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Apr 16, 2019

प्रेरक

आईने में हम
रचना गौड़ भारती
शब्दों का इस्तेमाल जब आवाज़ के साथ होता है तो उसे बोलना कहते हैं। बात दोनों प्रकार की होती है एक प्रभाव डालने वाली और दूसरी बिगाड़ने वाली। संचार की मुख्य क्रिया बोलना है। विचार विनिमय जीवन में अति आवश्यक है, दूसरों के विचार जानने और अपने विचार उन तक पहुँचाने के लिए। ये कोई नई बात नहीं है। यह तो सब जानते हैं, यहाँ हम बात करेगें मूक प्रतिक्रिया, मौन या चुप रहने पर। कहते हैं शब्द जितनी बात नहीं समझा सकते उतनी खामोशी बयां कर देती है- खामोशी बोलती है।
            बड़े बुजुर्गों को अक्सर कहते सुना है कि जब कोई झगड़ रहा हो तो उस समय चुप हो जाओ, बात आगे नहीं बढ़ेगी। मगर लोग वाद-विवाद, बहस आदि में अधिक विश्वास करते हैं। दूसरों को दबाकर जीतना एक शगल बन गया है। यहाँ सवाल हार-जीत का नहीं, बात की प्रभावोत्पादकता का है। किसी के साथ संवाद में भिड़ जाना समझदारी नहीं होती। बात को समझने या समझाने के लिए कुछ देर मौन या चुप्पी आवश्यक होती है। बात में इतना प्रभाव होना चाहिए कि आप दूसरे को समझा सकें, नहीं तो वहाँ चुप हो जाना बेहतर होता है। चुप हो जाने में यहाँ मतलब यह बिल्कुल नहीं है आप हार गए या आपकी बात में दम नहीं है। इसमें कुछ बिन्दु काम करते हैं जैसे-
1. आपने हार स्वीकार कर ली इसलिए चुप हैं-
जब कोई भी दो व्यक्ति आपस में उलझ जाते हैं और दोनों अपनी-अपनी बात पर अडिग रहते हैं तो स्थिति झगड़े का रूप ले लेती है। ऐसी परिस्थिति में एक जने को चुप हो जाना ठीक रहता है। बोलने वाला कुछ देर में अपनी भड़ास निकालकर या तो खामोश हो जाएगा या आप उससे कुछ समय के लिए दूरी कायम कर लें। स्थिति को सही अंजाम देना हमारे अपने हाथ में होता है। हाँ! यह सही है सामने आने वाला कभी-कभी यह सोचकर खुश हो जाता है कि ये चुप है मतलब इसने हार मान ली या मैंनें इसे हरा दिया। छोटी सी बात को तूल देकर लम्बा खींचना कोई समझदारी नहीं होती। चुप रहने वाला उस समय एक समझदार, शालीन व सभ्यता के दायरे में होता हैं। बोलकर चुप कराने वाला व्यक्ति अपनी वाचालता, घमण्ड और बड़बोलेपन के मद में खुश हो जाता है। दोनों व्यक्ति शांत होकर खुश हैं, मगर अपनी-अपनी सोच में। जैसे कोई दान लेकर खुश होता है तो कोई दान देकर। इंसानियत का तकाज़ा है कि जहाँ तक संभव हो क्लेश को दूर रखना चाहिए। ये एक अच्छे इंसान के गुण होते हैं। बात को आई गई करना भी एक कला है। दुनिया एक रंगमंच और हर इंसान एक कलाकार है। कोई भी कला सुख शांति व समृ़द्धि प्रदान करती है। यह बात व्यक्तिगत रूप में, सामूहिक रूप में व सामाजिक रूप में स्पष्ट नज़र आती है। हमारा जन्म गीली मिट्टी के लौंदें के समान होता है जिसे हमारे संस्कार, हमारा परिवेश व हमारी शिक्षा तराश-तराश कर एक अच्छा व्यक्ति, अच्छा नागरिक बनाते हैं। यहीं से उचित व अनुचित की कीलें हमारे मन व मस्तिष्क में ठुकनी आरम्भ होती हैं। जिसके जीवन में जितनी कड़वाहट होती है, उसी अनुपात में कीलें बढ़ती जाती हैं। कीलें यानिकुण्ठाएँ। जो धीरे-धीरे आपके व्यवहार पर हावी होती जाती हैं। जितना कुण्ठित व्यक्ति होगा वह दूसरों को उतना ही चुभेगा। आपका व्यवहार व आचरण एक कंटीले वृक्ष में परिवर्तित हो जाएगा। आप तब इंसान न होकर एक कैक्टस बन जाएँगें। आपको पता है वनस्पति में कैक्टस को घर में रखना भी अशुभ माना जाता है। यहाँ इंसान को कैक्टस इसलिए कहा है क्योंकि हमारी बातें, हमारी उपस्थिति और हमारा परिवेश अशांतिकारक, दूसरों को व्यथित करने वाला और असंतोषजनक है तो हम एक कैक्टस ही हैं।
            देखा आपने कभी-कभी की चुप्पी कितनी असरकारक होती है। जब मॉफी माँगने से कोई छोटा नहीं होता तो चुप रहने से छोटा या गलत कैसे हो सकता है। चुप रहकर वो प्रयासरत होता है बात को संभालने में, सामंजस्य बनाने और शांति स्थापित करने में।
2. आपकी बात गलत थी इसलिए चुप हैं-
वाक्युद्ध या द्वन्द में चुप हो जाना श्रेष्ठ है। सामने वाला चाहे यह सोच ले कि शायद आपको समझ आ गया है कि आपकी बात गलत थी, इसलिए आप चुप हो गए। वाद-विवाद या कोई बात आखिर क्या है-हमारे विचार। सबको अपना पक्ष और अपने विचार सदा सही लगते हैं। मगर क्या ऐसा होता है? यदि दोनों पक्ष सही होगें तो विवाद किस बात का? इसे हम ऐसे देख सकते हैं कि पक्ष और विपक्ष दोनों के विचार आपस में नहीं समझे जा रहे। दोनों को अपने विचार सही लग रहे हैं और दूसरे के गलत। कैसी भी परिस्थिति हो झगड़ा छोटा हो या बड़ा, एक बार स्वयं को दूसरे की जगह रखकर उसका दृष्टिकोण समझने की चेष्टा करनी चाहिए शायद कुछ मामला समझ आ जाए। असामान्य स्थिति में चुप रहना आपका गुण होगा, आपकी समझदारी व इंसानियत का तकाज़ा भी।  सही और गलत जब हम अपने अहम् को दूर रखकर दूसरे के स्थान व दूसरे की नज़र से देखते हैं तो स्वतः ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है।
3. आप अपनी बात समझाने में सक्षम नहीं इसलिए चुप हैं -
चुप रहकर स्थिति को नियंत्रण में बनाना, बोल-बोलकर उलझने से कहीं बेहतर होता है। कभी-कभी चुप होने का सामने वाला गलत अर्थ भी निकाल लेता है। जैसे आप अपनी बात समझा नहीं पा रहे इसलिए चुप हो गए। आपके पास चुप होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। शिक्षित व समझदार इंसान के लिए इशारा ही काफी होता है। चुप्पी में एक अलग ही आनन्द है, विश्वास है और शांति है। चुप रहकर बात नहीं बढ़ाना अच्छा है वरना जो सामने आएगा वो शायद बहुत बुरा हो। जो आपके रिश्तो और सम्बंधों को क्षति पहुँचाने वाला हो। आपने ऐसा होने नहीं दिया अतः आपको आनन्द की अनूठी अनुभूति है। विश्वास इस बात का कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती अतः  कभी न कभी सच जरूर सामने आएगा जिससे सामने वालों की आँखों से गलतफहमी का पर्दा स्वतः ही उठ जाएगा। जब सारी बात ही साफ हो जाएगी तो शांति कहाँ जाएगी वो आपके पास ही पनाह लेगी। बात समझने या समझाने के लिए दिमाग शांत होना चाहिए। क्रोध में हम न समझ पाते हैं ना समझा पाते हैं। यहाँ इसलिए चुप्पी का विशेष अर्थ एवं महत्व सिद्ध होता है।
4. मानसिक स्तर में अन्तर
            जब कोई एक व्यक्ति लगातार बोले और दूसरा चुप हो जाए तो मामला स्वतः कुछ समय में ठण्डा पड़ जाता है। सामने वाला या बोलने वाला तीव्रता से अपनी बात के साथ अनर्गल बातों को जोड़कर आपको मानसिक पीड़ा पहुँचाने का प्रयास करे तो समझ लेना चाहिए उसका मानसिक स्तर गिर रहा है। इस वक्त किसी भी प्रकार वो आपकी बात नहीं समझेगा। दो व्यक्तियों की मस्तिष्क तरंगों की समानता या असमानता उनका स्तर कहलाता है। लेवल अलग-अलग होने पर विचारधाराएँ भिन्न बनतीं हैं। विचारों का टकराना ही झगड़े का कारण है। ऐसे में चुप रहना समझौते की परिधि बन जाता है। शिक्षित व्यक्ति का व्यवहार उसके लेवल को तय करता है। यहाँ शिक्षित का मतलब डिग्री प्राप्त कर लेने से न होकर बुद्धि के विकास, मानसिक विकास से है।
5. शिक्षा का अभाव, ज्ञान चक्षु का बंद होना
            वाद-विवाद में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है। किसी भी विषय क्षेत्र में इंसान अपने ज्ञान के अनुसार बहस करता है। कभी-कभी गलत बात पर अड़ जाना भी अज्ञानता का ही प्रतिबिम्ब होता है। जिसे जितना मालूम होगा उतना ही बोलेगा। विषय की सम्पूर्ण जानकारी के बिना अपनी बात लेकर विवाद करना अनुचित है। यदि सामने वाले से हमारी बात अलग है, तो शांत मन मस्तिष्क से एक बार उसकी पूरी जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए। कभी-कभी कुछ बातें नियमोंके अंर्तगत होते हुए भी गलत हो जाती हैं जिन्हें हम सच समझते रहते हैं। समय परिवर्तन के साथ नियम परिवर्तन का ध्यान भी रखना चाहिए। जिस नियम के बल पर हम अपनी बात पर अडिग हो रहें हैं उसके नियम भी बदल सकते हैं। जिनकी हमें जानकारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में हम सर्वथा गलत हो जाते हैं। दूसरों की बात को किसी पूर्व धारणा के आधार से नहीं जोड़कर बुद्धि से आँकना जरूरी होता है। ऐसी परिस्थिति में चुप हो जाना बेहतर है, ये समझ कर कि सामने वाला अज्ञानता में है या उसके ज्ञान चक्षु बन्द हैं। सत्य को देखने के लिए ज्ञान चक्षु का खुला रहना अति आवश्यक है। यहाँ पूर्वाभास काम नहीं करता। आपकी बात यदि सही है तो उसे कोई समझे या ना समझे क्या फ़र्क पड़ता है। सत्यमेवजयते। जीत हमेशा सत्य की होती है। सत्य को बाहर आने में देर जरूर लगती है मगर सत्य बाहर आकर रहता है। उस समय सामने वाला यदि अच्छा इंसान है तो अपनी गलती मान लेगा अन्यथा गरूर व अहम् के मद में स्वीकार नहीं करेगा। मंुह से चाहे ना स्वीकारे लेकिन उसकी अर्न्तआत्मा जरूर जान लेगी कि वह गलत है। अतः धैर्य का आश्रय लेकर चुप रहना वक्त की मांग बन जाता है।
6. इंसानियत के कद का बौना होना
            गुण या अवगुण इंसान के होते हैं। जब किसी में इंसानियत ही नहीं होगी तो उसके गुणों और अवगुणों को हम किस कसौटी पर उतारेंगें। यदि आप उत्तरोत्तर अच्छे गुणों के विकास में लगे हैं तो आपके अंदर के इंसान का कद स्वतः बढ़ेगा। इसके विपरीत गुणों का हृास आपके इंसानी कद को बौना कर देगा। कितने लोग ऐसे हैं जो स्वार्थ को परे रख इस बात की चिन्ता करते हैं। ये जुड़ा होता है आपकी नैतिकता, आत्मा के उत्थान या पतन से। एक अच्छी आत्मा अच्छे इंसान में होगी। आजकल हम बाह्य उन्नति में दौड़ लगा रहे हैं। स्वार्थ के आगे घुटने टेक रहे हैं। हमें आवश्यकता है नैतिक उत्थान की। अन्दर से महान बनने की। जब हम किसी ऐसे धावक व्यक्ति से टकराएँ तो यहाँ चुप हो जाना समय की माँग होगी। हर तालाब पानी के ठहरने पर साफ़ नज़र आता है (जैसे हम अच्छी स्थिति में खुश व शांत) उसमें पत्थर गिरने से लहरें, नीचे बैठी गंदगी को हिलाकर पानी को गंदला कर देती हैं। ये तो खुला तालाब है, मगर हमारा मन बहुत गहरा है तथा इसको अंदर से साफ रखना हमारे हाथ में है। साफ मन का सरोवर कभी किसी के भड़काने, उकसाने से गंदा नहीं हो सकता। गन्दे पानी में साफ पानी को कितना भी मिलाएं पानी गन्दा ही होगा। जबकि साफ पानी में केवल एक मग्गा गंदा पानी उसे गंदा कर देता है। हमें अपनी चुप्पी से इस मिलावट को बंद करना होगा। यहाँ चुप होने वाला दूसरे के साथ नहीं स्वयं के साथ अच्छा करेगा। परिस्थिति कुछ भी हो कभी इंसानियत का कद बौना नहीं होना चाहिए।
7. लिंगानुगत भेद का फायदा उठाना
            अक्सर स्त्री व पुरूष के द्वन्द में, पुरूष को कहते सुना है कि तुम चुप हो जाओ। पुरूष पिता, पति, पुत्र या अफसर कोई भी हो सकता है। पुरूष अपने अहम् के आगे न तो नारी की सुनना चाहता है, न ही उसे बोलने देता है। क्या उसे डर होता है कि वह ज्ञान व समझ में उससे हार गया तो? स्त्री भी एक इंसान है, शिक्षित व समझदार है, जब नौकरी करते हुए उसके विचार वह बाह्य क्षेत्र में बेझिझक देती है तो वही विचार घर में गलत कैसे हो सकते हैं? यहाँ भी अन्तर होता है दृष्टिकोण का, हम विषय से भटक जाते हैं और रह जाती है पावर। वह पावर जो घर के मुखिया की है, एक पुरुष की है, उसके अहं की है। ऐसी स्थिति में एकमात्र उपाय चुप रहना ही क्लेश से दूर ले जाता है। नारी एक नदी है जो बहती है। उसके जल में अच्छे बुरे सब तरह के विचार आते हैं। पुरूष शुद्ध जल का फिल्टर है मगर उसकी फिल्टर वाली कैण्डल जल्दी चोक हो जाती है। यह स्वभावगत अन्तर है। बात को उसकी गरिमा से मानना चाहिए न कि आपस के ताकत प्रदर्शन से। जरूरी नहीं होता कि पुरूष सर्वदा सही और नारी गलत हो। कभी-कभी स्त्री भी सही हो सकती है, ये वहाँ होता है जहाँ उसको सुना जाता हो, बात का मूल्यांकन होता हो। जहाँ ऐसा नहीं होता वहाँ चुप रहना एक अच्छा अस्त्र होता है।सही बात की सत्यता कभी न कभी, कहीं न कहीं से सत्यापित हो ही जाती है।
8. संस्कार व रिश्तों का दबाव बनाना
            कभी-कभी विचारों की टकराहट उम्र व रिश्तों में बड़ों से हो जाती है। उस वक्त उम्र व रिश्तों का लिहाज़ कर हमें चुप हो जाना पड़ता है। यहाँ भी बात की सत्यता या उसकि मूल्यांकन को परे रखना गलत होता है। जब हम बड़ों से विचार विनिमय करते हैं और उनके विचार हमसे भिन्न होते हैं, तब भी संस्कारों के दबाव के कारण चुप रहना हमारी मज़बूरी बन जाती है। सभी लोग यदि बात की सत्यता के संदर्भ से बात करें तो शायद कहीं झगड़े ही नहीं होंगें। मैंने ऐसा कह दिया, तुम मानो। जैसे इनके कहे शब्द पत्थर की लकीर हो। एक ही शब्द जब अलग-अलग परिस्थिति में इस्तेमाल होता हो तो उसका अर्थ भी समयानुसार बदल जाता है। अच्छे व सही विचार जरूरी नहीं कि सिर्फ बड़ों के पास हों, उनपर बड़ों का एकाधिपत्य हो ऐसा बिल्कुल नहीं होता। छोटों के विचार भी सराहनीय हो सकते हैं, उनका सम्मान करना चाहिए। लेकिन जहाँ बात की महत्ता से ऊपर बड़प्पन का राज़ हो वहाँ चुप रह जाना ही श्रेष्ठ है। जहाँ संस्कार व रिश्तों का दबाव होता है वहाँ संवेदनाएँ निष्क्रिय हो जाती हैं। बड़ों के सामने चुप होना उनका सम्मान होता है मगर तब तक ही जब तक सत्य पर आँच नहीं आए। विचारों का आदान प्रदान ही संचार क्रिया है जो इन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी संवाहित करती है। बड़ों के आगे चुप रहकर उनकी इज्ज़त करना जरूरी होता है, यहाँ कोई हार जीत नहीं होती। अपनी बात धैर्य रख विनम्रता से उन्हें स्मरण कराई जा सकती है। बशर्तें आपकी बात में वज़न होना चाहिए।
9. पद-प्रतिष्ठा का सहारा लेना
            हमारे समाज में चाहे जातिगत अन्तर कम हो रहा है लेकिन पद प्रतिष्ठा का अन्तर साफ़ नज़र आता है। आज किसी अफसर के आगे कर्मचारीगण का मौन रहना अनुशासन के अर्न्तगत आता है। व्यवसाय में मालिक व मज़देरों में अन्तर देखा जा सकता है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की बात कितनी भी सही होगी, वह अफसर के आगे चुप रहता है। ऐसा होना नहीं चाहिए। सत्य बात कहने में किसी से नहीं डरना चाहिए। मगर बात अनुशासन की हो तो चुप रहना बेहतर होता है। ऐसी परिस्थिति में यदि अपनी बात अपने अफसर के समक्ष रखनी हो तो बड़े साफगोई ढंग व विनम्रता के साथ प्रस्तुत करनी चाहिए। उच्चपदाधिकारी या बॉस से आप अपनी बात जबरदस्ती नहीं मनवा सकते। विनय पूर्वक अपनी बात को सिद्ध करें अन्यथा तनाव झेलने को तैयार रहें। वक्त पर अपनी बात कहना एक हिम्मत व कौशल की बात होती है। बस, बात कहने का तरीका सही होना चाहिए। वरना विपरीत स्थिति में चुप रहना सही चुनाव होगा। चुप रहने में बड़ी ताकत होती है। जितना समय लेकर, सोच विचार के उपरान्त बात की प्रस्तुति होती है उसमें उतना ही निखार आ जाता है। चुप्पी कमज़ोरी नहीं बलकि तूफान के आने से पूर्व की खामोशी भी होती है। चुप्पी , किसी बड़े फैसले या बड़ा कदम उठाने से पूर्व भी होती है। चुप्पी अपने आप में एक ताकत है, जो आपकी टूटी हिम्मत को संग्रहित कर, समय आने पर प्रयुक्त होती है।
10. चुप्पी का जवाब वक्त के खेमे में
            अपने चुप रहने से मन में दुखी न हों क्योंकि आपकी चुप्पी का जवाब वक्त देता है। समय बड़ा बलवान होता है। जो बात आप कह नहीं सके उसे समय अपने अनुरूप सामने ला देता है। किसी को शब्दों में जवाब देकर कड़वाहट ही पैदा होती है, रिश्ते खराब हो जाते हैं। आप इंतज़ार करिए वक्त सब समझा देगा, जिससे सामने वाला या तो शर्मिन्दा होगा या अफसोस करेगा। व्यवहार सोच समझकर करना चाहिए।
सम्पर्कः 304,रिद्धि सिद्धि नगर प्रथम, बूंदी रोड, कोटा राजस्थान., मो. 9414746668

Feb 23, 2018

कहानी

प्रदर्शन 
- रचना गौड़ 'भारती'
   मम्मीजी की चिता में उनके एकमात्र लड़के ने आग दी। चिता धू-धूकर जल उठी। चंबल के किनारे की तेज़ हवा ने आग में घी का काम किया था। चिता की प्रचण्ड अग्नि ने सर्दी के उस मौसम में भी पास खड़े लोगों को काफी गरमाहट का अनुभव करा दिया था।
  करीब 70-80 लोगों की भीड़ में रमन भी शामिल था। रमन ने बड़े ही कौतूहल से मम्मीजी के अस्पताल जाने से लेकर उनके इलाज और उनके मरने तक की घटनाओं के अलावा उन्हें श्मशान घाट तक ले जाने में बरती गई तमाम पुरातनवादी रूढ़ियों को देखा था, उन्हें समझने का प्रयास किया था, पर उसकी समझ में यह नहीं आया कि नियमों का पालन क्यों आवश्यक था या इनके मानने से क्या नुकसान हो जाने वाला था।
  मम्मीजी के तीन दामादों में रमन सबसे छोटा दामाद था। मम्मीजी की शवयात्रा में शामिल होना रमन के लिए इस तरह का पहला अनुभव था। दस दिसंबर की सुबह नहाते समय मम्मीजी बाथरूम में गिर गईं थीं। काफी खून निकला था। उन्हें तुरंत ही अस्पताल ले जाया गया था। डॉक्टर का कहना था कि दिमाग की नस फट गई है।
   रमन से जो करते बना, उसने किया। रमन की पत्नी नेहा तो अपनी माँ की सेवा के लिए रात-दिन अस्पताल में ही रही। रमन की दो बड़ी सालियाँ मम्मीजी की एकमात्र बहू अपने पूरे दलबल  सहित दोपहर को अस्पताल पहुँचीं थीं। शाम तक पूरी टीम मम्मीजी के पास बैठने के बजाय बाहर मटर गश्ती ज्यादा करती थी। रमन जब भी वहाँपहुँचता - अपनी सालियों को कभी चाय तो कभी कॉफी पीते हुए, तो कभी बाहर सड़क पर टहलते हुए पाता था। एक बार उसने पूछा तो कहने लगीं-''यहाँ सर्दी काफी है। बच्चों को ठण्ड लग जाए, इसलिए धूप का सेवन अत्यन्त जरूरी है। (मानो यहाँ वे माँ की सेवा के लिए नहीं ,धूप का सेवन करने आतीं थीं।) फिर मम्मी को नेहा तो देख ही रही है।
रमन ने सवाल किया-''फिर आप लोग बच्चों को यहाँ  क्यों ला रहे हैं ? कुछ लोग घर ठहर जाया करें ........ कुछ रात में जाया करें।
  छूटते ही वह बोली थीं-''मेरे बच्चे मेरे साथ ही आएँगे। मैं उन्हें किसी के भरोसे छोड़कर क्यों आऊँ? रात में बच्चों को यहाँ  सुलाना ठीक नहीं; क्योंकि बच्चों को इन्फेक्शन हो जाता है। घर ही सबसे सुरक्षित जगह है। मैं स्वयं इन्फेक्शन के डर से नहीं आना चाहती। पर क्या करूँ, माँ  है, आना पड़ता है। नहीं आऊँगीं तो लोग क्या कहेंगें ? ( जैसे वह मोहल्ले वालों के तानों के डर से यहाँ   रहीं थीं।) दूसरे मम्मी भी तो नेहा को ही मानतीं हैं, अब नेहा ही उन्हें देखे।
रमन इस जवाब से निरूत्तर हो गया था। दोनों बहनें उसकी सलहज इस जवाब से प्रसन्न नजऱ रहीं थीं। वे सोचने लगा-''शायद मैं ही बेवकूफ हूँ जो मय परिवार के यहाँ  पड़ा हूँ।
पर तुरंत दूसरा विचार मन में गया-''माँ  है, सेवा करने में क्या हर्ज़ है ? सब नालायक सही, पर मैं तो नालायक नहीं ?’मम्मीजी की इकलौती बहू ने तो शायद अपनी सास को छूने की कसम ही खा रखी थी। घर से चलती तो कम से कम ढाई तीन हजार की साड़ी पहनकर। साथ में डिज़ाइनर ब्लाउज़। इसके ऊपर लिपस्टिक, रूज़ का मेकअप। अस्पताल में जाकर एक बार पुन: अपना मेकअप शीशे में देखना भूलती, ताकि राह में कोई गड़बड़ हुई हो, तो ठीक की जा सके।
   रमन ने उस दिन कह ही दिया था-''भाभीजी, आप का यह शृंगार यहाँ शोभा नहीं देता
वह तपाक से बोली-''आप क्या जाने ननदोईजी ? बहुत सारे डॉक्टर यहाँ  आते हैं। कुछेक उनके मित्र भी हैं। उनके मित्र भी मम्मीजी को देखने आते ही हैं। मुझे सादे कपड़ों में देखेंगें तो क्या कहेंगें ? कितनी बेइज्ज़ती होगी इनकी ? एक बड़े व्यापारी की पत्नी के नाते मुझे यह सब पहनना पड़ता है। घर की इज्ज़त का सवाल जो है।
 मम्मीजी के एक मात्र सुपुत्र सलिल और रमन के एक ही अदद साले साहब को तो बिजनेस से ही फुरसत नहीं मिलती थी। हाँ , रोज़ रात एक बार जरूर इधर से होकर जाते थे। रात में ठहरने के नाम पर दुकान के नौकर को बैठा जाते थे, जो आधा सोता तो आधा ऊँघता रहता था। रात में ग्लूकोज़ आदि चढ़ाते समय मम्मीजी के हाथ को पकड़े रहना पड़ता था, क्योंकि अक्सर वह हाथ को झटक देतीं थीं।; इसलिए रात में रमन नेहा बार- बारी सोते जागते थे।
    करीब सातवें रोज़ घर में महामृत्युंजय का पाठ प्रारम्भ हो गया था, मम्मीजी को मोक्ष दिलाने के लिए। साथ ही एक व्यति की नियुक्ति अस्पताल में मम्मीजी को भागवत पढ़कर सुनाने के लिए कर दी गई थी। मम्मी के स्वस्थ रहते कोई उन्हें एक छोटा किस्सा भी नहीं सुनाता था, पर अब भागवत सुनाई जा रही थी। जब तक मम्मी ठीक थीं, किसी को उनकी चिन्ता तक थी, कोई खाने को नहीं पूछता था, लावारिस-सी घर के कोने में पड़ी रहतीं थीं।
   जब रमन ऐसी बातें सुनता था ,तो उसका मन उन्हें अपने पास बुलाने का हो जाता, पर मम्मी नहीं आतीं, कह देतीं-''भैया, कुछ ही दिन रह गए हैं, यहीं गुजार लेने दो।
करीब आठवें दिन सुबह ही मम्मीजी का अस्पताल में देहान्त हो गया था। तुरंत घर से शेष दो बहनें, बहू उनके लड़के गए थे। उस दिन बच्चों को घर पर ही रहने दिया गया। आते ही सब मम्मीजी के शरीर से लिपट गए। (ऐसे वे सब पहले नहीं लिपटे थे।) थोड़ी ही देर में पूरा वार्ड दहाड़ मारकर रोने की आवाज़ों से गूँज उठा। यों लगा, जैसे एक साथ कई लोग कत्ल कर दिए गए हों। पाँच मिनट में ही सब शांत भी हो गया था। किसी के चेहरे को देखकर नहीं लग रहा था कि उनकी आँखों से आँसू का एक कतरा भी बहा हो। पूरा सीन रमन की आँखों के सामने नाटक के रिहर्सल की तरह से निकल गया।
   मम्मी के शव को स्ट्रेचर पर डालने के वक्त चूँकि सलिल भाई साहब अकेले थे, रमन ने सोचा मम्मी को उठाने में मदद कर दूँ। अभी हाथ बढ़ाया ही था कि बड़ी साली बोल उठी-''रमन, तुम हाथ लगाना। दामाद हो, तुम्हारा हाथ लग गया, तो मम्मी को नरक जाना होगा।मम्मी के मरने तक तो रमन सेवा करता रहा। उस समय किसी को याद नहीं आया कि वह दामाद है। पर चूँकि मम्मी को मोक्ष मिलने की बात थी, अतएव रमन अपना हाथ लगाकर उनके मोक्ष के रास्ते का द्वार बंद नहीं करना चाहता था।
    मम्मी को उठाना सलिल भाई साहब के अकेले के बस की बात नहीं थी। फिर भी सलिल भाई साहब, नेहा भाभीजी मम्मी को उठाकर स्ट्रेचर पर लाने लगे। स्ट्रेचर रमन की दोनों बड़ी सालियों ने पकड़ रखा था। इस से पहले कि शव स्ट्रेचर पर पाता, वह फर्श पर जा गिरा था।
  रमन अछूत सा दूर खड़ा तमाशा देखता रहा था। ज़मीन पर से किसी तरह फिर शव उठाकर स्ट्रेचर पर डाल लिया था। लाश घर पर ले जाई गई थी। आननफानन में लकड़ी की टिकठी आदि का प्रबंध हो गया था। करीब 20 किलो गुलाब के फूल, इतने ही मखाने मँगवा लिये गए थे। एक आदमी को 100 रू0 की रेजगारी भी लाने को भेज दिया गया था। उसे हिदायत दे दी गई थी कि एक और दो के कलदार ज्यादा लाना रुपये फेंकते समय लगेगा जैसे काफी तादाद में रुपये लुटाए जा रहे हैं। कोई मामूली बात तो थी नहीं। शहर के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी की माँ  की शवयात्रा थी। उन की सारी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी थी। कहीं कोई यह कह दे, लड़के ने माँ  के लिए कुछ खर्च नहीं किया।
   चूंकि दामाद का कोई रोल नहीं था इसलिए रमन ऐसी जगह बैठ गया, जहाँ  से समस्त क्रिया कलाप देखा जा सके। औरतें जत्थों में चलीं रही थीं। जैसे ही वे लाश के करीब आतीं, सब की सब एक सुर में दहाड़ मारकर रो पड़ती थी। क्या गज़ब का सामंजस्य था। कुछ ही क्षणों में फिर शांति छा जाती थी। पहले आई औरतें पीछे खिसककर मम्मीजी के बारे में चर्चा करने लगतीं। भले ही मम्मीजी के जीते जी कभी कानी आँख भी वे इधर नहीं झाँकी होंगीं, पर अब मोहल्ले की औरतों का हुजूम इसी तरफ था। थोड़ी देर बाद आवाज़ें आईं-''नाती कहाँ  है ?बुलवाओ, पैर तो छू लें। मम्मी को मोक्ष मिल जाएगा।
   रमन किंकर्तव्यविमूढ़ था। उसके छूने मात्र से मम्मी को नरक मिल सकता था, पर उसके लड़के के छूने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो रही थी। रमन की दोनों सालियां सलहज अपने-अपने लड़कों को लाश की ओर हाँकने लगीं। एकाध को तो इस सिलसिले में पीट भी दिया गया था। अंतत: सभी मम्मीजी के मृत शरीर का चरणस्पर्श कर चुके थे।
  रमन ने सोचा अच्छा हुआ उसके दोनों साढ़ू भाई नहीं आए। वरना उसकी तरह तमाशबीन बने बैठे होते। फोटोग्राफर भी बुलवा लिया गया था। मानो नई बहू का गौना होने वाला हो। बैंडबाजे बनजे लगे थे। बाहर एक राहगीर ने पूछ लिया था-''क्या लड़का हुआ है ?’ रमन क्या बोलता ?
   लाश पर कफन डाला जाने ही वाला था कि सलिल भाई साहब की निगाह शायद मम्मी के गले हाथ की कलाई पर चली गई थी। सोने की मोटी चेन चूड़ियाँ जो मिलाकर 5-6 तोले की थी। भाई साहब ने लपक कर निकाल लीं, जैसे कोई लेकर भागने वाला था।
 शव ट्रक पर रख कर सब लोग चंबल की ओर रवाना हो गए। आने को तो सभी आदमी एक ही ट्रक पर सकते थे, पर यहाँ  प्रतिष्ठा का मामला था। चार ट्रक खाली ही घाट तक गए थे।
 लकड़ी की चिता भी तैयार हो गई थी। लाश को चिता पर रखने से पहले चंबल में गोता लगवाना था। पर अभी भाई साहब की खोपड़ी घुटी नहीं थी। तुरंत ही एक नाई भाई साहब के बाल मूँडने लगा। मुंडन संस्कार के बाद उनके तन पर श्वेत झीना वस्त्र था। सर्द हवा के कारण उनकी कँपकँपी छूट रही थी।
   लाश को नहला कर चिता पर रख दिया गया और महापात्र का इंतज़ार होने लगा मुखाग्नि देने के लिए। उधर महापात्र लाश पर पड़ी चादर में से पैसे बीन रहा था। पूरे पैसे ढूँढ लेने के बाद ही वह लाश के करीब आया था। मंत्रोच्चार के साथ ही भाई साहब द्वारा अग्नि देने के बाद चिता जल उठी थी। इस अग्नि को घर से बड़ा ही सहेज कर लाया गया था।
   तभी रमन की निगाह दूर ढेर पर चली गई जहाँ  लकड़ी की अर्थियों का अंबार लगा था। शायद सब फिर बाज़ार में बेच दी जाएँगीं, चारपाई आदि बनाने के काम जाएँगीं। पास ही लाशों से उतरी चादरों का ढेर था। इनकी भी बिक्री अच्छे दामों पर हो जाएगी।
  तीसरे दिन घर के सभी बड़े चिता की राख को हंडिया में भरने के लिए शमशान पहुँचे, ताकि उसे वाराणसी, इलाहाबाद, हरिद्वार, गया पुरी जैसे स्थानों पर पवित्र नदियों में विसर्जित किया जा सके। इस कलश को लेकर भाई साहब को ही जाना था। जीते जी भाई साहब मम्मी को अपने साथ कहीं नहीं ले गए। वैसे हनीमून मनाने अपनी बीवी के साथ कश्मीर से कन्याकुमारी तक जा चुके थे। उनका कहना था-''माँ  के लिए इतना किया ,तो लोग क्या कहेंगें ?’ उन्हें बार बार लोगों के कहे जाने का डर खाए जा रह था। मम्मी को इतनी जगह लेकर जाने के पीछे भाई साहब का उद्वेश्य था- अपने व्यापार का इन क्षेत्रों में प्रसार करना।
 चंबल के ठण्डे पानी में जाड़े के दिन नहाकर सबकीघिग्घी बँध गई। कई लोगों की नाक बहने लगी, जिनकी नाक सुड़कने की आवाज़ें रह रहकर रही थीं। घर पर अभी पंडितों के कई चोंचले होने बाकि थे। दसवीं, एकादशी, तेरहीं..... पंडितों को दान, नातेदारों, मोहल्लेवालों को भोजन, करीब 40-50 हजार का खर्च था।
 माँ  के इलाज से लेकर उनकी तेरहीं तक करीब 2.50 लाख रूपये खर्च हुए। भाई साहब की हर जगह धाक जम गई। पंडितों ने एक प्रकार से मम्मी के स्वर्ग जाने का सर्टिफिकेट दे दिया था। साथ ही अगले साल श्राद्ध भी करवाने के लिए बोल गए थे। मम्मी के अस्पताल में खर्चें से कहीं अधिक खाने पर खर्च हुए थे; क्योंकि घर से सब खाली पेट चलते थे, ताकि होटल में चाट डोसा आदि खाया जा सके। मोटा खर्चा इसके बाद भाई साहब की विसर्जन यात्रा पर हुआ क्योंकि उनका पूरा परिवार साथ गया था। करीब महीने भर के दौरे में सब लोग होटलों में ठहरे थे। खाने, आने जाने किराए आदि में खूब खर्च हुआ।
   इतने खर्च के बावजूद भाई साहब का चेहरा प्रसन्नता से खिला हुआ था। माँ  के क्रियाकर्म में इतने पैसे नष्ट कर उन्होंनें समाज में अपने लिए काफी अच्छी जगह जो बना ली थी।
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