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Sep 5, 2026

पर्यावरणः जलवायु परिवर्तन और लुप्त होता अमरनाथ शिवलिंग

  - पंकज चतुर्वेदी

करोड़ों हिंदुओं की गहरी आस्था का केंद्र अमरनाथ यात्रा को चलना तो 57 दिन हैं । तीन  जुलाई 2026 को यात्रा शुरू होने के बाद पाँचवें दिन के अंत तक दर्शनार्थियों की  संख्या बढ़कर 1,13,800 तक  पहुँच चुकी थी; लेकिन  इसी दिन से शिविलिंग लगभग 90 फीसदी पिघल गया । समझना होगा कि  यह आस्था के साथ-साथ स्थानीय लोगों के रोजगार का सवाल तो है ही, बल्कि यह हमारे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक बड़ा पैमाना भी है। लेकिन इस वर्ष 2026 की यात्रा ने एक ऐसा सच सामने रखा है, जो न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि पर्यावरण के प्रति हमारे लापरवाह रवैये पर कड़े सवाल भी खड़े करता है। अमरनाथ गुफा में जो पवित्र हिम-शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बनता है, वह इस बार यात्रा के महज 5-6 दिनों में ही 90 प्रतिशत तक पिघल गया और उसकी ऊँचाई सिमटकर मात्र एक फुट रह गई ।  यह स्थिति किसी आपदा से कम नहीं है और यह हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करती है।

यात्रा के लिए निर्धारित 57 दिनों की अवधि के बीच में ही शिवलिंग का इस तरह विलीन हो जाना यह दर्शाता है कि हम प्रकृति के साथ किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं।  वैज्ञानिक और स्थानीय जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। इस साल कश्मीर घाटी में तापमान ने कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मई और जून के महीनों में पड़ी तेज धूप और गर्म हवाओं ने गुफा के आसपास के वातावरण को बुरी तरह प्रभावित किया।  इसके अलावा, पिछली सर्दियों में कम बर्फबारी हुई, जिससे गुफा के पास वह प्राकृतिक ठंडक नहीं बन पाई जो हिमलिंग को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए जरूरी होती है।

पिछले वर्षों के रुझानों को देखें तो यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। वर्ष 2024 में कश्मीर घाटी में जून-जुलाई के दौरान भीषण गर्मी की लहर देखी गई थी, जिसे हिमलिंग के जल्दी पिघलने का प्रमुख कारण माना गया।  इसी तरह, वर्ष 2025 में भी मौसमी अस्थिरता साफ दिखाई दी, जहाँ बर्फबारी के बाद न्यूनतम तापमान में 6 डिग्री तक का उछाल दर्ज किया गया, जो इस बात का संकेत है कि हिमालय में मौसमी पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं।  ये आँकड़े बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के मामले में दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है।

इस विषय पर एक बड़ी चुनौती सही डेटा के अभाव की भी है। अमरनाथ गुफा एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है, लेकिन वहाँ स्थायी रूप से काम करने वाले ऑटोमेटेड वेदर स्टेशनों का सार्वजनिक डेटा सीमित है।  भारतीय मौसम विभाग मुख्य रूप से 5 से 7 दिनों का पूर्वानुमान और जिला-स्तर के अपडेट देता है, न कि दशकों पुरानी क्लाइमेटोलॉजिकल सीरीज़।  इसी कारण शोधकर्ता और मीडिया अक्सर श्रीनगर, पहलगाम या अनंतनाग जैसे निकटवर्ती स्टेशनों के डेटा को आधार मानकर गुफा-स्तर के स्थानीय अवलोकनों—जैसे हवा, नमी और बर्फबारी—को जोड़ते हुए स्थिति का आकलन करते हैं।

सबसे गंभीर पहलू मानवीय हस्तक्षेप का है। अमरनाथ गुफा का तापमान वहाँ मौजूद ‘माइक्रोक्लाइमेट’ पर निर्भर करता है।  एक अध्ययन के अनुसार, गुफा के भीतर जाने वाला हर श्रद्धालु लगभग 100 वाट ऊष्मा उत्सर्जित करता है।  जब लाखों लोग वहाँ पहुँचते हैं, तो गुफा के अंदर की गर्मी और नमी खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है, जिससे बर्फ का शिवलिंग तेजी से पिघलने लगता है।  इसके ऊपर गुफा के आसपास होने वाली मशीनी गतिविधियाँ और शोर-शराबा भी वहाँ के तापमान को प्रभावित करते हैं, जिसका सीधा असर शिवलिंग के अस्तित्व पर पड़ता है। बढ़ती यात्रियों की संख्या के लिए सुविधाएँ जुटाने, वाहनों की अनुमति , पक्के निर्माण जैसे की कारण है जिसके चलते  अमरनाथ शिवलिंग समय से बहुत पहले सिमट गया ।

पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियरों का सिकुड़ना और बर्फबारी के बदले हुए पैटर्न इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि हम जलवायु संकट के बीच में खड़े हैं।  पवित्र हिमलिंग का निर्माण एक अत्यंत सूक्ष्म प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें छत से टपकने वाली जल-बूँदें जमाव बिंदु के नीचे के तापमान में शिवलिंग का आकार लेती हैं।  जब हम उस स्थान के स्थानीय तापमान में मानवीय गतिविधियों या अत्यधिक भीड़ के जरिए बदलाव लाते हैं, तो यह कुदरती प्रक्रिया ठप हो जाती है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी आस्था के प्रतीक को बचाने के लिए कुछ बदलाव के लिए तैयार हैं? हमें यह समझना होगा कि तीर्थयात्रा का अर्थ केवल वहाँ तक पहुँचना नहीं है; बल्कि उस स्थान के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखना भी है। इसके लिए विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करना अनिवार्य हो गया है।  हमें यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की दैनिक संख्या को नियंत्रित करना होगा; ताकि गुफा के भीतर का तापमान स्थिर रहे।  गुफा के आसपास मशीनों और अन्य यांत्रिक साधनों के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगानी होगी।  साथ ही, हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु को देखते हुए हमें अपनी विकासवादी सोच में बदलाव लाना होगा और जलवायु अनुकूलन पर जोर देना होगा।

आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। अगर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पवित्र धरोहर को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें विकास और दर्शन के नए और सतत तरीके खोजने होंगे। यह समय चेतने का है; क्योंकि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की कीमत अक्सर बहुत बड़ी चुकानी पड़ती है। क्या हम प्रकृति के इस नाजुक संतुलन को बनाए रखने के लिए अपनी जीवनशैली और यात्रा के तरीकों में बदलाव करने को तैयार हैं? हिमालय की गोद में बसी यह गुफा हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि हम धरती के मालिक नहीं; बल्कि इसके संरक्षक हैं। आने वाले वर्षों में हमारी रणनीति केवल तीर्थयात्रा के प्रबंधन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; बल्कि यह जलवायु सुरक्षा का एक बड़ा अभियान होनी चाहिए, ताकि हिमलिंग का यह पवित्र रूप भविष्य में भी श्रद्धालुओं को दर्शन देता रहे। ■ (indiaclimatechange.com से साभार)


Sep 4, 2026

जागरूकताः प्राथमिक आवश्यकता- न फैशन न दिखावा

 - लिली मित्रा

एक अच्छी आदत शुरू न कर पाने के कितने बहाने हम दे पाते हैं, हैरत होती है ! जितने बहाने हम सोचते हैं उतनी देर में शायद वो अच्छी आदत शुरू की जा सकती है... नहीं? मैने ये विचार कई बार किया है। फिर वो चाहे अपने स्वास्थ्य के प्रति अपना कर्तव्य हो या धरती माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का धर्म हो। और आप यदि बारीकी से सोचें तो पाएँगे कि - अधिकतर लोग इन दोनों ही मामलों में बहुत ढिलाई बरतते हैं।

ऐसा ही एक विषय है जो पृथ्वी की पारिस्थितिकी को बहुत तेजी से विषाक्त बना रहा है - प्लास्टिक कचरा।

      मुझमे ये जागरूकता आई तो चार - पाँच साल पहले पर इसे कार्यरूप में परिणीति मैं इस वर्ष दे पाई। वही बात कि - अच्छी आदतें शुरू न करने के सौ बहाने होते हैं हमारे पास। खैर मेरे इस संकल्प की परिणिति थोड़ी परिश्रमजन्य रही परन्तु परिणाम आत्मिक संतोष से परिपूर्ण है।

    करीब दो साल से मैने रसोई के गीले कचरे जैसे सब्ज़ी के छिलकों, चाय-कॉफी, अंडे के छिलकों आदि से जैविक खाद बनाना शुरू किया अब मुझे अपनी छोटी सी ही सही पर हरी -भरी  बगिया के लिए खाद मिल जाती है।

  इसी तरह अब  प्लास्टिक की पन्नियों, दूध - दही, तेल  की थैलियों, दंत -मंजन, कॉस्मेटिक वाले प्लास्टिक से बने हर तरह के कचरे को धोकर सहेज कर रखने की आदत हो गई है। फिर मैने सोशल मीडिया पर इनके उचित निस्तारण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का पता लगाया, और अब... मुझे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है...ये सोचकर कि मैं पृथ्वी की पारिस्थितिकी को और बुरी हालत में न जाने देने के लिए अपना अंशदान करने लगी हूँ, देर से ही सही ।

अपनी सोसाइटी में भी मैं इस आवश्यक जागरूकता को लाने का प्रयास करना शुरू किया है पर फिर वही बात... अच्छी आदतें न शुरू कर पाने के सौ बहाने। पर लोगों को ये समझना होगा कि इस विषय पर भाषणबाजी, लेखनबाजी करने का हक़ अब उसी का हो जिसकी दिनचर्या का हिस्सा धरती माँ के खस्ता स्वास्थ्य की तीमारदारी करना हो।

   इस लेख में स्व का उदाहरण सिर्फ इसलिए लिखा; क्योंकि  मेरे लिए अब ये दिन के तमाम कामों की तरह एक जरूरी काम है। ये विषय अब फ़ैशन या दिखावा नहीं, मेरी आपकी और हर एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं धर्म है। इसे पूजा - पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पालन किया जाना अनिवार्य है। ■

सम्पर्कः फरीदाबाद, हरियाणा

Jul 1, 2026

पर्यावरणः अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो!

 - अपर्णा विश्वनाथ

किंचित सही; लेकिन समय निकालिए और समझिए कि अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण (Recycling) को समझना आज के समय में हर एक के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि घरेलू अपशिष्ट के जिम्मेदार हम सभी हैं। इसलिए हमारा यह कर्तव्य है कि घरेलू अपशिष्टों के सही निपटान में अपना सहयोग दें।

अपशिष्ट पुनर्चक्रण मुख्य रूप से उपयोग किए जा चुके कचरे—जैसे पॉलिथीन, प्लास्टिक की बोतलें, एल्युमीनियम व स्टील के डिब्बे, कागज़-गत्ता, काँच, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और पुरानी बैटरियों—को संसाधित (process) करके नए उपयोगी उत्पाद बनाने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया पर्यावरण को बचाने के लिए की जाती है।

पर्यावरण में हमारे चारों ओर का वातावरण, पेड़-पौधे, छोटे-बड़े जीव-जंतु सभी शामिल है। हमारे द्वारा फैलाए अपशिष्ट पदार्थ इनके लिए कितने नुकसानदेह और प्राणघातक भी है कभी सोचा है आपने ?

किचन और घर की सफाई में यह नजरअंदाज करते हैं कि क्या हमने अपने घर के कचरे को सही जगह फेंका है? ऑफिस जाते हाथ में कचरे की पॉलिथीन चुपचाप कहीं भी रख देते हैं। बस अपने घर से दूर। गृहणियाँ रात का बचा बासी खाना पॉलिथीन में भर कर बाहर फेंक आती हैं। पीछे उसका क्या हुआ, कहाँ गया कचरा कोई मतलब नहीं।

अपने आस-पास नजरें फेरें तो सड़क किनारे, मैदानों, पार्कों के आसपास भोजन की तलाश में पॉलिथीन चबाते गाएँ और अन्य जीव दिख जाएँगे। यह मासूम जीव पॉलिथीन या अन्य पैकटों में बंद खाना जब बाहर निकालने में असमर्थ होते हैं और कोई विकल्प नहीं दिखता तो विवशतावश पूरी पॉलिथीन ही खा जाते हैं। पॉलीथीन

हम क्या अनर्थ कर रहे हैं? यह घटना हैरतअंगेज से ज्यादा हम लोगों के लिए शर्मनाक है। क्योंकि इसकी जिम्मेदारी समाज में रह रहे हरेक व्यक्ति की है जो कर्तव्य विमुख है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभाता है।

घटना जनवरी माह 2026 छत्तीसगढ़ की है। तबीयत बिगड़ने से एक गौ माता और बछड़े को भिलाई से रायपुर के राज्य स्तरीय पशु चिकित्सालय लाया गया। स्थिति ऑपरेशन तक आई। दो वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर संतोष आदिल (MVsc surgery ), डॉ नम्रता सिंह तथा अन्य सहयोगी कर्मचारियों की मदद से गाय और बछड़े का ऑपरेशन किया गया। घंटो मशक्कत के बाद गाय के पेट से पच्चीस किलो और बछड़े के पेट से ग्यारह किलो पॉलिथीन बाहर निकाला गया। सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह क्या परिस्थिति कर दी हम मानवों ने। ऐसा अमानवीय,

गैर-जिम्मेदाराना रवैया इन मूक प्राणियों के प्रति कहाँ तक उचित है?

उन मूक प्राणियों के  बचने की उम्मीद क्या ही हम कर सकते हैं! हम जैसे मतलबपरस्त लोग प्रार्थना करने के हकदार भी नहीं हैं।

अगर यह घटना आपको नहीं झकझोरती तो शायद यह बात जरूर परेशान करेगी कि आपके घर जिस गाय का दूध आ रहा है वह गाय सड़कों, मैदानों में इधर उधर फैले पॉलिथीन नहीं खाई होगी ! क्या आपके घर आया दूध शुद्ध है ? पॉलिथीन युक्त है पॉलिथीन मुक्त है"।

इस घटना को यहाँ लिखने का मकसद डराना नहीं; बल्कि चेतावनी है समय रहते सँभलने की। खुद के स्वास्थ्य और अपने आस-पास रह रहे जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधे की सुरक्षा की। क्योंकि उनमें भी प्राण है ।

थोड़ी भी संवेदना बाकी है आपमें तो सोचिएगा जरूर ! कूड़ा-करकट खासकर पॉलिथीन अपने घरों से अलग-अलग समेटकर पुनर्चक्रण के लिए दें।

हम मार्च 18 को विश्व पुनर्चक्रण दिवस मनाते हैं। हर बार नई थीम के साथ।  2026 का विषय है : "अपशिष्ट मत सोचो। अवसर सोचो! ” यह विषय आपको अपशिष्ट के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए प्रेरित करता है। अपशिष्ट को बेकार वस्तु समझने के बजाय, इसे कुछ नया बनाने के अवसर के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। कहते हैं ना एक पंथ दो काज। संवेदना और जिम्मेदारी एक सुंदर, स्वस्थ और टिकाऊ सामाजिक वातावरण के आधारस्तंभ हैं।

Jun 1, 2026

प्रकृतिः मौसम की मार से कराहती मानवता

 - पंकज चतुर्वेदी

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

भारत में मौसम का बदलता मिजाज और वैशाख के महीने में जेठ जैसी तपिश का अहसास होना अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे पारिस्थितिक संकट की चेतावनी है। अक्सर भीषण गर्मी और लू के लिए अल नीनो या वैश्विक जलवायु परिवर्तन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं; लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट काफी हद तक मानव-निर्मित है।

आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।

जब हम अपनी विकास योजनाओं के नाम पर हज़ारों हेक्टेयर प्राथमिक जंगलों, पहाड़ियों और जल निकायों को नष्ट करते हैं, तो हम अनजाने में उन प्राकृतिक ‘कूलिंग एजेंटों’ को खत्म कर देते हैं जो इस तपिश के खिलाफ हमारी एकमात्र सुरक्षा थे।

बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहाँ तापमान अब नियमित रूप से 48°C के स्तर को छूने लगा है। यह स्पष्ट है कि हमारी विकास की भूख ने धरती के प्राकृतिक थर्मोस्टेट को बिगाड़ दिया है।

इस मानव-निर्मित गर्मी की सबसे प्रत्यक्ष और क्रूर मार उन मजदूरों और सड़क किनारे काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ती है, जो इस ढाँचे का निर्माण कर रहे हैं। भारत के करोड़ों निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले और गिग-इकोनॉमी के कर्मचारी इस गर्मी को केवल एक आँकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक शारीरिक हमले के रूप में महसूस करते हैं। आँकड़ों के अनुसार, गर्मी के कारण भारत को 2030 तक अपने कुल कामकाजी घंटों का 5.8% हिस्सा खोना पड़ सकता है, जो लगभग 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है।

बांदा जैसे शहरों में, कंक्रीट और कोलतार की सड़कें गर्मी को सोखकर रात में भी उसे वापस छोड़ती हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव पैदा होता है और स्थानीय तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 5°C से 7°C तक अधिक बना रहता है।

नीतिगत स्तर पर मजदूरों के लिए ‘छाया का अधिकार’ या लू के दौरान काम के घंटों में बदलाव जैसे नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, जो हमारे विकास के उस अंधेपन को दर्शाते हैं जहाँ श्रम को एक जैविक इकाई के बजाय केवल एक मशीन समझा जाता है।

गर्मी का यह घातक रूप हमारी खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है। ‘थर्मल शॉक’ के कारण गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों के दाने दूध भरने की अवस्था में ही सूख रहे हैं, जिससे पैदावार में 15% से 25% तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। मिट्टी की नमी खत्म होने से उपजाऊ जमीन अब मरुस्थल में बदल रही है, फिर भी हमारी नीतियाँ सूखे क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा दे रही हैं।

इसी तरह, जंगलों के विखंडन और अवैध खनन ने वन्यजीवों के लिए भोजन  का संकट पैदा कर दिया है। छतरपुर और पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में, खनन के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप जंगली जानवरों का बस्तियों की ओर आना 40% तक बढ़ गया है। यह केवल मानव-पशु संघर्ष नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिक सुरक्षा चक्र का टूटना है जो इंसानों और जानवरों को एक साथ सुरक्षित रखता था।

वर्तमान ‘हीट एक्शन प्लान’ (एच ए पी) की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वे केवल शहरों में मौतों को रोकने पर केंद्रित हैं, जबकि जमीन, जल और मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं। अब समय आ गया है कि नीतिगत स्तर पर ‘वन हेल्थ’ के दृष्टिकोण को अपनाया जाए, जहाँ मिट्टी की नमी, पशुधन का स्वास्थ्य और वन्यजीवों का संरक्षण एक ही इकाई के रूप में देखा जाए।

हमें केवल वृक्षारोपण की रस्म अदायगी से ऊपर उठकर बुंदेलखंड के चंदेलकालीन तालाबों जैसे पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र को पुनर्जीवित करना होगा। ये तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी को ठंडा रखने के विकेंद्रीकृत साधन थे।

नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि राजमार्गों के लिए काटे गए पेड़ केवल लकड़ी नहीं थे, बल्कि वे उस सूक्ष्म-जलवायु का हिस्सा थे जो फसलों को झुलसने से बचाती थी।

हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। बुंदेलखंड में पत्थर खनन के लिए काटी गई हर पहाड़ी और उत्तराखंड में कंक्रीट के विस्तार के लिए नष्ट की गई हरियाली हमारे भविष्य की ठंडी हवाओं को रोक रही है।

आर्थिक लाभ की तुलना में गर्मी के कारण होने वाला स्वास्थ्य और कृषि का नुकसान कहीं अधिक है। भविष्य की नीतियों की सफलता अब इस जवाबदेही पर टिकी है कि हम बुनियादी ढांचे के निर्माण में ‘ग्रीन इंजीनियरिंग’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पर्यावरण नियमों की अनदेखी को कब बंद करते हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। तभी हम इस मानव-निर्मित भट्टी से बाहर निकल पाएँगे और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसी धरती दे पाएँगे जो केवल झुलसती नहीं, बल्कि जीवन भी प्रदान करती है। (Indiaclimatechange.com)

मौसमः सूरज के तीखे होते तेवर

  - प्रमोद भार्गव

देश के ज्यादातर भूभाग पर अँगड़ाई लेता पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। दिल्ली राजधानी क्षेत्र समेत समूचा मध्य व उत्तर भारत इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। 25 मई को सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही नौतपा शुरू हो गया था, हालांकि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार धरती का अधिक तपना अच्छी बारिश का संकेत है। मौसम विभाग भी नौतपा में भीषण गर्मी बता रहा है। सनातन पंचांग में उल्लेख मिलता है की इन नौ-दिनों में एक ऐसा समय भी आता है जब सूर्य अपनी सबसे तीव्र ऊर्जा के साथ पृथ्वी पर प्रभाव डालता है। फलतः गर्मी चरम पर पहुँच जाती है। 

   इस परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिकों की मानें तो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक ताकतवर महा-अलनीनो आकर ले रहा है। यह 1877 के बाद सबसे विध्वंसकारी मौसमी आपदा साबित हो सकता है। इसका सीधा असर भारत में देखने को मिल सकता है। क्योंकि अल-नीनो भारत की जीवन रेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को भी प्रभावित कर सकता है। मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काई मेट के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर ऊष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों में मँडरा रहा है।

 इस समय दिल्ली, उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को ऊष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लंबे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। इस समय बर्तन के एक ढक्कन की तरह गर्म हवा ऊष्मा को नीचे धरती की तरफ दबाए रखती है, जो तेज गर्मी का कारण बन जाती है। नतीजतन ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू बनी रहती है। गर्मी की इस प्रचंड स्थिति को ग्लोबल वार्मिंग का कारण बताया जा रहा है।   

     इस बार गर्मी का मिजाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आधे भारत में बढ़ा तापमान  लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहाँ तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पाँच दिन तक यही स्थिति यथावत् बनी रहे तो इसे ‘लू‘ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आँकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएँ आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है।

       धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो उसके लू उतारने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते ठंडा नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति को बौरा (पागल) भी सकता है। वैसे शरीर में प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करने का काम मस्तिष्क में ‘हाइपोथैलेमस‘ अर्थात ‘अधष्चेतक‘ क्षेत्र करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पीयूष ग्रंथि के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को अंतःस्रावी प्रक्रिया के माध्यम से तापमान को संतुलित बनाए रखना होता है। इसे चिकित्सा शास्त्र की भाषा में हाइपरपीरेक्सिया कहते हैं। यानी शरीर के तापमान में असमान वृद्धि या अधिकतम बुखार का बढ़ जाना। इसकी चपेट में बच्चे और बुजुर्ग आसानी से आ जाते हैं।

   बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है, तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निष्क्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी यानी डी-हाईड्रेशन के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियाँ जानलेवा होती हैं। इस स्थिति के निर्माण हो जाने पर बुखार उतारने वाली साधारण गोलियाँ काम नहीं करती हैं; क्योंकि ये दवाएँ दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं। जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।

       हवाएँ गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाशीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पाँचवाँ तत्त्व यूँ ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्त्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवतः आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्व का वजूद क्षीण होगा, तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे ब्रह्म तत्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है; क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देश भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया की छत यानी ओजोन परत में छेद को चौड़ा करने में लगे हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा, वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहाँ खेत बंजर हो जाएँगे। पालतू मावेशी और वन्य जीव गर्मी से तड़प-तड़पकर प्राण छोड़ने लग जाएँगे, जो मानव समुदाय अभावग्रस्त हैं, उन पर गर्म हवाओं का यह दबाव कहर बनकर टूटेगा। यह जानलेवा भी साबित होगा।

       संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत प्रत्येक वर्ष चुकानी पड़ेगी। इनसे करीब सालाना 15.6 लाख करोड़ की हानि उठानी पड़ सकती है। साफ है, वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी एकाएक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, फिर सूखे का कहर यही संकेत दे रहे हैं। आँधी, तूफान और फिर यकायक ज्वालामुखी के फटने की हैरतअंगेज घटनाएँ भी यही संकेत दे रही हैं कि अदृश्य खतरे इर्द-गिर्द ही कहीं मंडरा रहे हैं। समुद्र और अंटाकर्टिका जैसे बर्फीले क्षेत्र भी इस बदलाव के संकट से दो-चार हो रहे हैं। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है। पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। इसके इतर मानवजनित गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का 50 फीसदी भाग भी समुद्र की गहराइयों में समा गया है। इस अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड के जमा होने के कारण अंटार्कटिका के चारों ओर फैले दक्षिण महासागर में इस कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की क्षमता निरंतर कम हो रही है। इस स्थिति का निर्माण खतरनाक है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवशोषित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरनाक होगा।

अलनीनो की चपेट में मौसम

 जून के आरंभ में यदि समुद्र तट का तापमान बढ़कर 0.50 डिग्री हो जाता है और यह वृद्धि आगे भी बनी रहती है तो मौसम पर अल-नीनो का प्रभाव दिखाई देने लगता है।  भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पास अलनीनो के हालात बनना शुरु हो गए हैं। धीरे-धीरे समूचे दक्षिणी गोलार्द्ध को अपनी चपेट में लेने की ओर अग्रसर है । असल में उष्णकटिबंधीय प्रशांत और भूमध्यीय क्षेत्र के सागर में यदि तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव आता है तो इससे उत्पन्न होने वाली समुद्री घटना को ही ‘अलनीनो’ या ’एल-नीनो’ प्रभाव कहा जाता है। यह घटना दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतर से घटित होती है।  नतीजतन समुद्र के सतही जल का तापमान सामान्य  से अधिक हो जाता है और अल-निनो वजूद में आ जाता है। एल निनो स्पेनिश भाषा का शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘उत्पाती छोटा बालक’। अलनीनो का एक प्रभाव यह भी होता है कि वर्षा के क्षेत्रों में परस्पर परिवर्तन जैसे हालात दिखाई देते हैं। मसलन ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होती है। कम वर्षा अथवा अल-नीनो की चपेट में आए मानसून के कारण खेती योग्य कुल कृषि भूमि का 60 फीसदी हिस्सा सूखे के प्रभाव में आ जाता है। इस संकट का कहर किसानों और कृषि पर केंद्रित जनसमुदायों को झेलना होता है। यहाँ यह  भी ध्यान रखने की जरुरत है कि बीते 111 सालों के भीतर जो 20 भयानक सूखे पड़े हैं, उनकी पृष्ठभूमि में अल-नीनो का प्रभाव ही रहा है। 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.), मो. 09425488224-9981061100

तापमानः जम्मू-कश्‍मीर की वादियों पर हीटवेव का प्रकोप

  -  अजय मोहन

जम्मू-कश्‍मीर में जो तपिश जून के मध्‍य में आनी थी, वो मई में ही आ चुकी है। जून की सोच कर लोगों में अभी से भय है। ऊपर से बढ़ती गर्मी के कारण यहाँ के तमाम झरनों और अन्य जल स्रोतों अभी से संकट मँडराने लगा है।

वर्ष 2026 में गर्मी का यह मौसम एक के बाद एक रिकार्ड तोड़ रहा है। पहले अप्रैल में हीटवेव की घटनाओं का चढ़ता ग्राफ और फिर मई महीने में तमाम शहरों में तापमान 45 के पार पहुँचा। बढ़ती गर्मी का असर अब जम्मू-कश्‍मीर की वादियों तक पहुँच गया है। 20 मई को श्रीनगर में 30.7 डिग्री और जम्मू में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ। दोनों ही शहर धीरे-धीरे अपने ऑल टाइम हाई तापमान की ओर बढ़ते दिखाई दिए। श्रीनगर और जम्मू के साथ-साथ राज्य के 9 जिलों में हीटवेव का प्रकोप जारी है।

इस बढ़ते तापमान ने केवल जन-जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि घाटी में बहने वाले झरनों और पीने के पानी पर चिंता बढ़ा दी है।  

जम्मू-कश्‍मीर के विभिन्न जिलों में 10 साल का तापमान रिकॉर्ड 

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस साल मई में सबसे अधिक 30.7 डिग्री तापमान दर्ज हुआ। जबकि मई 2025 में 34.4°C दर्ज किया गया था। पिछले वर्ष मई का महीना बीते 10 वर्षों में सबसे गर्म था। हालाकि श्रीनगर में मई माह में सबसे अधिक तापमान 1968 में दर्ज हुआ था। तब यहाँ पारा 36.4 डिग्री पहुँच गया था। 

2016-2024 के बीच दर्ज सभी अधिकतम तापमानों से अधिक है। इससे पहले पिछले दशक में सबसे अधिक तापमान 32.7°C (2024) और 31.9°C (2016) रहा था। चिंताजनक बात यह है कि श्रीनगर का मई माह का दीर्घकालिक औसत अधिकतम तापमान (24.7°C) से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है।

श्रीनगर के निवासी व वरिष्‍ठ पत्रकार वाहिद भट्ट ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि आम तौर पर इतनी गर्मी जून के मध्‍य में पड़ती है। यहाँ के लोगों को इतनी गर्मी सहने की आदत नहीं है इसलिए लोग परेशान हैं। बीते एक सप्ताह में तो केवल दिन नहीं बल्कि रातें भी गर्म थीं। कल बहुत अधिक गर्मी के बाद जब बारिश हुई तो अचानक ह्यूमिडिटी बढ़ गई और पसीने वाली गर्मी शुरू हो गई। 

घाटी के अन्य शहरों में भी बढ़ा पारा

मौसम विभाग के अनुसार जब किसी पहाड़ी क्षेत्र का तापमान 30 डिग्री के पार पहुँच जाता है तब वहाँ हीटवेव दर्ज कर ली जाती है। श्रीनगर क्षेत्र के अन्य केंद्रों की बात करें तो काज़ीगुंड (अनंतनाग जिले में मौसम का स्टेशन) और पुलवामा जिले में स्थित कोनीबल में पारा 30 डिग्री के पार जा चुका है। वहीं कुपवाड़ा (28.3) और कोकेरनाग (29.2) हीटवेव के करीब पहुँच चुके हैं। कोकेरनाग अनंतनाग जिले में स्थित एक स्टेशन है।  

वहीं जम्मू संभाग में सभी केंद्र हीटवेव की न्यूनतम सीमा को पार कर चुके हैं। जम्मू में 42 डिग्री, बनिहाल (रामबन) में 31, बटोटे में 30.6, रियासी जिले के कटरा में 39 डिग्री, भदरवाह में 30.4 और कठुआ में 43.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ।   

 2016 से 2025 में अधिकतम और न्यूनतम तापमान 

यदि पिछले दस वर्षों के आँकड़ों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कश्मीर घाटी के अधिकांश स्टेशनों में मई के अधिकतम तापमान 30°C से ऊपर पहुँचने लगे हैं। अधिकांश जगहों का तापमान सामान्य से 5 डिग्री अधिक है। पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले क्षेत्रों, जैसे पहलगाम, गुलमर्ग और बनिहाल में भी तापमान लगातार ऊँचे स्तर छू रहा है। कई स्थानों पर तापमान अपने सर्वकालिक रिकॉर्ड के करीब पहुँच चुका है। सामान्य अधिकतम तापमान और वास्तविक तापमान के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है।

जम्मू-कश्‍मीर में बढ़ती गर्मी के संभावित प्रभाव

जलवायु वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। जम्मू-कश्मीर के हालिया तापमान आँकड़े इसके स्पष्‍ट सबूत हैं। इनके प्रभाव इस प्रकार हैं- 

• ग्लेशियरों और हिमनदों पर दबाव बर्फ के तेजी से पिघलने की संभावना बढ़ेगी। शुरुआती महीनों में नदियों में अधिक जल प्रवाह और बाद में जल उपलब्धता में कमी आ सकती है। 

• बढ़ते तापमान की वजह से झेलम और चिनाब बेसिन के जल चक्र पर असर पड़ सकता है।

• बागवानी और कृषि की बात करें तो सेब, चेरी, अखरोट और खुबानी जैसी फसलों को आवश्यक "चिलिंग आवर्स" कम मिल सकते हैं। फलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

• समय से पहले फूल आने और बाद में मौसम की मार से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

• झरनों और छोटे जल स्रोतों का प्रवाह घट सकता है। ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट बढ़ सकता है। भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है।

• ऊँचाई वाले क्षेत्रों की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के आवास बदल सकते हैं। कुछ प्रजातियों को और ऊँचे इलाकों की ओर पलायन करना पड़ सकता है।

झरनों और पेयजल स्रोतों पर बढ़ता संकट

जम्मू-कश्मीर में 6,553 गाँव हैं जहाँ 3,300 से अधिक मीठे पानी के झरने व जलधाराएँ हैं। अधिकांश गाँव पीने के पानी के लिए इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन बीते दो दशकों में आधी से अधिक जलधाराएँ या तो सूख चुकी हैं या फिर छोटी हो गई हैं। 

इस बारे में वाहिद भट्ट ने बताया कि दूर-दराज़ के गाँवों में जलधाराएँ तेजी से प्रभावित हो रही हैं। श्रीनगर के मनगुंड गाँव का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा, “मैं हाल ही में मनगुंड गाँव गया था। वहाँ लोगों से बातचीत में पता चला कि तीन स्प्रिंग ऐक्टिव थे, अब एक ही एक्टिव है। इसमें भी पानी बहुत कम है। जो धाराएँ सूख भी जाती थीं, वहाँ पहले अप्रैल के मध्‍य में पानी आना शुरू हो जाता था; लेकिन अब मई में भी पानी नहीं है।”

रीचार्ज नहीं हो पा रहे भूजल के स्रोत 

जम्मू-कश्मीर में हजारों गाँवों की पेयजल व्यवस्था प्राकृतिक झरनों पर निर्भर है। पिछले कुछ वर्षों में कई झरनों के जल प्रवाह में कमी दर्ज की गई है। बढ़ता तापमान इस समस्या को और गंभीर बना सकता है। सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में तेज बर्फ पिघलने से भूजल पुनर्भरण यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज प्रभावित होता है।

ऊँचे तापमान के कारण मिट्टी से वाष्पीकरण बढ़ता है, जिससे झरनों को पोषित करने वाली भूमिगत नमी कम हो जाती है। कई मौसमी झरने समय से पहले सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट गहरा सकता है। डायलॉग अर्थ में प्रकाशित एक अध्‍ययन के अनुसार कश्‍मीर निरंतर गर्म हो रहा है, जिसकी वजह से यहाँ के जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं। 1980 से लेकर अब तक राज्य के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 के बाद से गर्मी के दिन पहले से अधिक गर्म हुए हैं। 

अध्‍ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है और बीते दो दशकों में  ग्लेशियर 15 प्रतिशत तक सिकुड़ गए हैं। इस वजह से गर्मी का मौसम आते ही प्राकृतिक झरने तेज़ गति से सूख जाते हैं।

हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कैसे पड़ रहा है बढ़ते तापमान का असर?

लखनऊ के जय नारायण पीजी कॉलेज में प्रोफेसर व इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी के काउंसिलर डॉ. चांटिया ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि चूँकि सभी नदियों का प्रमुख स्रोत भूजल होता है और तापमान बढ़ने की वजह से भूजल रिचार्ज धीमा पड़ जाता है और इसके कारण आने वाले समय में हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों का प्रवाह कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जब- जब नदियों के प्रवाह में कमी आती है, तब- तब उसका असर उसके तटों पर बसी मानव सभ्‍यता पर पड़ता है। 

जम्मू-कश्‍मीर में रह रहे लोगों पर कैसे होगा बढ़ते तापमान का असर?

डॉ. आलोक चांटिया एक मानवशास्त्री हैं। उन्होंने बताया कि तापमान का सीधा असर मनुष्‍य के शरीरिक और मा‍नसिक व्यवहार पर भी पड़ता है। आम तौर पर जो लोग मैदानी इलाकों में रहते हैं, उनका शरीर अधिक तापमान को कुछ हद तक झेलने में सक्षम होता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 30 से 40 डिग्री का तापमान असहनीय हो जाता है। शरीर का अंतरिक तापमान जो 37 डिग्री सेल्सियस रहता है वे शरीर की थर्मोस्‍टेट के कारण संतुलित रहता है, लेकिन हीटवेव के कारण जो गलन ऊष्‍म बढ़ती है उसकी तपिश के कारण डीहाइड्रेशन की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है जिससे शरीर में पानी की न्यूनतम क्षमता को पूरा करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में स्‍वास्थ्‍य संबंधी परेशानियाँ बढ़ सकती हैं। (इंडिया वाटर पोर्टल)

Dec 3, 2025

पर्यावरणः क्या हम समय रहते हिमालय को बचा पाएँगे?

 - कविता भारद्वाज

हिमालय पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे नवीन और नाज़ुक पर्वत शृंखलाओं में से एक है लेकिन हम उसके साथ ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे कि उसमें असीम लचीलापन और सहिष्णुता है। विकास के नाम पर धमाके कर-करके पहाड़ों को चोटी-दर-चोटी उड़ाया जा रहा है, सुरंगें खोद-खोदकर सड़कें बनाई जा रही हैं, एक के बाद एक पनबिजली परियोजनाओं और पर्यटन स्थलों का निर्माण हो रहा है।

लेकिन हम यह भूल रहे हैं कि हिमालय केवल हमारी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए धरातल नहीं बल्कि एक जीवित तंत्र है। किसी भी प्रकार का विस्फोट, ढलान को समतल करने का हर प्रयास, हर कटा हुआ पेड़ इन पहाड़ों को कमज़ोर कर रहा है और धीरे-धीरे उन्हें बिखरने की कगार पर ला रहा है।

जो लोग इन पहाड़ों में पले-बढ़े हैं, उनके लिए ये केवल पत्थरों के ढेर नहीं, बल्कि घर और इतिहास है। यही पर्वत अनगिनत पक्षियों, जीवों और नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्रों का आश्रय है। जब हम जंगल काटते हैं या नदियों को बांधते हैं, तो हम केवल संसाधनों को नहीं खोते, बल्कि अपने घर, अपनी सुरक्षा और अपनी भावनाओं का एक हिस्सा भी खो देते हैं।

अव्यवस्था और विनाश-

जब जंगल साफ किए जाते हैं, झीलें या दलदली ज़मीन सुखा दी जाती हैं, और पहाड़ी ढलानों को अस्त-व्यस्त कर दिया जाता है, तो समूचे पारिस्थितिक तंत्र अपना संतुलन खो देते हैं। इसके बाद आने वाली बाढ़, भूस्खलन और भू-क्षरण इंसानों और जानवरों दोनों को प्रभावित करते हैं।

अगस्त 2025 में उत्तरकाशी के धराली गाँव का एक बड़ा हिस्सा मिट्टी और मलबे के सैलाब में दब गया। इसी साल हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भी कई ऐसे हादसे हुए जिन्होंने, कुछ समय के लिए ही सही, पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। आज, महीनों बाद भी वहाँ के लोग अपने घर और ज़िंदगी दोबारा बसाने के लिए जूझ रहे हैं।

ये आपदाएँ हमें तीन परस्पर सम्बंधित बातों का संकेत देती हैं: पहाड़ बहुत नाज़ुक हैं, मौसम का मिज़ाज अब पहले से ज़्यादा उग्र व इन्तहाई हो गया है, और इंसान हालात को बदतर कर रहे हैं।

अचानक आने वाली विशाल बाढ़ें अक्सर बादल फटने (बारिश बम) के कारण होती हैं- जब ऊँचे पहाड़ मानसूनी बादलों को सारा पानी एकसाथ बरसाने पर मजबूर कर देते हैं। चूंकि अब हवा पहले से ज़्यादा गर्म है, इसलिए उसमें नमी धारण करने की क्षमता ज़्यादा है (जो जलवायु विज्ञान का एक अहम सिद्धांत है), जिससे ऐसी बादल फटने की घटनाएँ ज़्यादा मर्तबा होती हैं और पहले से अधिक उग्र हो गई हैं।

इसी के साथ बढ़ती गर्मी हिमनदों को तेज़ी से पिघला रही है, जिससे ग्लेशियर-जनित झीलें अस्थिर होकर फूट जाती हैं और पानी, बर्फ और चट्टानें नीचे की ओर बह निकलते हैं।

इंसानी दखल से यह प्राकृतिक खतरा और भी बढ़ जाता है। जंगलों की कटाई, बिना सोचे-समझे सड़कों और बांधों का निर्माण पहाड़ों की ढलान को कमज़ोर कर देता है, जिससे भारी बारिश एक निश्चित आपदा में बदल जाती है।

जलवायु जोखिम का केंद्र-

जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (IPCC) की छठी रिपोर्ट उस बात की पुष्टि करती है जिसकी आशंका पहाड़ी समुदायों को पहले से थी। मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएँ अब पहले से कहीं अधिक हो रही हैं।

1980 के दशक से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बाढ़ की घटनाएँ चार गुना और उत्तरी मध्य अक्षांश इलाकों में ढाई गुना बढ़ी हैं। अगर तापमान 3–4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है, तो नदियों की बाढ़ों से प्रभावित लोगों की संख्या दुगनी हो सकती है, और कुल नुकसान (1.5 डिग्री सेल्सियस वृद्धि की तुलना में) चार से पाँच गुना तक बढ़ सकता है। यानी डिग्री का एक-एक अंश भी बहुत मायने रखता है। 

हिमालय के लिए इसका क्या अर्थ है? एयर कंडीशनर, गाड़ियों और जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल के नतीजे में बढ़ता तापमान हिमनदों को तेज़ी से पिघला रहा है, अस्थिर झीलें बन रही हैं, और बादल फटने व अचानक होने वाली तेज़ बरसातों को बढ़ावा मिल रहा है। विश्व मौसमविज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार वाहनों से निकलने वाला धुआँ और शहरों की गर्मी हिमालयी कस्बों में स्थानीय तापमान को बढ़ाते हैं, जिससे हिमनदों (ग्लोशियर) के पिघलने की रफ्तार और तेज़ होती है।

इसके साथ ही, विकास के नाम पर लगातार पेड़ों की कटाई ने उन प्राकृतिक सोख्ताओं (‘स्पंज’) को नष्ट कर दिया है जो कभी बारिश का पानी सोखकर मिट्टी को थामे रखते थे। अब जब जंगल, आर्द्रभूमि और उपजाऊ मिट्टी नष्ट हो रही हैं, तो हर मानसूनी लहर पहाड़ों से तेज़ी से नीचे उतरती है और तबाही मचा देती है।

जलवायु परिवर्तन का तनाव बढ़ने के साथ हिमालय का पारिस्थितिक तंत्र अपना प्राकृतिक सुरक्षा कवच खो रहा है। आज बादल फटने की कोई भी घटना तुरंत विनाशकारी बाढ़ में बदल सकती है; तेज़ बारिश भूस्खलन को जन्म दे सकती है; यहाँ तक कि मामूली तूफान भी अब भारी तबाही ला सकते हैं।

मानव-जनित तबाही इन समस्याओं को और बढ़ा रही है। नाज़ुक ढलानों पर विस्फोट करके सड़कों का निर्माण, बिना जलवायु जोखिम आकलन के पनबिजली परियोजनाओं और अनियंत्रित पर्यटन ने पहाड़ों को बेहद असुरक्षित बना दिया है। हर निर्माण कार्य हिमालय की उस स्वाभाविक मज़बूती को कम करता है जिस पर वह हज़ारों सालों से टिका रहा है।

हिमाचल प्रदेश का बेकर गाँव ऐसे ही एक तूफान में सिर्फ बह नहीं गया था बल्कि एक चेतावनी बन गया: अगर हम खोखले पहाड़ों को और खोखला करते रहेंगे, तो वे हमें बचा नहीं पाएँगे। हमारे पास दो ही विकल्प हैं: या तो हम इन पहाड़ों को विकास के बोझ से ढहा दें, या समझदारी से उनका सम्मान करते हुए पुनर्निर्माण करें।

तीन आवश्यक कदम

हिमालयी इलाकों और वहाँ के लोगों को बचाने के लिए तीन फौरी कदम उठाने की ज़रूरत है। ये केवल सैद्धांतिक नीतिगत सुझाव नहीं हैं। ये वास्तविक अनुभवों पर आधारित अनिवार्यताएँ हैं जो हमने सालों तक इस भूमि पर रहकर और इसके तेज़ी से बिगड़ते हालात को देखकर समझी हैं।

1. ऊँचाई वाले इलाकों में विस्फोट और निर्माण पर सीमा लगाएँ: नाज़ुक पर्वतीय क्षेत्रों में विकास कार्य जलवायु जोखिम और पारिस्थितिक मूल्यांकन (ecological assessment) की कसौटी पर खरे उतरने पर ही हाथ में लिए जाएँ। अगर सड़कें, बांध या इमारतें पहाड़ों की स्थिरता को नुकसान पहुँचा रहे हैं, तो उन्हें दोबारा डिज़ाइन किया जाए या किसी सुरक्षित जगह पर स्थानांतरित किया जाए।

इसके लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों को बिना किसी अपवाद के पर्यावरणीय कानूनों का सख्ती से पालन करना होगा। किसी भी ढलान को समतल करने या उसमें सुरंग बनाने का निर्णय लेते समय इंसानी और पर्यावरणीय सुरक्षा दोनों का ध्यान रखना अनिवार्य होना चाहिए।

2. प्राकृतिक अवरोधों की बहाली: हमें अपने प्राकृतिक सुरक्षा कवच को फिर से मज़बूत करना होगा। इसका मतलब है नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में फिर से जंगल लगाना, आर्द्रभूमियों और ऊँचाई वाले घास के मैदानों (alpine meadows) की रक्षा करना, और मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखना। ये प्राकृतिक तंत्र बारिश का पानी सोखते हैं, बाढ़ का प्रभाव कम करते हैं और पहाड़ों की ढलानों को थामते हैं; यह सुरक्षा व्यवस्था किसी भी कॉन्क्रीट की दीवार से ज़्यादा प्रभावी होती है।

हर पेड़ लगाना, हर घास के मैदान को बचाना, हमारे भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक कदम है। इसके लिए स्थानीय समुदायों और सरकार, दोनों को मिलकर काम करना होगा। स्थानीय लोग अपनी भूमि को सबसे अच्छी तरह जानते हैं, और सरकार को इन महत्वपूर्ण प्रयासों को आर्थिक और नीतिगत समर्थन देना चाहिए।

3. पनबिजली और ऊर्जा योजनाएँ जलवायु के अनुरूप बनें: पनबिजली परियोजनाओं का आकलन केवल लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि जलवायु सुरक्षा (climate resilience) के दृष्टिकोण से होना चाहिए- जैसे वे हिमनद झील फटने या बादल को कैसे प्रभावित करती हैं।

साथ ही, वाहन प्रदूषण को कम करना, अत्यधिक ऊर्जा खर्च करने वाली ठंडक प्रणालियों को नियंत्रित करना, और टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना ज़रूरी है। इससे ग्लेशियरों का पिघलना धीमा होगा और अचानक भारी वर्षा की घटनाएँ कम होंगी।

वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी वैसे तो पूरे विश्व समुदाय की है, लेकिन भारत को इसमें अग्रणी भूमिका निभानी होगी; खासकर हिमालय जैसे सबसे ऊँचे और नाज़ुक क्षेत्र में हरित ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देकर। 

अगर इन कदमों को न अपनाया गया, तो हिमालयी पर्वत जवानी में ही मर जाएँगे। लेकिन अगर हम आज से ही टिकाऊ बदलाव (sustainable change) को अपनाएँ, तो ये पर्वत, यहाँ का वन्य जीवन और यहाँ के लोग आने वाली कई सदियों तक सुरक्षित जीवन जी सकते हैं। आइए, हम सब मिलकर ऐसा हरित भविष्य बनाएँ, जहाँ हर छोटा कदम और हर महत्त्वाकांक्षा प्रकृति के प्रति सम्मान पर आधारित हो। (स्रोत फीचर्स)

Oct 1, 2025

पर्यावरणः तेज़ आवाज़ औरडी आपके कान

 - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

हमारे सभी त्यौहार हमें खुशी-उल्लास देते हैं, लेकिन हमारा दीपों का यह त्योहार साथ में बहुत ज़्यादा शोर भी देता है। सल्फर डाईऑक्साइड जैसे हानिकारक उत्सर्जन को कम करने और पटाखे फोड़ने पर होने वाले शोर को कम करने के लिए ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल करने की लगातार अपील की जाती है। इन्हें सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत निर्देशों, जैसे लड़ियों वाले पटाखों के निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध, के ज़रिए अनिवार्य किया है; लेकिन हर साल इस त्यौहार के मौसम में पटाखों की तेज़ आवाज़ें गूँजती रहती हैं।

लोगों की चिंता पटाखों के कारण होने वाले वायु प्रदूषण पर केंद्रित रहती है: लेकिन उतनी ही चिंता की बात यह है कि बहुत तेज़ आवाज़ या धमाके हमारी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पटाखों से इतर, साल भर होने वाले शोर या ध्वनि प्रदूषण पर अन्य तरह के प्रदूषण की तुलना में कम ध्यान दिया जाता है। ऐसा लगता है कि शोर को हमारे आसपास के पर्यावरण के हिस्से के रूप में अधिक आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है, खासकर तब जब यह शोर आप स्वयं पैदा कर रहे हों।

ध्वनि तरंगों के माध्यम से आगे बढ़ती है। इन तरंगों में ऊर्जा होती है। जितनी अधिक ऊर्जा होगी, उतनी ही ज़्यादा तीव्र तरंग होगी और उतनी ही तेज़ आवाज़ होगी। ध्वनि की तीव्रता मापने के लिए डेसिबल (डीबी) पैमाने का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक लघुगणकीय पैमाना है, इसलिए जब ध्वनि स्तर 10 डेसिबल बढ़ता है तो इसका मतलब होता है कि ध्वनि की तीव्रता दस गुना बढ़ गई है। डीबी पैमाने पर, मानव श्रवणशक्ति की शुरुआत 0 डीबी पर सेट की गई है। एक फुसफुसाहट की ध्वनि की माप इस पैमाने पर 30 डेसिबल आती है, और सामान्य बातचीत की ध्वनि की माप 60 डेसिबल।

तेज़ धमाके के साथ फूटने वाले पटाखे की ध्वनि तीव्रता, 10 फीट दूर मापने पर, 140 डेसिबल आती है। यह तीव्रता कान के कॉक्लिया (आंतरिक कान में एक सर्पिलाकार रचना जो ध्वनि तरंगों को विद्युत संकेतों में बदलती है) में मौजूद रोम कोशिकाओं को आसानी से नुकसान पहुँचा सकती है। कॉक्लिया कान के परदे के माध्यम से कंपन प्राप्त करता है और फिर रोम कोशिकाएँ उन्हें तंत्रिका संकेतों में बदल देती हैं। इन रोम कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने से वे ध्वनि के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं। नतीजतन, रोम कोशिका द्वारा प्रतिक्रिया करने और तंत्रिका संकेतों को मस्तिष्क तक भेजने के लिए तेज़ या ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है। रोम कोशिकाएँ मध्यम आवाज़ के असर के बाद कुछ हद तक ठीक हो सकती हैं। लेकिन हमारी त्वचा कोशिकाओं के विपरीत, ये कोशिकाएँ पुनर्जनन में असमर्थ हैं। इसलिए बार-बार होने वाले आघातों से उबरना इन कोशिकाओं के लिए मुश्किल हो सकता है। नतीजतन, लगातार तेज़ शोरगुल के कारण सुनने की क्षमता घट सकती है।

छोटे बच्चों के संवेदनशील कानों के लिए तेज़ आवाज़ें एक गंभीर खतरा हैं, क्योंकि सुनने की क्षमता में मामूली कमी भी उनकी सीखने की क्षमता को कम कर सकती है। शोर के अत्यधिक संपर्क के कारण होने वाला ध्वनि आघात अक्सर कान बजने (टिनिटस) की समस्या पैदा करता है, जिसमें कहीं कुछ आवाज़ न होने पर भी आपको कानों में सीटी बजने सी आवाज़ सुनाई देती रहती है। यह ‘सीटी की आवाज़' क्षतिग्रस्त रोम कोशिकाओं की असामान्य विद्युत गतिविधि का संकेत है। आम तौर पर, यह आवाज़ कम हो जाती है, लेकिन लंबे समय तक लगातार शोर- शराबे के संपर्क में रहने से यह आपके जीवन का स्थायी लक्षण बन सकती है। बेशक, टिनिटस बुज़ुर्गों को भी हो सकता है, जो उम्र से सम्बंधित क्षति के कारण पैदा होता है।

लंबे समय तक मध्यम- तीव्रता वाली आवाज़ों (शोरगुल) के संपर्क में रहने से भी सुनने की क्षमता ठीक वैसे ही कम हो सकती है, जैसे तेज़ आवाज़ें सुनने से होती है। भारतीय शहरों की सड़कों पर यातायात का शोर एक दिन में 60 से 102 डेसिबल तक मापा गया है। साल 2008 में इंडियन जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसिन में हैदराबाद शहर के यातायात पुलिसकर्मियों पर किया गया एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। अध्ययन में पाँच साल की सेवा के बाद सभी ट्रैफिक पुलिसकर्मियों में सुनने की क्षमता में कमी पाई गई थी, ऐसे ही नतीजे सुब्रतो नंदी और सारंग धात्रक को भारत में व्यावसायिक शोर पर किए गए सर्वेक्षण में मिले थे। 

इयरप्लग जैसे निवारक उपाय सुनने की क्षमता में कमी के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। निर्माण उद्योग जैसे कुछ पेशों में ज़रूरत के अनुसार इयरप्लग अपनाए जा रहे हैं, लेकिन इसे और अधिक व्यापक बनाने की ज़रूरत है। शायद, ग्रीन पटाखों के चलन में आने के पहले ही, त्यौहार की रातों में इयरप्लग पहनना एक आम दृश्य बन जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

Jun 1, 2025

पर्यावरणः गर्मी में भी घुट रही है दिल्ली की सांसें

  - पंकज चतुर्वेदी

पंजाब के सुदूर गाँव की रहने वाली इस युवती ने  हिन्दी में पी एचडी किया और दिल्ली के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान में काम मिल गया। होली गुजरी ही थी कि उसकी साँस घुटने लगी। फिर शरीर पर एलर्जी उभरने लगी। जब दवा भी माकूल असर नहीं दिखा पाई, तो डॉक्टर ने कह दिया कि  इस मौसम में दिल्ली में न रहो। अजब है दिल्ली, जाड़े में स्मॉग से दम घुटता है और साँस की बीमारी के लोगों को कह दिया जाता है कि दिल्ली छोड़ दो ।

गर्मी आई तो भी साँसों का संकट यथावत। अब बरसात होती ही कितने दिन की है ? बहादुरगढ़ से फरीदाबाद और गुरुग्राम से गाजियाबाद-नोएडा तक फैले दिल्ली एनसीआर में। कोई  पाँच करोड़ की आबादी पर बढ़ते तापमान के साथ  शुद्ध पेय जल के साथ साफ हवा की कमी और गहरा रही हैं ।

कैसी विडंबना है कि जो पेड़ पर्यावरण सुधारने के इरादे से सड़क किनारे और सार्वजनिक स्थानों में लगाए गए वे ही लोगों के दम घुटने का कारक बन रहे हैं। सिरस, गुलमोहर, सफेदा,  शिरीष, आम, नीम, मोलसरी जैसे कई ऐसे पेड़ दिल्ली में छाए हैं, जिनके परागण से साँस की बीमारी पर चर्चा कम ही होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पराग कणों की ताकत उनके प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है, जो मनुष्य के बलगम के साथ मिल कर करके अधिक जहरीले हो जाते हैं।

ये प्रोटीन जैसे ही हमारे खून में मिलते हैं, एक तरह की एलर्जी को जन्म देते हैं। एक बात और कि हवा में परागणों के प्रकार और धनत्व का पता लगाने की कोई तकनीक बनी नहीं है। वैसे तो परागणों के उपजने का महीना मार्च से मई मध्य तक है: लेकिन जैसे ही जून-जुलाई में हवा में नमी का स्तर बढ़ता है:  तो पराग और जहरीले हो जाते हैं। हमारे रक्त में अवशोषित हो जाते हैं, जिससे एलर्जी पैदा होती है। यह एलर्जी इंसान को साँस की गंभीर बीमारी की तरफ ले जाती है। चूंकि गर्मी में ओजेन लेयर और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है, ऐसे में परागण के शिकार लोगों के फेंफड़े  ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं। 

इस मौसम में  दिल्ली के लोगों को साँस लेने के लिए साफ हवा का दूसरा अदृश्य सबसे बड़ा दुश्मन हैं वाहनों की बढ़ती संख्या। हर वाहन के चलने से टायर घिसते ही हैं और इससे टायर की रबर, उसको बनाने में लगे  गोंदयुक्त रसायन आदि के 2.5 पी एम के कण निकलते हैं। सड़क गरम होती है, तो घिसाई अधिक होती है और ऐसे में हवा न चलने पर ये कण मानव के आवासीय ऊँचाई तक ही सीमित रह जाते हैं ।

इसमें तड़का लगता है वाहन के लिए अनिवार्य एलईएडी बेतरी से निकलने वाले  रासायनिक जहरीले धुएँ का। भले ही यह वायु प्रदूषण ठंड  के दिनों की तरह  प्रत्यक्ष दिख नही रहे हों:  लेकिन मानव शरीर  पर इसकी घातकता उतनी ही हैं। देश की राजधानी के गैस चैंबर बनने में 43 प्रतिशत जिम्मेदारी धूल-मिट्टी व हवा में उड़ते मध्यम आकार के धूल कणों की है। दिल्ली में हवा की सेहत को खराब करने में गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ से 17 फीसदी, पैटकॉक जैसे पेट्रो-इंधन की 16 प्रतिशत भागीदारी है। इसके अलावा भी कई कारण हैं जैसे कूड़ा जलाना व परागण आदि।

इस बार गरम हवाएँ  या लू जल्दी चल रही हैं और ऐसी हवा एक से डेढ़ किलोमीटर तेज गति से बहती है: इसी लिए मिट्टी के कण और राजस्थान -पाकिस्तान के रास्ते आई  रेत लोगों को साँस लेने में बाधक बनती है। अरावली को नुकसान पहुँचने से  सीमा पार से आने वाली रेत अब दिल्ली की हवा और आसमान को धुंधला बनाती है।

जितनी गर्मी होती है, दिल्ली महानगर में उससे जूझने के लिए वाहन, घर दफ्तरों में एसी का प्रयोग बढ़ जाता है।  एसी चलते हैं हाइड्रो क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस से जो कि पृथ्वी की ओज़ोन परत के लिए घातक है। यही नहीं,  इतने सारे वातानुकूलन संयत्र चलाने के लिए लगने वाली  बिजली उत्पादन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करते हैं। जलवायु परिवर्तन ओजोन परत को भी प्रभावित कर सकता है।

समझना होगा कि वायुमंडल में ओजोन का स्तर 100 एक्यूआई यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स होना चाहिए। लेकिन जाम से हलकान दिल्ली में यह आँकड़ा 190 तो सामान्य ही रहता है। वाहनों के धुएँ में बड़ी मात्रा में हाइड्रो कार्बन होते हैं और तापमान चालीस के पार होते ही यह हवा में मिलकर ओजोन का निर्माण करने लगते हैं। यह ओजोज इंसान के शरीर, दिल और दिमाग के लिए जानलेवा है। इसके साथ ही वाहनों के उत्सर्जन में 2.5 माइक्रो मीटर व्यास वाले पार्टिकल और गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण फेंफड़े बेहद कमजोर  हो जाते हैं ।

आखिर इससे निबटा कैसे जाए ? एक तो अब दिल्ली की सजावट के लिए जहाँ भी  हरियाली लगाई जाए , उसके लिए पेड़ों की प्रजातियाँ चुनते समय जलवायु परिवर्तन- गर्मी और  परागण की समस्या को ध्यान रखा जाए।  फिर सड़कों पर कम वाहन  निकलें, जाम न हो, इसकी योजना बने और कड़ाई से लागू हो। पानी का छिड़काव  एक ऐसा तरीका है जिससे काफी कुछ गर्मी और और उससे उपज रहे साँसों के संकट से जूझा जा सकता है। लाखों की संख्या  में चल रहे एसी और  करोड़ों की संख्या के  पानी के आर ओ  से निकलने वाले जिस पानी को हम बेकार समझ कर नाली में बहा  देते हैं, उसके जल संचयन और छिड़काव में इस्तेमाल से इस महा समस्या को कम किया जा सकता हैं ।( indiaclimatechange से साभार)

पर्यावरणः विरासत को संजोकर रखने वाला अनूठा गाँव पिपलांत्री !

  - सुनील कुमार महला

पेड़ हमारे पर्यावरण, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र, मानव व धरती के समस्त प्राणियों, वनस्पतियों को बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक है। कहना ग़लत नहीं होगा कि पेड़ जीवन का मुख्य आधार हैं। यही कारण भी है कि हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में पेड़ों को युगों -युगों से बहुत ही अहम् और महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यहाँ तक कि हमारे यहाँ तो पेड़ों की पूजा करने तक का प्रावधान रहा है। हिंदू धर्म में तो पीपल, बरगद, केला, और नीम जैसे पेड़ों को अत्यंत पवित्र माना गया है।

 हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में तो यहाँ तक माना जाता है कि पेड़ों में मनुष्यों के समान चेतना होती है। सच तो यह है कि भारतीय संस्कृति में पेड़ों को अपने पुत्रों से बढ़कर माना गया है। पाठकों को बताता चलूँ कि भारतीय संस्कृति को अरण्य अर्थात वृक्ष की संस्कृति भी कहा जाता है। बहरहाल, आज जंगल कम हो रहे हैं। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। विकास के नाम पर, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के नाम पर वनों का अतिक्रमण हो रहा है।

हाल ही में आई केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13,056 वर्ग किमी वन क्षेत्र पर अतिक्रमण हुआ है, जो दिल्ली के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक है, यह चिंताजनक है। जानकारी मिलती है कि मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 5,460.9 वर्ग किमी वन भूमि पर कब्जा है, जबकि 409 वर्ग किमी भूमि अतिक्रमण मुक्त की जा चुकी है।

कहना ग़लत नहीं होगा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण को सौंपी गई रिपोर्ट कहीं न कहीं देश में वनों के अतिक्रमण की भयावह स्थिति को उजागर करती है; लेकिन वहीं देश में कुछ ऐसे भी स्थान हैं,जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में देश और समाज के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को बताता चलूँ कि राजस्थान के राजसमंद ज़िले का पिपलांत्री गाँव,  पर्यावरण संरक्षण के साथ साथ ही लड़कियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। जानकारी के अनुसार यहाँ हर नवजात बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाए जाते हैं और इस अनोखी पहल की वजह से यह गाँव हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में मशहूर है।

गाँव की खास बात यह है कि इस गाँव में हर तरफ हरियाली नजर आती है तथा यह पहाड़ियों से घिरा हुआ है। बहुत कम ही लोगों को यह जानकारी होगी कि गौचर भूमि संरक्षण,जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण में इस गाँव का स्थान विश्व में प्रमुखता से लिया जाता है। इस गाँव में हजारों पेड़ लगाए गए हैं और यहाँ आप पक्षियों की चहचहाहट सुन सकते हैं। इस गाँव में पेड़ों को भाई मानकर पेड़ों के राखी बांधने की परंपरा आज भी कायम है। कहना ग़लत नहीं होगा कि पिपलांत्री मॉडल हमारे देश व समाज ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।

वास्तव में यह बालिकाओं को बचाने और हमारे पर्यावरण व पारिस्थितिकी की रक्षा की नींव पर निर्मित यह पर्यावरण-नारीवाद मॉडल कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। राजस्थान के इस गाँव की कहानी वर्ष 2005 में राजस्थान के इस गाँव के सरपंच (पिपलांत्री गाँव के पूर्व सरपंच/पंचायत प्रमुख) श्री  श्याम सुंदर पालीवाल के साथ शुरू हुई। उन्होंने बालिकाओं को बचाने,जल संरक्षण करने तथा पेड़ लगाने का बीड़ा उठाया। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2000 से पहले, पिपलांत्री गाँव में संगमरमर की खदानों और खदानों की भरमार थी, जैसा कि राजसमंद इनके लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ पानी का स्तर 700- 800 फीट तक नीचे चला गया था और पीने तक के लिए पानी नहीं बचा था। गाँव में सामान्य बुनियादी ढांचे (बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर) जैसे कि सड़क, सिंचाई और कृषि का अभाव था। श्री पालीवाल को वर्ष 2007 में निर्जलीकरण(डिहाइड्रेशन) के कारण अपनी 17 वर्षीय बेटी किरण की मृत्यु का सामना करना पड़ा। इससे पिपलांत्री को बदलने का उनका जुनून और बढ़ गया। अपनी बेटी किरण की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी बेटी किरण की याद में पहला पेड़ लगाया।

इससे पिपलांत्री गाँव में क्रांति का विचार आया। पालीवाल इस बात से वाकिफ थे कि किस प्रकार से एक लड़की को जन्म से पहले ही मार दिया जाता था, श्री पालीवाल ने बेटी जन्म पर एक पेड़ लगाने के विचार को बढ़ाकर 111 पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा, इससे एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत हुई। उनकी इस पहल के कारण अब तक 3 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए हैं और 700-800 फीट से नीचे का जल स्तर मात्र 5 वर्षों में 15 फीट ऊपर उठ गया है। इतना ही नहीं,पेड़ों को दीमक से बचाने और फलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए उनके चारों ओर 2.5 मिलियन से अधिक एलोवेरा के पौधे भी लगाए गए हैं। एलोवेरा उत्पादों से आर्थिक बदलाव भी आएँ हैं, लोगों को रोजगार मिला है।

पाठकों को बताता चलूं कि गाँव में ‘किरण निधि’ योजना की शुरुआत की गई, जिसमें पंचायत द्वारा बालिका के नाम पर बैंक खाता खोला जाता था और उसमें 21,000 रुपये की शुरुआती राशि जमा की जाती थी। माता-पिता (जो शेष 11000 रुपये का योगदान करते हैं) को एक हलफनामे पर हस्ताक्षर करना होता है, जिसमें वादा किया जाता है कि वे कन्या- भ्रूण हत्या नहीं करेंगे या अपनी बेटी की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले नहीं करेंगे, और वे उसे शिक्षित करेंगे। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी बालिका शिक्षा से वंचित न रहे और उसके पास अपने भविष्य के लिए पर्याप्त धन हो।

इतना ही नहीं, श्री पालीवाल ने खदान प्रबंधन का मुद्दा अपने हाथों में ले लिया, क्योंकि मार्बल का फेंका गया कचरा एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा था और इससे गाँव की जमीनें बंजर हो रहीं थीं। श्री पालीवाल को निर्मल ग्राम पंचायत पुरस्कार मिला और पुरस्कार स्वरूप 5 लाख रुपये  मिले। श्री पालीवाल के कारण आज पिपलांत्री अपने प्राकृतिक संसाधनों पर एक आत्मनिर्भर और समृद्ध गाँव है। इतना ही नहीं, महिला व्यवसाय और शिक्षा के विकास से बालिका सशक्तीकरण का मुख्य लक्ष्य पूरा हुआ है। वन्य जीवन में वृद्धि देखी गई है, जल संरक्षण हुआ है और गाँव के लोग समृद्ध और खुशहाल हैं। श्री पालीवाल की उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें वर्ष 2021 में प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि बेटी के जन्म को इस गाँव में एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आज भी बेटी के जन्म पर यहाँ 111 पौधे लगाने की परंपरा जारी है। कहना ग़लत नहीं होगा कि राजस्थान के राजसमंद जिले का यह गाँव लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सामुदायिक भागीदारी का एक अनोखा, नायाब व खूबसूरत मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।

सच तो यह है कि इस गाँव की यह परंपरा महज एक रस्म नहीं; बल्कि आज एक सामाजिक आंदोलन बन चुकी है, जो समाज की मानसिकता को बदलने का कार्य कर रही है। गाँव में हर नवजात बेटी के जन्म के साथ 111 पौधे लगाए जाते हैं, जो यह दर्शाता है कि यदि संकल्प सच्चा हो, तो इस दुनिया में कोई भी कार्य असंभव नहीं है। वास्तव में, गाँव की यह अनूठी प्रथा न सिर्फ़ जीवन के उत्सव का प्रतीक है; बल्कि पर्यावरण और लड़कियों दोनों के पोषण और सुरक्षा की शपथ भी है।

आज पौधारोपण के संकल्प से पूरे गाँव की बयार बदल चुकी है। हर तरफ हरितिमा का आवरण आज नजर आता है। आज गाँव में नीम, शीशम, आम और आँवला समेत अनेक प्रजातियाँ विद्यमान हैं। जल संरक्षण, वनस्पतियों का संरक्षण और साथ ही बेटियों की रक्षा का अनूठा संगम इसी गाँव में देखने को मिलता है। मुहिम का असर इस कदर हुआ है कि आज बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि गौरव का प्रतीक माना जाने लगा है। बहरहाल, कहना चाहूंगा कि पिपलांत्री का यह मॉडल लैंगिक समानता, जलवायु अनुकूलन, जैव-विविधता और टिकाऊ विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) का अनूठा प्रतीक बन चुका है।

वास्तव में, पर्यावरण संरक्षण और लैंगिक समानता के प्रति गाँव के ऐसे समग्र दृष्टिकोण ने गाँव को सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक प्रगति के प्रतीक में बदल दिया है। अंत में, यही कहूंगा कि राजस्थान के राजसमंद के पिपलांत्री की यह कहानी महिला सशक्तीकरण, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जमीनी पहल को दिखाती है। हमें यह चाहिए कि हम राजसमंद के इस गाँव से प्रेरणा लें और अपनी युवा पीढ़ी को इसके बारे में जानकारी दें ताकि वे पर्यावरण संरक्षण के साथ ही जल संरक्षण और बेटियों की सुरक्षा व संरक्षण के प्रति कृतसंकल्पित हों सकें। (indiaclimatechange से साभार)

Jan 1, 2025

पर्यावरणः कब मिलेगी एकल उपयोगी प्लास्टिक से मुक्ति?

 - प्रमोद भार्गव

पर्यावरण के बढ़ते संकट के लिए जिम्मेदार कारकों में से एक एकल उपयोगी प्लास्टिक के उत्पादन व खरीद-बिक्री पर विश्वभर में पिछले 1 जुलाई से प्रतिबंध लग गया है। आयात और निर्यात पर भी रोक लगा दी गई है। एकल उपयोगी अर्थात सिंगल यूज प्लास्टिक ऐसी प्लास्टिक हैं, जिससे बनी चीजें केवल एक बार उपयोग में लाई जाती है और फिर फेंक दी जाती हैं। यहीं पर्यावरण के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह साबित हो रही है। नतीजतन इस तरह के 19 नगों पर रोक लगा दी गई है। यदि कोई भी निर्माता इन उत्पादों का निर्माण करता है, तो उसे सात साल की सजा और एक लाख रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। हालाँकि इस कानून की धारा 15 में चिप्स और गुटखे की थैली को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। एक व्यक्ति हर साल 18 ग्राम एकल उपयोगी प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। ये खतरनाक इसलिए है, क्योंकि ये न तो पूरी तरह नष्ट होते हैं और न ही इन्हें जलाकर नष्ट किया जा सकता है। इनके टुकड़े पर्यावरण में जहरीले रसायन छोड़ते हैं, जो इंसानों और जानवरों के लिए खतरनाक होते हैं। साथ ही इनका कचरा बारिश के पानी को जमीन के नीचे जाने से रोकता है, जिससे जल का स्तर नहीं बढ़ पाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक देश में प्रतिदिन 26 हजार टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। 

मानव जीवन-शैली का अनिवार्य हिस्सा बन गया प्लास्टिक पर्यावरणीय संकट के साथ मनुष्य के जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्लास्टिक कचरे से मुक्ति का अभियान छेड़ने का शंखनाद किया था, जिसपर अब प्रतिबंध लगा दिया गया है। इनमें खासतौर से पेयजल और शीतल पेय के अलावा दैनिक उपयोग में लाई जाने वाली वे प्लास्टिक की थैलियाँ हैं, जिनके आसान विकल्प उपलब्ध हैं। इसके अलावा कान साफ करने की सलाई भोजन करने की थाली, ग्लास, चाकू, काँटे व चम्मच, झंडे गुब्बारे व आइसक्रीम की छड़ी और रैपर पर्यावरण ही नहीं मनुष्य और पशुधन के जीवन के लिए भी यह बड़ा संकट बनकर पेश आई है, क्योंकि येन-केन-प्रकारेण प्लास्टिक खान-पान की चीजों के साथ पेट में पहुँच रही है। इससे जहाँ मनुष्य आबादी बीमारी की गिरफ्त में आ रही है, वहीं गाय जैसे मवेशी बड़ी संख्या में प्लास्टिक खाकर जान गँवा रहे है। जाहिर है, जरूरत से ज्यादा प्लास्टिक का इस्तेमाल पर्यावरण के साथ-साथ जीव-जगत के लिए भी संकट बन गया है।  

  हिमालय से लेकर धरती का हर एक जलस्रोत इसके प्रभाव से प्रदूषित है। वैज्ञानिकों का तो यहाँ तक दावा है कि अंतरिक्ष में कबाड़ के रूप में जो 17 करोड़ टुकड़े इधर-उधर भटक रहे हैं, उनमें बड़ी संख्या प्लास्टिक के कल-पुर्जों की है।  एक और नए ताजा शोध से ज्ञात हुआ है कि दुनियाभर के समुद्रों में 50 प्रतिशत कचरा केवल उन कॉटन बड्स का है, जिनका उपयोग कान की सफाई के लिए किया जाता है। इन अध्ययनों से पता चला है कि 2050 आते-आते समुद्रों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक कहीं ज्यादा होगा। भारत के समुद्रीय क्षेत्रों में तो प्लास्टिक का इतना अधिक मलबा एकत्र हो गया है कि समुद्री जीव-जंतुओं को जीवन-यापन करना संकट साबित होने लगा है। ध्यान रहे कि एक बड़ी आबादी समुद्री मछलियों को आहार बनाती है। 

एक अनुमान के मुताबिक प्रति वर्ष 31.1 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन किया जाता है। यही वजह है कि समूचा ब्रह्माण्ड प्लास्टिक कचरे की चपेट में है। जब भी हम प्लास्टिक के खतरनाक पहलुओं के बारे में सोचते हैं, तो एक बार अपनी उन गायों की ओर जरूर देखते हैं, जो कचरे में मुँह मारकर पेट भरती दिखाई देती हैं। पेट में पॉलिथिन जमा हो जाने के कारण मरने वाले पशुधन की मौत की खबरें भी आए दिन आती रहती हैं। यह समस्या भारत की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। यह बात भिन्न है कि हमारे यहाँ ज्यादा और खुलेआम दिखाई देती है। एक तो इसलिए कि स्वच्छता अभियान कई रूपों में चलाए जाने के बावजूद प्लास्टिक की थैलियों में भरा कचरा शहर, कस्बा और गाँव की बस्तियों के नुक्कड़ों पर जमा मिल जाता है। यही बचा-खुचा कचरा नालियों से होता हुआ नदी, नालों, तालाबों से बहकर समुद्र में पहुँच जाता है। एडवांसेज नामक शोध-पत्रिका में छपे अध्ययन में बताया है कि आर्कटिक समुद्र के बढ़ते जल में इस समय 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है। वैसे जेआर जाम बैंक का दावा है कि समुद्र की तलहटी में 5 खरब प्लास्टिक के टुकड़े जमा हैं। यही वजह है कि समुद्री जल में ही नहीं मछलियों के उदर में भी ये टुकड़े पाए जाने लगे हैं। सबसे ज्यादा प्लास्टिक ग्रीनलैंड के पास स्थित समुद्र में मौजूद हैं। यही टुकड़े मांसाहार और पेयजल के जरिए मनुष्य के पेट में चले जाते हैं। 

प्लास्टिक की समुद्र में भयावह उपलब्धि की चौंकाने वाली रिपोर्ट ‘यूके नेशनल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल’ ने भी जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक वर्ष दुनिया भर के सागरों में 14 लाख टन प्लास्टिक विलय हो रहा है। सिर्फ इंगलैंड के ही समुद्रों में 50 लाख करोड़ प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं। प्लास्टिक के ये बारीक कण (पार्टिकल) कपास-सलाई (कॉटन-बड्स) जैसे निजी सुरक्षा उत्पादों की देन हैं। ये समुद्री सतह को वजनी बनाकर इसका तापमान बढ़ा रहे हैं। समुद्र में मौजूद इस प्रदूषण के समाधान की दिशा में पहल करते हुए इंग्लैंड की संसद ने पूरे देश में पर्सनल केयर प्रोडक्ट के प्रयोग पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पारित किया है। इसमें खासतौर से उस कपास-सलाई का जिक्र है, जो कान की सफाई में इस्तेमाल होती है। प्लास्टिक की इस सलाई में दोनों और रूई के फाहे लगे होते हैं। इस्तेमाल के बाद फेंक दी गई यह सलाई सीवेज के जरिए समुद्र में पहुँच जाती हैं। गोया, दुनिया के समुद्रों में कुल कचरे का 50 फीसदी इन्हीं कपास- सलाइयों का है। इंग्लैंड के अलावा न्यूजीलैंड और इटली में भी कपास-सलाई को प्रतिबंधित करने की तैयारी शुरू हो गई है। दुनिया के 38 देशों के 93 स्वयंसेवी संगठन समुद्र और अन्य जल- स्रोतों में घुल रही प्लास्टिक से छुटकारे के लिए प्रयत्नशील हैं। इनके द्वारा लाई गई जागरूकता का ही प्रतिफल है कि दुनिया की 119 कंपनियों ने 448 प्रकार के व्यक्तिगत सुरक्षा उत्पादों में प्लास्टिक का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए आठ यूरोपीय देशों में जॉनसन एँड जॉनसन भी कपास-सलाई की बिक्री बंद करने जा रही है।

प्रदूषण से जुड़े अध्ययन यह तो आगाह कर रहे हैं कि प्लास्टिक कबाड़ समुद्र द्वारा पैदा किया हुआ नहीं है। यह हमने पैदा किया है, जो विभिन्न जल- धाराओं में बहता हुआ समुद्र और नदियों में पहुँचा है। इसलिए अगर इनमें प्लास्टिक कम करना है, तो हमें धरती पर इसका इस्तेमाल कम करना होगा। पानी में प्रदूषण दरअसल हमारी धरती के ही प्रदूषण का विस्तार है, किंतु यह हमारे जीवन के लिए धरती के प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। माइक्रो प्लास्टिक को लेकर आई रिपोर्ट की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि अगर कोई इंसान सिर्फ बोतलबंद पानी पीता है, तो भी एक साल में उसके शरीर में 90,000 प्लास्टिक के टुकड़े पहुँच सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि 130 माइक्रोमीटर से छोटे प्लास्टिक के कणों में यह क्षमता है कि वह मानव ऊतकों को विस्थापित करके शरीर के उस हिस्से की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देता है। इसी तरह यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंगालिया में इकोलॉजी के प्रोफेसर एलेस्टयर ग्रांड ने बताया है कि साँस के जरिए शरीर में जाने वाली प्लास्टिक का बहुत छोटा कण ही फेफड़ों में पहुँच पाता है। जो साँस की तकलीफ पैदा कर सकता है।

प्लास्टिक के इन टुकड़ों के मनुष्य पर प्रभाव से बचने का प्रमुख उपाय यही है कि उपयोग में लाने के बाद प्लास्टिक के हरेक टुकड़े को इकट्ठा कर उसे पुनश्चक्रित किया जाए। विश्व आर्थिक संगठन के अनुसार दुनियाभर में हर साल 311 टन प्लास्टिक बनाया जा रहा है। इसमें से केवल 14 प्रतिशत प्लास्टिक को पुनश्चक्रित करना संभव हुआ है। भारत के केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय महानगरों में प्लास्टिक कचरे का पुनश्चक्रित कर बिजली और ईंधन बनाने में लगा है। साथ ही प्लास्टिक के चूर्ण से शहरों और ग्रामों में सड़कें बनाने में सफलता मिल रही है। आधुनिक युग में मानव की तरक्की में प्लास्टिक ने अमूल्य योगदान दिया है। इसलिए कबाड़ के रूप में जो प्लास्टिक अपशिष्ट बचता है, उसका पुनश्चक्रण करना जरूरी है; क्योंकि प्लास्टिक के यौगिकों की यह खासियत है कि ये करीब 400 साल तक नष्ट नहीं होते हैं। इनमें भी प्लास्टिक की ‘पॉली एथलीन टेराप्थलेट’ ऐसी किस्म है, जो इससे भी ज्यादा लंबे समय तक जैविक प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद नष्ट नहीं होती है। इसलिए प्लास्टिक का पुनर्चक्रण कर इससे नए उत्पाद बनाने और इसके बाद भी बचे रह जाने वाले अवशेषों को जीवाणुओं के जरिए नष्ट करने की जरूरत है।

यदि भारत में कचरा प्रबंधन सुनियोजित और कचरे का पुनश्चक्रण उद्योगों की शृंखला खड़ी करके शुरू हो जाए, तो इस समस्या का निदान तो संभव होगा ही रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे। भारत में जो प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, उसमें से 40 प्रतिशत का आज भी पुनर्चक्रण नहीं हो पा रहा है। यही नालियों सीवरों और नदी-नालों से होता हुआ समुद्र में पहुँच जाता है। प्लास्टिक की विलक्षण्ता यह भी है कि इसे तकनीक के मार्फत पाँच बार से भी अधिक मर्तबा पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान इससे वैक्टो ऑयल भी सह उत्पाद के रूप में निकलता है, इसे डीजल वाहनों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत अनेक देश इस कचरे से ईंधन प्राप्त कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई पायलेट रॉसेल ने तो 16 हजार 898 कि.मी. का सफर इसी ईंधन को विमान में डालकर विश्व-कीर्तिमान स्थापित किया है। गोया, प्लास्टिक वस्तुओं के बेवजह उपयोग पर प्रतिबंध तो लगे ही, इसे पुनर्चक्रित करके इसके सह-उत्पाद भी बनाए जाएँ। बहरहाल, प्रधानमंत्री की मुहिम इस दिशा में जरूर रंग लाएगी। ■

Nov 1, 2024

पर्यावरणः ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने काष्ठ तिज़ोरियाँ

वैसे तो इस बात पर आम सहमति है कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन कम करना सर्वोत्तम तरीका है लेकिन कई लोग मानते हैं कि सिर्फ उत्सर्जन कम करने से बात नहीं बनेगी। कार्बन डाईऑक्साइड को वायुमंडल में से हटाकर भंडारित करना भी ज़रूरी होगा।

इसी सिलसिले में कनाडा में 3775 साल पुराने संरक्षित लाल देवदार के लट्ठे की खोज ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक नए तरीके में रुचि उत्पन्न की है: लकड़ी की तिज़ोरियाँ (वुड वॉल्ट)। इस तकनीक में लकड़ी को इस तरह दफनाया जाता है कि वह सड़कर वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड न छोड़े। गौरतलब है कि कार्बन डाईऑक्साइड ग्लोबल वार्मिंग में एक प्रमुख योगदानकर्ता है।

यह विचार मैरीलैंड विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक निंग ज़ेंग का है, जिनके अनुसार मिट्टी की परतों के नीचे दबा हुआ यह प्राचीन लट्ठा दर्शाता है कि कैसे लकड़ी को कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में रखा जाए तो उसका कार्बन अक्षुण्ण रहता है। ज़मीन के ऊपर पड़ी लकड़ियाँ तो जल्दी से सड़ जाती है, और कार्बन डाईऑक्साइड मुक्त होती है। लेकिन जब उसी लकड़ी को मिट्टी या कीचड़ के नीचे दफनाया जाता है, जहाँ ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं होती, तो वह बहुत धीरे-धीरे विघटित होती है और कार्बन सदियों तक कैद रहता है।

ज़ेंग और उनके सहयोगियों का अनुमान है कि दुनिया भर में एक-दो बार इस्तेमाल की जा चुकी लकड़ी के 4.5 प्रतिशत बायोमास को इस तरह दफनाने से वायुमंडल से सालाना 10 गीगाटन तक कार्बन डाईऑक्साइड को हटाया जा सकता है। 

अलबत्ता, इस उपाय की प्रभाविता पर कुछ विशेषज्ञों को चिंता है। इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि दबी हुई लकड़ी में कार्बन सदियों तक कैद रहता है या नहीं। अब तक, समुद्री मिट्टी के नीचे क्यूबेक लॉग का संरक्षण वैज्ञानिकों को उम्मीद देता है कि इसी तरह के परिणाम बड़े पैमाने पर प्राप्त किए जा सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्य किस्म की मिट्टियां भी ऐसी सुरक्षात्मक परिस्थितियां प्रदान कर सकती हैं।

एक चिंता यह है कि कहीं यह तकनीक जंगलों को काटने की प्रेरणा न बन जाए क्योंकि वह जैव विविधता के लिए खतरे की घंटी होगी। एक और चुनौती पेड़ों को दफनाने की व्यावहारिकता और अर्थशास्त्र है। लकड़ी का उपयोग निर्माण कार्य, कागज़ और फर्नीचर बनाने में किया जाता है, और इसे दफनाने से वनों की कटाई और जैव विविधता के नुकसान सम्बंधित चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, ज़ेंग का सुझाव है कि इन जोखिमों से बचने के लिए केवल बेकार लकड़ी को दफनाया जा सकता है। ज़ेंग के अनुसार बेकार लकड़ी के ढेर आग का खतरा भी बन सकते हैं, इसलिए उन्हें दफनाने से कई लाभ मिलेंगे।

अभी के लिए, काष्ठ तिज़ोरियाँ जलवायु परिवर्तन के खिलाफ व्यापक लड़ाई में एक आशाजनक रणनीति दिख रही है। यद्यपि पर्यावरण सम्बंधी चिताओं के मद्देनज़र इस पर और शोध की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

Sep 1, 2024

पर्यावरणः स्वच्छ पानी के लिए बढ़ाना होगा भूजल स्तर

  - सुदर्शन सोलंकी

पानी की कमी दुनिया की प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है। दुनिया की अधिकांश आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ पानी सीमित है या अत्यधिक प्रदूषित है। जल प्रदूषण स्वास्थ्य की गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है।

नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित अध्ययन ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि पानी की कमी पर शोध प्रमुखत: पानी की मात्रा पर केंद्रित होते हैं, जबकि पानी की गुणवत्ता को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्यों की प्रदूषण निगरानी एजेंसियों के एक विश्लेषण से पता चला है कि हमारे प्रमुख सतही जल स्रोतों का 90 प्रतिशत हिस्सा अब उपयोग के लायक नहीं बचा है।

प्रदूषित होने के साथ ही जल स्रोत तेज़ी से अपनी ऑक्सीजन खो रहे हैं। इनमें नदियाँ, झरने, झीलें, तालाब व महासागर भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक जब पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है, तो यह प्रजातियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और पूरे खाद्य जाल को बदल सकता है।

सेंट्रल वॉटर कमीशन और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के पुनर्गठन की कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कई प्रायद्वीपीय नदियों में मानसून में तो पानी होता है;  लेकिन मॉनसून के बाद इनके सूख जाने का संकट बना रहता है। देश के ज़्यादातर हिस्सों में भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है, जिसके कारण कई जगहों पर भूमिगत जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन, मरक्यूरी और यहाँ तक कि युरेनियम भी मौजूद है।

दुनिया भर में लगभग 1.1 अरब लोगों के पास पानी की पहुँच नहीं है, और कुल 2.7 अरब लोगों को साल के कम से कम एक महीने पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। अपर्याप्त स्वच्छता भी 2.4 अरब लोगों के लिए एक समस्या है - वे हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों और अन्य जल जनित बीमारियों के सम्पर्क में हैं। हर साल बीस लाख लोग, जिनमें ज़्यादातर बच्चे शामिल हैं, सिर्फ डायरिया से मरते हैं।

बेंगलुरु जैसे बड़े शहर जल संकट से जूझ रहे हैं, जहाँ इस साल टैंकरों से पानी पहुँचाना पड़ा। दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले लोगों को रोज़मर्रा के कामों के लिए भी पानी की किल्लत झेलनी पड़ती है। राजस्थान के कुछ सूखे इलाकों में तो हालात और भी खराब रहते हैं।

भारत, दुनिया में सबसे ज़्यादा भूजल का इस्तेमाल करने वाला देश है। प्राकृतिक कारणों के अतिरिक्त भूजल स्रोत विभिन्न मानव गतिविधियों के कारण भी प्रदूषित होते हैं। और यदि एक बार भूजल प्रदूषित हो गए तो उन्हें उपचारित करने में अनेक वर्ष लग सकते हैं या उनका उपचार किया जाना संभव नहीं होता है। अत: यह अत्यंत आवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में भूमिगत जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाया जाए। भूमिगत जल स्रोतों को प्रदूषण के खतरे से बचाकर ही उनका संरक्षण किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में मौसम और बारिश के पैटर्न को बदल रहा है, जिससे कुछ इलाकों में बारिश में कमी और सूखा पड़ रहा है और कुछ इलाकों में बाढ़ आ रही है। जल संरक्षण की उचित व्यवस्था न होने के कारण भी कभी बाढ़, तो कभी सूखे का सामना करना पड़ सकता है। यदि हम जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था कर लें, तो बाढ़ पर नियंत्रण के साथ ही सूखे से निपटने में भी बहुत हद तक कामयाब हो सकेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि संचित वर्षा जल से भूजल स्तर भी बढ़ जाएगा और जल संकट से बचाव होगा। और साथ ही स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता की स्थिति भी बेहतर हो जाएगी। (स्रोत फीचर्स) ■