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Nov 1, 2021

उदंती.com, नवम्बर 2021

वर्ष 14अंक- 3

शुभ दीपावली

आओ अंधकार मिटाने का हुनर सीखें हम
कि वजूद अपना बनाने का हुनर सीखें हम
रोशनी और बढ़ेऔर उजाला फैले
दीप से दीप जलाने का हुनर सीखें हम

 -शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

 इस अंक में

अनकहीः  अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....  - डॉ. रत्ना वर्मा

ललित निबंधः आलोक पर्व की ज्योतिर्मयी देवी लक्ष्मी - हजारी प्रसाद द्विवेदी

कविताः दीप से दीप जले - माखनलाल चतुर्वेदी

आलेखः दीया हमारा होते ही रोशन होगी जिंदगी उनकी - डॉ. महेश परिमल

व्यंग्यः लक्ष्मी नहीं आईआ गई महँगाई ! - गिरीश पंकज

कविताः 1. दीपक माला 2. दीपक मेरे मैं दीपों की - रामेश्वर  शुक्ल 'अंचल'

जीवन दर्शनः ईश्वर का हाथ : सदा रखें साथ  -विजय जोशी  

छत्तीसगढ़ की दीवालीः  लोक संस्कृति में ग्वालिन पूजा - उदंती फीचर्स

आलेखः बड़ा महत्त्वपूर्ण है शब्दों का चयन - डॉ. आशीष अग्रवाल

संस्मरणः टहनी सचमुच माँ को बुला लाई थी ! - निर्देश निधि

लघुकथाः फिर से तैयारी - डॉ. कविता भट्ट

बाल एकांकीः चक्रव्यूह - कमला निखुर्पा

बाल कविताः तितली रानी.. - प्रियंका गुप्ता

बाल कविताः सवेरासूरज की सवारी - डॉ. अर्पिता अग्रवाल

बाल कथाः कंजूस और सोना - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

लघुकथाः हिसाब बराबर - डॉ. आरती स्मित

कविताः अपनी दीवाली - डॉ. उपमा शर्मा

स्वास्थ्यः क्यों कुछ लोग बहुत कम बीमार पड़ते हैं  - हिन्दी ज़ेन

कविताः सब बुझे दीपक जला लूँ  - महादेवी वर्मा

प्रदूषणः हम भारत में नियमों का पालन क्यों नहीं करते ? स्रोत फीचर्स

कविताः 1. आज फिर से तुम... 2आत्मदीप - हरिवंशराय बच्चन

 


अनकहीः अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....


-डॉ. रत्ना वर्मा 

अवसर कोई भी हो,  पिछले दो वर्षों में इंसानियत की एक नई विचारधारा ने जन्म लिया है। जहाँ घर परिवार और रिश्तों की अहमियत को गंभीरता से लिया जा रहा है,  वहीं स्वार्थ से परे स्वस्थ सामाजिक संबंधों का भी महत्त्व भी बढ़ गया है।

पिछले दिनों समाचार पत्र में प्रकाशित एक तस्वीर ने सबका ध्यान आकर्षित किया, जिसमें एक पिता सड़क किनारे चादर बिछाकर अपने दो बच्चों को पढ़ाई करवा रहे हैं। जाहिर है यह दृश्य भावुक कर देने वाला था ।  बिलासपुर के 38 वर्षीय गणेश साहू अपनी 8 साल की बेटी गंगा और 6 साल के बेटे अरुण के पिता हैं। वे रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं। बच्चों की माँ का असमय देहांत हो गया था और पिता की परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेज सकें। अतः उन्हें जब भी समय मिलता, वे अपने बच्चों को पढ़ाते रहते हैं।

यह खबर जैसे ही छत्तीसगढ़ एक दैनिक समाचार पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक पहुँची , तो उन्होंने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए, न केवल दोनों बच्चों को स्कूल में भर्ती कराया, उनके लिए गणवेश और कॉपी- किताबों की व्यवस्था की;  बल्कि उनके रहने के लिए आवास का भी इंतजाम करवाया। अब उन दोनों बच्चों के पास छत है, पढ़ने के लिए स्कूल है तो जाहिर है पिता को काम करने का पूरा समय मिलेगा और उनका भविष्य सँवरेगा।

दीपोत्सव के इस अवसर पर उपर्युक्त खबर को यहाँ बताने का तात्पर्य यही है कि किसी परिवार में शिक्षा का प्रकाश फैले,  इससे बड़ा दीपोत्सव का त्योहार किसी का हो ही नहीं सकता। कितनी खुशी की बात है कि गंगा और वरुण की दीपावली शिक्षा से प्रकाशमान होगी और वे अपने घर की देहरी पर दीवाली का दीया जलाएँगे।

फिर भी कुछ ऐसे  सवाल हैं जो इस अवसर पर  सबके जेहन में उठना स्वाभाविक हैं। हम सब उजालों से भरपूर, उल्लास और उमंग के इस पर्व में अपने आस-पास छाए अंधकार को दूर भगाने की बात तो करते हैं,
पर क्या हमने यह जानने की कभी कोशिश की है कि मिट्टी के दीयों से रोशनी करते हुए हम कौन से अंधकार को दूर भगाना चाहते हैं
; क्योंकि मात्र एक या दो बच्चों के जीवन में उजाला लाने से बात नहीं बनेगी, देश में ऐसे अनगिनत बच्चे हैं जिनकी किस्मत गंगा और वरुण की तरह नहीं होती। न मीडिया की नजर उन सब पर पड़ती और न मुख्यमंत्री उन्हें देख पाते।

यह सही है कि सरकार की जिम्मेदारी प्रत्येक बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की है
लेकिन जनता का भी तो कुछ दायित्व बनता है जरूरत बस थोड़ा सजग रहने की है। दैनिक मजदूरी करने वाले ऐसे बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को घर के आस- पास गली- मोहल्ले में खेलने के लिए छोड़कर दिनभर के लिए जब बाहर निकल जाते हैं, तब ऐसे बच्चे या तो बाल मजदूरी करते हैं या अनपढ़ रहते हुए गलत राह में पकड़कर अपराधी बन जाते हैं। जरूरत इन्हें सही राह पर लाने की और इनके लिए बेहतर विकल्प तलाशने की। जागरूकता के अभाव में बहुत से माता- पिता कम उम्र में ही अपने बच्चों को काम पर लगा देते हैं, उन्हें लगता है कि उनके परिवार में एक और कमाने वाला हाथ हो जाएगा तो परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी वे उस भविष्य को देखने का नजरिया नहीं रखते कि यदि उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त करेंगे तो भविष्य और प्रकाशमान होगा।

घरों को रोशनी से सजाकर, नए कपड़े पहनकर, आतिशबाजी करके, विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर और धन की देवी लक्ष्मी की पूजा करने मात्र से ही क्या मन का अंधकार दूर हो जाता है?  पिछले दो साल से तो कोविड जैसी महामारी ने अँधेरे उजाले, गम और खुशी के मायने ही बदल दिए हैं। कोई भी पर्व- त्योहार हो या पारिवारिक उत्सव इन्हें मनाने के तरीकों के साथ-साथ सबके विचारों में भी परिवर्तन आ गया है। थोड़ा सा परिवर्तन और करना होगा – सजग रहकर ।

आपके आस-पास दिन रात कुछ न कुछ ऐसे काम होते रहते हैं, जहाँ हजारों मजदूर परिवार दिन- रात काम पर लगे रहते हैं। जिनका निवास अस्थायी होता है, ऐसे में वे बच्चों को भला शिक्षा कैसे दिला पाएँगे। बहुत सारी सामाजिक संस्थाएँ कई तरह के जागरूकता का काम कर रही हैं पर फिर भी देश में इतनी समस्याएँ हैं,  इतनी परेशानियाँ हैं कि जितने भी लोग सहयोग के लिए आगे आएँ कम ही पड़ेगा। तो । तो हर उस व्यक्ति को सहयोग के लिए आगे आना होगा जो थोड़ा सा भी किसी के जीवन में उजाला फैलाने की काबिलियत रखता हो। यदि आपके पास किसी बेकार को काम देने की हैसियत है तो इस दीवाली किसी एक को काम दे दीजिए, यदि आपके आप किसी एक बच्चे को शिक्षित करने की हैसियत हैं, तो किसी एक बच्चे को पढ़ाने की जिम्मेदारी ले लीजिए। कहने का तात्पर्य यही कि आप जो भी करेंगे,  किसी के जीवन में प्रकाश ही फैलाएँगे। इस बार आप भी ऐसा कुछ करके तो देखिए, आपकी दीवाली भी जगमग हो जाएगी।

अंधकार को दूर भगाकर प्रकाश फैलाने का संकल्प लेते हुए हम प्रतिवर्ष इंतजार करते हैं महापर्व दीपावली का। बिना अंधकार को महसूस किए प्रकाश के महत्त्व को नहीं समझा जा सकता। जीवन के प्रत्येक कोने में व्याप्त नकारात्मकता को सकारात्मकता के उजाले से दूर करना ही प्रकाशोत्सव है। तो आइये इस दीपावली मन के अँधेरे को दूर भगाकर अपने साथ- साथ दूसरों के जीवन में भी प्रकाश फैलाने का संकल्प लें। 

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। (गोपालदास ‘नीरज’)

ललित निबंधः आलोक पर्व की ज्योतिर्मयी देवी लक्ष्मी

-हजारी प्रसाद द्विवेदी

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार समस्त सृष्टि की मूलभूत आद्याशक्ति महालक्ष्मी है। वह सत्व, सज और तम तीनों गुणों का मूल समवाय है। वही आद्याशक्ति है। वह समस्त विश्व में व्याप्त होकर विराजमान है। वह लक्ष्य और अलक्ष्य, इन दो रूपों में रहती है। लक्ष्य रूप में यह चराचर जगत ही उसका स्वरूप है और-अलक्ष्य रूप में यह समस्त जगत् की सृष्टि का मूल कारण है। उसी से विभिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। दीपावली को इसी महालक्ष्मी का पूजन होता है। तामसिक रूप में वह क्षुधा, तृष्णा, निद्रा, कालरात्रि, महामारी के रूप में अभिव्यक्ति होती है, राजसिक रूप में वह जगत् का भरण-पोषण करने वाली ‘श्री’ के रूप में उन लोगों के घर में आती है, जिन्होंने पूर्व-जन्म में शुभ कर्म किए होते हैं, परन्तु यदि इस जन्म में उनकी वृत्ति पाप की ओर जाती है, तो वह भयंकर अलक्ष्मी बन जाती है। सात्त्विक रूप में वह महाविद्या, महावाणी भारती वाक् सरस्वती के रूप में अभिव्यक्त होती है। मूल आद्याशक्ति ही महालक्ष्मी है।

शास्त्रों में भी ऐसे वचन मिल जाते हैं, जिनमें महाकाली या महासरस्वती को ही आद्याशक्ति कहा गया है। जो लोग हिन्दू शास्त्रों की पद्धति से परिचित नहीं होते, वे साधारणतः इस प्रकार की बातों को देखकर कह उठते हैं कि यह ‘बहुदेववाद’ है। यूरोपियन पंडितों ने इसके लिए ‘पालिथीज़्म’ शब्द का प्रयोग किया है। पालिथीज़्म या बहुदेववाद से एक ऐसे धर्म का बोध होता है, जिसमें अनेक छोटे-देवताओं की मण्डली में विश्वास किया जाता है। इन देवताओं की मर्यादा और अधिकार निश्चित होते हैं। जो लोग हिन्दू शास्त्रों की थोड़ी भी गहराई में जाना आवश्यक समझते हैं, वे इस बात को कभी नहीं स्वीकार कर सकते। मैक्समूलर ने बहुत पहले बताया था कि वेदों में पाया जानेवाला ‘बहुदेववाद’ वस्तुतः बहुदेववाद है ही नहीं, क्योंकि न तो वह ग्रीक-रोमन बहुदेववाद के समान है, जिसमें बहुत-से देव-देवी एक महादेवता के अधीन होते हैं और न अफ्रीका आदि देशों की आदिम जातियों में पाए जानेवाले बहुदेववाद के समान है, जिसमें छोटे-मोटे अनेक देवता स्वतन्त्र होते हैं। मैक्समूलर ने इस विश्वास के लिए एक शब्द सुझाया था- हेनोथीज्म, जिसे हिन्दी में ‘एकैकदेववाद’ शब्द से कुछ-कुछ स्पष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार के धार्मिक विश्वास में अनेक देवता की उपासना होती अवश्य है, पर जिस देवता की उपासना चलती रहती है, उसे ही सारे देवताओं से श्रेष्ठ और सबका हेतुभूत माना जाता है। जैसे जब इन्द्र की उपासना का प्रसंग होगा, तो कहा जाएगा कि इन्द्र ही आदि देव हैं, वरुण, यम, सूर्य, चन्द्र, अग्नि सबका वह स्वामी है और सबका मूलभूत है। पर जब अग्नि की उपासना का प्रसंग होगा तो कहा जायेगा कि अग्नि ही मुख्य देवता है और इन्द्र, वरुण आदि का स्वामी है और सबका मूलभूत देवता है, इत्यादि।

परन्तु थोड़ी और गहराई में जाकर देखा जाये तो इसका स्पष्ट रूप अद्वैतवाद है। एक ही देवता है, जो विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। उपासना के समय उसके जिस विशिष्ट रूप का ध्यान किया जाता है, वही समस्त अन्य रूपों में मुख्य और आदिभूत माना जाता है। इसका रहस्य यह है कि साधक सदा मूल अद्वैत सत्ता के प्रति सजग रहता है। अपनी रुचि और संस्कारों और कभी-कभी प्रयोजन के अनुसार वह उपास्य के विशिष्ट रूप की उपासना अवश्य करता है, परन्तु शास्त्र उसे कभी भूलने नहीं देना चाहता कि रूप कोई हो, है वह मूल अद्वैत सत्ता की ही अभिव्यक्ति। इस प्रकार हिन्दू शास्त्रों की इस पद्धति का रहस्य यही है कि उपास्य वस्तुतः मूल अद्वैत सत्ता का ही रूप है। इसी बात को और भी स्पष्ट करके वैदिक ऋषि ने कहा था कि जो देवता अग्नि में है, जल में है, वायु में है, औषधियों में है, वनस्पतियों में है, उसी महादेव को मैं प्रणाम करता हूँ!

आज से कोई दो हज़ार वर्ष पहले से इस देश के धार्मिक साहित्य में और शिल्प और कला में यह विश्वास मुखर हो उठा है कि उपास्य, वस्तुतः देवता की शक्ति होती है। यह नहीं है कि यह विचार नया है, पहले था ही नहीं, पर उपलब्ध धार्मिक साहित्य और शिल्प और कला-सामग्री में यह बात इस समय से अधिक व्यापक रूप में और अत्यधिक मुखर भाव से प्रकट हुई दिखती है। इस विश्वास का सबसे बड़ा आवश्यक अंग यह है कि शक्ति और शक्तिमान् में कोई तात्विक भेद नहीं है, दोनों एक हैं।

चन्द्रमा और चन्द्रिका की भाँति वे अलग-अलग प्रतीत होकर भी तत्त्वतः एक हैं-अन्तर नैव जानी मश्चन्द्र-चन्द्रिकयोरिव। परन्तु उपास्य शक्ति ही है। जो लोग इस विश्वास को अपनी तर्कसम्मत सीमा तक खींचकर ले जाते हैं, वे शक्त कहलाते हैं। जो शक्ति और शक्तिमान् के एकत्व पर अधिक ज़ोर देते हैं, वे शाक्त नहीं कहलाते। मगर कहलाते हों या न कहलाते हों, शक्ति की उपास्यता पर विश्वास दोनों का है। जिन लोगों ने संसार की भरण-पोषण करनेवाली वैष्णवी शक्ति को मुख्य रूप से उपास्य माना है, उन्होंने उस आदिभूता शक्ति का नाम ‘महालक्ष्मी’ स्वीकार किया है। दीपावली के पुण्य-पर्व पर इसी आद्याशक्ति की पूजा होती है। देश के पूर्वी हिस्सों में इस दिन महाकाली की पूजा होती है। दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। केवल रुचि और संस्कार के अनुसार आद्याशक्ति के विशिष्ट रूपों पर बल दिया जाता है। पूजा आद्याशक्ति की ही होती है। मुझे यह ठीक-ठीक नहीं मालूम कि देश के किसी कोने में इस दिन महासरस्वती की पूजा होती है या नहीं। होती हो, तो कुछ अचरज की बात नहीं होगी। दीपावली का पर्व आद्याशक्ति के विभिन्न रूपों के स्मरण का दिन है।

यह सारा दृश्यमान जगत् ज्ञान,इच्छा और क्रिया के रूप में त्रिटुपीकृत है। ब्रह्म की मूल शक्ति में इन तीनों का सूक्ष्म रूप में अवस्थान होगा। त्रिपुटीकृत जगत की मूल कारणभूता इस शक्ति को ‘त्रिपुरा’ भी कहा जाता है। आरम्भ में जिसे महालक्ष्मी कहा गया है उससे यह अभिन्न है। ज्ञान रूप में अभिव्यक्त होने पर सत्त्वगुणप्रधान सरस्वती के रूप में

, इच्छा रूप में रजोगुण प्रधान लक्ष्मी के रुप में और क्रिया रुप में तमोगुण-प्रधान काली के रुप में उपास्य होती है। लक्ष्मी इच्छा रूप में अभिव्यक्त होती है। जो साधक लक्ष्मी रूप में आद्याशक्ति की उपासना करते हैं, उनके चित्त में इच्छा तत्त्व की प्रधानता होती है, पर बाकी दो तत्त्व-ज्ञान और क्रिया-भी उसमें सहायक होते हैं। इसीलिए लक्ष्मी की उपासना ‘ज्ञानपूर्वा क्रियापरा’ होती है, अर्थात् वह ज्ञान द्वारा चालित और क्रिया द्वारा अनुगमित इच्छा-शक्ति की उपासना होती है। ‘ज्ञानपूर्वा क्रियापरा’ का मतलब है कि यद्यपि इच्छा-शक्ति ही मुख्यतया उपास्य है, पर पहले ज्ञान की सहायता और बाद में क्रिया का समर्थन इसमें आवश्यक है। यदि उल्टा हो जाये, अर्थात् इच्छा शक्ति की उपासना क्रियापूर्वा और ज्ञानपरा हो जाए, तो उपासना का रूप बदल जाता है। पहली अवस्था में उपास्या लक्ष्मी समस्त जगत् के उपकार के लिए होती है। उस लक्ष्मी का वाहन गरुड़ होता है। गरुड़ शक्ति, वेग और सेवावृत्ति का प्रतीक है। दूसरी अवस्था में उसका वाहन उल्लू होता है। उल्लू स्वार्थ, अन्धकारप्रियता और विच्छिन्नता का प्रतीक है।

लक्ष्मी तभी उपास्य होकर भक्त को ठीक-ठीक कृतकृत्य करती है। तब उसके चित्त में सबके कल्याण की कामना रहती है। यदि केवल अपना स्वार्थ ही साधक के चित्त में प्रधान हो, तो वह उलूकवाहिनी शक्ति की ही कृपा पा सकता है। फिर तो वह तमोगुण का शिकार हो जाता है। उसकी उपासना लोकल्याण-मार्ग से विच्छिन्न होकर बन्ध्या हो जाती है। दीपावली प्रकाश का पर्व है। इस दिन जिस लक्ष्मी की पूजा होती है, वह गरुड़वाहिनी है-शक्ति, सेवा और गतिशीलता उसके मुख्य गुण हैं। प्रकाश और अन्धकार का नियत विरोध है। अमावस्या की रात को प्रयत्नपूर्वक लाख-लाख प्रदीपों को जलाकर हम लक्ष्मी के उलूकवाहिनी रूप की नहीं, गरुड़वाहिनी रूप की उपासना करते हैं। हम अन्धकार का, समाज से कटकर रहने का, स्वार्थपरता का प्रयत्नपूर्वक प्रत्याख्यान करते हैं और प्रकाश का, सामाजिकता का और सेवावृत्ति का आह्वान करते हैं। हमें भूलना न चाहिए कि यह उपासना ज्ञान द्वारा चालित और क्रिया द्वारा अनुगमित होकर ही सार्थक होती है...

माखनलाल चतुर्वेदी की कविता


 दीप से दीप जले

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें।

लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में
लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में
लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में
लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में
लक्ष्मी सर्जन हुआ
कमल के फूलों में
लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।

गिरि, वन, नद-सागर, भू-नर्तन तेरा नित्य विहार
सतत मानवी की अँगुलियों तेरा हो शृंगार
मानव की गति, मानव की धृति, मानव की कृति ढाल
सदा स्वेद-कण के मोती से चमके मेरा भाल
शकट चले जलयान चले
गतिमान गगन के गान
तू मिहनत से झर-झर पड़ती, गढ़ती नित्य विहान।।

उषा महावर तुझे लगाती, संध्या शोभा वारे
रानी रजनी पल-पल दीपक से आरती उतारे,
सिर बोकर, सिर ऊँचा कर-कर, सिर हथेलियों लेकर
गान और बलिदान किए मानव-अर्चना सँजोकर
भवन-भवन तेरा मंदिर है
स्वर है श्रम की वाणी
राज रही है कालरात्रि को उज्ज्वल कर कल्याणी।।

वह नवांत आ गए खेत से सूख गया है पानी
खेतों की बरसन कि गगन की बरसन किए पुरानी
सजा रहे हैं फुलझड़ियों से जादू करके खेल
आज हुआ श्रम-सीकर के घर हमसे उनसे मेल।
तू ही जगत की जय है,
तू है बुद्धिमयी वरदात्री
तू धात्री, तू भू-नव गात्री, सूझ-बूझ निर्मात्री।।

युग के दीप नए मानव, मानवी ढलें
सुलग-सुलग री जोत! दीप से दीप जलें

आलेखः दीया हमारा होते ही रोशन होगी जिंदगी उनकी


-डॉ. महेश परिमल

पिछले साल एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था, जिसमें दीया बेचने वाली एक महिला की दुर्दशा बताई गई है। उसके बनाए दीये नहीं बिक रहे हैं। एक बच्चा उससे दीये खरीदते हुए आश्वासन देता कि शाम तक पूरे दीये बिक जाएँगे। वह घर जाकर एक प्रिंट तैयार करता है। फिर साइकिल से अपने परिचितों के घर जाकर उसे बाँटता है। दीवारों पर लगाता है। उधर शाम तक उस महिला के सारे दीये बिक जाते हैं। शाम को बच्चा उसके पास पहुँचकर कहता है- मैंने कहा था ना कि शाम तक सारे दीये बिक जाएँगे। महिला उस बच्चे को धन्यवाद कहने के लिए लल्ला-लल्ला कहते हुए उसके पीछे भागती है;  लेकिन बच्चा काफी दूर निकल जाता है। रास्ते में महिला को एक पोस्टर मिलता है, जिस पर उसकी तस्वीर होती है, जिस पर लिखा होता है- अम्मा की दीवाली हैप्पी बनाओ, जाके उनसे दीया ले आओ। यह देखकर महिला रूआँसी हो जाती है। वह दिल से उस बच्चे का धन्यवाद करती है। विज्ञापन का आखिरी हिस्सा भावुक कर देता है।

उस दिन कॉलोनी के मेन गेट पर कुछ देर तक खड़े रहा, इस दौरान मैंने पाया कि आजकल कई घरों में ऑनलाइन सामान काफी मात्रा में आ रहा है। लोग घरों से बाहर नहीं निकलना चाहते। इसलिए अमेजान-फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन चीजें मंगा रहे हैं। यानी ई कामर्स की खरीदी जोर-शोर से हो रही है। क्या हमने सोचा कि यदि हम इन कंपनियों से सामान नहीं खरीदेंगे, तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, किंतु यदि हम साधारण दुकानदारों से सामान नहीं खरीदेंगे, तो उन्हें बहुत फर्क पड़ेगा। इधर विदेशी कंपनियाँ मालदार हो जाएँगी, उधर छोटे दुकानदारों की दीवाली नहीं मन पाएगी। हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि कोरोना काल में सभी मध्यम दर्जे के व्यापारियों को मंदी का सामना करना पड़ा है। उनके लिए यह दीवाली दु:ख के गहरे बादल लेकर आई है। कोरोना काल की यह विशेषता यह रही कि इसने अमीरों को और अमीर और गरीबों को और गरीब बनाया है। सरकार ने सहायता की, माफी की योजनाएँ भी बनीं। इसके बाद भी निम्न मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग को किसी तरह का लाभ नहीं मिला।

जिन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिली, उनकी दीवाली हम लोग जगमग कर सकते हैं। हमें उनकी सहायता सीधे नहीं करनी है, बल्कि उनके उत्पादों को खरीदकर हम उन्हें मदद कर सकते हैं। सीधी मदद का दुरुपयोग अधिक होता है। इसलिए इनके उत्पादों को खरीदकर हम उन्हें प्रोत्साहन दे सकते हैं। यदि हम गाँव की बनी हुई चीजें लेते हैं, तो हालात बदलने में देर नहीं लगेगी। एक तरफ सरकार घोषणा कर रही है कि उनकी आय दोगुनी कर दी जाएगी;  पर यह केवल घोषणा बनकर ही रह जाती है। सरकार किसानों को जो लाभ दिलाती है, उसका फायदा केवल बड़े किसानों को ही मिल पाता है। छोटे किसान हमेशा ठगे जाते हैं। बेरोजगारों के लिए मजदूरी बढ़ाने की घोषणा पर अमल नहीं हो पाता। दूसरी तरफ बेरोजगारी बढ़ती ही रहती है।

इस दिशा में लोगों को दो पहलुओं पर काम करना होगा। पहला तो यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रुपये पहुँचाने होंगे। दूसरा है, छोटे दुकानदारों से माल खरीदना। शहर के लोग आर्थिक रूप से इसलिए सम्पन्न होते हैं, क्योंकि वे लोग अब ऑनलाइन खरीदी करने लगे हैं। इस बार दीवाली और क्रिसमस पर शहरी लोग ई कॉमर्स साइट से 70 हजार करोड़ का माल खरीदेंगे। जो कुछ वे खरीदेंगे, वे सभी चीजें शहर के छोटे व्यापारियों के पास उपलब्ध हैं। यदि ऑनलाइन खरीदी में 50 प्रतिशत की भी कमी हो जाए, तो छोटे व्यापारियों के पास से 35 हजार करोड़ रुपए आ जाएँगे। हमारा छोटा-सा योगदान लघु व्यापारियों को बड़ी राहत दे जाएगा।

छोटा दुकानदार हमारे घर के आसपास ही रहता है। हमारा उनका संबंध भले ही केवल सामान की खरीद-फरोख्त का हो, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ भी हो, आखिर वह है हमारा अपना है। जिसे हम जानते-पहचानते हैं। अमेजान-फ्लिपकार्ट को तो हममें से किसी ने नहीं देखा। फिर वह हमारा अपना कैसे हो गया। व्यापारी से हमारे सीधे संबंध हैं। पर उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों से वायवीय संबंध हैं। आप ही बताएँ आप किस तरह के संबंधों को प्राथमिकता देंगे? यह सच है कि छोटे व्यापारी की आर्थिक स्थिति सुधारने का हमने कोई ठेका तो नहीं ले रखा है, पर बड़ी कंपनियों को राहत देने का भी हमने तो ठेका नहीं ले रखा है। इंसानियत यही कहती है कि पहले उसकी मदद करो, जो करीब है। हमारी खरीददारी से हमारी ही नहीं, बल्कि उसकी दीवाली भी सुधर जाएगी।

अब एक छोटे-से उदाहरण से अपनी बात समझाने की कोशिश करता हूँ। हमने बाजार से कुछ दीये खरीदे, इससे क्या दीये बेचने वाले का ही लाभ हुआ। नहीं, पहले तो उस कुम्हार को लाभ मिला, जिसने दीया बनाया, उससे उसके परिवार को आर्थिक लाभ हुआ। दूसरा लाभ तेल वाले को मिला; क्योंकि बिना तेल के दीया तो जलाया ही नहीं जा सकता। फिर बाती के बिना दीया कैसे जलेगा, तो कपास उगाने वाले किसान को भी तो लाभ हुआ ना? फिर कपास का बीज बेचने वाले व्यापारी को भी इसका लाभ मिला। कपास तोड़ने वाले श्रमिकों को भी रोजगार मिला। कपास को गाँव से शहर ले जाने वाले वाहन चालक को भी लाभ हुआ। उसका परिवार भी उस लाभ का अधिकारी बना। सोचो, एक दीया कितनों को रोजगार ही नहीं, चेहरे पर खुशियाँ फैला रहा है? यही है सच्चाई।

छोटे व्यापारियों की कमर कोरोना ने तोड़ दी है। कमर तो मध्यम वर्ग की भी टूटी है। पर यही मध्यम वर्ग ही मध्यम वर्ग का सहारा बनेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। हम बच पाए, तो छोटे व्यापारी बच जाएँगे। हम ही उन्हें बचा सकते हैं। क्या हुआ, यदि वह कुछ अधिक मुनाफा कमाता है। हम यही सोचेंगे कि देश का पैसा देश में ही है। पर विदेशी कंपनी को दिया हुआ हमारा पैसा विदेश ही जाएगा। स्वदेश में तो नहीं रहने वाला। छोटे व्यापारियों को कोई उधार भी नहीं देता। हम उनसे सामान खरीदकर उन पर कोई एहसान नहीं करेंगे। इसलिए इंसानियत के नाते यही कहना है कि छोटे व्यापारियों से सामान खरीदकर हमें देश को आगे बढ़ाने की दिशा में एक छोटा-सा प्रयास करना है। आप ऐसा करेंगे ना?

सम्पर्कः टी 3- 204, सागर लेक व्यू, वृन्दावन नगर, भोपाल- 462022, मो. 09977276257