मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label डॉ. रंजना जायसवाल. Show all posts
Showing posts with label डॉ. रंजना जायसवाल. Show all posts

Sep 4, 2026

कहानीः बड़ी जिज्जी

  - डॉ. रंजना जायसवाल

मॉल से बाहर निकलते वक्त एक व्यक्ति को देख निधि के पैर ठिठक गए। अतुल जीजा जी! हाँ ये तो अतुल जीजा ही थे पर उन्होंने तो बड़ी जिज्जी के इस दुनिया के जाने के बाद यह शहर छोड़ दिया था। छोड़ दिया था या छोड़ना पड़ा। निधि की अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा…उसके परिवार ने एक शरीफ इंसान को शहर में रहने लायक छोड़ा ही कहाँ था। वो शहर छोड़कर जाता नहीं तो क्या करता! यादों की किरचों ने उसके दिल को लहूलुहान कर दिया।

अतुल जीजा जी अर्थात अतुल प्रभाकर, ऊँचा कद, गेहुँवा रंग और सधा हुआ चेहरा कुल मिलाकर एक नज़र में किसी को भी आकर्षित कर लेना वाला व्यक्तित्व। अतुल जीजा जी जब पहली बार जिज्जी को देखने आए तो सबने एक स्वर में कहा था।

”नीतू सोने की कलम से भाग्य लिखवाकर आई है। भाग्य खुल गए उसके तो…”

तो किसी ने कहा-“नीतू! नीतू जैसी को भी इतना सुंदर लड़का मिल सकता है।”

“जैसी!”

नीतू जिज्जी अतुल जीजा से ज़रा भी कम नहीं थी। एकदम बराबर की जोड़ी… अतुल जीजा ने जिज्जी को किसी शादी में देखा था और वह उसके रंग-रूप पर फिदा हो गए थे। नीतू जिज्जी तीन बहनों में सबसे बड़ी थी।

 “नीतू को एक कपड़े में ही विदा कर दीजिए मुझे दहेज में कुछ नहीं चाहिए।”

अतुल जीजा जी की बात सुन पापा निहाल हो गए थे। तिलक में शगुन में चढ़ाए गए इक्यावन हज़ार रुपये को वापस कर उन्होंने कहा था।

“आपका आशीर्वाद ही काफ़ी है।”

“पर बेटा ये तो समाज की रीत है। इसमे अनोखा क्या है? हमारे पूर्वज भी करते थे, मैं भी कर रहा हूँ। आखिर मरने के बाद क्या मुँह दिखाऊॅंगा मैं अपने पुरखों  को…”

जीजा जी ने नोटों की गड्डी से एक रुपया निकाला और माथे लगा स्वीकार कर लिया। उन्होंने पापा की बात मान भी रख लिया और अपना सम्मान भी बचा लिया। जीजा जी के व्यवहार ने पापा का दिल जीत लिया। जिस समाज में लड़कियाँ दहेज के लिए रोज मार दी जाती है, वहाँ अतुल जीजा ने शगुन का एक रुपया लेकर नाते-रिश्तेदारों का दिल जीत लिया था। ना जाने कितनी रिश्तेदारों के सीने पर साँप लोट गए थे। नीतू जैसी लड़की को इतना समझदार लड़के का मिलना किसी को भी पच नहीं पा रहा था पर कहते हैं ना खुशियाँ दबे पाँव आती हैं और दबे पाँव चली भी जाती हैं।


शायद पापा से यहीं गलती हो गई थी। कहते हैं चाँद में भी दाग है। नीतू जिज्जी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर एक ऐसा दाग था, जो चाह कर भी छुड़ाया नहीं जा सकता था। नीतू जिज्जी को मिर्गी के दौरे पड़ते थे। पापा ने न जाने कहाँ-कहाँ  इलाज़ कराया; पर कोई फायदा नहीं हुआ। एक दिन निधि ने कहा भी था।

“पापा, जीजा जी को जिज्जी की बीमारी के बारे में बता दीजिए। कल को ये न हो कि हमारे ऊपर, हमने इतनी बड़ी बात छुपाकर शादी की का इल्जाम लग जाए।”

“चुप रहो तुम…क्या सही है और क्या ग़लत, ये बात अब तुम मुझे समझाओगी।”

निधि पापा के इस व्यवहार से रुआँसी हो गई। कभी-कभी वह सोचती कि आखिर क्या गलत कहा था उसने…पर उम्र के साथ निधि पापा की मजबूरी समझ गई थी। तीन जवान बेटियों के पिता के ऊपर अपने बेटियों को अच्छे घर ब्याहने का कितना दबाव होता है, यह बात वही समझ सकते थे। पापा कितनी भी कोशिश करते पर जीजा जी जैसा लड़का नहीं ढूँढ पाते। वैसे भी वह खुद चलकर आए रिश्ते को यूँ अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे।

सच ही कहते थे लोग जिज्जी सोने की कलम से अपना भाग्य लिखवाकर लाई थी। शादी के एक महीने ही हुए थे। जिज्जी वैसे भी बहुत  सुंदर थी, उनके तन पर अतुल जीजा के प्रेम का रंग ऐसा चढ़ा थी कि वह शादी के बाद और निखर गई। उस दिन ऑफिस से लौटने के बाद अतुल जीजा ने अपनी नव- विवाहिता पत्नी को गर्म-गर्म समोसे का पैकेट पकड़ाते हुए कहा था- “नीतू, ये लो समोसे…इसी बात पर एक बढ़िया सी चाय पिलाओ, चाय के साथ समोसा… मजा आ जाएगा,” अपनी नवोढ़ा की आँखों में आँखें डालकर उन्होंने कहा 

“आप हाथ-पैर धो लीजिए। मैं अभी आपके लिए तुलसी-अदरक वाली चाय बना कर लाती हूँ।”

जीजा जी कपड़े बदलने के लिए बाथरुम में घुस गए और जिज्जी चाय बनाने के लिए रसोई घर में… तभी किसी बर्तन के गिरने की जोर से आवाज आई। जीजा जी रसोई घर की तरफ दौड़े। जिज्जी जमीन पर गिरी पड़ी हुई थी। चूल्हा जल रहा था और चाय का पानी भगोने सहित जमीन पर बिखरा हुआ था।

“क्या हुआ? तुम जमीन पर कैसे गिर गई!”

अतुल जीजा जी ने नीतू जिज्जी से पूछा, नीतू जिज्जी का शरीर बुरी तरह से ऐंठ रहा था, आँखें पलट गई थी और उनकी आँखों के कोर से लगातार आँसू बह रहे थे। ये आँसू शारीरिक तकलीफ़ और अक्षमता की वजह से कम, अपने पति के सामने अपनी बीमारी के इस तरह उजागर होने से ज़्यादा थे।

सुहाग की चूड़ियाँ जमीन से टकराकर चूर हो गई थी और उसकी किरचें तन के साथ मन को भी लहूलुहान कर गईं थी। जिज्जी अपने आप को असहाय महसूस कर रहीं थीं। उनका तन इस वक्त उनका साथ नहीं दे पा रहा था; पर मस्तिष्क एक अजीब से उहापोह में पड़ा हुआ था अब क्या होगा? जीजा जी समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें क्या हुआ है? अपनी नव विवाहिता का यह रूप देखकर एक पल को वह भी स्तब्ध रह गए थे। उन्होंने जल्दी से उनके हाथ-पैर रगड़ना शुरू किया। थोड़ी देर में जिज्जी ठीक होती चली गई। जिज्जी, जीजा जी से नज़र नहीं मिला पा रही थी। आखिर उनका इतना बड़ा अवगुण जीजा के सामने आ गया था।

समाज के लिए उनकी  यह बीमारी उनका अवगुण ही थी शायद; इसीलिए लोग कहते थे नीतू जैसी लड़की को इतना सुंदर लड़का भला कैसे मिल गया! कुछ लोगों ने यह भी कयास लगाए थे।

“जरूर लव मैरिज होगी या शायद लड़के में ही खोट होगा; पर सामने से तो ऐसा नहीं लगता था।”

आजकल के जमाने में लोगों की अच्छाई भी किसी को रास नहीं आती। अतुल जीजा जी समझदार थे। जिज्जी की बीमारी के बारे में उन्हें पता चल चुका था। उन्होंने उनके इस रूप के साथ स्वीकार कर लिया।

जिज्जी ने इस घटना की जानकारी हम सब को दी। पापा दौड़े-दौड़े चले आए थे। वे हाथ जोड़े सर झुकाए जीजा जी के सामने एक अपराधी की तरह खड़े थे। वह एक ऐसे अपराध के लिए अपने दामाद से क्षमा माँग रहे थे, जो उन्होंने किया भी नहीं था; पर हाँ वह अपराधी थे। उन्होंने एक मासूम और शरीफ़ आदमी से अपनी बेटी के जीवन का इतना बड़ा सच छुपाया था। अतुल जीजा जी ने पापा के हाथ को पकड़कर कहा था- “पापा जी आप मुझे शर्मिंदा न करें। यह बीमारी शादी के बाद होती तब मैं क्या करता!”

रिश्तेदारों ने कहा- “अतुल जीजा करते भी तो क्या। जिज्जी अब उनकी पत्नी थी।” 

पर क्या सचमुच! एक वक्त था जब इस देश में लड़कियाँ रंग-रूप, चश्मा लगाने और छोटे बालों की वजह से नकार दी जाती थी। जिज्जी की बीमारी की बात छिपाकर शादी करना एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता था।

वे चाहते तो उसी वक्त दीदी को वापस भेज सकते थे; पर सात जन्मों तक साथ निभाने का वायदा की कसम खाने वाले जीजा जी ने उस कसम की सचमुच लाज रखी थी।

जिज्जी आत्मग्लानि से भरती चली गई। जीजा जी का मासूम चेहरा देखकर वह हमेशा सोचती, अतुल उनके बारे में क्या सोचते होंगे! उन दोनों के रिश्तों की मिठास न जाने धीरे-धीरे कहाँ खोती चली गई। जिज्जी के भाग्य से ईर्ष्या करने वाले लोगों की नजर ऐसी लगी कि जिज्जी  की खुशियाँ भाप बनकर उड़ गई।

जिज्जी के शादी के सात साल हो गए थे पर जिज्जी की कोख अभी तक नहीं भरी थी। वह एक मानसिक दबाव से गुजर रही थी। मानसिक दबाव के चलते मिर्गी के दौरे जल्दी-जल्दी पड़ने लगे। एक तरफ माँ न बनने का दुख  और दूसरी तरफ़ सामाजिक दबाव ने दीदी को चारों तरफ से घेर लिया था। वह समझ नहीं पा रही थी कि उनके साथ क्या हो रहा है!

एक तरफ उनके अंदर इस बात का दर्द था कि वह माँ नहीं बन सकती दूसरी तरफ इस बात का भी डर था कि अगर वह माँ बनी भी, तो उनका होने वाला बच्चा भी उन्हीं की तरह पैदा ना हो जाए। जीजा जी के लाख समझाने के बाद भी की ऐसा कुछ भी नहीं होगा, जिज्जी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। उनकी हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी।

कोई उन्हें समझाने का प्रयास करता तो वह गुस्से से पागल हो जाती थी। जिज्जी घंटों अपने आप को कमरे में बंद कर लेती। जीजा जी की स्थिति अजीब थी। पति-पत्नी के बीच का रिश्ता प्रेम और विश्वास के ताने-बाने से बुना हुआ होता है; पर उन दोनों के बीच का प्रेम और विश्वास कहीं दूर कराह रहा था।

जिज्जी दिन पर दिन शक्की होती जा रही थी उन्हें लगने लगा था कि अगर वह माँ नहीं बन पाई, तो जीजा जी उन्हें छोड़कर दूसरा विवाह कर लेंगे। जीजा जी उन्हें कई बार समझा चुके थे। उन्होंने उनसे वादा किया था कि कुछ भी हो जाए, वह किसी से कभी शादी नहीं करेंगे। जिज्जी की खुशी के लिए वह अनाथ आश्रम से बच्चा भी गोद लेने को तैयार हो गए; पर जिज्जी को अपने खून, अपने बच्चे की धुन सवार थी।

 जिज्जी घण्टों पूजा करने लगी। कोई मंदिर कोई दरगाह ऐसी न थी जहाँ पर दीदी ने हाथ न जोड़े हों, नाक ना रगड़ी हो पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। उनका शरीर नमक की तरह घुलता जा रहा था।

उसे आज भी वह दिन याद है।

“मैं दो दिन के लिए ऑफिस के काम से शहर के बाहर जा रहा हूँ। निधि तुम अपनी जिज्जी के पास आकर रह लो। आजकल उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती।”

“जीजा जी, आने को तो मैं आ जाती पर जीजी ने ही मना कर दिया है, मैं अकेले रह लूँगी।”

काश उस दिन निधि ने जीजा जी की बात मान ली होती, तो जिज्जी हम सबके बीच होती। काश वह दीदी के पास चली गई होती। काश! काश,यह काश भी बहुत अजीब होता है। इस काश ने उम्र भर का उसे दर्द दे दिया था। जीजा जी को गए हुए एक दिन ही हुआ था। 

सुबह-सुबह दूध वाले ने घंटी बजाई, तो अंदर से कोई जवाब नहीं आया। दूध वाला वापस चला गया। बर्तन और झाड़ू पोछा करने वाली सुनीता आंटी आश्चर्य में थी। रोज सुबह दरवाजा खोल देने वाली नीतू जिज्जी आज दस बजे तक दरवाजा बंद करक बैठी हुई थी। सुनीता आंटी को कुछ शक हुआ। उन्होंने पड़ोसियों से आग्रह किया कि वे अपनी छत से कूदकर, झाँककर देखें ।

नीतू जिज्जी ने पंखे से लटकर अपनी जान दे दी थी। यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। किसी भले मानुस ने अतुल जीजा को खबर दी, घर में कोहराम बच गया। पापा और घर के सभी लोग जिज्जी की मृत्यु का कारण जानते थे; पर पापा ने सब जानते हुए भी अतुल जीजा जी को दीदी की मृत्यु का कारण बताया और उन पर केस ठोक दिया। 

जमाता के पैर छूकर अपनी बेटी का कन्यादान करने वाले पापा जीजा जी के जान के दुश्मन बन गए। जिस जमाता के गुण गाते हुए पापा की ज़ुबान नहीं थकती थी, आज वही जमाता उन्हें फूटी आँख नहीं सुहा रहा था । जिज्जी इस दुनिया से अकेले नहीं गई थी। वह अपने साथ अतुल जीजा जी के जीवन की हिस्से की खुशियाँ भी लेकर चली गई थी।

जीजा जी का जीवन कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते बीतने लगा। पापा ने उन पर तरह-तरह की धाराएँ लगवाई थीं। अपनी बेटी के खोने के दर्द का बदला वह कुछ इस तरह से ले रहे थे। निधि ने एक बार हिम्मत करके पापा से पूछा भी था - “पापा जीजा जी की क्या गलती है? आप और हम सभी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि दीदी किस मनःस्थिति से गुजर रही थी, क्या आपको भी लगता है कि जीजा जी जिज्जी की मौत के जिम्मेदार हैं?”

पापा ने उसे डाँटकर चुप कर दिया था।


“अभी तुम इतनी बड़ी नहीं हुई कि तुम मुझे सलाह दो। मेरे मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं…”

 वह छटपटाकर रह गई थी। जिस चेहरे को देख रिश्तेदारों के सीने पर साँप लोट जाते थे, माँ बलाए लेती नहीं चूकती थी, आज उस चेहरे की रौनक न जाने कहाँ गुम हो गई थी।

“कैसे हैं जीsss…!”

शब्द उसके गले में अटककर रह गए जिस व्यक्ति के साथ यह रिश्ता जुड़ा था, वह अपनी मौत के साथ यह रिश्ता भी ले गया था। जिज्जी की मृत्यु के बाद जीजा जी के साथ जो कुछ भी उन पर बीता, उसने उन्हें जीजा कहने का हक भी खो दिया था। 

“कैसी हो निधि, तुम्हारी शादी हो गई!” माथे पर बिंदी और लाल सिंदूर से भरी हुए माँग को देखकर जीजा जी ने पूछा।

“जी! दो साल हो गए।”

जीजा जी ने अपना हाथ उसके सिर पर आशीर्वाद की मुद्रा में रख दिया।

“नीतू निधि का  कन्यादान हम ही करेंगे।” 

जीजा जी की कही हुई बात उसके कानों में गूँज रही थी। वक्त भी कितना बेरहम होता है वह सोच रही थी।

“आप यहाँ…!”

“तेरी दीदी को गए पाँच साल हो गए। मैं उसकी पुण्यतिथि पर उस घर से मिलने जाता हूँ ,जिसमें हमने अपनी दुनिया बसाई थी। तेरी जिज्जी तो निर्मोही निकली। सात जन्मों तक साथ निभाने का वायदा करके हाथ छुड़ाकर चली गई।”

निधि के भीतर गहरे कुछ दरक गया। 

“अतीत में जो बीत गया उसे भुला दीजिए।” 

“भूल जाऊँ! भूलना तो मैं भी चाहता हूँ, पर अतीत मुझे भूलने नहीं देता।”

जीजा जी की आवाज में निराशा थी

“आपने शादी sss…!”

वह चाहकर भी वाक्य पूरा नहीं कर पाई। जीजा जी हौले से मुस्कुरा दिए, उनकी मुस्कान में एक दर्द था।

“तेरी जिज्जी से वायदा किया था, कभी किसी से शादी नहीं करूँगा।”

वह जीजा जी को देखते रह गई। जीजा जी के प्रेम में कोई कमी नहीं थी पर दीदी ही सात जन्मों का वायदा करके उन्हें धोखा देके चली गई थी।

“चलता हूँ मेरी ट्रेन का समय हो गया है। अपना ध्यान रखना।”

निधि ने अपना मोबाइल निकाला।

“अपना फोन नंबर तो शेयर कीजिए।”

जीजा जी के चेहरे पर एक मुस्कान पसर गई। वह उस मुस्कान का मतलब समझने का प्रयास कर रही थी।

जीजा जी बिना नम्बर दिए सीढ़ियों से नीचे उतर गए। वह उन्हें जाता हुआ देख रही थी। जिसकी वजह से यह रिश्ता जुड़ा हुआ था, जब वह रिश्ता ही नहीं रहा फिर जुड़ने का क्या ही मतलब था। निधि ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कहा- “जिज्जी तुमने अच्छा नहीं किया।”■

सम्पर्कः लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड 231001. मोबाइल नं. 9415479796, Email address- ranjana1mzp@gmail.com


Jan 1, 2025

कहानीः इश्क का रंग ग्रे

 - डॉ. रंजना जायसवाल

मोबाइल पर लगातार घण्टी बज रही थी। कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे की मालकिन मधु जी बाथरूम में थीं। घण्टी की आवाज सुन एक पल को वह हड़बड़ा गईं। चेहरे पर साबुन लगा हुआ था। उनके हाथ रुक गए। चेहरे पर साबुन का झाग बुलबुलों के रूप में चेहरे पर बिखरा यहाँ-वहाँ आँख-मिचौली कर रहा था। वह सोच में पड़ गईं, इस वक्त किसका फोन हो सकता है।

मधु जी ने चेहरे पर लगे फेसवाश को धोया और भीगी आँखों और चेहरे को तौलिए से पोंछते हुए बाथरूम से बाहर निकल आईं।

“आ रही हूँ, लोगों को जरा भी सब्र नहीं है,”  मधु जी ने गीले हाथों को तौलिए से पोंछते हुए कहा।

पर उस कमरे में उनके सिवा था ही कौन… बगल वाले में कमरे से टी वी की तेज़ आवाज़ आ रही थी। अशोक जी मैच देखने में मशगूल थे। डे-नाइट क्रिकेट मैच चल रहे थे। कमेंट्रेटर गला फाड़-फाड़ खिलाड़ियों और दर्शकों का उत्साहवर्धन कर रहा था। तालियों की तेज गड़गड़ाहट से पूरा माहौल बना हुआ था। तभी…

“शिट! क्या जरूरत थी खेलने की। सम्भ- सम्भलकर खेलने का समय था। बताओ अच्छ- खासी सेंचुरी रुक गई। धत तेरे की…”

मधु जी का ध्यान मोबाइल से हट अशोक जी के प्रलाप पर आकर टिक गया। मोबाइल कट चुका था। अशोक जी की आवाज़ में झुँझलाहट थी। उन्होंने गुस्से में टी वी बन्द कर दिया; पर उनकी बड़बड़ाहट की आवाज़ अभी तक आ रही थी। मधु जी ने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया और सोचने लगीं इससे बेहतर तो मैच ही था।

मधु जी की आँखें मेज पर पड़े आज के अखबार पर गईं जो अशोक जी के हाथों से गुजरता हुआ अब उनके हाथों में आया था। पन्ने बेतरतीब से पड़े एक-दूसरे से गुत्थम- गुत्था कर रहे थे। अखबार की यह हालत देख वे असहज हो गई थीं। उन्होंने वक्त के साथ बूढ़ी होती जा रही उँगलियों से एक-एक पन्ने को सहेजा और एक सरसरी निगाह बासी पड़ चुकी ख़बरों पर डाली। दिन भर अशोक जी के हाथों के साथ मशक्कत कर अखबार जगह-जगह से मुड़-तुड़ गया था। मधु जी ने अशोक जी के व्यवहार और उँगलियों का खुरदरापन बेतरतीब पड़े पन्नों में महसूस किया।

शादी के पहले घर में सबसे पहले वे अखबार पढ़ती थीं। एक-एक पन्ने से उठती ताजे अखबार की खुशबू उन्हें बहुत लुभाती थी; पर  इन बीते तीस सालों में अशोक जी के साथ बिताए पलों में वह खुशबू गायब हो चुकी थी। सबसे पहले अखबार अशोक जी ही पढ़ते थे। घर की जिम्मेदारियों और अपने आप को एक सफल गृहिणी सिद्ध करने की कोशिश में सारा दिन पंख लगाकर उड़ जाता और अखबार की वह ताजी खुशबू भी समय के साथ उड़ जाती। पन्नों को सहेजते- सहेजते एक खबर पर उनकी निगाह रुक गई-  बुढ़ापा शांति से काटने की चाहत में बढ़ रहे हैं, “ ग्रे तलाक”...

ग्रे तलाक! मधु जी की कौतूहलता बढ़ती गई। उन्होंने अंदर की ख़बरों को पढ़ना शुरू किया। एक दंपति ने शादी के तैंतीस साल बाद म्युचुअल तलाक लिया। बच्चों की पढ़ाई और शादी हो जाने के लिए वे एक साथ रह रहे थे लेकिन जब उनकी यह जिम्मेदारियाँ पूरी हो गईं तब उन्हें यह एहसास हुआ कि वह एक-दूसरे के लिए बने ही नहीं हैं। उनका मानना है कि परिवार की खुशी के लिए वे अब तक साथ रहे; पर  अब वह बुढ़ापा शांति से काटना चाहते हैं। मधु जी ने एक गहरी साँस ली और अखबार को वहीं छोड़ टी वी ऑन कर दिया।

मधु जी की आँखें टी वी पर चिपक गईं। उनकी पसंदीदा सिने तारिका का गाना आ रहा था। उन्होंने कमरे की लाइट बन्द कर दी और साइड लैंप जला दिया। कमरे में फैले हल्के अँधेरे में मद्धिम रौशनी एक खुशनुमा एहसास के साथ बिखर गई। ए. सी.की ठंडी हवा का झोंका उनके तन को सहला गया। उन्होंने रिमोट से वॉल्यूम का बटन दबाकर आवाज मद्धिम की और गाने का आनन्द लेने लगीं। स्वरलहरियाँ हवा के पंखों पर सवार हो पूरे कमरे में फैल गईं।

सिने तारिका ने सुर्ख लाल रंग की साड़ी तन पर लपेट रखी थी। सर पर ऊँचा जूड़ा,तराशे हुए तीर कमान भवें, रँगे हुए होंठ और साड़ी से मैच करता सुर्ख खिलता हुआ गुलाब जूड़े में टँका शरारती बच्चे की तरह ताका- झाँकी कर रहा था। मधु जी एकटक उस तारिका को देख रहीं थी। उन्हें अपनी फेयरवेल पार्टी याद आ गई थी।

“चल तुझे तेरी पसंदीदा हिरोइन की तरह तैयार करती हूँ। सब देखते रह जाएँगे।”

सच ही तो कहा था बुआ जी ने… सहेलियों ने उसकी जान खा ली थी।

“तुझे पक्का हमारी ही नज़र लग जाएगी,” दूसरी ने छेड़ते हुए कहा था।

“आज तो लड़कों की खैर नहीं।”

वह शायद पहली और आखिरी बार था, जब उन्होंने जूड़ा बनाया था। अशोक जी को उनका जूड़ा बनाना पसन्द नहीं था।

“भगवान ने इतने सुंदर बाल दिए हैं, ये क्या जूड़ा बनाकर खड़ी हो गई हो। चोटी बनाया करो।”

मधु जी का चेहरा उतर गया था। शादी के पहले सजने-सँवरने का उन्हें कितना शौक था। लेटस्ट फैशन के कपड़ों से उनकी अलमारियाँ भरी रहती थीं। अपनी शादी में भी दो-दो अटैचियाँ भरकर एक से बढ़कर एक कपड़े लाई थीं। शोख-चटख रंग के कपड़े, आँखें चौधियाँ जाए।

आज भी उन्हें वह दिन याद है। शादी को हफ्ते भर ही हुए थे। दोस्तों ने नव युगल के लिए पार्टी का इंतजाम किया था। मधु जी ने सुबह से ही प्लानिग कर रखी थी। वो लाल कांजीवरम के साथ लम्बा वाला सोने का हार और झुमके पहनूँगी। अशोक जी ऑफिस से अभी तक नहीं आए थे। मधु जी अशोक जी के ऑफिस से आने से पहले ही तैयार होकर बैठ गई थीं। पुरुषों का क्या है, बस वही पेंट-शर्ट पहनकर हर जगह खड़े हो जाएँगे। मुश्किल से दस मिनट लगेंगे; पर उन्हें तो कायदे से तैयार होना था। आखिर पहली बार अशोक जी के दोस्तों से मिल रही थीं। शादी में मिलना भी कोई मिलना होता है। आज सबसे व्यक्तिगत मुलाकात हो जाएगी तो जान-पहचान बढ़ाने में आसानी होगी।

मधु जी में बड़ा उत्साह था। आज मन भर के उन्होंने श्रृंगार किया था। माथे पर नग वाली बिंदी, आई ब्रो पेंसिल से भवों को पैना किया था। गाल गुलाब हो रहे थे और शरारती झुमके बार-बार उन गालों को चूम ले रहे थे। मधु जी न जाने क्या सोच अपने ही रूप को देख शरमा गई थीं। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि अशोक जी उन्हें देखकर सरप्राइज हो जाएँगे।

“सरप्राइज!”

“ये क्या हाल बना रखा है। तुम शायद भूल रही हो कि तुम अशोक गुप्ता की पत्नी हो। ये लाल- पीले रंग की साड़ी, क्या किसी शादी में जा रही हो।”

“हमारी अभी-अभी शादी हुई है। नई दुल्हन पर यही सब रंग अच्छे लगते हैं,” मधु जी ने रुआँसे होते हुए कहा था।

“नई शादी! तो क्या ढोल पीट-पीटकर सबको बताओगी। वैसे भी बताना किसे है, सबको पता है।”

एक हफ्ते पुराने दूल्हे के मुँह से ऐसी बात सुन मधु जी हतप्रभ रह गईं।

“मेरे पास तो ऐसे ही कपड़े हैं।”

“हमारी तरफ से जो कपड़े चढ़ाए गए थे, वो कहाँ गए?” अशोक जी का स्वर तल्ख हो गया था।

“अभी ब्लाउज-पेटीकोट नहीं बने हैं। वैसे भी इतने फीके रंग कौन दुल्हन पहनती है?”

“सबसे पहले तो तुम अपने दिमाग से यह नई दुल्हन होने का भूत उतार दो और वह फीके रंग नहीं क्लास है। ध्यान रखो मैं एक अच्छे क्लास से बिलॉन्ग करता हूँ। बड़े-बड़े लोगों के साथ उठना-बैठना है मेरा… अपना नहीं तो कम से कम मेरी इज्जत का तो ख्याल करो। अपने मायके में जो चाहे करती होगी; पर  मेरे साथ रहना है तो क्लास मेंटेन करना होगा।”

मधु के सामने अटैची में पड़ी वह खूबसूरत कांजीवरम और बनारसी साड़ियाँ घूम गईं। एक-एक साड़ी चुन-चुनकर ली थी। सारे भारतीय रंग गहरे, शोख और चटख… 

“नई दुल्हन पर यही सब रंग तो फबते हैं,” बुआ जी ने यही कहा था।

अशोक जी को पेस्टल रंग पसंद थे। हल्के फीके से  सिंपल रंग… माँ ने एक बार टोका भी था।

“इस उम्र में यह सब रंग पहनेगी तो बुढ़ापे में क्या पहनेगी। तू तो उम्र से पहले बूढ़ी होती जा रही है।”

जिन रंगों को पहन वह खुशियाँ महसूस करती थी, वह खुशियाँ कहीं गुम हो चुकी थीं। उन्हें आज भी वह दिन याद था। पंडित जी ने कुंडली मिलाई थी छत्तीस में बत्तीस गुण मिले थे। माँ कितनी खुश थी! उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

“जोड़ी बड़ी अच्छी रहेगी,” मधु जी ने हँसते हुए कहा था।

“क्या माँ! आप भी किस दुनिया में जीती हैं! आपका बस चलता तो छत्तीस के छत्तीस गुण मिला देतीं। सीता जी के तो छत्तीस के छत्तीस गुण मिले थे, कौन सा सुख मिला, थोड़े कम ही सही।”

“चुप कर! कुछ भी बोलती है। थोड़े कम ही मिले तो अच्छे, लोगों की नजर लग जाती है,” माँ रिश्तेदारों को बताते हुए फिर रही थी। 

“बिटिया की कुंडली बहुत अच्छी मिली है। मधु तो राज करेगी राज…”

सच ही कहा था उन्होंने वह राज ही कर रही थी। समाज की नजर में सुख के जो पैमाने होते हैं, सब कुछ था इस घर में। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी; पर  क्या वाकई में उसके जीवन में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। मधु जी अशोक जी के जीवन में घुल सी गई थीं। उनके खुद के शौक, पसन्द, सपने, चाहत क्या थे, वे भूल गई थीं; पर  कब तक…

मधु जी को अचानक याद आया, जब वह बाथरूम में थीं तब किसी का फोन आया था। सुम्मी! मोबाइल पर सुम्मी का मिस्ड कॉल चमक रहा था।

“सुम्मी! इस वक्त? अरे हाँ आज उससे सुबह बात कहाँ हुई थी,” उन्होंने अपने आप से कहा।

“ये लड़की भी न! दिनभर में एक बार बात न कर ले तो इसे चैन नहीं मिलता।”

मधु जी ने नम्बर मिला दिया। शायद फोन उसके हाथ में ही था। एक घण्टी बजते ही उसने फोन उठा लिया।

“क्या मम्मी! कहाँ रहती हैं। मुझे वक्त नहीं मिला तो आपने भी फोन नहीं किया।”

सुम्मी बोलती चली गई, मधु जी मुस्कुराकर रह गईं। ये लड़की आज भी सुपरफास्ट मेल है।

“कपड़ों को धूप लगा रही थी। आज पौधे और गमले लेने गई थी। बस उन्हें लाने-लगाने में समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला।”

“अरे वाह! ये शौक कबसे पाल लिया। आपको तो कभी पेड़-पौधे लगाते नहीं देखा। नानी के घर जरूर लगे थे; पर  यहाँ तो एक भी पौधा नहीं था,” सुम्मी बोलती चली गई।

“तेरे पापा को यह सब फालतू की चीज़ें लगती थीं। कौन रोज-रोज पानी डाले और देखभाल करे;  इसलिए कभी लगाया नहीं। शादी से पहले मैं ही लॉन मेंटेन करती थी,”  मधु जी ने बुझे स्वर में कहा।

“पापा ने आपको कुछ कहा नहीं?”

मधु जी ने सुम्मी के सवालों का कोई जवाब नहीं  दिया।

“मम्मी आपने अपनी डी पी बदली है?”

“हाँ बहुत सालों से एक ही लगा रखी थी,” मधु जी ने लापरवाही से कहा।

“पापा के साथ बड़ी प्यारी फोटो थी। आप दोनों एक-दूसरे के साथ कितने अच्छे दिखते हैं। मेड फ़ॉर इच अदर..”

मधु जी ने सुम्मी की बात का कोई जवाब नहीं दिया।

“मम्मी!आप डी पी में कितनी अलग लग रही हैं।”

“ कैसी लग रही हूँ,अच्छी या बुरी…?”

मधु जी ने सवाल दागा। सुम्मी इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी।

“अsss…अच्छी, बहुत अच्छी। आपको इस तरह कभी देखा नहीं था न… इसलिए थोड़ा अजीब लगा; पर  आप अच्छी लग रही हैं। एक बात कहूँ, ” सुम्मी की आवाज़ संजीदा हो गई।

“बोलो न…”

“आपको हमेशा पेस्टल रंग के सूती, खादी या लेनिन कपड़े पहनते ही देखा।”

“तेरे पापा को ऐसे ही रंग और कपड़े पसन्द थे।”

“गहरे रंग के कपड़ों में आप बड़ी यंग दिख रही हैं। ये साड़ी कब ली?”

“बहुत पुरानी है, मेरी शादी के समय की। बगल वाली शर्मा जी की बेटी की कल गोद भराई थी। वहीं पहनी थी।”

“आपको हमेशा चोटी में देखा है, जूड़े में पहली बार देख रही हूँ।”

“हम्म…”

सुम्मी कुछ-कुछ समझ रही थी। माँ के जीवन में कुछ बदल रहा था; पर  क्या… मम्मी गहरे रंग के कपड़े पहनने लगी थीं, जूड़ा बनाने लगी थीं। कल की ही तो बात है, लंच में उन्होंने कढ़ी बनाई थी; पर  पापा को तो कढ़ी बिल्कुल पसन्द नहीं थी। फिर…पिछले संडे अपनी सहेली मुक्ता मौसी के साथ फ़िल्म देखने गई थी और लौटते वक्त चौराहे वाले रेस्टोरेंट में खाना खाकर आई थीं।

मम्मी में आया यह परिवर्तन सुखद तो था; पर  पापा?पापा तो चुप रहने वालों में से नहीं थे। घर में क्या बनेगा, रिश्तेदारों को क्यानाना जी सरकारी नौकरी में थे। नौकरी के समय उन्होंने न जाने कितने शहर देखे थे; पर  शादी के बाद वह अपने शहर से नानी के घर के अलावा कहीं नहीं जा पाई थीं।

मम्मी ने इसका कभी विरोध भी नहीं किया। वह पापा के रंग में रँगती चली गईं। शायद प्रतिरोध करने का फायदा भी नहीं था। पापा काफी गुस्सैल स्वभाव के थे। घर की शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए मम्मी चुप रह जाती और उनकी यह चुप रहने की आदत उनकी आदत में शुमार हो गई; पर  सुम्मी की शादी होते ही इन छः महीनों में मधु जी के जीवन में काफी परिवर्तन आया था। सुम्मी इसको शिद्दत से महसूस कर रही थी; पर सों वीडियो कॉल करते समय मम्मी उसके कमरे में ही सोने जा रही थीं।

“मम्मी पापा कहाँ हैं?”

“अपने कमरे में…”

“और आप?”

मधु जी चुप थीं। सुम्मी चुपचाप उनके जवाब का इंतज़ार कर रही थी। उसके सब्र का बाँध टूटने लगा था। तभी…

“मैं तेरे कमरे में हूँ।”

“कबसे…?”

मधु जी ने सुम्मी के सवाल को नजरअंदाज कर दिया।

“पापा मैच देख रहे हैं।”

“और आप? आप भी तो पापा के साथ मैच देखते थे। आपको भी तो मैच देखना पसंद था।”

“मुझे मैच देखना कभी पसंद नहीं था; पर  तेरे पापा का तो तू जानती ही है- उनके हाथ से कोई रिमोट नहीं ले सकता। फिर वह जो देखते थे मैं भी वही देख लेती थी।”

“मम्मी सब ठीक है ना, इधर मैं कई दिनों से नोटिस कर रही हूँ आप कुछ बदली-बदली सी नजर आ रही हैं!”

“सुम्मी ये बदलाव अच्छा है या बुरा…?”

सुम्मी मधु जी के सवाल का जवाब नहीं दे पाई। शायद घर के बच्चे वर्षों से अपनी माँ की बँधी-बँधाई छवि में आए परिवर्तन को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाते।

“आप मुक्ता मौसी के साथ फिल्म देखने गई थीं। फिर  रात में खाना भी बाहर ही खाकर आई थीं।”

“तुमसे किसने कहा?”

“पापा ने बताया था, थोड़ा नाराज़ लग रहे थे।”

मधु जी चुपचाप सुनती रहीं।

“तुम्हारे पापा क्या कह रहे थे?”

“कुछ खास नहीं, बोले— आजकल तुम्हारी मम्मी अपने मन की हो गई हैं। जो चाहती हैं, वह करती हैं।”

“क्या यह गलत है? क्या तुम्हें भी ऐसा ही लगता है?”  मधु जी की ज़बान पर काँटे उग आए थे।

“नहीं मम्मी, मुझे बेहद खुशी और आश्चर्य हुआ था। आपका यह रूप पहले कभी नहीं देखा था। बागवानी के लिए पौधे और आज डीपी पर आपकी फोटो देखकर बेहद आश्चर्य हुआ। आपको कभी इस तरीके से न देखा था और ना ही सोचा था।”

सुम्मी ने महसूस किया- उन दोनों भाई-बहनों के घर बसते ही मम्मी की गृहस्थी उजड़ गई थी। शायद यह गृहस्थी बहुत पहले ही उजड़ गई थी पर उसका स्वरूप अब दिखना शुरू हुआ था। वक्त के साथ घर में ही नहीं उनके रिश्तों के बीच की दरारें गहरी हो गई थीं।

“सुम्मी तुम इतनी बड़ी तो हो ही गई हो कि अपनी मम्मी, एक औरत की बात को समझ सको। बस अब और नहीं, मैं अपने आप को प्रूफ करते- करते थक चुकी हूँ। मेरी माँ ने हथेलियों में दिखती लकीरों को तो देखा था; पर  माथे में उभरी चिंता मेरे भाग्य में खींची गई लकीरों को वे कहाँ पढ़ पाई थीं। मैं अपना बुढ़ापा शांति से बिताना चाहती हूँ।”

“क्या आप पापा से अलग हो जाना चाहती हैं?”

मधु जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

“पर मम्मी इस उम्र में आप दोनों का अलग हो जाना क्या यह सही डिसीजन है। आपने एक बार भी सोचा है हमारे ससुराल वाले क्या सोचेंगे? भैया-भाभी, उनके बच्चे, सब हँसेंगे आप; पर … इस उम्र में कोई तलाक देता है। आपने सोचा है सोसाइटी क्या कहेगी?” सुम्मी ने खीझकर कहा।

“सोचा! कभी समाज, कभी परिवार तो कभी बच्चे, इनके बारे में सोचते-सोचते एक उम्र निकाल दी। क्या हमें अपने बारे में सोचने का कोई हक नहीं, क्या उम्र के इस पढ़ाव पर भी हम अपने बारे में सोच नहीं सकते?”

“पर मम्मी?”

शब्द सुम्मी के गले में अटककर रह गए।

“अपने हिस्से का आसमान बुनने का हक तो कभी न कभी सभी को मिलना चाहिए। सुम्मी इश्क का रंग हमेशा लाल नहीं होता। कभी-कभी ग्रे भी होता है।”

■ 

Jul 1, 2022

कहानीः माँ से मायका….

- डॉ. रंजना जायसवाल

रात का घना अँधेरा पसरा हुआ था, रात के चादर तले इन्सानों के साथ-साथ अब तो सारे सितारें भी सो चुके थे पर ईशा की आँखों में नींद कहाँ... एक अजीब सी बेचैनी ईशा महसूस कर रही थी। अंकुर नींद के आगोश में डुबे हुए थे।  घड़ी की सुई की टिक-टिक से भी उसे झुंझलाहट महसूस हो रही थी।  पता नहीं क्यों कुछ छूटता हुआ महसूस हो रहा था। अंशु भाभी का अभी थोड़ी देर पहले ही फोन आया था।

नाना जी नहीं रहे…’

कब…?’

अभी थोड़ी देर पहले उन्होंने अंतिम साँस ली।’

दिल में कहीं कुछ चटक सा गया, शायद ननिहाल से जुड़ा हुआ वो अंतिम धागा ...क्योंकि उनके जाने के साथ ही ननिहाल शब्द जीवन से खत्म हो गया।  ईशा को ननिहाल हमेशा से बहुत पसंद था, ये वो जगह थी जहाँ लोग उसकी माँ को उनके नाम से पहचानते थे।  यहाँ वह राम गोपाल जी की बहू नहीं, रमेश की पत्नी नहीं और न ही ईशा की माँ थी। यहाँ वो कमला थी सिर्फ कमला…जहाँ उनके आगमन का लोगों को इंतजार रहता था, जिनकी वापसी के नाम पर लोगों के चेहरे पर उदासी पसर जाती थी।

इतनी जल्दी…कितने दिनों बाद आई हो, कुछ दिन तो रुको…

माँ का चेहरा जितनी तेजी से खुशी से चमकता उतनी ही तेजी से धप्प भी पड़ जाता।  खुशी इस बात की कुछ लोग आज भी उसके आने का इंतज़ार करते हैं, गम इस बात का जो दूसरे ही पल इस बात का इज़हार कर देता है कि अब वह पराई हो चुकी है। सिर्फ अपनों के लिए ही नहीं इस शहर के लिए भी...

दीदी क्या सोचा है आपने...कब चलेंगी। उनकी बहू कह रही थी, बीमार चल रहे थे सबका इंतज़ार करेंगे ,तो कैसे चलेगा मिट्टी खराब हो जाएगी।’

मिट्टी...एक जीता-जागता इंसान पल भर में मिट्टी हो गया। महीनों तक गर्मी की छुट्टी का इंतज़ार करने वाले नाना जी को आखिर बार देखना भी नसीब न होगा।  माँ के जाने के बाद उन्होंने ही तो सहेजा था हम दोनों भाई-बहन को...माँ जब इस दुनिया से गई बच्चे नहीं थे हम पर प्यार के दो मीठे बोल, ममता भरा हाथ तो हर उम्र में चाहिए होता है। माँ बहुत कष्ट में थी, हर बार की किमियोथरिपी निराशा की ओर धकेल रही थी...डॉक्टर हर बार कहते अब वो ठीक है पर माँ जानती थी सब कुछ ठीक नहीं था। डॉक्टर से मिलने के बाद पापा हमेशा हम भाई-बहन के सामने मुस्कराने का प्रयत्न करते, ‘सब कुछ ठीक है चिंता की कोई बात नहीं’ पर हर बार पापा के माथे की लकीरों को अनपढ़ माँ न जाने कैसे पढ़ लेती थी। आज सोचती हूँ तो लगता है पापा के लिए कितना मुश्किल रहा होगा सब कुछ... हम सब के चेहरे पर खुशी के कुछ हसीन पल देखने के लिए वो मुस्कुराने का प्रयत्न करते थे...पर मुस्कुराते रहना कोई आसान बात नहीं बहुत दर्द से गुजरती थी उनकी वो हँसी हम सब के चेहरे पर खुशी के चंद लम्हें देखने के लिए... ईशा को आज वो दिन बार-बार याद आ रहा था। माँ का शरीर कैंसर से दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा था पर उससे ज्यादा कमजोर होती जा रही थी उनके जीने की इच्छा शक्ति… पर न जाने क्यों मायके की दहलीज उन्हें बार-बार खींच रही थी। पापा के बार-बार मना करने के बावजूद माँ हमें समेटे नाना-नानी से मिलने चली गई थी।  नानाजी ने बार-बार कहा भी था, ‘तुम चिंता न करो हम तुमसे मिलने आएँगे’ पर उस दहलीज उन दीवारों का मोह उनसे छूट नहीं रहा था।  छूटता भी क्यों जीवन की न जाने कितनी यादें जुड़ी थी उन दीवारों से, उन गलियारों से...उन्हें हमेशा लगता था शहर के चौराहे, वो नुक्कड़ उनका राह आज भी तक रहे हैं।

 एक-एक चीज का हिसाब रखने वाली माँ नानी के घर जाकर न जाने क्यों भुलक्कड़ हो जाती थी।  नानी के बार-बार कहने पर भी कुछ न कुछ सामान हर बार छूट ही जाता था। हर समय हर चीज़ को सहेजने वाली माँ खुद को सहेजना भूल जाती थी। जिसकी उँगलियों पर एक-एक चीज़ होती वो न जाने क्यों मायके से लौटते समय चीज़ें रखकर भूल जाती, शायद वो उस घर में अपनी वजूद की खूशबू बनाये रखना चाहती थी पर उस बार वो सामान नहीं शायद अपने आप को भूल आई थी। कभी-कभी इंसान मौत से पहले ही मर जाता है...माँ शायद अपना अंत जानती थी

हमेशा बोलने वाली माँ अचानक से चुप हो जाती या फिर बहुत बोलने लगती। बहुत कुछ कहना था। उन्हें पर शायद हम ही उन्हें सुन नहीं पाए। कुछ था जो माँ के साथ ही अनकहा रह गया। अबकी बार वो लौट कर आई तो कुछ था जो उन से छूट रहा था पर माँ मुँह से कुछ भी न कहती। रिश्तों और संबंधों को हमेशा सहेजने और समेटने वाली माँ सूख रही थी। माँ हमेशा कहती थी-  ‘वृक्षों से हमें संबंधों को गहराई की कला सीखनी चाहिए, कुल्हाड़ी की एक चोट से सिर्फ जड़ें नहीं मरती पेड़ भी मर जाता है।’

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः। ।’

अंतिम आहुति के साथ पूजा सम्पन्न हुई।  ईशा अपनी सोच के दायरे से बाहर आ गई।  नाना जी तस्वीर में मुस्कुरा रहे थे।  स्वागत करने वाले हाथ, दुलारने वाले हाथ आज तारीख़ बन चुके थे।  सभी लोग प्रसाद ग्रहण कर आँगन में ही बैठ गए। बड़े मामा जी के लड़के ने नाना जी के जीवन पर एक छोटा सी वृत्तचित्र बनाया था।  ईशा हर कोने में बिखरी बचपन की यादों को आँचल में समेट रही थी। पता नहीं अब कब आना हो, हो भी या शायद...नाना जी का मुस्कुराता चेहरा आँखों में समा गया।  ऑफिस जाते नाना जी, पोते की शादी में नाचते नाना जी, परिवार के साथ खाना खाते नाना जी, ईशा की आँखों के आँसू रुक नहीं रहे थे। अंशु भाभी ने धीरे से उसके हाथों पर हाथ रखाl पर स्नेह और आश्वासन का स्पर्श भी उन आँसुओं को रोक न सका। अंकुर ने धीरे से रुमाल ईशा की तरफ सरक दिया।

कुछ था जो ईशा किसी से भी बाँट नहीं पा रही थी।  पूजा संपन्न हो चुकी थी। धीरे-धीरे घर से सभी पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार प्रसाद लेकर अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगे। अंकुर ने भी धीरे से इशारा किया, ‘अगर अभी निकल लेंगे तो रात तक घर पहुँच जाएँगे।’ रुकने का कोई मतलब भी नहीं था और रोकने वाला भी दूर-दूर तक कोई नहीं था।  रोकने और मनुहार करने वाले हाथ तो न जाने कब का हाथ छुड़ाकर इस दुनिया से जा चुके थे। ईशा ने सबसे इजाजत माँगी, मामी जी ने अंकुर और ईशा का टीका किया और घर के लोगों के लिए डिब्बे में प्रसाद बाँधकर दे दिया।  ईशा ने एक भरपूर नजर घर पर डाली, कितना कुछ समेट लेना चाहती थी वो... शायद रिश्ते, शायद घर या फिर शायद ये शहर सब कुछ तो छूट रहा था। गाड़ी धूल उड़ाती आगे बढ़ गई।  रास्ते भर ईशा ने किसी से कोई बात नहीं की पर अंशु कुछ-कुछ समझ रही थी। वो उसके चेहरे को पढ़ने का प्रयास कर रही थी, उम्र में उससे छोटी ही थी पर दुनिया की उसे बड़ी अच्छी समझ थी।

जीजाजी! बड़ी देर से गाड़ी चल रही है, कहीं ढाबा देखकर गाड़ी रोक लीजिए। चाय पीने का मन कर रहा है।’

अंशु समझ चुकी थी, कुछ ऐसा था जो ईशा को चुभ रहा था।  ईशा बेचैन थी अंशु ये अच्छी तरह समझ रही थी।  नाना के घर से हमेशा के लिए नाता कहीं न कहीं टूट रहा था, सब लोग ढाबे की ओर चल पड़े।  ईशा भरे हुए कदमों से कुर्सी की तरफ बढ़ ही रही थी कि अंशु ने हाथ पकड़कर उसे रोक लिया।

दीदी! आप बुरा ना माने तो एक बात कहूँ।’

हाँ बोल न..’

नाना जी का जाना हम सब के जीवन में एक खालीपन भर गया है ; पर इस दुनिया में जो आया है, उसे एक दिन तो जाना ही है। नाना जी अपनी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी करके गए हैं, मुझे ऐसा लगा, आपके आँसुओं का कारण सिर्फ नाना जी का जाना नहीं था।  ऐसा कुछ था जो आपको कचोट रहा था, आप के आँसू थम नहीं रहे थे।’

ईशा चुपचाप अंशु के चेहरे पर देखती रही, अंशु न जाने कैसे उसके दिल के दर्द को समझ गई थी।

अंशु! तुमसे आज तक कुछ भी छिपा नहीं है, आज भी तुमसे मैं कुछ भी नहीं छुपाऊँगी।  जिस घर में मेरी माँ पली-बढ़ी जिसकी हर सांस मायके से शुरू होती थी और मायके पर ही खत्म होती थी।  आज नाना जी के घर जब वह वृत्तचित्र चला,  तो मामा जी के बेटे, बहू, नाती-पोते सब की तस्वीरें थी;  पर मेरे पापा और मेरी माँ की एक तस्वीर भी नहीं थी। नाना जी की सन्तान, मेरी माँ उस घर की बेटी भी थी । किसी की बहन, किसी की बुआ भी थी। आज न जाने क्यों मुझे ये महसूस हुआ- माँ का वजूद उनकी मृत्यु के साथ ही खत्म नहीं हुआ, बल्कि उस घर में तो उनका अस्तित्व कब का ख़त्म हो चुका था। माँ से जुड़ा हुआ यह नाता शायद उसी दिन खत्म हो गया था, जिस दिन माँ मरी , पर इसका एहसास मुझे आज हुआ। अंशु लोगों की थोड़ी सी अनदेखी सिर्फ रिश्ते को ठंडा नहीं करती इंसान को भी ठंडा कर देती है। आज मैंने महसूस किया, कुछ साल पहले मेरी माँ मरी तो सिर्फ उनका शरीर मरा था पर लोगों की नजरों में उनका अस्तित्व तो बहुत पहले ही मर गया था।  जानती हो अंशु छोटी चाची गरीब परिवार से थी, दादी ने उनकी सुंदरता देखकर चाचा से शादी की थी। माँ बताती थी, चाची के मायके वाले इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हो रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था, जीवन भर वो इतने सम्पन्न परिवार के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पाएँगे।’

कर्तव्य…?’

कर्तव्य… मतलब लेन-देन। भारतीय परिवारों में हर मौके तीज-त्योहार पर आने वाला नेग, न्योछावर,लेन-देन बहू के घर वालों और समधियानें का कर्तव्य ही तो है।’

ईशा की बात सुन अंशु मुस्कुरा दी।

अंशु! उस पर से तुर्रा ये कि इसमें नया क्या है, दुनिया करती है।  दादी ने चाची की सुंदरता पर मोहित होकर उन्हें दो कपड़ों में लाना मंजूर तो किया था पर शादी होते ही दादी यह बात भूल चुकी थी कि चाची के परिवार के लोगों की ऐसी स्थिति नहीं है कि वह हर मौके पर नेग-न्योछावर भेजते रहें पर चाची ने अपने मायके वालों की इज्जत रखने के लिए न जाने कितनी बार चाचा जी से बचा-बचा कर रखे पैसों से कभी मिठाई तो कभी कपड़े खरीद कर मायके की इज्जत रखी।  दादी इंसान के तौर पर बहुत अच्छी थी पर सास…दादी समझ जाती थी कि ये सारा सामान किस तरह से एकत्र किया गया हैं।  ‘सैंया का दाम और भैया का नाम’ दादी का ये एक वाक्य चाची को नश्तर की तरह चुभता पर वह बेचारी क्या करती। घर में जेठानी भी थी, एक अनदेखी सी प्रतिद्वंद्विता बनी ही रहती। आश्चर्य की बात ये प्रतिद्वंद्विता उन दोनों के मन में कभी नहीं उपजती। माँ के चाची से हमेशा से अच्छे संबंध रहे पर दादी, बुआ और नाते- रिश्तेदारों तुलना कर ही देते थे।

एक बार चाची ने मन की गाँठों को माँ के सामने खोलकर रख दिया था।  उन्होंने रोते-रोते माँ को बताया था कि भाई भाभी के आने के बाद बिल्कुल ही बदल गए हैं पर मायके की इज्जत रखने के लिए मन पर पत्थर रखकर वहाँ जाना ही पड़ता है।  औरत का जीवन कभी ससुराल में मायके की इज्जत रखने तो कभी मायके में ससुराल की इज्जत रखने में ही बीत जाता है। माँ अच्छी तरह से समझती थी कि विदाई में मिली चाची की साड़ियाँ ,उनकी खुद की खरीदी हुई होती थी, पर आज समझ में आता है कहीं ना कहीं माँ भी तो मायके की इज्जत ही रख रही थी।  नाना-नानी अपने सामर्थ्य अनुसार सब कुछ कर ही रहे थे पर आज मामा के परिवार का व्यवहार देखकर यह महसूस हुआ कि मायके की दहलीज माँ के हाथ से कब की निकल चुकी थी। जिस परिवार के पास नाना के परिवार के नाम पर उनकी बेटी और उसके परिवार की एक तस्वीर भी उपलब्ध न हो सकी, वो भला माँ से जुड़े हुए रिश्तों की क्या कद्र करेगा।

माँ बस नाना- नानी का मुँह देख कर आती- जाती रही, शायद ससुराल में मायके का सम्मान बचाए रखने के लिए…

अंशु ईशा के चेहरे को देख रही थी और ईशा आसमान में बिखरे उन बादलों के बीच डूबते सूरज को… रिश्तों की भीड़ में आज एक रिश्ता कहीं डूब गया था। 0

सम्पर्कः लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश -231001, Email- ranjana1mzp@gmail.com

Mar 1, 2022

लघुकथा- कम्बल


- डॉ. रंजना जायसवाल 

किसी क्लब का अध्यक्ष होना भी अपने आप में सर दर्द हो जाता है। रोज कोई न कोई कार्यक्रम लगा ही रहता है, अतुल पाँच महीनों से लगातार दौड़ ही रहे थे। कभी वृद्धाश्रम,कभी विकलांगों का कैंप तो कभी ब्लड डोनेशन। देखते- देखते दिसंबर का महीना भी आ गया।

“और अतुल बाबू इस महीने क्या करने का सोचा है।”

“सोच रहा हूँ गरीबों में कंबल बाँट दूँ, हम लोग यहाँ मोजा, जूता, जैकेट से लैस होकर भी ठंड से ठिठुरते रहते हैं। कई गरीबों के तन पर तो मैंने एक कपड़ा तक नहीं देखा। मन द्रवित हो जाता है, मुझसे तो देखा भी नहीं जाता।”

“कहीं से कंबलों का जुगाड़ हो गया क्या…”

श्रीवास्तव जी ने चुटकी लेते हुए कहा,आखिर वो भी तो भूतपूर्व अध्यक्ष थे। अपने कार्यकाल में कई बार ऐसे ही उनका मन द्रवित हो जाता था। श्रीवास्तव जी की बात सुनकर अतुल एक बार के लिए सकपका -सा गया जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। नजरें चुराते हुए उसने श्रीवास्तव जी से कहा, “अगले इतवार को चलते हैं, क्लब की तरफ से दो सौ कंबल बाँटेंगे। सोच रहा शहर से दूर किसी गाँव में बाँटा जाए।“

“सही कह रहे हो अतुल, सारे क्लब को इससे आसान समाज सेवा कुछ नजर ही नहीं आती, जो देखो वही क्लब कंबल बाँटने में जुट जाता है। अरे जिसका पेट पहले से भरा हो उसका पेट फिर दोबारा क्यों भरना। यह । भिखारी दो-दो, चार-चार कंबल बटोर कर बैठ जाते हैं और फिर औने पौने दाम में बाजार में बेच देते हैं।

“सही कह रहे हैं श्रीवास्तव जी इसीलिए शहर से दूर गाँव में बाँटने को सोच रहा हूँ, शायद असली जरूरतमंद वही मिल जाये। आप चलेंगे न…”

“नेक काम में पूछना क्या…?”

श्रीवास्तव जी ने अतुल से कहा, इतवार की सुबह सुषमा जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी। क्लब के सदस्य कंबल बाँटने के लिए आने वाले थे। सुबह का नाश्ता तो करके ही जाएँगे। अतुल तेजी से हाथ बढ़ा रहे थे और कमल के द्वारा दान किए गए कंबलों को तेजी से अपनी गाड़ी में रख रहे थे।

“सुगंधा इसमें से दो-चार कम्बल निकाल लो, कामवालियों को दे देना। वे भी खुश हो जाएँगी। पिछली बार बर्तन धोने वाली को सिलाई मशीन दिलवा दी, तो खाना बनाने वाली कितना नाराज हो गई थी कि उसको नहीं मिली। अरे भाई अब अपनी जेब से आदमी किस-किस को दे, इस बार सबको खुश कर दो।“

सुगंधा ने चार कम्बल घर के भीतरी हिस्से में रख दिए, कहीं बाथरूम जाने के बहाने क्लब के किसी सदस्य की उन पर नजर न पड़ जाए। तभी दरवाजे पर कूड़ा उठाने वाले विजय ने घंटी बजाई। अतुल ने बहती गंगा में हाथ धोने की सोची, कौन- सा अपनी जेब से पैसा देना है। लगे हाथ इसको भी कंबल दे ही देता हूँ। यह भी तो जरूरतमंद है ही, खुश हो जाएगा और जीवन भर सलाम भी ठोकता रहेगा।

“यह लो कंबल और तुम्हारे किसी साथी को जरूरत हो, तो बताना, मुझसे आकर ले जाए। हम गरीबों की सहायता के लिए हमेशा खड़े रहते है।“

विजय ने उल्टे ही हाथ उस कंबल को वापस कर दिया, “भैया! आपने कह दिया यही बहुत है, मेरी तो सरकारी नौकरी है, काम भर का कमा लेता हूँ। मुझसे ज्यादा गरीब लोग इस दुनिया में पड़े हैं, उन्हें मुझसे ज्यादा जरूरत है। आप उन्हें दे दीजिए।”

सोच रहा था गरीब कौन है…

सम्पर्कः लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश- 231001