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Jul 20, 2015

लोकनाट्य नाचाः जिसे जनता पूरी रात जागकर देखती थी

लोकनाट्य नाचाः
जिसे जनता 
पूरी रात जागकर देखती थी

- महावीर अग्रवाल
नाचा छत्तीसगढ़ अंचल में प्रचलित लोकनाट्य की एक प्रमुख शैली है, जिसे आम जनता हजारों की संख्या में रात-रात भर जागकर उतावली और बावली होकर देखती है। सूर्य की पहली किरण क्षितिज पर नहीं फूटती, तब तक इसके दर्शक मंत्रमुग्ध से बैठे रहते हैं। गाँव के बच्चों और बूढ़े, युवा और महिलाएँ सभी को समान रूप से प्रिय नाचा जनरंजन के साथ लोकशिक्षण का भी अत्यंत समर्थ माध्यम है। इस छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य में जन-जन का सुख-दुख, उसकी आशा- आकांक्षा, उसकी वेदना और खुशी के साथ ही उसकी संघर्ष क्षमता भी प्रतिबिंबित होती है। लोकजीवन का बहुरंगी और सही रूप इसमें झलकता है। लोकगीत और लोकसंगीत में पिरोकर इसे जब आज के संदर्भो में प्रस्तुत किया जाता है, तो इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। वस्तुत: इस लोकविधा में छत्तीसगढ़ी की आत्मा बोलती है।
नाचा का उद्भव एवं विकास ग्रामीण परिवेश में होने के कारण इसमें लोकनाट्य के तत्त्व भरपूर हैं। इसमें कथा लोकनाट्य की गेय और धारदार संवाद शैली पर आगे बढ़ती हैं। गम्मतिहा या जोकर की इसमें अहम भूमिका होती है, जो कि किसी भी घटना या बात को तुरंत प्रस्तुत करने में अपना सानी नहीं रखता। वह नृत्य, गायन, अभिनव तीनों में दक्ष होता है और विदूषक की तरह अपने संवादों से, अपनी आंगिक चेष्टाओं से मुख्य रुप से हँसाने का कार्य करता है। गम्मतिहा की सहायता के लिये एक दूसरा पुरुष परी बनता है। परी का अर्थ है सजी-धजी सुंदर युवती जो गायन में पारंगत हो और जिसका कंठ भी मधुर हो। परी की यह पहचान है कि हमेशा सिर पर काँसे का लोटा रखकर ही मंच पर प्रवेश करती है। तीव्र लय में नृत्य करते समय उसके सिर पर रखे लोटे का संतुलन देखते बनता है। परी की लावण्यमयी कमनीय देह, दिलकश अदाकारी और नजाकत दर्शनीय होती है। कुछ पार्टियों में परी को नचकहरिन भी कहा जाता है। कुछ नाचाओं का महत्त्वपूर्ण हिस्सा या सशक्त लोकमंचीय कलारुप होता-गम्मत जिसके विकसित होते हुए व्यापक स्वरुप में अंचल में लोकगाथाएँ और लोकगीत रच-बस गये हैं।
दुर्भाग्यवश, अश्लीलता के कारण नाचा आज कुत्सित मनोरंजन का साधन बनता जा रहा है। कई बार तो अश्लीलता सीमा को पार कर जाती है। परन्तु प्रारंभ में ऐसा नहीं था, नाचा का जन्म गाँवों में हुआ, वहीं वह फला-फूला और आगे बढ़ा। सो उसमें ग्रामीण जीवन की सहजता, उन्मुक्तता और अलमस्ती का होना स्वाभाविक था और इसके कलाकार कभी-कभी बोलचाल और अपने अभिनय में शिष्ट समाज की सीमाओं को लाँघ जाते थे। लोकजीवन में स्व‘छंदता और निकटता का बोध गाँव की जिन्दगी का जरुरी हिस्सा है, जो उसकी संस्कृति में रचा-बसा है। लोक कलाकार अपने विचारों, भावों और अपनी कला को बड़ी सादगी और सहजता से दर्शकों के सामने रख देता है। उसमें निश्छलता से ओतप्रोत तो होता है, बनावट नहीं होती, यही उसकी शक्ति है। कुछ विवेचकों को इसमें अश्लीलता के जो मापदंड हैं उनसे लोककला को मापना समीचीन नहीं है। बोली, बरताव, पहरावा-हर स्तर पर लोकजीवन में जो खुलापन है, उसी का प्रतिबिंब नाचा में है।
नाचा कलाकार अभिनय में अपने चेहरे और हाथों का अधिक प्रयोग करते हैं। बेशक कभी-कभी नाटकीय प्रभाव पैदा करने के लिये, चरित्रों के अनुरुप जटा-जूट और नकली दाढ़ी-मूँछ का भी उपयोग किया जाता है) कलाकारों की पूरी देह गतिमान रहती है, मानों उनका अंग-अंग बोलता हो। यही कारण है कि उनकी अभिव्यक्ति इतनी सशक्त और प्रभावशाली होती है कि शहरी और फिल्मी जीवन जीने वाले बड़े-बड़े कलाकार और सिद्धहस्त आलोचक भी आश्चर्यचकित होकर मुक्तकंठ से उनकी प्रशंसा करते हैं। सामाजिक कुरीतियों पर विषमता और छुआछूत पर ढोंग और पाखंड, पर शोषण और राजनीति के दोहरे चरित्र पर तीखी चोट करने की नाचा कलाकारों की क्षमता तो केवल नाचा देखकर ही समझा जा सकता है। उसकी प्रस्तुतियों की विषयगत विविधता, व्यापकता और गहराई को देखकर यह कहना गलत न होगा कि नाचा विषयवस्तु को गहरी सूक्ष्मता के साथ पकडक़र उसे व्यंग्य और हास्य से पैना बनाकार समाज के गतिशील यथार्थ का रेखांकन करता है।
सभी नाचा प्रस्तुतियों की रचनाविधि अत्यंत सरल होती है। मंडली के सभी कलाकार एक साथ बैठ जाते हैं तथा कोई ऐसा विषय मंचन के लिये उठा लेते हैं,
जो सामाजिक बुराई के रूप में उन्हें ज्वलंत प्रतीत होता है। वे तुरन्त उस पर कार्य आरंभ कर देते हैं उनके पास विषयवस्तु का न तो कोई लिखित विवरण होता है। और न नाट्यविधा के अनुसार अलग-अलग दृश्य एवं संवादों का पूर्व निश्चित विधान। यह सब वे अपने नाट्यकौशल के जरिये अत्यल्प समय में, बिना किसी कठिनाई के विकसित कर लेते हैं। गम्मत में लोकजीवन की सभी स्थितियों का चित्रण गीत, नृत्य, अभिनय और धारदार संवादों द्वारा प्रस्तुत होता है। जोक्कड़ और परी की नजाकत लगातार हास्य की सृष्टि करती है। सहजता और भोलेपन से बोले हुए संवादों को सुनकर दर्शक लगातार ठहाके लगाते हैं। जीवन के किसी भी मार्मिक प्रसंग को नाचा का आधार बना लिया जाता है। गीत और चुटीले संवादों के सहारे कथा आगे बढ़ती है। देहाती वाद्य मोहरी, डफड़ा, डमऊ, निसान-मंजीरा के सामूहिक स्वर नाचा को जीवंत बना देते हैं।

छत्तीसगढ़ के गाँवों में बार-बार खेले जाने वाले एक नाचा लोकनाट्य की कथावस्तु इस प्रकार है: किसी गाँव में एक समृद्ध हरिजन परिवार रहता है। एक बार उसकी इच्छा होती है कि उसके यहाँ भी सत्यनारायण की कथा हो। एक कथावाचक पंडितजी से अनुरोध किया जाता है। किन्तु वे अनुरोध ठुकरा देते हैं। जब परिवार की अविवाहित रूपवती सयानी कन्या को इस अपमान का पता चलता है तब वह स्वयं पंडितजी के घर जाती है। पंडित जी उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसके यहाँ कथा बाँचना स्वीकार कर लेते हैं। धीरे-धीरे दोनों में परिचय बढ़ता है। पंडितजी उस हरिजन कन्या से प्रणय निवेदन करते हैं पर यह उसे ठुकरा देती है। तब पंडितजी उसे आत्मा-परमात्मा की बातें समझाने लगते हैं। उससे कहते हैं कि दुनिया में कोई छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा नहीं है। हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं, तब वह हरिजन कन्या विवाह का प्रस्ताव रखती है। पंडित जी मान लेते हैं और इस तरह यह लोकनाट्य समाप्त होता है।
भरम के भूत नामक नाचा में अंधविश्वास पर कटाक्ष करके हास्य उत्पन्न किया जाता है। पोंगा पंडित नाम के एक अन्य नाटक में अनपढ़ ब्राह्मण पुरोहित और एक भोले-भाले कृषक पुत्र को पेश किया जाता है। अपने पिता की मृत्यु के बाद यह कृषक पुत्र पिता के श्राद्ध के अंत में सत्यनारायण भगवान की कथा करवाना चाहता है। दोनों ही पात्र अपने अज्ञान एवं भोलेपन से हास्य की सृष्टि करते हैं।
छोटी-छोटी कथाओं में से कुछ में दो पत्नियों वाले व्यक्ति की दुर्दशा की तुलना पीपल की पत्तियों से की जाती है, जो हवा के हल्के से झोंके से काँपने लगते हैं या ग्रामीण किसान के ऐसे भोले-भाले बेटे की कहानी प्रस्तुत की जाती है, जो अपने बिगड़े हुए साथी की संगत में व्यभिचार की ओर उन्मुख हो जाता है और अंत में कोढ़ का शिकार हो जाता है। सामान्यत: इन नाटकों की यह नसीहत होती है कि बुरे काम का नतीजा हमेशा बुरा होता है।
नृत्य और नाटक में प्राण फूँकने की नाचा कलाकारों की असाधारण क्षमता के प्रभाव से दर्शक अपने आपकों दूसरी दुनिया में पहुँचा हुआ महसूस करते हैं। वे नाटक के पात्रों के सुख-दुख में बराबर के भागीदार बन जाते हैं। यह नाचा की विलक्षण उपलब्धि है कि बिना किसी विशेष वेशभूषा के सिर्फ अपनी जीवंत अभिनय-क्षमत द्वारा इसके कलाकार प्रत्येक चरित्र को बेहद ईमानदारी के साथ जीते और उसमें प्राण फूँक देते हैं।
समय के साथ-साथ नाचा की भाषा और प्रस्तुति में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। फिल्मों का व्यापक प्रभाव इसके गीत, संगीत और वेशभूषा में प्रकट होने लगा है और व्यावसायिकता के चक्रव्यूह में फँसकर नाचा अपनी सहजता और मौलिकता खो रहा है। कूल्हों की मटक और द्विअर्थी संवादों में मनोरंजन खोजने वाली फूहड़ संस्कृति उस पर हावी हो रही है। भडक़ीले कपड़ों के साथ भद्दे संवादों का प्रयोग चिंतनीय है। पहले परी लोकगीत और ब्रम्हानंद के भजन गाती थी। अब 90 प्रतिशत गीत फिल्मी होते हैं। नाचा को यदि अपनी अस्मिता बचाये रखनी है तो उसे फिल्मी तडक़-भडक़ का रास्ता छोडऩा पड़ेगा।
सच्चा कलाकार अपने अंत: करण की प्रवृत्ति और रुझान की आग में तपकर तैयार होता है। अभाव में बीत रहे जीवन और अनिश्चित भविष्य के बावजूद सृजन के आवेश और दबाव में वह प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को कैसे गढ़ता और तैयार करता है, यह रात-रात भर नाचा देखकर और नाचा कलाकारों के जीवन को निकट से देखकर ही जाना जा सकता है। नाचा के क्रमिक इतिहास उसके कलाकारों की पीड़ा उसके संघर्षो और प्रश्नचिह्नित उपलब्धियों को दीपक चन्द्राकर द्वारा निर्मित एवं रामहृदय तिवारी द्वारा निर्देशित फीचर फिल्म लोकरंग के गम्मतिहा में सूक्ष्म रुप से रेखांकित किया गया है।
कहना न होगा कि अपनी संस्कृति और इतिहास की बाँह थामकर, वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न संस्कृति के सृजनशील तत्त्वों से जुडक़र ही नाचा सही और सकारात्मक विकास कर सकेगा। सामाजिक चिंतन से जुड़े हुए तमाम रचनाकारों, कलाकारों एवं सृजनधर्मियों को इस दिशा में सोचना और नाचा को समाज के गतिशील यथार्थ और सामाजिक चेतना से जोडऩे का प्रयास करना चाहिये।
अन्यथा छत्तीसगढ़ के लोकजीवन को अभिव्यक्त करने वाली यह सर्वाधिक प्रभावशाली कला इतिहास की चीज बनकर रह जाएगी।

Mar 17, 2010

ये साहित्यिक लठैत

- महावीर अग्रवाल
'लाठी' जवांमर्द का प्रतीक रही है। जमींदारों के रुतबे और उनकी शान-शौकत को बरकरार रखने में उनके लठैत हमेशा लाठी का जोर आजमाते हैं। मालगुजारों की उज्जवल कीर्ति ने लठैतों के बल पर ही आकाश चूमा है। बड़े-बूढ़ों के मुख से तत्कालीन लठैतों की बहादुरी के किस्से आप सुनने बैठिए रात बीत जाएगी, पता भी न चलेगा। लठैतों के चमत्कार वे इतने रससिद्ध और प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि सुनने पर ऐसा लगता है कि कोई फिल्म देख रहे हैं। वे भाव- विभोर होकर उनकी बहादुरी की गाथा सुनाते हैं। वे बताते हैं जमींदार लठैतों के दम पर कैसे राज करते थे। अत्याचार करते थे। केवल चार छह लठैतों की टीम पूरा गांव उजाडऩे की क्षमता रखती थी। जब चाहा तब खड़ी फसल काट ली। जिस पर नजर ठहरी, उसे दिन- दहाड़े उठवा लिया। लाठी का जोर ही सब कुछ था। वह युग लाठी वाले हाथों का युग था। इसीलिए इस कहावत का जन्म हुआ- 'जिसकी लाठी उसकी भैंस।'
अब यह युग कलम का युग है, कलम वाले हाथों का आज जमाना है। पत्रकार हो या लेखक- कलम का जोर सब मनवा लेते हैं। बुद्धिजीवियों की बढ़ती और चढ़ोतरी का युग है। साहित्यिक चर्चाओं, गोष्ठियों और शिविरों का माहौल गरम रहता है। जमकर लिखा जा रहा है। जिसे कहते हैं साहित्य। साहित्यकारों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि श्रोता और पाठक कम हो गए हैं। पचास लोग मिलकर प्रयोगधर्मी नाटक खेलते हैं तो देखने वालों की संख्या पच्चीस रहती है। उसके अतिरिक्त खूब कवि हैं, ढेर सारे। कोई कहानीकार है तो कोई उपन्यासकार। कोई नाटककार है तो कोई व्यंग्यकार। स्थिति ऐसी है कि भीड़ में कंकड़ फेकिये। जिसे लगेगा, वह साहित्यकार ही होगा।
अब तो धन्नासेठों के लक्ष्मीपुत्रों को भी कविता का शौक चर्राया है। घर वाले चिल्लाते रहते हैं- कवि के रूप में कुल कलंग पैदा हो गया। परंतु साहबजादे साहित्य की सेवा में मस्त रहते हैं। वाह- वाही करने चार साहित्यिक हमेशा साथ लगे रहते हैं। लगन बराबर बढ़ती जा रही है। ये अपने नये संग्रह के लिए एक साहित्यिक लठैत की खोज में हैं।
क्या कहा? साहित्यिक लठैत।
हां, जी हां। साहित्यिक लठैत की खोज में हंै।
सुनिए साहब। साहित्यिक लठैत उन्हें कहते हैं जिनकी साहित्यिक जगत में तूती बोलती है।
साफ- साफ बताइए। पहेलियां मत बुझाइये।
तो सुनिए। ....।। जिस प्रकार पहले जमींदारों और मालगुजारों का उत्थान पतन उनके लठैतों पर निर्भर रहता था, उसी प्रकार समकालीन साहित्यिक जगत में किसी भी साहित्यिकार का उत्थान और पतन समीक्षकों की टोली पर निर्भर करता है। इन्हें ही चालू भाषा में साहित्यिक लठैत कहते हैं।
बात कुछ कुछ जमती है भाई।
पूरी बात तो सुनिए। जैसे जमींदारों के लठैतों की लाठियां आक्रमण के साथ- साथ समय पडऩे पर सुरक्षा भी अख्तियार करती थी, उसी प्रकार साहित्यिक लठैत विरोधियों पर जमकर आक्रमण करते हैं। और जब विरोधी खेमे में साहित्यिक लठैत किसी कृति की धज्जियां उड़ाते हैं, तो ये सुरक्षा कवच बनकर सामने आते हैं।
कहा जाता है कि यदि दिग्गज समीक्षक आपके पहले संग्रह पर अनुकूल टिप्पणी दे दे, तो देखते ही देखते आप साहित्याकाश पर चमकने वाले सितारे होंगे। आपकी तुलना तोड़ती पत्थर, ब्रह्मराक्षस, कामायनी, आंसू, कुरुक्षेत्र से होने लगेगी। लोग समझने लगेंगे कि एक दिव्य प्रतिभा का अवतरण साहित्यिक जगत में हो चुका है। और यदि वे साहित्यिक लठैत नाराज हो गये तो आपके पचीसों संग्रह आने के बाद भी आप बौने ही रहेंगे और लगातार आकाश छूने के लिए फडफ़ड़ाते रहेंगे। एक दिन मैंने अपने- अपने क्षेत्र के प्रख्यात तीन समीक्षकों से भेंट की। दो पंक्तियां उनको कागज पर लिखकर दी और कहा कि आप इन पंक्तियों की सजीव व्याख्या कीजिए। वे राजी हो गए। उनमें से एक थे- कथावाचक जो भक्तों की भीड़ के बीच हारमोनियम के माध्यम से कीर्तन भी कर रहे थे और सस्वर पाठ करने के बाद अपने ढंग से व्याख्या या समीक्षा करते जा रहे थे। भगवान अदृश्य है, सबकी सुनते हैं। सब कुछ करते हैं पर नजर नहीं आते। मैं तो दिन रात उनके ही चरणों की वंदना करता हूं।
दूसरे नामी गिरामी विद्वान थे। उद्भट विद्वान, प्रकांड पंडित जैसे शब्द छोटे पड़ जाते हैं उनके सामने। हमेशा कार पर चलने वाले। शोषण के विरुद्ध नाम बुलंद करने वाले माक्र्सवाद में गहरी आस्था रखने वाले समीक्षक थे। वे जनसभा को संबोधित कर रहे थे- यह सही है कि मैंने गरीबी नहीं देखी। अभावों का दुख नहीं जाना। बचपन से ही वैभव के बीच रहा, लेकिन मजदूर हमारे भाई हैं। इनका दुख हमारा दुख है। उनकी मांगें हमारी मांगे हैं। उनके अधिकारों के लिए मैं आखिरी दम तक लडूंगा।
और तीसरे थे पुस्तकों के प्रेमी एक पढ़ाकू युवक। उभरते हुए कवि और समीक्षक के रूप में उनकी पहचान बनी थी कि अचानक उनकी मंगनी हो गई। आज्ञाकारी पुत्र होने के कारण वे बाग्दता को देखने भी नहीं गये। परंतु अपनी इस प्रेयसी का भूत उन्होंने स्वयं के सर पर चढ़ा लिया। भावी पत्नी और वर्तमान प्रेमिका के प्रेम में मस्त होकर उन्होंने भी उन दो पंक्तियों की समीक्षा की जो मैंने उन्हें लिखकर दी।
तीनों जाने-माने समीक्षक थे। पंक्तियां वे ही थीं परंतु नजर अलग अलग थी। पहले कथावाचक ने कहा- मैंने भगवान नहीं देखा पर उनका गुणगान करता हूं। दूसरे कार वाले माक्र्सवादी ने कहा- मैंने मजदूरी नहीं की गरीबी नहीं देखी लेकिन उसके लिए संघर्ष करता हूं। और तीसरे पढ़ाकू युवक ने कहा- अभी तक मैंने अपनी प्रेमिका को नहीं देखा तो क्या हुआ। तीनों साहित्यिक लठैतों ने अपने- अपने ढंग से दो पंक्तियों की व्याख्या की। चौथे से मिलता तो वे भी अपने ढंग से नई व्याख्या करते। इसीलिए तो कहता हूं रचनाकारों से कि साहित्यिक लठैतों से न उलझें। अब आपको भी दो पंक्तियां समीक्षा हेतु परोस रहा हूं:
उन पर हम जान देते हैं अनवर,
जिन्हें अब तक देखा नहीं है।
संपर्क- संपादक 'सापेक्ष',
ए-14, आदर्श नगर,
दुर्ग (छ.ग.) 491003,
फोन - 0788- 2210234
व्यंग्यकार के बारे में ...
महावीर अग्रवाल ने केवल व्यंग्य ही नहीं लिखे बल्कि उनकी सक्रियता का क्षेत्र व्यापक है। उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी के साथ प्रगतिशील विचारधारा की पत्रिका 'सापेक्ष' को अपनी जीवन संगिनी श्रीमती संतोष अग्रवाल के साथ मिलकर बड़े परिश्रम और यत्न पूर्वक प्रकाशित सम्पादित कर एक राष्ट्रीय पहचान दी। उनका सम्पूर्ण कार्यक्षेत्र दुर्ग रहा और दुर्ग से ही श्री प्रकाशन आरंभ कर छत्तीसगढ़ के अनेक लेखकों के संग्रह छापकर उन्हें उपकृत किया। महावीरजी ने देश के मूर्धन्य साहित्यकारों के साक्षात्कार के लिए और उन्हें प्रकाशित किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोककला पर काम किया, नाचा पर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। 'गधे पर सवार इक्कीसवी संदी' और 'लाल बत्ती जल रही है' नाम के उनके दो व्यंग्य संग्रह हैं। यहां प्रस्तुत व्यंग्य रचना 'ये साहित्यिक लठैत' में लेखक ने अपने अनुभवों से साहित्य की खेमेबन्दी में व्याप्त लठैतों का चिट्ठा खोला है। विशेषकर साहित्यिक आलोचना जगत में तैनात लठैतों की संदिग्ध भूमिका और आलोचक के भीतर पनप रही सामन्ती प्रवृत्तियों की ओर इशारा किया गया है।
- विनोद साव

Jan 19, 2009

जब गुलाब के फूल देखकर गदगद हुए कमलेश्वर

डायरी से/ 27 जनवरी पुण्यतिथि
जब गुलाब के फूल देखकर 
गदगद हुए कमलेश्वर
- महावीर अग्रवाल 
उनकी ऊर्जा समाज, पाठक व परिवेश है। वे तो महज हाथी के दांत हैं। खाने वाले तो पाठक हैं। वे जो कुछ लिखते हैं उनकी सामग्री समाज से ही मिलती है। उनका पूरा लेखन मनुष्य के लिए है।

मेरी बांछे खिल गई थीं उस दिन 12 जनवरी 2003 को जब 10-12 मित्रों के साथ संध्या समय कमलेश्वर मेरे घर पधारे थे। यह उन दिनों की बात है, जब बख्शी सृजनपीठ भिलाई के अध्यक्ष सतीश जायसवाल के आमंत्रण पर वे माधवराव सप्रे पर केंदित आयोजन में भिलाई आए थे। मेरी डायरी में लिखा हुआ है कमलेश्वर ने पहली सभा में 'गांधी, जिन्ना और अंबेडकर' की कथा सुनाकर जिस तरह तालियां बटोरीं वह चमत्कार से कम नहीं है। दूसरी सभा में जब उन्होंने 'हमलावार कौन' कथा प्रस्तुत की तो सन्नाटा छा गया। अध्यक्षीय आसंदी से अच्युतानंद मिश्र ने कमलेश्वर को बधाई देते हुए साधुवाद दिया। इसी बीच स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार जमुना प्रसाद कसार ने अपनी पुस्तकें अतिथियों को भेंट की। सियाराम शर्मा, लोक बाबू, परमेश्वर वैष्णव, रवि श्रीवास्तव, विनोद मिश्र, गुलबीर सिंह भाटिया, घनश्याम त्रिपाठी, संतोष झांझी, प्रभा सरस, विद्या गुप्ता, मीना शर्मा और महेशचंद्र शर्मा सहित अनेक साथी आपस में चर्चा करते रहे- अभूतपूर्व कथाओं को प्रस्तुत करने में कमलेश्वर के निराले अंदाज में अनोखा परिष्कार ही नहीं मूल्यबद्धता का समर्पित संस्कार भी नजर आया।

कमलेश्वर लगातार दो दिनों तक साहित्यकारों और अपने पाठकों से घिरे रहे। अधिकांश लोगों ने अपने प्रिय लेखक से आटोग्राफ लिए व उनकी कहानियों, उपन्यासों के बारे में जमकर सवाल किए। कमलेश्वर ने अपनी चिरपरिचित शैली में तर्कसम्मत जवाब दिए। उन्हें जब एक बच्ची शुभी (बुशरा सबा खान) से मिलाया गया और यह बताया गया कि यह उनकी नई पाठिका हैं तो वे भावविह्वल हो गए। (सतीश जायसवाल ने 'इंद्रधनुष सचमुच' कहानी बच्ची शुभी पर लिखी और वह कहानी 'कथादेश' में छपी)।

दो दिनों के सफर और कई सत्रों के कार्यक्रम की मसरुफियत व थकान के बावजूद इकहत्तर वर्षीय कमलेश्वर की बातों में उनके साहित्य की तरह ताजगी व उत्साह दिखाई दे रहा था।

थकान, उकताहट या औपचारिकता का भाव कहीं नहीं था। उनसे पूछा कि आप इतना अच्छा व इतनी अधिक कहानियां कैसे लिख लेते हैं तो उन्होंने उलट कर प्रश्न किया कि बताओ मेरी उम्र क्या होगी?

किसी ने साठ किसी से पैंसठ कहा। पर जब कमलेश्वर ने अपनी उम्र इकहत्तर वर्ष बताई तो सभी चौंक पड़े। उन्होंने बताया कि उनकी ऊर्जा समाज, पाठक व परिवेश है। वे तो महज हाथी के दांत हैं। खाने वाले तो पाठक हैं। वे जो कुछ लिखते हैं उनकी सामग्री समाज से ही मिलती है। उनका पूरा लेखन मनुष्य के लिए है। कमलेश्वर ने बताया कि उनका उद्देश्य साहित्य से रोजी कमाना नहीं है। उनके पाठक उनकी असली पूंजी हैं। पाठक तो 'कितने पाकिस्तान' कृति के फोटो के भी दीवाने हैं। यह बात उन्हें संतुष्ट करती है। वे तो अपने लेखन के लिए कभी किसी से अपेक्षा नहीं करते। एक छात्रा ने पूछा कि क्या आप कभी किसी पाकिस्तानी राइटर से मिले हैं और वे भारत के बारे में कैसी राय रखते हैं। जवाब में कमलेश्वर ने बताया कि कई लेखकों से मिल चुके हैं। अहमद फराज, सुल्तान जावेद जैसे पाकिस्तानी लेखक भी भारत- पाक कटुता व आतंकवाद पर हमारी तरह ही इत्तफाक रखते हैं।

आतंकवाद से किसी का भला नहीं होने वाला है। एक छात्रा ने पूछा अव्यवस्था देखकर क्या आप राजनीति में जाना पसंद करेंगे? कमलेश्वर ने कहा, यदि राजनीति में गए तो वे भी राजनीतिकों की तरह सुख सुविधा से प्रभावित हो जाएंगे। वे अपना काम लेखन से कर रहे हैं और करते रहेंगे।

उन्होंने कहा वे कभी भी फिजूलखर्ची नहीं करते। एक छात्रा ने पूछा यदि आपको अपनी फिल्म 'आंधी' व 'मौसम' आज के परिवेश में दोबारा लिखने कहा जाए तो कैसे लिखेंगे? उन्होंने कहा ये दूसरी तरह की फिल्में थीं। आज एक दूसरी तरह की कहानी बनेगी। अभी इंदिरा गांधी पर पटकथा लिख रहा हूं। फिल्म बनने के बाद उसे देखकर आप सब समझ जाएंगे कि मैं फिल्म किस तरह लिखता हूं। कमलेश्वर ने कुछ अन्य सवालों के जवाब में बताया, कहानी हो, कविता हो या उपन्यास हो हर रचना में चाहे वह चित्रकला व मूर्तिकला क्यों न हो अस्मिता की तलाश व समकालीन मूल्यों का समाहित होना जरुरी है। हम एक जागरूक समाज के पक्षधर हैं और जागरुक नागरिक की तरह लेखक समाज का भी अपना देश होता है। दूसरे दिन पहले हम सब 4 बी, स्ट्रीट 33, सेक्टर-9, 'बख्शी सृजनपीठ' पहुंचे, वहां कहानीकार सतीश जायसवाल ने उनका भावभीना स्वागत किया। कमलेश्वर की सहजता और सरलता ने सबको अभिभूत कर दिया। समय बहुत कम था, इसलिए भागते-दौड़ते हुए कुछ मित्रों के साथ उनके प्रिय परदेशीराम वर्मा, कमलेश्वर को अपने घर ले गए, और फिर वे मेरे घर तक आए, जहां सतीश जायसवाल, अशोक सप्रे, परदेशीराम वर्मा, अशोक सिंघई, प्रशांत कानस्कर और विनोद साव ने मिल-बैठकर एक घंटे गपशप की।

घर की बनी हुई केसर की खीर तो कमलेश्वर जी ने बहुत कम खाई लेकिन नमकीन गुजिया और चटपटे आलू की चाट उन्हें बहुत पसंद आई। इतना ही नहीं किचन में पंहुच कर गृहणी से उन्होंने कहा आप सापेक्ष की प्रबंध सम्पादक हैं , आप सापेक्ष नाम के इस दीपक को हमेशा जलाए रखिएगा। फिर दिल्ली अपने घर आने का आमंत्रण भी दे दिया।

हमारे छोटे से बगीचे में 100 से अधिक गुलाबों की छटा देखने के काबिल थी। एक-एक पौधे में सात से सत्रह तक गुलाब के फूल मुस्कुरा रहे थे। काले गुलाब के साथ हल्दिया, गहरे व हल्के बैंगनी, सुर्ख लाल, पंचरंगी गुलाब, पीला, सफेद और इन्द्रधनुषी गुलाबों की रंगत देखकर कमलेश्वर गद्गद् हो गए। अंधेरा घिर आया था, मैंने फटाफट बाहर से बिजली के लट्टू जला दिए। उन्होंने कहा, महावीर जी इतने बड़े-बड़े और स्वस्थ गुलाब किसी के घर में मैंने बहुत कम देखे हैं। इतना सब मेन्टेन करने के लिए आपका पूरा परिवार बधाई का पात्र है। कमलेश्वर जी का छत्तीसगढ़ और मेरे घर आना आज भी जीवित हैं हमारी स्मृतियों के अंतरिक्ष में।