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Nov 20, 2009

मुझे भी आता है गुस्सा

हैलो जी...
- रजत आनंद
ज्रुरूत के समय मोबाइल पर बतियाना अच्छी बात है पर समय कुसमय कहीं भी गप्प हांकना या सामने वाले के समय के महत्व को न समझते हुए किसी भी समय रिंग कर देना कहां तक सही है? वे यह भी नहीं देखते हैं कब, कहां और कैसी बातचीत करनी है।

Oct 22, 2009

मुझे भी आता है गुस्सा

अपनी सोच बदल डालिए
- सुमन परगनिहा
आइए हम सब मिलकर कुछ सोचते हैं कि क्या किया जाए। क्यों न हम किसी का मुंह ताकने की बजाए खुद ही आगे आ कर इसके लिए एक प्रयास करें। सबसे पहले तो अपने घर से ही शुरु करें।
मैं जो यहां कहने जा रही हूं वह कोई नई समस्या या गुस्से का कोई नया कारण नहीं है। हो सकता है इसे पढ़ते ही आपको लगे ऊंहूं.... फिर वही पुराना राग।..... लेकिन रूकिए और जरा सोचिए क्या जब आप सड़क के किनारे पैदल चल रहे हों और सड़क संकरी हो तभी पीछे से तेज हार्न बजाती कोई गाड़ी आपसे और किनारे होने को कहे तो आप क्या करेंगे? क्योंकि आपके पास तब सड़क किनारे बिखरे कचरे और गंदगी के ढेर के ऊपर चलने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा। तब, तब तो आपको गुस्सा आएगा ना? और बरबस ही आप कह उठेंगे कि कचरा फेंकने के लिए क्या सड़क का किनारा ही बचा है।
जी हां यही है मेरे गुस्से का कारण। प्रश्न यह है कि सड़क किनारे कचरा कौन फेंकता है? आस- पास रहने वाले ही न। जवाब यह भी मिलता है कि अपने घरों का कचरा कहां जा कर फेंके। नगर निगम न तो कचरा उठाने का कोई प्रबंध करती और न ही कचरा फेंकने का। सफाई कर्मचारी आते है नाली का कचरा सड़क किनारे इकट्ठा करके चले जाते हैं कि इसे उठाने का काम हमारा नहीं है इसके लिए गाड़ी आएगी कहते हुए चले जाते हैं। यह बात भी सही है। तब क्या करें? हम तो हर साल जल, मल कर नियमित पटाते हैं, पर सफाई व्यवस्था को लेकर कभी भी संतोष जनक परिणाम नहीं निकलता।
पर कोई न कोई तो हल निकालना ही होगा न? आईए हम सब मिलकर कुछ सोचते हैं कि क्या किया जाए। क्यों न हम किसी का मुंह ताकने की बजाए खुद ही आगे आ कर इसके लिए एक प्रयास करें। सबसे पहले तो अपने घर से ही शुरु करें। आप प्रति वर्ष दीपावली में अपने घर की साफ- सफाई करते हैं पर घर से निकलने वाला कचरा कहां फेंक कर आते हैं सड़क के किनारे ना? यह सोचकर कि सड़क की सफाई का काम तो नगर निगम का है वह करवायेगी सड़क की सफाई। क्या आपकी यह सोच सही है? तो बस इसी सोच को बदल डालिए। आप घर बैठकर हमेशा सफाई के नाम पर इसको- उसको कोसते रहते हैं पर क्या आपने कभी अपनी कालोनी या मोहल्ले में रहने वालों के साथ मिल बैठकर इस समस्या का हल निकालने की कोशिश की है। या कभी संबधित विभाग के अधिकारी से मिलकर इसका समाधान खोजने का प्रयास किया है। यदि नहीं तो इस दिशा में भी सोचिए, हो सकता है आपको समाधान मिल जाए।
आप कह सकते हैं कि अरे छोडिय़े यह सब कहने में बहुत अच्छा लगता है पर वास्तव में जब कुछ करने निकलो तो नतीजा कुछ नहीं निकलता। हां आप सही कह रहे हैं पर मुझे जरा यह तो बताइए क्या नतीजा चुपचाप बैठे रहने से निकल जाएगा। एक पहल तो कीजिए। भले ही गुस्सा दिखाकर। आपके इस गुस्से में कई लोगों का गुस्सा शामिल हो जाएगा तो कुछ तो हल निकलेगा।
तो आईए इस दीवाली में गुस्सा थूंक कर कोई समाधान निकालें और अपने घर के साथ- साथ अपने आस- पास के वातावरण को भी शुद्ध रखने का संकल्प लें।

Sep 23, 2009

मुझे भी आता है गुस्सा

बेटी पुकारने में झिझक क्यों
- सुजाता साहा
छोटे पर्दे पर इन दिनों बेटियों को लेकर ढेर सारे कार्यक्रम चल रहे हैं - अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, बालिका वधू, 24/12 करोलबाग आदि, जिनमें हमारे देश में बेटियों की सामाजिक पारिवारिक स्थितियों के माध्यम से समाज की विभिन्न बुराईयों और कुरीतियों से लडऩे के लिए रास्ते निकाले जाने का बेहतर प्रयास किया जा रहा है। वहीं जब किसी कार्यक्रम में बेटियों को बेटा कहकर संबोधित किया जाता है तो मुझे गुस्सा आ जाता है।
हाल में स्टार टीवी पर एक नया कार्यक्रम शुरू हुआ है तेरे मेरे बीच में। फरहा खान द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया के वर्तमान में मशहूर कलाकारों को बुलाया जा रहा है जिसमें उनकी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया जाता है। सलमान खान, शाहरूख खान, विजेन्द्र सिंह, प्रियंका चोपड़ा के बाद दो ग्लैमरस तारिकाओं को दर्शकों के सामने पेश किया गया बिपाशा बसु और शिल्पा शेट्टी।
आप सोच रहे होंगे कि इनके बारे में मुझे भी आता है गुस्सा  स्तंभ में बताने की क्या जरुरत पड़ गई?  मैं इस कार्यक्रम के बारे में नहीं बल्कि फरहा द्वारा इन दोनों तारिकाओं को बार- बार यह कहकर संबोधित करने पर, कि आप मिल रहे हैं अपने परिवार के दो बेटों से, पर आपत्ति दर्ज कराना चाहती हूं। आखिर फरहा को ऐसा कहने की जरुरत महसूस क्यों हुई? जबकि वह खुद भी एक काबिल बेटी है और बेटियों की मां है, फिर आज के दौर में जबकि बेटे और बेटी के बीच भेदभाव मिटाने के लिए कई धारावाहिक चल रहे हैं, वहां बेटियों को बेटा कहकर संबोधिन किया जाना कुछ अटपटा लगा। बेटा कहे जाने पर इन दोनों बेटियों ने भी आपत्ति दर्ज नहीं की। जबकि फरहा ने इसी कार्यक्रम में एक ऐसे परिवार को बुलाकर सम्मानित किया और एक लाख का चेक देकर उनकी सहायता की जो अपने माता- पिता व भाई का पालन- पोषण नौकरी करके कर रही है। इन दोनों तारिकाओं ने भी उनके दोनों नालायक बेटों को खरी- खोटी  सुनाई- शिल्पा ने कहा 'आपके बेटों की इज्जत बिल्कुल नहीं करती।' और बिपाशा ने कहा 'मेरे बेटे होते तो मैं मार- मार के निकालती।' कहने का तात्पर्य यह कि अगर आप मीडिया के माध्यम से नामी सितारों के जरिए एक अच्छा संदेश देने जा रहे हैं तो कम से कम ऐसा तो मत कहिए कि संदेश ही गलत जाए।
इस कार्यक्रम के बहाने मेरा गुस्सा उन लोगों के प्रति भी उभर के आ गया जिनके माता- पिता अपनी काबिल बेटी का परिचय-  यह हमारी बेटी नहीं बेटा है, कहते हुए कराते हैं। वे गर्व के साथ यह भी तो कह सकते हैं ये है हमारी होनहार बेटी, जिसने आज एक मुकाम हासिल किया या जिसने अपने परिवार की जिम्मेदारी सम्भाल ली है। कितना ही अच्छा हो कि माता- पिता और फरहा जैसी सेलीब्रिटीज गर्व से कहें मिलिए हमारी इन होनहार बेटियों से.....

Apr 27, 2009

हमने अपनी धरती को कचरे का डब्बा बना दिया

हमने अपनी धरती को 
कचरे का डब्बा बना दिया
- कुमुदिनी खिचरिया

मुझे बहुत गुस्सा आता अपने उन देशवासियों पर जो अपने शहर, मोहल्ले, अस्पताल, सरकारी दफ्तर, स्कूल कालेज, पिकनिक स्पाट, सड़क, नदी, पहाड़ जो हमारे देश की शान है, हमारा सम्मान है, को कचरे का डब्बा समझते हैं।
हम सब अपने भारतवासी होने में बहुत गर्व करते हैं और करना भी चाहिए। देश पर जब मुसीबत आती है तब उस मुश्किल घड़ी में हम सब एक होकर लडऩे- मरने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि ऐसे समय में प्रत्येक भारतवासी के दिल में देश प्रेम का जज्बा जाग उठता है। यह बहुत अच्छी बात है कि हम अपनी धरती अपनी मां के लिए हमेशा मर मिटने के लिए तैयार रहते हैं, परंतु दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं किय यह एकता, यह प्यार सिर्फ लड़ाई, दंगे और प्राकृतिक विपदा के समय ही दिखाई देता है।
मुझे बहुत गुस्सा आता अपने उन देशवासियों पर जो अपने शहर, मोहल्ले, अस्पताल, सरकारी दफ्तर, स्कूल कालेज, पिकनिक स्पाट, सड़क, नदी, पहाड़ जो हमारे देश की शान हैं, हमारा सम्मान है, को कचरे का डब्बा समझते हैं।
अब आप सोचेंगे कि मैं अचानक देश प्रेम की बात करते-करते कचरे जैसे मुद्दे पर कैसे उतर आई। पर सच तो ये है कि मेरा देश प्रेम इसी विषय को लेकर है। क्योंकि जिस देश में हम रहते हैं वह आज कचरे का डब्बा ही तो बनते जा रहा हैं। आप बाजार में जा रहे हैं, बस में, ट्रेन में सफर कर रहे हैं, पर्यटन स्थल में घूम रहे हैं, आपने देखा ही होगा कि आपके चारो तरफ तंबाकू, गुटका, पानी के पाऊच, और न जाने किस-किस तरह के प्लास्टिक रैपर पड़े हुए नजर आते हैं। सबसे अधिक दुख की बात तो यह है कि यह सारा कचरा और कोई नहीं हम और आप ही फेंकते हैं।
मैं पूछना चाहती हूं क्या आप घर पर भी ऐसा ही करते हैं? मुझे गुस्सा आता है ऐसी गृहणियों पर जो घर को तो शीशे सा साफ रखती हैं, बच्चे यदि घर पर कचरा करे तो उन्हें डाटती हैं, लेकिन वही गृहणी जब घर से बाहर घूमने निकलती है, पिकनिक पर जाती हैं तो पूरा कचरा जहां खाया वहीं छोड़कर चली आती हैं। इतना ही नहीं अपने बच्चों को भी ऐसा करने से नहीं रोकती। क्या यही है हमारे देश की पढ़ी- लिखी गृहणी?
मुझे अपने व्यवसाय के सिलसिले में बहुत से सरकारी दफ्तरों में जाता पड़ता है वहां का हाल देखकर तो गुस्सा नहीं बल्कि शर्म आती है अपने आप पर अपने देश के लोगों पर जो इस तरह गंदे वातावरण में आराम से आठ घंटे बैठकर काम करते हैं। हमारे शहर का तहसील आफिस जहां करोड़ों का राजस्व आता है, वहां आप चारों तरफ कचरा ही कचरा देखेंगे। वहां पंहुचते ही नाक में रूमाल रखकर सांस लेना पड़ता है, दीवारों से एक फीट दूर खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वे पान के पीक से रंगे होते हैं, इस तरह का नजारा लगभग सभी शहरों में प्रत्येक सरकारी दफ्तरों में दिखाई देता है। यह सब देखकर हम एक दूसरे को सिर्फ कोसते रह जाते हैं न खुद सुधरते न ऐसा करने वालों को सुधारने के लिए कुछ करते।
इन सबसे मुसीबत मोल लेने के बजाय देश का एक वर्ग विशेष, जो काम प्राइवेट सेक्टर में किए जा सकते हैं वहां जाना पसंद करते हैं जैसे बैंक, अस्पताल। इसके लिए वे ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार रहते हैं। लेकिन यह तो समस्या का समाधान नहीं है। देश प्रेम का जज्बा हमें अपने देश को साफ सुथरा, प्रदूषण से मुक्त, सांस लेने लायक बना कर रखने में भी दिखाना होगा, तभी हम सच्चे देश भक्त कहलाने के हकदार बनेंगे।
मेरे अंदर गुस्सा तो बहुत भरा हुआ है फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं और मुझे विश्वास है कि हमारे देशवासी सफाई का महत्व भी जल्द ही समझेंगे और अपने घर के बाहर को भी घर की तरह साफ सुथरा रखने के बारे में सोचेंगे .....तब मैं एक और आर्टिकल लिखूंगी कि मुझे गर्व है ...

Feb 25, 2009

मुझे भी आता है गुस्सा

अपनी जिम्मेदारी से मुँह न मोड़ें
- रश्मि वर्मा
'अस्पताल' अपने आप में कष्टप्रद शब्द है उस पर किसी अपने को लेकर जाना और वहां इलाज के लिए इधर से उधर भटकना, डॉक्टर के इंतजार में आते जाते मरीजों को देखना और इन सबके साथ अस्पताल के आस- पास फैली गंदीगी तो जैसे अस्पताल की पहचान होती है। अस्पताल में प्रवेश करते ही मरीजों की लाईन और दर्द को देखकर घबराहट वैसे ही बढ़ जाती है जो अच्छे भले स्वस्थ इंसान को बीमार कर देता है।

मुझे समझ नहीं आता हमारे देश में अस्पताल के माहौल को इतना मनहूसियत भरा बना कर क्यों रखा जाता है। प्राईवेट क्लिनिक तुलनात्मक रुप से जरुर साफ नजर आते हैं वहां के वातावरण को भी कुछ हल्का करने की कोशिश की जाती है। जहां इंतजार में बैठे मरीजों के लिए कुछ पत्रिकाएं होती हैं। टीवी लगाकर भी मरीज के इन कष्टप्रद क्षणों को कम करने की कोशिश की जाती है। कई जगह मधुर संगीत भी सुनाई देने लगा है। यदि सभी अस्पतालों में सफाई और मन को शांत रखने वाला वातावरण मिले तो फिर कहना ही क्या? मरीज वहां से आधा स्वस्थ होकर निकलेगा और आधा दवाई खाने के बाद ठीक हो जाएगा।

परंतु अस्पताल के माहौल और व्यवस्था को लेकर जिस तरह के अनुभवों से मैं गुजरी हूं आप भी अनुभव कर चुके होंगे। एक बार मैं अपने परिवार के बीमार सदस्य को लेकर अस्पताल पहुंची। नंबर लगा कर मैं अपनी बारी के आने का इंतजार करने लगी, मेरे आगे अभी दो मरीज और थे। मैं कुछ समझ पाती कि अचानक एक वार्डबॉय के साथ दो सज्जन डॉक्टर के केबिन में धड़धड़ाते हुए घुस गए। गुस्सा तो बहुत आया कि यह क्या बात हुई हम घंटों लाइन लगाए बैठे हैं और ये वीआईपी आते ही अंदर चले गए। लेकिन मैं अपना गुस्सा पी गई, क्योंकि मेरे साथ एक बीमार व्यक्ति था। ऐसे माहौल में यदि मैं लडऩे लगती या गुस्सा जाहिर करती तो उस बीमार की मन:स्थिति क्या होती। सो चुपचाप बैठी रही। बाद में जब पता चलता है कि डॉक्टर की केबिन में इस तरह अंदर जाने वाला, नगर का प्रभावशाली व्यक्ति है या डॉक्टर का परिचित अथवा अस्पताल को मोटी रकम दान देने वाला, तब मन होता कि उनसे जाकर पूछूं- क्या आपकी तकलीफ हमारी तकलीफ से ज्यादा है?

लेकिन अस्पताल का दर्द सिर्फ इतना ही नहीं होता। इस लम्बे इंतजार में और भी कई तरह के अनुभवों से गुजरना होता है। इन दिनों हर रोज एक नया अस्पताल खुल रहा है तो क्या हुआ, उससे दोगुनी गति से मरीजों की संख्या भी तो बढ़ती ही जा रही है। जब भी अस्पताल जाओ खासकर सरकारी अस्पताल वहां आस-पास इतनी अधिक गंदगी होती है कि सांस लेना दूभर होता है। अस्पताल का वातावरण घुटन भरा होता है कि यह सब अच्छे भले इंसान को बीमार कर देता है।

प्रश्न यह उठता है कि ये गंदगी करने वाले होते कौन हैं, हम ही ना? अस्पताल मेनेजमेंट सफाई की व्यवस्था नहीं करवाता होगा ऐसा तो हो नहीं सकता, और जहां ऐसा नहीं होता तो इसके लिए भी वहां शिकायत की जा सकती है। पर अस्पताल की सफाई क्या केवल अस्पताल मैनेजमेंट की ही जिम्मेदारी है? क्या इस सफाई में हम अपना योगदान नहीं कर सकते? क्या यह हमारी भी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अस्पताल को स्वच्छ रख सकें। हम यह सोच कर क्यों कुछ नहीं करते कि हमें क्या करना है सिर्फ एक दिन ही तो यहां आना है उसके लिए कौन मुसीबत मोल ले। यही वजह है कि बहुत कुछ गलत होते हुए देखकर भी हम अनदेखा कर जाते हैं।

इसी तरह डॉक्टर कब मिलेंगे, कौन से नंबर के कमरे में मिलेंगे जैसी सतही जानकारी न मिलने के कारण भी मरीज को लिए- लिए इधर से उधर और कभी- कभी कई- कई मंजिल तक ऊपर से नीचे होते रहना पड़ता है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन की पूछताछ वाली व्यवस्था जिम्मेदार होती है। हम क्यों नहीं इन सबकी शिकायत करते।

जिम्मेदारी से भागना तो समस्या का हल नहीं है। हमें पहल तो करनी ही होगी, कि जब डॉक्टर से मिलने कोई वीआईपी लाईन तोड़े तो खड़े होकर उनसे कह सकें कि हम दो घंटे से बैठे हैं या तो आप भी लाईन में लग जाईए या फिर डॉक्टर से अलग से समय लेकर आईए, जनता के समय में आकर उनकी बद्दुआएं क्यों लेते हैं। सीधे डॉक्टर के पास जाकर भी इसकी शिकायत करें।

कहने का तात्पर्य यह कि सिर्फ गुस्सा करने से काम नहीं बनने वाला। उस गुस्से को खतम करने के लिए आगे आना होगा ताकि कोई लम्बी लाइन तोडक़र आपके समय को छीनने की कोशिश न करे। तो आईए जाग जाएं और इस गुस्से को जागरुकता में बदल लें।

Dec 13, 2008

उफ... ये मौजा ही मौजा ...

उफ... ये मौजा ही मौजा ...
- डॉ. प्रतिमा चंद्राकर

यदि आपको भी आता है गुस्सा तो आइए उस गुस्से को उदंती.com के इस पृष्ठ पर लिख कर उतारने की कोशिश करें। क्योंकि बड़े- बुजूर्ग कहते हैं कि गुस्से को मन में नहीं रखना चाहिए, उसे बाहर निकाल देने से गुस्सा कम हो जाता है, तो यदि उस गुस्से को लिखकर आपस में बांट लें तो गुस्सा कम तो होगा ही साथ ही इसके माध्यम से एक अभियान चला कर संबंधित विभाग और प्रशासन का ध्यान आकर्षित भी कर सकते हैं। साथ ही एक दूसरे की समस्या का समाधान निकालने का प्रयास।

आज सुबह जब मैं कॉलेज जाने के लिए गेट से बाहर निकली तो सामने वाले पड़ोसी के घर में हलचल देखकर एक अजीब सी दहशत और घबराहट होने लगी। शाम को लौटने पर गाडिय़ां और लाइट की सजावट देखकर सारा माजरा समझ में आ गया। मन गुस्से से भर गया यह सोच कर कि आज फिर रात की नींद हराम होगी।
मेरे पड़ोसी का घर बहुत बड़ा है, अपने हवेलीनुमा मकान को वे शादी, जन्म दिन आदि की पार्टी के लिए किराए पर देते हैं। मैं यहां आए दिन होने वाली शादी और पार्टियों से डरने लगी हूं। अरे ... पर यह कॉलम तो गुस्से का है, मैं डर के विषय में क्यों लिख रही हूं? दरअसल मेरा गुस्सा डर में बदल चुका है। मैं लिख रही हूं और मेरे कानों में full sound में मौजा ही मौजा... की आवाज़ गरम लावे की तरह पिघल रहा है। रात के साढ़े दस बज चुके हैं पर डिस्को की कान के पर्दे फोड़ देने वाली आवाज़.... उफ।

मैं और मेरे परिवार का सम्बन्ध पढ़ाई -लिखाई से है। शाम को और देर रात तक इस तरह कि आवाज़ से सभी परेशान रहते हैं। आप सोचते होंगे पढ़ा-लिखा परिवार और जागरूकता जऱा भी नहीं? तो मैं बता दूं तीन वर्ष पहले मैंने पुलिस को इसकी लिखित शिकायत दी थी, कि रहवासी इलाके में देर रात तक इस तरह के आयोजन हेतु कोई अपना घर कैसे किराए पर दे सकता है? पुलिस ने बताया कि उनके पास परमिशन है। ऐसी बात भी नहीं है कि इस कालोनी में अन्य जगरुक लोग नहीं रहते, यहां कई सरकारी अफसर भी रहते हैं पर शिकायत करने का कीड़ा मुझे ही काटा।
हां तो मैं बता रही थी कि जब शादी, जन्मदिन और डिस्को पार्टी का शोर शिकायत करने के बाद भी नहीं रुका तो नियमानुसार सही-सही जानकारी प्राप्त कर पुन: शिकायत पत्र लिखा परन्तु प्रशासन तो प्रशासन है चलेगी तो अपनी ही चाल से। भले ही आज हम चांद तक पहुंचने पर गर्व करें पर चलेंगे उसी बैल गाड़ी वाले युग की चाल।
आज भी स्थिति यह है कि जब तक थाने फ़ोन न करो, लाऊड स्पीकर कि आवाज़ धीमी नहीं होती। थक कर मैंने मानव अधिकार में भी इस सम्बन्ध में शिकायत की है। लेकिन शायद वहां भी उनकी अपनी सीमाएं हैं। देखते-देखते तीन साल बीत गए और दीपावाली के बाद से गर्मी कि छुट्टियों तक हम बारातियों का स्वागत करते भांगड़ा एवं पटाखे तथा गानों की गूंज में जीने के आदि हो गए।
जब-जब इस घर को किराए पर शादी या किसी और पार्टी के लिए दिया जाता है हमारी और हमारे बच्चों की पढ़ाई लिखाई तो प्रभावित होती ही है, यदि हम इस शोर से बचने के लिए घूमने निकल जाते हैं तो रात को लौटते पर अपनी गाड़ी अन्दर रखने हेतु पहले शादी घर जाकर सैकड़ों लोगों से पूछ -पूछ कर अपने गेट के सामने से गाड़ी हटवाते हैं या फिर अपनी गाड़ी सडक़ पर भगवान भरोसे छोडक़र कानों में रूई डालकर सभी दरवाज़े बंद कर सोने कि कोशिश करते हैं।
मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं एक तो इसी शोर शराबे के बीच पढ़ते हुए बोर्ड पास कर दूसरे शहर पढऩे चली गई, दूसरी बोर्ड की तैयारी में है। इस तरह हम बरस- दर बरस अपने गुस्से के ग्राफ़ को ऊपर से नीचे करते हुए हार मान कर चुप- चाप बैठ गए हैं।
पर उदंती में गुस्से का यह कॉलम देखकर अपने आपको रोक नहीं पाई और मन छटपटा उठा। उदंती के पृष्ठों के लिए अपने दिल का गुबार निकाल कर मन हल्का तो हो गया लेकिन मेरी समस्या का समाधान मुझे नहीं मिल रहा है। मैंने अपने पढ़े- लिखे होने की जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई है और पहल भी की है। लेकिन जब-जब सामने वाले इस घर में जब- जब पार्टी का आयोजन होता है, मेरे गुस्से का ग्राफ बढऩे लगता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ है क्योंकि आज रात मुझे कानों में रुई डालकर सोने का प्रयास करना ही पड़ेगा, अन्यथा कल नौकरी पर कैसे जा पाऊंगी।