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Jul 1, 2025

मिसालः आधुनिक रायगढ़ के शिल्पी दानवीर सेठ किरोड़ीमल

  -  बसन्त राघव

 छत्तीसगढ़ दानवीरों का गढ़ रहा है। रायपुर में दाऊ कल्याण सिंह, बिलासपुर में पं. देवकीनन्दन दीक्षित और रायगढ़ में सेठ किरोड़ीमल। छत्तीसगढ़ के विकास में इन तीनों विभूतियों के अवदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता । इन्हीं का अनुसरण करते हुए शक्ति के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश अग्रवाल ने हाल ही के वर्षों में नया बस स्टैंड के लिए अपनी बेशकीमती जमीन नगरपालिका शक्ति को दान कर एक मिसाल पेश की है, जो कि अनुकरणीय है। 

वर्तमान रायगढ़ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी है, औद्योगिक नगरी के रूप में इसका तेजी से विकास हो रहा है। छत्तीसगढ़ के पूर्वी सीमान्त पर हावड़ा-बाम्बे रेल लाइन का यह जीवन्त नगर है। इसका एक दिलचस्प इतिहास है राजा चक्रधर सिंह और दानवीर किरोड़ीमल लोहारीवाला के नाम पर इसे विश्वविख्यात ख्याति मिली हैं, रायगढ़ राज्य की स्थापना सन् 1668 के आसपास महाराष्ट्र चान्दा से विस्थापित राजा मदन सिंह ने की थी। पहले बुनगा बाद में राजा ने नवागढ़ी में ‘सतखंडा’ की नींव डाली और राज्य को विकसित किया। बीसवीं सदी के शुरू में राजा चक्रधर सिंह ने उसे साहित्य और संगीत के लिए विख्यात किया। रायगढ़ नगर की प्रसिद्धि में एक और अमिट नाम है दानवीर सेठ किरोड़ीमल लाहरीवाले का, सच्चे अर्थों में वे आधुनिक रायगढ़ नगर के शिल्पी हैं। अगर उनके योगदान को हटाकर देखें, तो रायगढ़ एक व्यावसायिक सामान्य स्तर का शहर ही है। हालाँकि वर्तमान में वह एक औद्योगिक नगरी के रूप में तेजी से विकसित हो रहा है।
  सेठ किरोड़ीमल ने यहाँ पहली बार अधिकाधिक मात्रा में स्कूल, कॉलेज, पुस्तकालय, चिकित्सालय, बालमंदिर और बालसदन, भव्य मंदिर, धर्मशाला, भरत कूप, कुआ-बावली और कॉलोनियों का निर्माण कराया, इतना ही नहीं रायगढ़ शहर को औद्योगिक नगर के रूप में पहचान दिलाने वाला प्रदेश का प्रथम जूटमिल रायगढ़ में उन्होंने ही स्थापित किया। सेठ किरोड़ीमल ने अपने बुद्धि-चातुर्य से यहाँ  का माल कलकत्ता को भेजा। कठिन संघर्ष, व्यावसायिक बुद्धि के कारण उन्होंने अकूत सम्पत्ति प्राप्त की और अन्त में उसे जनता के हित में ही, सेवा कार्यों में लगा दिया। उनकी यह अप्रतिम सेवा, उन्हें महान दानवीरों की श्रेणी में रख दिया, उनकी सेवाएँ  क्या कभी भुलाई जा सकती है ? 
राजशाही खत्म होने के बाद सेठ किरोड़ीमल ने ही औद्योगिक नगर के रूप में रायगढ़ नगर की नींव रखी। सेठ किरोड़ीमल जैसे महादानी, समाजसेवक, विलक्षण व्यवसायी कौन थे, कहाँ से आए, उनका जन्म कहा हुआ, यह जानना बहुत दिलचस्प है। सेठ जी का जन्म हिसार (हरियाणा) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में 15 जनवरी 1882 को हुआ था। कम आयु में ही उनमें कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश जागी। वे  कलकत्ता आकर छोटे-मोटे व्यापार करते थे, जहाँ  उनके भाग्य का सितारा चमका। प्रो. आर.के. पटेल के शब्दों में- द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1936 से 1942 तक सेठ किरोड़ीमल जी ने जापान एवं मित्र राष्ट्रों को युद्ध की विभीषिका से कराहती जनता के लिए भारी मात्रा में खाद्यान्न दिया। उनकी दृष्टि में मानवता की सेवा ही सर्वोपरि थी। उनके हृदय में युद्ध के पक्ष-विपक्ष का भेद नहीं था। ‘‘मेरे पापा डॉ. बलदेव जब प्रोफेसर के. के तिवारी के आग्रह पर सेठ किरोड़ीमल के ऊपर एक लम्बा लेख  लिख रहे थे, तब पं. लोचन प्रसाद पांडेय के बन्धु पं. मुरलीधर पांडेय ने उन्हें बतलाया था- ‘‘भारत स्वतंत्र हुआ, जब अंग्रेज भारत छोड़कर विदेश जा रहे थे, तब हुकमरानों को कलकत्ता में एक यादगार पार्टी दी गई थी।  उसके प्रबन्धक थे श्री किरोड़ीमल। इससे प्रसन्न होकर अधिकारियों ने उन्हें कम्पनी के व्यवसाय में कुछ परसेंट का लाभ तय कर दिया था, इससे उन्होंने प्रभूत राशि कमाई। कठिन संघर्ष, व्यावसायिक तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता ने ही उन्हें रायगढ़ आने के लिए उत्प्रेरित किया था। यहाँ उनका कारोबार बढ़ा और दिन दूनी रात चौगुनी कमाई होने लगी। उन्हें यहाँ  सब कुछ मिला; पर वे निःसंतान थे। अस्तु, अब उनका ध्यान परोपकार की ओर लगा।     
    सेठ किरोड़ीमल ने परोपकार के लिए अनेक महती कार्य किए हैं। कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं - अविभाज्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री रविशंकर शुक्ल एवं सेठ पालूराम धनानिया की प्रेरणा से उन्होंने रायगढ़ में 7 मार्च 1946 को गौरीशंकर मंदिर का शिलान्यास पं. शुक्ल के हाथों करवाया था। देश का प्रसिद्ध झूला- मेला की शुरुआत भी उन्होंने गौरीशंकर मंदिर से की थी। यह संगमरमर पत्थर से निर्मित विशाल मंदिर है, इसका शिल्प पूर्णतया राजस्थानी है। इसके गर्भगृह के दीवालों पर सत्यं के चित्र लोगों को पौराणिक गाथाओं की याद दिलाते है।
  30 लाख नगद एवं अपनी अन्य सम्पत्तियों के साथ 13 मई 1946 को तत्कालीन मुख्यमंत्री के हाथों ‘सेठ किरोड़ीमल धर्मादा ट्रस्ट’ की स्थापना कराई गई। रायगढ़ में ही नहीं उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों- जैसे दिल्ली, मथुरा, मेहँदीपुर, (राजस्थान),  भिवानी (हरियाणा), पचमढ़ी, रायपुर, किरोड़ीमल नगर आदि नगरों में अनेक धर्मशाला,  रैन बसेरा एवं कॉलेज का निर्माण कराया, जो कि उनके लोकापकारी कार्यों का जीवन्त उदाहरण है. दिल्ली में सेठ किरोड़ीमल ट्रस्ट द्वारा स्थापित ‘किरोड़ीमल कालेज’ में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अध्ययन किया था। उनके अलावा मदनलाल खुराना (दिल्ली के पूर्व मुख्य मंत्री), सतीश कौशिक, गिरिजा प्रसाद कोइराला (नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री), कुलभूषण खरबंदा, सुशांत सिंह और अश्वनी चाँद जैसे अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति किरोड़ीमल कॉलेज के छात्र रह चुके हैं।
 रायगढ़ की बात चलती है तो मुझे सन् 1975 की याद आती है। उस समय हम लोग धर्मजयगढ़ में रहते थे और वही से जन्माष्टमी के दिन झूला मेला देखने के लिए सपरिवार रायगढ़ आए थे । उस समय पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ लग रहा था (आज भी झूलामेला में वही हाल रहता है) । झूलामेला देखने छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के अन्याय शहरों से लाखों श्रद्धालु आए हुए थे। आज भी भक्तों की संख्या लाखों में होती है और भीड़ इतनी रहती हैं कि स्टेशन से लेकर मंदिर तक आने में कहीं भी पाँव रखने की जगह नहीं रहती। मैं दो वर्ष पहले भी रायगढ़ आया था। पापा जी घर में नहीं थे। बीमार हालत में अकेले मम्मी ने मुझे के. जी. हास्पिटल रायगढ़ में भर्ती कराया था। यहीं मेरा निःशुल्क इलाज हुआ था। एक जुलाई 1947 को सेठ किरोड़ीमल ने महात्मा गांधी नेत्र चिकित्सालय का लोकार्पण राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन से करवाया था, (वे पं. मुकुटधर पांडेय के मित्रों में थे) नेत्र चिकित्सालय के समीप ही अशर्फी देवी महिला चिकित्सालय है सेठ किरोड़ीमल जी ने अपनी पत्नी के नाम से इसका निर्माण कराया था। इसका उद्घाटन भी पं. रविशंकर शुक्ल ने ही किया था। यह आधुनिक एक्सरे मशीनों से सर्व- सुविधायुक्त अस्पताल था। यहाँ निःशुल्क इलाज किया जाता है। पहले अस्पताल का सारा खर्च ट्रस्ट  द्वारा उठाया जाता था।
शिक्षा के क्षेत्र में सेठ जी अत्यंत उदार एवं जागरूक थे। मेरे जीवन की एक घटना मुझे याद हैं, वह आदर्श बाल मंदिर से जुड़ा हुआ है, नवांकुरों की शिक्षा के लिए इसे भी सेठ जी ने ही शुरू किया था। इसके एक प्रखंड में कथक नृत्य (ताडंव पक्ष) की शिक्षा पं. फिरतू महाराज यहाँ की बालिकाओं को वर्षों तक देते रहे। सन्  1975-76 की बात है पापा जी, जब स्थानांतरण में कोड़ातराई आए, तब उन्होंने अपना निवास रायगढ़ में रखा। उन्होंने स्कूल में दाखिला के लिए मुझे इसी बालमंदिर में लाए, वहाँ के वयोवृद्ध बोड़े, गुरुजी मेरा गठीला शरीर देखते ही, बिना कुछ जवाब- सवाल के कह दिया, यह लड़का कमजोर है, यहाँ नहीं ले सकते, पिता जी दुखी हुए , बोले- ‘‘बिना सवाल-जवाब के जाँचे-परखे आपने ऐसा कैसे कह दिया? क्या आपको पहलवानी कराना है। स्काउट मास्टर के नाम से प्रसिद्ध बोड़े सर के मन में चाहे जो रहा हो, जो भी परिस्थिति रही हो, उन्होंने मुझे भर्ती नहीं किया। मुझे सरस्वती शिशु मंदिर में दाखिला मिला। नटवर हाईस्कूल से मैंने मैट्रिक और किरोड़ीमल विज्ञान कला महाविद्यालय के पीजी बिल्डिंग से अपने बड़े भाई शरद के साथ हिन्दी में एम.ए तक की डिग्री ली। इस तरह मैं इस शहर से जुड़ा रहा।
नटवर स्कूल रायगढ़ के सामने खेल का बड़ा मैदान था, जो अब  कई प्रभावशील लोगों द्वारा काट-छाँटकर छोटा कर दिया गया है। खैर,  यह स्कूल और मैदान पंतगबाजी, जालीदार भवन भी सेठ जी की ही कृपा का फल हैं। यहाँ  यह भी ज्ञातव्य हो कि रायगढ़ के गणेशोत्सव में बाहर से आने वाले कला साधकों को  नटवर स्कूल में ठहराया जाता था। राजा भूपदेवसिंह  ने सन् 1906 में अपने बड़े बेटे नटवर सिंह के नाम पर इस स्कूल की स्थापना की थी । सन्  1954 में सेठ किरोड़ीमल ने इस स्कूल भवन का जीर्णोद्धार कराया था और इसे भव्यता प्रदान की। तब से इसे किरोड़ीमल नटवर हाईस्कूल के नाम से जाना जाता है।                           
    रायगढ़ के जिस कोने पर चले जाइए उनके यादगार के रूप में कई इमारतें सेठ किरोड़ीमल के नाम पर ही मिलेंगी। छत्तीसगढ़ ,मध्यप्रदेश, बिहार और उड़ीसा में तथा अन्यान्य जगहों पर सेठ किरोड़ीमल के नाम पर इमारतें खड़ी हैं। यदि पॉलिटेक्निक काँलेज रायगढ़ की चर्चा न की जाए, तो इस लेख का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। सेठ किरोड़ीमल ने रायगढ़ में मध्यप्रदेश के प्रथम पॉलिटेक्निक कॉलेज का निर्माण कराया था, जो कि आकार में किसी छोटे- मोटे विश्वविद्यालय का स्मरण कराता है।
पॉलिटेक्निक कालेज का शिलान्यास सन् 1955 में  म. प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल ने  किया था एवं उद्घाटन देश के प्रथम राष्ट्रपति डाँ०राजेंद्र प्रसाद ने 1956 में किया था। समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार एवं पुरातत्त्ववेत्ता पं. लोचन प्रसाद पांडेय ने की थी। अविभाजित मध्यप्रदेश के दौरान कुल दो इंजीनियरिंग कालेज (रायपुर और बिलासपुर) , और कुल तीन पॉलिटेक्निक थे।  जिसमें किरोड़ीमल शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज रायगढ़ का नाम प्रमुख था। रायपुर और बिलासपुर इन दोनों कॉलेजों में एडमिशन नहीं हो पाने वाले छात्रों के सामने रायगढ़ का पॉलिटेक्निक कालेज ही विकल्प में बचता था। रायगढ़ के अतिरिक्त अन्य दो  पॉलिटेक्निक  कॉलेज धमतरी और दुर्ग में भी थे; लेकिन धमतरी का पॉलिटेक्निक कॉलेज प्राइवेट था। और यह भी सच था कि रायगढ़ पॉलिटेक्निक कॉलेज की बात ही कुछ और थी। इसकी भव्यता आते- जाते लोगों को अपनी ओर खींचती थी। रायगढ़ पॉलिटेक्निक कॉलेज के उद्घाटन के लिए किरोड़ीमल अपने मुनीम को लेकर जवाहरलाल नेहरू के यहाँ  गये थे। जवाहरलाल नेहरू के स्टाफ ने उन्हें भाव नहीं दिया।  किरोड़ीमल ने इसे अन्यथा नहीं लिया;  लेकिन मुनीम को यह सेठ जी का अपमान लगा। मुनीम ने सेठ जी को मारवाड़ी में कहा- ‘‘इब तो उद्घाटन राष्ट्रपति सेती होणा चईए।’’  और दोनों राष्ट्रपति को आमंत्रित करने राष्ट्रपति भवन चले गए। राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद जी स्पेशल ट्रेन से रायगढ़ आए थे और सेठ किरोड़ीमल ने महामहिम राजेंद्र प्रसाद जी से सोने की कैंची से फीता कटवाया था। सेठ किरोड़ीमल के संदर्भ में भारत के राष्ट्रपति महामहिम डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने उद्बोधन भाषण में कहा था- " देश को श्री किरोड़ीमल लुहारीवाला सदृश मानव सेवा में आस्था रखने वाले लोगों की आवश्यकता है, जो संख्या में भले ही कम हों; पर सामने आकर यदि ऐसा अनुकरणीय कार्य करें, तो राष्ट्र का कल्याण होगा।’’ 
 किरोडीमल पॉलीटेक्निक कॉलेज के पीछे दो बड़े हॉस्टल भी हैं। एक विश्वेश्वरैरया हॉस्टल  और उसके पीछे तिलक हॉस्टल । जिन्हें बनाने में आज करोड़ों रुपये लगेंगे। राजीव नयन शर्मा 1980 के छात्रसंघ अध्यक्ष के लिए चुने गए थे, उनके अनुसार उस समय यहाँ  लगभग 600  छात्र विद्याध्ययन हेतु रहा करते थे; लेकिन आज उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है, खाली पड़ा हुआ है। जनहित में इसका उपयोग जरूरी है। वर्तमान में वहाँ सोलह सतरह सौ बच्चे पढ़ रहे हैं। इस लिहाज से छात्रों के हित में दोनों हॉस्टलों को काम में लिया जाना चाहिए। 
 छत्तीसगढ़ - मध्यप्रदेश का पॉलिटेक्निक कालेज होने की वजह से यहाँ  अब तक लाखों इंजीनियर तैयार हो चुके हैं, यहाँ विश्व प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री  डाँ० आर.जी. बुलदेव भी प्रथम प्राचार्य के रूप में सेवा दे चुके है।  इसका परिसर पेड़-पौधों से घिरा हुआ है।  रंग -बिरंगे फूल पौधे इसकी शोभा बढ़ाते हैं। इसके तीन खंड है, जिसमें शताधिक कमरे है और जहाँ  मौखिक, प्रैक्टिकल के साथ प्रायः सभी विषयों की पढ़ाई होती हैं। पिछले पचास- पचपन वर्षो  में यहाँ लाखों इंजीनियर निकल चुके हैं, और देश के विभिन्न भागों में सेठ किरोड़ीमल का नाम राष्ट्रव्यापी कर चुके हैं। इसी बिल्डिंग में एक ऑडिटोरियम भी हैं, जिसमें शहर तथा दूसरे शहरों के कवि, लेखक एवं कलाकार शिरकत करते हैं।
किरोड़ीमल विज्ञान कला महाविद्यालय एवं पॉलिटेक्निक कॉलेज रायगढ़ में आचार्य विनयमोहन शर्मा, कविवर रामेश्वर शुक्ल अंचल जैसे नामी-गिरामी  विद्वान्  प्राचार्य के रूप में कार्य कर चुके है । पं. प्रभुदयाल अग्निहोत्री जैसे संस्कृत के महापंडित भी प्रोफेसरी कर चुके है। इस विद्यालय से पं. मुकुटधर पांडेय और जन कवि आनंदी सहाय शुक्ल से भी गहरा सम्पर्क रहा है।
  वाकई सेठ किरोड़ीमल ने रायगढ़ को बसाया , सजाया- सँवारा। यहाँ  के लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने बहुत से काम किए। अगर सेठ किरोड़ीमल नहीं होते तो रायगढ़ इतना पिछड़ा हुआ होता कि हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। आज का रायगढ़ अस्सी- पचासी साल पीछे चला जाता।  आज भी छत्तीसगढ़ दो मामलों में बहुत पिछड़ा हुआ है एक दो शिक्षा दूसरा स्वास्थ्य। उसके लिए हमको बाहर जाना होता है। उन्होंने उस समय देश के इने-गिने संस्थाओं की तर्ज पर यहाँ  हॉस्पिटल, कॉलेज और स्कूल बनवाए।

जनचेतना के अग्रदूत सेठ किरोड़ीमल ने सभी सुविधाओं से युक्त एक पुस्तकालय की भी स्थापना  1954 -55 में की थी। इसका निर्माण नेत्र चिकित्सालय और बूजी -भवन (धर्मशाला) के बीच किया था। इस पुस्तकालय का परिवर्धन पालूराम धनानिया कामर्स कॉलेज के प्राचार्य श्री नंदलाल शर्मा ने बड़ी निष्ठा से किया था। खेद है रख रखाव के अभाव में वह प्रायः सभी विषयों की पुस्तकों का विशाल ग्रंथालय भी दीमकों का आहार हो गया। धर्मशाला में ठहरने वाले यात्रियों के लिए ट्रस्ट की ओर से भोजन - पानी की व्यवस्था रहती थी, खेद है, इसका उपयोग व्यावसायिक परिसर के रूप में किया जा रहा है। सेठ जी द्वारा निर्मित कॉलोनियों में वर्षों से काबिज में से कुछ लोग स्थायी रूप से कब्जा कर चुके हैं; लेकिन प्रशासन अबतक इन पर रोक नहीं लगा पाया है।
   लोगों के द्वारा यह भी बताया जाता है कि भारत के भूतपूर्व रक्षा मंत्री और हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री बंशीलाल अपने गर्दिश के दिनों में रोजी -रोटी की तलाश में रायगढ़ आए थे; लेकिन बात नहीं बनी और वे वापस  चले गए थे।
 वैसे छत्तीसगढ़ दानवीरों का गढ़ रहा है। रायपुर में दाऊ कल्याण सिंह, बिलासपुर में पं देवकीनन्दन दीक्षित और रायगढ़ में सेठ किरोड़ीमल। छत्तीसगढ़ के विकास में इन तीनों विभूतियों के अवदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता ।  इन्हीं का अनुसरण करते हुए शक्ति के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश अग्रवाल ने हाल ही के वर्षों में नया बस स्टैंड के लिए अपनी बेशकीमती जमीन नगरपालिका शक्ति को दान कर एक मिसाल पेश की है, जो कि अनुकरणीय है। 
  आधुनिक रायगढ़ के इस महान शिल्पी का स्वर्गवास 2 नवम्बर 1965 को हुआ था, पर यश काया रूप से वे आज भी हमारे बीच जीवित हैं। ऐसे महान  धर्मवलम्बी  सेठ किरोड़ीमल का नाम, समाज द्वारा क्या कभी भुलाया जा सकता है ? रायगढ़ उनका सदैव ऋणी रहेगा।   
  सम्पर्कः  पंचवटी नगर, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़, मो.न. 8319939396    Email.basantsao52@gmail.com

May 1, 2023

जन्म दिवस -21 मईः शरद जोशी होने का अर्थ

 - बसन्त राघव

व्यंग्य की चर्चा करते ही दो नाम सबसे पहले जेहन में उभरते हैं  एक हरिशंकर परसाई दूसरे शरद जोशी। आधुनिक व्यंग्य के विकास में इन दोनों का समानांतर महत्त्व है। एक आधुनिक व्यंग्य के प्रवर्तक के रूप में जाने जाते हैं, तो दूसरे उसके पोषण और संवर्धन के लिए ख्यात हैं। दोनों ने ही व्यंग्य साहित्य को प्रतिष्ठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है।

अग्रेंजी साहित्य के सम्पर्क में आने से हिंदी साहित्य के स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। उसकी  हर विधा का स्वरूप बदला। व्यंग्य में भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं । वह संस्कृत की व्यंजना से अंग्रेजी के सटायर शब्द के ज्यादा करीब आने लगा।  व्यंग्य  हास-परिहास से इतर एक सोद्देश्य गंभीर साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित होने लगा है। यह अलग बात है कि शरद जोशी  व्यंग्य को कोई स्वतंत्र विधा नहीं मानते हैं। उनके विचार से वह तो सहज प्रवृत्ति है, जो अभिव्यक्ति की  विविध विधाओं में रूपायित होती रही है।  व्यंग्य की शास्त्रीय मान्यता की भ्रांति से जुड़े विधा - पक्ष की चर्चा करते हुए शरद जोशी जी  कहते हैं  "आधुनिक व्यंग्य का सर्वाधिक विवादास्पद पहलू उसका साहित्यिक स्वरूप रहा है । साहित्य में व्यंग्य की व्यापकता और लोकप्रियता को देखते हुए कतिपय आलोचक उसे ' विधा ' अथवा ' शैली ' के चौखटे में बन्द करने का प्रयास करते हैं । अपने अलगपन के कारण यह विधा का आभास देता है । किसी भी विधा की अपनी सुनिश्चित और निर्धारित सीमाएँ होती हैं । किन्तु व्यंग्य को सुनिश्चित और निर्धारित सीमा में नहीं बाँधा जा सकता ।" 

शरद जोशी ने अपनी चुटीली एवं हास्य, मनोविनोद से संपृक्तशैली में अपने सबसे ज्यादा रोचक व्यंग्य लिखे और यही उनके व्यंग्य सृजन की अपनी विशेषता रही है। 80 के एक कवि सम्मेलन का मंच संचालन सोम ठाकुर कर रहे थे। उन्होंने शरद जोशी के लिए कहा था  " उन्हें गद्य को हास्य में प्रस्तुत करने में पारंगत हासिल है"। उसी मंच में शरद जोशी जी ने  सरकार पर कटाक्ष करते अपनी एक हास्य रचना का पाठ किया था, "अगर सरकार के पाँव भारी हैं, तो उसे कौन हिला सकता है"। इतना सुनते ही मंचस्थ कवि और उपस्थित श्रोता हँस हँसकर लोटपोट हो गए थे। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा माहौल गुंजायमान हो उठा था।  उन्होंने अपने व्यंग्य में समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, सरकार की ढुलमुल नीतियों एवं धार्मिक पाखण्डों, कुनबापरस्ती, स्वार्थपरता पर गहरा आघात किया है। वे अपने समकालीन उद्भट साहित्यकारों की आलोचना करने से भी नहीं चूकते थे। उनका कथ्य-सम्प्रेषण उन्हें अपने समकालीन व्यंग्यकारों से अलग चिह्नित कर विशिष्टता प्रदान करता है । व्यंग्य के क्षेत्र में उनकी नूतन प्रयोगधर्मिता उनकी कलात्मक बौद्धिकता को दर्शाती है। निश्चय ही व्यंग्य साहित्य में उनका स्थान अक्षुण्ण रहेगा।

आज व्यंग्य की जरूरत इसलिए भी है कि चतुर्दिक विसंगतियों और विडंबनाओं ने समाज को जकड़ लिया है। व्यंग्य एक ऐसा हथियार है, जिससे इन विकृतियों पर प्रहार किया जा सकता है। व्यंग्य की उपादेयता पहले की अपेक्षा  आज अधिक बढ़ी है। यह साहित्यिक शक्ति के प्रर्दशन का एक मात्र धारदार जरिया है। जहाँ शब्द तीर की तरह चलते हैं और सीधे मार करते हैं। शरद जोशी आम जनता के भीतर की व्यथा और कसमसाती पीड़ा को अच्छी तरह समझते थे। जोशी जी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, राजनीतिक, विसंगतियों और विकृतियों के खिलाफ सचेत प्रहरी बनकर उन सभी विद्रूपताओं एवं विसंगतियों पर जोरदार प्रहार करते हैं। शरद जोशी व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति को जरूरी मानते हैं, उनका मानना है कि इससे व्यंग्य सरल, सहज और पाठकों के लिए बोधगम्य बन जाता है।  इससे पाठक जल्दी से विषयवस्तु के भीतर प्रवेश कर जाता है। उसकी चेतना रचना के रसास्वादन के साथ - साथ जागृत होने लगती है, व्यंग्य पाठक की बौद्धिकता  को उत्तेजित करता है।

जहाँ तक शरद जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि का सवाल है, शरद जोशी के पूर्वज गुजराती मूल के ब्राह्मण थे। उनके पिता श्रीनिवास जोशी नौकरी के लिए उज्जैन आकर  बस गए थे। उज्जैन के ही मुगरमुट्टे  मोहल्ले में  21 मई 1931 को शरद जोशी  का जन्म हुआ था । पिता रोडवेज में डिपो मेनेजर के पद पर पदस्थ थे | पिता के स्थानान्तरणों की वजह से  जोशी जी का बचपन मऊ, उज्जैन, नीमच, देवास, गुना  जैसे छोटे बड़े शहरों में बीता। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन में, हाईस्कूल की शिक्षा नीमच और देवास में हुई। इंदौर के होल्कर महाविद्यालय में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।  पिता की आर्थिक स्थिति  अच्छी नहीं थी। अतः उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा अपने ही लेखनीय पारिश्रमिक से पूरी की। माता श्रीमती शांता जोशी एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। आधुनिक विचारों के पोषक शरद जोशी एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे।  पतले- दुबले,  साँवले रंग के शरद जोशी जी का दार्शनिक दृष्टिकोण और उनकी बौद्धिक चेतना उन्हें एक विलक्षण व्यक्तित्व प्रदान करती है। वे संकीर्ण धार्मिक रूढ़िवादी सिंद्धातों से इतेफाक नहीं रखते थे। रूढ़ि भंजक शरद जोशी ने ' इरफाना सिद्दीकी से प्रेम विवाह किया था। इरफाना सिद्दीकी एक पढ़ी-  लिखी गरीब मुस्लिम लड़की थी। उस समय इरफाना सिद्दीकी रंगमंच और कथा साहित्य के क्षेत्र में उभरता हुआ नाम था। दोनों का अन्तरजातीय विवाह धर्मभीरु परिवार और समाज को मंजूर नहीं था। लेकिन दोनों ने इसका डटकर सामना किया। दोनों से वाणी, ऋचा, और नेहा तीन बच्चियाँ हुईं। शरद जोशी एक आदर्श पति और एक आदर्श पिता थे। उन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई। पत्नी इरफाना सिद्दीकी के शब्दों में -" कैसे बताऊँ कि वे कितने स्नेही एवं आदर्श जीवन साथी थे । मैं अपनी बेटियों को उनके पास छोड़कर कहीं भी बेफिक्री से रह सकती थी , वे बड़ी ख़ुशी से मुझसे भी ज्यादा अच्छी तरह से बच्चों की देखभाल कर लिया करते थे।"

शरद जोशी को किताबें पढ़ने और खरीदने का बड़ा शौक था। किताबें खरीदने के लिए जोशी जी अपने आय में से एक बड़ी राशि खर्च कर दिया करते थे। उन्होंने यशपाल, प्रेमचंद, टालस्टाय, बाल्जाक, चेखव, गोर्की, मोपासां, रवीन्द्र नाथ टैगोर, मंटो, कृश्न चन्दर, जैसे शीर्षस्थ साहित्यकारों को खूब पढ़ा। यही नहीं  वे उनकी रचनाओं से बहुत प्रभावित भी हुए थे।

शरद जोशी सेल्फ मेड इंसान थे, इसलिए उनमें तुनकमिजाजी एक स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह रची- बसी थी। वे अपने इसी स्वभाव के कारण अपने करीबी लोगों को भी शत्रु बना बैठते थे।  शरद जोशी एक समय हरिशंकर परसाई के बहुत करीबी मित्रों में से एक थे, लेकिन 'साहित्य का महाबली' शीर्षक व्यंग्य लिखकर उन्होंने परसाई जी से दुश्मनी ले ली।  अशोक बाजपेयी भी कभी उनके घनिष्ठ थे। बाद में शरद जी उन्हें भी अपना घनघोर शत्रु बना बैठे। लेकिन यह कहना  उचित नहीं होगा कि वे खूसट और अव्यावहारिक किस्म के आदमी थे, सच तो यह है कि वे बड़े मृदुभाषी, निराभिमानी इंसान थे। यह भी सच है कि उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। वे बड़े निर्भीक, निडर व्यक्ति थे, तभी तो अपने विरोधियों पर तत्काल व्यंग्य या आलोचना करने से नहीं चूकते थे।

 स्व. हरिहर जोशी, के. पी. सक्सेना, नरेन्द्र कोहली और मुज्तबा हुसैन उनके अभिन्न मित्रों में से थे।

 शरद जोशी की संघर्षशीलता और साहसिकता उनकी लेखनी में परिलक्षित होती है। उनका आखिरी मुकाम मुंबई रहा। उन्हें हृदयरोग, और मधुमेह की बीमारी थी। 5 सितंबर 1991 को मुम्बई में ही उन्होंने अपने जीवन की अन्तिम साँस ली।

शरद जोशी ने अपने कैरियर की  शुरुआत 1955 में अकाशवाणी की छोटी- सी नौकरी से की, जहाँ पर वे पाण्डुलिपि लेखन का कार्य किया करते थे। उसके बाद मध्यप्रदेश सूचना एवं प्रकाशन विभाग में जनसंपर्क अधिकारी रहे, अपने तुनकमिजाजी और महत्त्वाकांक्षी  व्यक्तित्व के कारण उन्होंने वहाँ की भी नौकरी छोड़ दी, उस समय तक उनकी पहचान एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार के रूप में हो चुकी थी। नौकरी से त्यागपत्र देकर उन्होंने स्वतंत्रलेखन को ही अपने आजीविका का साधन बनाया। व्यावसायिक लेखन के लिए उन्होंने जी तोड़ मेहनत की। 

उन्होंने लेखन की शुरुआत कहानी से की थी।  उसके बाद सैकड़ों व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम, हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिक एवं फिल्मों के लिए पटकथाएँ और संवाद लिखे हैं।  उन्होंने कुछ वर्षों तक पत्रकारिता भी की।  जोशी जी रेडियो में वार्ताएँ, प्रहसन, और नाटक लिखते थे, जिसके लिए उन्हें 25 रुपये पारिश्रमिक मिलता था। दैनिक नई दुनिया में 'परिक्रमा' स्तंभ के लिए 30 रुपये मिलते थे। वे पूरे पच्चीस साल तक कवि सम्मेलनीय मंचों की शोभा बढ़ाते रहे। ज्ञात हो कि शरद जोशी कवि सम्मेलनों में कविता नहीं गद्य पाठ किया करते थे। उन्हें साहित्य में एक विशेष पहचान तब मिली, जब  धर्मवीर भारती ने उनकी एक  व्यंग्य रचना "गागरिन का यात्रा -भत्ता" धर्मयुग में प्रकाशित की। मनमोहन मदारिया जी लिखते हैं " 'गागरिन का यात्रा - भत्ता' अनूठी सूझ की रचना थी।" इसके बाद 'धर्मयुग में उनकी रचनाएँ लगातार छपती रहीं। शरद जोशी की विभिन्न व्यंग्य रचनाएँ देश के श्रेष्ठ समाचार  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चित होती रही। दैनिक नवभारत टाइम्स में आपका कॉलम 'प्रतिदिन' निकलता था जो कि काफी चर्चित और लोकप्रिय हुआ था। कादम्बरी, ज्ञानोदय, रविवार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान के लिए भी उन्होंने खूब लिखा। सन् 1951 से लेकर सन् 1956  तक उनका व्यंग्य स्तम्भ 'परिक्रमा' 'नई दुनिया' में लगातार निकलता रहा, बाद में 1958 में उन्हें संगृहीत कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था। उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं का भी संपादन कार्य किया जिसमें- 'दैनिक मध्य देश' (भोपाल), 'नवलेखन' मासिक (भोपाल), हिंदी एक्सप्रेस (बम्बई), प्रमुख हैं।

फिल्म लेखन के क्षेत्र में शरद जोशी जी ने क्षितिज, छोटी सी बात, साच को आँच नहीं, गोधूलि, दिल है कि मानता नहीं, उत्सव, आदि के लिए पटकथाएँ और संवाद लिखे ।

" शरद जोशी ने ‘यह जो है जिंदगी’, ‘विक्रम और बेताल’, ‘सिंहासन बत्तीसी’, ‘वाह जनाब’,  'देवीजी',‘दाने अनार के’,  प्यालो में तूफान',‘यह दुनिया गज़ब की’ और ‘लापतागंज’  जैसे  टीवी धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद लिखे, जो बहुत लोकप्रिय और चर्चित हुए। कुछ वर्ष पहले 'सब' चैनल पर उनकी कहानियों और व्यंग्य पर आधारित 'लापतागंज' 'शरद जोशी की कहानियों का पता' का प्रसारण किया जाता था, जिसे लोगों के वारा खूब  पसंद किया जाता रहा है।

शरद जोशी की प्रमुख व्यंग्य रचनाएँ इस प्रकार है- परिक्रमा (1958), राग भोपाली (2009), जादू की सरकार (1993), किसी बहाने (1971), घाव करे गंभीर, जीप पर सवार इल्लियाँ (1971), रहा किनारे बैठ (1972), तिलस्म(1973), दूसरी सतह (1975), प्रतिदिन (3 खण्ड), यत्र-तत्र-सर्वत्र (2000), नावक के तीर, मुद्रिका रहस्य(1992), झरता नीम शाश्वत थीम, पिछले दिनों (1979), नदी में खड़ा कवि और मेरी श्रेष्ठ व्यंग रचनाएँ (1983), यथासंभव (1985), हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे (1987), शामिल हैं।

शरद जोशी के लिखे दो व्यंग्य नाटक अंधों का हाथी (1979), एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ (1979) और उपन्यास में  ‘मैं, मैं और केवल मैं काफी चर्चित और लोकप्रिय रहा है।

 शरद जोशी को चकल्लस पुरस्कार 1983 में, भारत सरकार के द्वारा 1989 में  “पद्म श्री”  सम्मान , काका हाथरसी सम्मान, ‘सारस्वत मार्तंड’  आदि सम्मानों से नवाजा गया था।

शरद जोशी के निधन के एक साल बाद 1992 में मध्यप्रदेश सरकार ने 'शरद जोशी' सम्मान शुरू कर एक ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। यह पुरस्कार व्यंग्य और निबंध के क्षेत्र में उत्कृष्ट लेखन के लिए हर वर्ष दिया जाता है।  पुरस्कार में विजेता को 51,000 रुपये के साथ एक प्रशस्ति पत्र भी दिया जाता है। ■■

सम्पर्कः पंचवटी नगर, मकान नं. 30, कृषि फार्म रोड, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़, basantsao52@gmail.com


Dec 2, 2022

वन्य जीवनः देवी देवताओं के वाहन- प्रकृति संरक्षण के प्रतीक

 - बसन्त राघव

मनुष्यों से इतर जो जीव जंतु वन में रहते हैं, वे वन्य प्राणियों की श्रेणी में आते हैं । जन सुरक्षा की बात तो समझ में आती है, लेकिन वन्य प्राणियों की सुरक्षा कुछ लोगों को अटपटी सी लगती है और ऐसे समय में खासकर जब हम मनुष्य के लिए रोटी कपड़ा और मकान की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं लेकिन मनुष्य अपने ही स्वार्थ में केंद्रित हो गया है इस लिए वह उदारतापूर्वक अन्यों पर विचार नहीं कर सकता।

संसार में जितने भी प्राणी हैं, सब एक ही ईश्वर की संतान हैं । सृष्टि की रचना करते समय भी सृष्टिकर्ता ने आवश्यकताओं का ध्यान रखकर  गोचर जगत की सृष्टि की है । जिसमें जड़ - चेतन, पेड़- पौधे, पशु -पक्षी, उसके बाद मनुष्य आते हैं। मनुष्य विधाता की अंतिम रचना है । इसलिए अन्य प्राणी हमारे अग्रज है।

जिस तरह मनुष्यों को जीने का अधिकार है। उसी तरह वन्य प्राणियों को भी है। भारतीय दर्शन  का मूल सूत्र यही है कि मनुष्य को चाहिए वह अन्य प्राणियों को किसी प्रकार की हानि न पहुँचा; क्योंकि सभी में एक ही आत्मा का निवास है । गांधी और गौतम के उपदेशों का सार यही है सत्य अहिंसा परमोधर्म । तुलसी ने सच कहा  है- "परपीड़ा सम नहिं अधमाई।" दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा अधम या निकृष्ट कार्य कोई नहीं है।

आज सरकार व समाज का परम कर्तव्य हैं कि वह वन्य प्राणियों की रक्षा करे । हमारे यहाँ वन्य प्राणियों के संरक्षण वैदिक काल से शुरू हो गया था । हमारे देवी देवताओं के द्वारा किसी न किसी रूप में पशु-पक्षियों को सरंक्षण दिया गया है। भगवान के कच्छप, मत्स्य, वराह, नरसिंह आदि अवतार, जलचर थलचर की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। हमारे मनीषियों ने पशु पक्षियों को भगवानों के वाहनों के रूप में जोड़ा, ताकि हम पशु पक्षियों के प्रति दयालु, सहिष्णु और सेवाभावी हो सके। अगर पशु-पक्षियों को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद हम इनके  प्रति और ज्यादा हिंसक होते।  इस तरह हमारे मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा के लिए मनुष्य को एक संदेश  दिया है। उनका मानना है कि हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए पशु पक्षियों के प्रति हमारा व्यवहार सदैव  उदार होना चाहिए ।

उदाहरण देखिए :

विष्णु का वाहन गरुड़ है। आज गरुड़ पक्षी लुप्त हो रहे है । पक्षी गरुड़ बुद्धिमान होता है। पहले जमाने में उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, वैसे  कबूतर भी यह कार्य  बड़ी कुशलता से करते थे ।

राम काल के सम्पाती और जटायु को भला कौन नहीं जानता। ये दोनों भी छत्तीसगढ़ क्षेत्र में रहते थे। इनके प्रजाति के पक्षी खासकर छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बहुतायत में थी। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर आज भी प्रसिद्ध है ।

माँ लक्ष्मी का वाहन उल्लू भी विलुप्ति  के कगार में है। सामान्यतः उल्लू  शब्द को मूर्ख बनाने के पर्याय में देखा-समझा जाता रहा है=लेकिन यह धारणा बिलकुल गलत है, सच माने तो उल्लू सबसे बुद्धिमान, भूत और भविष्यदृष्टा निशाचारी प्राणी है । वह धन संपत्ति और शुभता का प्रतीक माना जाता है।

कुछ लोग उल्लू के नाखून और पंख आदि को तांत्रिक क्रियाओं के लिए काम में लाते हैं। कुछ नासमझ लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए आज भी दीपावली की रात को उल्लू की बलि चढ़ाते हैं जिसके कारण उल्लू की संख्या में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इनके प्रति क्रूरता करने से पहले हमें नहीं भूलना चाहिए कि लक्ष्मी जी को उलूक वाहिनी भी कहा जाता है ।

हंस पक्षी पवित्र, जिज्ञासु और काफी समझदार होता है। यह माँ सरस्वती का वाहक है। शिव का वाहन नंदी बैल  है। गाँवों में बैलों का बड़ा महत्त्व होता है । भारत में आज भी बैलों से खेतों की जुताई व बैलगाड़ी चलाने के लिए काम में लिया जाता है।

माता पार्वती का वाहन बाघ है। तो दूसरी ओर माँ दुर्गा का वाहन शेर । गणेशजी जी सबसे निराले है उन्होंने अपना वाहन मूषक को बनाया। जिसने सबसे पहले और अति शीघ्र चारों धाम की सैर करवा कर गणेश जी को माता पिता के प्रिय बुद्धिमान बालक जो बना दिया था। कार्तिकेय का वाहन मयूर है मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है । इंद्र का वाहन ऐरावत (सफेद हाथी ) है।  जो थाइलैंड में पाया जाता है। हाथी शांत, समझदार प्राणी है। इस विशालकाय जानवर की हत्या उसकी चर्बी और दाँतों के लिए की जाती है, जो ऊँचें दामों में बिकती हैं, जिसके कारण इंसान इनकी निर्दयतापूर्वक हत्या करता आ रहा है ।

यमराज का वाहन भैंसा है। मगरमच्छ देवी माँ गंगा का वाहन है । मगरमच्छ भारत की छोटी-बड़ी अधिंकाश नदियो में पाये जाते हैं । वैज्ञानिक कहते हैं कि मगरमच्छ हर परिस्थिति में जी लेते हैं। धरती पर मगरमच्छ लगभग 25 करोड़ साल से रहते आ रहे हैं । जल में  मगरमच्छ की अनुपस्थिति से पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ सकता है। वर्तनाम में कल-कारखाने एवं बिजली उत्पादन के नाम पर नदियों की जो दुर्गति हो रही है किसी से छिपी नहीं है जिसके चलते मगरमच्छों के साथ - साथ अन्य प्राणी जगत के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने  लगा है। यमराज भैंसे की  सवारी करते हैं। भैंसा एक सामाजिक प्राणी होता है । भैंसा अपनी शक्ति और स्फूर्ति के लिए भी जाना जाता है। शनिदेव पूरे नौ पशु पक्षियों की सवारी करते हैं, जैसे कि गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं । हालाँकि कौआ उनकी मुख्य सवारी माना जाता है । कौआ एक बुद्धिमान प्राणी है । कौए को अतिथि - आगमन का सूचक और पितरों का आश्रय स्थल माना जाता है । कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है।

भगवान भैरव कुत्ते को हमेशा अपने साथ रखते हैं।  कुत्ता एक कुशाग्र बुद्धि और रहस्यों को जानने वाला प्राणी है। कुत्ता कई किलोमीटर तक की गंध सूँघ सकता है। कुत्ता वफादार प्राणी होता है, जो हर तरह के खतरे को पहले ही भाँप लेता है । प्राचीन और मध्य काल में पहले लोग कुत्ता अपने साथ इसलिए रखते थे, ताकि वे जंगली जानवरों, लुटेरों आदि से बच सकें। यह लोमड़ी प्रजाति का जीव है।

 हनुमानजी तो स्वयं वानर रूप में विराजमान हैं;  इसलिए  वानरों की आज भी पूजा की जाती है, फिर इनका वध कैसे ? इस तरह हम पाते है कि हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले से ही पशु पक्षियों के संरक्षण के लिए रास्ता ढूँढ निकाला था; लेकिन हम है कि अपनी हिंसक प्रवृत्तियों से बाज नहीं आते। हमें प्रकृति और पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए पशु-पक्षियों की सुरक्षा और संवर्धन को लेकर गंभीरता और  तेजी से काम करने की जरूरत है।

कल्पना कीजिए ये नीले आकाश में बंदनवार जैसे लरजते कलगान करते राजहंस चहचहाते हुए पक्षी हरी- हरी दूब पर टूँगते खरगोश छलांग मारते हुए हिरन, क्या बध्य हैं । यदि शेर, चीते, भालू, हिरन, खरगोश, हाथी, सांभर आदि से जंगलों को वंचित कर दिया जाए, तो उसमें रखा ही क्या है? पशु-पक्षी प्रकृति  सहचरी के पुंज ही नहीं ; बल्कि विश्व सौंदर्य के अनुपम उपहार हैं। क्या इस सौंदर्य को विनष्ट करके हम कभी भी सुंदर बन सकते हैं।

 वन्य प्राणियों के अवैध शिकार के कारण उनकी संख्या निरंतर कम होती जा रही है । सृष्टि के कई विरले प्राणियों की प्रजातियाँ तो विलुप्त होती जा रही हैं। भोले- भाले जीवों की निर्दयतापूर्वक हिंसा सभ्य समाज के लिए कभी वांछनीय नहीं हो सकती । इसीलिए सरकार ने जंगली जानवरों के शिकार को अवैध करार दिया है और अपराधियों के लिए सजा का प्रावधान रखा है; परंतु लाख सावधानियों के बाद भी अवैध शिकार जारी है।

 वन्य प्राणियों की रक्षा या संरक्षण का अर्थ न केवल उनके प्राणों की रक्षा है; बल्कि क्षीण होती जा रही दुर्लभ प्राणियों की संख्या में वृद्धि , नस्ल में सुधार, उनके रहने के लिए पर्याप्त सुरक्षित वन, नदी नाले आदि का रक्षण है ।

 इतना ही नहीं चिड़ियाघर व अजायबघरों में जैसे उनके आहार और उपचार की व्यवस्था की जाती है, उसी प्रकार की व्यवस्था रक्षित जंगलों के प्राणियों के लिए भी होना चाहिए।

इसी प्रकार घने जंगलों के सफाया होने से भी उनका समुचित विकास नहीं हो पाया । घने जंगलों में ही वन्य प्राणियों की वृद्धि  हो सकती है अब शासन ने इस राष्ट्रीय समस्या से जूझने के लिए घने जंगलों की रक्षा के साथ ही कृत्रिम वन लगाने शुरु किए हैं और वन्य प्राणियों के संवर्धन की बात भी सोची जा रही है।

वन्य प्राणियों के संरक्षण हेतु शासन अनेक योजनाएँ तैयार कर रहा है और उसके क्रियान्वयन के लिए प्रभावशाली कदम उठाए जा रहे हैं । वर्तमान भारत में 106 राष्ट्रीय उद्यान एवं 500 से भी अधिक वन्य जीव अभयारण्य हैं। भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड के नैनीताल में 1935 में ‘हैली नेशनल पार्क’  के नाम से स्थापित किया गया था। जिसका वर्तमान नाम ‘जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान’ है। मध्यप्रदेश में सर्वाधिक राष्ट्रीय उद्यान है जिसमें बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान एवं कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान प्रमुख हैं। भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान जम्मू कश्मीर के लेह में  ‘हिमिस राष्ट्रीय उद्यान’ है, जिसका कुल क्षेत्रफल ही 4400 वर्ग किलोमीटर है । देश का सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य  ‘नागार्जुन सागर बाघ अभयारण्य’,  जो आंध्र प्रदेश में स्थापित है।  कलकत्ता में भारत प्राणिविज्ञान सर्वेक्षण का मुख्यालय है।

केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वाधिक वन्य जीव अभयारण्य अंडमान निकोबार द्वीप समूह में हैं। इसके अलावा नामेरी, काजीरंगा, देंहिंग पटकाई और रायमोना राष्ट्रीय उद्यान प्रसिद्ध है।  छत्तीसगढ़ में इन्द्रावती, गुरुघासीदास, कांकेर राष्ट्रीय उद्यान हैं। अभयारण्यों में भैरमगढ़ वन्यजीव अभयारण्य, पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना 1983 में की गई हैं। जो बीजापुर जिला के अंतर्गत हैं।

अब तो अफ्रीकी चीतों को श्योपुर जिले के ‘कूनो नेशनल पार्क’ में रखा गया है। यह वन्यजीव प्रेमियों के लिए हर्ष का विषय है।  इनके पीछे सरकार का एक मात्र उद्देश्य 'पशु, पक्षी या वन संपदा को संरक्षित करना, उसका विकास करना व शिक्षा तथा अनुसंधान के क्षेत्र में उसकी मदद लेना होता है।’

वन्य प्राणी हमारी प्रकृति में संतुलन रखते हैं । जो वन्य प्राणी हमारे लिए सहायक है और जो मरकर भी हमारे काम आते हैं उनकी रक्षा करना शासन का ही नहीं हर व्यक्ति का परम कर्तव्य है ।

सम्पर्कः पंचवटी नगर, मकान नं. 30, कृषि फार्म रोड, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़, basantsao52@gmail.com, मो. 8319939396

Apr 1, 2022

कविताः यूक्रेन युद्ध

 - बसन्त राघव

....क्या हो गया है

इस बदहवास भीड़ को!

क्यों भागे जा रहे हैं बेतहाशा

क्यों है इतनी बेचैनी

छोड़ने की ..अपने वतन को

....

सहमें हुए हैं

घायल रक्त रंजित वृद्ध, बच्चे, स्त्रियाँ

भागे जा रहे हैं, भागे जा रहे हैं

शरणार्थी शिविरों की ओर

....

आज सारा युक्रेन

तब्दील हो गया है

श्मशान में

जल रहा है धू -धू

....

एक आग सुलगने लगी है

लोगों के भीतर भी लहू खौल रहा है

युद्धोन्माद के खिलाफ

एक यक्ष प्रश्न तैर रहा है हवा में

क्या युद्ध के अलावा

और कोई रास्ता नहीं बचा है

समाधान का ...

...

हर क्षण भयावह और वीभत्स

जाने कब कौन, कहाँ शिकार हो जाये

निर्दय खूंखार गोलियों का

उड़ाये जा रहे हैं मिसाइलों से

इंसानियत के परखच्चे

शनैश्चर विचरण कर रहा है

मुँडेर - दर -मुँडेर

कहीं यह अतंर्दृष्टि की

घोर चूक तो नहीं

वोलोदिमीर जेलेंस्की

देखो तो कैसा मंजर है चारों ओर

या फिर तुम्हें दिखाई नहीं देता

कि क्या हो रहा है?

....

किसी को कुछ नजर नहीं आता

कोहरा बहुत घना है

तो जाएँ कहाँ,

हर मोड़ पर तो खतरा है

‘टैंक’  मुँह बाएँ खड़ा है

....

कदम -कदम पर है बिछा है

मौत का पहरा

रची जा रही मानवता की अग्नि समाधि

कर रहा अट्टहास राक्षसी दंभ

....

क्या घर, क्या बाहर,

क्या गली, क्या चौपाल

हर जगह, हर समय मँडरा रहा  काल

न जाने क्यों अब किसी पर

भरोसा नहीं होता

क्यों दिखाई नहीं देता

शांति की पहल करनेवाला

कोई मसीहा

....

कभी खारकीव, कभी खेरसाँन में

तो कभी चेर्निहाइव और मारियुपोल,

इरपिन और कभी कीव में

हर शहर, गाँव में

कभी दस-बीस तो कभी हजार

जानें जा रही हैं

तमाशबीन हो गई है सारी दुनिया

बर्बरता की पराकाष्ठा

लिख रही है कलंक कथा

स्कूलों, अस्पतालों, चर्चों तक में

....

रोको- रोको इस महाविनाश को

रोको और अधिक अशुभ होने से

रोको खंडित होने से मानवता को ,

विश्वबन्धुत्व को

....

अभी भी वक्त है चेतो,

बाज आओ ठहरो- ठहरो जरा

ओ सैन्य वीरों सोचो- सोचो जरा

ओ कर्णधारों आओ

महाविनाश के सभी हथियार

सिरा आएँ सागर में

मनुष्य हैं तो, मनुष्य बनकर रहें

सुंदर धरती को लहू से सींच कर

क्या कभी तुमने

किसी फूल को खिलते

देखा है?


सम्पर्कः पंचवटी नगर, मकान नं.30, बोईरदादर, कृषि फार्म रोड,

रायगढ़, छत्तीसगढ़, मो. 8319939396, basantsao52@gmail.com