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Apr 1, 2023

चार लघुकथाएँ

1. मरुस्थल के वासी

- श्याम सुन्दर अग्रवाल

गरीबों की एक बस्ती में लोगों को संबोधित करते हुए मंत्रीजी ने कहा, “इस साल देश में भयानक सूखा पड़ा है। देशवासियों को भूख से बचाने के लिए जरूरी है कि हम सप्ताह में कम से कम एक बार उपवास रखें।”

मंत्री के सुझाव से लोगों ने तालियों से स्वागत किया।

हम सब तो हफते में दो दिन भी भूखे रहने के लिए तैयार हैं। भीड़ में सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने कहा।

मंत्रीजी उसकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए और बोले, “जिस देश में आप जैसे भक्त लोग हों, वह देश कभी भी भूखा नहीं मर सकता।

मंत्रीजी चलने लगे जैसे बस्ती के लोगों के चेहरे प्रश्नचिह्न बन गए हों।

उन्होंने बड़ी उत्सुकता के साथ कहा, ‘अगर आपको कोई शंका हो तो दूर कर लो।’

थोड़ी झिझक के साथ एक बुजुर्ग बोला, ‘साब! हमें बाकी पाँच दिन का राशन कहाँ से मिलेगा ?’

2. पाँव का जूता 

- डॉ. सतीश दुबे

बैसाख की सन्नाटे–भरी दोपहरी में कभी एड़ी तो थोड़ी देर बाद पंजे ऊँचे करके चलते हुए वे दुकान के अहाते में पसरी हुई छाइली के बीच खड़े हो गए। क्षण–भर बाद थकान और पीड़ा से भरी हुई निगाह उन्होंने दुकानदार की ओर घुमाई, ‘‘भइया! ये दवाई दे दो। देख लेना जरा, पेट–दरद की ही है ना, बूढ़ी दरद से तड़फ रही है।’’

लाठी टेकते हुए धीमी–धीमी चाल से आ रही इस आकृति के क्रियाकलाप को बड़ी देर से देख रहा दुकानदार अपने को संयत नहीं कर पाया तथा आर्द्रभाव से बोला, ‘‘बाबा! यह क्या? पैरों में जूते–चप्पल तो डाल लिए होते। ऐसी तेज घूप में नंगे पैर, जूते कहाँ गए आपके?’’

‘‘जूते.....’’ उन्होंने धीरे–धीरे अपनी गर्दन ऊँची करके दुकानदार की ओर देखा तथा पूरा वजन लाठी पर टिकाते हुए बोले, ‘‘बबुआ, जब से बेटे के पाँव मेरे पाँव के बराबर हुए हैं, जूते वह पहनने लगा है।’’

उनका जवाब सुनकर दुकानदार को एहसास हुआ, मानो गरम लपट का कोई झोंका आहत करके गुजर गया हो। उसकी निगाह उनके तपे हुए चेहरे, जले हुए पाँवों तक फिसली तथा वह सिहर उठा। उसने दवाई चुपचाप उनकी ओर खिसका दी तथा अपने जूतों को पैरों में जोरों से भींच लिया।

3. जानवर भी रोते हैं

 - जगदीश कश्यप

चोर निगाहों से बन्तो ने देखा कि सरदारजी बार–बार उसकी ओर देख रही थी। उसने चाहा कि वह पूछ ले– कोई तकलीफ तो नहीं। कहीं सरदारनी पहले की तरह फिर से न बिफर पड़े–‘‘नी बन्तो, मैं हाँ जी....तू की खाके मेरे सामणे बोलेगी...’’ चाहती तो बन्तो भी उसे खरी–खरी सुना देती पर औरतों ने समझाया कि लड़ाका कुलवन्त कौर के मुँह लगना तो अपना चैन खोना है।

‘‘तुसी वाज (आवाज) दिती मैनूं?’’ बन्तो ने छत से खड़े होकर पुकारा। आँगन में खड़ी भैंस बार–बार बिदक रही थी। कुलवन्त ने इस अन्दाज से सिर हिलाया कि उसने कोई मदद नहीं मांगी है। फिर भी बन्तो जोर से बोली–‘‘ठैर बीजी मैं आनियाँ...’’

उस समय कुलवन्त खेतों में था। पुरबिए भैसों के साथ खर–पतवार साफ कर रहे थे। इधर सिरफिरों ने उसके बीमार पति, पुत्रवधू, उसके दोनों बच्चों को गोलियों से भून डाला था। पुत्र तेजिन्दर इस हत्याकाण्ड से पगलाया हुआ फिरता है। सरकार ने नौकरी देने की बात कही, पर कुछ नहीं हुआ।

बन्तो ने भैंस को सहलाया तो कुलवन्त को लगा कि उसकी पीठ सहलाई जा रही है। गाँव से झगड़ा करके वह सुखी नहीं रह सकी, यह अन्दाजा उसे अब हो रहा था। सिरफिरों की गोलियों से भैंस का कटड़ा भी मारा जा चुका था, जिस कारण भैंस कूदने लगी थी। बन्तो ने बाल्टी के पानी के छींटे भैंस के थन में मारे और धार काढ़ने लगी। कुलवन्त ने देखा–भैंस उसकी ओर इस अन्दाज से देखती हुई जुगाली–सी कर रही थी, मानों कह रही हो–‘‘बन्तो का भी सारा परिवार गोलियों का शिकार हो गया। चलो तुम लोगों से सिरफिरों ने जो भी बदला लिया हो पर मैंने आतंकवादियों का क्या बिगाड़ा था जो मेरे कटड़े को मार गिराया।’’

भैंस ने देखा कुलवन्त कौर बन्तो के नजदीक बैठ गई और उसकी पीठ से सिर टिकाकर रोने लगी। ‘काश! कोई उसका भी रोना देख पाए,’ गुमसुम भैंस ने सोचा।

4. अंतहीन  सिलसिला  

-  विक्रम सोनी

दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप–कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ‘‘नेतराम...!’’साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ‘‘नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।’’

‘‘मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।’’

‘‘तो क्या हुआ, पहन ले।’’ भीड़ से दो–चार जनों ने कहा।

नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ‘‘अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’

नेतराम चुप रहा।

एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ‘‘मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’ और वह एक बार फिर रो पड़ा।

अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी–हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।

Jan 1, 2021

लघुकथा- पेट पर लात

 पेट पर लात

-विक्रम सोनी

उसे आज भी मजदूरी नहीं मिली। मजबूत कदकाठी का था। अत:, भीख माँगना उसको बीमार बना देता। शहर भर की सड़क नापने के बाद वह मोटर स्टैण्ड के शैड में सुस्ताने बैठ गया है। करीब ही एक बाबू पेटीबिस्तर पर बैठे इधरउधर देख रहे थे। उसने पूछा, ‘सामान ढोना है बाबू जी ? चलिये मैं पहुँचा दूँ, कहाँ चलियेगा ?’’

‘‘धामपुर! क्या लोगे?’’

‘‘सोच समझकर दे दीजिएगा।’’

‘‘फिर भी ! तय रहे तो अच्छा है न?’’

‘‘पाँच रुपये।’’

‘‘चलो!’’

वह अभी पेटी उठवा ही रहा था, दोतीन वर्दीधारी कुली आ धमके। एक ने बाबू जी से कहा, ‘आप लोग पढ़ेलिखे होकर भी लायसेन्स वाले कुलियों को चोर समझते हैं। जानते हैं ये कुली बन गँवार जैसा आदमी कौन है? शहर के नामी गुण्डे जग्गी का खास पट्ठा। अभी ले जाकर रास्ते में आपको नंगा कर देता।

वह हक्काबक्का कभी कुली की तरफ कभी बाबू जी की तरफ देख रहा था। वह कुछ बोलता, इससे पहले ही कुली ने उसके गाल पर एक तमाचा जड़ते हुए कहा, ‘‘जा ! अपने बाप से कह देना, यह मेरा इलाका है।’’ फिर वह बाबू जी की ओर पलटा, ‘‘जाइए आपको हमारा साथी सुरक्षित पहुँचा आएगा।’’ कहाँ जाइएगा?’’

‘‘धामपुर!’’

‘‘पन्द्रहरुपये कुली को दे दीजिएगा।’’

बाबू जी भी डर गए थे। उनके जाते ही उसी मरियल कुली ने उससे कहा, ‘‘कौन है बे? आइन्दा पेट पर लात मारने इधर आया, तो अंतड़ी निकाल लूँगा समझा! चल भाग यहाँ से।’’

 वह बाहर आतेआते सोच रहा था, कौन किसके पेट पर लात मार रहा है?

Apr 16, 2019

विक्रम सोनी की चार लघुकथाएँ

विक्रम सोनी की
 चार लघुकथाएँ
1-कारण
चमचमाती, झंडीदार अंबेसडर कार बड़े फौजी साज–सामान बनानेवाली फैक्टरी के मुख्य द्वार से भीतर समा गई। नियत स्थान पर वे उतरे। अफसरान सब पानी जैसे होकर उनके चरणों को पखारने लगे। कुछ गण्यमान्य कहे जानेवाले खास लोग विनम्रता के स्टूच्यू सरीखे खड़े हो गए। फैक्टरी के इंजीनियर स्वचालित मशीनों की तरह चल पड़े। उनकी निगाहे बाई ओर घूमीं।
‘‘इधर विद्युत् संबंधी काम होता है सर!’’
उन्होंने दाईं ओर देखा।
‘‘इधर टूलरूम है महोदय!’’
वे आगे बढ़ गए।
‘‘सामने बारूद का काम होता है सरकार!’’
वे बारूद के ढेर में सम्मिलित हो गए।
सुबह अखबारों ने मुँह खोल दिए। जब मैंने निकाले गए मजदूर तथा तकनीशियनों से उनके निकाले जाने के कारण जानना चाहा तो सात छोटे–बड़े पारिवारिक बेटों के मुखिया ने कहा, ‘‘भइया जी, कल हमारे कारखानों में लोकतंत्र घुस आया था।’’
2-अंतहीन सिलसिला
दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप–कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ‘‘नेतराम…!’’साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ‘‘नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।’’
‘‘मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।’’
‘‘तो क्या हुआ, पहन ले।’’ भीड़ से दो–चार जनों ने कहा।
नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ‘‘अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’
नेतराम चुप रहा।
एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ‘‘मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’ और वह एक बार फिर रो पड़ा।
अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी–हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।
3-मुआवजा
वह बोझिल कदमों से अस्पताल की सीढि़याँ उतर रहा था। उसके पीछे–पीछे उसकी पत्नी बिसूरती हुई चली आ रही थी। उसके दोनों हाथों के समानंतर फैलाव पर उसके सातेक साल के बच्चे की लाश बेकफन पसरी हुई थी। बाहर अब भी वर्षा हो रही थी।
पिछले कई दिनों से वर्षा थमी नहीं थी। और वह था तेज का मजदूर। चौथे दिन के ढलते–ढलते बच्चा भूख और तेज ज्वर से बिलबिलाने लगा था। घर में बचा–खुचा जो भी था, दाना–दाना लील लिया गया। बच्चे को पोलीथिन की छप्पर तले अधिक देर तक नहीं रखा जा सकता था। भीगी कथरी में बच्चे को लपेटकर सुबह ही वह सरकारी अस्पताल जा पहुँचा। बच्चे को भरती कर लिया गया। अभी उसके हाथों में दवाई की पर्ची तथा दूध, फल देने की हिदायतें पकड़ाई ही गई थीं कि बच्चे ने दम तोड़ दिया। डॉक्टर ने लाश जल्दी उठाने को कहते हुए सलाह दी, ‘‘करीब ही सरकारी राहत पड़ाव है। वहाँ चले जाओ। बरसात से हुई हानि का मुआवजा मिल जाएगा और तुम दोनों भी सुरक्षित रहोगे।’’
वह बच्चे को उठा ही रहा था कि नर्स ने कुढ़ते हुए–सा कहा, ‘‘बच्चा बरसाती पानी में डूबकर मरा होता तब तो मुआवजा मिलता। यह तो भूख से मरा है।’’
अंतिम सीढ़ी पर पहुँचते–पहुँचते उसकी पत्नी के खाली पेट में जमकर मरोड़ उठा। रुलाई की वजह से नस–नस में ऐंठन–सी हो रही थी। उसने पत्नी को दिलासा दी और दोनों भीगते हुए ही घुटने भर पानी में चल पड़े। सड़क जनशून्य थी। सामने से एक लॉरी आदमी, औरतों, बच्चों से ठसाठस भरी आ रही थी। उसने उसे रोकना चाहा, मगर तभी लॉरी लड़खड़ाई तथा बाईं ओर बनी दीवार से टकराकर अधउलटी रुक गई। कई जिस्म नीचे पानी में गिरकर छटपटाने लगे। कोहराम मच गया। वह बच्चे की लाश को फेंककर छटपटाते लोगों के बीच खड़ा हो चिल्ला पड़ा ‘‘हाय मेरा बच्चा, मेरी औ…..र…त।’’
उसकी निगाहें पीछे आती पत्नी को ढूँढ रही थीं और उसकी पत्नी अपने ही करीब तैरती बच्चे की लाश से परे हिलोरें खाती डबलरोटी को झपटने की कोशिश कर रही थी।
4-सर्वशक्तिमान
उस नवनिर्मित के द्वार पर दिन–ब–दिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। चौबीसों घंटे श्रद्धालुओं की उपस्थिति से मंदिर का मुख्य द्वार कभी बंद नहीं हो पाता था। पूजन–अर्चन के बाद लौटते हुए इतनी संतुष्टि,आज से पहले दुनिया के किसी भी धर्मगढ़ से निकलते लोगों के चेहरों पर नहीं देखी गई। खास बात तो यह कि इस मंदिर में सभी धर्मों और समुदायों के लोग आ–जा रहे थे।
किसी से पूछते कि इस मंदिर में किसकी मूर्ति रखी हुई है तो लोग एक ही उत्तर देते, ‘सर्वशक्तिमान की,’ और श्रद्धा–भक्ति से आँख मूँद लेते।
सरकार एक दिन खुद ताव खाते मंदिर में घुस पड़े। आखिर उनसे ज्यादा ताकतवर यह कौन सर्वशक्तिमान अवतरित होकर एक धर्म साम्राज्य पर फावड़ा चला रहा है? वे पहुँचे। दर्शन पाते ही उनकी गर्दन झुक गई। वे फर्श से माथा टेककर बड़बड़ाए, ‘‘हे सर्वशक्तिमान, मुझ दरिद्र पर कृपा करो।’’ दरअसल वहाँ स्वर्ण–सिंहासन पर चाँदी का एक गोल सिक्का रखा हुआ था।

Feb 10, 2015

लघुकथाएँ

 अंतहीन  सिलसिला 

दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दियातभी कलप-कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थेवे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ''नेतराम...!” साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ''नेतराम बेटाअपने बाप का यह जूता पहन ले।
''मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।
''तो क्या हुआपहन ले।  भीड़ से दो-चार जनों ने कहा।
नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ''अब बोलमैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।
नेतराम चुप रहा।
एक बारदूसरी दफेआखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ''मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं। और वह एक बार फिर रो पड़ा।
अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी-हलवाही में तब तक खटते रहना हैजब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।

सर्वशक्तिमान

उस नवनिर्मित के द्वार पर दिन-ब-दिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। चौबीसों घंटे श्रद्धालुओं की उपस्थिति से मंदिर का मुख्य द्वार कभी बंद नहीं हो पाता था। पूजन-अर्चन के बाद लौटते हुए इतनी संतुष्टि,आज से पहले दुनिया के किसी भी धर्मगढ़ से निकलते लोगों के चेहरों पर नहीं देखी गई। खास बात तो यह कि इस मंदिर में सभी धर्मों और समुदायों के लोग आ-जा रहे थे।
किसी से पूछते कि इस मंदिर में किसकी मूर्ति रखी हुई है तो लोग एक ही उत्तर देते, 'सर्वशक्तिमान की,  और श्रद्धा-भक्ति से आँख मूँद लेते।
सरकार एक दिन खुद ताव खाते मंदिर में घुस पड़े। आखिर उनसे ज्यादा ताकतवर यह कौन सर्वशक्तिमान अवतरित होकर एक धर्म साम्राज्य पर फावड़ा चला रहा हैवे पहुँचे। दर्शन पाते ही उनकी गर्दन झुक गई। वे फर्श से माथा टेककर बड़बड़ाए, ''हे सर्वशक्तिमानमुझ दरिद्र पर कृपा करो।  दरअसल वहाँ स्वर्ण-सिंहासन पर चांदी का एक गोल सिक्का रखा हुआ था।

कारण

चमचमाती, झंडीदार अंबेसडर कार बड़े फौजी साज-सामान बनाने वाली फैक्टरी के मुख्य द्वार से भीतर समा गई। नियत स्थान पर वे उतरे। अफसरान सब पानी जैसे होकर उनके चरणों को पखारने लगे। कुछ गणमान्य कहे जानेवाले खास लोग विनम्रता के स्टेच्यू सरीखे खड़े हो गए। फैक्टरी के इंजीनियर स्वचालित मशीनों की तरह चल पड़े। उनकी निगाहे बाईं ओर घूमीं।
''इधर विद्युत् संबंधी काम होता है सर!
उन्होंने दाईं ओर देखा।
 ''इधर टूलरूम है महोदय!
वे आगे बढ़ गए।
''सामने बारूद का काम होता है सरकार!
वे बारूद के ढेर में सम्मिलित हो गए।
सुबह अखबारों ने मुँह खोल दिए। जब मैंने निकाले गए मजदूर तथा तकनीशियनों से उनके निकाले जाने के कारण जानना चाहा तो सात छोटे-बड़े पारिवारिक बेटों के मुखिया ने कहा, ''भइया जीकल हमारे कारखानों में लोकतंत्र घुस आया था।

सम्पर्क: बी-4, तृप्ति विहार इन्दौर रोड ,उज्जैन (म.प्र.)

Oct 22, 2013

तीन लघुकथाएँ


- विक्रम सोनी

1.अंतहीन  सिलसिला 

दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप-कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ''नेतराम...!” साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ''नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।
''मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।
''तो क्या हुआ, पहन ले।  भीड़ से दो-चार जनों ने कहा।
नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ''अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।
नेतराम चुप रहा।
एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ''मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं। और वह एक बार फिर रो पड़ा।
अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी-हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।

2.सर्वशक्तिमान

उस नवनिर्मित के द्वार पर दिन-ब-दिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। चौबीसों घंटे श्रद्धालुओं की उपस्थिति से मंदिर का मुख्य द्वार कभी बंद नहीं हो पाता था। पूजन-अर्चन के बाद लौटते हुए इतनी संतुष्टि,आज से पहले दुनिया के किसी भी धर्मगढ़ से निकलते लोगों के चेहरों पर नहीं देखी गई। खास बात तो यह कि इस मंदिर में सभी धर्मों और समुदायों के लोग आ-जा रहे थे।
किसी से पूछते कि इस मंदिर में किसकी मूर्ति रखी हुई है तो लोग एक ही उत्तर देते, 'सर्वशक्तिमान की,  और श्रद्धा-भक्ति से आँख मूँद लेते।
सरकार एक दिन खुद ताव खाते मंदिर में घुस पड़े। आखिर उनसे ज्यादा ताकतवर यह कौन सर्वशक्तिमान अवतरित होकर एक धर्म साम्राज्य पर फावड़ा चला रहा है? वे पहुँचे। दर्शन पाते ही उनकी गर्दन झुक गई। वे फर्श से माथा टेककर बड़बड़ाए, ''हे सर्वशक्तिमान, मुझ दरिद्र पर कृपा करो।  दरअसल वहाँ स्वर्ण-सिंहासन पर चांदी का एक गोल सिक्का रखा हुआ था।

3.कारण

चमचमाती, झंडीदार अंबेसडर कार बड़े फौजी साज-सामान बनाने वाली फैक्टरी के मुख्य द्वार से भीतर समा गई। नियत स्थान पर वे उतरे। अफसरान सब पानी जैसे होकर उनके चरणों को पखारने लगे। कुछ गणमान्य कहे जानेवाले खास लोग विनम्रता के स्टेच्यू सरीखे खड़े हो गए। फैक्टरी के इंजीनियर स्वचालित मशीनों की तरह चल पड़े। उनकी निगाहे बाईं ओर घूमीं।
''इधर विद्युत् संबंधी काम होता है सर!
उन्होंने दाईं ओर देखा।
 ''इधर टूलरूम है महोदय!
वे आगे बढ़ गए।
''सामने बारूद का काम होता है सरकार!
वे बारूद के ढेर में सम्मिलित हो गए।
सुबह अखबारों ने मुँह खोल दिए। जब मैंने निकाले गए मजदूर तथा तकनीशियनों से उनके निकाले जाने के कारण जानना चाहा तो सात छोटे-बड़े पारिवारिक बेटों के मुखिया ने कहा, ''भइया जी, कल हमारे कारखानों में लोकतंत्र घुस आया था।

सम्पर्क: बी-4, तृप्ति विहार , इन्दौर रोड ,उज्जैन (म.प्र.)