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Aug 1, 2024

लघुकथाः पानी की जाति

  -  विष्णु प्रभाकर

बी.ए. की परीक्षा देने वह लाहौर गया था। उन दिनों स्वास्थ्य बहुत ख़राब था। सोचा, प्रसिद्ध डॉ. विश्वनाथ से मिलता चलूँ। कृष्णनगर से वे बहुत दूर रहे थे। सितम्बर का महीना था और मलेरिया उन दिनों यौवन पर था। वह भी उसके मोहचक्र में फँस गया। जिस दिन डॉ. विश्वनाथ से मिलना था, ज्वर काफ़ी तेज़ था। स्वभाव के अनुसार वह पैदल ही चल पड़ा, लेकिन मार्ग में तबीयत इतनी बिगड़ी कि चलना दूभर हो गया। प्यास के कारण, प्राण कंठ को आने लगे। आसपास देखा, मुसलमानों की बस्ती थी। कुछ दूर और चला, परन्तु अब आगे बढ़ने का अर्थ ख़तरनाक हो सकता था। साहस करके वह एक छोटी-सी दुकान में घुस गया। गांधी टोपी और धोती पहने हुए था।

दुकान के मुसलमान मालिक ने उसकी ओर देखा और तल्ख़ी से पूछा—"क्या बात है?"

जवाब देने से पहले वह बेंच पर लेट गया। बोला—"मुझे बुखार चढ़ा है। बड़े ज़ोर की प्यास लग रही है। पानी या सोडा, जो कुछ भी हो, जल्दी लाओ!"

मुस्लिम युवक ने उसे तल्ख़ी से जवाब दिया—"हम मुसलमान हैं।"

वह चिनचिनाकर बोल उठा—"तो मैं क्या करूँ?"

वह मुस्लिम युवक चौंका। बोला—"क्या तुम हिन्दू नहीं हो? हमारे हाथ का पानी पी सकोगे?"

उसने उत्तर दिया—"हिन्दू के भाई, मेरी जान निकल रही है और तुम जात की बात करते हो। जो कुछ हो, लाओ!"

युवक ने फिर एक बार उसकी ओर देखा और अन्दर जाकर सोडे की एक बोतल ले आया। वह पागलों की तरह उस पर झपटा और पीने लगा।

लेकिन इससे पहले कि पूरी बोतल पी सकता, उसे उल्टी हो गई और छोटी-सी दुकान गन्दगी से भर गई, लेकिन उस युवक का बर्ताव अब एकदम बदल गया था। उसने उसका मुँह पोंछा, सहारा दिया और बोला—"कोई डर नहीं। अब तबीयत कुछ हल्की हो जाएगी। दो-चार मिनट इसी तरह लेटे रहो। मैं शिंकजी बना लाता हूँ।"

उसका मन शांत हो चुका था और वह सोच रहा था कि यह पानी, जो वह पी चुका है, क्या सचमुच मुसलमान पानी था?

May 15, 2020

दो लघुकथाएँ

1. फ़र्क
 -विष्णु प्रभाकर 
उस दिन उसके मन में इच्छा हुई कि भारत और पाक के बीच की सीमारेखा को देखा जाए, जो कभी एक देश था, वह अब दो होकर कैसा लगता है? दो थे तो दोनों एक-दूसरे के प्रति शंकालु थे। दोनों ओर पहरा था। बीच में कुछ भूमि होती है जिस पर किसी का अधिकार नहीं होता। दोनों उस पर खड़े हो सकते हैं। वह वहीं खड़ा था, लेकिन अकेला नहीं था-पत्नी थी और थे अठारह सशस्त्र सैनिक और उनका कमाण्डर भी। दूसरे देश के सैनिकों के सामने वे उसे अकेला कैसे छोड़ सकते थे! इतना ही नहीं, कमाण्डर ने उसके कान में कहा, "उधर के सैनिक आपको चाय के लिए बुला सकते हैं, जाइएगा नहीं। पता नहीं क्या हो जाए? आपकी पत्नी साथ में है और फिर कल हमने उनके छह तस्कर मार डाले थे।"
उसने उत्तर दिया,"जी नहीं, मैं उधर कैसे जा सकता हूँ?" और मन ही मन कहा-मुझे आप इतना मूर्ख कैसे समझते हैं? मैं इंसान, अपने-पराए में भेद करना मैं जानता हूँ। इतना विवेक मुझ में है।
वह यह सब सोच रहा था कि सचमुच उधर के सैनिक वहाँ आ पहुँचे। रौबीले पठान थे। बड़े तपाक से हाथ मिलाया।
उस दिन ईद थी। उसने उन्हें 'मुबारकबाद' कहा। बड़ी गरमजोशी के साथ एक बार फिर हाथ मिलाकर वे बोल-- "इधर तशरीफ लाइए। हम लोगों के साथ एक प्याला चाय पीजिए।"
इसका उत्तर उसके पास तैयार था। अत्यन्त विनम्रता से मुस्कराकर उसने कहा.. "बहुत-बहुत शुक्रिया। बड़ी खुशी होती आपके साथ बैठकर, लेकिन मुझे आज ही वापस लौटना है और वक्त बहुत कम है। आज तो माफ़ी चाहता हूँ।"
इसी प्रकार शिष्टाचार की कुछ बातें हुई कि पाकिस्तान की ओर से कुलांचें भरता हुआ बकरियों का एक दल, उनके पास से गुज़रा और भारत की सीमा में दाखिल हो गया। एक-साथ सबने उनकी ओर देखा। एक क्षण बाद उसने पूछा.. "ये आपकी हैं?"
उनमें से एक सैनिक ने गहरी मुस्कराहट के साथ उत्तर दिया-- "जी हाँ, जनाब! हमारी हैं। जानवर हैं, फर्क करना नहीं जानते।"
2. पानी

बी.ए. की परीक्षा देने वह लाहौर गया था। उन दिनों स्वास्थ्य बहुत ख़राब था। सोचा, प्रसिद्ध डा. विश्वनाथ से मिलता चलूँ। कृष्णनगर से वे बहुत दूर रहे थे। सितम्बर का महीना था और मलेरिया उन दिनों यौवन पर था। वह भी उसके मोहचक्र में फँस गया। जिस दिन डा. विश्वनाथ से मिलना था, ज्वर काफी तेज़ था। स्वभाव के अनुसार वह पैदल ही चल पड़ा, लेकिन मार्ग में तबीयत इतनी बिगड़ी कि चलना दूभर हो गया। प्यास के कारण, प्राण कंठ को आने लगे। आसपास देखा, मुसलमानों की बस्ती थी। कुछ दूर और चला, परन्तु अब आगे बढ़ने का अर्थ ख़तरनाक हो सकता था। साहस करके वह एक छोटी-सी दुकान में घुस गया। गाँधी टोपी और धोती पहने हुए था।
दुकान के मुसलमान मालिक ने उसकी ओर देखा और तल्खी से पूछा-- "क्या बात है?"
जवाब देने से पहले वह बेंच पर लेट गया। बोला.. "मुझे बुखार चढ़ा है। बड़े ज़ोर की प्यास लग रही है। पानी या सोडा, जो कुछ भी हो, जल्दी लाओ!"
मुस्लिम युवक ने उसे तल्खी से जवाब दिया-- "हम मुसलमान हैं।"
वह चिनचिनाकर बोल उठा.. "तो मैं क्या करूँ?"
वह मुस्लिम युवक चौंका। बोला-- "क्या तुम हिन्दू नहीं हो? हमारे हाथ का पानी पी सकोगे?"
उसने उत्तर दिया-- "हिन्दू के भाई, मेरी जान निकल रही है और तुम जात की बात करते हो। जो कुछ हो, लाओ!"
युवक ने फिर एक बार उसकी ओर देखा और अन्दर जाकर सोडे की एक बोतल ले आया। वह पागलों की तरह उस पर झपटा और पीने लगा।
लेकिन इससे पहले कि पूरी बोतल पी सकता, उसे उल्टी हो गई और छोटी-सी दुकान गन्दगी से भर गई, लेकिन
उस युवक का बर्ताव अब एकदम बदल गया था। उसने उसका मुँह पोंछा, सहारा दिया और बोला.. "कोई डर नहीं। अब तबीयत कुछ हल्की हो जाएगी। दो-चार मिनट इसी तरह लेटे रहो। मैं शिंकजी बना लाता हूँ।"
उसका मन शांत हो चुका था और वह सोच रहा था कि यह पानी, जो वह पी चुका है, क्या सचमुच मुसलमान पानी था? 

Apr 16, 2014

रहमान का बेटा

रहमान का बेटा
- विष्णु प्रभाकर
 क्रोध और वेदना के कारण उसकी वाणी में गहरी तलखी आ गई थी और वह बात-बात में चिनचिना उठना था। यदि उस समय गोपी न आ जातातो संभव था कि वह किसी बच्चे को पीट कर अपने दिल का गुबार निकालता। गोपी ने आ कर दूर से ही पुकारा - 'साहब सलाम भाई रहमान। कहो क्या बना रहे हो?' रहमान के मस्तिष्क का पारा सहसा कई डिग्री नीचे आ गयायद्यपि क्रोध की मात्रा अभी भी काफी थीबोला, 'आओ गोपी काका। साहब सलाम।'
 'बड़े तेज होक्या बात है?' गोपी बैठ गया। रहमान ने उसके सामने बीड़ी निकाल कर रखी और फिर सुलगा कर बोला - 'क्या बात होगी काका! आजकल के छोकरों का दिमाग बिगड़ गया है। जाने कैसी हवा चल पड़ी है। माँ-बाप को कुछ समझते ही नहीं।गोपी ने बीड़ी का लंबा कश खींचा और मुस्करा कर कहा - 'रहमानबात सदा ही ऐसी रही है। मुझे तो अपनी याद है। बाबा सिर पटक कर रह गएमगर मैंने चटशाला में जा कर हाजिरी ही नहीं दी। आज बुढ़ापे में वे दिन याद आते हैं। सोचता हूँदो अच्छर पेट में पड़ जाते तो...बीच में बात काट कर रहमान ने तेजी से कहा - 'तो काकानशा चढ़ जाता। अच्छरों में नाज से ज्यादा नशा होवे हैयह दो अच्छर का नशा ही तो है जो सलीम को उड़ाए लिए जावे है। कहवे है इस बस्ती में मेरा जी नहीं लगे। सब गंदे रहते हैं। बात करने की तमीज नहीं। चोरी से नहीं चूकें...'
गोपी चौंक कर बोला - 'सलीम ने कहा ऐसे?' 'जी हाँसलीम ने कहा ऐसे और कहाहम इंसान नहीं हैंहैवान हैं। फिर हम जैसे नाली में कीड़े बिलबिलाए हैं नउसी तरह की हमारी जिंदगी है….' कहते-कहते रहमान की आँखें चढ़ गईं। बदन काँपने लगा। हुक्के को जिसे उसने अभी तक छुआ नहीं थाइतने जोर से पैर से सरकाया कि चिलम नीचे गिर पड़ी और आग बिखर कर चारों ओर फैल गई। तेजी से पुकारा - 'करीमन! ओ हरामजादी करीमन! कहाँ मर गई जा करले जा इस हुक्के को। साला आज हमें गुंडा कहवे है...गोपी ने रहमान की तेजी देख कर कहा - 'उसका बाप स्कूल में चपरासी था न!'जी हाँवही असर तो खराब करे है। पढ़ा नहीं था तो क्याहर वक्त पढ़े-लिखे के बीच रहवे था। मगर साले ने किया क्याभरी जवानी में पैर फैला कर मर गया। बीवी को कहीं का भी नहीं छोड़ा। न जाने किसके पड़तीवह तो उसकी माँ ने मेरे आगे धरना दे दिया। वह दिन और आज का दिनसिर पर रखा है। कह दे कोई,सलीम रहमान की औलाद नहीं है। पर वह बात है काका...आगे जैसे रहमान की आँख में कहीं से आ कर कुणक पड़ गई। जोर-जोर से मलने लगा। उसी क्षण शून्य में ताकते-ताकते गोपी ने कहा - 'सलीम की माँ बड़ी नेकदिल औरत है।'
रहमान एकदम बोला - 'काकाफरिश्ता है। ऐसी नेकदिल औरत कहाँ देखने को मिले है आजकल। क्या मजाल जो कभी पहले शौहर का नाम लिया हो! ऐसी जी-जान से खिदमत करे है कि बस सिर नहीं उठता। और काका उसी का नतीजा है। तुमसे कुछ छुपा है। कभी इधर-उधर देखा है मुझे?'
गोपी ने तत्परता से कहा - 'कभी नहीं रहमानमुँह देखे की नहीं ईमान की बात है। पाँच पंचों में कहने को तैयार हूँ।'और रही चोरी की बात! किसी के घर डाका मारने कौन जावे है। यूँ खेत में से घास-पात तुम भी लावो ही हो काका।गोपी बोला - 'हाँ लावूँ हूँ। इसमें लुकाव की क्या बात है। और लावें क्यों नहम क्या इतने से भी गएबाबू लोग रोज जेब भर कर घर लौटे हैं। सच कहूँ रहमान! तनखा बाँटते वक्त अँगूठा पहले लगवा लेवे हैं और पैसों के वक्त किसी गरीब को ऐसी दुत्कार देवें कि बिचारा मुँह ताकता रह जावे है। इस सत्यानाशी राज में कम अंधेर नहीं है। पर बेमाता ने हमारी सरकार की किस्मत में न जाने क्या लिख दिया हैदिन-रात चौगुनी तरक्की होवे है। गाँधी बाबा की कुछ भी पेश नहीं आवे।रहमान ने सारी बातें बिना सुने उसी तेजी से कहा - 'बाबू क्योंवे जो अफसर होते हैंसाब बहादरवे क्या कम हैंकिसी चीज पर पैसा नहीं डालें हैं। और काका! यह कल का छोकरा सलीम हमें गुंडा बतावे है। गुंडे साले तो वे हैं। सच काका! कलब में सिवाय बदमाशी के वे करें क्या हैं। शराब वे पिएँजुआ वे खेलें और...।'और क्याहमारे साब के पास आए दिन कलब का चपरासी आवे है। कभी सौकभी डेढ़ सौसदा हारे ही हैंपर रहमानउसकी मेम बड़ी तकदीर की सिकंदर है। जब जावे तब सौ-सवा सौ खींच लावे है। 'मेम साब... काकातुम क्या जानो। उसकी बात और है। जितने ये साब बहादुर हैंऔर साब क्योंबड़े-बड़े वकीलबलिस्टरलालासभी आजकल कलब जावे हैं। मुसलमान को शराब पीना हराम हैपर वहाँ बैठ कर विस्कीजिनपोरटसेरी सब चढ़ा जावे हैं। औरतें ऐसी गिर गई हैं कि पराए मरद के कमर में हाथ डाल कर लिए फिरे हैंऔर वे हँस-हँस कर खिलर-खिलर बातें करे हैं। काका! जितनी देर वे वहाँ रहवे हैंये यही कहते रहे हैं - उसकी बीवी खूबसूरत है। इसकी जोरदार है। सरमा खुशकिस्मत हैरफीक की लौंडिया उसके घर जावे। गुप्ता की बीवी उसके पास रहे है। सारा वक्त यही घुसर-पुसर होती रहे और मौका देख कोई किसी के साथ उड़ चला। उस दिन जीत की खुशी में ड्रामा हुआ था। पुलिस के कप्तान लालाजी बने थे। वे लालाजी लोगों को हँसाते रहे और मेजर साहब उनकी बीवी को ले कर डाक बँगले की सैर करने चले गए। ये हैंबड़े लोगन की चाल-चलन। ये हमारे आका... हमारे भाग की लकीर इन्हीं की कलम से खिंचे है।'
गोपी ने फिर जोर से बीड़ी का कश खींचा और गंभीरता से कहा - 'रहमान! देखने में जितना बड़ा हैअसल में वह उतना छोटा।'और खोटा भी।'और क्या।'ओर इन्हीं के लिए सलीम हमें बदतमीजबदसहूरबेअकलन जाने क्या कहवे है। मैंने भी सोच लिया हैआज उससे फैसला करके रहूँगा। मैंने हमेशा उसे अपना समझा है। नहीं तो... नहीं तो...।'
गोपी ने अब अपना डंडा उठा लिया। बोला - 'रहमानकुछ भी होसलीम तेरा ही लड़का माना जावे हैजवान हैअबे-तबे से न बोलना। समझाआजकल हवा ऐसी चल पड़ी है। और चली कब नहीं थी! फरक इतना हैपहले मार खा कर बोलते नहीं थेअब सीधे जवाब देवे हैं...'
रहमान तेज ही था। कहा - 'मैं उसके जवाबों की क्या परवा करूँ काका। जावे जहन्नुम में। मेरा लगे क्या है? ...और काका। मैं उसे मारूँगा क्यों। मेरे क्या हाथ खुले हैं। मैं तो उससे दो बात पूछूँगारास्ता इधर या उधर। और काकामुझे उस साले की जरा भी फिकर नहीं - फिकर उसकी माँ की है। यूँ तो औलाद और क्या कम हैं,पर जरा यही कुछ सहूरदार था... काकासोचता था पढ़-लिख कर कहीं मुंशी बनेगाजात-बिरादरी में नाम होगा। लेकिन लिखा क्या किसी से मिटा है?'
 गोपी बोला - 'हाँ रहमान। लिखा किसी से नहीं मिटा! अब चाहे तो मालिक भी नहीं मेट सकता। ऐसी गहरी लकीर बेमाता ने खींची है। सो भइया अपने इज्जत अपनी हाथ है। ज्यादा कुछ मत कहना। पढ़ों-लिखों को गैरत जल्दी आ जावे है। समझा...।'
'समझा काका।और फिर गोपी डंडा उठाघास की गठरी कंधे पर डालसाहब सलाम करके चला गया। रहमान कुछ देर वहीं शून्य में बैठा धुँधले होते वातावरण को देखता रहा। मन में उमड़-घुमड़ कर विचार आते और आपस में टकरा कर शीघ्रता से निकल जाते। वे झील के गिरते पानी के समान थेगहरे और तेज। इतने तेज कि उफन कर रह जाते। उनका तात्कालिक मूल्य कुछ नहीं थाइसीलिए उससे मन की झुँझलाहट और गहरी होती गई। करुणा और विषाद कोई उसे कम नहीं कर सका। आखिर वह उठा और अंदर चला गया।
घर में सन्नाटा था। बच्चे अभी तक खेल कर नहीं लौटे थे। उसकी बीवी रोटियाँ सेंक रही थी। सालन की खुशबू उसकी नाक में भर उठी। उसने एक नजर उठा कर अपनी बीवी को देखा - शांत-चित्त वह काम में लगी है। उसके कानों में लंबे बाले रोटी बढ़ाते समय वेग से हिलते हैं। उसके सिर का गंदा कपड़ा खिसक कर कंधे पर आ पड़ा है। यद्यपि जवानी बीत गई हैतो भी चेहरे का भराव अभी हल्का नहीं पड़ा है। गोरी न हो कर भी वह काली नहीं है। उसकी आँखों में एक अजीब नशा है। वही नशा उसे बरबस खूबसूरत बना देता है। जिसकी ओर वह देख लेती है एक बारतो वह ठिठक जाता है। रहमान सहसा ठिठका - उन दिनों इन्हीं आँखों ने मुझे बेबस बना दिया था। नहीं तो... सहसा उसे देख कर उसकी बीवी बोल उठी - 'इतने तेज क्यों हो रहे थे। गैरों के आगे क्या इस तरह घर की बात कहते हैं?' रहमान कुछ तलखी से बोला - 'गैरों के आगे क्यापानी अब सर से उतर गया है। कल को जब घर से निकल जावेगातब क्या दुनिया कानों में रुई ठूँस लेगी या आँखें फोड़ लेगी?' बीवी को दुख पहुँचा। बोली - 'बाप-बेटे क्या दुनिया में कभी अलग नहीं होते?' 'कौन कहे कि वह मेरा बेटा है?' 'और किसका है?' 'मैं क्या जानूँ?' 'जरा देखना मेरी तरफ! मैं भी तो सुनूँ।'
 तिनक कर उसने कहा - क्या सुनेगीमेरा होता तो क्या इस तरह कहताजबान खींच लेता साले की।'देखूँगी किस-किसकी जबान खींचोगे। अभी तक तो एक भी बात नहीं सराहता।'बच्चे और जवान बराबर होते हैं।'नहीं होवें पर पूत के पाँव पालने में नजर आ जावे है। और फिर वही कौन-सा जवान हैअल्हड़ उमर है। एक बात मुँह से निकल गईतो सिर पर उठा लिया। तुम्हारा नहीं तभी तो। अपना होतातो क्या इस तरह ढोल पीटते। अपनों के हजार ऐब नजर नहीं आवे है। दूसरों का एक जरी-सा पहाड़ बन जावे है...रहमान कुछ भी होइतना मूर्ख नहीं था। उसने समझ लियाउसने बीवी के दिल को दुखाया हैपर वह क्या करे। सलीम से उसे क्या कम मुहब्बत है! पेट काट कर उसे रहमान ने ही तो स्कूल भेजा है। उसके लिए अब भी कभी बड़े बाबूकभी डिप्टीकभी बड़े साहब के आगे गिड़गिड़ाता रहता है। इतनी गहरी मुहब्बत हैतभी तो इतना दुख है। कोई गैर होता तो...। तभी उसके चारों बच्चे बाहर से शोर मचाते हुए आ पहुँचे। वे धूल-मिट्टी से लिथड़े पड़े थे। परंतु गंदे और अर्द्धनग्न होने पर भी प्रसन्न थे। सबसे बड़ी लड़की लगभग बारह वर्ष की थी। आते ही खुशी-खुशी बोली - 'अम्मी! आज हम भइया की जगह गए थे।रहमान को कुछ अचरज हुआपर वह जला-भुना बैठा था। कड़क कर बोला - 'कहाँ गई थी चुड़ैल?' लड़की सहम गई। घबरा कर बोली - 'भइया की जगह।'कौन-सी जगह?' 'जहाँ भइया जाते हैं। दूर...।छोटा लड़का जो दस बरस का थाअब एकदम बोला - 'अब्बावहाँ बहुत सारे आदमी थे।तीसरा भी आठ बरस का लड़का। आगे बढ़ आयाकहा - 'वहाँ लेक्चर हुए थे।रहमान अचकचाया - 'लेक्चर?' लड़की ने कहा - 'हाँअब्बा! लेक्चर हुए थे। भइया भी बोले थे। लोगों ने बड़ी तालियाँ पीटीं।अम्मा का मुख सहसा खिल उठा। गर्व से एक बार उसने रहमान को देखा। फिर बोली - 'क्या कहा उसने?' लड़की जो मुरझा चली थीअब दुगने उत्साह से कहने लगी - 'अम्मीभइया ने बहुत-सीबातें कही थीं। हम गंदे रहते हैंहम अनपढ़ हैंहम चोरी करते हैं। हमें बोलना नहीं आता। हमें खाने को नहीं मिलता।रहमान चिहुँक कर बोला - 'देखा तुमने।बीवी ने तिनक कर कहा - 'सुनो तो। हाँऔर क्या लाली?' लड़का बोला - 'मैं बताऊँ अम्मी! भइया ने कहा थाइसमें हमारा ही कसूर है।'हाँ,' लड़की बोली - 'उन्होंने कहा थाबड़े लोग हमें जान-बूझ कर नीचे गिराते जावे हैं और हम बोलें ही नहीं।और फिर अब्बा की तरफ मुड़ कर बोली - 'क्यों अब्बावे लोग कौन हैं?' अब्बा तो बुत बने बैठे थेक्या कहते?' लड़का कहने लगा - 'अब्बा! और जो उनमें बड़े आदमी थेसबने यही कहा - हम भी आदमी हैं। हम भी जिएँगे। हम अब जाग गए हैं।अम्मी ने एक लंबी साँस खींची। चेहरा प्रकाश से भर उठा - 'सुनते हो सलीम की बातें।रहमान अब भी नहीं बोला। लड़की बोली - 'और अम्मी। भइया ने मुझसे कहा था कि मैं अब घर नहीं आऊँगा।'नहीं आएगा?' 'हाँअम्मी।रहमान की निद्रा टूटी - 'क्यों नहीं आएगाक्योंकि हम गंदे...?' 'नहीं अब्बा!लड़की आप ही आप कुछ गंभीरता से बोली - 'भइया ने मुझसे कहा था कि अब इस घर में नहीं रहूँगा। नया घर लूँगाबहुत साफ। अब्बा से कह दीजो कि वहाँ रहने से गड़बड़ हो सकती है। हम लोगों के पीछे पुलिस लगी रहती है। वहाँ आएगी तो शायद अब्बा की नौकरी छूट जावेगी...?' लेकिन अब्बा हों तो बोलें। उनके तो सिर में भूचाल आ गया है। वह घूम रहा हैरुकता नहीं...

Aug 25, 2011

नागफाँस

नागफाँस
- विष्णु प्रभाकर
सुशील की मां अक्सर कहा करती थी और अक्सर क्या, अब तो कहने के लिए उनके पास एकमात्र यही कहानी शेष रह गयी थी, लम्बी सांस खींचकर, गर्व और वेदना भरे स्वर में वह कहती, 'भगवान की कृपा से उसने चौदह पुत्रों को जन्म
दिया था।'
सुनने वालियों की आंखों में कौतूहल साकार हो उठता। कोई वाचाल पूछ बैठती, 'चौदह पुत्र! पर मां जी, अब तो केवल
दो हैं।'
'हां बेटी। देखने के लिए ये ही दो हैं। वैसे मेरे चार बेटे दिसावर रहते हैं।'
'अच्छा, कमाने के लिए गए हैं?'
'हां, कमाते ही होंगे।'
'क्यों, कुछ भेजते नहीं?'
'भेजना! उन्होंने तो जाकर इधर देखा भी नहीं।'
'हाय रे! कैसे बेटे हैं,' वह वाचाल नारी कांप उठती, 'पर मांजी तुम्हें उनका पता तो होगा?'
सुशील की मां उसी सहज वेदना भरे स्वर में बोली, 'पता बताया ही नहीं तो कैसे जान सकती हूं। वे चारों तो ऐसे गए कि जैसे थे ही नहीं।'
'शेष।'
'राम को प्यारे हुए।'
'ओह...।'
'क्या बताऊं, बेटी। ये दो बचे हैं। कुशल का स्वभाव भी ऐसा ही था- कई बार भागने को हुआ। पर उस पर मैंने बड़ी मिन्नतें मानीं, जात, बोली, चढ़ावे चढ़ाए तब कहीं जाकर देवी की कृपा से रुका है।'
इस पर प्राय: सभी नारियां उसे एक ही सलाह देतीं, 'कुशल का विवाह कर दो मांजी। विवाह का बंधन आदमी को बड़ा प्यारा लगता है। आजकल देर से विवाह करने की जो रीति चल पड़ी है उस कारण भी सत्ता हाथ से निकल जाती है।'
सुशील की मां ने भी यही बात सोच रखी थी। उसके चारों बेटे सगाई कराने से पहले ही भाग गए थे। इसलिए कुशल की सगाई के लिए धूमधाम शुरु हुई और एक दिन धूप-सी गोरी लड़की देखकर उसे तिलक चढ़ा दिया गया। फिर लगन आया और विवाह की तिथि निश्चित हो गई। कुशल ने एक बार भी आपत्ति नहीं की बल्कि सब काम प्रसन्नचित्त करता रहा। सुशील की मां को त्रिलोक का राज मिला। उसने सुशील के पिता से कहा, 'यह दिन बड़े पुण्य से देखने को मिला है। मैं मन की निकाल कर रहूंगी।'
लाला चंद्रसेन निम्न मध्यवर्ग के व्यक्ति थे। यह वर्ग अक्सर महापुरुषों को जन्म देता है। यही वर्ग बड़ी- बड़ी आशाओं और आकांक्षाओं को लेकर जन्म लेता है, परंतु साधन के अभाव में घुटी हुई तमन्नाओं का मजार बन कर रह जाता है। यही है संघर्षों की क्रीड़ाभूमि और यहीं पर आदमी समझ से संपर्क स्थापित करता है। लाला चंद्रसेन भी समझदार थे और इसी समझदारी को आगे बढ़ाने के लिए उनके पुत्रों ने घर की संकुचित दीवारें तोड़कर खुले विश्व में आश्रय लिया था। पुत्रों के जाने का दर्द उन्हें भी था, पर पुरुष थे, पिता थे। पत्नी की बात सुनकर वे हंसे, 'मैं कब मना करता हूं।'
सच तो यह है उनके भीतर भी आकांक्षाएं आग्रह कर रही थीं। पहला विवाह है, ऐसा हो जिसे सब याद रखें। इसलिए उन्होंने बढिय़ा अंग्रेजी बाजे का आर्डर दिया। भोज की व्यवस्था देश की हालत को देखते हुए सीमित थी, परंतु जितनी थी उससे बड़े- बड़े धनियों को ईष्र्या हो सकती थी। मीठी तश्तरी में बड़ी- बड़ी आठ मिठाइयां। पूरे पाव भर तोल की नमकीन तश्तरी। डालडा के युग में उन्होंने गांव- गांव घूमकर घी इकट्ठा किया था। वे कहते, 'या तो करो नहीं। करो तो ऐसा करो कि याद ही आती रहे।'
भोज का दिन आया। सब कुछ तैयार था। केवल साग बनने थे और कचौरियां उतरनी थीं। मुंह अंधेरे से ही हलवाइयों ने शोर मचाया। अन्दर से और भी वेग से हल्दी चढ़ाने का कोलाहल उठा। लालाजी ने आकर कहा, 'अरे भई ! क्या देर है? मसाला निकालो और सबको साग काटने पर बैठा दो।'
उतने ही वेग से सुशील की मां चीखी, 'अजी कुशल को भेजो, हल्दी चढ़ानी है।'
'ओ हो भाई, कितनी देर हैं?'
'देर कुशल की है। उसे भेजो, बस।'
'कुशल कहां है?' 'कुशल यहां था।', 'कुशल वहां होगा।' वह क्षण भर से एक गगनभेदी कोलाहल उठा। ऐसा कि हल्दी और हलवाई की आवाज उसमें डूबकर रह गई। उसी में डूब गया कुशल। बहुद देर बात पता लग पाया कि वह पिछली रात को ही कहीं चला गया है। उसके बिस्तरे पर एक पत्र पाया गया था। पढऩे से पूर्व मां समझ गयी कि कुशल भी भाईयों की राह का राही बना। वह रोई नहीं, एक आंसू भी नहीं आया आंखों में। लोगों ने कहा, 'ढूंढ़ों।'
लाला चंद्रसेन धीरे से बोले, 'व्यर्थ है।'
'क्यों?'
'जो रहना नहीं चाहता उसे रोकने की चेष्ठा करना उसे और खोना है।'
सुनकर सब स्तम्भित हो आए। वे जैसे अपने से बोलते हों, 'मैंने गलती की जो उसे बांधना चाहा।' उससे कहता, 'बेटा! तू भी जा, दुनिया को देख, पहचान। मेरा जो कत्र्तव्य था वह मैंने यथाशक्ति पूरा कर दिया। पाल- पोस तुझे सोचने समझने योग्य बना दिया।'
सुशील की मां ने यह सब सुना तो तड़प उठी, बोली, 'आखिर वे तुम्हारे ही बेटे तो हैं।'
'मेरे।' वे हंसे, 'मेरा तो मैं भी नहीं हूं वे क्या होते।'
बहस आगे बढ़ी और आंसुओं की अबाध गति से उसका अंत हुआ। अन्त हुआ यह कहना गलत है। अंतिम छोर की तरह उनका सबसे छोटा बेटा सुशील अभी शेष था। पंद्रह वर्ष का सुन्दर बालक सेब की तरह लाल और फूल की तरह खिला हुआ था। उसकी हंसी में सुगंध था, पर बड़े भाई तिलक के दिन उसे जो ज्वर चढ़ा था वह उतरने से बराबर इंकार कर रहा था। विवाह में लगे हुए परिवार में उसे कोई बहुत महत्व नहीं दिया गया पर अब जब हल्दी और हलवाई की बात फैलकर मिट गई तो मां ने सुशील की पट्टी का सहारा लिया। देखा- संध्या होते- होते उसका सेब सा लाल मुख अंगार सा दहक उठा है। आंखें मुंदी जाती हैं।
तब पछाड़ खाकर मां ने डाक्टर का दामन पकड़ा, 'डॉक्टर, मेरा सब कुछ ले लो पर इसे बचा दो।'
सांत्वना भरे स्वर में डॉक्टर बोला, 'घबराइए नहीं बुखार है। वक्त पर उतरेगा।'
'उतर जाएगा?' पागल सी मां ने पूछा।
'हां- हां'
'कब?'
'यही सात आठ दिन में।'
लेकिन आठ क्या, अट्ठाईस दिन बीत जाने पर भी बुखार ने जाने का नाम नहीं लिया। एक बार बीच में लगा सा था कि बुखार टूट चला है पर तीसरे दिन ही उसने दूने वेग से आक्रमण कर दिया। मां रोते- रोते संज्ञाहीन-सी हो गयी। डॉक्टर मनुष्य था, उसने मां की करुणा को समझा। बोला, 'मां, यह बुखार इकहत्तर दिन तक चलता रह सकता है। इसकी दवा कुछ नहीं होती,
केवल रोगी की देखभाल से ठीक होता है।'
मां ने कहा, 'आप जैसे कहते हैं वेसे ही मैं करती हूं।'
'ठीक है। अभी और करे जाइये आजकल में बुखार टूटने ही वाला है। प्रसन्न रहिए और रोगी को प्रसन्न रखिए, जानता हूं यह कठिन है पर यह भी जानता हूं कि बेटे के लिए आप सब कुछ कर सकती है। चार - पांच दिन की बात है।'
डॉक्टर ने ठीक कहा था। पांचवे दिन बुखार टूट गया। सुशील जितना शरीर से स्वस्थ था, मन भी उसका उतना ही दृढ़ था। रंग लौटते देन न लगी। मां का मन खिल- खिल आया। पिता की चिंता भी कम हुई। सुशील ने बीमारी में ही पिता से प्रतिज्ञा करवा ली थी कि स्वस्थ हो जाने पर उसे कालेज भेजेंगे। सो अच्छा होते- होते एक दिन उसने कहा, 'पिताजी, कालेज खुलने को एक सप्ताह रह गया है। मेरी फीस भेज दो न। '
पिता ने जबाव दिया, 'कल शहर जाकर मैं सब ठीक कर आऊँगा।'
तब मां ने धीरे से इतना ही कहा, 'बेटा! पहले ठीक तो हो जा, फिर जाने की बात सोचना।'
सुशील मुस्कराया, 'मां! तुम सदा शंका करती रहती हो। मैं अब बिल्कुल ठीक हूं। देखना अगले सप्ताह कालेज जाऊंगा। डॉक्टर से पूछ देखो...।'
डॉक्टर ने हंसते हुए उसका अनुमोदन किया, 'हां, हां, तुम बिल्कुल ठीक होकर एक सप्ताह में शहर जा सकोगे, परंतु भोजन का विशेष ध्यान रखना होगा।'
'जी मैं वही खाता हूं जो आप बताते हैं।'
'तुम सचमुच एक आदर्श रोगी हो। तभी तो बार- बार रोग को पछाड़ कर अच्छे हो जाते हो। हां, कल मैं तुम्हारे लिए टानिक लाऊंगा।'
यह कह डॉक्टर उठे। फिर एकाएक बोले, 'पर सुशील! भगवान के लिए अब बुखार का न्यौता न दे बैठना। समझे, शरीर के शत्रु से ऐसी मित्रता ठीक नहीं है।'
बात हंसाने के लिए कही गयी थी, सब हंस पड़े। पर अगले दिन अचानक क्या हुआ कि सबेरा होते न होते सुशील जाड़े से कांपने लगा। ज्वर का आक्रमण हो चुका था, तापमान देखा तो 105 डिग्री! चिन्तातुर डॉक्टर ने बहुत देर तक गंभीरता से जांच की, कहा, 'इस बार टाइफाइड के साथ मलेरिया भी है।'
शांत गंभीर पिता ने उत्तेजित होकर पूछा, 'डॉक्टर, आखिर यह क्या है?।'
डॉक्टर ने पिता के कंधे को थपथपाया, 'चिंता मत करें। सब कुछ ठीक होगा। दु:ख इतना ही है कि सुशील महाशय अगले सप्ताह कालेज न जा सकेंगे?'
लगभग संज्ञाहीन होने पर भी कालेज का नाम सुनते ही उसने आंखें खोल दी। बोला, 'मैं कालेज अवश्य जाऊंगा। पांच छह दिन की देर हो जाएगी तो क्या है? पिता जी। आप मेरी फीस अवश्य भेज दीजिए।'
पिता ने कहा, 'भेज दूंगा, पर तुम्हें अपना ध्यान रखना चाहिए।' सुशील ने नहीं सुना। वह बोला, पिता जी मैं डॉक्टर बनूंगा।
'अवश्य बनना'
आगे उससे बोला न गया।
दिन पर दिन वह दुर्बल होता चला गया। सुईयों से उसका शरीर बिंध गया, कड़वी- तीखी दवाइयों से उसका मन चिड़चिड़ा हो आया, तो भी इक्कीस दिन के बाद जब उसका ज्वर उतरा तो उसने यही कहा, 'दीवाली के बाद मैं कालेज जाऊंगा।'
'बेशक, तुम जा सकोगे,' डॉक्टर ने कहा।
पिता गर्व से बोले, 'परीक्षाफल शानदार है तुम्हारे प्रिसिंपल ने विश्वास दिलाया है कि तुम सब कमी पुरी कर लोगे।'
डॉक्टर ने विजयी खिलाड़ी के स्वर में कहा, 'विश्वास में अद्भुत शक्ति होती है सुशील। मैंने बड़े- बड़े रोगियों को विश्वास के बल पर अच्छे होते देखा है।'
यही विश्वास सुशील की ढाल बन गया। वह जिस तेजी से स्वास्थ्य लाभ कर रहा था उसे देखे बिना विश्वास नहीं हो सकता था। बस हर समय यही रट लगी रहती थी, 'मैं कालेज जाऊंगा, मैं डॉक्टर बनूंगा।'
मां कहती, 'डॉक्टर बनकर तू कहां जाएगा?'
'यही रहूंगा, मां।'
'इसी कस्बे में?'
'हां, मां। पास में बहुत गांव हैं। उनकी सेहत की देखभाल करना हमारा फर्ज है। उनकी सेहत ठीक न रहेगी तो देश की उन्नति कैसे होगी।'
मां सहसा कांपकर बोल उठती, 'देश की चिंता करने से पहले अपने को तो देख।'
सुशील मुस्कराता, 'मैं ही देश हूं, मां।'
मां अचकचाती- चौंकती, 'आखिर तुम ये बातें कहां से सीखते हो?'
'तुमसे?'
'मुझसे।'
'हां! तुम मां हो! तुमने ही तो हमारा निर्माण किया है।'
तब मां हर्ष से फूलती, चिंता से दुबलाती। देर तक एकान्त में बैठकर सोचती, 'ये मेरे बेटे हैं, इनमें मेरा रक्त है पर मुझे तो ये बातें आती ही नहीं। फिर मुझसे ये कैसे सीखते हैं? सीखते हैं तो मुझे छोड़कर क्यों चले जाते हैं? क्या सुशील भी चला जाएगा... क्या सुशील भी ... सुशील जो मेरी आखिरी संतान है, मेरी आखिरी आशा है...।'
वह कांपी... सिहर- सिहर उठी... तभी किसी ने जैसे कहीं भीतर से पुकारा- सुशील में एक अन्तर है, वह सोचता नहीं बोलता है...।
हां, वह सोचता नहीं, बोलता है पर बोलता तो वैसी ही बातें हैं देश ... आदमी... कर्त्तव्य और न जाने क्या क्या...।
उस रात वह देर तक यही दिवा- स्वप्न देखती रही। सबेरे उठी तो देखा- सुशील चादर ताने लेटा है।
पुकारा, 'सुशील।'
सुशील नहीं बोला। सशंक आकर उसने चादर के भीतर हाथ डाला जैसे अंगार से छू गया हो। वह कांप कर पीछे हट गयी और भर्राए स्वर में कहा, 'सुशील... सुशील!!'
सुशील चौंक कर क्षीण स्वर में बोला, 'क्या है?'
'कैसा जी है बेटा?'
'शरीर जल रहा है। छाती में दर्द है। रात शीत लगी थी।'
'छाती में दर्द', मां पागल सी उसके पिता के पास दौड़ी, 'देखिए तो सुशील को खूब बुखार चढ़ा है। छाती में दर्द है।'
जैसे वज्र गिरा हो। पिता एकदम बोले, 'क्या?'
'बुखार!'
'बुखार! बुखार किसको है?'
मां ने किंचित तेज होकर कहा, 'जल्दी जाकर डॉक्टर को बुलाओ। सुशील की छाती में दर्द है और बुखार भी तेज है।'
डॉक्टर आया। खूब जांच-पड़ताल के बाद उसने कहा, निमूनिया है।
'निमूनिया!! पिता स्तब्ध रह गए।'
'निमूनिया? मां को जैसे विश्वास नहीं आया।'
फिर कई क्षण कोई किसी से नहीं बोला। आखिर डॉक्टर ने शिकायत के स्वर में कहा, 'मैं कहता हूं, क्या आप इसका बिल्कुल ध्यान रख सकते? इसे सर्दी लगी है।'
रुंधे स्वर में मां ने उत्तर दिया, 'डॉक्टर! रात को बार- बार उठकर मैं उसे कपड़ा ओढ़ाती हूं।'
'दवा कौन देता है?'
'मैं देती हूं।'
'ठीक समय पर?'
'आप सुशील से पूछ लीजिए।'
डॉक्टर ने दोनों हाथ हवा में हिलाए कहा, 'कुछ समझ में नहीं आता। जैसे ही रोगी स्वास्थ्य- लाभ करता है रोग उसे फिर आ दबोचता है। अच्छा, मैं फेन्सीलीन की सुइयां लगाता हूं।'
कई दिन तक डॉक्टर हर चार घंटे के बाद सुइयां लगाता रहा। उन दिनों बेहोश सी मां ने न जाने कितनी निद्राहीन रातें बेटे के बिस्तर के पास बैठकर काटीं। ऐसी देखभाल की कि सब अश- अश कर उठे। पड़ोसियों ने कहा, मां ऐसा न करेगी तो और कौन करेगा और फिर वह मां, जिसके बेटे एक बाद एक उसे छोड़ कर चले गये हों।
'हां, जी ! वह जान भी दे दे तो थोड़ी है उसके लिए।'
'जान ही तो वह दे रही है।'
'बेचारी ने पिछले जन्म में न जाने क्या पाप किए थे?'
'पाप क्या जी, आजकल की तो औलाद ही निराली है। कहते हैं बेटा मां- बाप का नहीं होता, देश का होता है।'
'हां जी! यही बात है। भला कोई पूछे उनसे, तुम्हें पाल पोसकर किसने बड़ा किया है, देश ने या मां ने! तुम्हारे गू-मूत किसने उठाए हैं, देश ने या मां ने?'
उनमें कुछ युवतियां भी थीं। एक युवती शहर में रहकर पढ़ी थी, वह बोली, 'और तो मैं कुछ नहीं जानती पर आदमी होता देश के लिए ही है।'
जैसे यह युद्ध को चुनौती थी। फिर तो घंटों क्या दिनों यही चर्चा कर घर और गली- गली का विषय बनी रही। यहां तक कि सुशील फिर अच्छा होने लगा, पर देश और आदमी के रिश्ते का कोई निर्णय नहीं हो सका। आखिर डॉक्टर ने एक दिन सुशील के पिता को बुलाकर कहा, 'इस बार सुशील की देखभाल विशेष रूप से करनी होगी। यदि अब रोग ने आक्रमण कर दिया तो...।'
डॉक्टर ने जान बूझकर वाक्य पूरा नहीं किया। लाला चंद्रसेन बोले, 'जानता हूं डॉक्टर जानता हूं।'
'यही समय है जब रोग आक्रमण करता है।'
'जी, हमने पूरी तैयारी कर लगी है। बारी- बारी से रात को जागने का प्रोग्राम है, उसकी एक ममेरी बहन को भी बुला भेजा है।'
क्षण भर डॉक्टर शून्य में दृष्टिपात करके कहा, 'दो चार दिन मैं भी रहना चाहूंगा।'
'आप!'
'हां, मैं।'
करुण स्वर में लाला चंद्रसेन बोले, 'डॉक्टर! आपने क्या नहीं किया। आपकी कृपा से ही सुशील बार- बार मौत के मुंह में जाकर लौटा है आप अब...।'
डॉक्टर ने टोक दिया, 'मैं रोगी का अध्ययन करना चाहता हूं।'
'जी'
'और वह भी कुछ दूर से।'
'आपका मतलब?'
'मतलब यह है कि मैं आपके कमरे में रहकर सुशील की देखभाल करूंगा और हां! यह बात किसी से कहिए नहीं। मां से भी नहीं।'
लालाजी का सिर चकरा उठा पहले तो, पर गर्व भी कम नहीं हुआ। घर आकर यह बात वे सुशील की मां से कहते- कहते तनिक ही बचे। 'आज डॉक्टर कहते थे...।' इतना कहकर जैसे उन्हें होश आया। चुप हो गए।
सुशील की मां बोली, 'डॉक्टर क्या कहते थे?'
'यहीं' उन्होंने कुछ याद करते हुए कहा, 'कि मैं आज गांव जा रहा हूं। सुशील को लौटकर रात के समय देखूंगा।'
फिर करुण स्वर में बोले, 'कितना भला डॉक्टर है।'
'भगवान का रूप है', मां ने गद्गद् स्वर में कहा।
'हमें तो वही जिला रहा है।'
उसने यह बात सच्चे मन से कही थी। दोनों पति- पत्नी तब देर तक भले आदमियों की चर्चा करते रहे। फिर दिन बीत गया। थके हुए जीवन को सहलाने के लिए रात आ पहुंची। अंधकार में दृष्टि नहीं है, पर शांति अवश्य है। उसी शान्त वातावरण में डॉक्टर आये। सुशील को गुदगुदाया, हंसाया, दवा बताई और लौट गये। परंतु अपने घर नहीं, पास के कमरे में। लाला चंद्रसेन वहीं रहे, मां भी वहीं थी, सुशील को नींद आ गई। मां ने लैम्प बुझा दिया, दीवा जलता रहा। उसका धुंधला पर शीतल प्रकाश तन-मन दोनों को सुखकारी था। कुछ देर में लाला चंद्रसेन उठे, बोले, 'जब तुम सोने लगो तो मुझे पुकार लेना।'
और वे भी चले गये। धीरे - धीरे चारों और शांति छा गई। सुशील के पास बैठी मां की पलकें भारी हुईं और फिर झुक गई। पर डॉक्टर की आंखों में नींद नहीं थी। वे कभी कुर्सी पर बैठे रहते, कभी टहलते, कभी धीरे -से खिड़की में से देख लेते। लाला जी उत्सुक उत्तेजित उन्हें देखते और पूछे बैठते, 'डॉक्टर कोई बात देखी?'
डॉक्टर मुस्कराता, 'आप चिंता न करें।'
और फिर सन्नाटा, किसी के खखारने और चलने का शब्द, दूर कहीं गिदड़ों की हूँ हाँ और फिर मौन, डॉक्टर की धीमी पदचाप, फिर एकाएक कहीं कुत्तों की भौं- भौं! दीवार की घड़ी ने दो बजा दिए। तभी सहसा डॉक्टर चौंक उठे। उन्होंने धीरे से लालाजी को जगाया, 'हां- हां बोलिए नहीं। चुपचाप मेरे पीछे खिड़की के पास चले आइए।
'क्या है?'
'आ जाइये चुपचाप।'
दोनों ने हतप्रभ देखा- धुंधले प्रकाश में एक मूर्ति धीरे- धीरे सुशील की खाट के पास पहुंची है। उसने कई क्षण चुपचाप सुशील के मुख को देखा, फिर चूमा, फिर धीरे- धीरे कांपते हांथों से चादर उतार दी। सुशील एक बार खांसा, फिर पैरों को पेंट में समेट लिया। छाया मूर्ति पीछे हटी। मेज पर दवा की शीशी रखी थी, उसे उठाया और उसे चिलमची में फेंक दिया।
चित्रलिखित- सा डॉक्टर बोला, 'देखा।'
चंद्रसेन तड़पे, 'डॉक्टर! यह तो सुशील की मां है।'
'हां। आइए।'
'डॉक्टर, मैं.... मैं....।'
'आइए।'
डॉक्टर ने आगे बढ़कर सहज भाव से किवाड़ खोले और सुशील के कमरे में चले आये। छाया मूर्ति ने सहसा मुड़कर देखा, उसके मुख से एक चीख निकली- 'आप... आप...।'
और वह तीव्र वेग से कांपती हुई पीछे हटी, हटती गई, कांपती गई और फिर लडख़ड़ा कर गिर पड़ी। लाला चंद्रसेन उधर दौड़े, इधर डॉक्टर ने सबसे पहले खिड़की बंद की। फिर सुशील को कपड़ा उढ़ाया। तब सुशील की मां की ओर झुके। वह बेहोशी में बड़बड़ा रही थी- सुशील अच्छा हो रहा है... वह कालेज जाएगा, डॉक्टर बनेगा... और फिर नहीं लौटेगा... उसके भाई भी नहीं लौटे थे... नहीं, नहीं, वह शहर नहीं जा सकता... वह मुझे नहीं छोड़ सकता।
डॉक्टर ने सुना, पिता ने सुना दोनों ने एक दूसरे को देखा। पिता सिर से पैर तक सिहर उठे, मुंह से इतना ही निकला, 'डॉक्टर...।'
डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, 'मुझे यही डर था।'
'मां का स्नेह पुत्र का काल बना हुआ है डॉक्टर।'
सहसा डॉक्टर का स्वर कठोर हो उठा, उन्होंने कहा, 'स्नेह नहीं यह मनुष्य का स्वार्थ है जो प्रतिक्षण मनुष्यता की हत्या करता रहता है।'
पिता ने इस बार कोई उत्तर नहीं दिया। मां का स्वर निरंतर शिथिल हो रहा था इतना कि मात्र फुसफुसाहट शेष रही थी और सुशील सो रहा था- शांत, निद्वन्द्व।

विष्णु प्रभाकर और नागफांस
हिन्दी की यादगार कहानियां स्तंभ में आप अब तक प्रेमचंद, माधवराव सप्रे, मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, उपेन्द्रनाथ अश्क, कमलेश्वर, फशीश्वरनाथ रेणु, जैनेन्द्र कुमार एवं भुवनेश्वर की कहानियां पढ़ चुके हैं। इस अंक में हम दे रहे हैं प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर की कहानी नागफांस। धरती अब भी घूम रही हैं विष्णु जी की श्रेष्ठतम कहानी मानी जाती है। नागफांस कहानी अपेक्षाकृत कम चर्चित लेकिन अपनी प्रस्तुति एवं कलात्मकता के कारण यह कहानी विशिष्ट है। 'आवारा मसीहा' जैसी जीवनी लिखकर अपार ख्याति पाने वाले विष्णुजी हिन्दी के अद्भुत एकांकी लेखक हैं। प्रस्तुत है उनकी यादगार कहानी 'नागफांस'।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा, एलआईजी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाईनगर 490009, मो. 9827993494
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