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Dec 12, 2019

लोग नहीं ये मौके हैं


लोग नहीं ये मौके हैं
- सुधा राजे

झुक मत सीना तान उठा सर, क्या जो कर-पग छाले हैं।
चौकन्ना हो देख हर तरफ कितने चेहरे काले हैं।
*
तनिक झुका फिर उठ न सकेगा लोग नहीं ये मौके हैं।
दुनिया वाले कमजोरी का लाभ उठाने वाले हैं। 
*
टूटा तन मन टूटा जीवन टूटा फूटा भाग्य लिए ,
टूटे नाते साहस फिर भी बच्चे तीन संभाले हैं।
*
कभी न रोना उनके आगे तेरे  दु:ख पर खुश हो लें
तेरा खुश होना दु:ख उनको ये  प्रतिशोध निराले हैं।
*
कितना भी हो दर्द न उफ़ कर, अट्टहास से डरा उन्हें
जिनके हाथों बेवफाई के चाकू खंजर भाले हैं।
*
तेरा सुख और ख़ुशी जिसे बेचैन करे नींदे छीने
दे निकाल जीवन से पगले, विषकीड़े क्यों पाले हैं।
*
हंसने रोने दोनों वाली बात कि दावा रहमत का
बहुत जलालत दे घायल पग आधी रात निकाले है।
*
बहुत खूबसूरत थी दुनिया जिसके ख्वाबों के कारन
उसके साथ बिता कर लौटे बचे लबों पर ताले हैं।
*
'सुधावक्त की बेरहमी ने इतना सबक दिया दु:ख से
मैंने उतनी हिम्मत पाली जितने आंसू ढाले है।

मूल निवासी- दतिया मध्य प्रदेश, सम्प्रति- सीनियर एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिसर, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा, पंजाबपिन- 144411, पता- 41-c, ऑफिसर्स रेजिडेंस अप्पार्टमेंट, सेक्टर 2, एल पी यू

Nov 17, 2018

..जलता रहा

...जलता रहा

ऋतु कौशिक

अश्क़ अपने ,आप ही पीता रहा
दरिया मेरी आँख में ठहरा रहा

धूप मेरा जिस्म पिघलाती रही 
और साया देख कर जलता रहा

कर ली थी उसने ग़मों से दोस्ती 
तब कहीं वो मुद्दतों ज़िन्दा रहा 

 रात से यारी रही मेरी ,मगर 
बरसों दिल आसेब से डरता रहा

इस तरह जीता रहा वो फुरसतें
याद में शामो सहर करता रहा 

मैं ही छाई हूँ मेरे चारों तरफ
दोस्तों का साथ अब जाता रहा।

सम्पर्कः मकान नम्बर 43सी, प्रोफेसर कालोनी, आज़ाद नगर, हिसार, पिन 125001, फोन 9354967636

Sep 15, 2017

दो ग़ज़लें

कश्ती माँझी की...
डॉ. जया 'नर्गिस
1
कायदे हैं अजब तेरे घर के
मोम के होंठ, बोल पत्थर के

कश्ती माँझी की भूल से डूबी
सर पे इल्ज़ाम क्यूँ समुंदर के

सच बहरहाल मेरा साथी है
जीना आता, नहीं मुझे डर के

धूप का ताज पहनने वाले
कब भरोसे रहे मुकद्दर के

उसकी आँखों का देख मैखाना
सर झुके आज जामो-सागर के

मोल क्या देगी ये मुफलिस दुनिया
उसकी आँखों से गिरे गौहर के

पूछते क्या हो हाल 'नर्गिसका
उसको जीना पड़ा है मर-मर के

तन्हा  पानी...


2
मेरी पलकों पे ये ठहरा पानी
देखता है तेरा रस्ता पानी

अपनी लपटों में घेर लेता है
उसकी आँखों का सुलगता पानी

दो किनारों के बीच बनता है
झिलमिलाता हुआ पर्दा पानी

खत्म मेला हुआ तो ऐसा लगा
रह गया घाट पे तन्हा पानी

आने वाले समय में क्या मालूम
बनके रह जाए न किस्सा पानी

दिल की धरती हो भला नम कैसे
सबकी आँखों का है सूखा पानी

मरहबा मरहबा ऐ प्यास मेरी
खुद उतारे तेरा सदका पानी

सम्प्रति- नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नि·ल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च भोपाल में म्यूजि· प्रोफेशनल के पद पर कार्यरत। सम्पर्क- इलेक्ट्रानि· डिपार्टमेंट, N ITTTR, शामला हिल्स भोपाल- 462002, मो. 9827624212, jyanargis@gmail.com

Mar 10, 2017

नारी का संसार लिखा

 नारी का संसार लिखा 
-डॉ. पूर्णिमा राय

स्वप्न सलोने मन में लेकर, दिलबर तेरा प्यार लिखा।
यौवन तेरे नाम किया है, तन-मन का शृंगार लिखा।।

साँसे आती-जाती कहती, इक पल दूर न जाना अब;
मिला सुकूँ इस रुह को तब हीजब तेरा अधिकार लिखा।।

मन की बस्ती सूनी-सूनी, रंग प्यार के सदा भरो;
हमने प्रेम भाव से इतना, मनभावन संसार लिखा।।

अरमानों का खून हुआ है, देखी हालत दुनिया की;
मानवता के हित की खातिर, प्रीत भरा उद्गार लिखा।।

बहकी-बहकी फिज़ा लगे है, प्रिय की पावन खुश्बू से
मृत काया में होता स्पंदन, प्राणों का संचार लिखा।।

नारी का सम्मान करें सब, धैर्य बढ़ाएँ उनका जो;
ऐसे पुरुष महान जगत में, उनका ही सत्कार लिखा।

मुख चंदा -सा उज्ज्वल दिखता, कर्म करे सब पुरुषों के;
नारी ताकत के ऊपर ही, कवियों ने हुँकार लिखा।।

सुन्दर नखशिख रूप नारी का, चंचल चितवन मन भाए;
प्रेम, स्नेह की मूरत जननी, नारी का संसार लिखा।।

सम्पर्क: ग्रीन ऐवनियू घुमान रोड, तहसील बाबा बकाला, मेहता चौंक-143114, अमृतसर (पंजाब) 7087775713, Email- drpurnima01.dpr@gmail.com

Feb 19, 2017

दो ग़ज़लें

               अपना बना लिया
                                          - आशीष दशोत्तर

उतर के सबके दिलों में उसने सभी को अपना बना लिया है
लबों पे जिसने अगर मुहब्बत का कोई नग़मा सजा लिया है।

हमारा रूतबा, हमारी रौनक, हमारी चाहत नहीं मिटीं है
भले ही पानी में घुल के हमने वजूद अपना मिटा लिया है।

मिटे हैं दुनिया के ग़म हज़ारों नकार में आए सभी नज़ारे
नक़ाब जितने पड़े हुए थे सभी को जब से हटा लिया है।

बना वो हमदम भी, हमसफर भी, बनाई उसने ही रहगुज़र भी
हमारे सपनों को उसने देखो हमीं से कैसे चुरा लिया है।

नहीं किसी को बचा सका है, वो नाखुदा भी, या कोई कश्ती
किसी को तिनकों के ही सहारों ने डूबने से बचा लिया है।

उसी पे बरसा है नूर बेशक़, उसी पे रब की हुई इनायत
घने अंधेरों में गर किसी ने ज़रा सा दीपक जला लिया है।

जहाँ पे रिश्ते ही छूट जाएँ- जहाँ से गिरकर सँभल न पाएँ
मुझे तो आशीष उसने ऐसी बुलन्दियों से बचा लिया है।

               कभी मुस्कुराता है

कभी ख़ामोश रहता है, कभी वो मुस्कुराता है
इसी अंदाज़ ही से वो सदा मिलता-मिलाता है।

यहाँ खुद को भुलाकर जो किसी में डूब जाता है
समन्दर से वही इक दिन खज़ाने ढूँढ़ लाता है।

मेरी उम्मीद उजली है मेरे सब रास्ते रोशन
मेरे क़िरदार का सूरज तभी तो जगमगाता है।

हमें ईमान का ऐजाज़ हासिल हो गया जब से
तभी तो झूठ हमको देख कर यूँ तिलमिलाता है।

नहीं मिलने के यूँ तो हैं बहाने दोस्तों, लेकिन
हमें जो चाहता है वो हमारे पास आता है।

भला आशीष क्यूँ कोई करे उम्मीद क़ातिल से
कभी ज़ालिम भी क्या अम्नो-अमा के गीत गाता है?

Jan 28, 2017

तीन ग़ज़लें

                      1. हरी छाँव भी है
                   - सुधेश 

जिन्दगी धूप है छाँव भी है
शहर से ऊबे तो गाँव भी है।

शतरंज जिन्दगी ने बिछाई
हार का जीत का दाँव भी है।

सोच क्या जो जिन्दगी है सागर
हिम्मत की मगर नाव भी है।

दहकती आग है ये जिन्दगी
यहाँ खिलती हरी छाँव भी है।

भूख पसरी हुई दूर तक है
दहकता पास में अलाव भी है।

                     2. मीत मन का

काश ऐसा सपना आए
आए तू फिर कहीं न जाए।

ख्वाब क्या तू खुद ही आ जा
और फिर दूजा ना आए।

आज अपने स्वर में गा दे
गीत मेरा दुनिया गाए।

प्यास भू की बुझ ना पाई
मेघ छातो क्या छा

मीत मन का पाया है जो
और क्या जिस को मन पाए।

                   3. मेले में तो अकेला हूँ

मैं भीड़ में अकेला हूँ
उजड़ा सा एक मेला हूँ।

खुद को अमीर कहता था
खोटा मगर अधेला हूँ।

दुनिया बड़ी खिलाड़ी है
मैँ तो मगर न खेला हूँ।

गुरुडम लिये सजे हैं जो
उन का नहीं ही चेला हूँ।

यों तो बड़ी नुमाइश है
मेले में तो अकेला हूँ

सम्पर्क: 314 सरल आपार्टमैन्ट्स, द्वारका , सैक्टर 10, दिल्ली 110075 , Email- dr.sudhesh@gmail.com

May 10, 2016

दो ग़ज़लें

उनकी आँखों में

- डॉ.ब्रह्मजीत गौतम

(1)
   उन की आँखों में ऐसी तासीर है
  जो देखे सँवरे उसकी तक़दीर है

  कहते हैं कविता होती है पीर से
     कविता से कवि भी हो जाता पीर है

     जिस के पास नहीं दो दाने प्यार के
     राजा हो कर भी वो शख़्स फ़क़ीर है

     क्या रक्खा है मंदिर मस्ज़िद चर्च में
   घट-घट के अंदर उसकी तस्वीर है

    सब ने मैली कर दी चादर ओढ़ कर
     ज्यों की त्यों धर दे वो दास कबीर है

 धूल धरो माथे पर अपने देश की
  धूल नहीं यह चंदन और अबीर है

         'जीत' ग़ज़ल वह कहलाती है पुरअसर  
      जिसका हर इक श़ेर लगे ज्यों तीर है 

        क्यों हो गया ख़फ़ा
     (2)
     यार क्यों हो गया ख़फ़ा मुझसे
    ऐसी क्या हो गई ख़ता मुझसे

    जख़्म ये दिल पे मेरे कैसे हुए
 हाल कोई तो पूछता मुझसे

    वक़्त की बेरुखी का क्या कहि
   साथ हो कर भी है जुदा मुझसे

      कोई क़ातिल है उनके रुख़ का तिल
               जान मेरी तो ले गया मुझसे

               नींव ने यूँ कहा कंगूरे से
               ये बुलंदी हुई अता मुझसे

               मंज़िलें ख़ुद ही पास आएँगी
               ले के चल हौसला ज़रा मुझसे

               हार में ग़म न 'जीत' में ख़ुशियाँ
               सीख लीजे ये फ़ल्सफ़ा मुझसे                                                

     युक्का- 206, पैरामाउंट सिम्फनी, क्रासिंग रिपब्लिक, गाज़ियाबाद- 201016मो. 9760007838, 9425102154   

Aug 12, 2015

ग़ज़लें

- गिरीश पंकज 

1. अंगार लिखता है

कोई तकरार लिखता है कोई इनकार लिखता है
हमारा मन बड़ा पागल हमेशा प्यार लिखता है

वे अपनी खोल में खुश हैं कभी बाहर नहीं आते
मगर ये बावरा दुनिया, जगत, व्यवहार लिखता है

ये जीवन राख है गर प्यार का हिस्सा नहीं कोई
ये ऐसी बात है जिसको सही फनकार लिखता है

कोई तो एक चेहरा हो जिसे दिल से लगा लूँ मैं
यहाँ तो हर कोई आता है कारोबार लिखता है

तुम्हारे पास आ जाऊँ  पढ़ूँ कुछ गीत सपनों के
तुम्हारे नैन का काजल गजब श्रृंगार लिखता है

अगर हारे नहीं टूटे नहीं तो देख लेना तुम
वो तेरी जीत लिक्खेगा अभी जो हार लिखता है

यहाँ छोटा-बड़ा कोई नहीं सब जन बराबर हैं
मेरा मन जि़न्दगी को इस तरह तैयार लिखता है

हमारी दोस्ती उससे भला होगी कहो कैसे
मैं हूँ पानी मगर वो हर घड़ी अंगार लिखता है

उधर हिंसा हुई, कुछ रेप, घपले, हादसे ढेरों
ये कैसी सूरते दुनिया यहाँ अखबार लिखता है

वो खा-पीकर अघाया सेठ कल बोला के सुन पंकज
जऱा दौलत कमा ले तू तो बस बेकार लिखता है

2. कह कर चले आए

पेड़ था फलदार तो पत्थर चले आए
क्या करें हम चोट बस खाकर चले आए

लोग जलते हैं यहाँ क्यों फल रहे हैं हम
झेलकर इस दर्द को हँस कर चले आए

शातिरों के हाथ में है अब अदब की डोर
जब दिखा यह दृश्य हम कटकर चले ले आए

राग कुरसी जब सुनाया जा रहा था तब
मन दु:खी होने लगा उठ कर चल आए

दर्द में डूबी निशा को भूल बैठे हम
तुम अचानक दूत-से बन कर चले आए

आँसुओं की इक नदी बहने लगी जब भी
रोकने उनको सभी अक्षर चले आए

एक मेला-सा लगे बर्बादियों का अब
थी बड़ी किस्मत कि जो बचकर चले आए

लूटते थे लोग पहले जो विदेशी थे
अब तो है ये हाल कि रहबर चले आए

प्यार से जिसने पुकारा हम गए उस ओर
इक नदी की धार से बहकर चले आए

देख कर हमको खुशी जाहिर न की उसने
अब न पंकज आएगा कहकर चले आए

--
दस व्यंग्य संग्रह और पांच उपन्यासों के लेखक गिरीश पंकज वैसे तो मूलत: व्यंग्यकार के रूप मे ही पहचाने जाते है लेकिन बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित है कि वे गज़़ले भी कहते है। गत वर्ष उनका दूसरा  गज़़ल संग्रह प्रकाशित हुआ था- यादों में रहता है कोई

सम्पर्क: जी- 31, नया पंचशील नगर, रायपुर (छ. ग.) 
मो.94252 12720Email- girishpankaj1@gmail.com

Oct 20, 2014

दो ग़ज़लें


दियों की बात
- डॉ.राकेश जोशी
1. 
आज फिर से भूख की और रोटियों की बात हो
खेत से रूठे हुए सब मोतियों की बात हो

जिनसे तय था ये अँधेरे दूर होंगे गाँव के
अब अधेरों से कहो उन सब दियों की बात हो

इक नए युग में हमें तो लेके जाना था तुम्हें
इस समुन्दर में कहीं तो कश्तियों की बात हो

जो तुम्हारी याद लेकर आ गई थीं एक दिन
धूप में जलती हुई उन सर्दियों की बात हो

जिनको तुमने था उजाड़ा कल तरक्की के लिए
आज फिर उजड़ी हुई उन बस्तियों की बात हो

जिक्र जब भी जंगलों का, आँसूओं का, आए तो
पेड़ से टूटी हुई सब पत्तियों की बात हो

बदलना सीख रहे हैं
2 .
जैसे-जैसे बच्चे पढऩा सीख रहे हैं
हम सब मिलकर आगे बढऩा सीख रहे हैं

आज हवाओं में हलचल है, बेचैनी है
बन्दर फिर पेड़ों पर चढ़ना सीख रहे हैं

भूख मिटाने को खेतों में जो उगते थे
गोदामों में जाकर सड़ना सीख रहे हैं

कहाँ मुहब्बत में मिलना मुमकिन होता है
इसीलिए हम रोज़ बिछड़ना सीख रहे हैं

नदी किनारे  बसना सदियों तक सीखा था
गाँवों में अब लोग उजड़ना सीख रहे हैं

धूप निकल कर फिर आएगी इस धरती पर
दुनिया को हम लोग बदलना सीख रहे हैं


लेखक के बारे में: अंग्रेजी साहित्य में एम. ए., एम. फिल., डी. फिल. राजकीय महाविद्यालय, डोईवाला देहरादून, उत्तराखंड, में अंग्रेजी साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।  इससे पूर्व वे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी अनुवादक के तौर पर मुंबई में पदस्थापित रहे। मुंबई में ही उन्होंने थोड़े समय के लिए आकाशवाणी विविध भारती  में आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर भी कार्य किया। उनकी कविताएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ-साथ आकाशवाणी से भी प्रसारित हुई हैं। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने साहित्यिक पत्रिका 'लौका संपादन भी किया। उनकी एक काव्य-पुस्तिका 'कुछ बातें कविताओं मेंसन 1997 में प्रकाशित हुई थी। उनका एक ग़ज़ल संकलन शीघ्र प्रकाश्य है. सम्पर्क: असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी) राजकीय महाविद्यालय, डोईवाला देहरादून, उत्तराखंड, Email-joshirpg@gmail.com