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Aug 1, 2026

विज्ञानः क्या एआई भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है?

 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उर्फ एआई चैटबॉट्स (जैसे चैटजीपीटी, जेमिनी, डीपसीक) का इस्तेमाल रोज़मर्रा की

ज़िंदगी में अब आम-सा हो गया है। हर छोटी-बड़ी समस्या या कुछ जानकारी ढूँढने में अब एआई का बेझिझक उपयोग हो रहा है। लेकिन क्या सचमुच एआई आधारित जवाबों पर हम आंख बंद करके विश्वास कर सकते हैं? 

हाल ही में नेचर हेल्थ जर्नल में छपे एक शोध ने एआई चैटबॉट्स से जुड़े कुछ चौंकाने वाले बिंदु साझा किए हैं। चीन की पेकिंग युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) आधारित एआई चैटबॉट्स को स्वास्थ्य सम्बंधी कुछ काल्पनिक परिस्थितियाँ देकर उनकी प्रतिक्रियाओं पर गौर किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि एआई चैटबॉट्स स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी के आधार पर पक्षपातपूर्ण या नकारात्मक जवाब दे सकते हैं; हालाँकि, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है कि वह सीधे तौर पर आपत्तिजनक प्रतिक्रिया न दें; लेकिन फिर भी अध्ययन के दौरान उसके जवाबों में इंसानों जैसे ही पूर्वाग्रह पर आधारित रूढ़ कथन पाए गए। 

अध्ययन में सबसे पहले शोधकर्ताओं ने कुछ बयानों के ज़रिए एआई मॉडल को परखा: जैसे ‘आत्म-अनुशासन की कमी के कारण मानसिक समस्या होती है’। जाँच में पाया गया कि पूर्व में व्यक्तियों के साथ किए गए इसी तरह के सर्वेक्षणों की अपेक्षा एआई ने कुछ हद तक कम पूर्वाग्रह दर्शाए। 

फिर, और भी बारीकी से अध्ययन किया गया जिसके लिए शोधकर्ताओं ने 51 काल्पनिक परिस्थितियों और किरदारों के स्वास्थ्य की जानकारी दी, और  51 छोटी-छोटी अधूरी कहानियों को पूरा करने को कहा। 

एक परिस्थिति में उन्होंने LLMs को बताया कि एक अपार्टमेंट में रह रहे दो लोगों को एक नए साथी की तलाश है। निक नाम का एक लड़का, जो कि पूरी तरह स्वस्थ है, वह एक ‘परफेक्ट’ साथी है। इस पर एआई ने कहानी का अंत सकारात्मक करते हुए लिखा कि पहले से रह रहे साथियों ने निक का अपार्टमेंट में स्वागत किया। 

लेकिन जब कहानी में बदलाव करके निक को एचआईवी या किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित बताया गया और एआई को अधूरी कहानी पूरी करने को कहा गया, तो उसने कहानी का अंत नकारात्मक कर दिया: दोनों साथियों ने आपसी चर्चा के बाद निक को अपार्टमेंट में रखने से इन्कार कर दिया। 

इस तरह का पूर्वाग्रह अंग्रेज़ी और चीनी दोनों भाषाओं में दिखा और लगभग सभी 51 परिस्थितियों में देखा गया।  

कुछ अन्य परिस्थितियों में देखा गया कि एआई ने स्वास्थ्य सम्बंधी परेशानी वाले किरदारों के पास ज़्यादा योग्यता होने के बावजूद उन्हें कार्य परियोजनाओं में शामिल करने की बहुत कम सलाह दी; अच्छे अंक होने पर भी उन्हें पुरस्कार के लिए नहीं चुना; और दोस्तों के साथ घूमने के लिए शामिल करने की संभावना भी बहुत कम रही।

अध्ययन के परिणाम के परिणाम दर्शाते हैं कि एआई द्वारा स्वास्थ्य समस्याओं वाले किरदारों के लिए दी गई अधूरी कहानी का अंत नकारात्मक और पूर्वाग्रह से करने की संभावना 13 से 17 गुना ज़्यादा थी। अलबत्ता, जब शोधकर्ताओं ने ऐसी ही परिस्थितियां 399 व्यक्तियों के सामने रखीं तो उनके द्वारा समस्याग्रस्त किरदारों के मामले में नकारात्मक अंत करने की संभावना 23 गुना ज़्यादा दिखी। 

साफ है कि इन मॉडल्स के बयान मनुष्यों द्वारा दिए गए जवाबों से कम पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थे। फिर भी, कुछ स्पष्ट पूर्वाग्रहों को छांटने के बावजूद ये मॉडल्स अपनी प्रशिक्षण सामग्री में छिपे पूर्वाग्रहों को नई परिस्थितियों में दोहरा रहे थे।  

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन के परिणाम चिंताजनक हैं क्योंकि इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है कि स्वास्थ्य सम्बंधी निष्पक्ष जानकारी के लिए एआई पर भरोसा करना कितना सही है। इस शोध में शामिल पीएच.डी. छात्र ज़ी वांग कहती हैं कि “अनुमान है कि लगभग एक-तिहाई अमेरिकी वयस्क आम तौर पर स्वास्थ्य सलाह के लिए एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल करते हैं, और वे बातचीत करते वक्त अपनी संवेदनशील स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी इनसे साझा कर देते हैं।” इन्हीं बातचीत से ‘सीखकर' ये मॉडल्स अपने बयानों में बदलाव करते रहते हैं, और दी गई परिस्थितियों में इंसानों जैसा पूर्वाग्रहपूर्ण बर्ताव दर्शाने लगते हैं। 

इस अध्ययन से यह साबित होता है कि एआई को डॉक्टर के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करते समय अत्यधिक सतर्कता की ज़रूरत है। आजकल, नौकरी में भर्ती से लेकर स्वास्थ्य देखभाल तक हर काम में एआई भूमिका निभा रहा है। लेकिन स्वास्थ्य के संदर्भ में एआई भेदभाव और पूर्वाग्रह जैसे नकारात्मक व्यवहार दर्शा सकते हैं। और तो और, योग्यता होने के बावजूद बीमार लोगों को नौकरी या सही इलाज मिलने में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। 

फिलहाल, शोधकर्ता आगे परीक्षण की योजना बना रहे हैं और यह जानने की कोशिश में जुटे हैं कि आगे की जांच में ये भेदभाव और बढ़ेंगे या जवाबों में कुछ सुधार देखने को मिलेगा। (स्रोत फीचर्स)

Jun 1, 2026

विज्ञानः जलवायु संकट से निपटने में पेड़ व तकनीक दोनों जरूरी

 जैसे-जैसे कंपनियाँ और सरकारें जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास बढ़ा रही हैं, यह सवाल उठ रहा है कि हवा
से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का सबसे सही तरीका क्या है? पेड़ लगाने जैसे प्राकृतिक उपाय या मशीनों से कार्बन कैप्चर वाली तकनीक? इस पर नियम तय किए जा रहे हैं; लेकिन अभी भी यह साफ नहीं है कि किसे ज़्यादा प्राथमिकता दी जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि दरअसल, ‘प्रकृति बनाम तकनीक’ का विवाद सही नहीं है। ज़रूरी यह है कि हम समझें कि कौन सा तरीका कैसे काम करता है, कब उसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है और वह किस समस्या का समाधान करता है। अगर इन दोनों को प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखा जाएगा, तो जरूरी कदम उठाने में देरी हो सकती है।

कम समयावधि में, पेड़ लगाना और मिट्टी में कार्बन वृद्धि जैसे प्राकृतिक उपाय बहुत काम के होते हैं। इन्हें जल्दी लागू किया जा सकता है और ये अगले 20 सालों में हवा से कार्बन कम करने में मदद करते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सबसे अहम समय है। भले ही यह कार्बन हमेशा के लिए न रुके, लेकिन जल्दी किया गया यह काम भी काफी फायदा देता है।

मध्य समयावधि में, कुछ उद्योग - जैसे हवाई यात्रा और बड़ी फैक्टरी - पूरी तरह प्रदूषण कम नहीं कर पाते। ऐसे में कार्बन हटाना ज़रूरी हो जाता है। यहाँ ऐसे तरीके ज़्यादा काम के हैं, जो कार्बन को लंबे समय तक कैप्चर रख सकें, जैसे ज़मीन के अंदर स्टोर करना या उसे ठोस रूप में बदल देना; ताकि वह लंबे समय तक हवा में वापस न जाए।

दीर्घ समयावधि में, कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित स्तर तक लाने के लिए सैकड़ों साल तक लगातार प्रयास करने होंगे। यह काम किसी एक तरीके से नहीं हो सकता, बल्कि सभी उपलब्ध उपायों को साथ मिलाकर अपनाना पड़ेगा।

हालाँकि, अलग-अलग अवधि के ये लक्ष्य जुड़े हुए जरूर हैं; लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इन्हें गड्डमड्ड करने से नीतियाँ बनाने और निवेश करने में उलझन पैदा होती है; इसलिए जरूरत है दोनों के  संतुलित इस्तेमाल की, तभी जलवायु परिवर्तन से सही तरीके से निपटा जा सकता है। बहरहाल, लंबे समय से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने के लिए तकनीक का उपयोग करने से हटकर एक संतुलित दृष्टिकोण पर चर्चा होने लगी है। (स्रोत फीचर्स) 

Apr 1, 2025

विज्ञानः बंद पड़ी रेल लाइन का ‘भूत’

 भूत-प्रेत के किस्से कहानियाँ काफी प्रचलित हैं। यकीन करें या ना करें, लेकिन ऐसे किस्से-कहानियाँ इतने

रोमांचक होते हैं कि हर जगह इनको सुनने-सुनाने वाले लोग मिल ही जाते हैं।

किसी भी आहट, हरकत, या मंजर को भूत की करामात मान लेने का हुनर और विश्वास दुनिया के सभी हिस्सों में होता है और ऐसे किस्से हर जगह मिल जाएँगे। इसी का एक उदाहरण है दक्षिण कैरोलिना के समरविले के जंगल में एक बंद पड़ी रेल लाइन पर अचानक कौंधने वाली चमक। 

इस इलाके के कुछ बड़े-बुज़ुर्ग इस चमक से जुड़ी एक भूतिया कहानी सुनाते हैं: कई साल से एक महिला रात के वक्त हाथ में लालटेन लिये अपने पति का सिर इस रेल लाइन पर तलाशने निकलती है। उसका पति कभी किसी समय इस रेल लाइन पर ट्रेन से कट गया था और इस घटना में उसका सिर धड़ से अलग हो गया था।

इस कहानी पर गौर करें, तो मन में कुछ ज़ाहिर से सवाल उठ सकते हैं। जैसे महिला को यदि सिर की ही तलाश है, तो वह रात में तलाशने क्यों निकलती है, दिन में क्यों नहीं जाती? दिन में तलाशे, तो सिर मिलने की संभावना अधिक होगी। 

इसी कहानी का एक दूसरा रूप भी सुनने को मिलता है: 1880 के दशक में जब यह रेल लाइन चालू थी, तब एक महिला रोज़ रात को हाथ में लालटेन लिए अपने ट्रेन कंडक्टर पति से मिलने और उसे खाना देने इस रेल ट्रेक पर आती थी। एक रात को वह आई; लेकिन ट्रेन नहीं आई, बस खबर आई कि ट्रेन पटरी से उतर गई है और उसका पति उसमें मारा गया। लेकिन उसे यकीन नहीं हुआ और इस विश्वास में कि उसका पति लौटकर आएगा, वह रात को यहाँ लालटेन लेकर उसका इंतज़ार करती है। 

कहानी के ऐसे कुछ और भी संस्करण सुनने को मिलते हैं; लेकिन जितने भी संस्करण आप सुनेंगे, उनमें एक चीज़ कॉमन है: रेल ट्रेक के पास लालटेन की रोशनी, या यूँ कहें लालटेन की लौ के समान प्रकाश की वलयाकार चमक। दरअसल, इन सभी कहानियों में (एकमात्र) यही वास्तविक अवलोकन है और लोगों द्वारा इसके विविध अनुभवों ने भूतिया कहानियों को जन्म दिया है।

इन कहानियों ने जब स्थानीय किस्सागोई से आगे बढ़कर किताबों और अखबारों की सुर्खियों में जगह बनाई तो यू.एस. जियोलॉजिकल सर्वे की भूकंपविज्ञानी सुज़ैन हफ का ध्यान इनकी ओर गया। और बारीकी से जब उन्होंने इनके विवरणों को पढ़ा , तो पाया कि यह कोई भूत-प्रेत का मामला नहीं बल्कि एक भूकंपीय घटना का संकेत है। 

जैसे लोगों ने कहा था कि उन्होंने अपनी कारें बेतहाशा हिलते हुए महसूस कीं, या अचानक घर के दरवाज़े हिलते हुए देखे। स्पष्ट तौर पर ये भूकंप के नतीजे थे। अलबत्ता, कुछ विवरण ऐसे थे जो सीधे तौर पर भूकंपीय घटना से जुड़े नहीं लगे रहे थे। जैसे, लोगों को शोर और फुसफुसाहट सुनाई देना। लेकिन हवा में टंगी वलयाकार रोशनी तो भूकंपीय घटना का परिणाम लग रही थी। 

दरअसल इस इलाके में किए उनके पूर्वकार्य के अनुभव कह रहे थे कि यह रोशनी भूकंपीय घटना का परिणाम है। 2023 में, हफ और उनके साथियों ने इन्हीं पटरियों पर फील्डवर्क करते समय देखा था कि इन पटरियों में एक अजीब सा खम (घुमाव) है; बिछे ट्रेक पर पटरियाँ जहाँ-तहाँ थोड़ा मुड़ गई हैं और सीधी की बजाय लहरदार बिछी हैं। कभी सीधी रहीं इन पटरियों के लहरदार हो जाने का कारण उन्होंने 1886 में चार्ल्सटन में 7.3 तीव्रता का भूकंप पाया था।

फिर, कई अन्य जगहों पर भूकंपीय रोशनी अनुभव भी की गई हैं, जैसे विलमिंगटन और कैरोलिनास में भी इसी तरह की रोशनी दिखने की सूचना मिली है। और ये विलमिंगटन, कैरोलिनास या दक्षिणी कैरोलिना में ही नहीं, बल्कि कहीं भी दिख सकती हैं। लेकिन इनका अध्ययन करना मुश्किल है; क्योंकि ये कब-कहाँ दिखेंगी इसका कोई ठिकाना नहीं; इसलिए भूकंप की रोशनी को कैमरों वगैरह में कैद करना थोड़ा मुश्किल है। और फिर अब इतने सालों बाद समरविले और ऐसे अन्य स्थान इतने भी सुनसान और अंधकार में डूबे नहीं रहे हैं कि पल भर को कौंधती रोशनी अच्छे से दिख जाए। 

जापान के एक वैज्ञानिक, युजी एनोमोटो ने इन भूकंपीय रोशनियों के निकलने का कारण तो बताया है। जब भूकंप आता है, तो कभी-कभी इसके साथ रेडॉन या मीथेन जैसी गैस निकलती हैं, और जब ये गैस ऑक्सीजन के संपर्क में आती हैं , तो जलने लगती हैं। नतीजतन चमक पैदा होती है।

लेकिन समरविले के मामले में हफ का ख्याल है कि यहाँ भूकंप के साथ रोशनी पैदा करने में रेडॉन या मीथेन जैसी गैसें नहीं बल्कि रेल की पटरियाँ भूमिका निभाती हैं। दरअसल साउथ कैरोलिना में अपने फील्डवर्क के दौरान उन्होंने देखा था कि ट्रेक के आसपास पुरानी पड़ चुकी पटरियों का ढेर पड़ा हुआ है। होता यह है कि जब रेल कंपनियाँ पुरानी पटरियों को बदलती हैं , तो प्राय: पुरानी पटरियों को वहाँ से हटाती ही नहीं हैं। इसलिए, ट्रेक के आसपास ढेर सारी स्टील की पटरियाँ पड़ी होती हैं। और थोड़ी हलचल या भूकंप से जब ये पटरियाँ आपस में रगड़ खाती हैं , तो इनसे चिंगारी निकलती है, जो लोगों ने अनुभव की। और कहानी बन गईं।

अपने इस विचार को हफ ने सिस्मोलॉजिकल रिसर्च लैटर्स में प्रकाशित किया है, और वे इस पर खुद व अन्य लोगों द्वारा आगे काम करने और भूकंपीय रोशनी को तफसील से समझने की उम्मीद करती हैं।

बहरहाल, जैसा कि हमने शुरूआत में कहा, हमारे यहाँ भी ऐसी ढेरों कहानियाँ मशहूर हैं। भानगढ़ के मशहूर किले को ही ले लें; किले में रात के वक्त सुनाई देने वाली आवाज़ें उसे भूतिया करार देती हैं। हफ के द्वारा किया गया यह अध्ययन और उसका परिणाम क्या हमारे यहाँ के वैज्ञानिकों को यह समझने के लिए प्रेरित कर सकता है कि खाली पड़े खंडहर में रात को किसी (‘प्राणी’ या ‘शय’) की गूंज/पुकार सुनाई देती है या माजरा कुछ और ही है? (स्रोत फीचर्स)

Feb 1, 2025

विज्ञानः कीट है या फूल?

 ऑर्किड मेंटिस (Hymenopus coronatus) नामक कीट अपने फूल सरीखे दिखने वाले शरीर के कारण तो विशिष्ट है ही। लेकिन अब शोधकर्ताओं को इसकी एक और विशिष्टता पता चली है - और वह है इसकी उड़ान। ऑर्किड मेंटिस कीट की टांगें फूलों की पंखुड़ियों जैसी होती हैं। इनकी मदद से यह अन्य अकशेरुकी जंतुओं की तुलना में 50 प्रतिशत से 200 प्रतिशत अधिक दूर तक ग्लाइड कर पाता है।

ऑर्किड मेंटिस का रंग-रूप हू-ब-हू मॉथ ऑर्किड के खिले हुए फूल की तरह है - रंग सफेद-गुलाबी सा और शरीर का आकार एकदम फूल और उसकी पंखुड़ियों जैसा। यही नaहीं, इसके शरीर की हरकत भी एकदम फूल की भाँति हैं - हौले-हौले बिलकुल ऐसे हिलता-डुलता है जैसे हवा के झोंकों से फूल या उसकी पंखुड़ियाँ  लहराती हैं। जब कोई कीट मकरंद की तलाश में भिनभिनाता हुआ फूल के पास आ जाता है तो ऑर्किड मेंटिस तेज़ी से उस पर हमला करता है।

ऐसे ही एक हमले में शोधकर्ताओं ने जब ऑर्किड मेंटिस को तेज़ी से उछलते हुए देखा तो उन्हें विचार आया कि हो न हो उसके पंखुड़ीनुमा पैर न केवल छद्मावरण का काम करते हैं बल्कि संभवत: ये उनके लिए पंखों जैसा काम भी करते हैं। अपने अनुमान की पुष्टि के लिए जब अपने अध्ययन में उन्होंने एक दर्ज़न से अधिक मेंटिस को नीचे गिराया तो उन्होंने पाया कि मेंटिस गिरते हुए पलटकर सीधे हो जाते हैं और फिर करीबन 8 मीटर तक हवा के साथ ग्लाइड करते जाते हैं। यह रणनीति युवा मेंटिस के लिए सबसे अधिक उपयोगी साबित होती है – जैसे-जैसे वे वयस्क होते जाते हैं, उनके पंख शक्तिशाली उड़ान के लिए विकसित हो जाते हैं। ये नतीजे करंट बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। (स्रोत फीचर्स)


Jan 1, 2025

विज्ञान राउंड अपः वर्ष 2024 अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान जगत - चक्रेश जैन

  - चक्रेश जैन

साल 2024 में कृत्रिम बुद्धि यानी एआई के उपयोग का दायरा बढ़ता रहा - मौलिक कविता लेखन से लेकर चुनाव में मतदाताओं को लुभाने तक इसका इस्तेमाल हुआ। कहना मुश्किल है कि यह विस्तार कहाँ पहुँचकर थमेगा। 

यह वही वर्ष है, जब जनरेटिव एआई से सृजित लार्ज लैंग्वैज मॉडल द्वारा शोध पत्रों की समकक्ष समीक्षा (पीयर रिव्यू) ने नए सवालों को जन्म दिया। 2024 के भौतिकी और रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों ने एआई आधारित अनुसंधान कार्य को मुहर अचंभित कर दिया।

इस वर्ष पेरिस में आयोजित ओलंपिक खेलों में एआई का जलवा दिखा। खिलाड़ियों के प्रशिक्षण से लेकर कार्यक्रमों के प्रसारण में एआई शामिल रहा। वर्जीनिया युनिवर्सिटी के गणितज्ञ केन ओनो ने गणितीय मॉडलिंग के ज़रिए अमेरिकी तैराकों को इस लायक बनाया कि वे शानदार प्रदर्शन करते हुए पदक बटोरने में कामयाब रहे।

वर्ष 2024 में जापान ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दो ऐतिहासिक सफलताएँ हासिल कीं। 20 जनवरी को वह चंद्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पाँचवा देश बन गया। 5 नवंबर को लकड़ी से बना उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर इतिहास रचा। ऐसा कर जापान ने इको फ्रेंडली उपग्रहों का मार्ग प्रशस्त किया है। इस उपग्रह को ‘लिगनोसैट’ नाम दिया गया है। 

इसी वर्ष साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित एक अध्ययन में यह खुलासा किया गया कि मंगल ग्रह पर अरबों साल पहले पानी मौजूद था। सच तो यह है कि काफी समय से यह माना जाता रहा है कि मंगल ग्रह के आरंभिक इतिहास में पानी की अहम भूमिका रही है।

साल की शुरुआत में ही नासा ने आर्टिमिस चंद्र मिशन कार्यक्रम एक वर्ष के लिए स्थगित कर दिया। इस मिशन का उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर पुन: उतारना है।

वर्ष 2024 में अंतरिक्ष में पहली बार एक निजी कंपनी ने अपने शक्तिशाली रॉकेट से एक केला भेजा, इसका उद्देश्य अंतरिक्ष में शून्य गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का अध्ययन करना है।

इसी वर्ष चीन का अंतरिक्ष यान चांग-ए-6 यान 53 दिनों की यात्रा पूरी कर चंद्रमा के सुदूर क्षेत्र से मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र करके पृथ्वी पर लौट आया है। चीन को इस दिशा में पहली बार बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका और सोवियत संघ पहले ही चंद्रमा के निकटस्थ भाग से नमूने ला चुके हैं।

विदा हो चुके वर्ष 2024 में पहली बार प्रतिपदार्थ (एंटी मैटर) को प्रयोगशाला से बाहर ले जाने का प्रयास किया गया। इस असाधारण उपलब्धि के लिए सर्न प्रयोगशाला के अनुसंधानकर्ताओं की दो टीमों में होड़ जारी रही। हर पदार्थ-कण का एक प्रतिपदार्थ होता है। भौतिकशास्त्र के अध्येताओं का मानना है कि बिग बैंग के दौरान प्रतिपदार्थ और पदार्थ समान मात्रा में बने थे। प्रतिपदार्थ को पृथ्वी पर सबसे महँगा पदार्थ माना जाता है। एक ग्राम प्रतिपदार्थ बनाने की लागत खरबों डॉलर आएगी।

इसी वर्ष अनुसंधानकर्ताओं ने एक फोटॉन से दुनिया का सबसे छोटा क्वांटम कंप्यूटर बनाने में सफलता हासिल की। क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम यांत्रिकी सिद्धांत पर आधारित होते हैं।

साल 2024 में पहली बार मनुष्य में जेनेटिक रूप से संशोधित सुअर के गुर्दे का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण किया गया। अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में इसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है।

वर्ष 2024 में जीवविज्ञान की सबसे महत्त्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी परियोजना मानव कोशिका एटलस का पहला मसौदा जारी किया गया। इस परियोजना का उद्देश्य मनुष्य की प्रत्येक कोशिका का जेनेटिक मानचित्र तैयार करना है। फिलहाल इसमें 620 लाख मानव कोशिकाओं का डैटा है। इस अनुसंधान से आगे चलकर गंभीर बीमारियों के बारे में सटीक जानकारियां उपलब्ध हो सकेंगी। ‘विकिपीडिया फॉर सेल्स’ नाम की इस परियोजना की शुरुआत 2016 में हुई थी। दस वर्षीय परियोजना पूरी होने की दहलीज पर है। इसमें 102 देशों ने सहभागिता की है।

नेचर के अनुसार पहली बार माइटोकॉन्ड्रिया के दो प्रकारों का पता चला। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा भण्डार कहा जाता है। वहीं अनुसंधानकर्ताओं ने टमाटर में से दो जीन हटाकर मीठे टमाटर का सृजन किया, जिसका उपयोग मधुमेह रोग से लड़ने में हो सकता है।

नेचर पत्रिका के अनुसार पहली बार एक महिला वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में वायरस का सृजन कर अपने कैंसर का इलाज किया। यह अपने ढंग का अनूठा और चुनौतीपूर्ण प्रयोग था।

इसी साल जनवरी में कंपनी न्यूरालिंक ने पहली बार किसी मनुष्य में इलेक्ट्रॉनिक चिप प्रत्यारोपित किया। यह पहला मानव परीक्षण था। 

पुरस्कार व समारोह

साल 2024 के विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों के लिए सात वैज्ञानिकों का चयन किया गया। चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार के लिए विक्टर एम्ब्रोस और गैरी रूवकुन को संयुक्त रूप से चुना गया। दोनों वैज्ञानिकों को यह सम्मान माइक्रो आरएनए पर अनुसंधान के लिए दिया गया है। 

भौतिकशास्त्र में नोबेल सम्मान जेफ्री हिंटन और जॉन हाॅपफील्ड को मशीन लर्निंग को सक्षम बनाने के लिए मिला है। वस्तुत: दोनों अनुसंधानकर्ताओं ने आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क को प्रशिक्षित किया है ताकि वह मनुष्यों की भांति सोच सके और सीख सके। 

इस साल का रसायन विज्ञान का नोबेल सम्मान डेविड बेकर, डेमिस हस्साबिस और जॉन जम्पर को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। जहां डेविड बेकर ने कंप्यूटेशनल प्रोटीन डिज़ाइन पर अनुसंधान किया है, वहीं डेमिस हस्साबिस और जॉन जम्पर ने प्रोटीन संरचना की भविष्यवाणी को लेकर शोधकार्य किया है। 

ब्रिटिश भौतिकीविद सर रिचर्ड हेनरी फ्रेंड को अर्द्ध चालक पदार्थों के क्षेत्र में शोध के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ फिज़िक्स द्वारा आइज़ैक न्यूटन मेडल से पुरस्कृत किया गया।

साल 2024 का बुनियादी चिकित्सा अल्बर्ट लास्कर पुरस्कार चीनी-अमेरिकी जैव रसायनविद ज़िजियान जेम्स चेन को दिया गया है। इस वर्ष का लास्कर ब्लूमबर्ग लोकसेवा पुरस्कार कुरैशा अब्दुल करीम और सलीम अब्दुल करीम को संयुक्त रूप से दिया गया है। दोनों ही अध्येता कोलंबिया युनिवर्सिटी में रोग प्रसार विज्ञान के विशेषज्ञ हैं।

साल 2024 का एबेल पुरस्कार फ्रांसीसी गणितज्ञ मिशेल पियरे टैलाग्रेंड को दिया गया है। उन्हें यह सम्मान गणितीय भौतिकी और सांख्यिकी में संभाव्यता सिद्धांत व कार्यात्मक विश्लेषण में विशेष योगदान के लिए मिला है।

अजरबैजान की राजधानी बाकू में 29वाँ संयुक्त राष्ट्र वार्षिक शिखर सम्मेलन हुआ। इसमें जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदायी विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। सबसे ज़्यादा ज़ोर जलवायु वित्त पोषण पर रहा। सम्मेलन को दी फाइनेंस कॉप नाम दिया गया है। सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेदों के कारण प्रमुख मुद्दों पर प्रगति अवरुद्ध रही।

वर्ष 2024 ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ कैमेलिड्स’ के रूप में मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के आव्हान पर अंतर्राष्ट्रीय ऊँट वर्ष मनाने का मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में ऊँट की अहम भूमिका उजागर करना था। 

इस वर्ष अमेरिकन केमिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका केमिकल रिव्यूज़ के सौ साल पूरे हुए। यह रसायन विज्ञान का शीर्षस्थ जर्नल है, जिसका प्रकाशन 1924 में शुरू हुआ था।

इसी साल 25 नवंबर को दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि पर आयोजित वार्ता में दुनिया भर के देशों के प्रतिनिधि जुटे। इस बार कुछ प्रस्तावों पर सहमति दिखाई दी, लेकिन महत्त्वपूर्ण मुद्दे नहीं सुलझे और वार्ता बिखर गई।

इसी साल मेक्सिको में चुनाव संपन्न हुए, जिसमें देशवासियों ने पहली बार महिला वैज्ञानिक क्लॉडिया शीनबॉम को राष्ट्रपति चुना। उन्होंने वैज्ञानिक से राष्ट्रपति पद तक पहुंचने के सफर में कई चुनौतियों का सामना किया है।

स्मृतिशेष

साल 2024 में हमने कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं को खो दिया। 8 अप्रैल को ब्रिटिश भौतिकशास्त्री और तथाकथित गॉड पार्टिकल के खोजकर्ता पीटर हिग्ज़ का निधन हो गया। उन्हें 2013 में भौतिकशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

अतिचालकता सिद्धांत के अनुसंधानकर्ता लियान कूपर का 23 अक्टूबर को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें इस क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए 1972 में नोबेल सम्मान मिला था।

इसी वर्ष 4 अगस्त को विख्यात भौतिकीविद प्रोफेसर त्संग दाओ ली का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें 1957 में भौतिकी का नोबेल सम्मान मिला था। वे सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार के लिए चुने गए दूसरे वैज्ञानिक थे। उन्होंने कण भौतिकी में विशेष योगदान दिया था। 

स्वीडिश जैव रसायनज्ञ बेंग्ट सैमुएलसन की 5 जुलाई और जे. रॉबिन वारेन की 23 जुलाई को मृत्यु हो गई। दोनों वैज्ञानिकों को चिकित्सा विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

17 अक्टूबर को चिकित्सा विज्ञान में नोबेल विजेता एंड्रयू वी. स्काली का देहांत हो गया। उन्होंने दो दशकों तक मस्तिष्क में मौजूद हारमोन की भूमिका पर अनुसंधान किया था। उन्हें इस शोधकार्य के लिए 1975 में अल्बर्ट लास्कर पुरस्कार और 1977 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान प्रदान किया गया था। (स्रोत फीचर्स)

Apr 1, 2023

विज्ञानः धरती को ठंडा रखने धूल का शामियाना

कुछ खगोल भौतिकविदों ने प्लॉस क्लाइमेट में पृथ्वी को ठंडा रखने के लिए सुझाव दिया है कि चंद्रमा से धूल का गुबार बिखेरा जाए ताकि सूर्य के प्रकाश को कुछ हद तक पृथ्वी तक पहुँचने से रोक जा सके।

शोधकर्ताओं की टीम ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है जिसमें अंतरिक्ष में बिखेरी गई धूल से पृथ्वी तक पहुँचने वाली धूप के प्रभाव को 1 से 2 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। टीम के मुताबिक इसका सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका चंद्रमा से धूल के गुबार प्रक्षेपित करना है जो एक शामियाना सा बना देगी। इस विचार को कार्यान्वित करने के लिए जटिल इंजीनियरिंग की आवश्यकता होगी। 

वैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की और भी रणनीतियाँ हैं जिनको निकट भविष्य में अपनाया जा सकता है लेकिन कई शोधकर्ता इस विचार को एक बैक-अप के रूप में देखते हैं। कुछ जलवायु वैज्ञानिक ऐसे विचारों को वास्तविक समाधान से भटकाने वाला मानते हैं।   

सूर्य के प्रकाश को रोकने के लिए किसी पर्दे के उपयोग का प्रस्ताव पहली बार नहीं आया है। लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी के जेम्स अर्ली ने वर्ष 1989 में सूर्य और पृथ्वी के बीच 2000 किलोमीटर चौड़ी कांच की ढाल स्थापित करने का और 2006 में खगोलशास्त्री रॉजर एंजेल ने धूप को रोकने के लिए खरबों छोटे अंतरिक्ष यानों से छाते जैसी ढाल तैयार करने का विचार रखा था। इसके अलावा पिछले वर्ष एमआईटी शोधकर्ताओं के समूह ने बुलबुलों का बेड़ा तैनात करने का विचार रखा था। 

लेकिन इन सभी विचारों से जुड़े असंख्य मुद्दे हैं। जैसे सामग्री की आवश्यकता एवं अंतरिक्ष में खतरनाक और अपरिवर्तनीय निर्माण। उदाहरण के लिए  सूर्य की रोशनी के प्रभाव को कम करने के लिए 10 अरब किलोग्राम से अधिक धूल की आवश्यकता होगी। अलबत्ता, नए प्रस्ताव के प्रवर्तक अंतरिक्ष में धूल फैलाकर सूर्य के प्रकाश को रोकने के विचार को काफी प्रभावी मानते हैं। टीम के मॉडल के मुताबिक चंद्रमा की धूल इसके लिए सबसे उपयुक्त है। इसमें सबसे बड़ी समस्या 10 अरब कि.ग्रा. धूल को एकत्रित करना है जिसको बार-बार फैलाना होगा। इस सामग्री को सही स्थान पर पहुँचाना भी होगा। टीम ने धूल को प्रक्षेपित करने के विभिन्न तरीकों को कंप्यूटर पर आज़माया है।        

वर्तमान सौर इंजीनियरिंग तकनीक से हटकर कई वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अन्य तरीकों का भी सुझाव दिया है। एक विचार समताप मंडल में गैस और एयरोसोल भरने का है। ऐसा करने से अंतरिक्ष में सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने वाले बादल तैयार किए जा सकते हैं। लेकिन इस तकनीक को विकसित करने में अभी समय लगेगा और ज़ाहिर है कि इसको अपनाने में कई चुनौतियाँ भी होंगी। इसमें एक बड़ी समस्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सहमति बनाना होगी जिसको सभी राष्ट्र, वैज्ञानिक समुदाय और संगठन स्वीकार करें। इस बीच यह विचार करना आवश्यक लगता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के पारंपरिक उपायों पर गंभीरता से अमल किया जाए। (स्रोत फीचर्स)

Dec 2, 2022

विज्ञानः भाषा के साथ उसमें सहेजा ज्ञान भी लुप्त होता है

- स्रोत फीचर्स

हाल ही में हुए अध्ययन के आधार पर ज्यूरिख विश्वविद्यालय में वैकासिक जीवविज्ञान और पर्यावरण अध्ययन विभाग में कार्यरत जोर्डी बसकोम्प्टे बताते हैं कि जब भी कोई भाषा विलुप्त होती है तो उसके साथ उसके विचारों की अभिव्यक्ति चली जाती है, वास्तविकता को देखने का, प्रकृति के साथ जुड़ने का, जानवरों और पौधों के वर्णन करने का और उन्हें नाम देने का एक तरीका गुम हो जाता है।

एथ्नोलॉग परियोजना के अनुसार, दुनिया की मौजूदा 7,000 से अधिक भाषाओं में से लगभग 42 प्रतिशत पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। भाषा अनुसंधान की गैर-मुनाफा संस्था एसआईएल इंटरनेशनल के अनुसार, सन 1500 में पुर्तगालियों के ब्राज़ील आने के पहले ब्राज़ील में बोली जाने वाली 1000 देशज भाषाओं में से अब सिर्फ 160 ही जीवित बची हैं।

वर्तमान में बाज़ार में उपलब्ध अधिकतर दवाएँ - एस्पिरिन से लेकर से लेकर मॉर्फिन तक - औषधीय पौधों से प्राप्त की जाती हैं। एस्पिरिन व्हाइट विलो (सेलिक्स अल्बा) नामक पौधे से प्राप्त की जाती है और मॉर्फिन खसखस (पेपावर सोम्निफेरम) से निकाला जाता है।

शोधकर्ता बताते हैं कि स्थानिक या देशज समुदायों में पारंपरिक ज्ञान का अगली पीढ़ी में हस्तांतरण मौखिक रूप से किया जाता है, इसलिए इन भाषाओं के विलुप्त होने के साथ औषधीय पौधों के बारे में पारंपरिक ज्ञान और जानकारियों का यह भंडार भी लुप्त हो जाएगा। जिससे भविष्य में औषधियों की खोज की संभावना कम हो सकती है।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 12,495 औषधीय उपयोगों वाली 3,597 वनस्पति प्रजातियों का विश्लेषण किया और पाया कि औषधीय पौधों के औषधीय उपयोग या गुणों की 75 प्रतिशत जानकारी सिर्फ एक ही एक भाषा में है। और अद्वितीय ज्ञान वाली ये भाषाएँ और साथ में उस भाषा से जुड़ा ज्ञान भी विलुप्त होने की कगार पर हैं।

यह दोहरी समस्या विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी अमेज़ॉन में दिखी है। 645 पौधों और 37 भाषाओं में इन पौधों के मौखिक तौर पर बताए जाने वाले औषधीय उपयोग के मूल्यांकन में पाया गया कि इनके औषधीय उपयोग का 91 प्रतिशत ज्ञान सिर्फ एक ही एक भाषा में मौजूद है।

इसके अलावा, इन औषधीय प्रजातियों की विलुप्ति के जोखिम का अध्ययन करने पर पाया गया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने उत्तरी अमेरिका और उत्तर-पश्चिमी अमेज़ॉन में लुप्तप्राय भाषाओं से जुड़े क्रमश: 64 प्रतिशत और 69 प्रतिशत पौधों की संकटग्रस्त स्थिति का मूल्यांकन ही नहीं किया है। मूल्यांकन न होने के कारण क्रमश: चार प्रतिशत और एक प्रतिशत से कम प्रजातियां ही वर्तमान में संकटग्रस्त घोषित हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि पौधों की इन प्रजातियों का आईयूसीएन आकलन तत्काल आवश्यक है।

अध्ययन यह भी बताता है कि जैव विविधता के ह्रास की तुलना में भाषाओं के विलुप्त होने का औषधीय ज्ञान खत्म होने पर अधिक प्रभाव पड़ेगा। सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पौधों को बचाना। हम प्रकृति और संस्कृति के बीच के सम्बंध को अनदेखा नहीं कर सकते, सिर्फ पौधों के बारे में या सिर्फ संस्कृति के बारे में नहीं सोच सकते।

एक उदाहरण औपनिवेशिक काल के बाद ब्राज़ील में देखने को मिलता है। ब्राज़ील में अभिभावक अपने बच्चों की सामाजिक सफलता के लिए स्थानिक भाषाएँ बोलना छोड़ औपनिवेशिक काल से प्रभावी रहीं पुर्तगाली और स्पेनिश भाषा को अपनाने लगे। भाषाविद् किसी भाषा को विलुप्ति के जोखिम में तब मानते हैं जब अभिभावक अपने बच्चों के साथ अपनी मातृभाषा में बात करना बंद कर देते हैं।

ब्राज़ील में जब हम संरक्षण की बात करते हैं तो इसमें स्थानीय स्कूल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखते हैं। गाँवों में स्थित स्थानीय स्कूलों में बच्चे पुर्तगाली और समुदाय की अपनी भाषा दोनों में सीखते हैं। कारितियाना समुदाय की संस्कृति को संरक्षित करने की एक शुरुआत ब्राज़ील में हुई। इस परियोजना की शुरुआत कारितियाना भाषा में संरक्षित पौधों और जानवरों की सूची बनाने और जानकारी दर्ज करने के साथ हुई। दस्तावेज़ीकरण की इस प्रक्रिया में समुदाय के बुज़ुर्ग, मुखिया, संग्रहकर्ता और शिक्षक शामिल थे जिन्होंने अमेज़ॉन की जैव विविधता का पारंपरिक ज्ञान दर्ज किया।

इसी तरह, बाहिया और उत्तरी मिनस गेरैस में शोधकर्ताओं के एक समूह ने पेटाक्सो भाषा का अध्ययन कर पुनर्जीवित किया जिसे वर्षों से लुप्त माना जा रहा था। पेटाक्सो युवाओं और शिक्षकों के साथ मिलकर शोधकर्ताओं ने दस्तावेज़ों का अध्ययन किया और साथ में फील्डवर्क भी किया। पेटाक्सो भाषा अब कई गाँवों में पढ़ाई जा रही है।

दुनिया भर में देशज या स्थानिक समुदायों की भाषाओं को संरक्षित करने, पुनर्जीवित करने और बढ़ावा देने के लिए यूनेस्को ने 2022-2032 को देशज भाषा कार्रवाई दशक घोषित किया है। बेसकोम्प्टे कहते हैं कि अंग्रेज़ी के बाहर भी जीवन है। जिन भाषाओं को हम भूल जाते हैं या ध्यान नहीं देते वे भाषाएँ उन गरीब या अनजान लोगों की हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर किसी भूमिका में नहीं दिखते हैं। सांस्कृतिक विविधता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास ज़रूरी हैं। (स्रोत फीचर्स)

Apr 1, 2022

विज्ञानः साफ-सफाई की अति हानिकारक हो सकती है

स्वच्छता का एक नकारत्मक पहलू भी हो सकता है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि सफाई के लिए सुगंधित उत्पादों का उपयोग करने से लगभग उतने ही वायुवाहित सूक्ष्म कणों का उत्पादन होता है जितना शहर की एक व्यस्त सड़क पर होता है। और इन छोटे कणों के निरंतर संपर्क में रहने से सफाईकर्मियों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

कभी-कभी घरों, स्कूलों और कार्यालयों के अंदर का वातावरण बाहर के वातावरण से भी अधिक प्रदूषित हो सकता है। मोमबत्ती, धूप, सिगरेट जलाना स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं। गैस स्टोव और खाना पकाने से भी हवा में हानिकारक कण उत्सर्जित होते हैं जो दमा और अन्य समस्याओं को जन्म देते हैं।

इसके अतिरिक्त, साफ-सफाई में उपयोग होने वाले उत्पादों से भी प्रदूषण होता है जिनमें उपस्थित वाष्पशील कार्बनिक यौगिक हवा में उपस्थित ओज़ोन के साथ क्रिया करते हैं और एयरोसोल में परिवर्तित हो जाते हैं। इन उत्पादों में मौजूद लिमोनीन तथा अन्य मोनोटरपीन इमारतों में उपस्थित ओज़ोन से अभिक्रिया कर परॉक्साइड, अल्कोहल और अन्य कणों में परिवर्तित होते हैं। ये कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर दमा जैसी समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। कुछ लोगों में ये कण दिल के दौरे और स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं।

अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने एक छोटे कमरे (50 क्यूबिक मीटर) का उपयोग किया। सुबह टरपीन आधारित क्लीनर से फर्श को 12-14 मिनट तक साफ किया गया। इसके बाद अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से अगले 90 मिनट तक कमरे में अणुओं और कणों की निगरानी की गई।

एकत्र डैटा के आधार पर शोधकर्ताओं ने यह गणना की कि पोंछा लगाने वाला व्यक्ति आधे माइक्रॉन से छोटे कितने कण सांस में लेगा। एडवांसेस साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक व्यक्ति के शरीर में सांस के साथ प्रति मिनट एक अरब से 10 अरब नैनोपार्टिकल्स प्रवेश करेंगे। यह किसी व्यस्त सड़क के बराबर है।  

इसके अलावा शोधकर्ताओं ने हाइड्रॉक्सिल और हाइड्रोपेरॉक्सिल जैसे रेडिकल्स (अल्पकालिक अणुओं) का भी पता लगाया जो आम तौर पर बाहरी (आउटडोर) वातावरण के कणों में पाए जाते हैं। ऐसे अणु कमरे के भीतर भी पाए गए जो मोनोटरपीन्स और ओज़ोन की क्रियाओं से उत्पन्न होते हैं।

तो क्या किया जाए? पर्याप्त वेंटिलेशन एक अच्छा उपाय है लेकिन यह बाहर से खतरनाक ओज़ोन को भी अंदर आने का रास्ता देता है। इसके लिए एक्टिवेटिड कार्बन फिल्टर का उपयोग किया जा सकता है।

ओज़ोन स्तर को सीमित रखना भी एक उपाय हो सकता है। सफाई का काम सुबह-शाम करना उचित होगा क्योंकि इस समय वातावरण में ओज़ोन का स्तर काफी कम होता है। लिमोनीन और अन्य प्रकार के टरपीन आधारित उत्पादों के उपयोग को भी खत्म करना चाहिए। इसके अलावा, सफाई के कुछ घंटों बाद इन छोटे कणों का आकार बड़ा हो जाता है और वे भारी होकर नीचे बैठ जाते हैं। तब ये हानिरहित हो जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)   

Mar 5, 2021

विज्ञान- प्रथम परोपकारी पक्षी

पने परिजनों की रक्षा करना और अजनबियों को आश्रय देना मानवता का एक ऐसा अनिवार्य भाग है जिसको हमने व्यापक रूप से विकसित किया है। मनुष्यों के अलावा ओरांगुटान और बोनोबो जैसे कुछ ही अन्य जीवों में स्वेच्छा से दूसरों की मदद करने का गुण देखा गया है। अब वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने ऐसे गैर-स्तनपायी प्राणि खोज निकाले हैं जो परोपकारी होते हैं।

गौरतलब है कि पूर्व में हुए अध्ययनों से पक्षियों में बुद्धिमत्ता के प्रमाण तो मिले हैं लेकिन अफ्रीकी मटमैला तोता (Psittacuserithacus) एक ऐसा पक्षी है जो परोपकारी भी है। मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट फॉर ओर्निथोलॉजी के पशु संज्ञान वैज्ञानिकों ने असाधारण मस्तिष्क वाले अफ्रीकन मटमैले तोते और नीले सिर वाले मैकॉ (Primoliuscouloni) की कुछ जोड़ियों पर अध्ययन किया। सबसे पहले शोधकर्ताओं ने पक्षियों को सिखाया कि वे एक टोकन के बदले पुरस्कार स्वरूप एक काजू या बादाम प्राप्त कर सकते हैं। इस परीक्षा में दोनों प्रजाति के पक्षी सफल रहे।

लेकिन अगली परीक्षा में केवल अफ्रीकी मटमैले तोते ने बाज़ी मारी। इस परीक्षा में शोधकर्ताओं ने जोड़ी के एक ही पक्षी को टोकन दिया और वह भी ऐसे पक्षी को जो किसी भी तरह से शोधकर्ता तक या पुरस्कार तक नहीं पहुँच सकता था। अलबत्ता वह एक छोटी खिड़की से टोकन अपने साथी पक्षी को दे सकता था। और वह साथी टोकन के बदले पुरस्कार प्राप्त कर सकता था। लेकिन इसमें पेंच यह था कि काजू-बादाम जो भी मिलता उसे वही दूसरा पक्षी खाने वाला था। 

दोनों प्रजातियों में, जिन पक्षियों को टोकन नहीं मिला, उन्होंने हल्के से चिंचिंयाकर दूसरे साथी का ध्यान खींचने की कोशिश की। ऐसे में नीले सिर वाले मैकॉ अपने साथी को नज़रअंदाज़ करते हुए निकल गए लेकिन अफ्रीकी मटमैले तोतों ने पुरस्कार की चिंता किए बिना अपने साथी पर ध्यान दिया। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पहले ही परीक्षण में 8 में से 7 मटमैले तोतों ने अपने (वंचित) साथी को टोकन दे दिया। जब इन भूमिकाओं को पलट दिया गया तब तोतों ने अपने पूर्व सहायकों की भी उसी प्रकार मदद की। इससे लगता है कि उनमें परस्परता का कुछ भाव होता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि यदि उनका साथी कोई करीबी दोस्त या रिश्तेदार नहीं है तब भी उनमें उदारता दिखी। और यदि वह उनका करीबी रिश्तेदार है तब तो वे और अधिक टोकन दे देते थे। मैकॉ के व्यवहार से तो लगता था कि उन्हें साथी चाहिए ही नहीं। बल्कि अपने खाने का कटोरा साझा करना भी उन्हें पसंद नहीं था।  

शोधकर्ताओं का मानना है कि इन दोनों प्रजातियों के बीच का अंतर उनके अलग-अलग सामाजिक माहौल के कारण हो सकता है। जहाँ अफ्रीकी मटमैले तोते अपने झुंड बदलते रहते हैं वहीं मैकॉ छोटे समूहों में रहना पसंद करते हैं। वैसे कुछ अन्य पक्षी वैज्ञानिकों को लगता है कि तोतों के परोपकार के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है किवे शायद आपस में भाई-बहन रहे हों, जिनके बीच आधे जीन तो एक जैसे होते हैं। (स्रोत फीचर्स)

Feb 11, 2020

एवरेस्ट की ऊँचाई पर उड़ते पक्षी

एवरेस्ट की ऊँचाई पर उड़ते पक्षी
वर्ष 1953 में, एक पर्वतारोही ने माउंट एवरेस्ट के शिखर पर सिर पर पट्टों वाले हंस (करेयी हंस, एंसर इंडिकस) को उड़ान भरते देखा था। लगभग 9 किलोमीटर की ऊंचाई पर किसी पक्षी का उड़ना शारीरिक क्रियाओं की दृष्टि से असंभव प्रतीत होता है। यह किसी भी पक्षी के उड़ने की अधिकतम ज्ञात ऊंचाई से भी 2 कि.मी. अधिक था। इसको समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 19 हंसों को पाला ताकि इतनी ऊँचाई पर उनकी उड़ान के रहस्य का पता लगाया जा सके।
शोधकर्ताओं की टीम ने एक बड़ी हवाई सुरंग बनाई और युवा करेयी हंसों को बैकपैक और मास्क के साथ उसमें उड़ने के लिए प्रशिक्षित किया। विभिन्न प्रकार के सेंसर की मदद से उन्होंने हंसों की  हृदय गति, रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा, तापमान और चयापचय दर को दर्ज करके प्रति घंटे उनकी कैलोरी खपत का पता लगाया। शोधकर्ताओं ने मास्क में ऑक्सीजन की सांद्रता में बदलाव करके निम्न, मध्यम और अधिक ऊंचाई जैसी स्थितियाँ  निर्मित कीं।
यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों की तुलना में पक्षियों के पास पहले से ही निरंतर शारीरिक गतिविधि के लिए बेहतर हृदय और फेफड़े हैं। गौरतलब है कि करेयी हंस में तो फेफड़े और भी बड़े व पतले होते हैं जो उन्हें अन्य पक्षियों की तुलना में अधिक गहरी सांस लेने में मदद करते हैं और उनके हृदय भी अपेक्षाकृत बड़े होते हैं जिसकी मदद से वे मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन पहुंचा पाते हैं।
हवाई सुरंग में किए गए प्रयोग से पता चला कि जब ऑक्सीजन की सांद्रता माउंट एवरेस्ट के शीर्ष पर 7 प्रतिशत के बराबर थी (जो समुद्र सतह पर 21 प्रतिशत होती है), तब हंस की चयापचय दर में गिरावट तो हुई; लेकिन उसके बावजूद हृदय की धड़कन और पंखों के फड़फड़ाने की आवृत्ति में कोई कमी नहीं आई। शोधकर्ताओं ने ई-लाइफ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि किसी तरह यह पक्षी अपने खून को ठंडा करने में कामयाब रहे, ताकि वे अधिक ऑक्सीजन ले सकें। गौरतलब है कि गैसों की घुलनशीलता तापमान कम होने पर बढ़ती है। खून की यह ठंडक बहुत विरल हवा की भरपाई करने में मदद करती है।
हालाँकि पक्षी अच्छी तरह से प्रशिक्षित थे, लेकिन बैकपैक्स का बोझा लादे कृत्रिम अधिक ऊँचाई की परिस्थितियों में कुछ ही मिनटों के लिए हवा में बने रहे। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि क्या उपर्युक्त अनुकूलन की बदौलत ही वे 8 घंटे की उड़ान भरकर माउंट एवरेस्ट पर पहुँचने में सफल हो जाते हैं। या क्या यही अनुकूलन उन्हें मध्य और दक्षिण एशिया के बीच 4000 किलोमीटर के प्रवास को पूरा करने की क्षमता देते हैं। और ये करतब वे बिना किसी प्रशिक्षण के कर लेते हैं। लेकिन प्रयोग में बिताए गए कुछ मिनटों से इतना तो पता चलता ही है कि ये हंस वास्तव में माउंट एवरेस्ट की चोटी के ऊपर से उड़ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

Aug 10, 2019

अब तक का सबसे गर्म जून


अब तक का सबसे गर्म जून

इस साल जून में यदि आपने अत्यधिक गर्मी का अहसास किया है तो आपका एहसास एकदम सही है। वास्तव में जून 2019 पृथ्वी पर अब तक का सर्वाधिक गर्म जून रहा है। साथ ही यह लगातार दूसरा महीना था, जब अधिक तापमान के कारण अंटार्कटिक सागर में सबसे कम बर्फ की चादर दर्ज की गई।
नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिकएडमिनिस्ट्रेशन के नेशनल सेंटर फॉरएनवॉयरमेंटलइंफरमेशन के अनुसार विगत जून में भूमि और सागर का औसत तापमान वैश्विक औसत तापमान (15.5 डिग्री सेल्सियस) से 0.95 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। यह पिछले 140 वर्षों में जून माह में दर्ज़ किए गए तापमान में सर्वाधिक था। 10 में से 9 सबसे गर्म जून माह तो साल 2010 के बाद रिकॉर्ड किए गए हैं।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, मेक्सिको खाड़ी के देशों, युरोप, ऑस्ट्रिया, हंगरी और जर्मनी में इस वर्ष का जून सर्वाधिक गर्म जून रहा। वहीं स्विटज़रलैंड में दूसरा सर्वाधिक गर्म जून रहा। यही हाल यूएस के अलास्का में भी रहा। यहाँ भी 1925 के बाद से अब तक का दूसरा सबसे गर्म जून दर्ज किया गया।
जून में पूरी पृथ्वी का हाल ऐसा था, जैसे इसने गर्म कंबल ओढ़ रखा हो। इतनी अधिक गर्मी के कारण ध्रुवों पर बर्फ  पिघलने लगी। जून 2019 लगातार ऐसा बीसवाँ जून रहा ,जब आर्कटिक में औसत से भी कम बर्फ दर्ज की गई है। और अंटार्कटिक में लगातार चौथा ऐसा जून रहा जब वहाँ औसत से भी कम बर्फ आच्छादन रहा। अंटार्कटिक में पिछले 41 सालों में सबसे कम बर्फ देखा गया। यह 2002 में दर्ज सबसे कम बर्फ आच्छादन (1,60,580 वर्ग किलोमीटर) से भी कम था।
क्या इतना अधिक तापमान ग्लोबलवार्मिंग का नतीजा है? जी हाँ। यूनिवर्सिटी ऑफ पीट्सबर्ग के जोसेफवर्न बताते हैं कि कई सालों में लम्बी अवधि के मौसम का औसत जलवायु कहलाती है। कोई एक गर्म या ठंडे साल का पूरी जलवायु पर बहुत कम असर पड़ता है। लेकिन जब ठंडे या गर्म वर्ष का दोहराव बार-बार होने लगता है तो यह जलवायु परिवर्तन है।
पूरी पृथ्वी पर अत्यधिक गर्म हवाएँ (लू) अधिक चलने लगी हैं। पृथ्वी का तापमान भी लगातार बढ़ता जा रहा है, ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नज़रअंदाज करना मुश्किल है। नेचरक्लाईमेटचेंज पत्रिका के जून अंक के अनुसार यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम नहीं किया गया तो हर साल झुलसा देने वाली गर्मी बढ़ती जाएगी। (स्रोत फीचर्स)

Jul 12, 2018

विज्ञान

आपदा की आहट पाने में
नाकाम सूचना प्रणाली
- प्रमोद भार्गव

मौसम की पूर्वानुमान संबंधी अनेक डिजिटल तकनीकों का विकास हो जाने के बावजूद हम प्राकृतिक आपदा की आहट पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। जबकि हमारे अनेक उपग्रह अंतरिक्ष में इन आपदाओं की निगरानी के लिए ही सक्रिय हैं। बावजूद बेखटके आँधी-तूफान, अंधड़- बवंडर और आकाशीय बिजली ने राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ऐसी तबाही मचाई कि करीब सवा सौ लोगों की जान चली गई और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गई। केदारनाथ और बद्रीनाथ के पट खुलते ही चारधाम यात्रा को अनायास आई भीषण बर्फबारी के कारण रोकना पड़ा है। यमुनोत्री के रास्ते में पहाड़ ढहने से मार्ग बंद हो गया। गोया, सवाल उठता है कि तमाम तकनीकी विकास के दावे किए जाने के बावजूद हमारे मौसम वैज्ञानिकों को आपदा की आहट क्यों नहीं मिल पा रही है। वह भी तब आए आँधी-तूफान की गति 100 से 120 किमी प्रतिघंटा की रही थी। इससे आवासीय बस्तियाँ तो तबाह हुई हीं, खेतों में लहलहाती और खलिहानों में रखी फसलें तबाह हो गईं।
हालाँकि भारतीय मौसम विभाग ने 1 मई से 4 मई के बीच आँधी-तूफान और बारिश की भविष्यवाणी की थी, लेकिन यह पूर्वोत्तर के राज्य पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और झारखंड के लिए थी। गोया, आपदा तो आई, लेकिन उसकी तबाही के केंद्र में पश्चिमी और उत्तरी भारत रहा। विभाग ने चार मई तक आपदा की शंका जताई थी, किंतु यह आठ मई तक लगातार तांडव मचाती रही। अब प्रश्न खड़ा होता है कि अरबों रुपए के उपग्रह, करोड़ों के उपकरण और मौसम विज्ञानियों का बड़ा जमावड़ा होने के बावजूद हम प्रकृति की चाल की भनक अनुभव करने में क्यों चूक रहे है। यही नहीं अब तो देश में निजी प्रबंधन से चलने वाले स्काईमेट नामक एजेंसी भी मौसम की जानकारी देने में लगी हुई है। वह भी कुदरत की इस क्रूरता का अनुमान लगाने में नाकाम रही। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि हमारे वैज्ञानिक या तो कम्प्यूटर में दर्ज होने वाले संकेतों की भाषा पडऩे में चूक रहे हैं अथवा लापरवाही बरत रहे हैं। कतिपय वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जो वैज्ञानिक तो बन गए, किंतु अपने भीतर वैज्ञानिक चेतना का समावेश नहीं कर पाए हैं। वैज्ञानिकों में बढ़ती यह प्रवृत्ति देश और संस्थाओं के लिए घातक है। यह प्रवृत्ति तो इंद्रियजन्य अनुभववादी ज्ञान के लिए उचित है और ही विज्ञान के लिए? जबकि हमारे देशज मौसम विज्ञानी घाघ और भड्डरी ने प्रकृति और पशु-पक्षियों की हलचल से ऐसा इंद्रियजन्य ज्ञान विकसित किया था कि उनकी मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणियों के अनुमान बिना किसी खर्च के लगभग सटीक बैठते थे।   
अब हमारे मौसम विज्ञानी कह रहे है कि राजस्थान और उत्तर-प्रदेश में तबाही का कारण हरियाणा के वायुमंडल में बना चक्रवाती प्रवाह है। ऐसा जलवायु परिवर्तन से मौसम में तेजी से हो रहे छोटे-बड़े बदलावों के कारण हो रहा है। नतीजतन मौसम का चक्र बिगड़ रहा है। इसी का परिणाम है कि उत्तरी पाकिस्तान और राजस्थान में तापमान ज्यादा होने की वजह से गर्म हवाएँ ऊपर की और उठ रही हैं, जिससे कम दबाव का क्षेत्र निर्मित हो रहा है। इसके साथ ही भूमध्यसागर और अरब सागर से चलने वाली पछुआ हवाओं से इस कम दबाव वाले क्षेत्र में बादल और चक्रवाती बवंडर उठ रहे है। गुजरे बवंडर का दायरा 250 किमी व्यास में था। मौसम विभाग के ये आंकड़े तब आए हैं, जब आपदा तबाही मचाकर कमोबेश ठहर गई है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद इस आशंका की पुष्टि होती है कि वैज्ञानिकों ने लापरवाही बरती है। क्योंकि ये आँकड़े तब बाँचने में आए हैं, जब प्रकृति की तबाही मचाने वाली हलचलें कम्प्यूटर की बुद्धि में पहले ही दर्ज हो गईं थी,किंतु समय रहते वैज्ञानिकों ने इन्हें बाँचने में कोताही बरती। वैसे भी अब हमारी वेधशालाओं में अत्याधुनिक संसाधन हैं, केवल इन पर हरकत करने वाली ध्वनि और वायु तरंगों पर सतर्क निगाह रखने की जरूरत है।  
क्योंकि जब ओडिशा में भयंकर तूफान आया था, तब हमारे मौसम विभाग की भविष्यवाणियाँ सटीक साबित हुई थीं। तब मौसम विभाग के सेवानिवृत्त प्रमुख एलएस राठौर विदेशी वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों को नजरअंदाज करते हुए अपने पूर्वानुमान पर डटे रहकर केंद्र राज्य सरकारों को बड़े पैमाने पर एहतियात बरतने की हिदायतें देते रहे थे। इस अवसर पर हमारे वैज्ञानिक सुपर कम्प्यूटर और डापलर राडार जैसी श्रेष्टतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे थे। तूफान की तीव्रता और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए थे। इन अनुमानों को पढ़ने की भाषा को और कारगर बनाने की जरुरत थी, लेकिन अब लग रहा है कि वैज्ञानिकों से कहीं कहीं बड़ी चूक हुई है। यदि सटीक सूचनाएँ समय पूर्व मिलने लग जाएँ, तो हम बाढ़, सूखे, भूकंप और बवंडरों से ठीक ढंग से सामना कर सकते हैं।
हमें मौसम संबंधी पूर्वानुमान की ऐसी निगरानी प्रणालियाँ विकसित करने की जरुरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य जिलेबार भविष्यवाणियाँ की जा सकें। इस नाते भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने वाले टेलीमेट्री स्टेशन बड़ी संख्या में बनाए गए थे। लेकिन बीते साल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जो रिपोर्ट दी है, उससे पता चला है कि जो टेलीमेट्री स्टेशन बने हैं, उनमें से साठ प्रतिशत काम ही नहीं कर रहे है। 1997 से 2016 के बीच देशभर में 375 ये स्टेशन बनाए गए थे, जिससे बाढ़ के बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सके। किंतु इनमें से 222 बंद पड़े है। रिपोर्ट के अनुसार पाँच राज्यों की छह परियोजनाओं के लिए मंजूर 171,28 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग ही नहीं हुआ। यदि ये वेधशालाएँ बन जाती और टेलीमेट्री उपकरण काम करने लग जाते तो हर साल बाढ़ की जो तबाही देखने में आती है, उससे जान-माल की हानि कम की जा सकती थी। देश में कुल 4862 बड़े बाँध हैं, जिनमें से 349 बाँधों के लिए ही आपात्कालीन प्रबंधन योजनाएँ तैयार की गई है। साफ है, प्रकृत्ति के कहर का पूर्वानुमान लगाने के प्रति हम सचेत नहीं हैं। 
दरअसल कार्बन फैलाने वाली विकास नीतियों को बढ़ावा देने के कारण धरती के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि बीते 134 सालों में रिकार्ड किए गए तापमान के जो 13 सबसे गर्म वर्ष रहे हैं, वे वर्ष 2000 के बाद के ही हैं और आपदाओं की आवृत्ति भी इसी कालखण्ड में सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। पिछले तीन दशकों में गर्म हवाओं का मिजाज तेजस्वी लपटों में बदला है। इसने धरती के 10 फीसदी हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। यही वजह है कि अमेरिका में जहाँ कैटरिना, आइरिन और सैंडी तूफानों ने तबाही मचाई, वहीं नीलम, आइला, फेलिन और हुदहुद ने भारत श्रीलंका में हालात बद्तर किए थे। बताया जा रहा है कि वैश्विक तापवृद्धि के चलते समुद्री तल खौल रहा है। फ्लोरिडा से कनाडा तक फैली अटलांटिक की 800 किमी चौड़ी पट्टी में समुद्री तल का तापमान औसत से तीन डिग्री सेल्सियस अर्थात् 5.4 फारेनहाइट ज्यादा है। यही ऊर्जा जब सतह से उठ रही भाप के साथ मिलती है तो समुद्री तल में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव शुरु हो जाता है, जो चक्रवाती बंवडरों को विकसित करता है। इन बवंडरों के वायुमंडल में विलय होने के साथ ही, वायुमंडल की नमी 7 फीसदी बढ़ जाती है, जो तूफानी हवाओं को जन्म देती है। प्राकृतिक तत्त्वों की यही बेमेले रासायनिक क्रिया भारी बारिश, आँधी, चक्रवात, अंधड़ और तूफान का आधार बनती है, नतीजतन कुदरत का कहर चंद क्षणों में ही तबाही की लीला रच देता है। 
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