी की मुश्किलों को  समझ उनके जीने  का मनोबल बढ़ाने का प्रयत्न करना है।मसलन ... प्रदूषण की इस घुटन भरी जीवन शैली में भी अपने घर में ही पौधों की देखभाल कर व्यस्त रहना। शोर, ट्रैफ़िक, नित नई बीमारियों से जूझते परिवार जनों का मददगार बनने का अभ्यास करना, कामकाजी बहू अथवा बेटी की आगे बढ़कर मदद करना सुखद बुढ़ापे की पहली सीढ़ी है। बड़े होते ही देने के भाव से भर जाना...यह देना पैसा नहीं सहयोग,मीठे बोल, सकारात्मक सोच और करते चलो -करते चलो अर्थात अपने चिंतन की धारा बदल दो.,सब सरल हो जाएगा तो अपने आप ही सब अपने बन जाएँगे। तो क्या तैयारी करें….इस पर और भी विचार करना पड़ेगा जैसे -
परिवार के किसी जन के कुछ पूछने पर ही अपने अनुभवों का संक्षिप्त उल्लेख करना।
 नई दुनिया की दौड़ में सब कुछ सहज स्वीकार करने की शक्ति जमा करना 
* 'छोड़ो तो छूटे' के मंत्र को गहराई से समझना जैसे बहुत पुरानी चीजों को दबाकर कर रखना, अपने स्वार्थ के कारण या मोह के कारण अपने बच्चों को अपने से अलग रहने की बात पर अपार दुख में डूब जाना। इन सब को छोड़ने की शक्ति का संचयन तो पचास से भी पहले ही करना होगा।
* अपनी जीवन शैली की ऐसी तैयारी करना जिसे सब यह कहें कि आप तो जवानों से भी ज़्यादा व्यस्त रहती हो। 
*योगा और योग (meditation) दोनों को अपना साथी बना लेना।
*ईश्वरीय आस्था के प्रकंपन घर में फैलाने का प्रयत्न।हाँ! यहाँ यह ज़रूरी है कि बिना कुछ कहे यह सब बहुत शांत रीति स्वतः ही चलता रहे। अपने स्वभाव ,अपनी बात और कार्य से अपनों के बीच एक माँ , बाप, दादा, दादी या नाना, नानी बनकर रहना। 
* ईश्वरीय आस्था अर्थात अपने बोल और चलन में स्थिरता का अभ्यास चालीस-पचास में ही ऐसा प्रयास होना ज़रूरी है। मानवता और सुखद रिश्तों की संभाल ही जीवन मूल्यों की पहचान का नाम  है; अतः धार्मिक कर्मकांड की कट्टरता भी परिवार पर कतई न थोपें।
* जो हमें अपने समय में अच्छा लगता तो ठीक है क्योंकि वह मेरा युग मेरा समय था। अपनी मूल्यपरक बात को सरलता से परिवार के सामने रखें।गलत और अनुचित व्यवहार के प्रति आगाह भी करते रहें ।वे मान ले तो वाह...वाह न माने तो जिद्दीपन या क्लेश से जल्दी ही अपने को अलग कर लें।
* पचास की उम्र अपने ही में इतनी सुहानी है कि अपनी हसरतों के साथ जीने का मज़ा लें। अपने बच्चों के पैसे पर अनावश्यक नज़र न ही रखें तो बुढ़ापा गुले-गुलज़ार है । बच्चों पर अपनी जायदाद का परचम न फहराया जाए तो अपनी संपत्ति की कद्र शायद ज्यादा बढ़ जाए।
*बदलते खान-पान और पहनावे को स्वीकार करें तो साठ सत्तर में हैरानी और नुक्ताचीनी की बीमारी से छूट जाएँगे।
दोस्तों! वैसे तो हर परिवार की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।किसी को पैसे की किल्लत, किसी को रिश्तों की मार, किसी को अपनों से बिछुड़ने का गम या किसी को बीमारी की चोट ... हालात कैसे भी हों पर अपनों के संग साथ की कला तो यहीं  से सीखनी ज़रूरी है कि अपने किस्से कहानियां भूलें और एक अच्छे श्रोता बनने का भरसक प्रयास पचास के साथ-साथ शुरू कर दें। कुछ दिनों के लिए घर को छोडऩे की आदत डालें  और सैर सपाटे से खुशी और तंदरुस्ती पाएँ।
स्व परिवर्तन और सहनशीलता की कमान अपने हाथ में हो तो बुढ़ापा अपने घर के आश्रम में भी बढ़िया बीतेगा वरना हमारे देश में अस्पतालों की तरह वृद्धाश्रम भी बढ़ने लगेंगे।

सम्पर्कः -B-85 गुजरानवाला टाउन, पार्ट..1, दिल्ली...9

Aug 15, 2017

न काहू से दोस्ती न...

क्यूँ... मन माँगे मोर
- साधना मदान
बार- बार खाने की मेज़ पर रुचि अपने हाथों बनाई खीर सबको खिलाना चाह रही थी। नीले परदे के पास वाली कुर्सी से वाह! वाह! की आवाज़ सुनकर रुचि की आँखें जगमगा गईं पर यह आवाज़ खीर के स्वाद से भरी नहीं थी बल्कि चार वर्ष की बच्ची का चुटकुला सुनकर आई थी। फिर एक दिन काम्या ने बिना झिझक आफ़िस के दोस्तों के सामने कविता पाठ कर ही दिया। अब तालियों की गूँज सुनने के लिए उसके कान मानो बिखरते पानी से बहने लगे तब फिर कहीं से खनखनाती सी आवाज़ आई ...कुछ फिल्मी हो जाता तो बात बन जाती। अभी दो एक दिन की बात है, खूबसूरत लगने की ललक में मोहिनी ने पाँच छ: जोड़े ऑन लाइन कपड़े खरीद लिए और जब एक- एक कर पहने तो सामने वाले ने टुकुर- टुकुर देखा तो सही, पर बोलने के लिए जैसे भाषा ही भूल गया या मूक होने का अभिनय करने लगा। अब रुचि, काम्या और मोहिनी किसी अज्ञात वास में चली गईं कि हाय! किसी के मुख से दो शब्द भी प्रशंसा के न फूटे। क्या मैं व्यर्थ ही सबके लिए माथा मारती हूँ ? या मैं अब किसी के लिए कुछ नहीं करूँगी। तारीफ़ के दो शब्दों की भी मैं अब मोहताज हो गई हूँ। बस, मुझे पहले ही पता था कि मेरा कोई अपना नहीं। बस, अब कभी ये कुछ करें.. मजाल मेरी, जो देख भी जाऊँ। आज की दुनिया का हाल ही बुरा है। देखकर भी नहीं देखते।
दोस्तों! इसी उठा पटक में, वाहवाही के दो बोल की चाहना हमें अँधेरे कोठरे में बंद कर देती है। हम निराशा की धुंध में खोए- खोए से रहने लगते हैं। अपनी एक दुनिया रचते हैं जिसमें विचारों के तीखे बाण सहेज कर रख लेते हैं । फ़ेज़ बुक या वाट्स एप की गलियों में लाइक्स ढूँढने निकल पड़ते हैं। एक -एक झरोखे में दूषित निंदा-द्वेष के प्रकंपन फैलाने में जुट जाते हैं।
कई बार मन की हवाएँ बार -बार हिलोरे लेकर कुछ गुनगुनाती हैं और उन गाती तरंगों का स्वर जानते हैं आप ज़रुर वही बीते पल, जब अमुक ने मुझे ...अच्छी लग रही हो कहकर सहलाया था या फिर आज तो तुमने जो शापिंग कराई ,उसका जवाब नहीं या फिर जो भाषण दिया वाह -वाह ! हो गई या फिर सबके बीच मेरे काम , नाम और शान का राग अलापा गया ...वो पल तो मैं कभी न भूलूँ। दोस्तों! सोचती हूँ क्या मेरी खुशी का आधार मात्र यही पल हैं। मैं तभी मस्त हूँ ...जब मैं -मैं के दौर में मेरे पिलपिले अहं को हर कोई कोमलता का स्पर्श देता रहे। मेरी निंदा करने वालों के एक -एक कर नाम लेता रहे और मैं अपनी आत्म- प्रशंसा की तलवार से उन सबको धाराशायी करती रहूँ। तुम मेरे तब तक अपने हो जब तक मेरी किसी गलती पर छींटाकशी न करो। जहाँ मेरी जीवन की चलती कार में हलका गेयर बदलने की आवाज़ उठाई वहीं अहं का धुँआ फैलने लगेगा। बस ,रिश्ता केवल इतना कि हाँ में हाँ का बाजा बजाओ वरना तुम कौन हो मेरे इस जहाँ में।
  कुछ सवाल ज़हन में उठते हैं कि सबके साथ का सितार तभी बजेगा ,जब सारे तार मैं ही बजाऊँ या जो भी मैं करूँ कोई तो वाह- वाही के दो शब्द कहो। ऐसा न हो तो हमारा सारा कर्म क्षेत्र किसी अज्ञात वास में डूब जाता है। यदि इसी भाव को मैं एक सच का आइना जैसे चश्मे से देखूँ तो मैं अलग ही दृश्य देखती हूँ कि मेरे हाथ में एक कटोरा है और मैं सबसे कहती हूँ मेरी प्रशंसा में कुछ तो कह डालो पर तब देखती हूँ एक अजब नज़ारा कि कोई कुछ भी नहीं देता -पता है क्यों नहीं दे पाता क्योंकि स्वयं देने वाले के पास भी दूसरों की महिमा गाने के लिए न तो भाव है और न शब्द या फिर उत्साह, उमंग की चढ़ती कला में ले जाने की उड़ान वाले पंख। साथियों! समस्या है तो समाधान भी है। बीमारी है तो इलाज भी है। प्रश्न है तो प्रसन्नता भी है। वास्तव में प्रसन्न रहने के लिए ही प्रशंसनीय काम करने पड़ते हैं। कैसा वजूद हो मेरा कि मैं पहले स्वयं से ही संतुष्ट रहना सीख लूँ। जो भी करुँ नि:स्वार्थ होकर करुँ। किसी को छोटा दिखाने या इष्र्या द्वेष से भरे मन से न करुँ। अपने किसी काम में या बोल में या संकल्प में चित्त की चंचलता को प्रवेश न दूँ। कोई मान ले तो ठीक न माने तो अहं से परे हो जाऊँ। विवाद न हो, संवाद हो तो दोस्तों हमारे भी दिन बदलेंगे। सब हमारा भी इंतज़ार करें, कोई यह कहे आपकी ही राह देख रहे हैं। तब मेरे मन के झरोखों से बयार यह कहेगी प्रशंसा पानी है तो अपने ऊपर आप ही कृपा कर। बहसबाज़ी, अपेक्षाएँ, मैं -मैं, आवेश, क्रोध, चिढ़चिढ़ाहट, रोक-टोक और व्यर्थ के बोल ही हैं जो हमें निंदा का व दोषी होने का बाना पहनाती हैं। अपने आइने को सा$फ रखें तो और भी हमारी छवि को भली प्रकार निहार पाएँगे। अब कोई प्रशंसा करे न करे मेरा मन, बुद्धि और संस्कार तो हंस जैसा बन ही रहा है क्योंकि मैंने कंकर चुनना छोड़ दिया है। गुण और विशेषताओं का शर्बत पीती हूँ तो रूहानियत के नशे में मस्त हो जाती हूँ। ऐसे में कबीर साहब से मुलाकात के पट फिर खुल जाते हैं और कबीर कर्म का कपड़ा बुनते-बुनते मुझसे कहते हैं...न काहू से दोस्ती न काहू से बैर...तब मेरा भरपूर मन अपने कटोरे में संतोष और सहयोग का प्रसाद देख आनंद के हिलोरे लेने लगता है।

सम्पर्क: प्रवक्ता हिंदी, कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल, अशोक विहार दिल्ली

Mar 10, 2017

दूसरे लोक में ले जाने की यात्रा

दूसरे लोक में 
ले जाने की यात्रा 
- साधना मदान
मंदिर में ज़ोर से बजती घंटियाँ और प्रभु समक्ष दंडवत प्रणाम ये सब जैसे भक्त को भावनाओं की नाव में बैठाकर एक दूसरे ही लोक में ले जाने की यात्रा है।
मंदिर, भजन, करताल, ढोलक और मूरत का सुमिरन ये सब भक्त और भगवान का अलौकिक मिलन है। हृदय का तार जब निरंतर नाम स्मरण में जुड़ जाता है तो चेहरा रोशन हो जाता है। मंत्र का वरदान तो अटूट विश्वास के सागर का मंगल स्नान जैसा होता है।
     सोचती हूँ भक्ति बचपन में संतों का परिचय या भावमयी कथा सुनने का नाम है। युवाकाल में भक्ति भगवान से सरूर का नाम है और बुढ़ापे में भक्ति नियम,सहारे और सकून का बल है। भक्ति कीर्तन की शहनाई है,भक्ति कर्ण रस का माधुर्य है,भक्ति मगन हो लगन की शक्ति है। केसरिया रंग और माथे पर तिलक प्रभु संग रहने का संदेश है। भक्ति छप्पन व्यंजन का भोग है। भंडारे में भजन गाते- गाते प्रभु प्रसाद की चाहना है।
  साथियों! भक्ति का यह राग नया नहीं है। हवन, कथा प्रवचन, प्रभात फ़ेरी और जलूस सब देखते देखते हम सब बड़े हुए हैं। पर फिर भी अंतर्मन क्यों निराशा, उदासी, अलबेलेपन के कटघरे में उलझा हुआ है? क्यों मन और बुद्धि एक नूर से दूर है। चिंता का चिंतन कठिन परिस्थितियों में हमें खोखला कर देता है। चाहिए-चाहिए की ललक भगवान को चंद रूपयों का प्रलोभन देने की किस प्रवृत्ति का नाम है? कहते हैं भगवान भक्ति का भूखा है। चावल के दाने लेकर महल देता है।गोपियों की ललक और तड़प देख सबके साथ रास रचाने की रीति को पूर्ण करता है। पर मेरा यह बोझिल मन और तर्कमयी बुद्धि क्यों कोई परिवर्तन को महसूस नहीं कर पाती। एक विचार उठती गिरती लहरों की तरह मुझसे पूछता है भक्ति का रंग और संग तेरे चेहरे और चलन से दूर क्यों है।
  अकसर लोग कहते हैं हमें भक्ति का दिखावा पसंद नहीं। हमें ढोंगी गुरु नहीं भाते। कोई नियम नहीं,कोई रीति नहीं, कोई पौराणिक प्रसंगों से सरोकार नहीं। ऐसी जीवन शैली में भक्ति से पल्ला झाड़ते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि चित्त की खाली स्लेट पर कौन से रंग भरूँ। कौन सी ऐसी मिट्टी से चित्त के चौके को लीपूँ। ऐसे कौन से सुर सजाऊँ कि मन की वीणा लयबद्ध हो जाए। ऐसी कौन सी समझ आवे कि वक्ता नहीं वक्तव्य समझ में आ जाए। ऐसा कौन सा अभ्यास करुँ कि बुढ़ापे मे अपने किए कार्यो का गाना मैं न गाऊँ तब कोई अपने चंद प्रियजन संगी सहयोगी बन मेरे अकेलेपन को भर दें।
           ये सब प्रश्न मानस पटल पर हिलोरे ले ही रहे थे कि कबीर साहब की यह साखी मुझसे मिलने आ गई…..
   हम घर जाल्या आपणा लिया मुराड़ा हाथि ।
   अब घर जाल्यां तास का जो चले हमारे साथि ।

ऐसे ही कबीर और नानक से जब जब मिलती हूँ तो मन के इकतारे से भक्ति के सुर ज्ञान की हुंकार में बदल जाते हैं। भक्ति भावना का प्रवाह है और ज्ञान इस प्रवाह को संतुलन और सामर्थ्य प्रदान करता है। कहा जाता है भक्ति का फल ज्ञान और ज्ञान का फल भगवान है।
भावना, संवेदना, करुणा, सहानुभूति और समर्पण की रसधारा तभी बहेगी जब आत्मशक्ति का दीपक साथ साथ जलेगा। आत्मत्राण के लिए ज्योति-पुञ्ज से सान्त्वना,सहायता या तसल्ली नहीं बल-पौरुष,आत्मिक शक्ति का ज्वाला कण लेने का अधिकार रखेंगे। जिस दिन आस्था में सत्यता झलकेगी उस दिन प्रभु प्रेम में सिक्त मन कह उठेगा….मनुष्य मात्र बंधु है...यही बड़ा विवेक है।  कई बार सोचती हूँ जब भक्ति में उमंग उत्साह के पंख लग जाते हैं तो उड़ान मेरे कर्म को दिव्यलोक तक ले जाती है।तब एक झंकार सुनाई देती है ,एक चेतना का आभास होता है कि अपने ऊपर आप ही कृपा करनी है। शुभ भावना का चँवर जब डुलेगा तो मनसा, वाचा कर्मणा का सौरभ आत्मशक्ति के शंख के साथ साथ प्रभु सुमिरन का भजन बन जाएगा।  
    एक प्रयास का अभ्यास कर रही हूँ कि अकेले भक्ति का रास्ता नहीं पूरा चल पाऊँगी जब तक ज्ञान की पगडंडी पर स्नेह,सहयोग और सामर्थ्य की पौध नहीं लगाऊँगी। सिर्फ़ भक्ति से स्वपरिवर्तन संभव नहीं और सिर्फ़ ज्ञान से प्रेम पूर्ण नहीं होता। यदि सूर का सखा भाव वात्सल्य का ओस कण है तो कबीर की साखी आत्म चिंतन का ज्वाला कण है। भक्ति अश्रु है तो ज्ञान शक्ति है। भक्ति कर्ण रस है तो ज्ञान आत्मबल है। भक्ति गुहार है तो ज्ञान हुंकार है।भक्ति आस्था है तो ज्ञान अंतरैक्य-मिलन है। भक्ति स्वाद है और ज्ञान प्रसाद है। भक्ति स्वमान है तो ज्ञान कल्याण है। भक्ति जय-जयकार है और ज्ञान स्वयं का उद्घोष है। अतः इस कर्म क्षेत्र में स्वयं सितारा बन अपनी ऊर्जा से प्रेम की रश्मि का प्रसार करें। अतः यह तो स्पष्ट हो ही रहा है कि सिर्फ़ भजन, कीर्तन या कथा श्रवण से संपूर्ण प्राप्ति संभव नहीं जब तक अपने आप से मुख़ातिब न हों। अपने आप को टटोलना और बदलना यही ज्ञान की गूँज है तब कोई तो अवश्य कहेगा……
       तेरे चेहरे से उसकी रोशनी का पता चल गया…

प्रवक्ता हिन्दी, कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल, अशोक विहार दिल्ली -1100052