मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'. Show all posts
Showing posts with label रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'. Show all posts

Mar 1, 2026

किताबेंः ज़िन्दगी के लिए विटामिन- विटामिन ज़िन्दगी

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

विटामिन ज़िन्दगी: ललित कुमार, पृष्ठ: 264, मूल्य:249 रुपये, आईएसबीएन: 978-93-92820-47-2, द्वितीय संस्करण: 2022, प्रकाशक: हिन्द युग्म, C-31, सेक्टर-20, नोएडा, उत्तर प्रदेश – 201301

एक छोटी- सी ठोकर खाना, एक बार फिसलना, गिरना, फिर इस तरह- से टूट जाना कि गहरे अवसाद से घिरते चले जाना, उसी अवसाद से घिरी ज़िन्दगी के लिए विटामिन है- विटामिन ज़िन्दगी, जिसका अक्षर- अक्षर हमें अदम्य साहस से भरता है, जिसे पढ़कर मन करता है कि अपनी आशाओं का आसमान अब दूर नहीं, अभी उठेंगे और उचककर उसे छू लेंगे।

एक शिशु, जिसका स्वयं प्रकृति माँ ने एक दुर्गम पथ पर चलने के लिए चुनाव किया और प्रकृति माँ का दुलारा वह शिशु; जो अपने नन्हे कदमों से कष्ट में भी किलकते हुए न सिर्फ उस कंटक पथ पर बिना रुके, बगैर थके चला, बल्कि जिसने उस दुर्गम पथ में मील का पत्थर बनकर पथिकों का दिशा- निर्देशन किया- कविताकोश, गद्यकोश, WeCapable.com, दशमलव यू ट्यूब चैनल के संस्थापक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता रोल मॉडल ललित कुमार जी की ‘विटामिन ज़िन्दगी’ पुस्तक में उनका संघर्ष और उत्कर्ष उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो बहुत जल्दी परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देते हैं।

पोलियो जैसी चुनौती के साथ जहाँ एक कदम भी चलना मुश्किल था, ललित जी का सफर और बच्चों की तरह आरम्भिक स्कूली ज्ञान से बढ़ता हुआ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय में स्नातक डिग्री, संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहभागिता, संयुक्त राष्ट्र संघ के आधिकारिक मिशन पर चीन के दौरे, मॉरीशस भ्रमण, स्कॉटलैंड सरकार से मिली स्कॉलरशिप पर स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग की हेरियट- वाट यूनिवर्सिटी से MSc in Bioinformatics with Distinctions, यूरोपीय संघ के साथ मिलकर काम, कनाडा की लवाल यूनिवर्सिटी से पूर्ण स्कॉलरशिप पर पीएचडी में दाखिले तक का सफर है जो दूसरों के लिए अनुकरणीय है। वे जीवन में कहीं भी ठहरे नहीं।

छोटी- सी बात पर घबराकर ईश्वर को उलाहना देने वालों के लिए ये पंक्तियाँ सीख हैं- “प्रकृति माँ का उपहार, वह काँटा, अब मेरे भीतर पूरा धँस चुका था। मैंने प्रकृति माँ से नहीं पूछा कि आपने मुझे ही क्यों चुना। पोलियो वायरस के जिन कणों ने मेरे शरीर को तहस- नहस कर दिया था, वे कण मुझ पर हमला न करते, तो हो सकता है कि किसी और को अपना निशाना बनाते। प्रकृति माँ ने उन कणों को मेरे शरीर में कैद करके शायद किसी और की रक्षा की हो! प्रकृति माँ से क्या पूछना... उनका आदेश सिर- आँखों पर!” (पृष्ठ 27)

परहित की भावना से ललित जी हमेशा आगे बढ़ते रहे और समाज के पूर्वाग्रह से लड़कर, सामाजिक असंवेदनशीलता के सामने डटकर उन्होंने स्वयं को सिद्ध किया कि वे किसी से कमतर कतई नहीं हैं।

पुस्तक तीन भागों में विभाजित है: 1- गिरना 2- सँभलना 3- उड़ान। पुस्तक को पढ़ते हुए विकलांगता के प्रति समाज की संकीर्ण सोच हमें विचलित करती है कि आख़िरकार हम कैसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ समानता व बंधुत्व के नारे तो हर गली- चौराहे पर गूँजते हैं; परंतु उनकी व्यवहार रूप में परिणति कहीं नहीं! व्यक्ति समाज की इकाई है, उसी से मिलकर समाज का निर्माण हुआ है, तो क्यों समाज किसी को असामान्य का दर्जा देकर उसे अलग- थलग कर आगे निकलने की होड़ में रहता है जबकि दिखावा यह करता है कि हम सब एक हैं! यह कैसा तंत्र है, कैसी व्यवस्था है; जिसमें किसी के भीतर आगे बढ़ने की ललक होते हुए भी बढ़ावा देने के बजाय पग- पग पर उसे पीछे धकेलने की प्रवृत्ति है?

समाज का यह रवैया, जो जीने की भरपूर चाह रखने वाले को लाचारी का बोध कराकर उसे यह कहकर दरकिनार कर देता है कि तुम तो कुछ करने योग्य नहीं, हमें शर्मिन्दगी का अहसास कराता है। ललित जी का चीन की दीवार पर चढ़ना जीता- जागता दृष्टांत है कि उनके लिए सफलता का कोई शिखर उनसे बड़ा नहीं, और समाज का यह सोचकर उन्हें रोकना कि उन्हें पोलियो है तो वे अयोग्य हैं, समाज की अतिगम्भीर मानसिक विकलांगता का लक्षण है, जो उनकी प्रतिभा के आकलन में अक्षम रहा।

शिक्षक, एक शिल्पकार सरीखा बालक के व्यक्तित्व को सुंदर आकार दे, उसके भविष्य की नींव रखे, उसे नैतिक शिक्षा दे, मानव- मूल्य सिखाए, सुसंस्कार दे, जॉन एडम्स ने भी कहा- “शिक्षक मनुष्य का निर्माता है।”, पुस्तक में उल्लिखित प्रसंग शिक्षक के कार्य- व्यवहार पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं कि शिक्षक ही बालक के बाल- मन में यदि हीन भावना भरें तो ऐसी स्थिति में अन्य छात्र क्या करें?

प्रत्येक व्यक्ति इस धरती पर एक विशिष्ट उद्देश्य को लेकर आया है, इस विश्वास से उन्होंने जीवन का उद्देश्य जाना, समझा ही नहीं, अपनी दृढ़ इच्छा- शक्ति से उसे पूर्ण करने वाले ललित जी हमारे समाज और देश के लिए एक आदर्श हैं। दुर्भाग्यवश अधिकतर लोग आजीवन अपने जीवन के उद्देश्य से ही अनभिज्ञ रहते हैं।

जीवन जटिलताओं का जाल है। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हमें विटामिन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार हमारे मन को भी पूर्णतया स्वस्थ रखने के लिए आस्था, आत्मबल, इच्छा- शक्ति, दृढ़ संकल्प, धैर्य, उत्साह, प्रोत्साहन आदि विटामिन अनिवार्य हैं और ये सब विटामिन प्रचुर मात्रा में हमें 'विटामिन ज़िन्दगी' में मिलते हैं, जिसकी पहली ही खुराक हमें अवरोध, अशांति, अन्याय, अलगाव, असमानता, अमानवीयता जैसे जानलेवा वायरस से लड़कर जीत दिलाने में पूरी तरह सक्षम है। शीर्षक 'विटामिन ज़िन्दगी' पराजय के लिए वरदान है, जिसका आवरण अपने आप में विजय का बखान है। अन्त में वे काव्य-पंक्तियाँ, जो हताश-निराश होने वाले व्यक्तियों के लिए सबसे बड़ा विटामिन हैं-

बैसाखियों से बड़ी ज़िन्दगी!

बैसाखियों से लड़ी ज़िन्दगी

बैसाखियों पे खड़ी ज़िन्दगी

बैसाखियों से बनी ज़िन्दगी

बैसाखियों पे चली ज़िन्दगी

बैसाखियों से बँधी ज़िन्दगी

बैसाखियों पे सधी ज़िन्दगी

-- ललित कुमार -

ललित कुमार जी को 'विटामिन ज़िन्दगी' के सकारात्मक सृजन हेतु हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभेच्छाएँ।


Aug 1, 2025

किताबेंः अक्षरलीला- लघु छंद में विराट अनुभूति

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

अक्षरलीला (हाइकु-संग्रह): रमेश कुमार सोनी, पृष्ठ: 112, मूल्य: 340 रुपये, ISBN: 978-93-6423-264-7, प्रथम संस्करण: 2025, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली— 110059

 रमेश कुमार सोनी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ी व हिंदी में लेखन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। रोली अक्षत (2004) तथा पेड़ बुलाते मेघ (2018) के बाद उनका तीसरा हाइकु- संग्रह अक्षरलीला मेरे हाथ में है।
 रमेश कुमार सोनी हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में हाइकु, ताँका, सेदोका छंद को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी रहे हैं। हिंदी हाइकु को पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकालकर उसे छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति से जोड़ने वाले वे पहले रचनाकार हैं। गुरतुर मया उनका छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह है। उनकी कविताएँ जीवन, प्रकृति, समाज, पर्यावरण जैसे मुद्दों पर संवेदना व्यक्त करती हैं।
रमेश कुमार सोनी की रचनाओं में लघु छंदों के माध्यम से प्रकृति और समाज के साथ ही पारंपरिक और लोकभाषा संगम की अनूठी भूमिका देखने को मिलती है। वे भाषा और शैली में नवाचार लाते हुए विविध भावनात्मक पक्षों को हाइकु की मर्यादा में समेटने में सक्षम रहे हैं।
14 उपशीर्षकों में विभाजित अक्षरलीला लघु छंद में विराट अनुभूति का संग्रह है। सोनी जी का अनुभव संसार कितना व्यापक है, प्रतिष्ठित साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से पता चलता है।
रमेश कुमार सोनी का हाइकु संग्रह ‘अक्षरलीला’ विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विविधता से भरा हुआ है। इस संग्रह में जीवन के अनेक रूपों की सूक्ष्म झलकियाँ है, जो तीन पंक्तियों में हाइकुकार के पूरे अनुभव संसार को समेटने की कला को दर्शाती हैं। लेखक ने गाँव की सादगी और शहर की चहल-पहल, दोनों को संवेदनशील दृष्टि से देखा है—कहीं खेत की हरियाली है, तो कहीं शहरी भीड़ में खोती संवेदना।
प्रकृति, ऋतुएँ, पेड़-पौधे, पक्षी, बारिश, धूप—इन सबको हाइकु के माध्यम से चित्रित करते हुए, सोनी जीवन के हर उस क्षण को पकड़ते हैं जो अक्सर हमारी व्यस्तता में अनदेखा रह जाता है। उनके हाइकु में मौसम की करवटें सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि मन की अवस्था का रूप भी बन जाती हैं।
इन हाइकुओं में जीवन के छोटे-छोटे दृश्य हैं—चूल्हे की आँच, नदी के किनारे की चुप्पी, स्कूली बच्चों की आवाज़, पतझड़ में झरते पत्तों की साँसें—जो पाठक को सीधे अनुभव के केंद्र में ले जाते हैं। ‘अक्षरलीला’ के हाइकु सिर्फ पढ़े नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं।
इनकी विशेषता यह है कि हर हाइकु एक चित्र है। वह चित्र जीवन की एक पूरी कथा को अपने भीतर समेटे होता है। गाँव से शहर, ऋतु से मनोदशा, और प्रकृति से आत्मा तक की यह यात्रा, ‘अक्षरलीला’ को केवल एक हाइकु संग्रह नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की लघु लेखनी बना देती है।
भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा/ दुनिया जागी (1)
पहला हाइकु ही प्रकृति के माध्यम से प्रात:कालीन जागरण की एक सूक्ष्म, भावपूर्ण छवि रचता है। पहली पंक्ति एक शांत क्षण की स्थापना करती है। भोर का मौन चेतना के जागरण से ठीक पहले का ठहराव है—जहाँ सारा जगत अभी नींद और जागरण के संधि-काल में है। यह मौन बहुत कुछ कहता है।
यहाँ ‘पाखी’ प्रकृति का पहला पुजारी बन जाता है। उसकी चहचहाहट को कवि ने “मंत्र” कहा है, जिससे पक्षी का स्वर एक पवित्र, जाग्रत करने वाला अनुष्ठान बन जाता है।
अंतिम पंक्ति में क्रिया और परिणाम आता है। पक्षी के मंत्र की गूँज से दुनिया जागती है। यह संवेदना और चेतना के स्तर पर भी एक जागरण है।
यह हाइकु प्रकृति और मानव जीवन के अंतर्संबंध को अत्यंत सूक्ष्म, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। तीन पंक्तियों में एक पूरा दृश्य, एक चेतना और एक संदेश समाहित है। यह कविता पाठक को न केवल सुबह का दृश्य दिखाती है, बल्कि उसे भीतर से जागृत भी करती है।
खेत गा उठे/ बैलों की घंटी संग/ किसान— राग। (5) खेत गा उठे यह मानवीकरण है, जिससे खेत मानो किसान के श्रम के साथ स्वयं संगीत रचने लगते हैं। यहाँ ध्वनि का बिंब अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बैलों के गले में बँधी घंटियाँ केवल संगीत का स्रोत नहीं, बल्कि श्रम के आरंभ की पुकार हैं। यह ध्वनि परिश्रम की पहचान है, एक लोक-ध्वनि, जो केवल कानों में नहीं, मन में गूँजती है। यह खेत, बैल और किसान के बीच की त्रयी को जोड़ती है।
तीसरी पंक्ति इस हाइकु को एक संगीतात्मक और सांस्कृतिक ऊँचाई पर ले जाती है। ‘किसान-राग’ कोई स्थापित शास्त्रीय राग नहीं, बल्कि किसान के श्रम, पसीने, संघर्ष और आशा का राग है। यह राग प्रकृति से उपजता है—जिसमें मिट्टी की सोंधी गंध, बैलों की चाल, और मानवीय श्रम की तपिश शामिल है।
रमेश कुमार सोनी ने अपने संग्रह में नवीन प्रयोग भी किए हैं-
शेखी बघारे/ काँटों बीच गुलाब/ जेड प्लस में। (53)
काँटों के बीच गुलाब ऐसा है, जैसे उसे जेड प्लस सुरक्षा मिली है। 
तितली उड़ी/ ग्लोबल सिटीजन/ प्रकृति जाने। (81)
तितली को कवि ने ग्लोबल सिटीजन कहा है।
कवि ने मृगी को ट्रेनर माना है—
छौने उछले/ मृगी चौकस खड़ी/ ट्रेनर अच्छी। (7)
कवि ने बाज को पैराग्लाइड करते देखा है—
नभ में बाज/ पैराग्लाइड करे/ योग में मग्न। (18)
दर्पण के सामने गौरैया का बच्चों सा ठुमकने का दृश्य मनभावन है—
दर्पण देख/ गौरैया ठुमकती/ बच्चों के जैसी। (46)
आज के युग की भयावह तस्वीर दिखाता यह हाइकु है— फ्रिज सहमा/ चालीस टुकड़ों का/ गवाह बना। (70)
सोनी के इस हाइकु संग्रह के सभी हाइकु भाव भाषा से समृद्ध हाइकु हैं। जीवन, समाज, प्रकृति का कोई भी रंग उनकी लेखनी से छूटा नहीं है। आशा है पाठक को यह संग्रह पसंद आएगा।

May 2, 2025

किताबेंः विचित्रता से घिरे मन और बुद्धि

 - रश्मि विभा त्रिपाठी 

 मन विचित्र बुद्धि चरित्र (कहानी-संग्रह): डॉ. सुषमा गुप्ता, पृष्ठ: 208, मूल्य: 209 , संस्करण: 2025,  प्रकाशक: हिंद युग्म, सी- 31, सेक्टर- 20, नोएडा (उ.प्र.)- 201301, आवरण- चित्र: प्रियम गुप्ता

संवेदनशील कथाकार डॉ. सुषमा गुप्ता का कहानी- संग्रह ‘मन विचित्र बुद्धि चरित्र’ विचित्रता से घिरे मन और बुद्धि के निर्णय से बना चरित्र या तो समाज के लिए एक आदर्श बनता है या फिर एक कलंक।  
11 कहानियों से सजा संग्रह ‘मन विचित्र बुद्धि चरित्र’ मास्टर पीस है, जिसमें मन, बुद्धि का मूर्तरूप दिखता है। 
‘मरीचिका की गंध’ स्त्री को लेकर भ्रम में जी रहे एक युवक की कहानी है। प्रमुख पात्र न बरसों पहले गई लड़की की आत्मा तक पहुँच सका और न अपनी मौजूदा प्रेमिका के लिए अपनी आत्मा के तहखानों का दरवाजा खोल पाता है.
तहखाने ‘ताजे गोश्त की हवस में’ बदबूदार हो चुके हैं; इसीलिए अपनी प्रेमिका के आने से पहले वह सबकुछ समेट लेना चाहता है।
कहानी ‘मंत्रविद्ध’ में सपनों और यथार्थ के बीच मानसिक और भावनात्मक प्रवाह में बहता हुआ एक पात्र है। स्वप्न में वह देखता है कि ट्रेन छूटने के बाद एक लड़की मदद के लिहाज से उसे अपने घर ले जाती है। उसकी डायरी उसके हाथ लगती है। डायरी में वह परिष्कृत समाज का चेहरा देखता है और सोचता है कि कहीं वह देह व्यापार से तो नहीं जुड़ी; मगर फिर भी उसकी ओर खिंचता चला जाता है। यह अवचेतन मन की शक्ति है, जो उसे अपनी ओर खींचती है। जीवन के अनुभव और घटनाएँ इसी अवचेतन मन की शक्ति का परिणाम हैं, जिन्हें चेतन मन भोगता है। भावनाएँ कभी किसी से इस तरह जुड़ जाती हैं कि हम अपने आसपास उसकी उपस्थिति महसूस करते हैं। 
‘ख़्वाब की छाल में यथार्थ की कील’ कहानी दिखाती है कि कैसे सत्ताधारी गिद्ध किसी की बुद्धि को लील जाते हैं और कैसे किसी को औजार बनाते हैं अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए। कहानी संदेश देती है कि जब तक समाज में धार्मिक भेदभाव की दीवारें खड़ी करने वाले स्वार्थपरक असंवेदनशील लोग हैं, शांति और मानवता तब तक कायम नहीं हो सकती।
कहानी ‘मिस्टिक स्टे’ एक गम्भीर मुद्दे को उठाती है। सुनसान गलियों से होकर एक जोड़ा हवेली में पहुँचता है, वहाँ पता चलता है कि वह एक होटल है। हवेली देखकर वह वहीं ठहरने का निश्चय करते हैं; हालाँकि होटल रहस्यमय है और किसी भी वेबसाइट पर सूचीबद्ध नहीं है।कहानी सोचने पर मजबूर करती है कि आज के युग में किस तरह हमारी निजता का हनन हो रहा है। ऐसे में हम अपनी सुरक्षा को लेकर कितने सतर्क हैं? 
‘ग्रेवडिगर’ कहानी में वास्तविक प्रेम और धोखे का चित्रण है। कहानी में एक ज़हीन ग्रेवडिगर लड़कियों की क़ब्र खोदता है और जब कोई लड़की मरने लगती, तो उसे कब्र से खींचकर बाहर निकाल लेता और जब जिन्दा होने लगती, तो उस पर कब्र की मिट्टी डाल देता है। प्रेम के नाम पर लड़कियों के जीवन को बर्बाद करने का यह तरीका है कि लड़की न जी सके और न मर सके। प्रेम के नाम पर शारीरिक मानसिक शोषण, धोखा करने वाला ग्रेवडिगर ही है। 
लड़की द्वारा लड़के की अनदेखी करने पर लड़के के अहंकार को चोट लगती है। अपने अहंकार को बचाने के लिए वह दोस्ती का हाथ बढ़ाता है और फिर चोट खाया आदमी क्या कर सकता है, यह बताने की जरूरत नहीं।
कहानी ‘भद्दी हँसी’ जुनून पर आधारित है कि कैसे व्यक्ति का ध्यान लगातार किसी पर रहता है, वह लगातार उसके बारे में सोचता है, जब इंसान पर हावी होने लगता है, तो न केवल उसे बल्कि उसके निजी रिश्तों को भी प्रभावित करता है।
गुब्बारे बेचने वाली दो लड़कियों में से एक पर रोशन लगातार ध्यान देने लगता है, उसकी मदद करने की सोचता है, जबकि वह जानता है कि वह समाज सुधारक नहीं है, रोशनी से वह प्रेम करता है; लेकिन उस लड़की की ओर जाने क्यों भागता है। लड़की की भद्दी हँसी में सामाजिक असमानता, समाज- सेवा, गरीबी और शिक्षा पर एक व्यंग्य है।  
‘दिन के ख़्वाब सुनाएँ किसको!’ प्रेम का अर्थ, परिभाषा, प्रेम के बदलते स्वरूप, प्रेम सम्बन्धों के उतार-चढ़ाव और अलगाव की कहानी है। नायिका अलगाव को अच्छा मानती है। अलगाव वाकई अच्छा ही है अगर साथी में रिश्ते के प्रति सच्ची निष्ठा नहीं।
दूसरों के दुख को अपना समझने वाली ‘उठान हाड़ की लड़की’ की संवेदनशील पात्र शम्पा साबित करती है कि आज के युग में संवेदना का मूल्य समझने वाला शायद विरला ही होगा। उठान हाड़ की लड़की की आत्महत्या से वह दुखी है, जबकि उसके पति को लगता है कि उसे साइकेट्रिस्ट की जरूरत है। कहानी समाज की काली सच्चाई दिखाती है जहाँ पैसों के लिए डोनर प्रक्रिया की आड़ में महिलाओं की देह से खिलवाड़ हो रहा है। 
‘टंच’ सुस्पष्ट स्वप्न (ल्यूसिड ड्रीमिंग) के अनुभव से गुजर रहे एक युवक की एक रोचक कहानी है।
‘मूक चीखें’ समाज का काला सच बताती है कि किस प्रकार एक दसवीं कक्षा के बच्चे को कुछ बिगड़ैल लड़कों ने न सिर्फ शारीरिक, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया; बल्कि उसपर यौन हिंसा की। बच्चे ने गहरे अवसाद में आकर आत्महत्या कर ली। विकृत मानसिकता के लड़कों के इस घिनौने कृत्य में उनके माता- पिता और स्कूल प्रबंधन दोनों जिम्मेदार हैं।
‘मनारा’ देशभक्ति, प्रेम और मानवता की कहानी है, जिसका नायक निश्कान बर्लिन के हीरोज डैन जाता है, जहाँ दूसरे विश्व युद्ध में शहीद हुए शहीदों की खून से सनी वर्दी, उनके लिखे ख़त, उनका हर सामान अमानत के तौर पर सहेजा गया है। वहाँ उसे एक बटुआ मिला, जिसपर लियो लिखा था। बटुए में लियो की प्रेमिका मनारा के नाम एक खत था। जाने किस भाव से उसने लियो का बटुआ लिया और मनारा की तलाश में निकल पड़ा, लियो का खत लौटाने के लिए।
संग्रह की हर कहानी के संवाद, भाव, विचार एक दृश्य की तरह पाठक की आँखों के सामने से गुजरते हैं। भाषा में एक लय है, जिसमें पात्रों की भावनाओं की गूँज सुनाई देती है।  
‘मन विचित्र बुद्धि चरित्र’ कहानी- संग्रह साहित्य जगत में अपना एक अलग और विशिष्ट स्थान बनाएगा। ■

Apr 1, 2025

कविताः शब्द





  - रश्मि विभा त्रिपाठी

फुसफुसाहट, शालीन संवाद, 

बहस या चीख़-पुकार

शब्द बुनते हैं एक दुनिया, 

खोलके अभिव्यक्ति के द्वार

एक रेशमी रूमाल 

या एक नुकीली कटार, 

या दिल को बेधते 

या पोंछते हैं आँसू की धार


स्याही और कलम से 

ये बनाते हमारे भाग्य की रेखाएँ, 

इन्हीं शब्दों के गलियारे से 

हम तय करते हैं दिशाएँ

सब भस्मीभूत कर दे, 

एक शब्द वो आग भड़का दे

जीवन छीन ले या फिर से 

किसी का दिल धड़का दे

नीरव को कलरव में बदले, 

फिर कलरव का खेल पलटता

शब्द की डोर से आदमी 

आदमी से जुड़ता और कटता

शब्द दुत्कारता या 

आवाज़ देकर पास बुलाता है,

पल में रोते को हँसाता है, 

हँसाते को रुलाता है

शब्द के दम पर ही 

कोई बस जाता है यादों में

ये ही छलिया और ये ही 

साथ जीने- मरने के वादों में

दूरियों की दीवार में बना देते हैं 

ये नजदीकी का दर, 

शब्दों के पुल पर हम मिलते 

उस पार से इस पार आकर

चुप्पी के हॉल में 

शब्दों का ही गूँजता संगीत है

इन्हीं से बनते हैं दुश्मन, 

इन्हीं से हर कोई अपना मीत है


विश्वकोश के बाग में जाएँ, 

तो शब्दों के फूल करीने से चुनें

कुछ भी कहने से पहले 

थोड़ी इन शब्दों की भी सुनें

शब्द हमें दूर कर सकते हैं, 

शब्द ही हमें रखते हैं साथ

खोलते दिल के दरवाज़े 

शब्दों के गमकीले हाथ

उसने शब्दों के वो फूल चुने थे, 

जिनमें थी पुनीत प्रेम की सुवास

वो नहीं है मगर 

जिन्दा है उसके होने का अहसास।

Mar 1, 2025

किताबेंः सैनिक पत्नियों की डायरी- महत्त्वपूर्ण अभिलेख

 - रश्मि विभा त्रिपाठी

सैनिक पत्नियों की डायरी: वंदना यादव, पृष्ठ: 190, मूल्य: 350 रुपये (पेपरबैक), ISBN: 978-93-5562-382-9, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन प्रा. लि. 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002

‘सैनिक पत्नियों की डायरी’ भारतीय सेना का जीवन, सैन्य जीवन की जटिलताओं, संघर्षों और साहस को सामने लाते हुए पति के साथ और पति के सीमा पर रहते हुए, दोनों प्रकार की परिस्थितियों में संचालित सैनिक- पत्नी के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख है।

पुस्तक में ‘डायरी- लेखन’ भारतीय सेना की सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि अपने सैनिक पति के साथ आगामी खतरों और जीवन के उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए अपने बच्चों को शिक्षित और सशक्त बनाने का कर्तव्य निभाती ये सैनिक पत्नियाँ देश के लिए कैसे अपने व्यक्तिगत स्वत्व का बलिदान करती हैं। पति की पहचान के पीछे रहकर अदृश्य बलिदान करने वाली ये सैनिक पत्नियाँ, जो ‘मेमसाहब’ के रूप में जानी जाती हैं, असल में सैनिकों की असली ताकत हैं। इस डायरी में एक सैनिक से विवाह के बाद शुरू हुए सैनिक पत्नी के जीवन के नए सफ़र, सैन्य परिवार का नए सदस्यों के प्रति व्यवहार, सैन्य संस्कृति और सैन्य परिवेश में समायोजन की चुनौतियों के अनुभव हैं। यह डायरी सैनिक जीवन की सामाजिक संरचना और उसमें सैनिक पत्नी की महत्त्वपूर्ण भूमिका दर्शाती है, जो सेना की सभी सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी करती है। इन सैनिक पत्नियों ने सैनिक पति की जगह-जगह पोस्टिंग, बार-बार स्थानांतरण से परिवार की प्रभावित दिनचर्या, बच्चों की परवरिश, पढ़ाई, नए स्कूल में दाखिले के बीच न केवल अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक क्षेत्र में अपना योगदान दिया; बल्कि विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न भाषा, संस्कृति, जलवायु- विविधता, खान-पान, रहन-सहन, और शिक्षा प्रणाली की बाधाओं के बीच अपने जीवन को तटस्थता से जीते हुए अपने सैनिक पति का कर्तव्यपथ प्रशस्त किया।

सैनिक पत्नी साहित्यकार शशि पाधा विवाहित जीवन में पहली बार ‘अपने घर’ आईं- “मोटे खद्दर का बना हुआ एक बड़ा- सा कमरा... दीवारें, छत, खिड़कियाँ सभी मोटे हरे रंग के कपड़े से बनी थीं। टेंट के बीचों-बीच एक मोटा- सा बाँस था, जिसने इसकी छत को थाम रखा था। सामने एक लोहे की मेज पर कैरोसिन लैंप जल रहा था। कैंटीन से लाई गई लकड़ी की पेटियों को ताजा अखबारों की परत से ढककर एक मेजपोश बिछाकर एक बड़ा- सा देखने वाला शीशा रख दिया गया था।  फर्नीचर के नाम पर दो चारपाइयाँ थीं। अलका पंत की डायरी बताती है कि जब पति पहली बार अकेला छोड़कर जाते हैं, तो कैसा डर होता है और जब उनके पति को (श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ शांति अभियान चलाने वाली सैन्य टुकड़ी के तहत श्रीलंका भेजा जाता है, तो देश के प्रति कर्तव्य निभाने को भेजती सैनिक पत्नी को गर्भधारण की स्थिति में पति की अनुपस्थिति कितनी प्रभावित करती है और सुरक्षा का मुद्दा भी।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बढ़ी हिंसा के माहौल में रहना और असम की पोस्टिंग के दौरान बच्चों के साथ ट्रेन से जाते हुए ट्रेन में उग्रवादियों द्वारा किए गए बम विस्फोट की घटना यह दिखाती है कि कैसे एक सैनिक व्यक्तिगत, पारिवारिक संकट और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाकर देश- रक्षा को प्राथमिकता देता है। सैनिकों के शहीद होने, शहीदों की पत्नियों के दुख और अपंग सैनिकों के संघर्ष के बीच इस सैनिक पत्नी ने दृढ़तापूर्वक अपने परिवार की सेवा की; ताकि पति अपना कर्तव्य निभाते हुए देश- सेवा कर सकें। एक साथी की शहादत पर सभी सैनिक परिवारों का प्रभावित होना सेना की सामूहिक एकता को दर्शाता है, जहाँ सभी महिलाएँ, बच्चे मिलकर उस दुःखद परिस्थिति का सामना करते हैं।

सिविलियन अंबरीन जैदी ने यह जानते हुए भी एक फौजी को अपना जीवनसाथी चुना कि वे देश सेवा के चलते हमेशा साथ नहीं रह पाएँगे, हफ्तों- महीनों तक आपस में बात नहीं होगी। गर्भधारण के समय नियमित चैकअप के दौरान डॉक्टर को जब शिशु की हार्टबीट नहीं मिली, तो वे एक सीनियर ऑफिसर की पत्नी के बताने पर मिलिटेंसी के चरम में भी अकेले ही सिविलियन डॉक्टर के पास चली गईं। छत्तीसगढ़ में तैनात उनके पति को माओवादियों से मौत की धमकी मिली, तो पहले वे डरीं; लेकिन फिर सामान्य हो गईं। सैनिक पत्नियाँ संस्था से सम्बन्धित सेवाएँ देने के साथ- साथ अपना कॅरियर बनाएँ, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों, उन्होंने इस दिशा में प्रयास किए। अंबरीन जैदी को वीर नारियों के अधिकारों के प्रति काम करने हेतु वर्ष 2023 में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सम्मानित किया है।

स्वतंत्र पत्रकार अनीता आर विशाल की डायरी बताती है कि पति ड्यूटी पर तैनात थे और उन्हें 102 डिग्री बुखार था। जानकारी मिलते ही उनके पति के सीनियर ऑफिसर रात को उनकी जगह जाकर रुके और उनको देखभाल के लिए घर भेजा। उनका हाल जानने आई अन्य अधिकारियों की पत्नियों का कहना- “आख़िर यहाँ हम ही एक परिवार हैं। अगर हम आपस में एक दूसरे का ख़याल नहीं रखेंगे, तो कौन रखेगा!” और चंचल पंत की डिलीवरी के दौरान हुए ऑपरेशन में खून की जरूरत पड़ने पर 30 अधिकारियों का उन्हें खून देने पहुँचना, सेना की एकजुटता और परिवार भाव का प्रतीक है। कारगिल युद्ध के दौरान पूर्णिमा सहारन को उनके पति ने चिट्ठी में बैंक खातों का सारा विवरण भेजते हुए लिखा कि यदि युद्ध के मैदान से वापस न आए, तो वे जीवन में इसके लिए तैयार रहें, यहाँ तक कि अपना जीवनसाथी चुन लें, जो उनके बेटे को हृदय से अपनाए। इस तरह की कल्पना तक से मन सिहर जाता है, ऐसी स्थिति में इन सैनिक पत्नियों ने कैसे धैर्य रखा होगा?

शशि पाधा जी ने अपने सैनिक जीवन में शहादत और मृत्यु को पास से ही नहीं देखा, बल्कि शहीद के परिवार को यह दुःखद समाचार देने की भी सबसे कठिन जिम्मेदारी निभाई और शहीद का अस्थि- कलश अपनी गोद में रखकर अंतिम विदाई के लिए पलटन तक लेकर आईं। श्रीलंका में लिट्टे के साथ अभियान में शहीद हुए कैप्टन हरपाल और कैप्टन सतीश का अस्थि कलश लेने वे सैनिक पत्नी दीपा के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पहुँचीं और उनके अस्थि- कलश को लेकर अपनी पलटन आईं, जहाँ उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

ऐसी विकट परिस्थितियों का सामना करने के लिए आखिर इन सैनिक पत्नियों में बल कहाँ से आता है, जो अनगिन कठिनाइयों और दर्दनाक अनुभवों के बावजूद मजबूती और साहस के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं? निःसंदेह यह इनकी देश सर्वोपरि की भावना है, जो साहस और सहनशक्ति के दम पर पति के सीमा पर रहते हुए ये बच्चों के साथ कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करती हैं। समर्पण और शौर्य की मिसाल ये सैनिक पत्नियाँ केवल परिवार का समर्थन ही नहीं करतीं’ बल्कि इनका मानसिक और भावनात्मक सहयोग सैनिक पति की कार्य- क्षमता बढ़ाता है, जिससे वे देश के प्रति अपने कर्तव्य को बेहतर ढंग से निभाते हुए सरहद की निगरानी करते हैं और जिसकी वजह से हम सिविलियन अपने घरों में चैन की नींद सो पाते हैं।

सम्पादिका स्वयं एक सैनिक पत्नी हैं, इस दृष्टिकोण से भी यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण है। यह सैनिक समाज की उन वास्तविकताओं को, जिन्हें हमारा समाज आमतौर पर नजरअंदाज करता है, सामने लाते हुए भारतीय सेना के जीवन को बगैर किसी पूर्वाग्रह के यथावत समझाने में सहायक है।

Jan 1, 2025

किताबेंः लघुकथा विधा का व्यापक विश्लेषण

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

‘लघुकथा: चिंतन एवं सृजन’ (लघुकथा- संग्रह): सम्पादक-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, पृष्ठ: 120, मूल्य: 300 रुपये, ISBN: 978-93-6423-599-0, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे–19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली–110059

लघुकथा एक ऐसी विधा है जो अपने आकार में लघु होने के बावजूद अपने अस्तित्व में विराट है और अपनी लघुता में वृहद् विचारों, संवेदनाओं और जीवन- जगत के विविध अनुभवों को शब्दबद्ध करने की अद्भुत क्षमता रखती है, जहाँ शब्दों की संक्षिप्तता में गहन अर्थ समाहित होते हैं। 

पुस्तक के पुरोवाक् में सम्पादक ‘हिमांशु’ लघुकथा की सृजन- प्रक्रिया पर महत्त्वपूर्ण चिंतन प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि लघुकथा एक ऐसी यात्रा है, जिसमें शब्दों के मितव्ययी उपयोग से गहन भावनाओं और विचारों को व्यक्त करते हुए लेखकीय गंतव्य तक पहुँचा जा सकता है। शीर्षक और कथा की आत्मा को जोड़ती लघुकथा वाच्यार्थ से परे जाकर व्यंग्यार्थ के माध्यम से गहरे अर्थ प्रदान करती है, सपाटबयानी वाली रचना नहीं।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ अपने अनुशीलन ‘लघुकथा लेखन और रचनात्मकता’ में लेखन और रचनात्मकता के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए लेखन हेतु लेखकीय परिपक्वता पर जोर देते हुए कहते हैं कि लेखन विचारों को शब्दों में पिरोना नहीं है, उसमें रचनात्मकता होनी चाहिए। और रचनात्मकता तभी आती है, जब लेखक विषयवस्तु को आत्मसात् कर उसे नवीन दृष्टिकोण और शिल्प से प्रस्तुत करता है।

‘हिन्दी लघुकथा में प्रतिबिंबित पारिवारिक जीवन’ लेख के अंतर्गत लघुकथा में पारिवारिक सम्बन्धों, मूल्यों और बदलावों पर पड़ी डॉ. शिवजी श्रीवास्तव की चिंतन दृष्टि है, जिसे लघुकथाकारों ने अपना विषय बनाकर हिन्दी लघुकथा में अभिव्यक्त किया है। पारिवारिक जीवन की जटिलताओं को समझने और हिन्दी लघुकथा के सामाजिक संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता बताता यह लेख न केवल साहित्यिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक संरचना के अध्ययन में भी महत्त्वपूर्ण है।

डॉ. कुँवर दिनेश सिंह के लेख ‘हिन्दी लघुकथा: शिल्प एवं सम्प्रेषण-कला’ में लघुकथा की संरचना, शिल्प और उसकी सम्प्रेषणीयता पर उनका गहन चिंतन है। इस लेख से हमें ज्ञात होता है कि कैसे लघुकथा में भाषा, प्रतीक और व्यंजना का सटीक और कुशल प्रयोग किया जाता है जिसके फलस्वरूप यह पाठकों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालती है और किस प्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक संदर्भ इसे प्रभावशाली बनाते हैं। यह लेख इंगित करता है कि लघुकथा में न केवल कथानक की गहराई होनी चाहिए, बल्कि उसमें पाठकों के साथ भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर जुड़ने की क्षमता भी होनी चाहिए। लघुकथा के शिल्प और सम्प्रेषण- कला को जानने के लिए यह लेख एक सहायक- सामग्री है।

 ‘बंद दरवाज़ा’ (मुंशी प्रेमचंद) में प्रतीकात्मकता के माध्यम से परिवार और समाज में व्यक्ति के अवसरों और संभावनाओं के मार्ग की ओर संकेत है। ‘पानी की जाति’ (विष्णु प्रभाकर) जाति, धर्म और मानवता में अग्रणी कौन है, इसे व्यक्त करते हुए संकेत करती है कि जीवन में अवरोध पैदा करती समाज की धार्मिक और जातीय विभाजन रेखा से पहले मानवता को रखा जाना चाहिए।

लघुकथा ‘अश्लील पुस्तकें’ (हरिशंकर परसाई) मानवीय व्यवहार पर व्यंग्य करती है और दिखाती है कि मनुष्य की कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है।

‘पाठ’ (सुकेश साहनी) किशोर- प्रेम की एक संवेदनापरक लघुकथा है। पात्र पाखी के अपने प्रति बढ़ते आकर्षण को महसूस कर शिक्षक को अपने साथी शिक्षकों के किस्से याद आते हैं लेकिन जब पाखी अपने प्यार का इज़हार करती है- “इस जन्म में मुझे डैडी का प्यार नहीं मिला” तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह जाता है, “अब आईना मुझे देखे जा रहा था” में शिक्षक को किशोर मनोविज्ञान का पाठ पढ़ने का संदेश है।

‘ऊँचाई’ (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’) में जीवन में परिवार की महत्ता और पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने का प्रभावी चित्रण है, मुख्य पात्र के भीतरी संघर्ष और पत्नी की तमतमाहट से उपजा एक मानसिक तनाव है, जिसे पिता की चिंता जड़ से मिटा देती है। लघुकथाकार ने उस क्षण की संवेदना को इतनी बारीकी से पकड़ा है कि पाठक खुद को उसमें बँधा हुआ महसूस करता है।

‘संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण’ (डॉ. सुषमा गुप्ता) मानव मन पर आधुनिक तकनीक का प्रभाव दर्शाते हुए डिजिटल युग में रिश्तों की स्थिति का असल आकलन करती है। मुख्य पात्र पिता की बीमारी और मृत्यु का समाचार फेसबुक पर अपडेट कर पिता के प्रति अपना भावनात्मक जुड़ाव दर्शाता है और दवाइयों की प्रतीक्षा करती माँ को नज़रअंदाज कर यह दिखाता है कि कैसे आभासी पटल पर व्यक्त भावनाओं ने मन में जगह ले ली है और असली रिश्ते जीवन से गायब हो गए

‘सिसकी’ (डॉ. कविता भट्ट) स्त्री की मातृत्व की आकांक्षा और समाज के दबाव को दर्शाती है। कमला और उसकी सास का संवाद दर्शाता है कि समाज किस प्रकार एक महिला के अस्तित्व को उसकी प्रजनन क्षमता से जोड़ता है। सोशल मीडिया पर ‘बेटी बचाओ’ का नारा देने वाला कमला का अपने वास्तविक कर्त्तव्यों से विमुख शान्ति, स्त्री का व्यक्तिगत संघर्ष, व्यापक सामाजिक संरचनाओं के खिलाफ एक मौन विद्रोह और अंततः यह सोचकर कि काश उसके ऐसी बच्ची होती, अपनी सिसकी से बेटी का महत्त्व रेखांकित करती है।

‘भविष्य’ (डॉ. उपमा शर्मा) में आज की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली का नैतिक पतन है कि कैसे संस्थाएँ नैतिकता को तिलांजलि देकर भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। संस्थागत नियम- व्यवहार के विपरीत शिक्षा और स्वास्थ्य का व्यवसायीकरण हो रहा है।

‘भूकम्प’ (प्रियंका गुप्ता) में गहन मानवीय संवेदना और नैतिक द्वंद्व का बखान है। पति की आत्मकेंद्रितता, पत्नी की चिंता और आपदा के भय के बीच अपने पिता की देखभाल करके थक चुके व्यक्ति की भावना है। अपनी स्वार्थी भावनाओं के प्रति झुके बेटे को उसकी पत्नी बताती है कि उसका बच्चा घर के भीतर है। अंततः बच्चे को गोद में लेकर व्हीलचेयर पर बाहर आते पिता को देखकर वह उनकी ओर लौटता है और जीवन- मूल्य और पारिवारिक दायित्वों का बोध करता है। ‘चकोर’ (रचना श्रीवास्तव) सच्चे मानवीय सम्बन्धों और प्रेम के चरम की एक सशक्त कथा है। “अब कभी यहाँ नहीं आना है” के बाद लड़के का फिर से लड़की को देखने के लिए आना सिद्ध करता है कि प्रेम दैहिक आकर्षण से नहीं, आत्मीय जुड़ाव से होता है।

‘कुछ नहीं खरीदा’ (सुदर्शन रत्नाकर) उपभोक्तावाद और मानवीय विचार का अंतर्विरोध दर्शाती है। समुद्र तट पर अपने बेटे के साथ बैठी महिला वहाँ के मूल निवासियों की स्थिति को देखकर विचार करती है और महिला के बेटे की बात -“आपने भी तो कुछ नहीं खरीदा” आत्ममंथन द्वारा विचार की क्रियान्विति पर बल देती है।

सुभाष नीरव की लघुकथा ‘धूप’ अपने उच्च पद के कारण जीवन के सरल आनंद से वंचित एक अधिकारी के माध्यम से वैयक्तिक मानसिकता और सामाजिक मानदंडों की पड़ताल करती है। इस ‘धूप’ में हम देखते हैं कि सामाजिक मानदंडों के चलते हम कितनी बार अपने वास्तविक आनंद को भुला देते हैं और उसे पाने में हिचकिचाते हैं।

‘गैप’ (कृष्णा वर्मा) में स्त्री के प्रति परिवार, समाज का पारंपरिक दृष्टिकोण है, जो उसकी अपनी पसंद का जीवन जीने की इच्छा को दबाता है।

‘प्राइमरी स्कूल’ (मीनू खरे) में एक सरकारी विद्यालय के प्रधानाध्यापक का अपने विद्यालय का स्तर सुधारने और उसे पब्लिक स्कूलों के समकक्ष लाने का प्रयास है जो व्यवस्था तंत्र, राजनीतिक और सामाजिक दबाव के कारण विफल हो जाता है। 

यह पुस्तक न केवल लघुकथा के स्वरूप, बल्कि महत्त्वपूर्ण लेखों, संदर्भित सशक्त लघुकथाओं के आधार पर लघुकथा विधा की प्रक्रिया का व्यापक विश्लेषण और उसके प्रभावी पहलुओं का समग्र चिंतन है। ■

Dec 1, 2024

किताबेंः ‘लघुकथा- यात्रा’ लघुकथाओं का दस्तावेज

 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

लघुकथा यात्रा: डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’, पृष्ठ: 122, मूल्य: 320 रुपये, ISBN: 978-93-6423-834-2, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे–19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली–110059

संवेदनापरक लघुकथाओं पर केंद्रित नीलाम्बरा के पुस्तक रूप संग्रह ‘लघुकथा- यात्रा’ के अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ। यहाँ पढ़ने के बजाय अध्ययन शब्द- प्रयोग इसलिए समीचीन है; क्योंकि यह संग्रह अध्येताओं, शोधार्थियों के लिए न केवल एक महत्त्वपूर्ण शोध सामग्री है बल्कि एक पुस्तकालय है जहाँ उन्हें संवेदना की सार्वभौमिक सत्ता की शिक्षा मिलती है, जो जीवन- जगत् के लिए अपरिहार्य है। 

आज के मशीनी युग में मानवीय संवेदनाओं का अस्तित्व मिट गया है। व्यक्ति यंत्रवत् अपने भौतिक सुख के लिए दौड़ रहा है। हर किसी के प्रति वह संवेदनहीन है।

संवेदना का महत्त्व बताते हुए संपादकीय में सम्पादक डॉ. कविता भट्ट ने लिखा है– संवेदना साहित्य की आत्मा है।

72 लघुकथाकारों की बेजोड़ लघुकथाओं से सुसज्जित यह संग्रह मानवीय मूल्यों की एक पाठशाला है।

ख्यातिलब्ध कथाकार व अनुवादक सुभाष नीरव के लेख से लघुकथा की रचना- प्रक्रिया को समझा जा सकता है।

संग्रह की पहली लघुकथा ‘राष्ट्र का सेवक’ (प्रेमचन्द) में सामाजिक विषमता व जातिवाद का चित्रण है। राष्ट्र का सेवक सबको समान मानता है; परन्तु जब उसकी बेटी निम्न जाति के युवक से विवाह की इच्छा जताती है, तो वह अपने भीतर छिपे असमानता के सच और सामाजिक मान्यताओं की विडम्बना को उजागर करता है।

लघुकथा ‘फ़र्क’ (विष्णु प्रभाकर) में जानवरों के माध्यम से आपसी मानवीय भेद के परिहार का संदेश निहित है।

अंजू खरबंदा की लघुकथाओं ‘खिड़की’, ‘खाली पलंग’ में क्रमशः सामान बेचने वालों की भावनात्मक स्थिति और ससुराल पक्ष द्वारा निर्मित सम्बन्धों को जोड़ता एक मजबूत पुल है। लघुकथा ‘ख़ूबसूरती’ (डॉ. उपमा शर्मा) समाज में व्याप्त सौंदर्य की संकीर्ण परिभाषा को चुनौती देती है। ‘जल संरक्षण’ (कमला निखुर्पा) जल संरक्षण की महत्ता और व्यक्ति के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। 

‘कुलच्छन’ (डॉ. कविता भट्ट) सामाजिक मूल्य, धार्मिकता और व्यक्तिगत आचरण के मध्य के अंतर का आवरण हटाकर सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य की कथनी और करनी में कितनी भिन्नता है। लघुकथा ‘हैप्पी मदर्स डे’ (कृष्णा वर्मा) आधुनिक जीवन की व्यस्तता और अकेलेपन का भाव दर्शाते हुए बहू की परिवार के प्रति संवेदनशीलता से एक भावनात्मक मोड़ लाती है।

लघुकथा ‘लड़की’ (प्रेम गुप्ता मानी) में समाज की भीतरी मानसिकता झलकती है। कथानक मानव स्वभाव का बखान करता है कि कैसे बिना जानकारी के लोग एक-दूसरे का मूल्यांकन करते हैं।

संवेदनशील लघुकथा ‘उड़ान’ (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’) अकेलेपन और उपेक्षा का दर्द बयान करती है।  इन्हीं की ‘ख़ुशबू’ लघुकथा एक महिला की कुंठा और अकेलेपन को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर उस सामाजिक ढाँचे को दर्शाती है जिसमें महिलाओं की समर्पित भूमिका को नजरअंदाज किया जाता है; कथा के उत्तरार्ध में गुलाब जीवन की ओर बढ़ने का पर्याय है। ‘ख़ूबसूरत’ लघुकथा सिखाती है कि वास्तविक सुंदरता व्यक्ति के आंतरिक गुणों में होती है। ‘गंगा स्नान’ की वृद्ध महिला पारो गंगा स्नान के लिए रखे पैसे स्कूल निर्माण हेतु दान कर शिक्षा को व्यक्तिगत लाभ से अधिक महत्त्व देते हुए संदेश देती है कि सच्चा ‘गंगा स्नान’ उस सेवा में है, जो हम समाज के लिए करते हैं। धारणा, कमीज और टुकड़खोर भी गहन भावबोध की लघुकथाएँ हैं।

लघुकथा ‘कसौटी’ (रश्मि विभा त्रिपाठी) में विवाह संस्था के पारंपरिक नियमों पर प्रश्न करती एक युवा महिला की परिष्कृत सोच है। ‘मंजिलें लाँघता दर्द’ (शशि पाधा) लघुकथा में दादी और पोते के बीच का भावनात्मक सेतु है।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव की मार्मिक लघुकथा ‘इकतीसवाँ दिन’ में आज के सम्बन्धों के क्षरण का सटीक विश्लेषण है। डॉ. सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘दिखावा’ में युवा पीढ़ी का सामाजिक पाखण्ड और मानवता के प्रति एक विरोधाभासी दृष्टिकोण है।

लघुकथा (सुकेश साहनी) ‘संस्कार’ पिता-पुत्र के रिश्ते और पारिवारिक जिम्मेदारियों को दर्शाती एक गहन भावनात्मक यात्रा है, जो पहले पारिवारिक रिश्तों की उपेक्षा और फिर कर्तव्यबोध के मार्ग पर ले जाती है। ‘धुँए की दीवार’ बँटवारे और उसके परिणामों पर प्रकाश डालते हुए, अंत में पुनर्मिलन की संभावना प्रकट करती है। कथा में बेटी और चाचा के बीच का निश्छल प्रेम, बँटवारे की दीवार को भेदकर इस सकारात्मक विचार को दृढ़ करता है कि यदि प्रेम, सद्भावना हो, तो रिश्तों की दीवारें भी धुँए की तरह उड़ सकती हैं। ‘पितृत्व’ दोहरी मानसिकता को दर्शाती लघुकथा है।

लघुकथा ‘मुक्ति’ (सुदर्शन रत्नाकर) में एक बेटे के आंतरिक संघर्ष और माँ की गम्भीर मानसिक स्थिति का मनोवैज्ञानिक चित्रण है। क्या सच में मुक्ति वही थी, जो उसे चाहिए थी?

डॉ. सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘ज़िंदा का बोझ’ एक गहन सामाजिक, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। हिंसक प्रवृत्ति के पीर साहब की हत्या होने पर सारे समाज का ध्यान जाता है, जबकि बेटी तक के प्रति उसकी कामुक प्रवृत्ति का किसी को पता नहीं। हिंसा झेलते हुए पल- पल मरती गुलाबो को किसी ने नहीं देखा। ‘ज़िंदा का बोझ’ शब्द में उसका भारी मानसिक संघर्ष दबा है।  

डॉ. हरदीप कौर सन्धु की हृदयस्पर्शी लघुकथा ‘ख़ूबसूरत हाथ’ में करमो का नजरिया मातृत्व और श्रम को गरिमामय बनाता है।

‘लघुकथा यात्रा’ संग्रह पाठकों को लघुकथा की अद्भुत दुनिया में ले जाता है। एक यायावर की तरह संवदनाओं की खोज में निकली संग्रह की ये उत्कृष्ट लघुकथाएँ पाठक को उस मोड़ पर ले जाती हैं, जहाँ वह एक नए दृष्टिकोण का सामना करता है। लघुकथा के विकास, तकनीकी विश्लेषण सम्बन्धी लेख, महत्त्वपूर्ण संग्रहों की समीक्षा और अनुवाद सामग्री सहेजे अध्येताओं और शोधार्थियों को लघुकथा की अनंत संभावनाओं की मंजिल की ओर ले जाती साहित्य- जगत् की इस लघुकथा- यात्रा के सम्पादन हेतु आदरणीया ‘शैलपुत्री’ जी को साधुवाद।

Sep 1, 2024

किताबेंः मन की वीणा पर सधे संवेदना के गीत-‘गाएगी सदी’

- रश्मि विभा त्रिपाठी

‘गाएगी सदी’ (हाइकु- संग्रह) : डॉ. सुरंगमा यादव, पृष्ठ: 112, मूल्य: 320 रुपये, आईएसबीएन: 978-81-968022-9-5, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059

जिस साहित्य में पावन भावों के चन्दन की चौकी पर आदर्शों की प्राण प्रतिष्ठा हो, आशा का घट स्थापन हो, अमंगल के नाश का आह्वान हो, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की स्तुति हो, मन्थन का मंत्रोच्चार हो, जागृति की जोत जगे, नैतिकता का नीराजन हो और पूरे विश्व के कल्याण की प्रार्थना हो, रचना रचने के व्रत को धारण करने से पूर्व लिया गया यह शुभ संकल्प ही संवेदना है। 
डॉ. सुरंगमा यादव पुस्तक ने भूमिका में काव्य- संवेदना का महत्त्व रेखांकित किया है- “जीवन हो या काव्य, संवेदनायुक्त होने पर ही सार्थक है। संवेदनायुक्त काव्य ही जनवादी काव्य कहलाता है।”
उनकी इसी संवेदना का राग है- ‘गाएगी सदी’ हाइकु- संग्रह।  इस संग्रह के पाँच उपशीर्षक हैं- ढाई आखर, वक्त की धूप, हरित कथा, जग की रीत एवं सुधियों की सुरभि।
जगत् एक स्वर्णमृग के समान है, जिसकी छलना में व्यक्ति उम्रभर इधर- उधर भटकाता रहता है और अपने ही भीतर की छिपी हुई कस्तूरी को कभी ढूँढ नहीं पाता। 
ढूँढी कस्तूरी/ निज अंतर छोड़/ दुनिया पूरी। (पृष्ठ 17)
जीवन की माला में जहाँ सुख के मोती की चमक मन को खूब जुड़ाती है, वहीं दुख के मोती पर नजर पड़ते ही उसकी चौंध मन को दुखाती है, रुलाती है कि मन टूटकर बिखर जाता है। बिखराव से बचाने के लिए डॉ. सुरंगमा यादव धीरज के धागे में मन को पिरोने की युक्ति बताती हैं-
जब भी रोया/ धीरज के धागे में/ मन पिरोया। (पृष्ठ 17)
जीवन भी रेत पर लिखे नाम की तरह है जिसका अस्तित्व केवल तभी तक है, जब तक कोई लहर उस तक नहीं आती! उस लहर के आने तक भवसागर के तट पर जीवन को जीभर जी लें।
रुक लहर/ रेत पर लिखा नाम/ देखूँ जीभर। (पृष्ठ 17)
तृप्ति का बादल उमड़ उमड़कर रोम- रोम को पुलकित करता है और बरसकर तपते मन को ठहराव देता है-
तुम्हें जो पाया/ झील- सा ठहराव/ मन में आया। पृष्ठ (18)
हम प्राय: अपनी सोच के साँचे में जीवन को ढालने का प्रयास करते हैं, परन्तु जीवन उस साँचे में पूरी तरह कभी नहीं ढल पाता! 
कितना सींचे/ पत्थरों पर कब/ उगे बगीचे। (पृष्ठ 21)
कवयित्री ने चाँद का मानवीकरण एक नए ढंग से करके हाइकु की सुन्दरता में चार चाँद लगा दिए हैं। नवीन भावबोध के इस हाइकु की चमक देखिए-
पूनो को देख/ दे रहा क्लोजअप/ चाँद सलोना। (पृष्ठ 23)
इस क्लोजअप शब्द के प्रयोग से चाँद के फोटोजेनिक फेस पर अपनी अंतर्दृष्टि का कैमरा फोकस कर पूनो की रात में बादल की ओट से निकलकर आए चाँद का एक सुन्दर चित्र सुरंगमा जी ने क्लिक किया है।
मन की पीर/ संवेदना की ऊष्मा/ मिली, पिघली। (पृष्ठ 29)
संवेदना की ऊष्मा मिलते ही मन की पीर पिघल जाती है। आज इसी संवेदना के अभाव में जीव जगत जल रहा है।
धूप जब ढलती है, तो झुलसे हुए तन- मन को साँझ की बेला में राहत मिलती है; लेकिन वक्त की यह धूप जब ढलती है तो संवेदनहीनता की काली छाया आकर डराने लगती है-
साँझ की बेला/ नीड़ निहारे पंक्षी/ बैठ अकेला। (पृष्ठ 31)
जीवन की साँझ में मनुष्य पक्षी की तरह अकेला बैठा अपना नीड़ ताकता रह जाता है और जिनके लिए तिनका- तिनका चुनकर नीड़ बनाया था, वे चूजे पंख निकलते ही उसे छोड़कर उड़कर दूर चले जाते हैं।
आज के नारी सशक्तीकरण के युग में नारी की वास्तविक स्थिति का आंकलन कवयित्री ने अपने हाइकु में किया है-
चाँद को छुआ/ भू पे नारी संघर्ष/ कम न हुआ। (पृष्ठ 40)
दुर्भाग्य यह है कि धरती पर आज भी नारी का शोषण जारी है-
नन्ही- सी कली/ वासना की सेज पे/ गई मसली। (पृष्ठ 32)
नारी की स्थिति में आज भी कोई बदलाव नहीं! उसका जीवन पीड़ा का एक शपथ- पत्र है-
नारी जीवन/ एक शपथ-पत्र/ पीड़ा के नाम। (पृष्ठ 39)
इसलिए कवयित्री का नारी जाति के लिए आह्वान है-
नारी कहो न!/ क्या लता ही रहोगी?/ वृक्ष बनो ना। (पृष्ठ 42)
वह नारी को वृक्ष का सहारा लेकर खड़ी होने वाली लता बनते नहीं देखना चाहतीं बल्कि वे चाहती हैं कि नारी स्वयं एक मजबूत वृक्ष बने, जिसकी जड़ें कोई हिला न पाए।
कवयित्री ने अपने हाइकु में अपने पर्यावरण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है। लोलुप दृष्टि के वनों पर गहराने से वृष्टि लगातार घट रही है। इसका परिणाम कितना विनाशकारी होगा?
घटती वृष्टि/ वनों पे गहराई/ लोलुप दृष्टि। (पृष्ठ 44)
पाँव पसारे/ कंक्रीट आ पहुँचा/ वन के द्वारे। (पृष्ठ 59)
कंक्रीट अपने पाँव पसारते हुए वन के द्वारे तक पहुँच गया है। इसे देखकर पंक्षी व्यथित हैं। पंक्षी की व्यथा बताते अत्यंत मार्मिक हाइकु-
लेकर तृण/ कंक्रीट के वन में/ भटकें पंछी। (पृष्ठ 45)
खंभे से पूछे/ हाँफता हुआ पक्षी/ छाँव का पता। (पृष्ठ 49)
उन्हें घने कोहरे में भी सर्दी की धूप के व्यवहार में अनियमितता दिखी है। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है कि सर्दी की धूप एक कामचोर कर्मचारी की तरह है-
सर्दी की धूप/ उपस्थिति लगाके/ चली झट से। (पृष्ठ 46)
सूरज क्वारंटीन है और उसका अपने स्वभाव के विपरीत व्यवहार है-
नभ में मेघ/ क्वारंटीन सूरज/ हुआ निस्तेज। (पृष्ठ 54)
बादलों को उन्होंने नभ का सर्वे करते हुए पाया है-
बादल छाए/ नभ का सर्वे कर/ वापस चले। (पृष्ठ 58)
जीवन के तूफान से लड़ने के लिए मनुष्य को सदैव एक वृक्ष की भाँति डटकर खड़े होना चाहिए और इस तूफान में अपनी जिजीविषा का दीप कभी बुझने नहीं देना चाहिए क्योंकि जिजीविषा वह वृक्ष है जिसके ठूँठ होने पर भी उसमें फिर से नई कोंपलें निकल आती हैं और वह हरा हो जाता है-
वृक्ष हैं वही/ जो तूफान से लड़े/ आज हैं खड़े (पृष्ठ 54)
जिजीविषाएँ/ ठूँठ पर कोंपल/ निकल आए। (पृष्ठ 71)
आज के युग में रिश्तों में कुछ बचा है, तो केवल संवादहीनता, उदासीनता, तनाव और स्वार्थ-
एक ही घर/ छत और फर्श- सी/ दूरी हममें। (पृष्ठ 33)
संवादहीनता में हाइकुकार ने एक धीमे जहर की पुष्टि की है जो धीरे- धीरे रिश्तों का दम घोंट रहा है। उदासीनता ने रिश्तों की तरलता को सोखकर उन्हें बेजान बना दिया वृद्धों के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता इस हाइकु में झलकती है-
वृद्ध लाचार/ अपनों की उपेक्षा/ देह भी भार। (पृष्ठ 33)
धुँधली आँखें/ कर गया किनारा/ आँख का तारा। (पृष्ठ 34)
भाव, भाषा, छन्द की कसौटी पर कसे बिम्ब योजना, सादृश्य विधान एवं प्रतीकात्मक शैली में संवेदना के स्वर इन हाइकु की शक्ति है।   ‘गाएगी सदी’ में संवेदना के ये गीत निस्संदेह सुर, लय, ताल से प्रबुद्ध पाठक की भावनाओं को झंकृत करेंगे। ■

Jun 1, 2024

माहियाः गर्मी के धूप हुए

  - रश्मि विभा त्रिपाठी

1

अब ना वो मेल रहा

जिसको देखो वो

अब दिल से खेल रहा।

2

राहें आसान नहीं

हार मगर माने

वो तो इंसान नहीं।

3

माँ मेरा सरमाया

मैं हूँ धूप कड़ी

वो एक घना साया।

4

आँखों में सच्चाई

बस इसकी मैंने

हर बार सजा पाई।

5

कैसा ये आलम है

रिश्ते टूट रहे

तन्हाई का गम है।

6

इंसान हकीकत में

वो ही होता जो

दे संग मुसीबत में।

7

मेला पल-छिन का है

हँस लो, गा लो तुम

जीवन दो दिन का है।

8

क्या बात हुई जाने

मेरे अपने ही

बन बैठे बेगाने।

9

दिन जो भी पीहर के

जी लेती बेटी

उनमें ही जीभर के।

10

आती खुशबू प्यारी

जब- जब मैं खोलूँ

यादों की अलमारी।

11

ना दुख मन में पालो

बीती बातों पे

अब तुम मिट्टी डालो।

12

कैसे हालात हुए

अरसा बीत गया

अपनों से बात हुए।

13

दुर्दिन जब आते हैं

कौन हमारा है

हमको दिखलाते हैं।

14

गर्मी की धूप हुए

रिश्ते- नाते तो

कैसे विद्रूप हुए।

15

कैसे दिन आए हैं

अपना ना कोई

अपने बस साए हैं।

16

दो दिन का मेल नहीं

प्यार निभा पाना

बच्चों का खेल नहीं।

17

ना देख वसीयत को

तू बूढ़ी माँ की

बस देख तबीयत को।

18

आती है रोज सबा

मुझसे ये कहने

ज़िंदा रखना जज़्बा।

19

जो उसका दावा था

साथ निभाने का

वो एक छलावा था।

20

इन सारे रिश्तों में

हर पल दर्द मिला

हमको तो किश्तों में।

21

आँधी के तिनके थे?

जाने किधर गए

जो दिन बचपन के थे।

22

अब तो वो गाँव मिले

मेरे सपनों का

चल- चलके पाँव छिले।

23

सब बंद झरोखे हैं

घर- बाहर देखो

धोखे ही धोखे हैं।

24

माटी के घर कच्चे

और न दिखते हैं

इंसाँ मन के सच्चे।

Jul 1, 2023

कविताः यात्रा की थकान


 





 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

भँवर में

बुरी तरह से

फँसने पर

सर से पाँव तलक

धँसने पर

मेरी आँखों के गड्ढों में

क्यों नहीं भरा

एक बूँद भी

जल !


सुनो!

सच ये है कि

मैं

नहीं रखना चाहती

अपने पास

हार की

कोई निशानी

दिशाएँ

दोस्त बन करके

दिन- ब- दिन

मुझे समझाती रही हैं

भीड़ में रास्ता

दिखलाती रही हैं

और हमेशा ही

ये जताती रही हैं

कि

कभी न रोना

परिस्थितियों के फेर से

दिग्भ्रमित न होना


मेरी धरती माँ ने

मेरा दामन भरा

आकाश पिता ने

सर पर हाथ धरा

सूरज भाई ने

चिट्ठी में लिखकर

भेजा है पता

मुझे क्षितिज का

तो अब रश्मि को

तुम ही बताओ

क्या करे?

क्यों घबराए- डरें?


कुछ भी हो

फिर भी

नहीं रहना

पलकें भिगोकर

दुख के साथ रहकर भी

दुख के हवाले होकर

मेरा पंथ दूसरा है

भले खुरदरा है

तो भी

वहीं रुकूँगी

जहाँ

समष्टि की

एक बहती निर्झरा है


हाँ!

थक गई हूँ

खा- खाकर ठोकर

खींच रही हूँ

घायल सपनों को

तन्मयता से,

खुद को ढो- ढोकर

मेरी पसलियों पर

भले ही

पड़ रहा है

आज

अत्यधिक दबाव

पर मुझे दिख रहा है

केवल और केवल

मेरा पड़ाव


वहाँ

मील के पत्थर

मेरे स्वागताकांक्षी हैं,

यात्रा की थकान

उतार रहे हैं

वे 

मेरे घायल पाँव धोकर।

सम्पर्कः 363 द, अशोक नगर, तहसील- बाह, जिला- आगरा, उ. प्र.

May 1, 2023

दोहेः साँसों का यह साज


 - रश्मि विभा त्रिपाठी

तुम बोलो सुनती रहूँ, मधुरिम ये आवाज।

तुमसे ही तो है सधा, साँसों का यह साज।।

2

तकिया तेरी बाँह का, थपकी देते हाथ।

मेरे सुख की नींद का, कारण तेरा साथ।।

3

मेरे दुख से हो दुखी, ढूँढा तुरत निदान।

पाया तेरे रूप में, ज्यों मैंने भगवान।।

4

उल्टा पड़ता आज तो,  लू का हर इक दाँव।

तेरा प्यार मुझे हुआ, वट की प्यारी छाँव।।

5

धन- दौलत, पद, नाम की, कैसी है दरकार।

मुझको बरकत दे रहा, तेरा पावन प्यार।।

6

घोर अँधेरे में धरे, रोज दुआ के दीप।

प्रेम तुम्हारा चाँद- सा, चमका सदा समीप।।

7

इसीलिए तो कट गए,  बाधाओं के जाल।

तुमने छोड़ा ही नहीं, मेरा कभी खयाल।।

8

कैसे मिलता है तुम्हें, मेरे मन का हाल।

दूरी अपने बीच की, धरती से पाताल।।

9

सरगम मेरी साँस की, छेड़ सुनाते राग।

तुमने मन का कर दिया, हरा- भरा यह बाग।।

10

करते हो नित नेम से,  मेरी खातिर जाप।

मीत मुझे लगता नहीं, तभी समय का शाप।।

11

चुभ सकता है क्या भला, मुझको कोई शूल।

मीत तुम्हारा प्यार ये, है पूजा का फूल।।


Jan 1, 2023

कविताः दुआ का पौधा

  - रश्मि विभा त्रिपाठी

मेरे आगे

तनकर खड़ा था

क्या करती

पाँव छूने को चली

दुख मुझसे बड़ा था

अचानक

उसकी आँखों में

उतर आई खीज बड़ी

पल में टूटी अकड़

भीतर तक जल-भुन गया

और लौटना पड़ा

उसे

मुँह की खाए

अपनी हार से चिड़चिड़ाए

आदमी की तरह

करते हुए बड़-बड़, बड़-बड़

सुनो

उसने देख लिया

कि

तुमने जो रोपा था

द्वार पर

दुआ का पौधा

उसने अब कसकर

पकड़ ली है जड़।


Dec 2, 2022

किताबेंः मंत्रमुग्धा माधुर्य- भाव- धारा का मंत्रमुग्ध अवगाहन

- रश्मि विभा त्रिपाठी

पुस्तकः मंत्रमुग्धा ( काव्य- संग्रह ): डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री', पृष्ठ: 106, मूल्य: आईएसबीएन: 978 93 91378, प्रथम संस्करण: 2022 , प्रकाशक: शैलपुत्री (शैलपुत्री फाउण्डेशन), सहभागिता: जीएसएफ नेटवर्क, प्राइवेट लिमिटेड, ग्रीन पार्क एक्सटेंशन, नई दिल्ली- 110016

'मंत्रमुग्धा' काव्य-संग्रह  निर्मल भाव- भूमि से फूटा एक अद्भुत रस - निर्झर; जिससे उमंग, उल्लास, अनुराग, शुचिता, नि:संगता पूरे वेग से प्रवाहित हुई है। इस माधुर्य भाव- धारा का मंत्रमुग्ध अवगाहन अवर्णनीय है। दर्शन की विदुषी, योग- विशेषज्ञ, बहुआयामी प्रतिभा की धनी डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री' हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं के साथ- साथ जापानी विधाओं के सृजन की भी साधक बनकर साहित्य की सतत श्रीवृद्धि कर रही हैं।

हिन्दी साहित्य के विख्यात व्यंग्यकार, कवि डॉ. गोपाल बाबू शर्मा के अनुसार 'मैंने कविता का काव्य पढ़ा, सुन्दर सरस भाव, सुदृढ़ शिल्प से उसका काव्य सम्पृक्त है'

परकल्याण कामना से परिशुद्घ उनके अंत:करण से निसृत काव्य हिन्दी साहित्य की धरोहर है। निस्संदेह एक सच्चा कवि ही व्यक्ति को स्व से ऊपर उठकर सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित करने का आह्वान कर अपने साहित्यिक धर्म का यथोचित निर्वहन करता है। उनकी काव्य- शक्ति में उच्च स्तरीय साधना का संचार है जिसका अनुशीलन मन को उच्छ्वसित करता है।

प्रस्तुत पुस्तक में कविताओं के अतिरिक्त क्षणिका, हाइकु, ताँका तथा चोका संगृहीत हैं जिनमें सुगठित भाव- तत्व और प्रसाद- गुण- सम्पन्न भाषा का आभ्यंतरिक साहचर्य आद्यंत द्रष्टव्य है। शब्द- योजना में ओज एवं माधुर्य का सुन्दर समन्वय है।

संग्रह की पहली ही कविता मंत्रमुग्धा है-

सुनो मंत्रमुग्ध मीत मेरे / आज शिखर पर खड़े होकर / झाँकने का मन है- / अश्रुताल के शांत जल की / असीम गहनता युक्त घाटी में... ( पृष्ठ- 11 )

इस निर्णीत निरीक्षण में अंत: प्रकृति का बाह्य प्रकृति के साथ राग प्रतीक रूप में इंगित है।

प्रेम के बारे में असंख्य मत हैं। प्रेम क्या है? प्रेम जीवन का सार है? अथवा सार रूप में जीवन ही प्रेम है? प्रत्येक देश, काल, परिस्थिति में किए गए अनुसंधान के आधार पर जीव जगत एवं विज्ञान की अपनी अलग- अलग प्रेम विषयक परिभाषाएँ हैं।

'प्रेम' कविता में शुद्ध प्रेम की पूर्ण परिभाषा परिलक्षित है-

प्रेम है उतरना, डूबना, डूबे रहना ( पृष्ठ- 13)

वस्तुत: मन रूपी नदी में उतरकर, उसमें आकण्ठ डूबकर ही प्रेम की प्राप्ति संभाव्य है।

अगली कविता की निम्न पंक्तियाँ महत्त्वपूर्ण हैं-

हलंत विसर्ग सभी समर्पित / हुआ प्रेम- कविता का सृजन। (पृष्ठ- 17 )

प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रेम का सम्पूर्ण दर्शन हैं, जिनमें अत्यंत गूढ़ तत्व निहित है। सूक्ष्म विश्लेषण द्वारा ही इस मर्म तक पहुँचा जा सकता है कि उपरोक्त पंक्तियों में हलंत- विसर्ग व्याकरणिक तत्व मात्र ही नहीं, बल्कि सृष्टि के उत्पत्ति कारक हैं। हलंत पुरुष रूप कारक व विसर्ग स्त्री रूप कारक।

बाल्यकाल से लेकर युवावस्था तक की कहानी का सार 'आँखें गले मिलीं' कविता की निम्नांकित पंक्तियाँ हैं-

बचपन जो पुरुष न था न स्त्री / अब वह पुरुष मैं स्त्री का बंधन। ( पृष्ठ- 18 )

इसमें बढ़ते हुए बचपन के साथ बढ़ती विसंगति का बोध है।

योग- शिक्षा के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित विधि से जीने का कौशल सिखलाने वाली कवयित्री ने अपनी कविता में भी योग की हठयोग प्रणाली का बड़ा ही सुन्दर, सार्थक प्रयोग किया है-

दीपक है मेरा प्यार आँधी से संघर्ष करेगा / समर्पण की चेतना हठयोग कर बैठी। ( पृष्ठ- 24 )

डॉ.कविता का सृजन अत्यंत समृद्ध है। वे शब्दों की मुक्ता को इस रीति से गुंफित करने में प्रवीण हैं कि काव्य की वह माला बड़ी ही मनोहारिणी बन पड़ती है-

दुख में मेरे कंधे पर अपनी हथेली से / आज किया तुमने प्रेम का हस्ताक्षर। ( पृष्ठ- 26 )

मूर्त को अमूर्त और अमूर्त को मूर्त रूप में उपस्थित कर देना उनके काव्य का वैशिष्ट्य है।

चाँद का मानवीकरण करते हुए उसके टेढ़े मुखड़े के पीछे छिपे जिस सत्य का उद्घाटन हमारे सामने हुआ है, कवयित्री की सूक्ष्म निरीक्षण- वृत्ति का परिचायक है। इस नए परिप्रेक्ष्य में उस पर शायद ही अब तक किसी की दृष्टि पड़ी हो।

काश! टेढ़े मुँह वाले चाँद की सच्चाई / लोग समझ पाते / तो शायद न कहते / मेरे दुख में विकल चाँद क्यों नहीं? ( पृष्ठ- 31)

चाक्षुष बिंब के गठन व विलक्षण व्यंजना शक्ति द्वारा उन्होंने हमें चाँद की वह भावाकृति दिखा दी है जो संवेगों का प्रभावोत्पादक रूपांतर है। जैसे- खुशी में हँसते होठों का गालों तक फैल जाना, गुस्से में भौंहों का तन जाना, रोने में अजीबो-गरीब मुँह बनाना इत्यादि में से टेढ़ेपन को संवेग के सन्दर्भ में रेखांकित करना उनकी प्रखर प्रज्ञा का परिणाम है। चाँद की यह छवि एकदम न्यारी एवं नई है।

'अब अरुणोदय होगा' ( पृष्ठ 53 ) कविता आशावादी भाव की आभा बिखेरती है। जीवन में राहु-केतु की चाल से कौन अपरिचित है? वे सदैव अशुभ की कामना करने वाले व निरा दु:ख देने वाले हैं। ऐसी परिस्थिति में हम सबके हेतु सूर्य- सा तेज, चंद्रमा- सा ओज अक्षुण्ण रखने का एक उद्बोधन है यह कविता।

किसी दिन तो / फूटता तुम्हारा प्रेम / पहाड़ से छल- छल... (पृष्ठ 64 )

उपर्युक्त क्षणिका के छल- छल वाक्य में ध्वन्यात्मक- चित्रात्मक- प्रतीकात्मक संयोजन बड़ा ही उत्कृष्ट है।

पुस्तक के हाइकु- ताँका- चोका खण्ड में तीनों जापानी विधाएँ अपने प्राण तत्व के साथ प्रतिष्ठित हैं।

उदाहरण स्वरूप-

हाइकु-

प्रतीक्षारत / मैं योगिनी सी ही हूँ / तुम महेश!

जग- जंजाल / झूठा यह मधु देश / तुम विशेष।

प्रेम- प्रस्तर / अडिग रह बने / शैल- शिखर।

तू हिमधर / पवन झकोरों में / खड़ा निडर।

ताँका-

ढला बादल / नदी के आगोश में / हुआ पागल / लिये बाँहों में वह / प्रेमिका- सी सोई।

चोका-

मेघ ने धरा- / धरा पर चुम्बन / झूम बरसे। / विरहन तरसे / मिलन- राग / गाओ प्रिय फिर से। / गूँगे का गुड़ / मन कुछ यूँ हर्षे / मनुहार हो / प्रेमालाप- प्यार हो / आशा है- अम्बर से।

संग्रह में आदि से अंत तक गहन भावाभिव्यक्ति, सुगठित भाषा, सुंदर प्रतीक, सशक्त बिम्ब, ध्वन्यात्मकता, लयात्मकता तथा मानव- प्रकृति के तादात्म्य का एक समन्वित शब्द- चित्र है। यह अनूठी कलाकृति पाठक को अवश्य ही मंत्रमुग्ध करेगी।                                            

Oct 1, 2022

कविताः हथियार नहीं डालूँगी

- रश्मि विभा त्रिपाठी 

मृत पड़ा है आलोक
मुझे फिर भी नहीं है शोक
मैं साहस का दीप
तिमिर तू देख
निशा की बेला में
नित मन की देहरी पे बालूँगी
हथियार नहीं डालूँगी

मृत पढ़ी है पुष्पलता
अरी झंझा तुझे क्या है पता
मेरे प्रश्वास की पाँखुरी पर
परितोष का पराग
तू जितना झकझोरेगी
अधरों से 

उतना ही सौरभ उछालूँगी

हथियार नहीं डालूँगी

मृत पड़ा सुरेन्द्र
मेरे जीवन- समर का केन्द्र
शत्रु के षडयंत्र से
फिर भी बाधित नहीं
मेरी पीठ पर बिंधे बाण
पौरुष के नहीं
ये नपुंसकता के हैं प्रमाण
लहूलुहान सत्य के लिए 
जब तक संजीवनी नहीं पा लूँगी
हथियार नहीं डालूँगी!

आगरा, उत्तर प्रदेश

Jul 1, 2022

चोकाः मन्नत के जो धागे

- रश्मि विभा त्रिपाठी


मेरी खातिर

नित नेम से बाँधे

हर पहर

मन्नत के जो धागे

दुख सारे ही

दुम दबाके भागे

उन धागों में

मेरा सुख अकूत

पिरोके तूने

आँसू से मन्त्रपूत

कर दिया है

चली टटोलने को

चिंता की नब्ज

छूकर मेरा माथा

एक पल में

धगड़कर गाँठ

धीरे से कसी

आँचल के छोर में

खुद-ब-खुद

खुल गईं बेड़ियाँ

उन्मुक्त उड़ी

साँझ या कि भोर में

आस का नभ

चूमूँ हो विभोर मैं

न कभी बही

हार की हिलोर में

कब सहमी

सन्नाटे के शोर में

मेरे सर से

'सेरा' उसारकर

आधि- व्याधि को

फेंका उतारकर

मेरी अक्सीर

तेरे पोर- पोर में

जगाते भाग

माँ तेरे ये दो हाथ

दुआ से दिन- रात।

('सेरा' अर्थात अनाज का वह थोड़ा भाग, जो माँ अपनी संतान की सलामती के लिए उसके सर के ऊपर सात बार घुमाकर अलग रख देती है दान के हित)