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Feb 19, 2017

दो ग़ज़लें

               अपना बना लिया
                                          - आशीष दशोत्तर

उतर के सबके दिलों में उसने सभी को अपना बना लिया है
लबों पे जिसने अगर मुहब्बत का कोई नग़मा सजा लिया है।

हमारा रूतबा, हमारी रौनक, हमारी चाहत नहीं मिटीं है
भले ही पानी में घुल के हमने वजूद अपना मिटा लिया है।

मिटे हैं दुनिया के ग़म हज़ारों नकार में आए सभी नज़ारे
नक़ाब जितने पड़े हुए थे सभी को जब से हटा लिया है।

बना वो हमदम भी, हमसफर भी, बनाई उसने ही रहगुज़र भी
हमारे सपनों को उसने देखो हमीं से कैसे चुरा लिया है।

नहीं किसी को बचा सका है, वो नाखुदा भी, या कोई कश्ती
किसी को तिनकों के ही सहारों ने डूबने से बचा लिया है।

उसी पे बरसा है नूर बेशक़, उसी पे रब की हुई इनायत
घने अंधेरों में गर किसी ने ज़रा सा दीपक जला लिया है।

जहाँ पे रिश्ते ही छूट जाएँ- जहाँ से गिरकर सँभल न पाएँ
मुझे तो आशीष उसने ऐसी बुलन्दियों से बचा लिया है।

               कभी मुस्कुराता है

कभी ख़ामोश रहता है, कभी वो मुस्कुराता है
इसी अंदाज़ ही से वो सदा मिलता-मिलाता है।

यहाँ खुद को भुलाकर जो किसी में डूब जाता है
समन्दर से वही इक दिन खज़ाने ढूँढ़ लाता है।

मेरी उम्मीद उजली है मेरे सब रास्ते रोशन
मेरे क़िरदार का सूरज तभी तो जगमगाता है।

हमें ईमान का ऐजाज़ हासिल हो गया जब से
तभी तो झूठ हमको देख कर यूँ तिलमिलाता है।

नहीं मिलने के यूँ तो हैं बहाने दोस्तों, लेकिन
हमें जो चाहता है वो हमारे पास आता है।

भला आशीष क्यूँ कोई करे उम्मीद क़ातिल से
कभी ज़ालिम भी क्या अम्नो-अमा के गीत गाता है?

Feb 10, 2015

खलल

खलल
संतो के प्रवचन सुनने का उन्हें शौक था। नियमित प्रवचन सुनते। कोई संत नगर में आता तो रोज सुनने जाते। अब तो ऊपर वाले ने उनकी सुन ली थी। टेलीविजन पर रोज प्रवचन आने लगे। वे सुबह से ले कर शाम तक अपने समय के खाली हिस्सों को इन्हीं प्रवचनों से भरते। उनकी इस भक्ति भावना को देखते हुए उन्हें धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति समझा जाने लगा था।
एक दिन वे टेलीविजन पर प्रवचन सुन रहे थे। संत कह रहे थे- बुजुर्गों की सेवा में ही जीवन का सार है। जिसने अपने बुजुर्गों की उपेक्षा कीउसका जीवन नर्क के समान है।


वे प्रवचन में खो चुके थे। संत वाणी को सुन उनकी ऑंखों से अश्रुधारा बह रही थी। तभी खट्-खट् की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। पीछे के द्वार पर बूढ़े पिता दस्तक दे रहे थे। वे उठे और उनके पास पहुँचे। लगभग चिल्लाते हुए बोलेक्या हैसभी कुछ तो धर दिया है आपके कमरे में। अब तो चैन से रहने दो। यह कहते हुए वे पिता को घसीटते हुए उनके कमरे में छोड़ आए। आते वक्त उन्होंने पिता के कक्ष के द्वार की साँकल बाहर से जड़ दी। अब प्रवचन सुनने में कोई खलल नहीं होगा। यह सोचते हुए वे पुन: टेलीविजन के सामने बैठ गए।

सम्पर्क- 39, नागर वासरतलाम (म.प्र.) 457001, मो. 098270-84966, Email- ashish.dashottar@yahoo.com

Dec 14, 2013

गज़ल़ें

आशीष दशोत्तर

१. कतार में


सिमटा है सारा मुल्क ही कोठी या कार में,
आशीष तो खड़ा हुआ कब से कतार में।

बाज़ार दे रहा यहाँ ऑफर नए-नए,
ख्वाबों की मंजिलें यहाँ मिलती उधार में।

मिलते रहे हैं रोज ही यूँ तो हज़ार लोग,
मिलता नहीं है आदमी लेकिन हजार में।

पल भर में मंजिलें यहाँ हसरत की चढ़ गए,
सँभले कहाँ है आदमी अक्सर उतार में।

जिसने ज़मी के वास्ते अपना लहू दिया,
गुमनाम कर दिये गए जश्ने-बहार में।

छू कर हवा गुज़र गई परछाई आपकी,
खुशबू तमाम घुल गई कैसी बयार में।

जज़्बात को निगल लिया मैसेज ने यहाँ,
आती कहाँ है ख्वाहिशें चिट्ठी या तार में।

आशीष क्या अजीब है मेरे नगर के लोग,
अम्नो-अमा को ढूँढ़ते खँजर की धार में।


२. कश्तियाँ कागज की

लफ्ज़ आए होठ तक हम बोलने से रह गए,
इक अहम रिश्ते को हम यूँ जोडऩे से रह गए।

अब शिकारी आ गया बाज़ार के ऑफर लिये,
फिर परिन्दे अपने पर को खोलने से रह गए।

हर कहीं देखी निगाहें आँसुओं से तरबतर,
खुद के आँसू इसलिए हम पोंछने से रह गए।

बारिशें तो थीं मगर बस्ते का भारी बोझ था,
कश्तियाँ कागज की बच्चे छोड़ने से रह गए।

बेरहम दुनिया के जुल्मों की हदें ना पूछिए,
शाख पर वे फल बचे जो तोड़ने से रह गए।

आज फिर देखी किताबें-जि़न्दगी आशीष तो,
पृष्ठ कुछ ऐसे मिले जो मोड़ने से रह गए।


लेखक के बारे में: - जन्म -05 अक्टूबर 1972, शिक्षा - 1.एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र), एम.ए. (हिन्दी), एम.एल.बी., बी.एड, बी.जे.एम.सी., स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन। प्रकाशन - 1 मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती-का प्रकाशन।, ग़ज़ल संग्रह 'लकीरें, 3 भगतसिंह की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक-समर में शब्द-प्रकाशित 4 नवसाक्षर लेखन के तहतकहानी की पाँच पुस्तकें प्रकाशित आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पार्श्वस्वर। अनेक पुरस्कार एवं सम्मान।सम्प्रति - आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में। सम्पर्क- 39, नागर वास, रतलाम (म.प्र.) 457001, मो.098270-84966,  Email- ashish.dashottar@yahoo.com

Aug 18, 2012

लघुकथाएँ



-आशीष दशोत्तर
खलल
संतो के प्रवचन सुनने का उन्हें शौक था। नियमित प्रवचन सुनते। कोई संत नगर में आता तो रोज सुनने जाते। अब तो ऊपर वाले ने उनकी सुन ली थी। टेलीविजन पर रोज प्रवचन आने लगे। वे सुबह से ले कर शाम तक अपने समय के खाली हिस्सों को इन्हीं प्रवचनों से भरते। उनकी इस भक्ति भावना को देखते हुए उन्हें धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति समझा जाने लगा था।
एक दिन वे टेलीविजन पर प्रवचन सुन रहे थे। संत कह रहे थे- बुजुर्गों की सेवा में ही जीवन का सार है। जिसने अपने बुजुर्गों की उपेक्षा की, उसका जीवन नर्क के समान है।
वे प्रवचन में खो चुके थे। संत वाणी को सुन उनकी ऑंखों से अश्रुधारा बह रही थी। तभी खट्-खट् की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। पीछे के द्वार पर बूढ़े पिता दस्तक दे रहे थे। वे उठे और उनके पास पहुँचे। लगभग चिल्लाते हुए बोले, क्या है? सभी कुछ तो धर दिया है आपके कमरे में। अब तो चैन से रहने दो। यह कहते हुए वे पिता को घसीटते हुए उनके कमरे में छोड़ आए। आते वक्त उन्होंने पिता के कक्ष के द्वार की साँकल बाहर से जड़ दी। अब प्रवचन सुनने में कोई खलल नहीं होगा। यह सोचते हुए वे पुन: टेलीविजन के सामने बैठ गए।
             परम्परा
बहू घर में पहली बार आई तो सास ने बहू को वही साड़ी दी जो उन्हें अपनी सास से मिली थी। यह घर की परम्परा थी। सास अपनी बहू को साड़ी देती, जिसे वह गोदभराई के वक्त पहनती। बहू का जब गोदभराई का समय आया तो सास ने याद दिलाया कि बहू वही साड़ी पहनना।
बहू ने मुँह बिचकाकर कहा- वो साड़ी और मैं पहनूँ? उसे तो मैंने कभी का बर्तन वाली बाई को दे दिया। कितनी ओल्ड फैशन और घिसी-पिटी साड़ी थी। उसे मैं पहन लेती तो मेरा दम ही घुट जाता।
सास, इस वक्त चुपचाप खड़े अपने बेटे और बोलती बहू के बीच खड़ी नई परम्परा से खुद को जोडऩे की असफल कोशिश कर रही थी। 

लेखक के बारे में- जन्म -05 अक्टूबर 1972, शिक्षा एम.एस.सी.(भौतिक शास्त्र) एम.ए.(हिन्दी)ए एम.एल.बी.ए बी.एड ए बी.जे.एम.सी.ए स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन। प्रकाशन- मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती, ग़ज़ल संग्रह- लकीरें, भगतसिंह की पत्रकारिता पर पुस्तक- समर में शब्द। नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित, आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पाश्र्व स्वर। पुरस्कार- साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन, साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन, म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृष्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत। साहित्य गौरव पुरस्कार। किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित। सम्प्रति- आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।
संपर्क- 39, नागर वास, रतलाम (म.प्र.) 457001, मो. 098270-84966, Email- ashish.dashottar@yahoo.com

Dec 2, 2009

ख्वाहिश


- आशीष दशोत्तर
ठोकर खाकर भी समझे हैं खुद को लोग सयाने कुछ,
लो, ऐसे ही लोग चले हैं दुनिया को समझाने कुछ।

पनघट, पीपल, कच्चे घर, कुछ गलियां छोटी-छोटी सी,
आंखों में यूं आ जाते हैं चलकर ख्वाब पुराने कुछ।

आजादी भी अब तो कितनी दूर तलक फैली देखो,
घर में यूं ही आ जाते हैं हरदम लोग डराने कुछ।

राम अगर हैं हमें बचा ले पल-पल होते दंगों से,
ऐसा ही तो कहती होंगी शायद रोज अजाने कुछ।

अपनी- अपनी ख्वाहिश को हर कोई पूरा कर माना,
उसके हिस्से में आए हैं घरवालों के ताने कुछ।

झण्डे, बैनर, जलसे, जमघट, बड़े- बड़े जयघोष हुए,
बीती रात सुलगते देखी हमने वहीं दुकाने कुछ।

मोटी सुई और पक्का धागा घर में हो तो ले आओ,
इसकी- उसकी और उसकी भी सिल दो आज ज़ुबाने कुछ।