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Sep 4, 2026

कविताः मृत्यु, तू जब भी आना...

  - डॉ. पूनम चौधरी

मृत्यु,

तू जब भी आना, दबे पाँव आना।

इतना धीरे

कि न टूटे

मेरे घर की हवा का संतुलन।

न काँपे तेरी आहट से

तुलसी की पत्तियों पर ठहरी ओस।

घर के कोनों में न भर देना

अचानक से खालीपन।

बस मेरे  स्पंदन को

बन जाने देना स्मृति।


मैं केवल एक देह,

एक नाम,

एक स्त्री नहीं हूँ।

मैं फैली हूँ—

उस दाम्पत्य में

जो शब्दों से नहीं,

साथ बिताए समय के 

अवक्षेप से बना है;

जहाँ एक के अंतर्मन में उठा

अल्पतम कंपन भी

दूसरे तक

बिना किसी उच्चारण के 

पहुँच जाता है।

 

उन अदृश्य आश्रयों में,

जहाँ मेरे बच्चे

अपनी पराजय,

अपने भय

और अपने अनकहे दुःख

मेरी हथेलियों पर रखकर

निश्चिंत हो जाते हैं।

 

अपनी माँ की प्रार्थनाओं में,

जहाँ मैं आज भी

उनकी चिंता का 

सबसे कोमल कारण हूँ।

 

अपने विद्यार्थियों की

उत्सुक आँखों में,

जो अपने

नन्हे हाथों से

वर्णमाला का 

पहला स्वर साध रहे हैं।

 

आँगन का हरसिंगार,

खिड़की की गौरैया,

दरवाज़े पर बैठा वह बूढ़ा कुत्ता—

ये सब मेरे जीवन के बाहर नहीं,

मेरे जीवन के विस्तार हैं,

जो मेरे होने को

किसी परिचय के बिना 

पहचान लेते हैं।

 

इसलिए, मृत्यु,

तू जब भी आना,

दबे पाँव आना।

 

मुझे पता है,

मेरा जाना भी

इस व्यवस्था का स्वाभाविक क्रम है

 

किन्तु

हर प्रस्थान का होता है 

एक ऋतु-विज्ञान,

हर विदाई की होती है एक गरिमा।

 

बस तब आना,

जब मेरे हिस्से का प्रेम

पहुँच चुका हो

अपने समस्त आश्रयों तक।

 

जब मेरी उपस्थिति से बड़ा हो गया हो

मेरे होने का अर्थ। 

जब आना,

तो किसी वज्रपात की तरह मत आना।

 

आना

जैसे पका हुआ फल

शाख से अलग होता है।

 

आना

जैसे नदी

बिना किसी शोर के

सागर में

अपना नाम विसर्जित कर देती है।

 

आना

जैसे दीप

अपने होने को 

प्रकाश में बदल 

फिर स्वयं

निस्पंद हो जाता है।

 

वैसे ही 

मेरे जाने के बाद

मेरे हिस्से की करुणा,

मेरे हिस्से की ऊष्मा,

मेरे हिस्से का विश्वास

उनके जीवन में बना रहे।

 

और जब कभी

मेरी अनुपस्थिति उन्हें छुए,

तो वह दुःख नहीं,

साहस में बदल जाए।

 

बस तब

ले चलना—

जब मन में

कुछ भी अवशेष न हो।

 

न कोई ऋण,

न कोई अनुताप,

न कोई मोह,

न कोई आकुल पुकार।

 

केवल यह संतोष हो

कि जीवन ने जो मेरे हाथों में सौंपा था,

उसे थोड़ा और सार्थक बनाकर

लौटा दिया। ■

May 1, 2026

कविताः बचा रहे जो आवश्यक है

  - डॉ. पूनम चौधरी 

बचा रहे

जो सच में आवश्यक है।


सवेरा

जब खिड़की पर आए-

सिर्फ़ उजाला नहीं,

भरोसे की 

एक किरण भी लाए,

जो चुपचाप जोड़ सके

टूटे हुए तार।


बचा रहे स्पर्श-

वह,

जो देह से परे

मन तक पहुँचता है,

मुक्त करता है

पीड़ा से,

बेचैनी से,

क्लांति से-

जैसे

माँ का हाथ,

निर्वाक,

सिर पर ठहरा हुआ।


बची रहे

हाथों की कोमलता-

उनमें ऊष्मा हो,

वे जानें

तोड़ना नहीं,

सहेजना;

छिटकना नहीं,

थामे रखना।


बचा रहे स्वाद-

न अधिक मिठास,

न अनावश्यक कड़वाहट,

बस

रोटी की भाप-सा सादा,

जो जीवन को

धीरे-धीरे पकाता रहे।


सीखा जाए

केवल उपयोग नहीं-

मान रखना भी।

बचा रहे मनुष्य,

और उसकी मनुष्यता।


सड़कों का शोर

सिर्फ़ प्रतिध्वनि न हो-

उसमें

अर्थ की एक लौ बचे,

जो

हवा के साथ भी जले,

और

विरुद्ध भी।


निराशा का भी

एक कोना हो-

जहाँ

अँधेरे के भीतर

प्रभात

संभावना बनकर ठहरा रहे।


बचा रहे प्रेम-

उसमें

सरलता हो,

थोड़ी-सी मासूमियत,

थोड़ी-सी नादानी-

जैसे

बच्चे की अकारण हँसी,

जो भीगी आँखों में भी

जगा दे

मुस्कान के जुगनू।


रिश्ते

बोझ न बनें-

ठिकाने हों,

जहाँ लौटकर

भटकनों के बाद

मन

उतार सके 

अपने थकान भरे जूते,

और पा सके विश्रांति।


कवि

जब भी लिखें-

सच लिखें।

चाहे वह चुभे,

चाहे उठाए प्रश्न-

पर

संवेदना कम न हो;

दूसरों के दुःख को

महसूस करने की

क्षमता बची रहे।


और-

जब तक यह जीवन है,

यह आकांक्षा भी बनी रहे।


क्योंकि

जब तक

बचाए रखने की

 इच्छा है,

तब तक

दुनिया में कहीं न कहीं

उम्मीद की एक लौ

जलती रहती है।

Feb 1, 2026

किताबेंः इतिहास के हाशिये से उठती एक चेतना

 -  डॉ. पूनम चौधरी

पुस्तकः चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी : क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर-लेखकः डॉ.शिवजी श्रीवास्तव, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसन्त कुंज, नई दिल्ली-110070, पृष्ठः 142, मूल्यः210 रुपये

स्वतंत्र भारत में लिखा गया क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास  और आलोचना का बड़ा भाग विख्यात,परिचित और उजले चेहरों के आसपास ही सीमित रहा। उन उजाले पृष्ठों के पीछे अनगिनत नाम ऐसे थे जिनकी वैचारिक शक्ति और दुर्दांत जिजीविषा संगठन की रीढ़ थी, जिन्होंने तन से,मन से और विचारों से इस आंदोलन को, इस संघर्ष को निरंतरता दी और स्वयं का उत्सर्ग कर दिया। अक्सर यह चेहरे स्मृति के अंधेरे में चले गए। शिवजी श्रीवास्तव का यह प्रयास इस अंधेरे में उतारने का बेजोड़ साहस है।

चंद्रशेखर आज़ाद के विश्वस्त सहयोगी: क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि भारतीय क्रांति के उस अनदेखे- अनुलिखित पक्ष को सामने लाने का सशक्त प्रयास है, जहाँ विचार, संगठन, त्याग और सृजन एक-दूसरे में घुलकर राष्ट्र- निर्माण की चेतना बनते हैं। यह पुस्तक किसी व्यक्ति विशेष का स्मारक भर नहीं है; बल्कि उस दीर्घ चेतना के इतिहास का नैतिक दस्तावेज है जिसने इस क्रांतिकारी आंदोलन को सशक्त बनाया।

डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस पुस्तक में एक सतत विचारशील चेतन की तरह स्पंदित होता है। यह पुस्तक बड़े-बड़े दावे प्रस्तुत नहीं करती, न ही माहौर जी का जीवन किसी नाटकीय आरोह अवरोह के साथ प्रस्तुत किया गया। यह जीवन मुखर होकर कोई दावा नहीं करता, स्वयं को केंद्र में नहीं रखता- फिर भी हर मोड़ पर उपस्थित रहता है। लेखक ने इसी मौन उपस्थिति को रेखांकित किया है। क्रांति क्षणिक उन्माद नहीं, विस्फोट नहीं; बल्कि धीरे-धीरे संस्कार बनती हुई व्यक्ति के व्यक्तित्व में उतरती जाती है, उसके शब्दों में अभिव्यक्त होने लगती है और अंततः उसके आचरण में बस जाती है। यह दृष्टि पुस्तक को साधारण जीवनी से उठाकर एक साहित्यिक-वैचारिक पाठ बना देती है।

 यह पुस्तक कई दृष्टि से विशेष है। राजनीतिक दृष्टि से यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक जटिल: किंतु अधिक मानवीय और कारुणिक छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आजाद केवल पौरुष और पराक्रम का प्रतीक बनकर नहीं उभरते;  बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी के रूप में सामने आते हैं। इसी पृष्ठभूमि में आजाद के चारों ओर डॉक्टर माहौर जैसा विश्वस्त सहयोगी है, जिसकी भूमिका राजनीतिक स्तर पर यह कृति क्रांतिकारी आंदोलन की एक अधिक मानवीय और अधिक जटिल छवि प्रस्तुत करती है। चंद्रशेखर आज़ाद यहाँ केवल वीरता के प्रतीक नहीं; बल्कि विश्वास और सहयोग की धुरी हैं। उनके चारों ओर डॉ. माहौर जैसे सहयोगी हैं, जिनकी भूमिका संघर्ष के वैचारिक चरण से लेकर सशस्त्र अवस्था तक दोनों ही कालखंडों  में समान रूप से निर्णायक रही है।

 शिवजी श्रीवास्तव की यह पुस्तक क्रांति को फिर एक नई परिभाषा दे रही है। क्रांति का आशय केवल बंदूक उठाना नहीं; बल्कि अनुशासन संगठन और वैचारिक स्पष्टवादिता के साथ समाज में बदलाव लाना है। यह पुस्तक आग्रह करती है कि राजनीतिक इतिहास को फिर से मानवीयता और भावनात्मक बुद्धि के साथ पढ़ा जाए। यह लेखक की वैचारिक सामर्थ्य और दूरदर्शिता है कि डॉ भगवान दास माहौर जी पर केंद्रित पुस्तक उनके साथ-साथ समानांतर परिदृश्य को भी उपेक्षित नहीं करती और यही प्रासंगिकता लेखक की कलम को विश्वसनीय बना रही है। सांस्कृतिक दृष्टि से पुस्तक में भगवान दास जी का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का रूप लेता है, जो आजीवन सृजन में रत रहा। परिशिष्ट में जुड़ी उनकी रचनाएँ  केवल काव्य- प्रदर्शन का भार ही नहीं उठातीं; बल्कि एक संघर्षशील आत्मा की पुकार बनकर उभरती हैं। उनकी कविताएँ वीरता की घोषणा बेशक नहीं करती; किंतु मनुष्य बने रहने की कोशिश उनमें अवश्य झलकती है। कविता यहाँ क्रांति का विकल्प नहीं, उसकी सहचरी है- एक ऐसी जगह जहाँ थका हुआ मन थोड़ी देर ठहरकर अपने विश्वास को फिर से पहचानता है। श्रीवास्तव जी ने जिस संवेदनात्मक संस्पर्श से इन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वह पुस्तक के साहित्यिक पक्ष को और प्रभावी बनाती है।

 भाषीय दृष्टि से पुस्तक संयमित काव्यात्मकता का बेजोड़ उदाहरण है। लेखक प्रदर्शन अथवा किसी काव्य चमत्कार का बोझ लेकर नहीं चलता। लेखक की अपनी स्वाभाविक लय है, जो पाठक को घटनाओं के पार उनके अर्थ तक ले जाता है। वर्णन कहीं भी बोझिल नहीं होता; बल्कि स्मृति का रूप लेता चलता है। आपकी शैली अपने नैतिक ठहराव के साथ अत्यंत आकर्षक है- जैसे लेखक जानता हो कि जिस जीवन सत्य के बारे में वह लिख रहा है, उनके सामने शब्दों को भी अनुशासित रहना चाहिए। यही अनुशासन इस पुस्तक को विश्वसनीय भी बनाता है और मार्मिक भी।

 इस पुस्तक का दूसरा कालखंड जो स्वतंत्रता के बाद का है, वह अत्यंत विचार उत्तेजक और संवेदनपरक है। यहाँ वह खंडित सत्य हैं, जो अक्सर परिवर्तन के पश्चात् उपेक्षित कर दिए जाते हैं। यहाँ क्रांतिकारी आंदोलन की चमक नहीं; बल्कि उसका अवशेष है—वह अवशेष जिसमें आदर्श जीवित तो हैं; पर समाज की प्राथमिकताओं से बाहर हो चुके हैं। डॉ. माहौर का जीवन एक शिक्षक, विचारक और सादा नागरिक के रूप में इस प्रश्न को बड़ी तल्खी के साथ उठाता है कि स्वतंत्रता के बाद हमने उन क्रांति पुत्रों के सपनों के साथ क्या किया। यह प्रश्न लेखक ने इस तरह रचे हैं, जिससे पाठक स्वयं टकराता है, उनके जीवन विवरण में पिरोए हुए ये प्रश्न पाठक को न केवल व्यथित करते हैं; बल्कि हमारे इतिहास और साहित्य को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा करते हैं।

समीक्षात्मक दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। वास्तव में यह पुस्तक साहित्य और इतिहास के अंतर सूत्र प्रस्तुत करती है। पुस्तक में इतिहास के तथ्यात्मक विवरण है, संदर्भ है, तारीखें है; किंतु वे शुष्क नहीं हैं; बल्कि वे मानवीयता और करुणा की कहानी में ढले हुए हैं। यह ढलाव ही इस पुस्तक को अकादमिक होते हुए भी संवेदनशील बनाता है। शोधार्थियों की दृष्टि से यह पुस्तक समृद्ध है, साथ ही सामान्य पाठक के लिए भी यह अनूठा अनुभव है और यही किसी स्तरीय कृति की पहचान है।

समग्र रूप से यह यह किताब एक स्मृति आख्यान है, जो बड़े ही सरल शब्दों में यह स्पष्ट कर देती है की इतिहास केवल विजयगाथा; नहीं बल्कि स्मृति का भी अनुशासन होता है। डॉ. भगवान दास माहौर का जीवन इस अनुशासन का उदाहरण है- जहाँ  क्रांति नारे में नहीं; बल्कि चरित्र और आचरण में प्रतिफलित होती है। लेखक की यह पुस्तक उसी चरित्र को शब्दबद्ध कर रही है। इस प्रयास में वह सफल भी हुए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल हमारी साहित्यिक सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना अधिक सजग और अधिक मानवीय बनती है; बल्कि वह धीरे- धीरे अनाम और अदृश्य स्वतंत्रता सेनानी को केंद्र में स्थापित कर देते हैं। इस प्रक्रिया में वह न केवल एक गुमनाम क्रांतिकारी को दृश्य में लाती है, इसी अर्थ में यह पुस्तक अतीत का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक नैतिक आमंत्रण है। ■

सम्पर्क: 98, पुष्पांजलि नगर फेज 3अवधपुरी आगरा ( उ. प्र.) 282-010, poonam.singh12584@gmail.com

Oct 1, 2025

किताबेंः ‘कुछ रंग’ ग्राम्य जीवन की संवेदनाओं का रंगमंच

 -  डॉ. पूनम चौधरी

कुछ रंग (चोका -संग्रह ): भीकम सिंह, प्रथम संस्करण: 2025, पृष्ठ:136, मूल्य:380 रुपये, अयन प्रकाशन, जे-19/39, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059

हिंदी कविता के इतिहास में जब भी किसी रचनाकार ने प्रचलित विधाओं की सीमाओं को पार करने का साहस किया है, तब तब साहित्य के नए द्वार खुले है। भीकम सिंह जी का कुछ रंग चोका- संग्रह इसी साहसिक परंपरा का प्रतिफल है। यह संग्रह मात्र काव्य संकलन नहीं है, बल्कि हिंदी काव्य में एक नई विधा ‘चोका’ का प्रयोग और उसके माध्यम से जीवन-जगत के अनुभवों का संवेदनशील दस्तावेज़ है। ‘चोका’ वस्तुतः जापानी काव्य परंपरा की विधा से प्रेरित होकर विकसित हुआ, परंतु भीकम सिंहजी ने इसे हिंदी की कलेवर से जोड़कर कुछ रंग दे दिए और साथ ही लोक-संस्कृति और भारतीय जीवन-दर्शन से इसका रूपांतरण कर दिया। यह संग्रह इसलिए विशेष महत्त्वपूर्ण है कि यह न केवल विधा की दृष्टि से नवीन है, बल्कि भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत परिपक्व और मार्मिक भी है।

‘कुछ रंग’ काव्य संग्रह में  - आनंद, पीड़ा,संघर्ष,स्मृति और आशा जैसे रंगों को शब्दबद्ध करने का कवि का यह भावुक और संवेदना-पूर्ण प्रयास है। ये रंग केवल बाहरी जीवन के दृश्य नहीं हैं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में अनुभव किए गए सजीव बिंब हैं, जो इस संग्रह का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है।

भीकम सिंह जी की काव्य -दृष्टि का केंद्र ग्रामीण जीवन है —वहाँ की प्रकृति, वहाँ के खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, श्रम, संघर्ष और जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी संवेदनाएँ । गाँव यहाँ केवल भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें श्रम की गरिमा, प्रकृति का आत्मीय सान्निध्य और सामूहिक जीवन की धड़कनें सुनाई देती हैं। कहते हैं-

अटका चाँद/गाँव  के सिवानों पे/

तारें छिटके/खेत क्यारियों पर/झिलमिल से।

यह प्राकृतिक छटा मात्र का चित्र नहीं है, बल्कि ग्रामीण जीवन की संतोष, आत्मीयता और उस आकाश से जुड़े रहने की अनुभूति है ।

भीकम सिंह का भाव-जगत् ग्राम्य जीवन के यथार्थ से गहराई से जुड़ा, इसलिए  वे गाँव का सौंदर्य चित्रित करना नहीं भूलते खेत, मेंड, गलियारे,पगडंडियाँ, फसले इन सब का जीवंत और मनोहरी चित्रण एक सरल और गाँव के प्रेम में डूबा मन ही कर सकता है इस कसौटी पर भीकम सिंह जी की कविता खरी उतरती है।

 इन कविताओं का दूसरा पक्ष भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कवि की दृष्टि से गाँव का संघर्ष, उनकी समस्याएँ, उनकी जिजीविषा कहीं ओझल नहीं होती। दुख जीवन का हिस्सा है, परंतु उसके बीच भी सुख की सम्भावना नष्ट नहीं होती। यही कारण है कि वे कहते हैं—

बसंती हवा उम्मीद की तरह/और घास भी/

मस्त मौला बावली/ है सुखों की वजह।

यहाँ हवा महज़ मौसम का बोध नहीं कराती, बल्कि मानवीय मनोविज्ञान की जिजीविषा का प्रतीक बन जाती है।  उनकी कविता में आए वृक्ष और पौधे केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है: बल्कि वे जीवंत प्रतीक है स्मृतियों के, संघर्षों के,जो धीरे-धीरे सामूहिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं-

पानी की गंध/ओढ़ के बरगढ़ /

खड़ा उदास/पास कही है प्यास।

इसी प्रकार खेत की जुताई, ठूँठों पर सुबह-सुबह का श्रम, और फसल की आशंका—ये सब मिलकर ग्राम्य जीवन की आत्मकथा बुनते हैं और इसकी छटा अद्भुत हो जाती है। भीकम सिंहजी के काव्य का भाव-पक्ष केवल सुख-दुख के वर्णन सीमित नहीं है, बल्कि उसमें एक गहरी संवेदनात्मक मार्मिकता है। उनकी कविता में दुख पाठक के मर्म को छूता है, करुणा की उत्पत्ति करता है; किंतु निराशा से उसका कोई संबंध नहीं है-

बीता बसंत/तो देह का मोह- / 

भी कम हो गया/मन तैरता रहा/ होकर रीता

तो यहाँ देह और मन दोनों की थकान का चित्र है।

इस संग्रह में कई स्थानों पर कवि का स्वर आत्ममंथन का भी है। खेतों की थकान, दुर्घटनाओं की आशंका, श्रम की कठिनाई—ये सब केवल बाहरी यथार्थ नहीं हैं, बल्कि कवि के भीतर भी एक बेचैनी उत्पन्न करते हैं। 

घास के जैसी/खेतों की पीठ पर/ 

उग रही है / मुद्रादायिनी जड़े/

हदें लाँघ के/नागफनी- सी बढ़ी/

इसी प्रश्नवाचकता से उनकी कविता का स्वर और अधिक मार्मिक हो उठता है। इस मार्मिकता में पाठक केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि स्वयं उस अनुभव का सहभागी बन जाता है। जैसे-जैसे संग्रह की कविताएँ आगे बढ़ती हैं पाठक का विश्वास कवि की संवेदना पर प्रबल होने लगता है। कवि जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़े प्रतीकों में बदल देते हैं। घास, ओस, अँखुआना, बीज बोना—ये सब न केवल कृषि-प्रक्रियाएँ हैं, बल्कि मानवीय जीवन की गहरी संवेदनाओं का रूपक हैं। 

भीकम सिंह जी का काव्य-संसार केवल ग्रामीण जीवन के सौंदर्य और आत्मीयता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें गाँव की समस्याओं का मार्मिक और गहन उद्घाटन भी है। यदि एक ओर उनकी कविता खेतों की हरियाली, नदियों की कलकल ध्वनि और गाँव के सामूहिक श्रम को जीवन का उत्सव बनाकर प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर उसी जीवन के भीतर पनपती विडंबनाओं, संघर्षों और विसंगतियों का यथार्थ चित्रण करती है। कवि का यह दूसरा पक्ष विशेष रूप से संवेदनात्मक, मार्मिक और तार्किक है, जो पाठक के अंतर्मन को गहराई से छू लेता है। गाँव की सबसे बड़ी समस्या है – शहरीकरण का बढ़ता हुआ प्रभाव-

गाँव  में थी/क्या कहीं कोई सड़क/ 

पगडंडी थी/सड़के जैसे आई/ 

 दूध घी गए/मैगी पिज्जा बर्गर/ जैसे जहर आए।

गाँव की सहजता और सरलता अब स्पर्धा की अंधी दौड़ में डगमगाने लगी है। कवि का आक्रोश और दुःख यहाँ केवल गाँव के लिए नहीं; बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है – 

खेतों के बाद/शुरू होगा बाजार/ 

कहाँ जाएँगे/विस्थापित सियार/ 

कोर्ट में होंगे/ तारीखों से बाहर।

कविता का दूसरा बड़ा प्रश्न है – खेती और मिट्टी का संकट। कवि ने खेतों की समाप्त होती उर्वरता की स्थिति को प्रतीकात्मक बिंबों में व्यक्त किया है – ‘मिट्टी में घुला रसायन’, ‘उड़ती हुई रेत’, ‘थके खेत’– ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस जीवन का सजीव दृश्य हैं, जो हज़ारों किसानों की हताशा और निराशा से भरा हुआ है।

 मिट्टी में घुला/रसायन देखके/सहमें खेत/ 

  थकने लगे/कुछ दिनों से खेत/ उड़ने लगी रेत।

कुछ रंग काव्य संग्रह का संवेदना पक्ष जितना प्रबल है, कलात्मक दृष्टि से भी यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भीकम सिंहजी का चोका विधा को स्थापित करने का यह प्रयास उल्लेखनीय है। ‘चोका’ मूलतः जापानी काव्य-परंपरा की लंबी कविताओं की एक विधा है, जिसमें गेयता और संक्षिप्तता का अद्भुत संतुलन होता है। कवि ने इस विधा को अपनी लोक-संस्कृति की भूमि पर उतारते हुए इसे भारतीय जीवन की संवेदनाओं के अनुकूल रूप दिया है।

उनके चोका में पंक्तियों की लय और प्रवाह विशेष महत्त्व रखते हैं। प्रत्येक पंक्ति में विचार और भाव का घनत्व है, परंतु भाषा सहज और लोक-जीवन से निकली हुई है। उदाहरण के लिए-

शाम झाड़के/खलिहान से उठा/ कंधे पे रखा/संतोष का अंगोछा।

शैल्पिक स्तर पर प्रयुक्त बिम्ब योजना अत्यंत प्रभावशाली है। कवि ने गाँव के दृश्यों का इतना संजीव और जीवंत चित्रण किया है की पाठक उन्हें पढता ही नहीं, बल्कि दृश्य की तरह घटित होते देखता है । खेत, ओस, खरपतवार, कांस, नीम, बसंती हवा—ये सभी बिंब ग्रामीण जीवन के सूक्ष्मतम अनुभवों को मूर्त कर देते हैं। यही कारण है कि उनका चोका दृश्यात्मकता के कारण एक अनोखा प्रभाव छोड़ता है। 

भाषा की दृष्टि से भी यह संग्रह विशेष महत्त्व रखता है, सहज़ सरल लोक जीवन की भाषा में जिस तरह कवि ने यह संसार रचा है वह सीधा पाठक के हृदय को छूता है । भाषा न तो अत्यधिक अलंकारिक है, न ही कृत्रिम। वह ग्राम्य जीवन की सहजता से निकली हुई है, किंतु साथ ही उसमें साहित्यिक परिष्कार भी है।  वे क्लिष्ट और गूढ शब्दावली प्रयुक्त नहीं करते बल्कि साधारण शब्दों में असाधारण अनुभव व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनकी भाषा में एक ओर लोक की सजीवता है, तो दूसरी ओर काव्य की परिष्कृति।

निष्कर्ष रूप से कह सकते हैं ‘कुछ रंग’ हिंदी साहित्य में एक नई विधा का आरंभ है और एक संवेदनशील कवि की परिपक्व अभिव्यक्ति का उदाहरण भी। भीकम सिंह ने चोका विधा को हिंदी के सांस्कृतिक संदर्भों में इस प्रकार ढाल दिया है कि वह आत्मसात् प्रतीत होती है। यह संग्रह भाव-पक्ष में जितना मार्मिक है, शिल्प-पक्ष में उतना ही सुदृढ़ और परिपक्व है।

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह पाठक को केवल कविता पढ़ने का अवसर नहीं देता, बल्कि उसे जीवन की गहरी संवेदनाओं में सहभागी बना देता है। गाँव के सुख-दुख, खेतों की थकान, श्रम की ऊर्जा, और भविष्य की आशा—ये सब मिलकर पाठक को ऐसा अनुभव कराते हैं मानो वह स्वयं उस जीवन का हिस्सा हो।  किसी भी रचना की कसौटी है- पाठक को जीवन के अनुभव से जोड़ देना।

Sep 1, 2025

किताबेंः अधूरी मूर्तियों का क्रंदन: एक संवेदनात्मक पड़ताल

 -  पूनम चौधरी

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन (कहानी -संग्रह ) : सुदर्शन रत्नाकर, प्रथम संस्करण: 2025, मूल्य:  ₹ 380 ,  पृष्ठ:-136,  अयन प्रकाशन,  जे 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

सुदर्शन रत्नाकरजी का कहानी -संग्रह ‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ साहित्य में अपनी संवेदनात्मक गहनता, प्रतीकात्मक शिल्प और दार्शनिक अंतर्दृष्टि के कारण विशेष महत्व रखता है। यह केवल कहानियों का संग्रह नहीं; बल्कि जीवन की विद्रूपता और विसंगतियों के साथ, जिजीविषा और मानवीय आकांक्षाओं की करुण परिणति का गहन साहित्यिक प्रतिरूप है। संग्रह का शीर्षक अपने आप में इतना सशक्त और प्रतीकात्मक है कि सम्पूर्ण रचना-समुच्चय की आत्मा को उद्घाटित करता है। अधूरी मूर्तियाँ मात्र पाषाण की टूटी काया नहीं, अपितु जीवन की अधूरी इच्छाओं, अपूर्ण आकांक्षाओं और म्लान स्वप्नों का दर्पण हैं। उनका क्रंदन मनुष्य की आत्मा का वह मौन स्वर है, जो कभी मुखर नहीं हो पाता, परंतु निरंतर अंतर्मन में गुंजायमान रहता है।

‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ शीर्षक केवल शाब्दिक अर्थ में टूटे हुए शिल्पों का विलाप नहीं है; बल्कि यह उन समस्त मनुष्यों के अनुभवों और मानसिक द्वंद्वों का रूपक है, जहाँ व्यक्ति चाह कर भी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता। समुद्र की अनंत लहरों के बीच अधूरी पड़ी मूर्तियों का क्रन्दन न केवल समय की विडंबना है; बल्कि मनुष्य के असंतोष, असफलताओं और अपूर्णता का भी मार्मिक प्रतीक है। इस प्रकार शीर्षक में संग्रह की आत्मा निहित है, जो न केवल भावनात्मक मार्मिकता; बल्कि गहन दार्शनिक दृष्टि को भी प्रकट करता है।

 संग्रह में कुल 15 कहानियाँ हैं, जो अपने-अपने स्तर पर मानवीय जीवन के विविध पक्षों का उद्घाटन करती हैं। कहानियाँ केवल घटनाओं का विवरण नहीं देतीं; बल्कि पाठक को पात्रों के मानसिक संसार में प्रवेश कराती हैं। प्रत्येक कहानी में पात्रों की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा इस प्रकार चित्रित है कि पाठक स्वयं उनके जीवन का सहभागी प्रतीत होता है।

संग्रह की भूमिका स्वयं लेखिका की आंतरिक दृष्टि को उद्घाटित करती है। इसमें स्पष्ट है कि रचना केवल कला का साधन नहीं; बल्कि जीवन के अनुभवों और संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण है। लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि वह जीवन की कठिनाइयों, पीड़ा और असफलताओं को मात्र उद्घाटित नहीं करती, बल्कि उनके भीतर से उत्पन्न आशा, साहस और जीवन के प्रति जिजीविषा को भी उन्होंने पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। भाषा की सहजता, प्रवाह और भावनाओं की शुद्धता भूमिका को पठनीयता और अनुभवात्मकता का गहन स्तर प्रदान करती है। सुदर्शन रत्नाकर की लेखनी का यह प्रारंभिक वक्तव्य मात्र भूमिका न होकर, उनके रचना-संसार का आत्मस्वर है। यहाँ लेखिका ने अपने सृजन की प्रक्रिया को अत्यंत आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ उजागर किया है। वे स्पष्ट करती हैं कि लेखन केवल दृष्टिगोचर जगत की पुनर्रचना नहीं; बल्कि अंतःकरण से अनुभव किए गए दुःख–सुख, वेदना–संघर्ष और जीवन के विविध रंगों का साक्षात्कार है।

लेखिका की दृष्टि में सृजन वह यात्रा है, जिसमें आँखें, हृदय और बुद्धि एकाकार होकर नया संसार रचती हैं। वे मानती हैं कि लेखक अपने पात्रों के साथ जीता है, उनसे वार्तालाप करता है और उन्हें आत्मसात करके शब्दों में उतारता है। इसी कारण उनकी रचनाएँ जीवन की सच्चाइयों से गहराई से जुड़ जाती हैं और पाठक के हृदय तक पहुँचकर उसकी संवेदना को स्पंदित करती हैं।

इस भूमिका में एक अत्यंत मार्मिक उद्घोष है—“लेखन का अंत नहीं होगा; क्योंकि उसके बिना मेरा जीवन निःसार है।” यह कथन लेखिका की लेखनी और जीवन के बीच के गहरे संबंध को प्रकट करता है। उनके लिए लेखन केवल एक अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ जीवन की जटिलताओं से जूझते हुए भी सकारात्मकता और जिजीविषा का संचार करती हैं।

‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ शीर्षक से ही यह संकेत मिलता है कि ये कहानियाँ अधूरेपन, वेदना और संघर्ष से उपजी संवेदनाओं को मुखर करती हैं। किंतु यह अपूर्णता नकारात्मकता की नहीं बल्कि उस सतत अन्वेषण का प्रतीक है, जो जीवन को गतिमान और रचनाशील बनाए रखता है।

भूमिका की भाषा सरल होते हुए भी मार्मिक है और उसकी संवेदनाएँ इतनी प्रामाणिक हैं कि पाठक अनायास ही लेखिका के आत्मसंवाद का सहभागी बन जाता है। यह भूमिका वस्तुतः उस धड़कन के समान है, जो संपूर्ण संग्रह को जीवंत कर देती है और पाठक को आगामी कहानियों के प्रति गहन उत्सुकता से भर देती है।

इस संग्रह की पंद्रह कहानियाँ जीवन की विविध स्थितियों, मानवीय संबंधों की जटिलताओं और स्त्री–मन की गहन संवेदनाओं को मार्मिक रूप में अभिव्यक्त करती हैं। प्रत्येक कहानी अपनी विशिष्टता रखती है; किंतु कुछ रचनाएँ विशेष रूप से हृदय में गहरी छाप छोड़ती हैं। 

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ कहानी-संग्रह की शीर्षक कहानी है। लेखिका ने स्त्री जीवन के अधूरेपन और उसकी मौन वेदना को जिस करुण स्वर में प्रस्तुत किया गया है, वह पाठक को भीतर तक विचलित कर देता है।

यह कहानी मानवीय संबंधों के अधूरेपन और स्त्री-जीवन की पीड़ा को उजागर करती है। अंशुला के जीवन के माध्यम से लेखिका ने दिखाया है कि एक स्त्री अपने कर्तव्यों, रिश्तों और सामाजिक बंधनों में उलझकर अपने सपनों और आकांक्षाओं को अधूरा छोड़ देती है। उसका व्यक्तित्व एक ऐसी मूर्ति की तरह है, जो आकार तो लेती है पर कभी पूर्णता तक नहीं पहुँच पाती। कथ्य का उद्देश्य नारी जीवन की विडंबना को सामने लाना और पाठक को यह सोचने पर विवश करना है कि क्यों स्त्री की इच्छाएँ बार-बार दबा दी जाती हैं। शिल्प की दृष्टि से कहानी प्रवाहमयी और आत्मीय है, जिसमें वर्णन और संवाद दोनों का संतुलित प्रयोग हुआ है। बिंब और प्रतीकों—विशेषकर ‘अधूरी मूर्ति’ और ‘क्रंदन’—ने कथा को गहन भावुकता और गहराई दी है। यह रचना अपने उद्देश्य, संवेदना और सहज शैली के कारण पाठक को भीतर तक छू जाती है।

‘अकेलेपन का दंश’  कहानी मानव-जीवन की उस शाश्वत समस्या को उद्घाटित करती है, जहाँ बाहरी स्वतंत्रता के होते हुए भी आंतरिक स्तर पर मनुष्य बंधनों में जकड़ा रहता है। समुद्र की मुक्त लहरों में तैरती मछलियाँ स्वतंत्रता और पूर्णता का प्रतीक हैं, किंतु जब वही मछलियाँ एक्वेरियम की सीमाओं में कैद हो जाती हैं, तो उनका अस्तित्व मात्र शारीरिक होता है, आत्मिक नहीं। यह रूपक मनुष्य की स्थिति का सटीक चित्रण करता है- सामाजिक नियम, पारिवारिक बंधन और मानसिक सीमाएँ हमें बाहरी स्वतंत्रता के बावजूद भीतर से कैद कर देती हैं। कहानी का संदेश स्पष्ट है कि वास्तविक स्वतंत्रता मानसिक और आत्मिक मुक्ति में निहित है।

‘बस एक बार’ कथा व्यक्तिगत संबंधों और सामाजिक कठोरताओं की गहरी पड़ताल करती है। विवाह से पूर्व हुए एसिड-अटैक और मंगेतर के पलायन का प्रसंग मानवीय संवेदनाओं की भीषण परीक्षा है। मुख्य पात्र की मन की चीखें केवल व्यक्तिगत शोक का द्योतक नहीं, बल्कि समाज की असंवेदनशीलता और स्त्री की असुरक्षा का भी उद्घाटन हैं। यहाँ लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि जीवन केवल बाहरी सौंदर्य या सामाजिक मान्यताओं पर आधारित नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदना और आत्मिक जुड़ाव ही संबंधों का वास्तविक आधार है। यह कथा पाठक को भीतर तक झकझोर देती है और समाज की क्रूर विडंबनाओं पर गहन प्रश्नचिह्न लगाती है।

‘वह हारा नहीं’ कहानी संघर्ष और साहस की अनूठी अभिव्यक्ति है। विपरीत परिस्थितियों, सामाजिक दबाव और अप्रत्याशित घटनाओं के बीच नायक का आत्मबल और धैर्य ही उसे जीवन में विजय की ओर अग्रसर करता है। यहाँ लेखिका यह स्पष्ट करती हैं कि बाहरी हार ही वास्तविक पराजय नहीं होती; पराजय तब होती है जब मनुष्य का आत्मबल टूट जाता है। यह कथा पाठक के भीतर छिपी जिजीविषा को जगाती है और संदेश देती है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, साहस और आत्मविश्वास ही मनुष्य को जीवन-पथ पर अग्रसर करते हैं।

 संग्रह की अन्य कहानियाँ दिद्दा, केंचुली,बेजी, मैं लड़ूँगी दारजी, नेगी अंकल, वह लौट आया आदि भी अपनी संवेदनात्मक शक्ति और कथ्य की विविधता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं, समग्रतः यह कहानी–संग्रह जीवन की अनकही पीड़ाओं और आशाओं का संवेदनशील दस्तावेज़ है।

लेखिका की भाषा सहज, प्रवाही और मार्मिक है। इसमें न तो कृत्रिम अलंकरण का बोझ है और न ही दुरूहता का आग्रह। भावों की शुद्धता और शब्दों की सादगी मिलकर एक ऐसा वातावरण रचती है, जहाँ पाठक सहज ही पात्रों की संवेदनाओं से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। संग्रह की कहानियों में संवाद, वर्णन और वातावरण—तीनों का संतुलित उपयोग हुआ है, जो कथानक को जीवंत और प्रभावशाली बनाता है।

 कहानियाँ केवल व्यक्तिगत पीड़ा और मानसिक संघर्ष तक सीमित नहीं है; इसमें समाज की असमानताओं, विडंबनाओं और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण है। संबंधों की जटिलता, सामाजिक अपेक्षाएँ, आर्थिक विषमताएँ- ये सब संग्रह की कहानियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हैं।

कहानियाँ वास्तविकता के उद्घाटन के साथ साथ उनके भीतर छिपी आशा, सहानुभूति और जिजीविषा की अभिव्यक्ति भी करती हैं। यही कारण है कि इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठक निराशा नहीं होता बल्कि जीवन की कठिनताओं से जूझने का साहस पाता है। यह द्वंद्वात्मक दृष्टि ही संग्रह को संवेदनशीलता के साथ-साथ दर्शनिकता भी प्रदान करती है।

भाषा की सहजता, शिल्पगत संतुलन, प्रतीकात्मकता और मार्मिकता के कारण यह संग्रह हिंदी कथा-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण और अविस्मरणीय योगदान सिद्ध होगा। यह न केवल पठनीय है; बल्कि अनुभवजन्य और चिंतन-प्रेरक भी है।

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन पाठक को जीवन की कठिनताओं और विसंगतियाँ से अवगत कराते हुए उसे संवेदनशील और जागरूक बनाता है। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है कि यह पाठक के मन, मस्तिष्क और हृदय पर गहरा व स्थायी प्रभाव छोड़ता है। ■

Jul 1, 2025

किताबेंः ‘तुम हो मुझमें’ नवगीतों की आत्मीय यात्रा

  - पूनम चौधरी

पुस्तकः तुम हो मुझमें (नवगीत-संग्रह) : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, वर्ष 2023, पृष्ठ: 144, मूल्य: 400 रुपये, आईएसबीएन-978-93-94221-73-4, अयन प्रकाशन, जे-19 / 39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

कविता आत्मा का नाद है- वह आवाज है, जो काल की सीमाओं से परे, अनुभूतियों के सबसे कोमल हिस्सों को स्पर्श करती है। जब कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, आत्मा की तापमयी यात्रा बन जाती है और नवगीत केवल लय नहीं,; बल्कि जीवन के धूप-छाँव में सुलगते सचों की अनुभूति बनकर पाठक के अंतस्तल में उतरने लगते हैं, तब वह सृजन एक साधना का रूप ले लेता है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का नवगीत संग्रह ‘तुम हो मुझ में’ इसी आत्मीय संस्पर्श की काव्यात्मक परिणति है, जहाँ प्रत्येक शब्द अपने भीतर एक सम्पूर्ण जीवन संवाद लिये हुए हैं। यह काव्य मात्र नहीं,; बल्कि कवि के अंतर-जगत् की वह झलक है, जो पाठक को न केवल स्पर्श करती है,; बल्कि उसे भीतर से खोलती भी है। ‘हिमांशु’ जी का यह संग्रह इसी साधना का जीवंत, संवेदनशील और समय संवेदन से ओतप्रोत साक्षात्कार है।

      इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि हम किसी आत्मीय व्यक्ति के साथ बैठे हैं, जो अपने जीवन की सबसे गूढ़ अनुभूतियों को हमारे सम्मुख बिना किसी कृत्रिमता के रख रहे हैं। बिना किसी कलात्मक चमत्कार और काव्य नाटकीयता के, एक अपूर्व सम्मोहन के साथ, जो पूरे काव्य संग्रह में व्याप्त है। इस संग्रह को पढ़ना, मानो किसी झरते हुए आँसू में झाँकना है, किसी टूटे हुए पल में साँस लेना है, किसी उजड़ती हुई राह में सिसकती उम्मीद की लौ को पहचाना है। ‘तुम हो मुझ में’ एक शीर्षक मात्र नहीं है, यह एक प्रतीक है, उस समस्त मानवीय जिजीविषा का, जो टूटती है, बिखरती है, छलती है, फिर भी पुनः उठ खड़ी होती है -प्रार्थना की तरह, रुदन की तरह, मौन की तरह।

इन नवगीतों को पढ़ते हुए अनुभूति होती है कि यह कवि मात्र शब्दों से नहीं रचते वह तो अपने जीवन की अनुभूतियों को, अपने समय की विद्रूपताओं को और हृदय की शिराओं में बहती आशा -अश्रु की नदी को लेकर शब्दों के माध्यम से संवेदना की धुन रचते हैं। एक धुन- जो कहीं विरह का गीत बनती है, कहीं प्रतिरोध की गूँज, कहीं मन की पीड़ा, कहीं प्रेमिका की प्रतीक्षा, कहीं श्रमिक की घुटन,कहीं प्रवासी की थकान और कहीं उस भारतीय आत्मा की अस्मिता जो तमाम व्यथा के बाद भी आशा की लौ थामे खड़ी है।  इनके नवगीत में व्यथा है; लेकिन करुणा भी है विसंगति है; पर दिशा भी है, टूटन है, पर पुनर्निर्माण की संभावना भी। यह विरोधाभास ही इनके काव्य को गहराई देता है क्योंकि जीवन भी अंततः इन्हीं विरोधाभासों का संगम है।

‘हिमांशु’ जी के शब्दों में एक अनोखी आत्मीयता है। वह जब लिखते हैं, ‘तुम हो मुझ में’ तो यह शीर्षक में ‘तुम’ केवल कोई व्यक्ति विशेष नहीं है। यह कभी समय होता है, कभी समाज, कभी चेतना और कभी खुद कवि का ही कोई अंश। यह ‘तुम’ पाठक भी हो सकता है जिससे कवि सीधे संवाद करता है, यही संवाद उन्हें एक शिक्षक के रूप में और भी प्रभावशाली बनाता है; क्योंकि शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, वह अनुभव बाँटता है, वह भावों की थाली परोसता है। यह संग्रह ऐसे ही शिक्षक की लेखनी से निकली आत्मा की आवाज है, जो पाठक के मन को न केवल शिक्षित करती है; बल्कि संस्कारित भी करती है और संवेदना से मन का कोना-कोना सुवासित कर देती है।

 कवि की भाषा कहीं मिट्टी की महक लिये हुए हैं कहीं खेतों में बहती हवा की तरह सरल और मन को छूने वाली, तो कहीं वह शहरी धुएँ और झूठ से जूझती आत्मा की गूँज बन जाती है। हर कविता के साथ एक गहरी करुणा बहती है - एक ऐसी करुणा जो केवल रुलाने के लिए नहीं; बल्कि भीतर कुछ तोड़कर फिर नया विश्वास बोने के लिए जन्म लेती है।

जलधारा /नहीं थी शीतल/ अपने पैरों के नीचे,

 गर्म अश्रु से/ संकल्प सभी /अहर्निश हमने सींचे

ये साधारण पंक्तियाँ नहीं है। यह जीवन के उस मोड़ की स्वीकारोक्ति है, जहाँ आँसू हार का प्रतीक नहीं;  बल्कि आत्मबोध और पुनर्नवा होने की प्रक्रिया बन जाते हैं। इनकी कविता किसी क्लिष्टता अथवा अबूझ दर्शन की माँग नहीं करती,  इनका दर्शन तो जीवन के छोटे-छोटे संवेदनात्मक अनुभवों से बना है और यही  इनकी भाषा को आत्मीयता प्रदान करती है। 

 ‘हिमांशु’ जी भी जीवन के आलोक की बात करते हैं। यहाँ तक की अँधेरे में भी आस की गुंजाइश ढूँढ लेते हैं, यही नवगीत की शक्ति है, वह अँधेरे को नकारता नहीं, उसे स्वीकार कर, उसमें प्रकाश की खोज करता है-

बीत गया जो/ लेकर उसको/  आँसू कौन बहाए,

 नए साल में/ नई आस की/ दुनिया एक बनाएँ 

कविता का स्वरूप बदल रहा है। नई पीढ़ी के कवियों के लिए भी यह पुस्तक एक मार्गदर्शन है। यह दिखाती है कि किस प्रकार व्यक्तिगत अनुभव को सार्वभौमिक बनाया जा सकता है। ‘तुम हो मुझ में’ कोई घोषणा -पत्र नहीं, वह एक आंतरिक याचना है कि हम अपने भीतर के ‘तुम' को फिर से जानें-

गढ़ने दो सबको/ अपना असली चेहरा

 खिलने दो श्वेत कमल -सा/ यह पावन अंतर्मन 

जलने दो/ हर देहरी पर/ दीप नए 

  इनकी कविता में ‘पंख’, ‘पत्थर’, ‘धूप’, ‘नागफनी’, ‘अधजला गीत’ जैसे प्रतीकों का प्रयोग केवल रूपक नहीं; बल्कि विचार की परतें खोलने वाले औजार हैं। जब वे कहते हैं-

 जब तक पंखों में ताकत है/  दूर देश तक जाना

 बाट देखता जब तक कोई/  तब तक वापस आना।

 यह उड़ान केवल आकांक्षा नहीं, अनुभव से ऊपजी चेतना है, जहाँ उड़ना कठिन भी है और आवश्यक भी। साथ ही हर स्थिति में लौट आने का विश्वास कवि की जीवन में गहन आस्था का परिचायक है। 

डूब गया तम की बाँहों में व्याकुल अंबर

ये कविताएँ, उस आंतरिक संत्रास को बयान करती हैं, जहाँ द्रष्टा न केवल भावनाओं से गुजरता है; बल्कि उन्हें जीता है, निगलता है, और अंततः आत्मा की वंशी से उसे नई धुन में ढाल देता है। 

दुख में होकर/ निपट अकेले/ हम सब कुछ सहते हैं

आज का आदमी आंतरिक रूप से इतना अकेला क्यों है? उत्तर मिलता है - जानोगे तुम कैसी होती/  मन की व्याकुलता है

           पता तभी तो चल पाता है/  जब कोई छलता है

यह ‘छल’ केवल व्यक्तिगत नहीं है- वह व्यवस्था का है, समाज का है, संबंधों का है और उस तमाम कथित नैतिकता का है जो केवल मुखौटों के लिए रची गई है। आप इन नवगीतों में इस ‘छल संसार’ का कोई क्रूर चित्रण नहीं करते, जैसा है, वैसा ही सामने रख देते हैं- लो पोथियाँ हमने/ पुरानी ताक पर रख दीं

- यह सिर्फ अतीत को समेटने की बात नहीं है, यह उस सांस्कृतिक विस्थापन का संकेत है, जहाँ इतिहास की धूल हटाकर हमने आधुनिकता का आवरण पहन लिया है, बिना यह समझे कि हमने क्या खोया। यह नवगीत इतिहास, स्मृति, और आधुनिक बोध का एक साथ समांतर पुल बनाता है, जहाँ ‘संन्यास’ की चर्चा केवल दार्शनिक विमर्श नहीं रह जाती, वह एक सामाजिक निस्संगता की स्वीकृति बन जाती है।

खड़े जहाँ पर ठूँठ/ कभी यहाँ/  पेड़ हुआ करते थे

- यह एक व्यंग्यात्मक नवगीत है, जो आज के राजनीतिक, सामाजिक विमर्शों की खोखलेपन और कुतर्कों की दुर्गंध को उजागर करता है। कवि यहाँ अनुभूत कर रहा है, उसे हमारी अनुभूति का हिस्सा बना रहा है। अपने आप में इतना मार्मिक है कि पाठक थम जाता है। भीतर कोई दरवाजा खुलता है, जिसमें कवि की कर्मठता और इच्छाशक्ति पाठक को आस्थावान बना देती थी। यह नवगीत- संग्रह केवल काव्य का अनुभव नहीं है, यह मौन का भाष्य है। एक ऐसा भाष्य, जो केवल कवि की संवेदना नहीं, बल्कि हम सबकी गुम हो रही मानवीयता का दर्पण है-

 दर्द का क्या/ नदी सा एक दिन बह जाएगा

और पीछे सिर्फ कुछ/ रेत ही रह जाएगा।

 ‘हिमांशु’ जी की यह काव्य-यात्रा केवल रचनात्मक दक्षता का परिचय नहीं; बल्कि संवेदना की प्रामाणिकता का साक्ष्य है। आपके शब्दों में- 

तिनका -तिनका लाकर चिड़िया/रचती है आवास नया।

इसी तरह से रच जाता है /सर्जन का आकाश नया। 


May 2, 2025

कविताः पिता, तुम सच में चले गए?

  -  डॉ. पूनम चौधरी 

जब मैं विदा हुई थी,  

छलक गई थी तुम्हारी आँखें,  

पर छुपा कर सारा दर्द,  

ओढ़कर मुस्कान, थमाया था धीरज-

‘‘जा, यह नया संसार तेरी प्रतीक्षा कर रहा है।  

पर तेरा छूटा हुआ सब तेरा ही है।’’

 

मैंने बाँध लिये थे शब्द,  

आँचल में गाँठ लगाकर।  

पर अब वह गाँठ खुल गई।  

तुम सच में चले गए?  

और साथ में ले गए मेरा छूटा हुआ सब- 

आँगन, घर, मायका।  

 

अब लौटती हूँ तो घर  

वैसा नहीं लगता।  

खुले दरवाजे के पीछे तुम नहीं होते,  

तुम्हारी कुर्सी की जगह नहीं बदली,  

पर अब वो किसी को नहीं बुलाती।  

 

अब आती हूँ तो  

रास्ते भर फोन नहीं खटकता—  

"कहाँ पहुँची? कब आएगी?"  

तुम्हारी आतुरता और मेरा चिड़चिड़ाना—  

"पहले आ जाऊँ, फिर कर लूँगी बात!"  

अब बस एक भावुक स्मृति है।  

 

अब घर में बस तुम्हारी तस्वीर है।  

माँ चुपचाप तस्वीर पर फूल रख देती है,  

और मैं बिना बोले छू लेती हूँ तुम्हारा चेहरा,  

जो अब बस एक कागज़ में क़ैद है।  

 

पिता, तुम सच में चले गए हो? 

 

अब वह आँगन खाली है,  

जिसमें गूँजती थी हँसी।  

जिस पर हर बार लौटने पर  

तुम पहले खड़े मिलते थे।  

अब घर की दीवारें सुनसान हैं,  

जैसे कोई अपना बहुत कुछ कहकर  

अचानक मौन हो गया हो।  

 

‘‘पिता, तुम सच में चले गए?’’  

 

अब जब अपने संसार में उलझती हूँ,  

दिल बोझिल हो जाता है।  

सुनना चाहती हूँ तुम्हारी आवाज़—  

‘‘भरोसा रख, वह सब सही करेगा।’’ 

पर अब सन्नाटा है।  

अब कुछ अपने आप सही नहीं होता।  

 

अब कोई अधिकार से नहीं पूछता—  

‘‘सब ठीक है ना, बेटा?’’  

सब कहते हैं, ‘‘तुम्हें तो मज़बूत होना चाहिए’’ 

पर जब पिता नहीं रहते,  

तो बेटियाँ अचानक से छोटी और कमजोर हो जाती हैं।  

और माँ भी...  

पिता के बिना अधूरी-सी लगती है।  

 

पिता, तुम सच में चले गए?

 

अब मायका बस अतीत में झाँकने जैसा है।  

तुम थे, तो वह घर था,  

घोंसला था, हर समस्या का समाधान था।  

मेरा रुकना बिना प्रश्न स्वीकार था।  

अब सब बदल गया है।  

 

माँ की आँखों की नमी दिल को चीरती है।  

उनकी आँखों का खालीपन,  

जो कभी नहीं भर पाएगा।  

अब वहाँ लौटना खुद को दो हिस्सों में बाँटने जैसा है-  

एक हिस्सा जो कहता है, "यह मेरा ही घर था।" 

दूसरा जो चिल्लाता है, "यह सब छलावा है,  

सारे अधिकार तो पिता के साथ ही विदा हो गए!"  

 

अब यहाँ रहने से ज़्यादा  

यहाँ से लौटना कठिन हो गया है।  

अब मायका सिर्फ़ चारदीवारी का नाम है,  

जिसकी छत अभी सलामत है,  

पर जिसका आसमान खो गया है।  

 

पिता, तुम सच में चले गए? 

 

सुना है, पिता कभी नहीं जाते।  

वह बेटियों की आत्मा में बस जाते हैं।  

अगर यह सच है,  

तो किसी शाम जब तेज़ हवा चले,  

तो ज़रा मेरी पीठ थपथपा देना।  

फिर रख देना सिर पर हाथ।  

 

किसी भूले-बिसरे गीत की धुन में  

बस इतना कह देना—  

‘‘बेटा, मैं यहीं हूँ!’’

 

कि यह दिल फिर से धड़कने लग जाए,  

यह जीवन फिर से मुस्कुरा उठे,  

यह आँखें फिर से रोशन हो जाएँ,  

और यह तसल्ली हो जाए  

कि अब भी मेरा कोना सलामत है।


रचनाकार के बारे में
-  शिक्षा- एम.ए. (हिंदी) पी-एच.डी (शैलेश मटियानी के कथा साहित्य की संवेदना), एम. एड, एल. एल. बी (आगरा विश्वविद्यालय ),  नन्हे ईश्वर (कहानी संग्रह )
 विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, साहित्य परिक्रमा, वाग्प्रवाह व समाचार पत्रों राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, स्वदेश आदि में कहानियाँ व आलेख प्रकाशित, निरंतर आलोचनात्मक व रचनात्मक विमर्श में सक्रिय। संप्रति -अध्यापिका ( उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद), ईमेल- poonam.singh12584@gmail.com
सम्पर्कः  98, पुष्पांजलि नगर फेज -3, अवधपुरी आगरा ( उत्तर प्रदेश) 282010