उदंती.com को आपका सहयोग निरंतर मिल रहा है। कृपया उदंती की रचनाओँ पर अपनी टिप्पणी पोस्ट करके हमें प्रोत्साहित करें। आपकी मौलिक रचनाओं का स्वागत है। धन्यवाद।

Jul 12, 2018

उदंती.com - जुलाई- 2018

उदंती.com -  जुलाई- 2018
 
बारिश रुकी हुई है कल से
और घुटन भी ज़्यादा है
रोकर कब दिल हलका हुआ है
                  -गुलज़ार
दूर तक फैला हुआ पानी ही पानी हर तरफ़
अब के बादल ने बहुत की मेहरबानी हर तरफ़
              -शबाब ललित
कच्चे मकान जितने थे बारिश में बह गए
वर्ना जो मेरा दुख था वो दुख उम्र भर का था
              -अख़्तर होशियारपुरी
'कैफ़' परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा
               -कैफ़ भोपाली

आम आदमी का कर्ज...

आम आदमी का कर्ज...

डॉ. रत्ना वर्मा
मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह अपना, अपने परिवार का जीवन सुखमय बनाने का हर संभव प्रयास करता है। जीवन यापन के सबके अपने- अपने तरीके होते हैं। एक समय था जब भारत में मनुष्य के जीवन यापन का तरीका उनकी जाति तय कर देती थी, परंतु आज काबिलियत मायने रखती है, शिक्षा उन्हें जीने के नए नए तरीके बताती है। बेहतर जिंदगी जीने के लिए वह हर उपाय करता है। इन्हीं में से आज का सबसे प्रचलित तरीका है कर्ज लेना। मकान बनवाना हो, गाड़ी खरीदनी हो, खेती करना हो, नया व्यवसाय करना हो या फिर पढ़ाई करनी हो। सबके लिए यहाँ कर्ज का प्रावधान है।
लेकिन क्या कर्ज लेना उतना ही आसान है? वर्तमान हालात में सवाल उठना स्वाभाविक है- जब विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे उद्योगपति बैंक से हजारों करोड़ों का कर्ज लेकर फरार हो जाते हैं और विदेशों में ऐशो-आराम की जिंदगी बसर करते हुए जैसे हमारा मुँह चिढ़ाते हैं। लो क्या कर लोगे कैसे वसूलोगे करोड़ों अरबो के कर्ज...
जबकि देखा तो यही गया है कि आम आदमी बैंक से कर्ज  लेता है तो बैंक का कजऱ् चुकाते-चुकाते उसकी जि़ंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा निकल जाता है। अगर आपसे किस्त चुकाने में कुछ दिनों की देर हो जाती है  तो बैंक, वसूली करने आपके घर तक चला आता है। एक आम आदमी के लिए कर्ज लेना बहुत आसान भी नहीं होता- कोई नौकरीपेशा जब बैंक से कर्ज लेता है तो उसे अपने तीन महीने के वेतन का पेपर दिखाना होता हैदो साल का फॉर्म-16 माँगा जाता है और कम से कम 6 महीने की बैंक स्टेटमेंट  माँगी जाती है। और जो नौकरीपेशा नहीं होते उनसे तो गारंटी के रूप में न जाने क्या- क्या माँग लिया जाता है। इसीलिए कर्ज लेने वाला हमेशा भयभीत रहता है कि वह इस कर्ज को वह उतारेगा कैसे? और नहीं उतार पाया तो? देखा तो यही गया है कि यदि जीते जी वह कर्ज नहीं चुका पाता तो उसके बाद उसके बच्चे वह कर्ज चुकाते हैं।
भारत ऐसा देश है जहाँ दूध का कर्ज चुकाने की बात कही जाती है। लेकिन आज इसी देश में एक तरफ कुछ ऐसे अमीरजादे हैं जो कर्ज लेकर अय्याशी करते हैं...और उसे वापस भी नहीं करते। जबकि दूसरी तरफ यही वह देश है जहाँ हर 40 मिनट में एक किसान इसलिए आत्महत्या कर रहा है क्योंकि वह फसल के लिए लिया गया कर्ज चुका पाने में असमर्थ है। आँकड़ें बताते हैं  कि 2016 में देशभर के करीब 47 लाख किसानों ने कुल 12 लाख 60 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। इन किसानों में से 60% ने खाद, बीज और कीटनाशकों के लिए, 23% किसानों ने खेती के उपकरणों के लिए, जबकि 17% किसानों ने खेती के अन्य कामों के लिए बैंकों से कर्ज लिया था। लेकिन जब वर्षा के जल पर निर्भर यही किसान फसल बर्बाद होने की वजह से  बैंक के कुछ हज़ार रुपये नहीं चुका पाते, तो बैंक उनके घर पर वसूली के लिए अधिकारी भेज देता है, उनके ट्रैक्टर, ट्राली उठवा लेता है।
 प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या नीरव मोदी और माल्या जैसे लोगों के कागज़ात भी उतनी ही गंभीरता के साथ जाँच किए जाते हैं जिस तरह हमारे पेपर की जाँच होती है? क्या लोन देते वक़त बैंक इनसे भी उतने ही पन्नों पर हस्ताक्षर करवाते है... जितने हमको करने पड़ते हैं? क्या उनके आधार और पैनकार्ड लिंक्ड होते हैं, क्या उन्होंने अपना इनकम टैस्स सही समय पर भरा है? उनके लिए सब छूट है। क्योंकि बैंकों के नियम- कायदे ऐसे लचीले हैं कि वह नामी गिरामी लोगों को विदेशों में व्यापार करने के लिए यूँ ही लोन दे देती है... और अपने देशवासियों को एक गाड़ी खरीदने, एक घर बनवाने, या फिर खेती के लिए बीज खरीदने के लिए हजारो-हजार नियमों की खानापूर्ति करनी पड़ती है।
ऐसे समय में जब बदलाव की बयार बह रही है, (कम से कम कहा तो यही जा रहा है) क्या मध्यम वर्ग के जीवन को सरल सुखमय और सुकून से भरा बनाने के लिए कुछ बदलाव नहीं किए जाने चाहिए? सरकार का काम क्या सिर्फ अब इतना ही रह गया है कि वह कुर्सी पाने के लिए वह सब उपाय (साम-दाम-दंड-भेद) करेगी, लेकिन जब जिंदगी सँवारने की बात आयेगी तो कदम पीछे हटा लेगी!
बड़ी विडम्बना तो यह है कि ये भगोड़े अमीरजादे जो नुकसान हमारे देश में कर गए हैं उसकी भी भरपाई हमारी सरकार हम आम इंसानों से ही टैक्स के रूप में वसूल कर करती है। यानी करे कोई और भरे कोई। लोकतन्त्र को खोखला करने वाली इन दीमकों का निदान बहुत ज़रूरी है। इन दीमकों पर जब संकट आता है, तो हमारे यन्त्र के चपरासी से लेकर बड़े नेता तक इनको बचाने में आगे आ जाते हैं। जब तक इनकी काली करतूतें जगजाहिर हों तब तक वे किसी सुरक्षित माँद में छुप जाते हैं। सामान्य जन को लूटने की जो छूट इनको मिली हुई है, यह लोकतन्त्र के लिए प्राणलेवा है। इस लूटपाट करने वालों पर प्रशासन कब शिकंजा कसेगा? क्या देश को अरबों रुपये  की चोट पहुँचाना, खा-पीकर डकार भी न लेना देशप्रेम है? अगर नहीं तो आर्थिक अराजकता फैलाने वालों को देशद्रोही क्यों नहीं घोषित किया जाता? ऐसे आर्थिक अपराधियों की सही जगह पंचसितारा होटल नहीं बल्कि कारागार है। स्वच्छ प्रशासन का एक ही मन्त्र  है- इस तरह के लोगों पर नकेल कसी जाए, अगर ऐसा नहीं किया गया तो लूट का यह कैंसर रोग बढ़ता ही जाएगा।  

विज्ञान

आपदा की आहट पाने में
नाकाम सूचना प्रणाली
- प्रमोद भार्गव

मौसम की पूर्वानुमान संबंधी अनेक डिजिटल तकनीकों का विकास हो जाने के बावजूद हम प्राकृतिक आपदा की आहट पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। जबकि हमारे अनेक उपग्रह अंतरिक्ष में इन आपदाओं की निगरानी के लिए ही सक्रिय हैं। बावजूद बेखटके आँधी-तूफान, अंधड़- बवंडर और आकाशीय बिजली ने राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ऐसी तबाही मचाई कि करीब सवा सौ लोगों की जान चली गई और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गई। केदारनाथ और बद्रीनाथ के पट खुलते ही चारधाम यात्रा को अनायास आई भीषण बर्फबारी के कारण रोकना पड़ा है। यमुनोत्री के रास्ते में पहाड़ ढहने से मार्ग बंद हो गया। गोया, सवाल उठता है कि तमाम तकनीकी विकास के दावे किए जाने के बावजूद हमारे मौसम वैज्ञानिकों को आपदा की आहट क्यों नहीं मिल पा रही है। वह भी तब आए आँधी-तूफान की गति 100 से 120 किमी प्रतिघंटा की रही थी। इससे आवासीय बस्तियाँ तो तबाह हुई हीं, खेतों में लहलहाती और खलिहानों में रखी फसलें तबाह हो गईं।
हालाँकि भारतीय मौसम विभाग ने 1 मई से 4 मई के बीच आँधी-तूफान और बारिश की भविष्यवाणी की थी, लेकिन यह पूर्वोत्तर के राज्य पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और झारखंड के लिए थी। गोया, आपदा तो आई, लेकिन उसकी तबाही के केंद्र में पश्चिमी और उत्तरी भारत रहा। विभाग ने चार मई तक आपदा की शंका जताई थी, किंतु यह आठ मई तक लगातार तांडव मचाती रही। अब प्रश्न खड़ा होता है कि अरबों रुपए के उपग्रह, करोड़ों के उपकरण और मौसम विज्ञानियों का बड़ा जमावड़ा होने के बावजूद हम प्रकृति की चाल की भनक अनुभव करने में क्यों चूक रहे है। यही नहीं अब तो देश में निजी प्रबंधन से चलने वाले स्काईमेट नामक एजेंसी भी मौसम की जानकारी देने में लगी हुई है। वह भी कुदरत की इस क्रूरता का अनुमान लगाने में नाकाम रही। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि हमारे वैज्ञानिक या तो कम्प्यूटर में दर्ज होने वाले संकेतों की भाषा पडऩे में चूक रहे हैं अथवा लापरवाही बरत रहे हैं। कतिपय वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जो वैज्ञानिक तो बन गए, किंतु अपने भीतर वैज्ञानिक चेतना का समावेश नहीं कर पाए हैं। वैज्ञानिकों में बढ़ती यह प्रवृत्ति देश और संस्थाओं के लिए घातक है। यह प्रवृत्ति तो इंद्रियजन्य अनुभववादी ज्ञान के लिए उचित है और ही विज्ञान के लिए? जबकि हमारे देशज मौसम विज्ञानी घाघ और भड्डरी ने प्रकृति और पशु-पक्षियों की हलचल से ऐसा इंद्रियजन्य ज्ञान विकसित किया था कि उनकी मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणियों के अनुमान बिना किसी खर्च के लगभग सटीक बैठते थे।   
अब हमारे मौसम विज्ञानी कह रहे है कि राजस्थान और उत्तर-प्रदेश में तबाही का कारण हरियाणा के वायुमंडल में बना चक्रवाती प्रवाह है। ऐसा जलवायु परिवर्तन से मौसम में तेजी से हो रहे छोटे-बड़े बदलावों के कारण हो रहा है। नतीजतन मौसम का चक्र बिगड़ रहा है। इसी का परिणाम है कि उत्तरी पाकिस्तान और राजस्थान में तापमान ज्यादा होने की वजह से गर्म हवाएँ ऊपर की और उठ रही हैं, जिससे कम दबाव का क्षेत्र निर्मित हो रहा है। इसके साथ ही भूमध्यसागर और अरब सागर से चलने वाली पछुआ हवाओं से इस कम दबाव वाले क्षेत्र में बादल और चक्रवाती बवंडर उठ रहे है। गुजरे बवंडर का दायरा 250 किमी व्यास में था। मौसम विभाग के ये आंकड़े तब आए हैं, जब आपदा तबाही मचाकर कमोबेश ठहर गई है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद इस आशंका की पुष्टि होती है कि वैज्ञानिकों ने लापरवाही बरती है। क्योंकि ये आँकड़े तब बाँचने में आए हैं, जब प्रकृति की तबाही मचाने वाली हलचलें कम्प्यूटर की बुद्धि में पहले ही दर्ज हो गईं थी,किंतु समय रहते वैज्ञानिकों ने इन्हें बाँचने में कोताही बरती। वैसे भी अब हमारी वेधशालाओं में अत्याधुनिक संसाधन हैं, केवल इन पर हरकत करने वाली ध्वनि और वायु तरंगों पर सतर्क निगाह रखने की जरूरत है।  
क्योंकि जब ओडिशा में भयंकर तूफान आया था, तब हमारे मौसम विभाग की भविष्यवाणियाँ सटीक साबित हुई थीं। तब मौसम विभाग के सेवानिवृत्त प्रमुख एलएस राठौर विदेशी वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों को नजरअंदाज करते हुए अपने पूर्वानुमान पर डटे रहकर केंद्र राज्य सरकारों को बड़े पैमाने पर एहतियात बरतने की हिदायतें देते रहे थे। इस अवसर पर हमारे वैज्ञानिक सुपर कम्प्यूटर और डापलर राडार जैसी श्रेष्टतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे थे। तूफान की तीव्रता और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए थे। इन अनुमानों को पढ़ने की भाषा को और कारगर बनाने की जरुरत थी, लेकिन अब लग रहा है कि वैज्ञानिकों से कहीं कहीं बड़ी चूक हुई है। यदि सटीक सूचनाएँ समय पूर्व मिलने लग जाएँ, तो हम बाढ़, सूखे, भूकंप और बवंडरों से ठीक ढंग से सामना कर सकते हैं।
हमें मौसम संबंधी पूर्वानुमान की ऐसी निगरानी प्रणालियाँ विकसित करने की जरुरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य जिलेबार भविष्यवाणियाँ की जा सकें। इस नाते भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने वाले टेलीमेट्री स्टेशन बड़ी संख्या में बनाए गए थे। लेकिन बीते साल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जो रिपोर्ट दी है, उससे पता चला है कि जो टेलीमेट्री स्टेशन बने हैं, उनमें से साठ प्रतिशत काम ही नहीं कर रहे है। 1997 से 2016 के बीच देशभर में 375 ये स्टेशन बनाए गए थे, जिससे बाढ़ के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सके। किंतु इनमें से 222 बंद पड़े है। रिपोर्ट के अनुसार पाँच राज्यों की छह परियोजनाओं के लिए मंजूर 171,28 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग ही नहीं हुआ। यदि ये वेधशालाएँ बन जाती और टेलीमेट्री उपकरण काम करने लग जाते तो हर साल बाढ़ की जो तबाही देखने में आती है, उससे जान-माल की हानि कम की जा सकती थी। देश में कुल 4862 बड़े बाँध हैं, जिनमें से 349 बाँधों के लिए ही आपात्कालीन प्रबंधन योजनाएँ तैयार की गई है। साफ है, प्रकृत्ति के कहर का पूर्वानुमान लगाने के प्रति हम सचेत नहीं हैं। 
दरअसल कार्बन फैलाने वाली विकास नीतियों को बढ़ावा देने के कारण धरती के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि बीते 134 सालों में रिकार्ड किए गए तापमान के जो 13 सबसे गर्म वर्ष रहे हैं, वे वर्ष 2000 के बाद के ही हैं और आपदाओं की आवृत्ति भी इसी कालखण्ड में सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। पिछले तीन दशकों में गर्म हवाओं का मिजाज तेजस्वी लपटों में बदला है। इसने धरती के 10 फीसदी हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। यही वजह है कि अमेरिका में जहाँ कैटरिना, आइरिन और सैंडी तूफानों ने तबाही मचाई, वहीं नीलम, आइला, फेलिन और हुदहुद ने भारत श्रीलंका में हालात बद्तर किए थे। बताया जा रहा है कि वैश्विक तापवृद्धि के चलते समुद्री तल खौल रहा है। फ्लोरिडा से कनाडा तक फैली अटलांटिक की 800 किमी चौड़ी पट्टी में समुद्री तल का तापमान औसत से तीन डिग्री सेल्सियस अर्थात् 5.4 फारेनहाइट ज्यादा है। यही ऊर्जा जब सतह से उठ रही भाप के साथ मिलती है तो समुद्री तल में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव शुरु हो जाता है, जो चक्रवाती बंवडरों को विकसित करता है। इन बवंडरों के वायुमंडल में विलय होने के साथ ही, वायुमंडल की नमी 7 फीसदी बढ़ जाती है, जो तूफानी हवाओं को जन्म देती है। प्राकृतिक तत्त्वों की यही बेमेले रासायनिक क्रिया भारी बारिश, आँधी, चक्रवात, अंधड़ और तूफान का आधार बनती है, नतीजतन कुदरत का कहर चंद क्षणों में ही तबाही की लीला रच देता है। 
सम्पर्क: शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनीशिवपुरी .प्र., मो09425488224, 099810 61100,                 E-mail- pramod.bhargava15@gmail.com