September 26, 2013

इस अंक में

उदंती.com       सितम्बर- 2013

आप चाहे कितने भी पवित्र शब्दों को पढ़ या बोल लें; 
लेकिन जब तक उन पर अमल नहीं करते, 
उसका कोई फायदा नहीं है।
- गौतम बुद्ध

अनकही: बाबाओं का गोरखधंधा  - डॉ. रत्ना वर्मा


अनकही

बाबाओं का गोरखधंधा...
-       रत्ना वर्मा
आजादी के पहले गुलाम भारत में जब अंग्रेज आए और उन्होंने भारत के बारे में अपने संस्मरण लिखे तो उनकी लिखी बातों में से एक बात को बहुत अधिक प्रचारित किया गया कि भारत सपेरों, नटों, जादूगरों और चमत्कारों का देश है? आज भी जब- तब इस बात को दोहराया जाता है? बचपन में जब अपने देश के बारे में इस तरह की बातें सुनते- पढ़ते थे तो मन में गुस्सा भर जाता था कि एक तो वे अंग्रेज हमारे देश को दो सौ सालों तक लूटते रहे और इसी सम्पन्न देश को सपेरों का देश कहकर उसकी खिल्ली उड़ाते रहे।
 मैं अपने देश की संस्कृति और सभ्यता पर गर्व करती हूँ और मुझे मान है अपने देश पर कि मैंने यहाँ जन्म लिया ; लेकिन दु:ख तब होता है जब चारो ओर अपनी इस महान संस्कृति और सभ्यता का उपहास होते हुए देखती हूँ। हम भारतीय मानसिक तौर पर भगवान पर आस्था रखने वाले लोग हैं। हम सृष्टि के रचयिता के सामने हमेशा नतमस्तक होते हैं; परंतु हमारी यही आस्था धीरे-धीरे अंधआस्था बनती जा रही है और हम पर ज़रा -सी मुसीबत आई नहीं कि घबरा जाते हैं। अपने सामने वाले इंसान को सुखी देखकर दु:खी होते हैं कि उसे सब कुछ कैसे मिल गया, मुझे भगवान ने क्यों नहीं दिया। बस फिर क्या है निराशा और हताशा हमें घेर लेती है; जिसका फायदा उठाने के लिए इन दिनों हमारे देश में कई प्रकार के बाबा पैदा हो गए हैं। इन्होंने हमारी इस कमज़ोरी का फायदा उठाना शुरू कर दिया है- कोई कहता है काले पर्स में पैसा रखो ,आपका पर्स हमेशा भरा रहेगा, कोई चमत्कार करके प्रसाद और फूल देकर उनकी गोद भर रहा है, तो कोई हाथों से भभूत निकाल करके उनके सब दु:ख हरने का दावा कर रहा है, कोई भविष्य बताकर बरगला रहा है, तो कोई जनता की सेवा के बहाने बड़े- बड़े आश्रम खोलकर दुकानदारी कर रहा है। इन्होंने देश- विदेश में बड़ी तादाद में अपने चेले- चपाटे खड़े कर लिये हैं ,जो अपने- अपने बाबाओं का गुणगान करते हुए, उनकी चमत्कार-कथाओं का प्रचार- प्रसार करते हैं।  मुसीबतों की मारी जनता जो पहले से ही मँहगाई, गरीबी, बेरोजगारी और बीमारी से ग्रसित है ,भाग्य पर भरोसा कर बाबाओं की शरण में पँहुच जाती है, और पँहुचे भी क्यों न बाबाओं का चमत्कार ही ऐसा होता है कि न वे पैसे को छूते हैं, न किसी से पैसा लेते हैं; लेकिन उनकी सुख- सुविधाएँ देखिए तो पाँच सितारा से कम नहीं होती।  उनके लिए जो मंच बनाए जाते हैं ,वे भी एयरकंडीशंड होते हैं। पर फिर भी वे कहते हैं यह सब भक्तों की कृपा है, हम किसी को जबरदस्ती नहीं बुलाते। आपको उन पर श्रद्धा है, भरोसा है, आपको ऐसा लगता है कि बाबा आपके कष्ट दूर कर देंगे तो आप उदार मन से दान दीजिए।
 पिछले दो दशकों से हमारे देश में ऐसे बाबाओं की बाढ़- सी आ गई है। इन ढोंगी बाबाओं के चलते अब सच्चे और ज्ञानी संत महापुरुष कहीं पीछे हाशिए पर चले  जा रहे हैं ; क्योंकि एक सच्चा संत वह सब नहीं कर सकता जो ये तथाकथित बाबा किए जा रहे हैं। हम जितने अधिक आधुनिक बन रहे हैं, ये बाबा अपना जाल उतनी ही तेजी से फैला रहे हैं।  बाबाओं के लिए आज मीडिया सबसे सस्ता और सुलभ माध्यम हो गया है। और अब तो इण्टरनेट में इन बाबाओं की अपनी वेब साइट बनी हुई हैं; जिनमें उनके चमत्कार के ऐसे- ऐसे किस्से बखान किए गए हैं कि दाँतो तले उँगली दबानी पड़ जाती है।
बावज़ूद इसके कि एक के बाद एक ऐसे बाबाओं के  ढोंग, उनके  पाखंड उजागर होते जा रहे हैं ,पर आश्चर्य -हमारी भोली! जनता को अपने अंधविश्वास के चलते यह सब कुछ नजर नहीं आता! ऐसी मन:स्थिति पर मनोविज्ञान कहता है कि जो व्यक्ति कमजोर होता हैं और कर्म के बजाय चमत्कारों पर विश्वास करते हुए अपने को भाग्य के हवाले कर देता है वह ऐसे बाबाओं की शरण में जा कर अपनी हताशा अपनी निराशा दूर करने की कोशिश करता है। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ गरीब और मध्यमवर्ग इनके भक्त बने होते हैं, इनके भक्तों की लाइन में कारों की कतारें भी लगी रहती हैं।
इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर तो हम आधुनिक और शिक्षित होने का दम भरते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी दैनिक जीवन की समस्या के समाधान के लिए ऐसे तथाकथित ढोंगी बाबाओं की शरण में जाते हैं। इतना ही नहीं किसी बीमारी को भूत-प्रेत की छाया मानकर बैगा और ओझाओं के पास जाते हैं, साँप या कुत्ते के काटने पर बजाय इलाज कराने के झाड़- फूँक का सहारा लेते हैं, अपनी अवांछित मनोकामना की पूर्ति के लिए बलि प्रथा या काले जादू पर विश्वास करते हैं। ये किस तरह की आदिम मानसिकता में हम जी रहे हैं! पिछले माह महाराष्ट्र में ऐसे ही अंधविश्वासों के खिलाफ कानून बनवाने के लिए लड़ते रहने वाले नरेन्द्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनकी पहल पर राज्य में अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिए एक विधेयक का प्रस्ताव आया भी था पर राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में वह पास न हो सका। उनकी हत्या के  एक दिन बाद महाराष्ट्र सरकार ने उसी विधेयक को अध्यादेश के तौर पर लागू करने की घोषणा जरूर की है।
अब प्रश्न यह उठता है कि इस तरह के गोरखधंधे कब तक चलते रहेंगे और जनता कब तक ठगी जाती रहेगी? ऐसे बाबाओं को बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं? इनसे मुक्ति के लिए सबसे पहले तो स्वयं जनता को इनके मोहजाल से निकलना होगा ।इसके लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरुरत है ,जो बचपन से ही इन अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाए।  दूसरी जिम्मेदारी शासन- प्रशासन और कानून- व्यवस्था की बनती है कि वे ऐसे बाबाओं के बढ़ते कारोबार पर सख्त नजर रखें, आज बहुत सारे बाबाओं का कारोबार इसलिए भी फल-फूल रहा है; क्योंकि उन्हें शासन-प्रशासन का प्रश्रय मिला होता है। तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी मीडिया की बनती है - थोड़े से फायदे के लिए उन्हें ऐसे ढोंगी बाबाओं का प्रचार- प्रसार करना बंद करना होगा, बल्कि जिस प्रकार आसाराम बापू के मामले में मीडिया ने अपनी भूमिका निभाई है, उसी तरह जनता के हित में सतर्क रहते हुए ऐसे गोरखधंधों को हमेशा ही उजागर करते रहना होगा।
अफसोस तो तब होता है जब इस तरह का कोई भी मामला जैसे ही ठंडा होता है ,सब उसे भूल जाते हैं और फिर चुपके से वही कारोबार और किसी तरीके से फिर-फिर शुरू हो जाता है; जिसकी रोकथाम बहुत जरुरी है । यह काम मीडिया बार-बार और हजार बार बताकर आगाह करके  इसे रोक सकती है। आज इस बात को सबने जान लिया है और मान भी लिया है कि जन-जागरण में मीडिया जैसा प्रभावशाली माध्यम और कोई नहीं है, यह तब भी सबसे प्रभावशाली माध्यम था ,जब हमारे पास उतने साधन और तकनीक नहीं थी और आज भी है जब हमारे पास अत्याधुनिक तकनीक है जो पूरी दुनिया को एक साथ जोडऩे में सक्षम है। उम्मीद तो यही है कि जन- जागरण की यह जिम्मेदारी हम बखूबी उठाएँगे और ऐसे बाबाओं को पनपने नहीं देंगे।

धरोहर

तेरह सौ साल से भी पुराना शहर

रायपुर

-जी.के. अवधिया

आज हम रायपुर को छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में जानते हैं। शायद आपको पता हो कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र वर्तमान भारत के अति प्राचीन क्षेत्रों में से एक है और प्राचीन काल में यह क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से विख्यात था जिसका वर्णन मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों में पाए जाते हैं।
छत्तीसगढ़ के अन्तर्गत आने के कारण रायपुर भी अत्यन्त प्राचीन क्षेत्र है। यदि रायपुर के इतिहास का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है कि नौवीं शताब्दी से पीछे जाने पर पता चलता है कि दूसरी से तीसरी शताब्दी तक यहाँ पर सातवाहन राजाओं का राज्य रहा है। चौथी सदी में राजा समुद्रगुप्त ने इस पर विजय प्राप्त कर लिया और पाँचवी-छठवीं सदी तक उनके वंशज यहाँ राज्य करते रहे। पाँचवी-छठवीं सदी में यह क्षेत्र कुछ काल तक शरभपुरी राजाओं में के अधिकार में रहा फिर नल वंश के शासक यहाँ शासन करने लगे। बाद में इस क्षेत्र का नियन्त्रण सोमवंशी राजाओं के हाथ में आ गया जिन्होंने सिरपुर को अपनी राजधानी बनाया था। सोमवंशी राजाओं में महाशिवगुप्त बालार्जुन सर्वाधिक पराक्रमी राजा रहे, उन्हीं की माता रानी वत्सला ने सिरपुर में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण करवाया था। उल्लेखनीय है कि सिरपुर का प्राचीन नाम 'श्रीपुर’  था और 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग श्रीपुर आया था जिसने श्रीपुर के 70 मंदिरों व 100 विहारों का उल्लेख किया है।
जहाँ तक शहर होने का सवाल है, 9वीं शताब्दी में भी रायपुर एक शहर के रूप में था याने कि एक हजार तीन सौ साल पहले भी रायपुर कोई गाँव, कस्बा या बस्ती न होकर एक नगर था। वर्ष 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर में लिखा है कि-  ऐसा प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ एक अत्यन्त प्राचीन क्षेत्र है जहाँ भुइया एवं मुंडा वंश के शासकों का राज्य था जिन पर गोंड वंश ने विजय प्राप्त कर उन्हें सुदूर पहाड़ियों में भाग जाने के लिए विवश कर दिया था। गोंडों ने प्रथम बार इस क्षेत्र को नियमित व्यवस्था वाला शासन प्रदान किया।
 साथ ही उसमें यह भी उल्लेख है कि विश्वास किया जाता है कि रायपुर नगर का अस्तित्व नौवीं शताब्दी से है तथा प्राचीन रायपुर वर्तमान रायपुर के दक्षिण पश्चिम में बसा था जिसका विस्तार खारून नदी तक था।
14 वीं सदी में रतनपुर राजवंश के राय ब्रह्मदेव ने रायपुर को फिर से बसाया था तथा यहाँ अपनी राजधानी बनाई थी। सन् 1460 में एक किले का निर्माण किया गया था जो कि आज पूर्णत: नष्ट हो चुका है।  किले के दो तरफ दो तालाब थे जो कि आज भी विद्यमान हैं तथा विवेकानन्द सरोवर (बूढ़ा तालाब) एव महराजबन तालाब के नाम से जाने जाते हैं। आज जो स्थान किला बगीचा के नाम से जाना जाता हैं कभी वहाँ पर ही वह किला था और वहाँ पर किला होने के कारण ही उस स्थान का नाम किला बगीचा पड़ा।
उपलब्ध जानकारी से लगता है कि रायपुर लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में रतनपुर से विभाजित होकर अलग राज्य बना और रतनपुर के राजा के कनिष्ठ पुत्र यहाँ के राजा बने। सन् 1741 में मराठा सेनापति, भास्कर पन्त, ने रतनपुर राज्य पर विजय प्राप्त की और उसे मराठा राज्य में जोड़ दिया। तत्पश्चात् सन् 1750 में रायपुर के राजा अमरसिंह मराठों के द्वारा पराजित हुए और सन् 1750 से 1818 तक रायपुर पर मराठों का शासन रहा।
सन् 1818 में रायपुर को अंग्रेजों ने मराठों से हथिया लिया और वहाँ सन् 1818 से 1830 तक अंग्रेजों का शासन रहा। सन् 1818 में ही अंग्रेजों ने रायपुर को छत्तीसगढ़ का मुख्यालय बनाया। सन् 1830 में रायपुर पर फिर से मराठों का अधिकार हो गया जो कि सन् 1853 तक चला। सन् 1853 में पुन: रायपुर अंग्रेजों के अधीन आ गया और स्वतन्त्रता प्राप्ति तक उन्हीं का शासन रहा। इम्पीरियल गजेटियर के अनुसार रायपुर पर अंग्रेजों के अधिकार प्राप्ति के समय रायपुर के प्राचीन मन्दिर दूधाधारी मन्दिर का जीर्णोद्धार हो रहा था।
अंग्रेजों के काल में रायपुर कमिश्नर डिवीजन, डिवीजनल जज, इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स, सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ पोस्ट ऑफिस तथा इरीगेशन इंजीनियर के प्रतिनिधि आदि का मुख्यालय था। सेन्ट्रल प्राव्हिंसेस के तीन सेन्ट्रल जेलों में से एक जेल रायपुर में ही था। सन् 1861 में बिलासपुर को रायपुर जिला से निकाल कर अलग जिला बनाया गया। सन् 1867 में रायपुर में म्युनिसपालिटी स्थापित की गई।
सन् 1892 रायपुर में जल वितरण के लिए बलरामदास वाटर वर्क्स, जिसके मालिक राजनांदगाँव के राजा बलरामदास थे, की स्थापना हुई जो खारून नदी से पानी के वितरण का कार्य करता था।
उन दिनों पीतल के सामान बनाने का कार्य, लकड़ी पर रोगन लगाने का कार्य, कपड़ा बुनना, सोनारी कार्य आदि रायपुर के प्रमुख व्यवसाय थे। रायपुर में दो प्रिंटिंग प्रेस थे जिनमें अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू और ओड़िया भाषा में छपाई का कार्य होता था। यहाँ पर एक संग्रहालय भी था जिसका निर्माण सन् 1875 में हुआ था, तथा यह संग्रहालय आज भी 'महंत घासीदास संग्रहालय’ के नाम से मौजूद है।
शिक्षा के लिए राजकुमार कॉलेज ( जहाँ पर राजा, जमींदारों, जागीरदारों एवं रईसों की सन्तानों को ही दाखिला दिया जाता था) के साथ ही गवर्नमेंट हाई स्कूल भी था, इसके अलावा और भी कई स्कूल थे। चिकित्सा के लिए अनेक डिस्पेंसरीज़ भी थे।

सम्पर्क:  अवधिया पारा चौक, पीपल झाड़ के पास
रायपुर (छ.ग.)-  492 001, मो. 08004928599,                   

अभयारण्य

उदंती-  विलुप्त प्रजातियों की शरणस्थली
उदंती अभ्यारण वर्ष 1984 में 237.28 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में स्थापित है। छत्तीसगढ़ उड़ीसा से लगे रायपुर-देवभोग मार्ग पर 20 15 उत्तरी अक्षांश एवं 82 0 देशांश पर यह अभयारण्य का तापमान न्यूनतम 7 से. एवं अधिकतम 40 से. रहता है। पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली उदंती नदी के आधार पर इस अभयारण्य का नामकरण हुआ है। अनेकानेक पहाडिय़ों की शृंखला एवं उनके बीच फैली हुई मैदानी पट्टियों से इस अभयारण्य की विशेषकृति तैयार हुई है। उदंती की लहराती पहाडिय़ों घने वनों से आच्छादित हैं। विशाल मैदान के साथ इन वनों में साजा, बीजा, लेंडिया, हल्दू, धाओरा, आँवला, सरई एवं अमलतास जैसी प्रजातियों के वृक्ष भी पाए जाते हैं। वनभूमि घास, पेड़ों, झाडिय़ों व पौधों से ढंकी हुई हैं। अभ्यारण्य का उत्तरी-पश्चिम भाग साल के वृक्षों से सुसज्जित है। फरवरी माह में उदंती नदी का बहाव रुक जाता है। बहाव रुकने से नदी तल में जल के सुंदर एवं शांत ताल निर्मित हो जाते हैं। यहाँ कुछ झरने भी हैं, जिनमें प्रसिद्ध देवधारा एवं गोदिन जलप्रपात शामिल है। अभयारण्य के अधिकतर क्षेत्रों में मानव निर्मित जलाशय पर्याप्त मात्रा में हैं। इनमें कांप नं. 34 जलाशय, कांप न. 82 जलाशय वृत्ताकार सड़क जलाशय, कंपा नं. 81 जलाशय एवं कंपा नं. 77 जलाशय शामिल हैं। यहाँ जंगली भैंसे निश्चित ही देखे जा सकते हैं।
उदंती में पक्षियों की 120 से भी ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें कई प्रवासी पक्षी शामिल हैं। इनमें से कुछ जंगली मुर्गे, फेजेन्ट, बुलबुल ड्रोंगो, कठफोड़वा आदि। उदंती संपूर्ण रूप से विशिष्ट प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण अभ्यारण्य है।
 चीतल, सांभर नीलगाय, जंगली सुअर एवं सियार यहाँ आमतौर पर आसानी से देखे जा सकते हैं। तेंदुआ, भालू, जंगली कुत्ते, जंगली बिल्ली, साही, लोमड़ी, धारीदार लकड़बग्घागौर, चौसिंगा एवं हिरण भी पाए जाते हैं। बाघ हालांकि काफी संख्या में हैं, लेकिन स्वभाव से शर्मीलें होने की वजह से कम ही दिखाई देते है।
उदंती ऐसा विरल बीहड़ स्थल है, जहाँ सबसे बड़े स्तनपायी प्राणियों में से एक जंगली भैंसा व गौर एक साथ देखे जा सकते हैं। इस अभयारण्य के निर्माण का विशिष्ट कारण विलुप्त प्रजातियों का मौजूद होना है, जैसे:- जंगली भैंसा (बिबालुस, बुबालिस), जो कि सिर्फ आसाम एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश में ही पाया जाता है।
दर्शनीय स्थल
गोड़ेना फाल- यह जलप्रपात करलाझर ग्राम से 8 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। स्थल तक पहुँचने के लिए घने वन एवं नदी के किनारे लगभग 800 मीटर पैदल चलना पड़ता है। रंगबिरंगी चट्टानों के सामान्य डाल से लगभग 250 मी. बहते हुए पानी को बच्चे फिसल पट्टी के रूप में भी उपयोग करते है। यह स्थल एकांत में है एवं बहुत ही मनोरम है, जहाँ झरने की कलकल की ध्वनि, पहाड़ी से बहती हुई सुनाई देती है। पर्यटकों के लिए पिकनिक का यह अच्छा स्थान है।
देवधरा जलप्रपात- तौरेंगा से 17 कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात है। यहाँ पहुँचने के लिए 1.5 कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। मिश्रित वनों से घिरा हुआ यह स्थान बहुत ही खूबसूरत है। बहुत बड़ी चट्टान के नीचे पूर्ण कटाव से ऐसा लगता है जैसे चट्टान आसमान में हों और नीचे गहरा जल भराव है। 40 फुट की ऊँचाई से गिरती जलधारा एवं पीछे दूर तक नदी में भरा हुआ जल एक अद्भुत दृश्य बनाता है।
सिकासेर जलाशय- अभ्यारण्य पहुँच मार्ग पर रायपुर देवभोग राज्य मार्ग पर धवलपुर से 3 कि.मी. पहले बाँए और 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित सिकासेर जलाशय है जो पैरी नदी पर बना है, जहाँ ऊपर एवं नीचे दोनों स्थानों पर सुंदर देवालय है। ऊपर पहाड़ी पर अति सुंदर प्राकृतिक कुण्ड है जहाँ प्रति वर्ष मेला लगता है। इसी जलाशय पर जल-विद्युत -संयंत्र निर्माणधीन है। जलाशय के नीचे लगभग 700 मीटर तक प्राकृतिक ढलानी चट्टानों से लगातार बहती हुई धारा बहुत ही सुंदर लगता है। कई स्थानों पर चट्टानों के बीच ठहरा हुआ पानी प्राकृतिक स्वीमिंग पूल बनाता है।
सीतानदी अभयारण्य
सीतानदी अभयारण्य की स्थापना 1974 में हुई थी एवं इसका क्षेत्रफल 553.36 वर्ग किमी है। यहाँ की विशेषताओं में 1600 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा, न्यूनतम 8.5 से. व अधिकतम 44.5 से. तापमान शामिल हैं। सीता नदी के आधार पर अभयारण्य को सीतानदी नाम दिया गया, जो कि अभयारण्य में उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। सीतानदी की भूमि उबड़-खाबड़ एवं छोटी-छोटी पहाडिय़ों और साल वनों में से आच्छादित है। यहाँ स्थित साल वन, देश के सर्वोत्कृष्ट वनों में से एक हैं। अभयारण्य में सीधे तने वाले टीक के रोपित वन व साजा, बीजा, लेंडिया, हल्दु, धाओरा, आँवला, सरई, अमलतास के मिश्रित भव्य वृक्ष बहुतायत में देखे जा सकते हैं। उदंती अभयारण्य के समान ही सीतानदी अभयारण्य की भूति भी घास, पौधों, झाडिय़ों आदि से ढंकी हुई है। बाँस वृक्ष यहाँ का सबसे प्रभावी और ध्यान आकर्षित करने वाला पादप है।
सीतानदी के अलावा, अभयारण्य में सोंढूर एवं लिलांज नदी बहती है। इस पर सोंढूर बाँध का निर्माण किया गया है, जिसमें विशाल जलराशि संचित है। अभयारण्य में स्थित वन का बड़ा हिस्सा सोंढूर नदी के पानी की सतह से नीचे है, जिससे सीतानदी स्थित वनों को नुकसान पहुँचा है। साथ ही यहाँ बहुत बड़े जलाशय का निर्माण हो गया है। बदले हुए प्राकृतिक आवास के कारण यहाँ पेड़-पौधों एवे वन्य जीवों की कई प्रजातियों का विकास हुआ है।
चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर एवं सियार यहाँ आमतौर पर आसानी से देखे जा सकते हैं। तेंदुआ, भालू जंगली कुत्ते, जंगली बिल्ली, साही लोमड़ी, धारीदार लकड़बग्घा, गौर, चौसिंगा एवं हिरण भी मिलते हैं। यहाँ बाघ भी हैं, लेकिन उनकी संख्या कम होने व शर्मीले स्वभाव के कारण कभी-कभी ही दिखाई देते हैं। पूरे अभयारण्य में घने वन का विस्तार होने से जंगली जानवरों को देखना मुश्किल हो जाता है।
सीतानदी अभ्यारण्य में 175 से भी अधिक प्रजाति के पक्षियों के होने का दावा किया जाता है। इनमें प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं। इनमें से कुछ हैं जंगली मुर्गे, फेजेन्ट, बुलबुल, ड्रोंगो, कठफोड़वा आदि। उडऩे वाली गिलहरी एक लुप्तप्राय: प्रजाति है, जो कि यहाँ मिलती है। खल्लारी स्थित वन विश्रामगृह, वाच टावर, सोंढूर डैम आदि दर्शनीय स्थल हैं। अन्य पर्यटन स्थलों में अगस्त्य ऋषि, अंगिरा ऋषि, कंक ऋषि, महर्षि गौतम, मुचकुंद ऋषि, शरभंग ऋषि एवं शृंगी ऋषि के आश्रम दर्शनीय हैं। (छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल)

यात्रा-वृत्तांत

त्रेतायुगीन जीवन मूल्यों 
के साथ 
फकीरी में मगन

बैइगा आदिवासी

परदेशी राम वर्मा

छत्तीसगढ़ का बारनवापारा अभयारण्य अपनी आंतरिक विशेषताओं के कारण सम्मोहित करता है। मैंने हर ऋतु में बारनवापारा को देखा है। 'प्रतिपल परिवर्तित प्रकृति वेश’  पंत जी की इस पंक्ति का मर्म समझना हो तो हर ऋतु में वहाँ जाना चाहिए। प्रकृति किस तरह भेष बदलकर दर्शकों को चकित करती है इसे केवल देखकर ही समझा जा सकता है। और तो और जंगली पशु और पक्षी भी ऋतुओं के साथ आपनी अदाओं में हेरफेर कर लेते हैं।

बारनवापारा का प्रवेश द्वारा है तुरतुरिया। तुरतुरिया में ही महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है। इसी आश्रम में गर्भवती महारानी सीता ने अयोध्या से निष्कासित होने के बाद आश्रम पाया। और यहीं उन्होंने दृढ़तापूर्वक संकल्प लेकर समाधि ले ली। धरती से उपजी सीता अंतत: धरती से इस तरह अपनी गोद में ले लेने का आग्रह करती हैं।
यथाइहं राघवादन्यं मनसाडपि न चिंतये।
तथा में माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।
मनसा कर्मण वाचा यथा राम समचंये।
तथा में माधवी देवी विवंर दातुमर्हति
यथैतत् सत्यमुक्तं मे वे रामात परं न च।
तथा में माधवी देवी विवंर दातुमर्हति।
उपर्युक्त श्लोक में सीता का यह आर्त्तनाद समाहित है जिसमें सीता माता ने कहा है कि मन से कभी राम के सिवाय अगर मैनें किसी दूसरे पुरुष का चिंतन नहीं किया तो हे धरती मैया तुम अपनी गोद में मुझे स्थान देना।
तुरतुरिया जाकर उपर्युक्त श्लोक में चित्रित आर्त्तनाद को महसूस किया जा सकता है।
आदिवासियों का अंचल है छत्तीसगढ़। आश्चर्य तो तब होता है जब सभ्यता के इस विस्फोट युग में भी हम अपने छत्तीसगढ़ में त्रेतायुगीन जीवन जीते हुए अपने आदिवासियों को देख पाते हैं।
श्रीराम और  सीता का सम्बन्ध छत्तीसगढ़ के वनवासियों के साथ कितना गहन था यह हम राम वनवारा और सीता के तुरतुरिया प्रवास की कथा से जानते हैं तो शबरी प्रसंग भी हमें बताता है कि राम-मय छत्तीसगढ़ की आस्था का रंग इतना गाढ़ा क्यों है। वनवासी राम छत्तीसगढ़ के भाँजे माता कौशल्या के बेटे रामसीता-पति राम के रूप में छत्तीसगढ़ ने अपने हृदय में श्रीराम को बसाया है। धरती पर जा समाई सीता के बिछोह में किस धरती पर सर पटक कर राम ने विलाप किया होगा।
छत्तीसगढ़ भाषा में रामाख्यान सुनकर लगता है कि श्रीराम का ननिहाल छत्तीसगढ़ सदा राम के साथ-साथ चला है।
इस हड़बड़ीअधीरता और अतृप्ति के युग में विलक्षण परितृप्तिधीरज और शांति का अर्थ जानना हो तो छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल की यात्रा करें।
विशेषकर कबीरधाम जिले के बैइगा आदिवासियों और अचानकमार तथा बारनवापारा सहित बस्तर और अंबिकापुर के कटकटाते जंगलों के भीतर बसे आदिवासियों से मिलें।
अगासदिया के दल के साथ मैंने इन क्षेत्रों की यात्रा का सुजोग जमाया। इन यात्राओं में कलाकार महेश वर्मासाहित्यकार लेखराम मढरियागायक राजेन्द्र साहूसमाजसेवी मालिक वर्मा एवं मनहरण साहू दल के सदस्य के रूप में साथ-साथ रहे।
कबीरधाम जिले के बैइगा आदिवासी और उनके गाँव
कवर्धा जिले में बैइगा आदिवासियों के लिए शासन ने अनुकरणीय काम कर दिखाया है। पर्यटक वहाँ जाकर महसूस करता है कि छत्तीसगढ़ सचमुच पाँच हजार वर्षो का इतिहास एक साथ समेटकर आगे बढ़ रहा है।
रायपुर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट स्टेडियम है तो कवर्धा के सुदूर ग्राम सेन्दुरखार में ऋषियों के युग के घर और छप्पर वाली कुटियों की शृंखला भी है।
पचासों एकड़ खाली जमीन में एक तरफ छोटे-छोटे पहाड़दूसरी ओर बहती नदी के किनारे एक झोपड़ी में बैगा जवान और उनकी घरवाली अपने छोटे से बच्चे के साथ। कैसे सुबह का स्वागत वे करते हैंकिस तरह साँझ उनके आँगन में झुकती है और किस तरह रात भर घूमते वन पशुओं के साथ वे समन्वय बनाकर चैन की नींद लेते हैं यह सोचकर यात्री रोमांचित हो उठता है। अप्रैल के महीने में हम गए थे सेन्दुरखार बैइगा गाँव। चारों और महुआ से पटी धरती। घरों के आँगन में महुआ की ढेरियाँ। वन से काँवर में महुआ लेकर गाँव की ओर आता कँवरहा बैइगा जवान छोटी-छोटी सुन्दर साफ-सुथरी झोपडिय़ाँ। मिट्टी के मकान।
लकडिय़ों के सहारे पैरा के लिए बने बड़े मचान। सरकार द्वारा निर्मित शासकीय कार्यालयपाठशालाएँ। सोलर ऊर्जा के लिए समुचित व्यवस्था और पक्की सड़कें। छत्तीसगढ़ कितना सुन्दर है, यह जानना समझना देखना हो तो इन आदिवासी गाँवों में जरूर जाना चाहिए। ये गाँव अपनी पौराणिकता के साथ आधुनिकता को पाकर अब अँगड़ाई लेने लगे हैं। गाँवों से निकलकर बैइगा आदिवासी सुदूर जंगलों में एक एक घर बनाकर एकांत में जीने का सुख उठा रहे हैं। उन्हें कोलाहल पसंद नहीं है।
आदिवासी गाँवों में शासन की ओर से सुविधाएँ जुटाई  गई हैं फिर भी वे अपनी नैसर्गिक रूझान के कारण साधनहीनता को आमंत्रित कर जंगलों के भीतर चले जाते हैं। यह जो बैगाओं की जिद है उसे समझना कम कठिन नहीं है। कबीर ने ठीक ही कहा है...
जिसको कछू न चाहिए सो ही शाहंशाह
बैगा आदिवासियों के घरों को झाँक कर देखने पर अपरिग्रह और त्याग का अर्थ समझने में सहूलियत होती है। एक कथरीदो एक जरमन के बर्तनएक लाठीटोपलीसूपाकुल्हाड़ीगैंती और हँसियाबस इतना सामान। यहाँ शहरी लोगों के लिए शायर लिख-लिखकर अधमरा हो गया कि...
'आगाह अपनी मौत से कोई बसर नहीं,
सामान सौ बरस का हैपल की खबर नहीं।
शहरी आदमी सौ बरस का सामान कई पीढिय़ों के लिए जोडऩे में मरा जाता है। बैइगा आदिवासी अपने लिए जरूरी सामान को भी त्यागता फिरता है ; क्योंकि उसकी मान्यता है कि...
'मन में है संतोष तोसबसे आप अमीर,
लालच में सुलतान केकब बँध सके फकीर
'स्वर्ग-द्वार और वन का मायालोक
पुरी में समुद्र किनारे जहाँ लोग नहाते हैं उस स्थान का नाम स्वर्गद्वार है। मुझे बारनवापारा का तुरतुरिया वन-पोस्ट और कवर्धा जिले का पोड़ी ग्राम क्षेत्र स्वर्ग-द्वार लगता है।
कवर्धा जिले के स्वर्गोपम बैइगा गाँवों में जाने का रास्ता पोड़ी से होकर जाता है।
मार्ग इस तरह है...
पोड़ी से पाण्डातराईपंडरियापटौहाकुईकुकदुरपोलायपुटपुटाचाटा फिर दोलदोली। यह दोलदोली नहीं किनारे का अत्यंत सुन्दर गाँव है। ऐसे गाँवों के लिए कवियों ने मुग्ध होकर गीत रचे।
आमा अऊ लीम के छाँव रे,
नदिया के तीर मोर गाँव रे।
यहाँ मूलचंद बैइगा का घर है। श्रीमती लमनी बैइगिन के साथ वे यहाँ रहते हैं। इनका मूलगाँव सेजाहिड है। लमनी बैइगिन का मायका है। जकनाडिह। गाँवों के ये नाम सुनते हुए मुझे मेरे गाँव लिमतरा से अलग होकर बना गाँव सुरजीडिह याद हो आया। सुरजाबाई गौटनिन के नाम पर यह गाँव सुरजीडिह बसा दिया गया। मैदानी क्षेत्रों में गाँवों और वनग्रामों के नाम में यह समानता भर नहीं है। लगभग भाषाखानपानजीवनचर्यातीज-त्योहारमान्यतादेव-देवी पूजन पद्धतियों में भी छत्तीसगढ़ एक है। आर्य और अनार्य के नाम पर यह सांस्कृतिक विभाजन विद्वानों ने किया है। कुछ उच्च जातियों को छोड़कर समस्त छत्तीसगढ़ की पिछड़ी दलित वनवासी जातियों के बीच संस्कृति का एक ही सूत्र प्रवहमान है। इसे हम छत्तीसगढ़ के भीतर डुबकी लगाकर ही समझ पायेंगे। जो छत्तीसगढ़ के गाँवों में पिछड़ीदलित वनवासी समाज में जन्में उनका अपना छत्तीसगढ़ है। उच्च जातियों में जन्म लेकर भी जिन्होंने छत्तीसगढ़ की आत्मा को पहचाना वे भी उनके साथ समरस हैं। दुर्भाग्य की बात है कि जो छत्तीसगढ़ को समझने का धीरज भी नहीं साध पाते वे इस  पर दावे के साथ अपना मन्तव्य स्थापित करते हैं। तनाव ऐसी ही दुस्साहसिक स्थापनाओं के कारण पैदा होता है।  छत्तीसगढ़ के बाहर से आकर कुछ नामी गिरामी पत्रकारोंलेखकों ने भी अपनी कुंठा से अभिशापित कुटिल वृत्ति का डंका बजाया। लेकिन अब धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ सजग हो रहा है। वह अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान रहा है। कोदोधान की फसलें इस क्षेत्र में होती है। भद्दूटिकूलननिहाबाईइस तरह के नाम वाले लोग सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में मिलते हैं। ये लोग हमें पिपर टोला गाँव में मिले।
सेन्दुरखार कवर्धा से तो किलोमीटर दूर स्थित छत्तीसगढ़ का कश्मीर है। अम्बिकापुर क्षेत्र में जिस तरह पहाड़ों में विशाल मैदान हैंउसी तरह सेन्दुरखार पहाड़ की चोटी पर स्थित सुन्दर मैदानी क्षेत्र है। यहाँ अप्रैल के महीने में दिन को दो बजे हम पहुँचे। ठंडी हवा का झोका लगातार उसी तरह चलता रहा जिस तरह दिसंबर माह में हमारे  मैदानी क्षेत्रों में चलता है। सेन्दुरखर में 45 घर के बैइगा हैं। यहाँ की जनसंख्या 645 है। दस घर यादवों के इस घर मानिकपुरी परिवार का है। 60 बच्चे स्कूल जाते हैं। उनके लिए एक ही शिक्षक है। सेन्दुरखार का आश्रित गाँव बाँगर है। यहाँ बलियादवबुधा बाईजयसिंह बैइगा तथा असरी बाई से भेंट हुई। सुक्रिय दस मानिकपुरी इस गाँव के आठवीं तक पढ़े शहरी विकास और कारोबार से परिचित कला साधक हैं।
इस गाँव में महेश वर्मा के नेतृत्त्व में लोकमय द्वारा शासकीय विकास गाथा की प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं। संभवत: लोकमया परिवार इसीलिए इस क्षेत्र के गाँवों और वहाँ के कुद चुनिंदा ग्रामीणों से परिचित भी है।
कवर्धा क्षेत्र में भ्रमण के बाद हम अचानकमार अभयारण्य के करीबी गाँवों की ओर भी गए। अचानकमार टाइगर रिजर्व को अब नये सिरे से संरक्षित किया जा रहा है। वहाँ से लमनी रेस्ट हाउस को हटाया जा रहा है।  बाघों के मिजाज के अनुरूप अभयारण्य को अनुकूल के लिए संरक्षित किया जा रहा है।
लोरमी से होकर अगर अचानकमार जाना चाहें तो रास्तें में लगातार छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गाँव और आगे बढऩे पर आदिवासी गाँव मिलेंगे।
घूमाकरगीकलालोकबंदकरगीखुर्दलिटियागाबरीपारापटैता फिर शिवतराई। आजकल शिवतराई में ही रेस्ट हाउस को स्थापित किया गया है। लमनी का सारा सामान शिवतराई में ला दिया गया है।
माननीय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी के गृह जिले कवर्धा में लगातार बैइगा आदिवासीयों से उनके जीवन और जीवन के विविध रंगों के बारे में स्थानीय सम्पर्को के साथ मिलकर हमने जानकारी ली।
छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग के संयुक्त संचालक श्री सालिकराम वर्मा हमारे पारिवारिक सदस्य हैं। वे समाजसेवी एवं छत्तीसगढ़ी संस्कृति के जानकार अधिकारी हैं। उन्होंने कृषि विभाग के सहायक भूमि संरक्षण अधिकारी श्री रविशंकर गुप्ता जी से कहकर हमारे लिए यात्रा को सुगम बनवा दिया। संस्कृति मंत्री जी के निज सविक वन पठारिया जी ने बारनवापारा क्षेत्र में भ्रमण के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
यहाँ अचानकमार अभयारण्य क्षेत्र में हमें बिलासपुर के एडीशनल कमिश्नर श्री एस.एल. रात्रे जी से सम्बल मिला। मेरा अनुज महेश साल भर पहले अपने कला दल के साथ लमनी तक प्रदर्शन हेतु गाँव-गाँव गया था; तब उसे लमनी रेस्ट हाउस में शासकीय निर्देशनुसार सारी सुविधा मिली थी। उसी अनुभव के आधार पर हम लमनी पहुँच तो गये मगर वहाँ जाकर पता चला कि अब व्यवस्थाएँ बदल गई हैं।
अचानकमार में नई व्यवस्था
शिवतराई के बाद हम मानपुरबारीघाटअचानकमारछपरवातिलईडबरीलमनी अतरिया होते हुए केवची पहुँचे। केंवची में साहू परिवार का विशाल ढाबा है। केंवची वह स्थान है जहाँ से अमरकंटक एकदम करीब है। साहू ढाबे में भोजन करने के बाद हम पुन: वापस हुए।
शिवतराई विश्रामगृह भी अभी निर्माणधीन है। वहाँ रुकने की व्यवस्था नहीं हो पाई। श्रीरात्रे जी ने अपने सहपाठी राहुल वाजपेयी के प्रसिद्ध पाँच-सितारा होटल इस्टपार्क में हमारे दल को रात्रि -विश्राम हेतु स्थान दिलवाया।
ईस्ट पार्क में रुककर हमें ज्ञात हुआ कि यह होटल पूर्व विधायक यशस्वी कांग्रेसी नेता स्व. रोहिणी कुमार वाजपेयी के सुपुत्र श्री राहुल वाजपेयी का है।
छत्तीसगढ़ में नए और पुराने का संगम
इस यात्रा में हमें उसे कथन को नए सिरे से समझने का अवसर लगा कि छत्तीसगढ़ एक साथ पाषाण युग और इक्कीसवीं सदी में साँसे लेता है। यह विलक्षण क्षेत्र है जहाँ पौराणिकता और आधुनिकता के दोनों सिरे पूर्ण गरिमा और आत्माभिमान के साथ हमें अपने सूत्र से जोड़ते हैं।
एक तरफ जंगल में बसे लंगोटीधारी आदिवासियों का अपना संसार है तो दूसरी ओर आधुनिक संसार से कदम से कदम मिलाकर चलने हेतु संकल्पित विकास की ओर अग्रसर सेवाभावी लोग हैं। होटल इस्ट पार्क छत्तीसगढ़ के उन तीन-चार चुनिंदा पाँच सितारा होटलों में से एक है जिसकी अपनी प्रतिष्ठा है। छत्तीसगढ़ के यश को बढ़ाने और इसे हर तरह से प्रतिस्पर्धा पूर्ण संसार में अग्रगामी कहलाने योग्य बनाने में जो लोग जुटे हैं। उनमें राहुल वाजपेयी और बिलासपुर के श्री अटल श्रीवास्तव जैसे लोग भी हैं। अटल श्रीवास्तव ने आदिवासी क्षेत्र में भी अपना होटल खोलकर नई ऊँचाइयों को प्राप्त किया है। वे छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त कान्हा किसली क्षेत्र में भी अपना व्यवसाय संचालित करते हैं।
श्री राहुल वाजपेयी तथा श्री अटल श्रीवास्तव समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं।
बारनवापाराजगदलपुरकवर्धा अचानकमारअंबिकापुर में छत्तीसगढ़ के वन-प्रांतर अपनी विशेषता के कारण पर्यटकों को आंतरिक समृद्धि देने हेतु आमंत्रित करते हैं। शायर ने ठीक ही कहा है...
फुर्सत मिले तो आओ कभी मेरे गाँव में,
महसूस होगा धूप से आए हो छाँव में।


सम्पर्क:  एल.आई.जी.-18, आमदीनगरहुडकोभिलाई-490009, छत्तीसगढ़मो. 9827993494

27 सितम्बर: जन्म दिवस

अदम्य साहस, शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति 

 शहीद भगत सिंह
-       राजेश कश्यप
आज हम जिस आजादी के साथ सुख-चैन की जिन्दगी गुजार रहे हैं, वह असंख्य जाने-अनजाने देशभक्त शूरवीर क्रांतिकारियों के असीम त्याग, बलिदान एवं शहादतों की नींव पर खड़ी है। ऐसे ही अमर क्रांतिकारियों में शहीद भगत सिंह शामिल थे, जिनके नाम लेने मात्र से ही सीना गर्व एवं गौरव से चौड़ा हो जाता है। शहीदे-आज़म भगत सिंह की जीवनी जन-जन में अदम्य देशभक्ति, शौर्य और स्वाभिमान का जबरदस्त संचार करती है। सरदार भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर के बंगा गाँव (पाकिस्तान) में एक परम देशभक्त परिवार में हुआ। सरदार किशन सिंह के घर श्रीमती विद्यावती की कोख से जन्में इस बच्चे को दादा अर्जुन सिंह व दादी जयकौर ने 'भागों वाला’ कहकर उसका नाम 'भगत’  रख दिया। बालक भगत को भाग्य वाला बच्चा इसीलिए माना गया था, क्योंकि उसके जन्म लेने के कुछ समय पश्चात् ही, स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण लाहौर जेल में बंद उनके पिता सरदार किशन सिंह को रिहा कर दिया गया और जन्म के तीसरे दिन उसके दोनों चाचाओं को जमानत पर छोड़ दिया गया।
बालक भगत सिंह में देशभक्त परिवार के संस्कार कूट-कूटकर भरे हुए थे। 'होरहान बिरवान के होत चिकने पात’ कहावत को चरितार्थ करते हुए बालक भगत ने तीन वर्ष की अल्पायु में ही अपने पिता के दोस्त नन्द किशोर मेहता को हतप्रभ कर दिया था। उसके पिता भगत सिंह को साथ लेकर अपने मित्र मेहता के खेत में गए हुए थे, तो दोनों मित्र बातों में मशगूल हो गए। लेकिन भगत सिंह ने खेत में छोटी-छोटी डोलियों पर लकडिय़ों के छोटे छोटे तिनके गाड़ दिए। यह देखकर मेहता हतप्रभ रह गए। उन्होंने पूछा कि यह क्या बो दिया है, भगत? भगत ने तपाक से उत्तर दिया कि 'मैंने बन्दूकें बोई हैं। इनसे अपने देश को आजाद कराऊँगा।’ भारत माँ को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने वाले इस लाल की ऐसी ही देशभक्ति से भरे भावों वालीं असंख्य मिसालें हैं।
पाँच वर्षीय बालक भगत का नाम पैतृक बंगा गाँव के जिला बोर्ड प्राइमरी स्कूल में लिखाया गया। उनकी मित्र मण्डली काफी बड़ी थी। बंद कमरों में बैठकर पढ़ना भगत सिंह को बोर कर देता था। इसीलिए वो अक्सर कक्षा से भागकर खुले मैदान में आ बैठते थे। बालक भगत सिंह कुशाग्र बुद्धि, साहसी, निडर एवं स्पष्टवक्ता थे। जब वे ग्यारह वर्ष के थे तो उनके साथ पढ़ रहे उनके बड़े भाई जगत सिंह को असामयिक निधन हो गया। इसके बाद सरदार किशन सिंह सपरिवार लाहौर के पास नवाकोट चले आए। प्राइमरी पास कर चुके बालक भगत सिंह को सिख परम्परा के अनुसार खालसा-स्कूल की बजाय राष्ट्रीय विचारधारा से ओतप्रोत लाहौर के डी.ए.वी. स्कूल में दाखिला दिलवाया गया। इसी दौरान 13 अप्रैल, 1919 को वैसाखी वाले दिन 'रौलट एक्ट’ के विरोध में देशवासियों की जलियाँवाला बाग में भारी सभा हुई। जनरल डायर के क्रूर व दमनकारी आदेशों के चलते निहत्थे लोगों पर अंग्रेजी सैनिकों ने ताड़बतोड़ गोलियों की बारिश कर दी। इस अत्याचार ने देशभर में क्रांति की आग को और भड़का दिया।
भगत सिंह ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग की रक्त-रंजित मिट्टी की कसम खाई कि वह इन निहत्थे लोगों की हत्या का बदला अवश्य लेकर रहेगा। सन् 1920 में गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन चलाया और देशवासियों से आह्वान किया कि विद्यार्थी सरकारी स्कूलों को छोड़ दें व सरकारी कर्मचारी अपने पदों से इस्तीफा दे दें। उस समय नौंवी कक्षा में पढ़ रहे भगत सिंह ने सन् 1921 में गाँधी जी के आह्वान पर डी.ए.वी. स्कूल को छोड़ लाला लाजपतराय द्वारा लाहौर में स्थापित नैशनल कॉलेज में प्रवेश ले लिया। इस कॉलिज में आकर भगत सिंह यशपाल, भगवती चरण, सुखदेव, रामकिशन, तीर्थराम, झण्डा सिंह जैसे क्रांतिकारी साथियों के सम्पर्क में आए। कॉलेज में लाला लाजपत राय व परमानंद जैसे देशभक्तों के व्याख्यानों ने देशभक्ति की लहर भर दी थी। कॉलेज के प्रो.विद्यालंकार जी भगत सिंह से विशेष स्नेह रखते थे। वस्तुत: प्रो.जयचन्द विद्यालंकार ही भगत सिंह के राजनीतिक गुरु थे। भगत सिंह उन्हीं के दिशा-निर्देशन में देशभक्ति के कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
इसी समय घरवालों ने भगत सिंह पर शादी का दबाव डाला तो उन्होंने विवाह से साफ इनकार कर दिया। जब हद से ज्यादा दबाव पड़ा तो देशभक्ति में रमे भगत सिंह देश की आजादी के अपने मिशन को पूरा करने के उद्देश्य से 1924 में बी.ए. की पढ़ाई अधूरी छोड़कर कॉलेज से भाग गए। फिर वे केवल और केवल देशभक्तों के साथ मिलकर स्वतंत्रता के संघर्ष में जुट गए। कॉलेज से भागने के बाद भगत सिंह सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, बटुकेश्वर दत्त, अजय घोष, विजय कुमार सिन्हा जैसे प्रसिद्ध क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। इसी के साथ भगत सिंह उत्तर प्रदेश व पंजाब के क्रांतिकारी युवकों को संगठित करने में लग गए। इसी दौरान भगत सिंह ने 'प्रताप’ समाचार पत्र में बतौर संवाददाता अपनी भूमिका खूब निभाई। इन्हीं गतिविधियों के चलते भगत सिंह की मुलाकात भारतीय इतिहास के महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद से हुई।
कॉलेज से भागे भगत सिंह के परिवार वालों ने काफी खोजबीन करके भगत सिंह से लिखित वायदा किया कि वह घर वापिस आ जाए, उस पर शादी करने के लिए कोई दबाव नहीं डाला जाएगा। परिवार वालों के इस लिखित वायदे व दादी जी के सख्त बीमार होने के समाचार ने भगत सिंह को वापिस घर लौटने के लिए बाध्य कर दिया। घर आकर वे पंजाब भर में घूम-घूमकर समाज की समस्याओं से अवगत होने लगे। सन् 1925 के अकाली आन्दोलन के सूत्रपात ने भगत सिंह को फिर सक्रिय कर दिया। अंग्रेज सरकार ने झूठा केस तैयार करके भगत सिंह के नाम गिरफ्तारी वारन्ट जारी कर दिया गया। भगत सिंह पंजाब से लाहौर पहुँच गए और सक्रिय होकर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेकर अंग्रेज सरकार की नाक में दम करने लगे।
1 अगस्त, 1925 को 'काकोरी-काण्ड’ हुआ। 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’  के सदस्यों द्वारा पार्टी के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य से हरदोई से लखनऊ जा रही 8 डाऊन रेलगाड़ी के खजाने को लूट लिया गया। इस काण्ड में कुछ क्रांतिकारी पकड़े गए। पकड़े गए क्रांतिकारियों को छुड़ाने के लिए भगत सिंह ने भरसक प्रयत्न किए, लेकिन उन्हें सफलता हासिल नहीं हो सकी। मार्च, 1926 में उन्होंने लाहौर में समान क्रांतिकारी विचारधारा वाले युवकों को संगठित करके 'नौजवान सभा’ का गठन किया और इसके अध्यक्ष का उत्तरदायित्व रामकृष्ण को सौंप दिया। रामकृष्ण औपचारिक अध्यक्ष थे, जबकि मूलरूप से संचालन भगत सिंह स्वयं ही करते थे। फिर इसकी शाखाएँ देश के अन्य हिस्सों में भी खोली गईं।
जून, 1928 में इसी तर्ज पर भगत सिंह ने लाहौर में ही 'विद्यार्थी यूनियन’ बनाई और क्रांतिकारी नौजवानों को इसका सदस्य बनाया। अंग्रेजी सरकार भगत सिंह के कारनामों से बौखलाई हुई थी। वह उन्हें गिरफ्तारी करने का बहाना ढूँढ़ रही थी। उसे यह बहाना 1927 के दशहरे वाले दिन मिल भी गया। जब भगत सिंह तितली बाग से लौट रहे थे तो किसी ने दशहरे पर लगे मेले में बम फेंक दिया। भगत सिंह पर झूठा इल्जाम लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वस्तुत: पुलिस के इशारों पर वह बम चन्नणदीन नामक एक अंग्रेज पिठ्ठू ने फेंका था। भगत सिंह को गिरफ्तार करके बिना मुकदमा चलाए उन्हें लाहौर जेल में रखा गया और उसके बाद उन्हें बोस्टल जेल भेज दिया गया। पुलिस की लाख साजिशों के बावजूद भगत सिंह जमानत पर छूट गए। जमानत मिलने के बाद भी भगत सिंह सक्रिय क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते रहे।
8 अगस्त, 1928 को देशभर के क्रांतिकारियों की बैठक फिरोजशाह कोटला में बुलाई गई। भगत सिंह के परामर्श पर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’  का नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’  रख दिया गया। इस बैठक में क्रांतिकारियों ने कई अहम प्रस्ताव पारित किए। एसोसिएशन का मुख्य कार्यालय आगरा से झाँसी कर दिया गया। भगत सिंह ने कई अवसरों पर बड़ी चालाकी से वेश बदल कर अंग्रेज सरकार को चकमा दिया। 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर पहुँचे साइमन कमीशन का विरोध लाला लाजपतराय के नेतृत्व में भगत सिंह सहित समस्त क्रांतिकारियों व देशभक्त जनता ने डटकर किया। पुलिस की दमनात्मक कार्यवाही में लाला जी को गंभीर चोटें आईं और लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। 17 नवम्बर, 1928 को लाला जी स्वर्ग सिधार गए। क्रांतिकारियों का खून खौल उठा। इस कार्यवाही के सूत्रधार स्कॉट को मारने के लिए क्रांतिकारियों ने 17 दिसम्बर, 1928 को व्यूह रचा, लेकिन स्कॉट की जगह साण्डर्स धोखे में मार दिया गया। इस काम को भगत सिंह ने जयगोपाल, राजगुरु आदि के साथ मिलकर अंजाम दिया था। इसके बाद तो पुलिस भगत सिंह के खून की प्यासी हो गई।
आगे चलकर इन्हीं देशभक्त व क्रांतिकारी भगत सिंह ने कुछ काले बिलों के विरोध में असेम्बली में बम फेंकने जैसी ऐतिहासिक योजना की रूपरेखा तैयार की। क्रांतिकारियों से लंबे विचार-विमर्श के बाद भगत सिंह ने स्वयं बम फेंकने की योजना बनाई, जिसमें बटुकेश्वर दत्त ने उनका सहयोग किया। 'बहरों को अपनी आवाज सुनाने के लिए  भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को निश्चित समय पर पूर्व तय योजनानुसार असैम्बली के खाली प्रांगण में हल्के बम फेंके, समाजवादी नारे लगाए, अंग्रेजी सरकार के पतन के नारों को बुलन्द किया और पहले से तैयार छपे पर्चे भी फेंके। योजनानुसार दोनों देशभक्तों ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया ताकि वे खुलकर अंग्रेज सरकार को न्यायालयों के जरिए अपनी बात समझा सकें।
7 मार्च, 1929 को मुकद्मे की सुनवाई अतिरिक्त मजिस्ट्रेट मिस्टर पुल की अदालत में शुरू हुई। दोनों वीर देशभक्तों ने भरी अदालत में हर बार 'इंकलाब जिन्दाबाद’  के नारे लगाते हुए अपने पक्ष को रखा। अदालत ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अन्तर्गत मामला बनाकर सेशन कोर्ट को सौंप दिया। 4 जून, 1929 को सेशन कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई। दोनो ंपर गंभीर आरोप लगाए गए। क्रांतिकारी भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने हर आरोप का सशक्त खण्डन किया। अंत में 12 जून, 1929 को अदालत ने अपना 41 पृष्ठीय फैसला सुनाया, जिसमें दोनों क्रांतिकारियों को धारा 307 व विस्फोटक पदार्थ की धारा 3 के अन्तर्गत उम्रकैद की सजा दी। इसके तुरंत बाद भगत सिंह को पंजाब की मियाँवाली जेल में और बटुकेश्वर दत्त को लाहौर सेन्ट्रल जेल में भेज दिया गया। इन क्रांतिकारियों ने अपने विचारों को और ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए हाईकोर्ट में सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की। अंतत: 13 जनवरी, 1930 को हाईकोर्ट ने भी सुनियोजित अंग्रेजी षडयंत्र के तहत उनकी अपील खारिज कर दी। इसी बीच जेल में भगत सिंह ने भूख हड़ताल शुरू कर दी।
इसी दौरान 'साण्डर्स-हत्या’  केस की सुनवाई शुरू की गई। एक विशेष न्यायालय का गठन किया गया। अपने मनमाने फैसले देकर अदालत ने भगत सिंह के साथ राजगुरु व सुखदेव को लाहौर षडयंत्र केस में दोषी ठहराकर सजाए मौत का हुक्म सुना दिया। पं. मदन मोहन मालवीय ने फैसले के विरुद्ध 14 फरवरी, 1931 को पुन: हाईकोर्ट में अपील की। लेकिन अपील खारिज कर दी गई। जेल में भगत सिंह से उनके परिवार वालों से मिलने भी नहीं दिया गया। भगत सिंह का अपने परिवार के साथ अंतिम मिलन 3 मार्च, 1931 को हो पाया था। इसके बीस दिन बाद 23 मार्च, 1931 को जालिम अंग्रेजी सरकार ने इन क्रांतिकारियों को निर्धारित समय से पूर्व ही फाँसी के फन्दे पर लटका दिया और देश में कहीं क्रांति न भड़क जाए, इसी भय के चलते उन शहीद देशभक्तों का दाह संस्कार भी फिरोजपुर में चुपके-चुपके कर दिया। इस तरह सरदार भगत सिंह 'शहीदे आज़म’  के रूप में भारतीय इतिहास में सदा सदा के लिए अमर हो गए। कल भी सरदार भगत सिंह सबके आदर्श थे, आज भी हैं और आने वाले कल में भी रहेंगे, क्योंकि उन जैसा क्रांतिवीर न कभी पैदा हुआ है और न कभी होगा। उनके सिद्धान्तों और आदर्शों पर चलकर ही कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकता है।

लेखक के बारे में: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएँ प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएँ, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएँ आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।

 सम्पर्क:   म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर, गाँव टिटौली, जिला- रोहतक हरियाणा-124005, मो. 09416629889,  Email : rajeshtitoli@gmail.com

बाल- संसद

प्राथमिक शिक्षा से लोकतंत्र का प्रशिक्षण
-भारत डोगरा
राजस्थान में प्रायमरी कक्षा तक के छात्रों को लोकतंत्र में प्रशिक्षित करने का एक अनूठा प्रयोग 'बाल संसदके नाम से किया गया है। 'बाल संसदका चुनाव अजमेर और जयपुर जि़लों में चल रही लगभग 90 रात्रि शालाओं के छात्रों द्वारा किया जाता है। इन रात्रि शालाओं में प्राय: गाँवों के सबसे निर्धन व कमज़ोर आर्थिक स्थिति के परिवारों के वे छात्र पढऩे आते हैं, जो विभिन्न कारणों से दिन के स्कूल में नहीं जा पाते हैं। ये छात्र प्राय: उन परिवारों से हैं जिनके माता-पिता दोनों मज़दूरी करने जाते हैं। इस स्थिति में ये बच्चे ही पशु चराने जाते हैं या छोटे भाई-बहनों की देखरेख करते हैं। शाम के समय वे रात्रि शाला में आ जाते हैं जहाँ रात के 9-10 बजे तक पढ़ते हैं, गीत गाते हैं, खेलते हैं।
रात्रि शालाओं में लोकतंत्र के प्रशिक्षण का अनूठा प्रयोग बाल संसद के रूप में किया गया है। लगभग 60 से 70 बच्चे एक सांसद को चुनते हैं। विभिन्न उम्मीदवारों के लिए वोट डालने, उम्मीदवार के प्रतिनिधि की उपस्थिति में वोट गिनने आदि की पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है। निर्वाचित सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री का चुनाव होता है और फिर मंत्रिमंडल का गठन होता है। जहाँ एक ओर वित्तमंत्री, गृहमंत्री, पर्यावरण मंत्री आदि चुने जाते हैं वहीं कुछ मंत्री स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार होते हैं, जैसे पुस्तकालय मंत्री, बाल मेला मंत्री आदि।
एक बाल संसद का गठन ढाई वर्ष के लिए होता है। अभी तक सात बाल संसदों का गठन यहाँ हो चुका है। इस वर्ष यहाँ की सातवी बाल संसद अपना कार्यकाल पूरा कर रही है।
प्रधानमंत्री अन्य मंत्रियों की सहायता से विभिन्न रात्रि शालाओं का दौरा करती हैं व जब जहाँ जो कमी पाई जाती है, उसे पूरा करने के लिए सहयोगी संस्था बेयरफुट कॉलेज के सम्बंधित विभाग को निर्देश दिए जाते हैं।
उदाहरण के लिए यदि सौर ऊर्जा से होने वाली प्रकाश व्यवस्था में कोई कमी है तो बेयरफुट कॉलेज के सोलर विभाग को ज़रूरी निर्देश दिया जाता है कि इसे ठीक किया जाए व पेयजल की उपलब्धि में कमी हो तो जल विभाग को कहा जाता है। इन विभिन्न विभागों के सचिवों को बाल संसद की बैठक में आना होता है। पर्यावरण मंत्री को यह फिक्र करनी होती है कि आसपास पेड़-पौधे लगाने व सफाई रखने का कार्य ठीक हो पा रहा है या नहीं, जबकि स्वास्थ्य मंत्री की चिंता का एक मुख्य विषय यह होता है कि सभी बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जाँच का जो नियम है उसका पालन हो रहा या नहीं।
कुछ रात्रि शालाओं में टिन शेड की सही व्यवस्था समय पर न हो पाने पर बाल संसद के नवीनतम अधिवेशन में चिंता प्रकट की गई है व प्रधानमंत्री ने इस बारे में कड़े निर्देश दिए हैं। इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री नीरजा नाम की छात्रा व शिक्षा मंत्री हेमराज ने संस्था के विभिन्न उपकेंद्रों के प्रतिनिधियों से विस्तृत जानकारी माँगी कि शिक्षा से वंचित कुछ बच्चे अभी तक रात्रि शालाओं में क्यों प्रवेश नहीं पा सके हैं। दूर-दूर से आए विभिन्न प्रतिनिधियों ने अपने सर्वेक्षणों के आधार पर जानकारी दी कि किस समस्या के कारण ये बच्चे अभी रात्रि शाला में नहीं आ रहे हैं। एक मुख्य वजह यह सामने आई थी कि कुछ बच्चों के माता-पिता मज़दूरी के लिए अन्यत्र पलायन कर गए हैं।
बाल संसद की किसी बैठक में कौन से मुद्दे चर्चित होते हैं इसका विस्तृत एजेंडा तैयार करके वितरित किया जाता है। इससे यह जानकारी में भी रहता है कि जो कार्रवाइयाँ पहले बताई गई थी या निर्देश दिए गए थे, उनका पालन किस हद तक हुआ है। उदाहरण के लिए नवीनतम बैठक में जो कागज़ात वितरित हुए हैं, उनमें बताया गया है कि किस कार्यशाला में सुधार को कहा गया है, किसका स्थान परिवर्तन करना पड़ा व किस शाला में कोई समस्या अभी भी बनी हुई है।
ये छात्र अभी बहुत कम उम्र के हैं अत: बेशक अभी यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया संस्था के शिक्षा विभाग की देखरेख में उसकी सहायता से ही चलती है पर बार-बार छात्रों को खुलकर बोलने व आगे आने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है। इस उदाहरण से सीखकर हम अपने विद्यालयों के संचालन में छात्रों की भागीदारी को व्यापक स्तर पर बढ़ा सकते हैं; जिससे उनकी रचनात्मकता को तरह-तरह से खिलने का मौका मिलेगा व साथ ही लोकतंत्र का प्रशिक्षण भी स्कूलों से बहुत रोचक ढंग से मिलेगा। (स्रोत फीचर्स)  

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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