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Mar 8, 2020

संथाल आदिवासी बच्चों का स्कूल

संथाल आदिवासी बच्चों का स्कूल
- बाबा मायाराम

जब हम गाँवों में जाते थे, नागरिक अधिकारों पर बात करते थे, लिखा हुआ दिखाते थे, तो लोग पूरी तरह समझ नहीं पाते थे, मन में शंका रह जाती थी। हमें महसूस हुआ कि यह शिक्षा की कमी की वजह से है। इसलिए हमने तय किया कि हम अगली पीढ़ी को शिक्षित करेंगे, यहीं से बच्चों के स्कूल की सोच बनी और यह स्कूल बना। यह रेवा मुरमू थीं, जो मुझे उनके गाँव के स्कूल की कहानी सुना रही थीं।
पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के गाँव छाचनपुर में यह स्कूल स्थित है। इस स्कूल का नाम लक्ष्मी मुरमू स्मृति शिशु विद्यालय है। कोलकाता के पश्चिम में 250 किलोमीटर दूरी पर यह गाँव है। छाचनपुर, एक छोटा संथाली गाँव है।  दारकेश्वर नदी के किनारे बसा है। यही नदी साल के जंगल और गाँव को विभक्त करती है।
मैं इस स्कूल को देखने 21 सितंबर (2019) को गया था। मध्यप्रदेश से कोलकाता ट्रेन से लम्बी यात्रा की थी। कोलकाता से छातना गया और फिर वहाँ से छाचनपुर पहुँचा। दिल्ली के आंबेडकर विश्वविद्यालय में एम. फिल. की छात्रा अंकिता सान्याल के साथ मैं गया था। अंकिता, उनके फील्ड वर्क के लिए छाचनपुर आती रहती हैं। इस चार घंटे की ट्रेन यात्रा में हमने मसाला नींबू चाय का खूब आनंद लिया। मुझे यहाँ की झालमुड़ी भी पसंद है, जो उस दिन नहीं मिली।
उस दिन मौसम साफ व खुशनुमा था। आकाश में सफेद बादलों के गाले छितरे हुए थे। सुसनिया पहाड़ गहरा हरा दिख रहा था। कहीं भी हो, पहाड़ सदैव आत्मा पर छा जाते हैं। मेरी नजरें बार-बार पहाड़ पर जाकर टिक जाती थीं। धान के हरे-भरे खेत लहलहा रहे थे। लेकिन बारिश कम होने से यहाँ धान की खेती कमजोर थी। वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश में हम अति वर्षा से फसलें बर्बाद हुई हैं। यह विचार आते ही मैं थोड़ा मायूस हो गया।
इस स्कूल की कहानी शुरू होती है एक सपने से, जिसे दो आदिवासी युवतियों ने देखा था। ये थीं लक्ष्मी मुरमू और रेवा मुरमू। दोनों ही संथाल आदिवासी और गाँव में उनके समुदाय में पहली पीढ़ी की पढ़ी लिखी लड़कियाँ थीं। दोनों ने ही कक्षा 10 तक पढ़ाई की थी। रेवा ने तो बाद में अनौपचारिक तरीके से पढ़ाई पूरी की।
यह दोनों दोस्त पुरूलिया जिले में स्वयं सहायता समूह ( एस.एस.जी.) का काम करती थीं। लेकिन इस दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उनकी बातें पूरी तरह गाँववाले नहीं समझ पाते हैं। अगर पर्चों व किताब में लिखा हुआ बताते हैं तो वे पढ़ नहीं पाते, इसका एक कारण उन्हें शिक्षा से वंचित होना लगा।
रेवा मुरमू, छाचनपुर गाँव की थीं और लक्ष्मी मुरमू हापनिया गाँव की, जो छाचनपुर से 25 किलोमीटर दूर है। रेवा की मुलाकात लक्ष्मी से तब हुई जब वे वर्ष 1998 में पुरूलिया के एक गाँव में गैर सरकारी संस्था में काम करती थीं। वे यहाँ संथाली महिलाओं के साथ स्वयं सहायता समूह में काम करती थीं।
रेवा और लक्ष्मी खुद भी संथाली आदिवासी थीं, इसलिए जल्द ही उनका महिलाओं के साथ अच्छा रिश्ता बन गया। वे उनमें घुल मिल गईं। उनकी पहल से यहाँ महिलाओं में जागरूकता आई। उनका काम बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक संस्था का काम छूट गया। 
कुछ समय बाद दोनों छाचनपुर आ गईं, जो रेवा का गाँव था। यहाँ उन्होंने घर बनाने के लिए जमीन खरीदी और धीरे-धीरे खुद अपने हाथों से कच्चा मिट्टी का घर बनाया। घर आँगन की लिपाई पुताई की। थोड़ी स्थिति संभली तो फिर बच्चों को पढ़ाने का सपना जागा, अनौपचारिक स्कूल चलने लगा।
छाचनपुर में 43 घर हैं। छोटे-छोटे मिट्टी के खपरैल वाले और कहीं घास-फूस की झोपड़ियाँ भी। सुघड़ और साफ-सुथरे। घरों के आगे पीछे हरे-भरे पेड़ पौधे हैं और हरी सब्जियाँ भी। यहाँ एक तालाब भी है। जो पश्चिम बंगाल की संस्कृति का हिस्सा है। यहाँ हर गाँव में पोखर तालाब होते हैं। मछली-भात  ( माछ-भात, भात यानी चावल) यहाँ का प्रमुख भोजन है। यहाँ की अधिकांश आबादी गाँवों में रहती है। 
यहाँ स्कूल नहीं है, 5 किलोमीटर दूर डुमडुमी गाँव जाना पड़ता है। ज्यादातर आदिवासी छोटे किसान हैं या मजदूरी करते हैं। सभी आदिवासी हैं, दो परिवार करमाकर के हैं। सरई पत्ता से दोना पत्तल बनाकर बेचते थे। सरकारी स्कूल में पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं है।
मैंने अंकिता के साथ गाँव का एक चक्कर लगाया। लोगों से मिला, बातें कीं। यहाँ के बुजुर्ग लखीराम हेम्राब ने बताया कि पहले यहाँ शांति थी, सुकून था, अब चीजों की भूख बढ़ गई है। पहले हम कम चीजों से ही काम चला लेते थे।” 
यह इलाका पहले जंगल से आच्छादित था। साल का घना जंगल था। अब उजड़ गया है। आदिवासियों का जीवन पूरी तरह जंगल पर ही आधारित है। तेंदू, जाम, आम जैसे फल मिलते थे। जड़ी-बूटियों से लोग छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज कर लेते थे। रेवा के पिता खुद जड़ी-बूटी के जानकार थे।  यानी आदिवासियों के पास जंगल, पेड़ पौधे, जड़ी-बूटी का पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता की जानकारी और पर्यावरण संरक्षण की परंपरा थी। जब जंगल नहीं रहा तो अधिकांश लोग मजदूरी करने लगे।
रेवा मुरमू बताती हैं कि इन स्कूलों में एक संथाली भाषा नहीं पढ़ाई जाती, इसलिए हमारे बच्चों को भाषा की दिक्कत का सामना करना पड़ता है। वे संथाली जानते हैं और पढ़ाई होती है बांग्ला में, इसलिए वे समझ नहीं पाते हैं। दूसरी बात यह है कि 5 वीं कक्षा के छात्र ठीक से लिख-पढ़ नहीं सकते, यानी वे स्कूल तो जाते हैं, पर वहाँ ठीक से पढ़ाई नहीं होती। इसलिए हमने बच्चों की पढ़ाई शुरू की।
शाम को जब काम धंधे से बच्चे घर लौटते तो वे रेवा के घर इकट्ठे होते, गपशप करते और पढ़ते। स्कूल चलने लगा। लेकिन इस बीच एक झटका तब लगा जब लक्ष्मी मुरमू को कैंसर हो गया और उनकी वर्ष २०१३ में असमय मृत्यु हो गई ।
लेकिन रेवा मुरमू ने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें एक्शन एड नामक संस्था से फैलोशिप मिली और अरूणपोल सील का साथ भी, जो एक्शन एड से जुड़े थे। अरूणोपोल जैसे संवेदनशील युवा शोधकर्ता का साथ मिलने से फिर स्कूल की रचनात्मक सोच को पंख लग गए।
अनौपचारिक शिक्षा के काम में कई व्यक्तियों व संस्थाओं ने सहयोग किया। कोलकाता के गाँधीवादी कार्यकर्ता काजल सेनगुप्ता ने इसमें मदद की। उन्होंने शिक्षा की इस पहल पर लेख लिखा जिसका असर हुआ कि किशोर भारती ट्रस्ट भी इस काम में जुड़ गया। इस ट्रस्ट के सदस्यों ने यहाँ का दौरा किया और इस काम में मदद करने का निर्णय लिया। शैक्षणिक पाठ्यक्रम तैयार करने में और आर्थिक रूप से भी सहयोग किया। और अंत में तय किया गया कि लक्ष्मी मुरमू की याद में एक स्कूल शुरू किया जाए, क्योंकि वह संथाली समुदाय में सामाजिक बदलाव की एक प्रेरणा बन गई थी।
इस स्कूल का नाम भी लक्ष्मी मुरमू की याद में रखा गया- लक्ष्मी मुरमू स्मृति शिशु विद्यालय। इसकी शुरूआत 26 जनवरी, 2015 में हुई।
यह एक छाचनपुर और पड़ोसी गाँवों के लोगों के लिए यह एक सामूहिक प्रयास है। यह संथाली बच्चों का स्कूल है, जिसकी पहल गाँव की ही आदिवासी महिलाओं ने की थी। यह एक ऐसा स्कूल है जिसे आदिवासी महिलाएँ चला रही हैं। लोहार और करमाकर समुदाय की महिलाओं का भी सहयोग है। इस स्कूल का मुख्य जोर आदिवासी और हाशिये के समुदायों के बच्चों को पढ़ाना है, जो अब तक शिक्षा से वंचित रहे हैं।
इस संस्था का उद्देश्य है ऐसा अनुकूल वातावरण बनाना जिसमें छाचनपुर और उसके आसपास के गाँव की महिलाएँ एक साथ बैठकर उनकी उम्मीदें, सोच, सपने, दुख-दर्द और समस्याओं पर बात कर सकें। इस पर चर्चा करना कि किस तरह उनकी आदिवासी संस्कृति दूसरी ओर मुड़ रहीं है, जो सालों से विकसित हुई थी। समुदाय में विकास और सेवाओं से जुड़ी जागरूकता पैदा करना और इस पर बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाना। सामूहिक रूप से वैकल्पिक ढाँचा विकसित करना जिसमें सामूहिक खेती, किचिन गार्डन, शिक्षा के बारे में विचार करना। यहाँ स्कूल परिसर में नींबू, लीची, कटहल, आम, दालिम, कमरंगा, खजूर, पीपल, कनेर, नीम आदि के पेड़ लगे हैं। स्कूल के किचन गार्डन में भिंडी, करेला, बरबटी, फूलगोभी, बंद गोभी, कद्दू, लौकी, टमाटर, खीरा है। स्कूल में दोपहर का भोजन दिया जाता है, जिसमें इस सब्जी का इस्तेमाल होता है।
इस स्कूल में शिक्षण पद्धति में खासतौर पर ध्यान दिया जाता है-
परिवेश का अध्ययन- आसपास के वातावरण, नदी, नाले, पेड़ पौधे, जंगल और वनस्पतियों का अध्ययन।
बांग्ला भाषा- पहली कक्षा से ही बांग्ला भाषा में अक्षर ज्ञान और पढ़ना लिखना सिखाया जाता है।
गणित- अंक पहचानना और सरल गणित सिखाना।
क्षेत्रीय संस्कृति- नृत्य औऱ लोकगीत।
अंग्रेजी- अंग्रेजी के अक्षर और कहानियाँ पढ़ना- लिखना।
यहाँ संथाली भाषा की लिपि ओलचिकी ( संथाली लिपि) भी सिखाई जाती है। इस भाषा के जानकार शिक्षक भी यहाँ हैं।
वर्तमान में यहाँ 3 से 9 वर्ष तक के बच्चे पढ़ते हैं। कक्षा 4 तक स्कूल है जिसमें 92 बच्चे हैं। स्कूल का संचालन छाचनपुर महिला कल्याण समिति करती है। इस समिति में 11 सदस्य हैं। स्कूल में अब 4 नए कमरे बन गए हैं। शौचालय है, कुआँ है। जिस जमीन पर स्कूल है, उसे खरीदा गया है। छाचनपुर महिला कल्याण समिति के नाम पर जमीन है।
इस स्कूल में प्रतिमाह 100 रू. शुल्क है। रेवा मुरमू बताती हैं कि इन परिवारों की हालत ऐसी है कि वे बच्चों के लिए यूनिफार्म नहीं खरीद पाते। एक चौथाई बच्चे फीस भी नहीं दे पाते।
इस स्कूल में 10 से किलोमीटर दूर गाँव के बच्चे आते हैं। मुसिदीही, तामीलीपाड़ा, सुअराबकड़ा, लेदापोलाश, रांगागोड़ा, लोहा गढ़, खरबना, धौडांगा, घोषेरग्राम, मनकाडीह, दोलपुर, दुमदुमी आदि। स्कूल की गाड़ी है, जो दूर गाँव के बच्चों को घर से लाती है, छोड़ती है।
किशोर भारती ट्रस्ट फार एजूकेशन रिसर्च संस्था ने पाठयक्रम बनाया है। छाचनपुर महिला कल्याण समिति के नाम से स्कूल का बैंक अकाउंट है। इसके अलावा, अंकुर कला ने भी मदद की है। यह महिला कल्याण समिति महिला सशक्तीकरण का काम करती है। आजीविका और महिला अधिकारों पर जागरूकता लाने का काम करती है।
इस स्कूल में 6 शिक्षक हैं। माला तुडु, रीना तुडू, संदीप मंडल, प्रदीप बाघ, गौर चंद्र मंडल और सौमित्र मंडल हैं। इसके अलावा, कुछ रिसर्च फैलो और इंटर्न भी हैं, जो समय समय पर यहाँ आकर रिसर्च करते हैं और स्कूल में मदद करते हैं। सिंदुनिल चटर्जी, अंकिता सान्याल और देवारती कुन्डू हैं। अंकिता सान्याल इनमें से एक हैं, जो साल में करीब 6 महीने यहाँ रहकर बच्चों को पढ़ाती हैं और उनके साथ  शिक्षा की नई गतिविधियाँ करवाती हैं।
इस स्कूल की एक छोटी लायब्रेरी है, जो विकसित हो रही है। अभी इस लायब्रेरी में 700 किताबें हैं जिनमें कहानी, कविता, नाटक की बांग्ला और अंग्रेजी किताबें उपलब्ध हैं।
किताबों के अलावा यहाँ बच्चों को गतिविधि आधारित सीखने-सिखाने पर जोर दिया जाता है। अंकिता सान्याल ने बच्चों के साथ कई नए प्रयोग किए हैं, जिसमें बच्चों को मजा भी आता है। सीखते भी हैं। जैसे पत्थरों को रंग लगाना, छोटे से बड़े क्रम में जमाना। पीपल की पत्तियों को गलाकर उसे रंगना और उससे पत्तों में प्रकाश संश्लेषण और वाष्पीकरण की प्रक्रिया को समझना। खेल खेल में फलों, पत्तों व सब्जियों के नाम जानना और लिखना।
मुझे यहाँ की अपराजिता मुरमू, अंजली सोरेन, सुजाता मोदीकोडा, शिवानी टुडू, पूजा मुरमू आदि बच्चों ने रंग किए पत्थर दिखाए। पीपल के रंगीन सुंदर पत्ते दिखाए और कविताएँ सुनाईँ। वे कहानी को नाटक के रूप में भी खेलते हैं। शिक्षक गौर चंद्र मंडल ने बताया कि आदिवासी बच्चे अन्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा ध्यान से पढ़ते हैं।
इस स्कूल की सोच गाँधी और टेगौर से प्रभावित है। सोच यह है कि गाँव के बच्चे, गाँव की परिस्थिति में पढ़े, और श्रम के कामों से भी जुड़े, उसी से सीखें भी। जो गाँधी की नई तालीम की भी सोच रही है। गाँधीवादी काजल सेन गुप्ता जैसे लोगों के जुड़ने का भी सीधा असर शैक्षणिक पद्धति पर दिखता है। जबकि मुख्यधारा के शासकीय स्कूल हाथ से काम करने को तरजीह नहीं देते हैं।
स्कूल के कमरे इस तरह से बने हैं कि बच्चों और प्रकृति का सीधा रिश्ता बने। स्कूल की दीवारें तीन-चार फुट ही ऊँची है, जिससे बच्चे स्कूल की दीवारों के अंदर कैद न हो। वे पेड़ पौधे, फूल, पत्ते, चिड़िया और खुला आसमान देख सकें। जो आदिवासी जीवन में सहज है। क्योंकि आदिवासियों का पूरा जीवन प्रकृति पर ही है। यह टेगौर की शिक्षा दर्शन से मेल खाती है। शांतिनिकेतन में आज भी पेड़ों के नीचे कक्षाओं में पढ़ाई होती है। टेगौर ने भी संथाली आदिवासियों से बहुत कुछ सीखा था। उनकी लोक कला, प्रकृति के साथ सहअस्तित्व, गीत, नृत्य आदि से टेगौर बहुत प्रभावित थे।
यहाँ कहना उचित होगा कि अधिकांश लोगों की जिंदगी जीवन की आपाधापी और जीविकोपार्जन में ही गुजर जाती है, जिसके कारण वे शिक्षा, साहित्य, संगीत आदि से वंचित रह जाते हैं। जैसे ही लोगों की स्थिति संभलती है वे शिक्षा की ओर मुड़ते हैं। छाचनपुर में जैसे शिक्षा की भूख जगी है, वह अब जगह देखी जा रही है। स्कूल भी हैं, पर उनमें से ज्यादातर में शिक्षा प्राप्त करने का माहौल नहीं है।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि छाचनपुर का स्कूल कई मायनों में अलग है। एक तो यहाँ के सभी शिक्षक स्थानीय हैं, स्थानीय ज्ञान, परिवेश, गाँव कृषि संस्कृति की समझ बनाई जा रही है। आदिवासी संस्कृति जो सबको जोड़ती है, जिसमें सामूहिकता है, सहकार है, एक दूसरे की मदद करने की परंपरा है, उसे फिर से स्थापित किया जा रहा है। गाँधी की नई तालीम जिसमें हाथ से उत्पादक काम कर सीखने पर जोर दिया जाता है, इस ओर प्रयास किया जा रहा है। आधुनिक शिक्षा में जहाँ हाथ से, श्रम को तरजीह नहीं दी जाती है, यहाँ इस पर जोर दिया जाता है। आदिवासियत, जो कम ऊर्जा में, कम संसाधनों में बहुत सुघड़ और सादगी से जीवन जीने की पद्धति है, उसे वापस लाया जा रहा है। एक और बात है वह स्थानीय शिक्षकों की प्रतिबद्धता, वे बहुत ही कम वेतन पर आदिवासियों की पहली पीढ़ी को शिक्षित कर रहे हैं, यह मिसाल है। इस स्कूल के बच्चे जंगल, जैव विविधता, पर्यावरण की समृद्ध विरासत को सहेज सकें, यह प्रयास किया जा रहा है। यहाँ 4-5 वीं कक्षाओं में शासकीय पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है, जिससे ये पढ़कर दूसरे स्कूलों में जाएँ तो उन्हें दिक्कत नहीं आती।
चूंकि यह प्रयास नया है, अभी कुछ भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। कुछ चुनौतियाँ भी हैं। जैसे समुदाय आधारित संस्कृति व मूल्यों की वापसी, अभिभावक भी बच्चों को हाथ से काम करने को अभी अच्छा नहीं मानते। किताबी ज्ञान की जगह गतिविधि आधारित ज्ञान से सीखना। पारंपरिक ज्ञान को मान्यता दिलाना।  लगातार स्कूल का प्रबंधन करना, आर्थिक मदद जुटाना आदि।  लेकिन इन सबके बावजूद स्कूल चल रहा है, यह बड़ी उम्मीद है। (विकल्प संगम से साभार)

Jan 15, 2020

जैविक खेती की ओर मुड़े बिरहोर

जैविक खेती की ओर मुड़े बिरहोर
-बाबा मायाराम 
मंझगंवां का आनंदराम मिश्रित खेती करते हुए
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले का एक गाँव है समेलीभाठा। मानगुरू पहाड़ और जंगल के बीच स्थित है। यहाँ के बाशिन्दे हैं बिरहोर आदिवासी। जंगल ही इनका जीवन है। वे न सिर्फ जंगल में रहते हैं, उन पर निर्भर हैं, बल्कि जंगल का संरक्षण भी करते हैं। यह उनकी परंपराओं में है, उनकी जीवनशैली में है। अब उन्होंने पौष्टिक अनाजों की जैविक खेती करना भी शुरू किया है। घरों में बाड़ी (किचन गार्डन) में सब्जियों और फलदार वृक्षों की खेती भी कर रहे हैं।
बिर का अर्थ जंगल, और होर का अर्थ आदमी होता है। यानी जंगल का आदमी। बिरहोर आदिवासी विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति में से एक हैं। यह घुमंतू जनजाति मानी जाती है। हालांकि उनके पूर्वज सरगुजा जिले से इधर आए थे, लेकिन अब स्थाई रूप से यहीं बस गए।
मैं अप्रैल माह में यहाँ लम्बी यात्रा कर पहुँचा था। माल्दा, समेलीभाठा और गुडरूमुड़ा गाँव गया था। राजिम की प्रेरक संस्था से जुड़े दो कार्यकर्ता रमाकांत जायसवाल और तिहारूराम बिरहोर ने मुझे इन गाँवों में घुमाया। वे यहाँ आजीविका  संरक्षण, वन अधिकार और जैविक खेती पर बिरहोर आदिवासियों के बीच काम करते हैं। उनकी जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश में जुटे हैं। प्रेरक संस्था ने देसी धान के बीजों का संरक्षण का काम किया है।   
रमाकांत जायसवाल और तिहारूराम बिरहोर ने बताया कि बिरहोर मुख्यतः पूर्व में शिकार करते थे और वनोपज एकत्र करते थे। बंदरों का शिकार उन्हें बहुत प्रिय था; लेकिन अब शिकार पर कानूनी प्रतिबंध है। अब बिरहोर मुख्यतः बाँस के बर्तन बनाते हैं और रस्सी बनाकर बेचते हैं। बांस के बर्तनो में पर्रा, बिजना ( हाथ से हवा करने वाला पंखा), टुकनी ( टोकनी), झउआ ( तसला की तरह), आदि चीजें बनाते हैं । इनमें से ज्यादातर बाँस के बर्तन शादी-विवाद के मौके पर काम आते हैं। पटुआ ( पौधा) और मोगलई ( बेल) की छाल से रस्सी बनती है। खेती-किसानी में काम आनेवाली रस्सियाँ व मवेशियों को बाँधने के लिए रस्सियाँ बनाते हैं। जोत, गिरबाँ, सींका,दउरी आदि चीजें रस्सी बनाते हैं। इनमें से जोत व गिरबाँ गाय बैल को बाँधने व हल बक्खर में काम आते हैं। खेती और पशुपालन साथ साथ होता है। इसके अलावा सरई पत्तों से दोना-पत्तल बनाकर बेचते भी हैं। इस सबसे ही उनकी आजीविका चलती है।
बिरहोरों की आबादी कम है। इनकी जीवनशैली अब भी जंगल पर आधारित है। इनमें पढ़े-लिखे बहुत कम हैं। हालांकि अब साक्षर व शिक्षित होने लगे हैं।  बाँस के बर्तन बनाने, रस्सी बनाने के अलावा बहुत ही कम लोग खेती करते हैं।
गुडरूगुड़ा का दुलार अपनी
पत्नी श्याम बाई के साथ
तिहारूराम ने बताया - पहले अनाज खाने नहीं मिलता था। महुआ फूल को पकाकर खाते थे। ज्वार और बाजरे की रोटी खाते थे। अब पहले जैसी स्थिति नहीं है।
माल्दा, जो तिहारूराम का गाँव है, मैं उनके घर ही रात में ठहरा था। खुले के आसमान के नीचे खाट पर सोने का मौका मिला। तिहारूराम ने मुझे बताया थोड़ी देर में भगवान का लाइट आएगा और अँधेरा भाग जाएगा। मैं आकाश में जगमगाते तारे और चाँद की रोशनी देखते- देखते सो गया। मुझे गहरी नींद आई। खुले आसमान के नीचे सोने का मौका बहुत सालों बाद आया था। सुबह तालाब के ठंडे पानी में स्नान किया। ग्रामीण संस्कृति की मिठास का अनुभव किया। छत्तीसगढ़ की एक पहचान तालाब भी हैं। यहाँ अधिकांश गाँवों में तालाब होते हैं।
तिहारूराम और रमाकांत जायसवाल ने बताया कि उन्होंने पहले दौर में 10 गाँवों का चयन किया है जिसमें जैविक खेती और किचिन गार्डन का काम किया जा रहा है। जिसमें पौड़ी उपरोड़ा विकासखंड के गाँव मालदा, नागरमूडा, डोंगरतलाई, कटोरी नगोरी, गुडरूमुडा, समेली भाठा और पाली विकासखंड के मंझगवां, उड़ता, टेढ़ीचुआ, भंडार खोल शामिल हैं। इन गाँवों में जैविक खेती के लिए 50 किसानों को देसी बीजों का वितरण किया गया हैं। इसके लिए मालदा में बीज बैंक है। बाड़ियों ( किचिन गार्डन) के लिए भी देसी सब्जियों के देसी बीज दिए गए हैं।
वे आगे बताते हैं कि इन गाँवों में जैविक खेती में धान, झुनगा, अरहर, उड़द, हिरवां, बेड़े आदि खेतों में बोया गया है। और बाड़ियों में लौकी, भिंडी, बरबटी, कुम्हड़ा, तोरई, डोडका, मूली, पालक, भटा, करेला, चेंच भाजी, लाल भाजी इत्यादि। इसके अलावा, फलदार वृक्षों में मुनगा, बेर, पपीता, आम, जाम, आँवला, नीम, कटहल आदि के पौधे भी वितरित किए गए हैं।
अगले दिन हम पहाड़ पर बसे समेलीभाठा गाँव गए। यह पौड़ी विकासखंड के अंतर्गत आता है। यहाँ करीब 35 घर हैं। आदिवासियों के घर विरल हैं, घनी बस्ती नहीं है। छोटे- छोटे घर लकड़ियों के बने हैं और उनकी बागुड़ ( बाउन्ड्री) भी लकड़ियों से ही बनी है। घरों की दीवार भी लकड़ियों की ही थी। बहुत मामूली स्थानीय चीजों से बने पर बहुत ही सुघड़ता से गोबर से लिपे-पुते। न कोई तामझाम, न दिखावा। इनमें आँखें टिक जाती थीं। अब शासकीय आवास योजना में पक्के घर भी बन गए हैं।
यहाँ के एतोराम बिरहोर, लछमन बिरहोर, रतीराम बिरहोर, बंकट, दुकालू और जगतराम ने बताया उनका जीवन पूरी तरह जंगल पर निर्भर है। जंगल से महुआ, चार, तेंदू, भिलवाँ, आम, बोईर (बेर), अमली ( इमली), हर्रा, बहेड़ा, आँवला इत्यादि वनोपज मिलते हैं।
हरी पत्तीदार भाजियों में कोयलार, मुनगा, आमटी, सोल, फांग, चरौटा, कोसम और पीपल भाजी मिलती है। इसके अलावा, कडुवां कांदा, नकवा कांदा, बरहा कांदा, सियो कांदा, पिठारू कांदा, कुदरू, केउ कांदा, गिलारू कांदा आदि मिलता है। कई तरह के पुटू ( मशरूम) भी जंगल से मिलते हैं। मसलन- गुहिया, चरकनी, सुआ मुंडा, पटका, चिरको, कुम्मा, पतेरी इत्यादि।
इसके अलावा, बिरहोर जड़ी-बूटियों से इलाज करना जानते हैं। उन्हें किस बीमारी में कौन-सी जड़ी काम आती है, इसकी जानकारी है।  धौंरा की छाल को वे चाय पत्ती की तरह डालकर तरोताजा होने के लिए पीते हैं। वे अब भी कुछ छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज जड़ी-बूटी से कर लेते हैं।
बिरहोर आदिवासियों का मुख्य त्योहार खरबोज है। ठाकुरदेव, बूढादेव, नागदेवता जंगल में है। माघ पूर्णिमा में यह त्यौहार मनाया जाता है। कर्मा नाचते हैं। नवापानी मनाते हैं। यह नए अनाजों के घर में आने की खुशी में मनाया जाता है, जिसे अन्य जगहों पर नुआखाई भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ और ओडिशा में नुआखाई का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
हिरवां के खेत में आनंदराम
अपनी भाभी के साथ

बिरहोर जंगल से लेते ही नहीं हैं, बल्कि उसको बचाते भी हैं। जंगल के प्रति जवाबदारी भी समझते हैं। उनका जंगल से  माँ-बेटे का रिश्ता है। वे जंगल से उतना ही लेते हैं जितनी जरूरत है। उन्होंने ऐसे नियम कायदे बनाए हैं कि जिससे जंगल का नुकसान न हो।
ग्रामीण बताते हैं कि वे कभी भी फलदार वृक्ष जैसे महुआ, चार, आम के पेड़ नहीं काटते। फलदार वृक्षों से कच्चे फलों को नहीं तोड़ते। किसी भी पेड़ की गीली लकड़ी को नहीं काटते। जरूरत पड़ने पर सबसे पहले जंगल में घूमकर सूखी लकड़ी तलाशते हैं, उसे ही काम में लेते हैं।
गुडरूमुड़ा के बुधेराम, मंगल, घसियाराम, जगेसर, नवलसिंह ने बताया कि अब जंगल भी पहले जैसे नहीं रहे। बाँस मिलने में भी दिक्कत है। जंगलों में बाहरी लोगों का भी आना-जाना बढ़ गया है। इधर कुछ सालों से हाथियों का उत्पात बढ़ गया है, जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मौसम बदल रहा है, बारिश नहीं हो रही है।  
जलवायु बदलाव को देखते हुए देसी बीजों की मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जो देसी बीज गुम हो गए हैं, वे बीज छत्तीसगढ़ के दूसरे इलाकों से लाकर बिरहोरों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। कोदो, कुटकी, धान की देसी किस्में, जो कम पानी में भी पक जाती हैं। घर की बाड़ियों (किचिन गार्डन) में हरी सब्जियाँ उगाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी तरह प्रेरक संस्था  ने कमार आदिवासियों के बीच गरियाबंद इलाके में घर की बाड़ियों का काम किया है। इससे देसी हरी सब्जियाँ व फलदार पेड़ों से फल मिलते हैं। बच्चों को अच्छा पोषण मिलता है। अगर इन फसलों में रोग लगते हैं तो जैव कीटनाशक किसान खुद बनाते हैं और उनका छिड़काव करते हैं।
बिरहोर गाँवों में जैविक व परंपरागत खेती को बढ़ावा देने के लिए देसी बीज व जैविक खेती के प्रयास किए जा रहे हैं। वन अधिकार कानून के तहत् बिरहोर आदिवासियों के व्यक्तिगत अधिकार व सामुदायिक अधिकार के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार खुद पहल कर रही है। इस सबसे बिरहोर आदिवासियों के जीवन में उम्मीद जगी है, और वे इससे उत्साह में हैं। यह प्रक्रिया चल रही है।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि बिरहोरों की जीवनशैली प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की है। जंगलों के साथ उनका रिश्ता गहरा है। वे एक दूसरे के पूरक हैं। जलवायु बदलाव के दौर जंगलों में और वहाँ से मिलने वाले कंद-मूल व खाद्य पदार्थों में कमी आई है। इसलिए जैविक खेती उपयोगी हो गई है। विशेषकर कम पानी वाली और बिना रासायनिक वाली जैविक खेती से भोजन सुरक्षा के साथ मिट्टी पानी का संरक्षण और संवर्धन होगा। बाड़ियों में हरी सब्जियाँ व फलदार वृक्षों से पोषण मिलेगा। सब्जियों के लिए बाजार पर कम निर्भरता होगी। जो कमी मौसम बदलाव के दौर में जंगलों से कंद-मूल व सब्जियों में आ रही है, उसकी पूर्ति होगी। जंगल हरा-भरा होगा। लुप्त हो रहे देसी बीज बचेंगे और जैव विविधता बचेगी और पर्यावरण भी बचेगी। कृषि और गाँव संस्कृति बचेगी। खान-पान की पारंपरिक संस्कृति बचेगी। इस दिशा में प्रेरक संस्था अनूठी पहल कर रही है। बिरहोर आदिवासियों के जंगल संरक्षण की सीख सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।  (विकल्प संगम से साभार)

Jul 14, 2019

गाँव जैसा मैंने देखा


गाँव जैसा मैंने देखा
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बाबा मायाराम

18 -02 - 2019
गाँव में एक दिन
चेहरे, बिम्ब, पुराने लोग, टूटा स्कूल और गाँव
परसों के दिन मैं अपने गाँव में था। उस गाँव में जिसमें बचपन बीता। जहाँ पुराने पीढ़ी के लोग मुझे नाम से जानते हैं।
वहाँ घूमते हुए मेरे मानसपटल पर वे बिम्ब जिन्हें शब्दों में ढालता रहता हूँ, खाली समय में। आँखें मूँदे हुए जब नींद नहीं आती। ट्रेन से सफर करते हुए जब तेजी से वह दौड़ती जाती है।
जब कोई परिचित मिलता, मैं देखता रहता उसके चेहरे को, याद करता उन लोगों को जो नहीं रहे, वे पेड़ जो कट गए हैं। इमली के, आम के और नीम के। वो ढोंगा जहाँ रहती थी एक बुढ़िया, लाठी टेककर कमर पर हाथ धरे।
मिल गया बाराती, जिसका जन्म लौटती बारात को हुआ था। अब उसका परिवार भी बड़ा हो गया। उन पेड़ों पर नाम भी जो उनके घर के पास थे- जैसे चंपोवारे। यानी चंपा के पेड़ वाला घर। वो मुनीम की माँ, जिसने मुझे बरसों बाद चीह्न लिया था।
अनमने से लोगों में अचानक नया उत्साह आ गया था। वे याद करने लगे थे मेरे पिता को, जिन्होंने उनके ओसारे में बैठकर खूब बातें की थी। इलाज कराने ले गए थे अस्पताल। 
छोटी- छोटी गैल अब सड़क में बदल गई हैं। पर उनमें पानी बेतरतीब फैला पानी। फैल गया है गाँव भी। 
स्मृति पर जोर डालने से याद आया था कच्ची खपरैल वाला स्कूल। अब पक्का कांक्रीट व लेंटर वाला बन गया था। बनाता रहा उसका आकार, कहाँ क्लास लगती थी और कहाँ बैठते थे टीचर। और कहाँ था इमली वाला पेड़।
कौन थे साथ में पढ़ने वाले।
मैंने एक नजर दूर नदी पर डाली। पानी नहीं था, रेत पसरी थी। दूर हो गई थी गाँव से। वह सदानीरा थी।
कुछ खोया हुआ, कुछ मृत सा, कुछ नया और कुछ उजड़ा सा.. उजड़ा उस मायने में जहाँ मूल्य बदल गए।
असल में स्मृति बीते हुए और वर्तमान को जोड़ने की कड़ी है, शायद उसमें समय भी लगता है
19 - 02 - 2019
बदलते गाँव 
डाँग,  पक्का गोला और गैल
जब गाँव की याद करता हूँ तो जो छवि उभरती है- सुबह सवेरे की चिड़ियों की चीं-चीं- चूँ ची चिआऊ।
कुएँ के पनघट पर पनिहारों की भीड़- रस्सी बाल्टी की खट-पट। नहाना-धोनाऔर देवी की पूजा-पाठ।
गाँव की डाँग, जहाँ दिन में अँधेरा हुआ करता था। जंगल के कारण, उधर आने में डर लगता था।
नदी, जो कल-कल छल-छल बहते थीं। वहाँ बरौआ, कहार लोगों के खेत होते थे। हरी सब्जियों की खेती। पानी तो झिरिया खोदने से ऊपर ही निकल आता था।
गोला, गाँव के लोग पक्की सड़क को गोला कहते हैं। गैल, उसे कहते हैं जो कच्ची होती है। गड़बाठ उसे कहते हैं, जिसमें बैलगाड़ी चल सके यानी चौड़ी गैल।
खेत-हार में काम करते लोग, मवेशियों की नार ( मवेशियों का समूह, जिसे गाँव का चरवाहा चराने ले जाता था)। शाम को धूल उठाते गाय-बैल। 
गोबर से लिपे-पुते घर। कच्ची मिट्टी की दीवारें गेरू से रँगी। तीज-त्योहारों का अलग ही आनंद। 
इन दिनों होउरा ( हरे चना पौधा सहित भूँजना, यानी भुँजा चना) खूब खाया जाता था। 
अब इनमें से कई दृश्य गायब हो गए हैं। जंगल कट गए, नदी सूख गई, कुएँ भी सूख गए। 
मवेशी भी कम हो गए। होउरा अब भी मिलता है। मिट्टी की दीवारें और लिपे-पुते घर भी। गाँव अब भी है। गाँव संस्कृति भी कुछ हद तक। इसे बचाने की जरूरत है।
23 -03 - 2019
गाँवों में क्या बदला?
जब आज मैं सड़क से गाँवों से गुजर रहा था तो सोच रहा था इन गाँवों में क्या बदला।?
गेहूँ के खेत, पेड़, गाँव घर, दुकानें सब चलचित्र की तरह पीछे छूट रहे थे।
एक तो बदलाव यही दिख रहा था कि सड़क अच्छी बन गई है और वाहनों की बाढ़ आ गई है।
जब हम तीन-चार दशक पहले सड़कों पर चलते थे तो लोग पैदल और साइकिल पर चला करते थे।
मोटर साइकिल इक्का दुक्का दिखती थी और ट्रेक्टर भी बहुत कम। टेलिविजन तो बाद में आया।
कच्चे घर हुआ करते थे। अब ज़्यादातर पक्के हो गए हैं; लेकिन कुछ तो अब भी कच्चे हैं, बल्कि वैसी ही हालत में हैं जैसे सालों पहले थे।
मवेशी बहुत होते थे। खेतों में हल-बक्खर चलते थे। बैल उन्हें खींचते थे।
स्कूल कमबच्चे ज्यादा थे; लेकिन पढ़ाई आज से अच्छी होती थी और शिक्षक- छात्र दोनों पढ़ाई पर ज़ोर देते थे। यह कम ज़्यादा हो सकता है। 
पर शिक्षकों में पढा़ने का चाव था। स्कूल की इमारतें आज जितनी अच्छी नहीं थी।
सड़कों के किनारे पेड़ हुआ करते थे, जो कम दिखते हैं। खेतों में आम, जामुन, महुआ के पेड़ बहुत होते थे। 
यह तो हुआ बाहरी बदलाव, सोच भी बदली है। वह कई मायनों में एक जैसी है। शहर  और गाँव का फर्क कम हो रहा है।
09- 04 -2019
नगालैंड- नयापन भी और पुरानापन भी
पहाड़ियों के बीच बसे विरल गाँव। ऊपर से छोटे-छोटे माचिसनुमा दिखते घर। बाँस की दीवारें। घरों की कलात्मकता व डिज़ाइन।
चीड़ के पेड़ों की सरसराहट। सफेद व लाल फूल। झाड़ियाँ व वनस्पतियाँ। सुंदर भू दृश्य (लैंडस्केप)
कल -कल बहती नदियाँ, नाले और झरने और दूर-दूर ऊँची नीची चोटियाँ।
जींस-पेट, टोपी, सुंदर छतरियाँ और पुराने में रंगीन मनकों व गुरियों  की मालाएँ पहने बुज़ुर्ग महिलाएँ।
और कई तरह की खेती पद्धतियाँ- पहाड़ी झूम खेती, टैरेस, किचन गार्डन और कुदरती खेती (नेचुरल फार्मिंग)
तरह-तरह के भोजन, बेजोड़ स्वाद, हरी पत्तीदार सब्जियाँ व स्वादिष्ट सूप 
ज़्यादा खेती करने वाले, लघु कुटीर उद्योग, सुंदर पर्स, शाल, झोले, टोपी। व्यापारी, कुछ नौकरी पेशा वाले। साझा संस्कृति के साथ अलग-अलग पेशों के साथ फलने-फूलने वाला है नगालैंड।
16 – 04- 2019
गाँव को क्या चाहिए
नगालैंड के एक गाँव में करीब हफ़्ता भर रहने का मौका मिला।
वहाँ जंगल था, पीने के पानी के परंपरागत जलस्रोत थे, पौष्टिक अनाजों की खेती थी।
अच्छा स्कूल था। लड़कियों की शिक्षा, जो कि इस गाँव में थी।
परंपरागत हस्तकला थी। बाँस की शंक्वाकार टोकरियाँ, पीठ पर बाँधकर चलने वाली, और भी न जाने कितने सामान, दस्तकारी ऐसी कि देखते रह जाएँ। 
बुनकरी की सानी नहीं, मफ़लर, पर्स, झोले, मेखला, टेबल कवर इत्यादि।
खेल मैदान, पुस्तकालय, देसी बीज बैंक और स्थानीय सामग्री से बने घर।
मुर्गी पालन था।
एक आदर्श गाँव ही था यह। अगर हम इसे सूत्र में कहे ,तो हमें एक गाँव में अच्छा जंगल चाहिए। ये पेड़-पौधे चाहिए। जिससे  जल संरक्षण हो।
ऐसी खेती चाहिए ,जिससे मिट्टी बचे, मिट्टी का संरक्षण हो, यानी रासायनिक खादों व कीटनाशकों से बचा जाए, जो हमारी खेती को बंजर कर रहे हैं।
इसके लिए पौष्टिक अनाजों की देसी खेती , हाथ से श्रम वाली ज़रूरी है। 
दस्तकारी के कामों से परंपरागत कला व हुनर भी बचेंगे और आजीविका भी मिलेगी। इस सूची में और भी कुछ जोड़ा जा सकता है।
इस तरह एक गाँव अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है।
22- 04 - 2019
छत्तीसगढ़ यात्रा
सादगी व सुघड़ता के गाँव
किसी भी जगह की यात्रा में वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ लोगों की संस्कृति भी प्रभावित करती है।
छत्तीसगढ़ उन स्थानों में एक है ,जहाँ की सांस्कृतिक सभ्यता बहुत समृद्ध है। 
खासतौर से ग्रामीण छत्तीसगढ़ की।
शहरी व नगरीय सभ्यता अब एक जैसी हो गई है। चमचमाती सड़़कें, कारें और भव्य इमारतें। उन पर रेंगते -भागते लोग।
लेकिन छत्तीसगढ़ के दूरदराज़ के गाँव अब भी पुरानी गाँव की संस्कृति को सँजोए हुए है।
खपरैल वाले हवादार घर, गोबर से लिपे-पुते, आंगन में तुलसी पौधा, बाड़ी में मुनगा, नींबू और अमरूद।
कुर्ता, धोती की पोशाक, रंगीन गमछा, लुंगी।  महिलाएँ, रंगीन चटक साड़ी। और रेडियो पर छत्तीसगढ़ी गीत।
कड़ी धूप में काम करना, कर्मठ लोगों की चमड़ी की चमक, महिलाओं का सार्वजनिक कामों में बराबरी से हिस्सा लेना।
सुबह झाडू लगाने से लेकर शाम तक खाना पकाना, खिलाना और बाद में खाना, जैसे कड़े काम करना। 
मेहमानों की आव-भगत, लोटे में पानी, नीचे बैठकर पीतल की थाली में चावल, दाल और हरी भाजियों का साग, मुनगा का साग।
सादगी से रहना, तरह तरह के नृत्य गीत, तालाबों के पास बने पेड़ों की पूजा। तालाबों के साथ सुंदर भूदृश्य। जो आँखों में बस जाते हैं।
इतनी सारी ग्रामीण विशेषताएँ शायद ही कहीं मिले।
यह सब लिखते समय मुझे याद आ रहा है कोटा का मानपुर व सरईपाली गाँव जहाँ मुझे बहुत ही प्रेम से भोजन कराया गया था। 
30 – 06 – 2019 
बारिशगाँव औऱ खेत
बारिश का मौसम आ गया है। दो दिन शाम को  घुमड़े बादल बरसे। कल कुछ ज़्यादा ही।
अब खेती किसानी का काम शुरू हो गया है। धान के लिए थऱहा ( रोपा), जो पीला पड़ने लगा था, अब उसमें जान आ गई होगी। 
बारिश आते ही मुझे गाँव की याद आई।
बारिश के पहले लोग खपरैल वाले घरों की मरम्मत करते हैं। जहाँ -जहाँ नए खपरे चढ़ाने की ज़रूरत होती है, बदल देते हैं।
मिट्टी के खपरे लोग खुद ही बनाया करते थे। कई महिलाएँ इसमें पारंगत थीं। 
खपरों के नीचे ठाट ( बाँस या अरहर के ठंडलों से बनता था)  किया जाता था। इस काम में बच्चे भी खपरे लाने ले जाने का काम करते थे।
छतों पर चढ़कर यह काम करना होता था। कई बार बच्चों को भी चढ़ने का मौका मिलता था।
खेतों में धान रोपाई जिसे इधर लबोदा कहते हैं, का दृश्य बहुत सुंदर होता था। रंग-बिरंगी साड़ियों में महिलाएँ और पुरुष लोकगीत गाते हुए रोपा लगाते थे।
बैल-बक्खर चलता रहता था। बारिश होती रहती थी। गाय-बैल चरते चराते खुद को पानी से बचाने के लिए पेड़ों के नीचे छुपते थे।
कई लोग बारिश से बचने के लिए सागौन के पत्ते के छाते बनाते थे। छातों का चलन कम था।