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Jul 1, 2026

यात्रा वृतान्तः बारिश में भीगी अमरकंटक

  - डॉ. रत्ना वर्मा

कुछ यात्राएँ केवल जगह देखने के लिए नहीं होतीं - वे आत्मा को छूने, मन को शांत करने और प्रकृति से गहरे जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा रही अमरकंटक की। वह भी बारिश के मौसम में- जब हर पत्ता धुला हुआ लगता है, हर शाख बरखा की बूँदों से झुकी हुई और काले बादल मानों मेघदूत की तरह किसी का संदेश लेकर जाते हुए दिखाई देते हैं।  

मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के मिलन-बिंदु पर स्थित एक सुंदर पहाड़ी क्षेत्र है में स्थित है अमरकंटक। यह छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा हुआ है और नर्मदा का उद्गम स्थल होने के कारण तीर्थराज के रूप में प्रसिद्ध है।  मैकल पर्वत की गोद में बसा यह स्थान किसी रहस्य और आध्यात्मिक शक्ति से भरा लगता है। एक ऐसी पावन भूमि जहाँ से न केवल नदियाँ बहती हैं, बल्कि आस्था, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम भी होता है। 

पूरे भारतवर्ष में ऐसे भौगोलिक क्षेत्र विरले ही देखने को मिलते हैं जहाँ एक ही स्थान से तीन नदियों का उद्गम हुआ हो। इतना ही नहीं, तीनों अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं- नर्मदा जी, जो पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है और अरब सागर में मिलती है; दूसरी सोन नदी, जो पूर्व की ओर बहकर गंगा से मिलती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में समा जाती है; और तीसरी जोहिला, जो दोनों के बीच से होती हुई आगे बढ़ती है और सोनभद्र में समा जाती है। है न यह सब अद्भुत और रहस्यमय? यही कारण है कि अमरकंटक को भारत के आध्यात्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान मिला है।

पेंड्रा से अमरकंटक : हरियाली  और बादलों के संग 

तो ऐसे विशेष स्थान की ओर रायपुर से पेंड्रा तक रेल से हमारा सफर तो सहज रहा; लेकिन असली सौंदर्य तो वहाँ से अमरकंटक की ओर सड़क मार्ग से जाते समय दिखाई दिया। सच ही है बारिश की रिमझिम बूँदों के संग यात्रा का रोमांच ही कुछ और होता है।  पिछले वर्ष पहली जुलाई की  सुबह जब रेल से मैं और मेरी चित्रकार दोस्त सुनीता पेंड्रा स्टेशन पर उतरे तब रिमझिम बारिश हो रही थी। बारिश की हल्की फुहारों के साथ चारों ओर फैले साल के हरे- भरे घने जंगल और खूबसूरत घाटियों को निहारते हुए एक घंटा कैसे बीता पता ही नहीं चला।  

अमरकंटक की वादियों में पहुँचते ही आभास हुआ मानों प्रकृति हमारे स्वागत में कोई गीत गुनगुना रही हो । मिट्टी में एक खास प्रकार की भीनी खुशबू , जो पहाड़ और जंगल में  सिर्फ बारिश में ही उठती है। ठंडी हवाएँ और आसमान में उमड़ते- घुमड़ते बादल... सब कुछ सुखद अहसास से भरा हुआ था। 

रास्ते में हम बाते करते हुए जा रहे थे कि अमरकंटक कैसे मध्यप्रदेश के हिस्से में चला गया और छत्तीसगढ़ को नहीं मिल पाया। दरअसल जब साल 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना, तब अमरकंटक को लेकर दोनों राज्यों में तनातनी की  स्थिति बनी रही। बटवारे के बाद नर्मदा मैया का उद्गम स्थल और मुख्य मंदिर परिसर तो मध्यप्रदेश में था; लेकिन पहाड़ों और जंगलों का एक बड़ा हिस्सा नए राज्य छत्तीसगढ़ में आ गया। धार्मिक महत्त्व और पर्यटन की वजह से दोनों ही राज्य इसे अपने क्षेत्र में शामिल करना चाहते थे। इससे यह उपेक्षित हो गया।  बढ़ता पर्यटन, अव्यवस्थित निर्माण और कचरे ने नर्मदा के उद्गम की पवित्रता पर असर डालना शुरू कर दिया। तब 2016 में दोनों राज्यों ने मिलकर इसे विशेष क्षेत्र घोषित कर एक संयुक्त प्राधिकरण बनाया। मकसद था- नर्मदा के उद्गम और आसपास के जलस्रोतों का संरक्षण करना पर्यटन को बढ़ावा देना साथ ही जंगल और पहाड़ को बचाए रखना।

.... हमारी बातों का सिलसिला चल ही रहा कि हम जंगल और पहाड़ियों के बीच बने एक शांत गेस्ट हाउस; जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था थी,  में कब पहुँच गए पता ही नहीं चला।  काले बादलों से ढँके आसमान के नीचे गेस्ट हाउस की गैलरी में बैठकर गरमागरम चाय की चुस्कियों ने रेल यात्रा की थकान को सुकून में बदल दिया। शाम हो गई थी अंतः कहीं और जाने का विचार नहीं था परंतु चाय पीने के बाद हमें बताया गया कि इस समय नर्मदा कुंड में शाम की आरती चल रही होगी । बस फिर क्या था हम तुरंत ही तैयार हुए और निकल पड़े नर्मदा मैया के उद्गम स्थल की ओर, भला ऐसा शुभ अवसर कौन छोड़ता है। 

चूँकि इस बार अमरकंटक कई बरस के बाद आना हुआ था तो  मुख्य सड़क के चारो ओर का नजारा बहुत कुछ बदला- बदला सा था। बारिश का मौसम होने के कारण पर्यटक तो इस समय बहुत कम थे।  हमने देखा जगह-  जगह अनेक नए भवन, आश्रम और कुछ मंदिरों का निर्माण हो चुका था। ठहरने के लिए धर्मशाला, होटल, आदि में भी बहुत बढ़ोतरी दिखाई दे रही थी। 

 रास्ते में नर्मदा नदी के जन्म को लेकर प्रचलित जनश्रुतियों पर भी बात होने लगी।   लोककथाओं  पौराणिक कथाओं में भी उनके जन्म और विवाह न होने को लेकर कुछ कथाएँ प्रचलित हैं जैसे-  भगवान शिव ने अपने अश्रुओं से नर्मदा को जन्म दिया था, यह भी कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण के समय अपने आशीर्वाद से नर्मदा को अवतरित किया। तभी तो नर्मदा मैया को “स्वयंभू नदी” माना जाता है। इसीलिए मान्यता है कि नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। इस तरह की अनेक कथाएँ सुनते- सुनाते हम कुछ ही किलोमीटर की दूरी तय कर नर्मदा कुंड पहुँच  गए। 

एक समय था कि जब नर्मदा कुंड और उसके आस- पास के मंदिरों का यह समूह दूर से ही नजर आता था पर अब गलियारे, रेलिंग और चबूतरे सब तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बन गए हैं। जूते उतारकर जब हम टाइलों वाले गलियारे से गुजरे तो भीगे फर्श पर फिसलने का डर था, पर मन में उमंग थी अतः मंदिर के समीप पहुँचे तो मंत्रोच्चारण के साथ आरती शुरू हो चुकी थी, अनेक भक्त जन वहाँ इकट्ठा थे। हम भी सबके बीच ध्यान मग्न होकर आरती में शामिल हो गए ....

अँधेरा घिर आया था और बारिश की बूँदे अब कुछ तेज हो गई थीं। उद्गम स्थल पर बना कुंड बहुत ही शांत, आध्यात्मिक और पवित्र अनुभूति से भरा हुआ था। आरती के बाद कुंड के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लगा जैसे जीवन की परिक्रमा नर्मदा मैया के सान्निध्य में पूरी हो रही हो। मंदिर परिसर में थोड़ी देर और ठहर, परिसर के चारो ओर घूमते हुए हम वापस गेस्ट हाऊस लौट आए। 

स्वाद और सुकून की रात

रात के भोजन में गरमागरम फुलके, नारियल की खुशबू से भरी बरबटी की सूखी सब्जी, आलू- गोभी की रसे वाली सब्जी, दाल-चावल और खीर - हर चीज़ स्वाद में लाजवाब। इस स्वादिष्ट भोजन ने दिन भर की भूख और थकान सब कुछ मिटा दिया। पेट तो भर गया, पर मन नहीं। खाने के बाद परिसर में आधे घंटे की चहलकदमी जरूरी हो गई थी, साथ में अमरकंटक के तब और अब में आए बदलाव पर गप-शप भी होती रही ताकि नींद आने में प्रकृति भी साथ दे।

दूसरा दिन : अमरकंटक की वादियों में भ्रमण

रात सुकून भरी नींद आई। चिड़ायों की चहचआहट और पत्तों  और शाखों पर गिरते बारिश की संगीतमय बूँदों की आवाज के साथ नींद खुली। जैसे ही कमरे के पीछे का दरवाजा खुला तो लगा मानों जंगल और पहाड़ के ऊपर उमड़ते – घुमड़ते बादल हमें सुबह की सैर के लिए आमंत्रित कर रहे हों। भला बादलों का आमंत्रण हम कैसे ठुकराते। 

और सच कहूँ... बारिश से भीगी हुई सुबह की यह सैर इस यात्रा में अनमोल रही। बादलों ने ठहर कर जैसे हमें अमरकंटक की शुद्ध और ताजी हवा में सांस लेने का मौका दे दिया। बारिश से धुली सड़क पर चलते हुए जंगल और पहाड़ से उठती सोंधी खूशबू, चारो ओर हरियाली की बिछी चादर, बारिश से भीगे पत्तों से गिरती बूँदें और पक्षियों का मधुर कलरव- सब मिलकर जैसे किसी अनकही कविता की रचना कर रहे थे।

कपिल धारा के रास्ते में चलते हुए आधे घंटे से अधिक समय तक सैर के बाद हम अपने ठिकाने पर लौट आए । आज का मौसम जैसे हमारे लिए ही खुला था, रात भर बरस कर बादल मानों सुस्ता रहे हों। बस फिर क्या था हम तैयार होकर नाश्ते के लिए जैसे ही डाईनिंग टेबल पर पहुँचे, उम्मीद से बिल्कुल विपरीत अमरकंटक की सादगी में इडली, डोसा, सांभर और नारियल की चटनी का दक्षिण भारतीय नाश्ता हमारा इंतजार कर रहा था। सब कुछ इतना स्वादिष्ट कि खाते हुए लगा कहीं हम केरल तो नहीं  पहुँच गए? दरअसल वहाँ का रसोइया दक्षिण भारतीय जो था। 

फिर शुरू हुई हमारी अमरकंटक के कुछ प्रमुख स्थलों की यात्रा: सबसे पहले पँहुचे माई की बगिया में- 

बरसों पहले माई की बगिया का जब भ्रमण किया था तो यहाँ जलधाराओं के कुंड प्राकृतिक रूप में थे, पर अब कुंड के चारो ओर क्रांकीट के मंदिर का निर्माण कर दिया गया है। किसी समय यहाँ साधु संत कुटिया में धुनी रमाए बैठे हुए नजर आते थे। पर अब नजारा कुछ अलग ही है।  फिर भी हरियाली से भरी इस बगिया में चलते हुए एक अलौकिक ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा अपनी सहेली गुलबकावली के साथ यहाँ खेलने आया करती थीं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नर्मदा नदी का वास्तविक उद्गम स्थल माई की बगिया ही है, और यहाँ से निकलने वाली जलधारा आगे जाकर नर्मदा मंदिर में मिलती है। एक अन्य कथा के अनुसार, नर्मदा का विवाह सोनभद्र से तय हुआ था और माई की बगिया में उनका विवाह मंडप भी सजाया गया था; लेकिन नर्मदा की जगह उसकी सहेली जोहिला दुल्हन बनकर बैठ गई। यह देखकर  नर्मदा रूठ गई और उल्टी दिशा में बहना शुरू कर दिया। किंवदंतियाँ तो कई प्रचलित है पर सच्चाई यही है कि यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता के लिए तो जाना ही जाता है, साथ ही कई औषधीय पौधों, विशेष रूप से गुलबकावली के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसका उपयोग आँखों के रोगों के लिए आयुर्वेदिक दवाई बनाने में किया जाता है। 

माई की बगिया से लौटकर हमारे कदम नर्मदा कुंड के पास फैले प्राचीन मंदिरों के समूह की ओर बढ़ चले। यह वे मंदिर हैं, जो अमरकंटक की पहचान हैं और 11वीं शताब्दी के कलचुरी वंश के सुनहरे इतिहास की गवाही देते हैं। राजा कर्णदेव ने इनका निर्माण कराया था। इस परिसर में छह मंदिर और सूरज कुंड नामक एक कुंड भी है। कर्ण मंदिर, केशव नारायण मंदिर, मछेंद्रनाथ मंदिर और पातालेश्वर मंदिर त्रिपुरियों के कलचुरियों द्वारा निर्मित किए गए थे, जबकि पंच मठ और जोहिला मंदिर बाद के काल के हैं। इनकी स्थापत्य शैली में कलचुरी कला का अद्भुत संतुलन दिखता है- बारीक नक्काशी और पत्थरों पर उकेरे गए प्रतीक आज भी जीवंत प्रतीत होते हैं।

इन मंदिरों का संरक्षण भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है। अब विभाग द्वारा परिसर को सँवारकर सुंदर बगीचे, पक्के रास्ते और गलियारे बना दिए गए हैं। पर्यटकों के लिए टिकट प्रणाली भी लागू है, ताकि धरोहर की देखभाल हो सके। ऐसा होने से प्रत्येक मंदिर में जाना और उन्हें करीब से देखना आसान हो गया है। मंदिरों के बीच विचरण करते हुए यही महसूस हुआ जैसे इतिहास फुसफुसा रहा हो- पत्थरों में गूँथा हुआ विश्वास, और आकाश को छूती हुई आस्था।

मंदिरों की सीढ़ियों और कुंड के पास कुछ चित्र खींचकर अगली यात्रा यानी कपिलधारा की ओर जलप्रपात  देखने के लिए निकल पड़े। लगभग 100 फीट ऊँचाई से गिरता यह जलप्रपात नर्मदा का पहला पड़ाव है। मन मोह लेने वाला दृश्य था। कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ कपिल मुनि ने तप किया और सांख्य दर्शन की रचना की। बारिश के कारण नीचे बहते प्रपात तक जाना तो जोखिम भरा था, पर कुछ साहसी तब भी नीचे उतर चुके थे। प्रकृति की गोद में बसे  इस आलौकिक स्थान की पहाड़ियों के आस- पास सदियों पुरानी कई गुफाएँ हैं जहाँ बैरागी कभी तप किया करते थे। तभी तो यहाँ से जलप्रपात को देखते हुए ध्यान करने जैसा अनुभव होता है और आस- पास पहाड़ों और जंगल में  फैली दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ से हवा शुद्ध और ताजगी से भरी हुई।

जब हम यहाँ पहुँचे तो पर्यटकों की थोड़ी भीड़ थी,  वे सब प्रशासन द्वारा बनाए नए व्यू प्वाइंट से झरने के साथ चित्र खिंचवाने में लगे हुए थे। जब भीड़ कुछ छंट गई तो हम भी उसी स्थान से कपिल धारा को देखने पहुँच गए। हमने भी कुछ चित्र लिए । चारों ओर पहाड़ और जंगल से घिरे इस मनोरम स्थान में कुछ समय व्यतीत कर बढ़ चले अगले पड़ाव की ओर.....

हमारा अगला पड़ाव था ज्वालेश्वर मंदिर यहाँ भगवन शिव का विशाल शिवलिंग स्थापित है।  पुराणों में इस स्थान को महारुद्र मेरु भी कहा गया है।  यह भी माना जाता है कि भगवान शिव पार्वती से साथ इस रमणीय स्‍थान पर निवास करते थे। ऐसा भी माना जाता है गंगोत्री का जल रामेश्वर में चढ़ाने में जितना पुण्य फल मिलता है उतना ही फल नर्मदा का जल ज्वालेश्वर महादेव में चढ़ाने से मिलता है।  इस विशाल शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए सीढ़ियों से ऊपर चढ़ना पड़ता है हमने भी ऊपर जाकर जल चढ़ाया और प्रणाम कर नीचे आ गए। 

तीसरे दिन सुबह भी बेहद खुशनुमा थी।  सुबह की सैर के लिए हमने आज दूसरा रास्ता चुना, थोड़ी चढ़ाई वाला।  लौटते हुए सुनीता ने वहाँ के जंगलों से कुछ जंगली फूल के पौधे चुन लिये। जिनमें गुलाब के कलम भी शामिल हैं। चूँकि कटीले गुलाब की डालियों को तोड़ पाना मुश्किल हो रहा था तो पास ही गाँव के एक घर में कलम काटने के लिए औजार माँगने के इरादे से आवाज लगाई। दुबली पतली सुंदर सी महिला ने बाहर आकर सवालिया निगाहों से हमें देखा तो झट हमने अपने आने का मकसद बता दिया । उस महिला ने तुरंत अपने पति को हमारी मदद के लिए भेज दिया । उस नौजवान ने अपनी कुल्हाड़ी से ढेर सारे गुलाब के कलम काटकर हमें दे दिए। सुनीता इस गुलाब के कलम को अपने नए स्टूडियो में लगाना चाहती है। पौधे लेकर हम लौट आए; क्योंकि तैयार होकर हमें  फिर कुछ और प्राकृतिक स्थानों  की ओर जाना था। 

लेकिन हमारी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। जैसे बादल हमसे कह रहे हों कि आज तो मुझे यहीं बैठकर आराम से निहारना होगा। और हुआ भी वही बारिश तेज हो गई और लगातार दिन भर होती रही। गरमा- गरम चाय का आनंद लेते हुए हम कमरे के पीछे गलियारे में बैठ बारिश का भरपूर आनंद लेते रहे। नाश्ता किया, भोजन लिया और दिन भर जंगल और पहाड़ों को बारिश में भीगते देखते रहे। 

आखिर इसी मौसम का आनंद लेने तो हमने अमरकंटक को चुना था । प्रकृति ने भी जैसे हमारा मन भाप लिया था। भला ऐसे मनोहारी दृश्य को देखकर सुनीता का चित्रकार मन कैसे न मचलता उसने तुरंत अपनी ड्राइंग कॉपी और पेन निकाली और रम गई,  लगा जैसे उसने प्रकृति को कागज पर उतार लिया हो ...और मैं इस अलौकिक अनुभव को शब्दों में ढालने के बारे में सोचती रही। 

धरमपानी और प्रकृति की गोद में विश्राम

दोपहर का भोजन लेकर हमने थोड़ी देर आराम किया और जब बारिश कुछ थमी, तो हम फिर निकल पड़े छतरी लेकर यह कहते हुए कि अब तो चाहे जितना बरसो चाहे हमें भी भिगो दो । थोड़ी देर वहाँ का स्थानीय बाजार घूमते रहे और जब बारिश पूरी तरह थम गई तो बताया गया कि आज तेज बारिश के कारण सोन मुड़ा, दूधधारा और कबीर चौरा आदि जाना मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि दूरी कुछ ज्यादा है और वहाँ से अँधेरा होने से पहले लौट भी नहीं सकते; लेकिन पास ही धरमपानी जा कर आराम से  वापस आया जा सकता था। 

धरमपानी, छत्तीसगढ़ की सीमा में स्थित एक रमणीय स्थान है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और पहाड़ों की अलोकिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह वास्तव में एक गर्म पानी का झरना है जिसे धुनी पानी भी कहा जाता है।  यह झरना औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है और माना जाता है कि इसमें स्नान करने से कई रोग ठीक हो जाते हैं।   

धरमपानी पहुँच कर तो आनंद ही आ गया। प्रकृति का बेहद खूबसूरत नजारा । हमने एक चट्टान पर बैठकर प्रकृति का शांत संगीत सुनते हुए पूरी शाम बिता दी।  दूर पहाड़ों पर बादलों की लुकाछिपी, हवाओं से झनकर आती आवाज, मानों कोई मघुर गीत गुनगुना रहा हो... रोज शाम आती थी, मगर ऐसी न थी, रोज रोज घटा छाती थी मगर ऐसी न थी.... यहाँ आकर बैठना जीवन की व्यस्तता से दूर, एक तरह का ध्यान का अनुभव करना था। सच है प्रकृति के साथ कुछ समय हर व्यक्ति को बिताना ही चाहिए। मन तो नहीं था पर अँधेरा घिरने वाला था अतः वहाँ से भी  लौटना ही पड़ा।  

प्रकृति, आत्मा और आस्था के मिलन की इस भूमि में तीन दिन तक समय बिताने के बाद ऐसा महसूस हुआ मानो सौन्दर्य से आच्छादित यह पवित्र तपोभूमि किसी ऋषि की कथा सुना रहा हो। प्रकृति जब अपने पूर्ण सौंदर्य में होती है, तब मनुष्य के सारे प्रश्न, सारी थकान और सारी बेचैनी जैसे खुद-ब-खुद शांत हो जाती हैं। अमरकंटक की बारिश में भीगी यह यात्रा एक तीर्थ से कहीं अधिक एक आध्यात्मिक अनुभव थी- एक ऐसा अनुभव जिसे न कैमरे में कैद किया जा सकता न शब्दों में समेटा जा सकता, पर आत्मा में हमेशा के लिए अवश्य दर्ज हो जाता है। कैमरे ने तस्वीरें तो कई ली; लेकिन सही माने में मन ने जो चित्र बनाए, वे कहीं गहरे तक अंकित हो गए हैं। बारिश में भीगते जंगल, प्राचीन मंदिरों की शांति और नर्मदा की पवित्रता ने हमें भीतर तक स्पर्श किया। सच है, नर्मदा केवल एक नदी नहीं, एक भाव है- जिसमें बहते ही मन पावन हो जाता है।

May 1, 2026

यात्रा वृतांतः कारों धाम की यात्रा कथा

 -  मांडवी सिंह

भारत की संस्कृति अपने दामन में  अनेक किस्से - कहानियों को समेटे, इतिहास और भूगोल के महीन रेशों की बुनावट पर कई युगों के दर्शन का बेलबूटा टाँके,सँजोती रहती है समय को, सँभालती रहती है नई पौध के एक - एक पल को।

इस बार की यात्रा में मुझे एक ऐसे स्थान पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो संस्कृति के उपर्युक्त सभी अलंकारों से सुशोभित है। भोपाल से कामायनी एक्सप्रेस से यात्रा शुरू हुई जो बनारस होते हुए बलिया तक जाती है। पहले यह ट्रेन सिर्फ बनारस तक जाती थी। प्रसंग था सहेली के पुत्र का विवाहोत्सव । इतिहास में बलिया का नाम बहुत मशहूर है। सबसे पहले तो मेरे मन में आया कि आखिर इस नाम का अर्थ क्या होता है? कुछ गूगल गुरु और कुछ स्थानीय लोगों से विचार- विमर्श के बाद जो निष्कर्ष निकला उसके आधार पर कहानी यह है कि पौराणिक काल में महर्षि भृगु ऋषि के आश्रम में ( आज भी इसे भृगु क्षेत्र कहा जाता है) उनके पुत्र शुक्राचार्य द्वारा दानवराज दानवीर राजा बलि का यज्ञ संपन्न कराया गया था। संस्कृत में यज्ञ को याग कहा जाता है। जिसके आधार पर इसका नाम 'बलियाग' पड़ा ,जो कालांतर में बलिया हो गया।

यह राजा बलि की राजधानी थी। यहाँ से लगभग 20 किलोमीटर दूर 'चितबड़ागाँव' है वहीं जाना था। सहेली के परिवार का बेटा अतुल मुझे लेने स्टेशन आया था। उसी के साथ बातचीत शुरू हुई। मैंने मजाक के लहजे में कहा कि इस गाँव का नाम चितबड़ा क्यों है, क्या यहाँ के लोग बड़े दिलवाले होते हैं? मुझे उम्मीद नहीं थी कि मजाक में कही गई बात का जवाब इतना दिलचस्प हो सकता है। अतुल ने बताया कि पुराने समय की बात है यहाँ के स्टेशन से खिलौनों से भरी ट्रेन गुजर रही थी। एक गरीब परिवार का बच्चा उस खिलौने के लिए मचल गया। गाँव वाले एकत्रित हो गए और ट्रेन रुकवा दी और एक खिलौना लेकर उस बच्चे को दे दिया। तभी से इस गाँव का नाम चितबड़ा गाँव पड़ गया, अर्थात् बड़े दिलवाले लोगों का गाँव। इस किवदंती  को सुनाना मेरा मूल उद्देश्य नहीं है बल्कि इस गाँव के पास जो अद्भुत स्थल है, जिसका प्रचार - प्रसार नहीं होने के कारण वह पर्यटकों से आज भी वंचित है उसका वृतांत सुनाना है।

इसी गाँव से एक रास्ता जाता है कामेश्वर धाम के लिए जिसे आज कारों धाम कहा जाता है। पूर्व में इसका नाम कामकारू, कामशीला था, जो अपभ्रंश होकर कारों हो गया।

इसकी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान शिव ने देवताओं के सेनापति कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया था। अतीत के झरोखे से झाँकते , सुलझे अनसुलझे अनेक किस्से ,कहानियों को समेटे इस स्थली को देखने की उत्कंठा बलवती होती जा रही थी, लेकिन विवाहोत्सव के पश्चात ही दर्शन संभव था।

सौभाग्य से वह समय भी आ गया। चितबडा गाँव से हमलोग कार से मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। हरे - भरे खेतों, बाग - बगीचों के नयनाभिराम दृश्यों ने मन के सारे दरवाजे खोल दिए। जहाँ तक निगाह जाए बस हरियाली ही हरियाली। बीच बीच में ईंट - भट्ठे का कारोबार था जो स्थानीय निवासी अतुल के परिवार का ही था। चितबड़ा गाँव मुख्य मार्ग से मंदिर तक पहुँचने के लिए ऑटो, टैक्सी चलते हैं। अब हमलोग मंदिर के करीब थे। मंदिर के पीछे वाले हिस्से में कुछ खर - पतवार और दलदल दिखा। अतुल ने बताया कि किसी समय मंदिर के चारों ओर 84 एकड़ में फैला तालाब था, जो अब अतिक्रमण का शिकार हो गया है। अब हम मंदिर के अंदर थे। बाहर ताजे फूलों की माला, बेलपत्र और प्रसाद की कुछ दुकानें थीं , जहाँ से हमलेगों ने फूल प्रसाद खरीदा। शिव एवं शक्ति की आराधना की। अन्य मंदिरों की अपेक्षा भीड़ कम होने के कारण पूजा - अर्चना निर्विघ्न सम्पन्न हुई।

 मंदिर के बहुत स्वच्छ और सुंदर प्रांगण में शिव मंदिर स्थापित है। सामने एक आधा जला हुआ आम का हरा भरा वृक्ष। रामजी के चरणपादुका के साथ राम, लक्ष्मण जी का मंदिर। कल- कल स्वच्छ जल से भरा हुआ सुंदर रानी पोखरा। हरितिमा की चादर ओढ़े पूरा परिवेश। यह स्थान साधकों की तपोभूमि भी रही है। यहाँ के प्रसिद्ध पुजारी बालक बाबा  के साथ एक और साधक पुजारी बाबा की मूर्ति भी स्थापित है। बालक बाबा ने काशी, मथुरा, हरिद्वार जैसे तीर्थस्थानों पर यात्रियों के ठहरने के लिए कई धर्मशालाओं का  निर्माण कराया था। दर्शन पूजन के बाद अतुल ने वर्तमान पुजारी जी, जिन्हें स्थानीय लोग साधु जी कहते हैं उनके पास ले गये। साधु जी उस समय विश्राम में थे अतः मेरे जिज्ञासु प्रश्नों के उत्तर के साथ अन्य कई रोचक जानकारी देने के लिए वे उपस्थित नहीं हो पाए। 

शिवलिंग के ठीक सामने आधा जला आम्र वृक्ष किसी को भी कौतुक में डाल देता है; क्योंकि उसका लगभग 70% तना जला हुआ है और बाकी पेड़ हरा भरा। आम का मौसम होने से उस पेड़ पर आम  लटक रहे थे। कहा जाता है कि इसी पेड़ की ओट से कामदेव ने समाधि में लीन भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया था, और शिवाग्नि में जलकर भस्म हो गया था।

दूसरा प्रसंग है ऋषि विश्वामित्र के साथ दोनों अवधेश कुमारों के ठहरने का । तारकासुर के उत्पात से उद्धार हेतु दोनों राजकुमारों को लेकर जब ऋषि विश्वामित्र बक्सर जा रहे थे तब मार्ग में यह स्थल आया। जहाँ गंगा और सरयू का संगम है। स्नान, पूजा - अर्चन के बाद दोनों राजकुमारों ने अनेक उग्रतपा ऋषियों के आश्रम देखे जहाँ वे कठोर तपस्या में लीन थे। राजकुमारों ने कौतूहलवश उस स्थान के बारे में ऋषि विश्वामित्र जी से पूछा। विश्वामित्र जी ने बताया कि यह वही तपोभूमि है जहाँ कंदर्प ने भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया था।

पौराणिक ग्रंथों और वाल्मीकि रामायण में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है। यह ऋषि दुर्वासा की तपोभूमि रही है।

अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं हुई थी।

यहाँ दो और प्राचीन शिवलिंग स्थापित है-

1. श्री कामेश्वर नाथ शिवालय जो रानी पोखरा के पूर्व तट पर विशाल आम्र वृक्ष के नीचे स्थित है। यह शिवलिंग खुदाई के समय प्राप्त हुआ था।

2. बालेश्वर नाथ शिवालय। बालेश्वरनाथ शिवलिंग चमत्कारी शिवलिंग हैं। कहा जाता है कि सन् 1728 में अवध के नवाब मुहम्मद शाह ने कामेश्वर धाम पर हमला किया था, तब बालेश्वरनाथ शिवलिंग से निकले हजारों काले भौरों ने जवाबी हमला कर उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया था। 

आठवीं सदी में  मंदिर का निर्माण अयोध्या के राजा कवलेश्वरनाथ द्वारा करवाया गया था। पहले यह क्षेत्र अवध प्रांत का हिस्सा था। किंवदंती है कि अवध के राजा कवलेश्वरनाथ को कुष्ठ रोग हो गया था। वह अपनी रानी और कुछ सेवकों के साथ अवध छोड़कर तपस्या हेतु जंगल की ओर निकल गए। रास्ते में यहाँ विश्राम किया। यहाँ के वातावरण में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि राजा विश्राम के लिए कुछ समय तक यहीं ठहर गए। उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। राजा ने भव्य मंदिर, तालाब (रानी पोखरा और मंदिर के चारों ओर फैले पोखरा) का निर्माण करवाया। इसी रानी पोखरे में अवध की महारानी स्नान करती थीं।


वर्तमान में स्थानीय निवासियों के द्वारा समय - समय पर यज्ञ,अखंड पाठ इत्यादि धार्मिक एवम् सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करवाया जाता है। मंदिर का जीर्णोद्धार भी स्थानीय लोगों के सहयोग से किया गया है। लम्बे समय से प्रत्येक श्रावण मास में बक्सर उजियार घाट से काँवरिया जल लेकर पैदल, वाहन द्वारा अपनी श्रद्धा के अनुसार कारों धाम आकार शिव का जलाभिषेक करते हैं।

साधु जी द्वारा अन्य रोचक किस्से अभी सुनने बाकी थे लेकिन मेरी वापसी के लिए ट्रेन का समय करीब आ रहा था अतः न चाहते हुए भी वहाँ से निकलना पड़ा। साधु जी ने ढेर सारा ड्राइ फ्रूट का प्रसाद दिया । पुनः आने का आमंत्रण एवं आशीर्वाद देकर हम लोगों को विदा किया।

ऐसी पौराणिक और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण कारों धाम को पर्यटन विभाग की निगरानी की आवश्यकता है ताकि 84 कोस के पोखरे का जीर्णोद्धार  हो सके। साथ ही साथ स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सके। तो आप भी आइए कारों धाम।

Apr 1, 2026

यात्रा वृत्तांतः उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर

 - डॉ. आरती स्मित 

यात्राएँ कहीं की हो, रोमांच पैदा करती हैं। मध्य प्रदेश कई कारणों से मेरा प्रिय स्थल रहा है, हालाँकि स्वरूप बदल रहा है, कहानियाँ बदल रही हैं, तब भी वह प्रांत आदि मानव का प्रांत होने के साथ ही अपनी स्थापत्य कलाओं, प्राचीन गुफाओं और एक बड़े हिस्से में आदिदेव महादेव की नगरियों के कारण मुझे अति प्रिय है। 

  साहित्य अकादेमी, भोपाल के आमंत्रण पर ‘गंज बसौदा’ जाने हेतु सहमति के पीछे एक बालसुलभ ललक थी- दसवीं सदी में स्थापित, शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते  उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर जाने और शिव के उस प्रतीक के दर्शन-पूजन की, जिनका अभिषेक करने प्रतिवर्ष शिवरात्रि की प्रात: रश्मियाँ धरती पर उतरती हैं। यह गल्प लग सकता है, किंतु यह सच है। इस मंदिर के इतिहास में कई गल्प भी शामिल हुए होंगे, किंतु यह उस महान कलाकार के ज्ञान का प्रत्यक्ष नमूना है। दसवीं सदी का वह शिल्पकार कितना विलक्षण रहा होगा, यह अनुमान लगाना भी कठिन जान पड़ता है।

   दिल्ली से गंज बसौदा की रेलयात्रा कुछ कष्टप्रद रही। किंतु स्थानीय संयोजक युवा कवि ध्रुव शर्मा द्वारा गंज बसौदा में की गई व्यवस्था बेहद व्यवस्थित और उत्कृष्ट थी। नीलकंठ महादेव के नाम पर ही होटल का नामकरण किया गया था—नीलकंठ। कार्यक्रम के सफल समापन के उपरांत अगले दिन ११ मार्च २०२५ को स्थानीय युवा सन्नी, उसकी बहन रोशनी, युवा कवयित्री शिखा, प्रगति एवं कार्यक्रम में शिरकत करने आए युवा साथी संदीप एवं राहुल के साथ यह यात्रा आरंभ हुई। इस प्रकार, एक से दो और दो से सात यात्री हो गए। दो स्कूटी एवं एक मोटर बाइक से बिना हेलमेट के १८ किलोमीटर की यात्रा भी रोमांचक रही। 

   गंज बसौदा यों तो विदेश निर्यात किए जाने वाले उम्दा पत्थर एवं उत्तम गुणवत्ता वाले गेहूँ के लिए प्रसिद्ध है, किंतु स्थानीय जन के बीच वहाँ के कुछ मंदिर प्रसिद्ध हैं जिनमें से एक राम मंदिर भी है। हालाँकि उस परिसर में शक्ति मंदिर भी है और गुरु गोरखनाथ के भव्य मंदिर निर्माण-कार्य चल रहा था। राम मंदिर तक की लघु यात्रा शिखा की स्कूटी से हुई थी। यहाँ से रोशनी के साथ यात्रा आगे बढ़ी। हमने स्टॉल से चेहरा और सिर ढँक रखा था। फिर भी गर्म हवा अपना प्रभाव जमाने में सफल रही। गंज बसौदा से उदयेश्वर नीलकंठ महादेव मंदिर के लिए कोई सवारी गाड़ी या निजी गाड़ी आती-जाती नहीं दिखी। न बस, न ऑटो। रास्ता भी कुछ दूर के बाद शांत ही था। आसपास घर भी न के बराबर। सड़कें कहीं-कहीं बिगड़ी हालत में मिलीं। दोनों ओर खेत में लहराती सुनहरी फसल पथिकों का मन मोह लेते हैं। मंदिर के निकट पहुँचने का संकेत उसके गोपुरम से मिल जाता है जो रास्ते से दिखता है। 

   लगभग चालीस मिनट बाद हमें दूर से मार्ग की दायीं दिशा में भील राजा का कोट (क़िला) दिखने लगा जिससे राजा भोज के वंशज वीरसेन ने आक्रमण करके जीता था और उस इलाक़े पर आधिपत्य स्थापित किया था। बाद में मंदिर के पुजारी श्री महेंद्र शर्मा ने आक्रमण से लेकर उदयपुर की स्थापना एवं मंदिर निर्माण से जुड़ी लंबी कथा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए बताया, अब भी उस क़िले के भीतर के कुछ अवशेष बचे हुए हैं जिन्हें देखा जा सकता है।

      मंदिर के प्रवेश द्वार से कुछ पूर्व दोनों ओर फूल-प्रसाद की दुकानें हैं, जहाँ भक्त अपनी पसंद और इच्छानुसार फूल-प्रसाद आदि लेते हैं। प्रवेश द्वार के पास ही जल की मशीन लगी हुई है, जहाँ से शिवलिंग पर चढ़ने के लिए भी जल भर लिया जाता है। जलते तलवों की चीख सुनते हुए हम जल्दी-जल्दी मुख्य मंदिर में प्रवेश हेतु चलने लगे किंतु दृष्टि रह-रहकर परिसर में आठों कोनों में बने वेदीमंडप एवं मुख्य मंदिर के गोपुरम की शिल्पकला में अटकती रही। प्रत्येक खंभे पर बारीक नक़्क़ाशी एवं देवी-देवताओं के अलग-अलग आकार की मूर्तियाँ तराशी हुई थीं, जो एक-दूसरे से जुड़कर गोपुरम का स्वरूप धारण कर रही थीं। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा ने बताया, “प्रत्येक खंभा अलग-अलग पत्थरों पर शिल्पकला उकेरने के बाद लोहे के तार से भीतर ही भीतर परस्पर इस प्रकार जोड़ा हुआ है कि खंभा एक पत्थर से बना होने का भ्रम होता है।” मंदिर का मुख्य द्वार लाल पत्थर की कई सीढ़ियों के ऊपर है, जहाँ मंदिर दो हिस्सों में प्रतीत होता है। खुले चबूतरे के बाद दोनों ओर के मोटे-मोटे खंभों पर नीचे से लेकर लगभग ढाई-तीन फीट तक शिलालेख हैं, वे पत्थर ही अन्य से कुछ अलग दिखते और दीवारों से मेल खाते हैं। उसके ऊपर बारीक शिल्पकला का अद्भुत नमूना, कहीं बड़ी मूर्तियाँ भी और उन मूर्तियों के किसी अंग में जाली-- उसी पत्थर से। 

    एक भी कोना खाली न दिखा जहाँ कुछ निर्मिति न हो। गर्भगृह के द्वार पर द्वारपाल बने हैं और इससे बाहरी द्वार पर यक्ष, गण आदि बने हुए हैं। एक स्थल पर विष्णु के मस्तक के स्थान पर बकरे का मस्तक, इसी प्रकार गणपति कई रूपों में दिखाई दे जाते हैं। उनकी छोटी-सी प्रतिमा में बनी सूँढ़ के भीतर गोलाई से छिद्र बना है, जिसमें धागा या पतली डोर घुस सके, इतनी जगह है। इसी प्रकार हाथी तथा अन्य कलाकृतियों में भी। चारों ओर कलाकृतियों से से घिरे खंभों और दीवारों के बीच नंदी अपना स्थान ग्रहण किए है। सीलिंग पर एक स्थान पर फूल की खिली पंखुरियों के भीतर की ओर उकेरी गई शिल्पकला को देखने के लिए मोबाइल के कैमरे को सेल्फ़ी मोड पर ले जाकर उस स्क्रीन पर देखना संभव होता है। यह तरीक़ा हमें पुजारी जी ने ही बताया। गर्भ गृह में उतरकर शिवलिंग के ऊपर चढ़े पीतल की खोल में बने भोलेनाथ की छवि भी कुछ अलग-सी है मानो पुरुष के अंतस की स्त्रैण प्रकृति का मूर्त रूप हो। प्रतिदिन उन्हीं का अभिषेक-सिंगार होता है। उस खोल के नीचे मूल शिवलिंग का एकाध इंच हिस्सा दिखाई पड़ता है। 

   पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा के कथनानुसार, शिवरात्रि के दिन प्रात:बेला में सूर्यकिरणें सीढ़ियाँ चढ़ती हुई शिवलिंग को स्पर्श कर, उसी दिशा में ऊपर दीवार तक जाती हैं। इसलिए उस खोल को केवल शिवरात्रि के दिन ही हटाया जाता है। उस दिन समस्त श्रद्धालु मूल शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं। खोल या आवरण पहनाने का कारण शिवलिंग के पत्थर को क्षय से बचाने का प्रयास मात्र है। दसवीं सदी से आज तक शिवलिंग ही नहीं, मंदिर का आंतरिक हिस्सा भी ज्यों का त्यों है। बाहरी हिस्से में गोपुरम की कुछ मूर्तियों के अंग भंग दिखाई देते हैं। इस मंदिर से जुड़ी कई विलक्षण बातों एवं कथाओं में से एक कथा यह भी है, जिसे सत्यकथा मानी जाती है। राजा भोज के वंश के राजा वीरसेन को स्वप्न में शिव मंदिर बनाने का आदेश मिला था। कथा लंबी है। जिसमें किसी कारण के तहत निश्चित समय मंदिर पूरा हो जाना था। प्रधान शिल्पकार ने एक ही रात में यह मंदिर खड़ा किया। शिल्पकारी के बाद वे पत्थर परिसर में ला-लाकर रखते थे। मंदिर जोड़ते-जोड़ते ऊपर गोपुरम तक वे गए। रात भर वे काम करते रहे, भोर होने तक वे उतर न पाए और सूर्य की किरणों के स्पर्श के साथ वे भी पत्थर के हो गए। आज भी मंदिर के शीर्ष पर पत्थर का एक आदमी उतरने की जुगत सोचता नज़र आता है। इस गोपुरम में बनी कुछ मूर्तियाँ शिल्पकार की अनूठी चिंतनदृष्टि का परिणाम कही जा सकती हैं। जैसे कि गणपति का स्त्री रूप, कहीं नर-नारी रूप में गणपति, कहीं अर्धांगेश्वर के रूप में महादेव एवं विष्णु एक साथ तो कहीं शक्ति अलग ही रूप में …. ऐसी कई विशेषताएँ जो अन्य गोपुर की कलाकृतियों से इसे भिन्न करती है। पर्यटकों द्वारा इसे स्वयं देख-समझ पाना तो कठिन होता होगा, पुजारी श्री महेन्द्र शर्मा जी ने स्वयं एक-एक विशिष्ट प्रतिमा दिखलाई और उसके निर्माण के पीछे शिल्पकार की दृष्टि पर संवाद किया। 

     मंदिर की विशिष्टता के साथ ही पुजारी जी के गुणों का उल्लेख किए बिना यह वृत्तांत पूरा न होगा। उनकी उदारता से पलकें भीगने का समय तब आया जब उन्होंने आग्रह करके एक कोने में रखी अपनी चप्पल पहन लेने को कहा ताकि धूप से मेरे पैर न जलें और स्वयं नंगे पाँव धूप में चलते हुए, परिसर का एक-एक कोना दिखाते और ख़ूबी बताते चले। 

     परिसर में ही फ़र्श पर पूरे मंदिर का नक़्शा बना हुआ है जो धुँधला गया है। मंदिर का कार्य निर्विघ्न पूरा हो, इसलिए आठों दिशाओं में वेद मंडप बनाए गए जिनमें नियमपूर्वक यज्ञ होता था। प्रमुख मंडप अन्य वेदी मंडप से बड़ा और मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने है। राजा उदयसेन के नाम पर यह प्रांत उदयपुर कहलाया। जहाँ से सूर्य किरणें भूमि से मंदिर के लिए उर्ध्वमुखी होती हैं, उस स्थान से गर्भगृह का शिवलिंग (तेज़ प्रकाश से अँधेरे में देखने के कारण) नहीं दिखा किंतु जलता दीया दिखा। शिवलिंग के ठीक पीछे शक्ति की प्रतिमा स्थापित है जो कुछ अलग सी है। शक्ति की प्रतिमा ढाई-तीन सौ वर्ष मात्र पुरानी है। 

     चलते-चलते पुजारी जी ने बताया कि जब से यह मंदिर बना है, यानी दसवीं सदी से अब तक एक वंश के ही पुजारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा का दायित्व निभा रहे हैं और आगे भी निभाते रहेंगे। सबसे अच्छी बात लगी कि यहाँ अन्य मंदिरों की तरह न तो पुजारियों ने कोई वीआईपी द्वार बनाया है, न वीआईपी पंक्ति और न ही वे भक्तों को मूर्ख बनाकर लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं। कहीं दान पेटी नहीं दिखी। कुछ लोग सुकून के लिए परिसर में बैठे दिखे। न कोई रोक-टोक, न ही किसी के द्वारा कोई अभद्रता। हमने कुछ तस्वीरें लीं। तीन बज चुके। फिर हमने उस पावन भूमि को प्रणाम किया और परिसर से बाहर निकल आए। स्थानीय जन ने बताया, पुजारी जी इस तरह किसी को समय नहीं देते। आपको तो उन्होंने अपने भोजन की बेला बीतने देकर एक-एक महत्त्वपूर्ण बात बताई। इसे शिव की कृपा ही कहा जा सकता है क्योंकि हमने देखा, लोग मंदिर घुसते-निकलते या कहीं बैठकर सुस्ताते रहे और फिर परिसर से बाहर हो गए। 

     एक बार फिर स्कूटी पर आनंद भरा सफ़र शुरू हुआ। अब हृदय इत्मीनान से की गई पूजा, मंदिर के कलात्मक सौंदर्य, उसके इतिहास, संबद्ध कथाओं तथा मंदिर के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने की बातों से पूर्ण आनंद में रहा। वापसी में भील राजा के कोट (दुर्ग) ने भी आने का आमंत्रण दिया। अब भी कुछ निशानियाँ बची हैं। आदिवासी राजाओं का हर जगह परास्त होते जाने और उनके सल्ला-गंगरा को सनातन धर्म में शिवलिंग माने जाने की सोच भी एक कोने में तारी रही। ठीक चार बजे हम होटल नीलकंठ के सामने थे, जहाँ मुझे ठहराया गया था और जहाँ से कुछ घंटों में विदा होकर दिल्ली की यात्रा शुरू होनी थी। 

   दिल्ली के व्यस्त और शोरभरी दिनचर्या में जब भी उस मंदिर की शांति भीतर उमड़ती है, चेतना नीलकंठ महादेव को निकट पाती है।  ■

सम्पर्कः डी 136, द्वितीय तल, गली नम्बर 5, गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली 110092

मो. 8376836119, ईमेल : dr.artismit@gmail.com


Sep 1, 2025

यात्रा वृत्तांतः ओह पहलगाम!

  - विनोद साव

सुबह ठण्ड बहुत ज्यादा थी हम देर तक यहाँ खड़े नहीं रह सके और जल्दी से फिर अपने होटल ‘रिविरा’ की ओर आते हैं। यह पहलगाम इलाके का गाँव मोवरा है। हम नदी किनारे दूर तक बसे सुन्दर- सुन्दर घरों को देखते हैं। यहाँ खड़े दुकानदार बताते हैं कि “ये जो छोटे छोटे बहुत से मकान आप देख रहे हैं ना साहब... वे सब भी होटल हैं। मकान दो कमरे का भी है, तब भी एक कमरे में मकान का मालिक है तो दूसरे कमरे में उसका पेइंग गेस्ट...बस गर्मियों के यही कुछ महीने तो हैं साहब, जब लोग पहाड़ों पर आ जाते हैं और हम लोग कुछ कमा लेते हैं।” तब समझ में आया कि कश्मीर में ‘टिप्स’ माँगने का चलन ज्यादा क्यों है? होटल, बाज़ार, टैक्सी में हर कहीं... और यह उनकी विवशता है। कितने भले और भोलेपन के साथ वे टिप्स माँग उठते हैं ये कहते हुए- “आखिर टिप्स तो बनती है साहब।” मिलने, नहीं मिलने पर भी उनके चेहरे से कृतज्ञता भरी मुस्कान जाती नहीं है...बनी रहती है।

पहलगाम यहाँ से अट्ठारह किलोमीटर है। पर लिद्दर नदी हमारा साथ नहीं छोड़ती। इसका रंग क्रिस्टल नीला है और यह घाटी की प्राकृतिक सुंदरता में और भी निखार लाता है। हम चोटियों- घाटियों में जहाँ भी जाते हैं, लिद्दर हमारी एक ओर चलती है। कभी हमारे साथ चढ़ते हुए, तो कभी उतरते हुए। कभी हमारी सड़क के नीचे से ओझल हो जाती है और फिर आगे बढ़कर मिल जाती है। छुप्पा - छुप्पी खेलती हुई फिर झेलम की आगोश में समा जाती है लिद्दर हूर की परी की तरह।

हमें पहलगाम से बेताब घाटी जाना है। हमारा ड्राइवर कहता है - “यहाँ से आपको दूसरी टैक्सी करनी पड़ेगी सर। यहाँ स्थानीय टैक्सी वालों का यूनियन है। उन्हीं की टैक्सियों में ही जाना पड़ता है। बाहर से आई टैक्सियों में नहीं। आप लोग घूमकर आ जाएँगे, तब फिर हम साथ हो जाएँगे।”

हम बेताब वैली के प्रवेशद्वार पर खड़े हैं। यहाँ फिल्म ‘बेताब’ बनी थी; इसलिए अब यह स्थान बेताब घाटी कहलाता है। हम दो सौ रुपये में दो टिकट लेते हैं। घोड़ी वाला हमारे पीछे पड़ता है। वह अल्बम में कई किस्म की फोटो दिखाता है और मोबाइल में वीडियो। इनमें पहाड़ों, झीलों, बाग बगीचों में नवजवानों के रूमानी दृश्य हैं। सुन्दर- सुन्दर चित्र हैं। वह कहता है “आपके भी ऐसे ही बढ़िया फोटो बन जाएँगे साब... घोड़ी सहित इस पूरे पैकेज का चलिए आप दोनों के लिए दो हजार लगा देंगे।”

हम पैंसठ सत्तर बरस की उम्र में खड़े पति-पत्नी हँस पड़ते हैं, ये कहते हुए “अरे बस करो भाई... अब घोड़ी चढ़ने की हमारी उमर नहीं रही।”

अब हम लकड़ी की दो धकेल गाड़ी में आ बैठे हैं घाटी घुमाने के लिए जिसे दो आदमी धकेल रहे हैं। बाहर से आए श्रमजीवी लोग हैं। कश्मीर के लोगों की तरह उन दोनों की भी दाढ़ियाँ हैं, जैसे मेरी हैं। मैं उन्हें कहता हूँ “अच्छे से घुमाना... मैं भी दाढ़ी वाला आदमी हूँ।” यह सुनकर वे अपनेपन से हँस उठते हैं। अब हमारे दोनों ओर बेताब घाटी की पहाड़ी सुन्दरता पसरी हुई है। दूर- दूर तक पहाड़ों की चोटियाँ और उस पर धूप में चमकती बर्फ जैसे चाँदी का हो वर्क। पहलगाम कश्मीर का प्रमुख रमणीय पर्यटन स्थल है। अमरनाथ की वार्षिक यात्रा का आधार कैंप है। धकेलने वाला भाई बताता है - “यह सामने जो चाँदी का वर्क मढ़े जैसी बर्फीली चोटी देख रहे हैं न... बस उसके नीचे अमरनाथ है। रास्ते में चन्दनवाड़ी है।”

हम यहाँ अपनी कुछ तस्वीरें उतरवाते हैं, श्रमजीवी भाइयों से। वे अच्छी तस्वीर लेते हैं और कुछ वीडियो भी। कुछ बालकों के पास खूबसूरत मेमने हैं बड़े बालों वाले जिन्हें रंगीन कर दिया है। वे पत्नी से आग्रह करते हैं - “मेम इस मेमने को अपनी गोद में रखकर तस्वीर उतरवा लें। उसके सौ रुपये लगेंगे।” चन्द्रा का मातृत्व उनकी आजीविका के प्रति जागा और वह एक कुर्सी में बैठकर मेमने को अपनी गोद में बिठाकर तस्वीर उतरवा ली, जिसे फेसबुक में पोस्ट करने से फिर धूम मच गई। मेम के साथ मेमना। शांति के दूत कबूतर का रेट फकत दस रुपये और नखरैल मेमना फोटो खिचाने का सौ रुपये लेती है।

यहाँ पहाड़ों में बकरी और भेड़ों के झुंड लेकर चरवाहे चलते देखे जा सकते हैं। शेक्सपियर के नाटक ’एज यू लाइक इट’ में जो विदूषक है, उसे एक चरवाहा व्यंग्य से कहता है कि ’सुनो! जिसे राजदरबार में शिष्टाचार माना जाता है, वैसा व्यवहार गाँव वालों के बीच हास्यास्पद माना जाता है।’ चरवाहा अंग्रेजी काव्य में ग्रीक काव्य की परंपरा की भाँति रोमांस का द्योतक है। उसका जीवन आनंदमय, चिंताहीन समझा जाता है। संभवतः यह बात दुनिया के सभी चरवाहों पर लागू होती है। ऐसा इन पहाड़ों के चरवाहों में भी दिखता है।

हम यहाँ से दूर जिस सड़क पर जा रहे थे, वह अत्यंत संकरी थी और इसलिए केवल सूडान यानी सबसे छोटी कार ही चल सकती थी। पाइन यानी देवदार के वृक्षों से लदे पहाड़ों की ऊँची- ऊँची चोटियों के करीब हम पहुँचते जा रहे थे। ये कुछ पहाड़ हैं, जिनकी तुलना स्विट्जरलैंड के आल्प्स पर्वत के आकार- प्रकार से की जाती है और इसलिए कश्मीर को स्विट्जरलैंड भी कह दिया जाता है; पर हिमालय का सौन्दर्य उसकी विराटता, अतुलनीय और बेमिसाल है। ड्राइवर कहता है - “हम आपको आरू वैली ले जा रहे हैं साब। यहाँ से अट्ठारह किलोमीटर है और इसका नज़ारा आते- जाते ही देख लीजिए। अंत में जाकर एक दरिया मिलेगा, वहाँ हम आपकी तस्वीर उतार लेंगे।” नदी को यहाँ दरिया कहते हैं।       

हम देख रहे थे इस दुर्गम मार्ग से उत्तुंग हिमालय को जिसके पहाड़ ऊँचे होते जा रहे थे और घाटियाँ नीचे और गहरी होती जा रही थीं। इन घाटियों और खाई- खंदकों जैसे इलाके में बनी संकरी सड़क पर कई ऐसे खतरनाक मोड़ आ रहे थे, जहाँ सड़क का किनारा एक इंच ही बच रहा होता और उसके बाद सैकड़ों फुट नीचे गहरी घाटी। पहाड़ों जैसी ऊँचाई देवदार पेड़ों की भी है। ऊँचे - ऊँचे दरख़्त जिसमें नोकदार पत्तियाँ होती थीं और जिसका सिरा होता था पहाड़ों की चोटियों की मानिंद। कश्मीर के सभी पेड़ नोकदार व धारदार होते हैं; ताकि बर्फ़बारी में बर्फ उन पर टिके नहीं और उनकी खूबसूरती व मस्ती बनी रहे। प्रकृति ने इन्हें वैसे ही जीवट और सुन्दर बनाया है, इनके रहवासियों की तरह। अंत में हमें यहाँ भी अमरनाथ से आती लिद्दर ही मिली थी अपने संकरे पाट; लेकिन तेज बहाव के साथ।

पहलगाम के छोटे और खूबसूरत पहाड़ी बाजार में दाना- पानी लिखा था, दाना- पानी रेस्त्रां में। यहाँ हमने कमल ककड़ी (ढेंस) जिसे हम मसालेदार खाते हैं उसे यहाँ मट्ठे के बघार में चावल के साथ खाया। 

हम भोजन कर बाजार के पीछे उस स्थान पर गए, जिसे बैसरन कहा जाता है। घोड़ी चढ़ने वालों ने हमसे संपर्क किया और बताया - “यहाँ से छह किलोमीटर दूर है साहब... आप दोनों का किराया साढ़े चार हज़ार लगेगा। अच्छे से घुमाकर ला देंगे।” अपने रीढ़ के दर्द से परेशान हमें घोड़ी चढ़ने से बचना था और हम पहले भी बचे थे। हमने मना कर दिया। यह 14 मई 2025 की बात है। इसके ठीक एक सप्ताह बाद 22 मई को जब हम कश्मीर यात्रा पूरी कर वापस अपने शहर दुर्ग पहुँच गए थे, तब इसी बैसरन में बड़ी अमानवीय घटना घट गई। यहाँ आतंकवादियों ने छब्बीस पुरुषों को उनके धर्म पूछकर बड़ी बेरहमी से उनके सबके सिर में बारी - बारी  से गोली मार दी और वे नवजवान अपनी पत्नी बच्चों के सामने रक्तरंजित होकर स्वर्ग सिधार गए...पर यह वह स्वर्ग नहीं है, जिसके लिए कश्मीर जाना जाता है। यह नरक से भी बदतर था। ये आतंकवादी केवल चार- पाँच लोग थे और सीमावर्ती जंगल से पैदल ही आए थे। यह आशंका हुई कि ये पाकिस्तान की सीमा से घुसे आतंकवादी हैं। ये पकड़े नहीं गए। फिर कुछ दिनों बाद भारत ने पाकिस्तान पर हमला कर दिया और उनके आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त किया। कश्मीर की वादियों में आतंक वादियों ने पहलगाम पर हमला किया; क्योंकि सबसे ज्यादा सैलानी यहीं आते हैं। आतंकवादी चाहते हैं कि कश्मीर आतंक के साये में ही जिए और उन पर इनका कब्ज़ा रहे। इसके प्राकृतिक स्रोतों पर अपना आधिपत्य जमाएँ और वे अपने हिसाब से यहाँ जंगल राज चला सकें, साम्प्रदायिक उन्माद फैला सकें। इसलिए इस बार आतंकवादियों ने सैलानियों पर सीधे हमला किया, ताकि वे आगे भी न आएँ।

ओह पहलगाम! अभी चार दिनों पहले तुम्हारी मुहब्बत भरी फिजा में हम डूबे हुए थे। भारत का स्वर्ग, वहाँ रहने वालों की खूबसूरती और सबका दिलकश अंदाज़, कश्मीरी, डोगरी और पश्तो की मिठास, अमन चैन और भाईचारा... इसमें कश्मीर के अवाम का क्या दोष था। दोष तो उन चन्द सिरफिरों का है, जो सैलानियों को मारकर वहाँ के रहवासियों के पेट पर प्रहार करते हैं। कायनात की सारी खुशी आजीविका के साधनों पर जिंदा रहती है दोस्तों... आजीविका छीन जाने से कुछ भी धरा नहीं रह जाता। कहाँ वो खूबसूरती का सबब और कहाँ ये खौफनाक मंजर...कहीं कोई मेल नहीं है।

कश्मीर हमारे देश का अकेला राज्य है जहाँ मुसलमान आबादी अधिक है। यहाँ लोग सुन्दर, सहयोगी, मधुर व्यवहार और आतिथ्य सत्कार से भरे हैं। सरकार का कहना है कि वर्ष 2024 में कश्मीर घाटी में ढाई करोड़ पर्यटक आए थे। देश की देशाटन प्रिय जनता ने साबित कर दिया कि उनकी पहली पसंद कश्मीर है; इसलिए इस आतंकवादी हमले के खिलाफ कश्मीर सहित हमारे देश भर के मुसलमानों ने और सबने साथ मिलकर भारत सरकार का समर्थन किया और अपनी एकजुटता का परिचय दिया; क्योंकि कश्मीर हमारा स्वर्ग है... और कश्मीरवासियों का जीवन भी स्वर्ग बने नरक नहीं। यह जिम्मेदारी भी हमारी बनती है। ■

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491 001, मो. 9009884014

Feb 1, 2025

यात्रा वृत्तांत: सत्य के मार्ग पर

विनोद साव

 जब हम किसी इलाके में पहली बार जा रहे होते हैं< तो बड़ी उत्सुकता होती है उसे देखने की जानने की। हम पीछे सरकते जा रहे दृश्य को गौर से देखते हैं। जो खेत सरपट भागे जा रहे हैं उनमें क्या बोया है। इन्हें बोने वाले लोग कौन हैं? उनके गाँव कैसे होते हैं। जब कोई नया स्टेशन आने वाला होता है< उसके शहर की बाहरी बसावट दिखने लगती है। फिर शहर दिखता है... और उसकी अपनी गन्ध। हर शहर की अपनी गन्ध होती है। उस नए स्टेशन में उतरने वाले लोग चले जाते होंगे अपने अपने गाँवों में जहाँ उनका घर होता है, उनकी बोई हुई फसलें होती हैं। उनके अपने खानपान और तीज-त्योहार, अपने उत्सव और रीति रिवाज होते हैं। उनके अपने उपासना- गृह और होती है इन सबसे बनी उनकी संस्कृति, जिनमें वे रचे बसे होते हैं। इनमें साफ सुथरे दिखते हुए लोग ज्यादातर श्वेतवस्त्र धारी हैं। 

यह सौराष्ट्र का वृहत्तर हिस्सा था जिसमें काठियावाड़ भी है। हमारे सामने एक वृद्ध मुसलमान दंपती लेटे हुए थे। उन्होंने हम लोगों को मुसकुराकर देखा फिर पैंट्रीकार से चाय आई, तब उन्होंने चाय पी। हमें आग्रह कर पिलाया, तो हमने भी पी ली। एक स्टेशन आ गया। एक गुजराती मित्र गन्देचा का फोन आ गया “कहाँ पहुँचे हो?”

मैं कहता हूँ - “जामनगर।”

वे कहते हैं – ‘‘भव्य ऐतिहासिक नगर है जामनगर। अपनी चमक धमक में दिन और रात में अलग अलग दिखता है। जिन्ना भी यहीं के थे कराची जाने से पहले।” इतिहास का एक पन्ना फड़फड़ाया। एक ऐसा चरित्र सामने खड़ा हुआ, कहा जाता है, जिनकी जिद में विभाजन हुआ था। जिन्ना ने एक हिन्दू स्त्री रतनबाई से ब्याह भी किया था; पर पाकिस्तान जिन्ना की जिद पर बना। गांधी कहते थे - “मैं अपने जीवन में दो लोगों को नहीं समझ सका- एक अपने बेटे हरिलाल को और दूसरा अपने काठियावाड़ी साथी मुहम्मद अली जिन्ना को।”

जामनगर स्टेशन राजकोट के बाद आया था। जामनगर में जिन्ना और राजकोट में गांधी रहे। राजकोट कभी सौराष्ट्र की राजधानी रहा था। मोहनदास के पिता करमचंद गांधी सौराष्ट्र के दीवान थे। मोहनदास पोरबन्दर में अपना बचपन बिताकर शालेय शिक्षा के लिए यहाँ आ गए थे। गांधी जी के घर में अब एक बालमंदिर खुल गया है। याद आया कि अपने शहर दुर्ग के बालमंदिर में हम जाते थे, उसका नाम कस्तूरबा गांधी बालमंदिर था। अब बाल मंदिरों को नर्सरी स्कूल कह दिया जाता है।

साबरमती नदी दिखी। अरसा पहले एक व्यापारी मित्र के साथ पहली बार गुजरात आया था तब अहमदाबाद में साबरमती आश्रम को देखा था। वहाँ अपेक्षाकृत युवा कस्तूरबा का एक सुन्दर चित्र दिखा था। उस समय की देखी हुई एक फिल्म ‘गांधी माय फादर’ की कस्तूरबा एकदम वैसी ही लगीं थीं। यह फिल्म महात्मा गांधी और उनके बेटे हरिलाल गांधी के बीच के अशांत संबंधों की पड़ताल करती है। यह हरिलाल के जीवन पर आधारित है। यह अचम्भा लगा कि फिल्म के निर्माता एक पेशेवर हीरो अनिल कपूर हैं और हरिलाल की भूमिका को अक्षय खन्ना ने जीवंत कर दिया था। फिल्म की शूटिंग दक्षिण-अफ्रीका, मुंबई और अहमदाबाद सहित कई भारतीय शहरों में की गई थी। गुजरात राज्य के संगठन के समय साबरमती नदी के किनारे एक नई राजधानी बनाई गई थी जिसका नाम रखा गया ‘गांधी नगर’।

हम दूसरी बार देश के पश्चिमी छोर में आ गए थे पर यह गुजरात का दक्षिण था जहाँ हमारी यह पहली यात्रा थी। पोरबंदर स्टेशन में उतरते ही सामने चित्र में ट्रेन पर चढ़े हुए बापू दिख गए। वे किसी ट्रेन के तीसरे दर्जे के दरवाजे पर खड़े थे। मैं भारतीय रेलवे की स्थानीयता को पकड़ने की उनकी चेतना का हमेशा कायल रहा हूँ। वाह वाह... भारतीय रेलवे।

प्लेटफार्म नंबर-एक के खम्भे पर एक रेखाचित्र टँगा है जिसमें गांधी जी का संदेश अंग्रेजी में है- First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you and then you win।” (पहले लोग तुम्हारी अवहेलना करेंगे, फिर वे तुम पर हँसेंगे, और जब तुमसे लड़ाई करेंगे तब जीत तुम्हारी होगी।” 

ट्रेन विलम्ब से आई थी। हमें विश्वास ही नहीं हुआ कि हम अपने गंतव्य तक पहुँच गए हैं। किसी ने कहा था “पोरबन्दर आ गया है।” उतरने पर कहीं स्टेशन का नाम भी नहीं दिखा। मैं और चन्द्रा उतर गए थे। एक सिपाही से पूछा ‘रिटायरिंग रूम?”

“आप काउंटर नम्बर-एक पर चले जाइए, वहाँ से चाबी ले आइए।” काउंटर वाले ने चाबी देते हुए बताया कि “आपने महीने भर पहले बुकिंग करवा ली थी; इसलिए कमरा मिल गया। पिछले पंद्रह दिनों से बुकिंग बंद है। पूरे स्टेशन का पुनर्निर्माण हो रहा है।” इसीलिए स्टेशन ध्वस्त होता सा दिखा। हमने इस ध्वस्त होते स्टेशन को अपने कैमरे में कैद कर लिया था। इसकी कैंटीन भी टूट चुकी है, पानी की बोतल और चाय भी यहाँ नसीब नहीं हो रही थी। दो दिन रहकर हमने गांधी जी के मोहल्ले में रहने का निर्णय ले लिया था; पर फ़िलहाल हम रेलवे के बसेरे में आ गए थे। यह एक वातानुकूलित रिटायरिंग रूम था। जिसका शयनकक्ष और नहानी दोनों बहुत बड़े थे और सर्वसुविधा युक्त थे। फकत पाँच सौ रुपयों में हासिल इस कमरे में विशाल डबलबेड, आलमारी, सोफासेट, ड्रेसिंग टेबल, आराम कुर्सी, गीजर, वॉशबेसिन और सब कुछ। जबकि बाहर होटल में इससे तीन गुना अधिक किराया था और कमरे व सुविधाएँ इसकी आधी भी नहीं थी। हम तीस घंटे की लम्बी रेलयात्रा की थकान उतारने यहाँ पसर गए थे। तीन घंटे बाद फिर रात आठ बजे तैयार होकर स्टेशन के कमरे से बाहर आ गए थे। स्टेशन के बाहर भी कहीं ढंग का नाश्ता नहीं दिखा। एक गुमठी वाले से पूछा “आपके पास क्या है।”

“फाफड़ा और गांठिया।” जवाब आया- “चालीस रुपये प्लेट’। उसने एक डिब्बे का ढक्कन खोला उसमें से बेसन का लोंदा निकाला और उसे बेल काटकर गरम तेल में डालने लगा। थोड़ी देर में गरमागरम फाफड़ा जिसे लम्बी हरी मिर्च और हरी चटनी-भुज्जी के साथ उसने पार्सल बना दिया। हम उसे लेकर ऑटो में बैठ गए।

सवेरे- सवेरे कप बसी में चाय पीने का चलन आज भी गुजरात में उसके घरों, होटलों, गुमठियों में है। हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा में प्लेट को ‘बसी’ कहते हैं। लेकिन यहाँ बसी यानी प्लेट को रकाबी कहते हैं। गुमठियों में सीधे प्लेट में भी चाय पिलाने का चलन है। ग्राहक ने प्लेट उठाई और चाय वाले ने केतली से उसमें चाय डाल दी और ग्राहक ने सुड़क- सुड़क कर पी ली।

ऑटो वाला भी हमारी तरह बुजुर्ग दिखा। पूछने पर अपना नाम बताया- “मालदेव गढ़वी।” फिर कहा कि “हमारे गढ़वी लोग गाना बजाना करते हैं भैया, अच्छे लोक-गायक होते हैं।” उसने कहा - “चलिए।।। हम आपको बढ़िया गुजराती थाली खिलाएँगे। पर उसके पहले सुदामा मंदिर देख लीजिए।’’

सुदामा मंदिर पोरबंदर के हलचल भरे बाजार क्षेत्र के बीच में है। कथानुसार राजा कृष्ण ने मित्र की सहायता की। उसके बाद सुदामा द्वारका के पास पोरबन्दर में बस गए होंगे या उनकी भी जन्मस्थली यहीं रही होगी; इसलिए इसे सुदामापुरी भी कहा जाता है। हमें प्रसाद रूप में उनका तांदुल (चूड़ा) प्राप्त हुआ; क्योंकि सुदामा ने अपनी गरीबी में कृष्ण को चूड़ा ही खिलाया था। यह संयोग है कि हम कृष्ण, सुदामा और गांधी जैसे सत्य और धर्मनिष्ठ महानायकों की धरती पर खड़े थे और यहाँ सुदामा- मोहन और मोहनदास की स्मृतियों के साथ चल रहे थे।

अहिन्दी भाषी अन्य राज्यों की तरह गुजरात भी कृष्ण भक्त है। वैष्णव जन तो तेने कहिए भजन के रचयिता पंद्रहवीं शती के संत कवि नरसी मेहता के जिन भजनों को गांधी जी गाया करते थे, वे गुजराती भाषा के आदि कवि कृष्ण भक्त थे। यहाँ कवियों-लेखकों ने अपने राजा कृष्ण द्वारका नरेश के प्रति अधिक आसक्त होकर लेखन किया है। गायकों नर्तकों ने रास डांडिया में इतनी धूम मचाई है कि पंजाब के भांगड़ा की तरह इस समूह- नृत्य को भी देश भर में ख्याति मिल गई है।

जब हम एक दिन सान्दिपनी विद्या-निकेतन जाने के लिए सुदामा चौक आए, तो गांधी के सत्य मार्ग पर तो एक ऑटो वाला दिखा, बोला "साहब वहाँ जाने के लिए आप मुझे दो सौ रुपये क्यों देते हैं उससे अच्छा है सिटी बस से निकल जाइए आप दोनों फकत बीस रुपये में" और हम चले गए थे, सुदामा बस अड्डे से दस किलोमीटर दूर पोरबन्दर एयरपोर्ट के पास सान्दिपनी विद्या निकेतन। यहाँ एक विशाल मंदिर है और सौ एकड़ में निर्मित एक शैक्षणिक संस्थान है जो आज की धार्मिक-राजनैतिक आकांक्षा में गुरुकुल शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यहाँ संस्कृत विद्यालय में केवल ब्राह्मण छात्रों का प्रवेश है। हमने उन्हें स्कूल के मैदान में धोती-कुरता पहने क्रिकेट और वॉलीबाल खेलते देखा। हमने एक धोतीधारी छात्र से पूछा- “संस्कृत स्कूल से पढने के बाद आप कहाँ जाएँगे?” तो उसने उत्तर दिया - “आर्मी में जाएँगे वहाँ ‘धर्मगुरु’ का पद है,  जिसमें नियुक्त हो जाएँगे।”

सान्दीपनी विद्या निकेतन के बगीचे में धातु निर्मित चार मूर्तियाँ जो देखने में एक समान दिखती हैं इनमें दो मूर्तियाँ सुदामा और उनकी पत्नी सुशीला की हैं और शेष दो मूर्ति गांधी और कस्तूरबा की हैं; लेकिन अब राजनीतिक भक्ति-भाव में सार्वजनिक स्थलों पर यहाँ  गांधी की जगह सुदामा की मूर्ति लगाने का चलन बढ़ सकता है। हो सकता है राजकीय पत्र में पोरबन्दर का नाम सुदामापुरी हो जाए। 

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ) 491001

Feb 3, 2024

चर्चाः यात्रावृत्तांत पर पहला विमर्श

विनोद साव, डॉ. साधना अग्रवाल,जीवन यदु,
छगनलाल सोनी, विनय शरण सिंह व माझी अनंत


 - विनोद साव

खैरागढ़ गोलबाजार के बाफना भवन में हम पहुँच गए थे। हमने सभागार का दरवाजा जैसे ही खोला, तो सामने मंच सजा हुआ था जिस पर प्रसिद्ध गीतकार जीवन यदु विराजमान थे। वे देखते ही खड़े होकर भाव-विह्वल हो बोल उठे कि “हमारे अगले सत्र के मुख्य अतिथि आ गए हैं व्यंग्यकार भाई विनोद साव।” खैरागढ़ जैसे कस्बे में भी एक चमक -धमक वाला एक निजी सुन्दर सभागार बन गया है। यहाँ छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने चार दिवसीय युवा रचना शिविर लगाया था। इस शिविर में छत्तीसगढ़ से आए महाविद्यालयीन विद्यार्थियों, शोधार्थियों से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक के रचनाकार शामिल हुए थे, जो भिन्न विधाओं के कलमकार थे। इसके पहले अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, धमतरी द्वारा संचालित ऐसा ही एक शिविर था जहाँ व्यंग्य पाठ के लिए आमंत्रित हुआ था। तब सम्मलेन के अध्यक्ष ललित सुरजन जी थे। अब उनकी आत्मीय यादें शेष हैं। अब ये जिम्मेदारियाँ वर्तमान अध्यक्ष रवि श्रीवास्तव और प्रबंध मंत्री राजेंद्र चांडक जी पूरी गंभीरता से निभा रहे हैं। राजेंद्र जी भारतीय सांस्कृतिक निधि रायपुर अध्याय के संयोजक भी हैं।

मुझे यहाँ दो सत्रों के लिए आमंत्रित किया गया था जिसमें एक व्यंग्य का सत्र था और दूसरा यात्रा- वृत्तान्त का। व्यंग्य से कम समय में मुझे यात्रा-वृत्तान्त के लेखक के रूप में मान्यता मिल गई है। ऐसा लगा कि इन दोनों सत्रों का आयोजन कहीं मेरी स्थापना के कारण तो संभव नहीं हो गया। मेरी जानकारी में यह पहला अवसर था, जब हिंदी साहित्य में कथेतर गद्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा ‘यात्रा-वृत्तान्त’ पर किसी संस्था द्वारा कोई विमर्श रखा गया हो... और इस संस्था द्वारा व्यंग्य पर एक सत्र का भी पहली बार कोई आयोजन रखा गया था। यह किसी भी साहित्यिक संस्था द्वारा परम्परागत आयोजनों से आगे बढ़कर साहित्य के नवोन्मेष को स्वीकारने की एक अच्छी पहल है। 

दोनों सत्रों के युवा रचनाकार बड़े उत्साहित थे, क्योंकि उन्हें भी इन सत्रों में भाग लेने के अवसर कभी मिले नहीं थे, इसलिए इस नवोन्मेष के प्रति उनकी जिज्ञासा भी बढ़ी थी। मेरा परिचय देकर मुझे प्रस्तुत करते समय जीवन यदु ने मुझे अपने यात्रा- वृत्तान्त के कुछ अंश पढने की हिदायत भी दे दी थी। सत्र की आरंभिक भूमिका इसकी संचालिका डॉ. साधना अग्रवाल ने बाँध दी थी। अंत में आभार प्रदर्शन प्रो. देवमाईत मिंज ने करते हुए बताया कि वे देव लकरा के नाम से मेरी फेसबुक फ्रेंड हैं और मेरे यात्रा- वृत्तान्तों को खूब पढ़ती हैं।

जिस तरह हमारे साहित्य संसार में कहानी की चर्चा प्रेमचंद के बिना और व्यंग्य की चर्चा परसाई के बिना पूरी नहीं होती, वैसे ही यात्रा वृत्तांत की चर्चा हो और बुद्धिष्ट यायावर राहुल सांकृत्यायन की चर्चा न हो यह संभव नहीं है। वे अक्सर यात्रा के महत्त्व को बताने के लिए 18 वीं सदी के दिल्ली के एक सूफ़ी शायर ख्वाजा मीर दर्द का ये शेर फ़रमाया करते थे जो आज भी लोगों की जुबान पर है:

“सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ

जिन्दगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ...

राहुल जी की यात्राएँ कोई भौगोलिक दूरियों को तय करने वाली यात्राएँ नहीं थीं। उन्होंने उस भूखंड के इतिहास को देखने के अलावा उसकी स्थानीयता से संवाद करना सिखाया था, जो इन यात्राओं की आत्मा होती है। ये बातें मैं खैरागढ़ में कह रहा था। तब बरबस ही मुझे यहाँ के रहवासी इंदिरा विश्वविद्यालय के प्रो.गोरेलाल चंदेल याद आ गए, जिन्होंने मेरे यात्रावृत्त ‘मेनलैंड का आदमी’ की समीक्षा करते हुए लिखा है कि “यात्रा -वृत्तांत लेखन की दृष्टि स्थान विशेष की भौगोलिकता के साथ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं को पकड़ने में कामयाब होती है और उस स्थान की धड़कन की एक एक गति को अपने संस्मरण का हिस्सा बनाने में यह दृष्टि सफल होती है। यात्रा- संस्मरण की भाषा नीरसता, उबाऊपन, एक पैनी दृष्टि, गहन निरीक्षण आत्मीयता का भाव और भारत को धर्म, जाति, भाषा परे से समग्रता में देखने की कोशिश होती है।”

ललित सुरजन, सतीश जायसवाल, उर्मिला शुक्ल यात्रा- वृत्तान्तों के अच्छे लेखक हैं। ललित जी का एक संग्रह है ‘शरणार्थी शिविर में विवाह गीत।’ वे लिखते हैं कि “एक दिन ग्रीस में कार्यरत फिलिस्तीनी श्रमिकों के संघ के प्रतिनिधि मुझसे मिलने आए। उन्होंने मुझे फिलिस्तीनी विवाह गीतों की एक सीडी भेंट की और आग्रह किया कि इसकी प्रतियाँ मैं भारत लौटकर अपने मित्रों को भेंट दूं और बताऊँ कि साठ साल से अधिक समय तक लगातार शरणार्थी जीवन जीते हुए, हर पल इजराइली हमलों की आशंका के बीच साँस लेते हुए, हजारों बेकसूरों की मौत के बाद भी किस तरह फिलिस्तीन की जनता ने अपनी जिजीविषा को बचा रखा है, कि मौत के साये में दिन गुजारते हुए वे अपने संगीत से, गीतों से ताकत पाते हैं।” मेरे संग्रह का ‘ब्लर्ब’ लिखते हुए ललित जी ने ‘Tourist और ‘traveler पर्यटक और सैलानी’ को अलग अलग नज़रिए से देखा है और मुझे सही अर्थों में ‘सैलानी’ माना है। यात्रा-संस्मरणों में इन दोनों शब्दों की बड़ी भूमिका है। टूरिस्ट जहाँ दूर खड़े होकर स्थान विशेष को देखता है वहीं सैलानी स्थानीय ज़िंदगी के साथ जुडकर सब कुछ देखता है। टूरिस्ट की नज़र स्थान विशेष पर, टूरिस्ट प्लेस की ओर होती है। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व के स्थानों पर प्रभावी दृष्टि टिकी होती है, जबकि सैलानी स्थानीय ज़िंदगी को, स्थानीय संस्कृति और खान-पान, पहनावे और वेशभूषा को, बाज़ार और हाट को, रिक्शा और ऑटो को, सबको देखता है ओर उसके भीतर ज़िंदगी की तलाश करता है। ज़िंदगी की धड़कन को सुनने का प्रयास करता है।”

डेढ़ घंटे के इस सत्र में उपस्थित युवाओं ने कई प्रश्न किए, जिनसे उनकी उत्साहजनक भागीदारी प्रमाणित हुई।

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001,  ई-मेल: vinod.sao1955@gmail.com, मो. 9009884014


Oct 1, 2023

यात्राः घुमक्कड़ी आखिर खुशहाल मिठाई का स्वाद ही तो है

 - साधना मदान 

यात्री, यात्रा, घूमना व घुम

क्कड़ी ये सब ऐसे ख्यालों या स्फूर्ति का एहसास है, जो हमें रोज़मर्रा से दूर प्रकृति और सौंदर्य के नज़दीक लेकर आता है। घूमना या फिर एक जगह से दूसरी जगह जाना, हमारे स्वभाव, स्वास्थ्य और अंतर्मन की चेतना को जैसे जीवंत कर देता है।

कहीं भी नई जगह जाना या यों कहें कि एक खोज, सौंदर्य और मनमस्त खुशी से साक्षात्कार करना जीवन की आवश्यकता है । नए अनुभव, नई वाणी और नए रीति-रिवाज का मेल है।

जब भी कबीर, नानक और राहुल सांकृत्यायन जी के साहित्य से मुखातिब होते हैं या मोहन राकेश (आखिरी चट्टान तक), महादेवी वर्मा जी के संस्मरण या सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति रास या फिर कुछ मनचलों और ज़िंदादिलों का लद्दाख की वादियों में दो पहिए पर सवार होकर बर्फ़ को छू लेने का जज़्बा ….ये सभी कुछ एक स्वस्थ और सदाबहार दुनिया की खुशहाल मिठाई का स्वाद ही तो है। सच में प्रकृति या यों कहें कि अपने देश के स्वरूप से मिलना बहुत ज़रूरी है।

देश का स्वरूप क्या है ? यह वास्तव में जान लें , तो सारा पर्यावरण हमारा हो जाएगा। मैं तो इस बात में अटूट विश्वास रखती हूँ कि अपने देश का भूगोल जाने बिना ‘पढ़ा-लिखा होना’ है ही नहीं । बालपन से ही सागर, नदियों, पहाड़ों, पेड़ों, फूलों को देखते हुए उनके नज़दीक चले  जाएँ, तो देश-प्रेम होते देर नहीं लगेगी। हम बचपन को क, ख, ग से लेकर अंग्रेज़ियत तक, सब कुछ ओढ़ा सकते हैं;  लेकिन विडंबना यह कि गंगा या पहाड़ों की हवा में श्वासोछ्वास होने की आदत से महफूज़ रखते हैं। 

चलिए, आज याद करते हैं रेलगाड़ी का वो सुहावना सफ़र,वो खिड़की के पास बैठना, बार-बार चंपक, चंदामामा और विक्रम- बैताल की पत्रिकाओं के लिए भाई -बहनों के संग नोक- झोंक  हो जाना। सभी कुछ जैसे आँखों की नाव में सवार हो जाता है। चलती गाड़ी में पेड़ों का संग संग दौड़ना,गाय, बैलगाड़ी, बकरियों के झुंड,बहती नदियाँ सभी कुछ घूमने-फिरने का एहसास ही तो था। जब भी कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम तय होता है, तो स्वयं में एक स्फ़ूर्ति तो आती ही है; पर साथ ही साथ ले जाने वाले सामान को सहेजना, आवश्यक चीजें याद रखना, समय, तिथि और व्यवस्था पर विचार करना सभी कुछ आपाधापी से दूर नयापन और खुशहाली से जोड़ता है। घर से दूर जब भी हम पहाड़ी या समुद्री यात्रा पर निकले, तो बहुत खूबी से हर लम्हे की जिया है हमने। तभी तो कहते हैं-

Journey is more beautiful than the destination.

पर एक सवाल मन को अकसर टटोलता है कि क्या यात्रा के भी अलग-अलग अंदाज़, प्रकार या फिर सलीका होता है ? जी हाँ होता तो है?

मस्त, बेफिक्र और सदाबहार यात्रा या फिर ऐश्वर्य, विलास या केवल आरामपरस्त यात्रा।

यात्रा सुख-समृद्धि से दूर प्रकृति मिलन की अनूठी चाह भी हो सकती है । घंटों पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए, पक्षियों की चहचहाहट फिर और आगे बढ़ते झरनों की ठंडक भरी बौछारें। इतना ही नहीं, पहाड़ों से गिरते पत्थरों में जानवरों की आवाज़ का गूँजना। बर्फीली हवाएँ या आधी बर्फ़ और आधे पानी वाली लहरों पर पैर रखने का अद्भुत संगम, कमाल की वादियों में दिल झूम -झूम गाने लगता है कि आज मैं आज़ाद हूँ , दुनिया के चमन में। ऐसी प्रकृति की गोद में न भूख, न प्यास और न ही कोई दुनियावी गंध । एक और यात्रा का भी बुलावा हमें रोज़मर्रा से दूर रूहानियत के आह्वान से सराबोर करता है। आप और मैं ऐसी तीर्थ यात्रा को सदा अपने अंतर्मन में सँजोए हुए हैं। यह यात्रा जब भी किसी अदृश्य की खोज का संकेत देती है या फिर साक्षात्कार की अद्वितीय छवि से मिलान कराती है, तो साधक और साधना की पवित्रता और आलोक से चित्तरंजन हो जाता है। यह यात्रा फिर इस लोक से उस लोक का मेल ही तो है।

यात्रा घुमक्कड़ी का भी नाम है। घूमते हुए न केवल नई जगह को देखना होता है, वहाँ की ज़िंदगी, खान-पान,बोली और पहनावा भी एक सुखद अनुभव होता है।


यात्रा के एक अनूठे रंग में आज हमारे युवा भी खूब रंगीन हो जाते हैं। नौकरी की खोज या नौकरी मिलने पर घर से बाहर बार- बार आना और जाना। यह यात्रा खुशहाली और आज़ादी तो देती है,  पर घर, अपनापन और स्वाद सभी कुछ फिर- फिर याद आता है। विदेश यात्रा पर आना और जाना भी स्वदेश प्रेम को स्पर्श  किए बिना रह नहीं पाता। रोमाँ चक यात्राएँ, समुद्री जहाजों की कहानियाँ हमें एक अलग लोक की सैर तो कराती ही हैं। यात्राएँ कभी मजबूरी तो कभी ज़रूरत के लिए भी की जाती हैं। अपनों से मिलने वाली यात्राएँ किसी उत्सव से कम नहीं होती हैं। तभी तो कहते हैं, यात्रा में साथी गंतव्य से भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पर हाँ,  यात्रा को दिखावे और महँगे रिज़ॉर्ट से दूर रखें, तो घूमने-फिरने की गरिमा सलामत रहेगी।

यात्रा सरस, स्वस्थ और स्फ़ूर्ति से भरपूर ज़िंदगानी का मधुर गीत है। बुद्ध की यात्राएँ करुणा और अहिंसा के गीत गाती हैं। यात्रा अंत से बेअंत तक जाने का भी मधुर संगीत है। निरंतर यात्री बने रहना जीवन की निरंतरता को दर्शाता है। कभी- कभी यह चंचल मन भी बिना किसी खर्च के यात्रा की लंबी दौड़ लगवाता रहता है। 

स्वस्थ चित्त, खुशहाल स्वभाव और सबके साथ खुशी बाँटने वाले अकसर लंबी यात्राओं पर निकल जाते हैं। सुस्ती, नीरसता और कंजूसी हमें यात्रा से दूर, प्रकृति से दूर और रुहानियत से अलग कर दिया करती है।

अतः मन के संग जिस्मानी यात्राओं का भी बहुत महत्व है इस छोटी सी ज़िंदगानी में।

दोस्तो! जब भी जहाँ भी मौका मिले घूमने-फिरने के सुहावने अवसर मत खोना।

Mar 1, 2023

यात्रा वृत्तान्तः स्मृतियों में बैंगलोर जैसे बाग- बगीचों के झुरमुट में झाँकना...

 - विनोद साव

अपनी स्मृतियों में बैंगलोर को खंगालना वैसे ही है जैसे बाग-बगीचों के झुरमुट में उसे झाँकना। हम यहाँ तीसरी बार आए थे, पहली बार 1982 में 18 दिनों की सम्पूर्ण दक्षिण भारत यात्रा में एक विशेष बस से आए थे। रात हमारे टूरिस्ट एजेंट ने हमें एक साफ-सुथरे गुरुद्वारे में रुकवा दिया था। गुरुद्वारा प्रबंधक ने कहा था कि “यहाँ दाढ़ी बनाना मना है।”

रात हम यहाँ सो गए थे। जब मॉर्निंग वॉक के लिए बाहर निकले तब हम इस अनूठे शहर को देखते रह गए थे जैसे हम किसी शहर में नहीं किसी सुन्दर उपवन में विचरण कर रहे हों। हर घर और उनकी दीवारें सुन्दर- सुन्दर फूलों, बेल-बूटों से ढकी हुई थी। उनके मकान मकानों की तरह नहीं किसी हरियाली से सजे आधुनिक रिसोर्ट या कॉटेज की तरह लगते। ऐसे लगता जैसे हम किसी शहर में नहीं किसी विशाल उद्यान में चले जा रहे हों जिसके मार्ग चौराहे सब फूलों-फ़व्वारों से भरे हुए हैं। तब जाना कि ऐसे ही नहीं इस शहर को ‘गार्डन सीटी’ कहा गया है। यहाँ वनस्पति उद्यानों का विशाल बगीचा ‘लालबाग’ है। बाहर ठेलों में इस बाग के फल फूल बिकते हैं। चालीस साल पहले तब एक रुपये बोतल में अंगूर के मीठे ताजे रस मिल गए थे। जब पीने बैठे तब कई बोतलें खाली हो गईं।

अपने शीतल सदाबहार मौसम और हर किस्म की सुविधाओं के कारण सेवानिवृति के बाद रहने बसने के लिए यह हमेशा उपयुक्त शहर रहा है इसलिए इसे पेंशनर्स पैराडाइज़ कहते हैं। यहाँ के बाजारों और शहरी इलाकों के मकान देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले कहीं अधिक सुन्दर और कलात्मक हैं। अब भले ही यह ऑटोमोबाइल प्रदूषण के कारण कम शीतल होता जा रहा है जैसे पुणे पहले हो चुका है। ट्रैफिक जाम एक बड़ी समस्या हो गई है। अब हम लोग व्हाइटफील्ड में रुकते हैं। इस इलाके का  नाम यूरोपीय और एंग्लो इंडियन एसोसिएशन के संस्थापक डी.एस. व्हाइट के नाम पर है। यह आई.टी.हब है और यहाँ रियल एस्टेट का बड़ा कारोबार है।

तब बैंगलोर के सिनेमाहॉल बड़े भव्य और खूबसूरत थे। बैंगलोर के इतिहासकार सुरेश मूना कहते हैं - ‘कभी यहाँ डेढ़-सौ सिनेमाहाल थे। हमने वहाँ के सबसे भव्य टाकीज ‘राज-राजेश्वरी’ को देखा था जहाँ एशिया का पहला 70- एम एम पर्दा लगा था। दिलीपकुमार-अमिताभ बच्चन दो दिग्गज अभिनेताओं के शक्ति प्रदर्शन से भरी फिल्म ‘शक्ति’ हमने देखी। हम फिल्म ‘कुली’ की बहुचर्चित अमिताभी दुर्घटना के बाद पहुँचे थे। बैंगलोर रेलवे स्टेशन में ‘कुली’ की शूटिंग हुई थी। जिसके बाद इंदिरा गाँधी भी उस घायल हीरो को देखने बैंगलोर के अस्पताल आ पहुँची थीं। तब हाथ जोड़ते हुए उन्होंने कागज में लिखकर इंदिराजी को दिया “आई कान्ट स्पीक” तब इंदिरा जी ने उनके माथे को अपने स्नेहसिक्त हाथों से छूते हुए कहा था “बट आई कैन स्पीक माय चाइल्ड।”

उस समय बैंगलोर का गाइड हमें घुमाते हुए बोल उठा था “लेडिज एंड जेंटलमैन.. बैंगलोर सिटी का पापुलेशन 35 लाख है, जैसे अमिताभ का एक फिल्म के लिए रेट 35 लाख है।”

हम घूमते हुए एक तीस मंजिली इमारत में पहुँच गए थे जिसके 29वें और 30वे माले पर अमज़द खान का “टॉप कॉपी’ रेस्तराँ था।

इस बार भी हम यशवंतपुर से पहले एलंका स्टेशन में उतरकर जब व्हाइटफील्ड जा रहे थे, तब रास्ते में एक मूर्तिकार कन्नड़ फिल्मों के दिवंगत सुपरस्टार डॉ. राजकुमार और उनके बेटे की मूर्ति बना रहे थे। उन्हें किसी सार्वजनिक स्थल में स्थापित करने के लिए। यहाँ फिल्मों के अभिनेता समाजसेवाओं से जुड़े रहे और इसलिए राजनीति में उन्होंने सफलता पाई।

बैंगलोर बम्बई की तरह का दूसरा शहर है। यहाँ एक बॉम्बे ग्रांट रोड भी है। इस शहर ने बम्बई (मुंबई) की तरह डिजिटल और सॉफ्टवेयर उद्योग, फैशन, सिनेमा और क्रिकेट में बड़ी रुचि ली और बैंगलोर को देश का ऐसा रोजगारपरक केंद्र बना दिया है कि इधर युवाओं की दौड़ देखते बनती है। नौजवान मानते हैं - “यह एक ऐसा शहर जहाँ मस्ती भरी छुट्टियों के लिए सारी सुविधाएँ मौजूद हैं। इसके प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ आधुनिक जीवन शैली का मिलन दुर्लभ है।” यद्यपि बैंगलोर की भीड़ को देखने से वह ग्लैमर दिखाई नहीं देता जो मुंबई-पुणे या दक्षिण के दूसरे बड़े शहरों में दिखाई देता है। आम कन्नड़  भद्रजन, सीधे सरल व बनाव-शृंगार से दूर दिखाई देते हैं लेकिन उनका शहर बैंगलोर तो पूरी तरह चकाचक और खूबसूरत है। उन्नति की दौड़ में कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद को पीछे छोड़ रहा है।

जब यह मैसूर राज्य था तब यहाँ के मुख्य सचिव वैज्ञानिक विश्वेश्वरैया थे उन्होंने इस शहर में ऐसी वैज्ञानिक चेतना भर दी कि हर नए विज्ञान और अन्वेषण की दृष्टि से यह नगर अपने विकास और उन्नति को तय कर रहा है। देश की अग्रणी सूचना प्रौद्योगिकी (IT) निर्यातक के रूप में अपनी भूमिका के कारण बैंगलोर को व्यापक रूप से भारत की सिलिकॉन-वैली या भारत की आई टी राजधानी के रूप में माना जाता है।

विश्वेश्वरैया ने वैज्ञानिक सिद्धांतों को लेकर एक म्यूजियम बनाया था  जिसे चार दशकों पहले जब देखा था इसमें चार खंड थे। प्रत्येक खंड में प्रदर्शित चीजों के सामने एक स्विच लगा था और उनका नाम एक पट्टिका पर अंकित किया गया था। स्विच दबाने पर मशीन का हर भाग काम करने लगता। इसके बिजली वाले खंड में एक गुड़िया थी। जो नाचती रहती थे और जब कोई उसे पकड़ने की कोशिश करता था वह गायब हो जाती थी। एक बेसिन में पानी का टैब लगा था जिसमें एक छेद से रोशनी पड़ती थी। रोशनी को हाथ से रोक देने पर पानी आने लगता था। बच्चों से लेकर बड़ों-बूढ़ों तक की रुचि की बहुत-सी चीजें यहाँ गिनीं नहीं जा सकती थीं, जिनके आकर्षण और काम अद्वितीय थे। सिनेमा, मशीन, टेलीफोन, टेलीग्राफ, कोयले की खानें, कागज बनाने के ढंग, दूरबीनें, माइक्रोस्कोप सब यहाँ प्रदर्शित थे। आज यह वैज्ञानिकता बैंगलोर में लोगों के जीवन में कदम कदम पर है और उद्योग-कारोबारों में एकदम हाइटेक है।

पिछले समय हम इसके एयरपोर्ट से रायपुर गए थे। इसका केम्पेगौड़ा हवाई अड्डा भारत का तीसरा सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है।  विजयनगर साम्राज्य के सामन्त केम्पेगौडा ने इस क्षेत्र में मिट्टी से बने क़िले का निर्माण कर बेंगलुरु शहर की नींव डाली थी। फिर हैदरअली और टीपू सुल्तान ने लकड़ी का महल बनवाया। टीपू के एक समर पैलेस को हमने चामराजपेट में देखा।

इस बार राजधानी एक्सप्रेस से नागपुर निकले तो बैंगलोर के के.एस.आर.रेलवे स्टेशन से हमने ट्रेन पकड़ी। KSR- क्रांतिवीर संगोल्ली रायन्ना एक बहादुर देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी थे जिनके नाम से रेलवे स्टेशन है। स्वाधीनता संग्राम के समय दुश्मनों ने उन्हें बरगद के पेड़ में लटकाकर मारा गया था।

बैंगलोर का शिक्षा और विज्ञान इनके धर्म आश्रमों को दिशा देता है। जहाँ इनके गुरु स्वामी महाराज कल्याणकारी सेवाओं में जुटे हुए हैं। उत्तर भारत के आश्रम गुरुओं की तरह नहीं जो अपनी करनी से जेल में जा बैठे हैं और आजीवन कारावास भुगत रहे हैं। यहाँ के ज्यादतर आश्रम स्कूल, अस्पताल की स्थापना के साथ कौशल कुटीर केन्द्रों में रोजगारपरक प्रशिक्षण दे रहे हैं। यह शहर केवल सूचना तकनीक ही निर्यात नहीं करता बल्कि भोजन खिलाने में भी टेक्नोलॉजी का सहारा ले रहा है।

हम इंदिरा नगर बैंगलोर के एक ऐसे रेस्तराँ में आ बैठे हैं जहाँ खाना रोबोट परोस रहे हैं। यहां पाँच रोबोट और तीन खिलौना ट्रेन है जिसमें ग्राहकों के आदेश के हिसाब से खाना परोसा जाता है। बैठक व्यवस्था के बीचोंबीच ट्रैक है जिसमें रोबोट चलते हैं। कभी कभी इसके पाँचों रोबोट एक के पीछे एक निकलते हैं। कभी कोई अपने ग्राहक को अकेला परोसने आ जाता है। यहाँ महिलाओं के साथ बच्चे बड़े उत्साह से आते हैं। वे खाना लेकर खड़े रोबोट के साथ अपनी सेल्फी लेते हैं। ये रोबोट महिलाओं की पोशाक में हैं। हमने थाई क्विजिन का आइटम ऑर्डर किया था जिसे लेकर आने वाली रोबोट का नाम ‘किटी’ था। रेस्तरां में बैठे हुए लोग उसे वैव करते हुए पुकार उठे थे ‘हाय किटी’।

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग, मो। 9009884014

Mar 5, 2021

यात्रा- दापोली में तीन दिन- नीला सागर ... काली घटाएँ, सफेद लहरें

-प्रिया आनंद

दापोली एक कोस्टल हिलस्टेशन है और इसी तरह कोंकण क्षेत्र भी महाराष्ट्र की सबसे सुंदर जगह है। इसे कैंप दापोली भी कहा जाता है। दरअसल ब्रिटिश शासनकाल में यहाँ हाई लेवल के ब्रिटिश ऑफिसर रहे थे। यहाँ के ग्रेवयार्ड में उनकी कब्रें आज भी मौजूद हैं। महाराष्ट्र के रत्नागिरी इलाके में यह एक छोटा सा शहर है।  हम पुणे से 6 घंटे की लंबी ड्राइव पर दापोली पहुँचे। लॉक डाउन खुलने के बाद यह हमारी पहली आउटिंग थी रास्ते में हरियाली से सजे पहाड़ ...ऊँचाई से गिरते झरने और सड़क के दोनों ओर कितने ही रंगों में मुस्कुराते जंगली फूल थे। थोड़ा और आगे बढ़ने पर पहाड़ों की ऊँचाई बढ़ गई। पश्चिमी घाट के ये पहाड़ कच्चे नहीं;  बल्कि बेहद मजबूत चट्टानों  के हैं। हम सुबह आठ बजे चले थे, दोपहर दो बजे तक ‘दि फर्न समाली रेजोर्ट’ पहुँचे। जंगल  में बना यह होटल लाल ईंटों से निर्मित है। और अपनी खूबसूरत वास्तु शैली के कारण जंगल के हरेपन में ही घुलमिल गया लगता है। हमारे वहाँ पहुँचते ही बारिश शुरू हो गई । बीच में थोड़ी देर के लिए रुकी  थी फिर लगातार जारी रही। ठंड थी इसलिए लंच लेने के बाद हम कहीं नहीं गए और रात को भी डिनर के बाद बिस्तरों में ही दुबक लिये। मेरी नींद अक्सर पाँच बजे खुल जाती है। बाहर जाकर बालकनी से देखा तो सारे पेड़-पहाड़ घनी धुंध में खो गए थे । बहुत दूर जलती हुई रोशनियाँ भी धुंध में बहुत धीमी चमक दे रही थीं। चारों ओर सिर्फ कोहरे का साम्राज्य था ... घना कोहरा और चिड़ियों की आवाजें। दस बजे तक धूप निकल आई ... बच्चे अब खुश थे वे बीच पर जाने की तैयारियों में व्यस्त हो गए। होटल से बीच थोड़ी दूर पर  ही था। 

दापोली अरबसागर के बेहद करीब है और यहाँ का समुद्रतट लगभग 50 किलोमीचर लंबा है। हालाँकि यहाँ सामान्य समुद्रतटों जैसी ही सारी विशेषताएँ हैं, पर यहाँ की रेत काली है। हम वहाँ पहुँचे तो तेज लहरों को देखकर चकित रह गए।  बीच से काफी दूर समुद्र में नावें आती -जाती दिख रही थीं। सफेद झाग लिये लहरें बहुत तेजी से आती थीं और  किनारे की काली रेत में आकर गुम हो जाती थीं। नारियल और सुपारी के पेड़ों से घिरा दापोली समुद्र तल से 800 फीट की ऊँचाई पर स्थित है । ब्रिटिश शासनकाल में यहाँ सैनिकों के शिविर होते थे। इसकी झलक आज भी यहाँ दिख जाती है।

दापोली, अंजारले, सारंग, मोपण, हरनाई, असद, खेरड़ी तथा मुरुड जैसे आस-पास के गाँवों के लिए प्रमुख शहर की भूमिका निभाता है। दापोली से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर दो किले हैं इनका नाम कनक दुर्ग और स्वर्ण दुर्ग है। रोचक ही है कि कनकदुर्ग जहाँ भूमि पर बना हुआ है  स्वर्णदुर्ग समुद्री किला है। कहते हैं पहले इन दोनों किलों को एक सुरंग जोड़ती थी पर अब यह बंद है और नावों के द्वारा ही स्वर्ण दुर्ग तक जाया जा सकता है। मूलतः इन किलों को आदिलशाही वंश ने बनवाया, परंतु 1660 में शिवाजी महाराज ने  इन पर कब्जा कर लिया। यहाँ दाभोल रोड पर कोटजाई और धाक्ति नदियों के संगम के निकट गहरी घाटी में प्राचीन गुफाएँ हैं जिनकी नक्काशी का संबंध तीसरी सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक का माना जाता है।

यहाँ के अंजारले गाँव की सुंदरता नारियल और सुपारी के पेड़ बढ़ाते हैं। यहाँ का बीच साफ सुथरा है और तट पर ढेरों सुंदर सीपियाँ और शंख  मिल जाते हैं। मुरुड बीच, कोंकण क्षेत्र के अत्यंत सुंदर और लंबे समुद्र तटों में से एक है। हरनाई, पोर्ट और बीच दोनों की भूमिका निभाता है। अंजारले गाँव का गणेश मंदिर बारहवीं सदी  में बना था  इसके अलावा भी  यहाँ कई दर्शनीय स्थान हैं।

कैसे जाएँ- यहाँ हवाई मार्ग,रेल मार्ग और सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। रत्नागिरी का डोमेस्टिक एयरपोर्ट दापोली से 127 किलोमीटर की दूरी पर है, खेड़ रेलवे स्टेशन यहाँ से 29 किलोमीटर की दूरी पर है। सड़क मार्ग से  दापोली मुंबई से 220 किलोमीटर और पुणे से 185 किलोमीटर की दूरी पर है।