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May 1, 2026

व्यंग्यः प्लास्टर वाली टांग

  - डॉ. मुकेश 'असीमित '

आप चाहते हैं कि आप हमेशा दुनिया की नजरों में बने रहें, सबकी निगाहें आप पर टिकी रहें। जिस गली से गुजरें, लोग आपको देखकर रुक जाएँ, हाल-चाल पूछें, आपको याद करें। बस, आप आ जाइए हमारे पास, लगवा लीजिए एक प्लास्टर... सच में, हर जगह आपकी पूछ होगी। जो आपको जानते हैं, जो नहीं जानते, सब आपको रास्ते में रोक सकते हैं। अगर आपके हाथ में प्लास्टर लगा हुआ है, तो आप इस शहर के लिए एक चलता-फिरता अजूबा बन सकते हैं। लोग आपको ऐसे देखने लगेंगे जैसे चिड़ियाघर से कोई प्राणी सड़क पर आ गया हो।

और अगर आपकी टाँग  में प्लास्टर लगा हुआ है और आप घर में कैद हैं, तो लोग आपके घर तक भी आ सकते हैं। पुराने दोस्त, रिश्तेदार, मोहल्ले वाले, जो कभी आपका हाल तक नहीं पूछते, वे भी बिना रोक-टोक आपके दरवाजे पर आ जाएँगे। कसम से, रातों-रात आपको लगेगा कि पूरी दुनिया आपकी टाँग  की चिंता में कितनी बेचैन हो गई है। आपने भले ही कभी किसी के काम में टाँग न फँसाई हो, पर जब आपकी टाँग टूटेगी, तो लोग आपकी टाँग का हाल जानने दौड़े चले आएँगे। इतनी हसरत से आपकी टाँग को देखेंगे जैसे उन्हें लग रहा हो कि यह अवसर उनको क्यों नहीं मिला, काश उनके भी प्लास्टर लगा होता... आज उनके घर पर भी पूछने वालों का जमावड़ा लगा होता।

शर्मा जी के कान दरवाजे पर लगी कॉल बेल पर हैं। जैसे ही कॉल बेल बजती है, शर्मा जी अपनी टाँग को तकिये पर रख देते हैं। सामने वाले को, जिस पर शोक प्रकट करना है, वह सामने रहेगी तो आने वाले को धक्का- सा नहीं लगेगा 'की यार प्लास्टर वाली टाँग कहाँ है ,’कहीं हम ठगा तो नहीं गए ,खबर तो पक्की है न ? कहीं हमारे समाचार लेने से पहले ही प्लास्टर कट गया हो..दस वहम जी..। मुख पर दुःख और वेदना के भाव ले आते हैं, चेहरा थोड़ा लटका लेते हैं। इधर, श्रीमती जी किचन में चाय का पानी चढ़ा देती हैं, बेटा बाहर दूध की थैली और चाय की पत्ती लेने को भागता है।

प्लास्टर वाली टाँग तकिये पर रखी है। लोग आ रहे हैं... मातमपुरसी का पूरा माहौल है। आहें भरी जा रही हैं, टाँग को पकड़-पकड़ कर हिलाकर देखा जा रहा है, "जिंदा है न?" शर्मा जी को थोड़ी उँगली चलाने को कहा जाता है। शर्मा जी उँगली चलाते हैं, हाँ... ठीक है, मन को तसल्ली। टाँग जिंदा है।

डॉक्टर ने भी कहा है, हर एक घंटे में उँगली चलाते रहें, तसल्ली रहेगी कि टाँग जिंदा है।

क्या शर्मा जी, क्या मिश्रा जी, क्या गुप्ता जी—जिनकी टाँग टूटी है और प्लास्टर लगा है, सबकी एक ही राम कहानी है। अब आप तैयार हो जाइए, इस पूरी कहानी के भूत, भविष्य और वर्तमान को सुनाने के लिए। कोई भी बात छूटनी नहीं चाहिए। सबसे पहले तो यह बताएँ  कि चोट कैसे लगी, कितना दर्द हुआ, आवाज आई थी क्या टाँग टूटने की? जब टाँग टूटी, कैसा महसूस हुआ—अच्छा या बुरा? अब कैसा महसूस हो रहा है?

फिर समाचार लेने वाला कोशिश करेगा आपको सांत्वना देने की, " अरे भाई साहब ,आपकी क्या टाँग टूटी है पिद्दी- सी .... ! ये भी कोई टाँग   टूटना होता है? टाँग   तो हमारे साले साहब की टूटी थी... भाई साहब, कैसी टाँग   टूटी थी उनकी, सच में!"

शर्मा जी सोचेंगे कि कितनों को सुना चुके हैं, अब क्या सुनाएँ बार-बार वही कहानी। यह भी कोई बात हुई... जो साहब समाचार लेने आए हैं, उन्हें तो सुनाना ही पड़ेगा, वरना वे ही आपको सुना देंगे, "बताइए, हम समाचार लेने आए और इन्हें इतनी भी तमीज़ नहीं कि हमें बता दें कि हुआ कैसे?" घटनास्थल का आँखों-देखा हाल तो आपको ही बताना पड़ेगा। या तो एक कैसेट रिकॉर्ड कर लीजिए और प्ले कर दीजिए या अपनी कहानी किसी नौकर को रटा दीजिए और उसे इस काम पर लगा दीजिए।

समाचार लेने वाला व्यक्ति अपनी सांत्वना देने से पहले पूरी घटना की गंभीरता के अनुसार अपनी सांत्वना की पोटली खोलेगा। फिर आपको कुछ सबूत भी पेश करने पड़ेंगे कि वास्तव में टाँग  टूटी है या यूँ ही मजाक कर रहे हैं, क्या पता आपका ..नकली प्लास्टर लगाकर बैठे हों । अब सबूत में आप डॉक्टर की पर्ची, एक्स-रे फिल्म, प्लास्टर का बिल, या फिर टूटने के समय की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग, या टूटने की आवाज की ऑडियो रिकॉर्डिंग, या कोई चश्मदीद गवाह प्रस्तुत कर सकते हैं। अब यह साबित तो आपको ही करना पड़ेगा न, आखिर टाँग   भी तो आपकी ही टूटी है।

कई समाचार  लेने वाले निराश भी होंगे...” अरे क्या शर्मा  साहब, हम समाचार  लेने आये हैं यह सोचकर की कोई ढंग की टाँग  टूटी होगी...ये क्या मामूली सा फ्रैक्चर ..बताओ काम धाम छोड़कर एक तो इनके समाचार  लेने आओ और एक ये हैं महाशय हैं की , ढंग से टाँग  भी नहीं तुड्वाते “ 

शर्मा जी ग्लानी से मरे जा रहे हैं..’अगली बार शिकायत का मौका नहीं देंगे ऐसा प्रण लिए हैं’ 

"शर्मा साहब, आप तो इतने संभलकर चलते हैं, गाड़ी भी धीरे चलाते हैं, कई बार देखा हमने।" ऐसे लोग तो शर्मा जी से जलन रखते हैं कि "शर्मा साहब इतना धीरे क्यों चलते हैं, कभी टाँग  -वांग क्यों नहीं तुड्वाते ताकि हमें भी समाचार लेने का मौका मिले।" बहुत दिनों से सोच रहे थे कि शर्मा जी से मिलने का मौका कब मिलेगा, असल में उन्हें अपने बेटे की नई जॉइनिंग के बारे में सलाह लेनी थी। और देखो, आज मौका मिल गया। एक पंथ दो काज ।

शर्मा जी शुरू करते हैं, लेकिन समाचार लेने वालों का ध्यान नाश्ते में परोसे गए समोसों पर चला जाता है। सोचते हैं, "सुनाएँ या नहीं?" लेकिन मन को तसल्ली देते हैं, "अरे समोसे तो मुँह से खा रहे हैं न, कान थोड़े ही व्यस्त हैं, सुन तो रहे हैं न।"

लो, उन्होंने समोसा आधा खत्म करके प्लेट में रख दिया, अब पूछ भी रहे हैं, "तो शर्मा जी, कैसे हुआ एक्सीडेंट?"

शर्मा जी कहने वाले होते हैं, "बहुत दिनों से टाँग में खुजली चल रही थी, एक्सीडेंट से मिलने की खुजली ।रोजाना रास्ते में एक्सीडेंट मिलता ..पूछता ‘शर्मा जी अब तो हो जाने दो न..देखो आपकी टाँग  भी मिलना चाह रहे है मुझ से .. ‘फिर एक दिन, तरस खाकर मैंने कह दिया - हो जाओ भाई । बस हो गया।"

 जब वे आएँगे और प्लास्टर को देखेंगे तो कहेंगे, "अरे शर्मा जी, कितने दिन का कहा है डॉक्टर ने?"  

आप कहेंगे, "जी, 20 दिन का।"  

तुरंत कोई बोलेगा, "नहीं-नहीं, कम से कम 6 हफ्ते रखवाइए शर्मा जी। डॉक्टर को कहिए 20 दिन के बाद और 20 दिन बढ़ा दे। अब टाँग   बार-बार तो टूटती नहीं, आराम दीजिए टाँग   को।"

कुछ लोग सलाह देंगे, "यार, आपको डॉ. रस्तोगी को दिखाना चाहिए था, वो सही में टाँग  जोड़ते हैं। हमारे साले  साहब की टाँग   जोड़ दी थी और जुड़ने के बाद लगा ही नहीं कि पहले टूटी थी।" स्साला एक्सीडेंट  भी कन्फुज ..यार ये टाँग   अभी तक टूटी क्यों नहीं..नया माल लग रहा है बिलकुल..फ्रेश।

 शर्मा जी सोचेंगे, "अगली बार जब टूटेगी तो डॉ. रस्तोगी को भी अजमा लेंगे।" 

फिर कोई पूछेगा, "वैसे हुआ क्या था?"  

आप कहेंगे, "जी, टाँग   टूट गई है।"  

"किसने बताया?"  

"डॉक्टर ने।"  

"अरे किस डॉक्टर को दिखाया?"  

"डॉ. गर्ग साहब को।"

ये वो लोग है जो बाल की खाल निकलने को आतुर..इन्हें लगता है ये सब सहानुभूति बटोरने के बहाने हैं, हम समाचार लेने वालों को नाहक परेशान  किया जा रहा है..अब कुछ लोग अप्र्त्यक्ष्य रूप से आपके मोटिवे को जानने के लिए अपनी कहानियाँ सुनाने लगेंगे, "वो अपने वर्मा जी हैं न, चुनाव में ड्यूटी लगी थी, छुट्टी नहीं मिल रही थी, तो डॉ. गर्ग ने एक पर्ची बना दी,एक नकली प्लास्टर लगवा दिया  और छुट्टी मिल गई।"

शर्मा जी क्या करें, कहेंगे, "अरे, मेरी तो सच में टूटी है। आप प्रमाण चाहते हैं? ये लीजिए एक्स-रे।" और एक्स-रे उल्टा पकड़कर देखने वाले कहेंगे, "अरे डॉक्टर ने फ्रैक्चर कहाँ से निकाल दिया? हमें तो कहीं कोई फ्रैक्चर नजर नहीं आ रहा। "

तब शर्मा जी अपनी आखिरी गवाही के लिए अपनी पत्नी को बुलाएँगे, "जरा बताओ न, कैसे हुआ?" पत्नी कहेंगी, "भाई साहब! स्कूटी पर जा रहे थे, गड्ढे तो आपको पता ही हैं सड़कों पर। दोनों गिरे और टाँग  नीचे आ गई स्कूटी के।"

फिर प्लास्टर के रंग-रूप और शेप का मुआयना करेंगे। सलाह देंगे, "फाइबर लगवाते, महंगा है पर अच्छा दिखता है।" कुछ लोग अपने पेन-पेंसिल से आपके प्लास्टर पर शुभकामनाएँ लिखकर या अपने ऑटोग्राफ देकर भी जाएँगे, जैसे यह अतिथि बुक हो और वो अजायबघर में आये हैं,आपकी प्लास्टर वाली टाँग   को देखने । 

कुछ सलाहकार देसी इलाज़ भी सुझाएँगे। कोई गाय का मूत्र, कोई बकरी का दूध, तो कोई सूअर का घी, और कहेंगे कि लगाओ, फायदा होगा। शर्मा जी को ऐसा लगने लगेगा कि टाँग   पर जितना प्लास्टर का चूना  नहीं लगा, उससे ज्यादा सलाह का चूना  चढ़ रहा है।

रिश्तेदार सब्जी-फल भी लेकर आएँगे, "भाई साहब, क्या हो गया महंगाई को ..सेब देखो तो 200 रुपए किलो हैं और वो भी सड़े हुए, मजबूरी में केले लेकर आ गए।" 

शर्मा जी उनके केले की थैली के बोझ टेतले दबे जा रहे हैं..अरे इसकी क्या जरूरत थी भाईसाहब... इस भार को थोडा हल्का करने के लिए शर्मा जी कहेंगे , "सुनो, चाय बना दो न। 

रिश्तेदार...”हें हें ..अरे भावी जी को क्यों परेशान करते हैं..चलो बना ही रहे हैं तो फीकी ही बनाना, तुम्हें पता है डायबिटीज हो गई है,अरे हाँ आपको सुगर तो नहीं है ?" 

शर्मा जी कहेंगे, "चेक नहीं कराई।" 

इस पर एक और सुझाव मिलेगा, "अब तो शुगर चेक करवानी पड़ेगी। कई के पैर सड़ गए हैं प्लास्टर के बाद।"फिर उनके पास किस्सों की भरमार है ,प्लास्टर की बीभत्स रस से भरी हुई स्टोरी के..किसी का प्लास्टर टाइट होने से,किसी के सुगर होने से न जाने कितनी टाँगे सडकर कट चुकी हैं ।

शर्मा जी प्लास्टर प्रकरण  की इन डरावनी कहानियों को सुनकर थरथर काँप रहे हैं 

कुछ लोग तो यही चाहेंगे कि जल्दी ठीक न हों। "भाई साहब, प्लास्टर खुलने के बाद भी हल्के काम करना, और दूसरी टाँग  का भी ख्याल रखना। ये एक बार टूटे तो दूसरी को जलन होने लगती है।" कुछ लोग बार-बार आएँगे, क्योंकि आप मजबूर हैं, टूटी टाँग  के साथ पड़े हैं। अब आप बहाना भी नहीं कर सकते कि घर पर नहीं हैं, आखिर टाँग  टूटी है, कोई मजाक थोड़े ही।


रचनाकार के बारे मेंः निवासः  गंगापुर सिटी, राजस्थान , पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ, लेखन रुचि: कविताएँ, संस्मरण, लेख, व्यंग्य, देश विदेश के दैनिकी,साप्ताहिक पत्र- पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएँ प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तक "नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक" (किताबगंज प्रकाशन से ), प्रकाशनाधीन -गिरने में क्या हर्ज है  -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) Mail ID –drmukeshaseemit@gmail.com

Nov 2, 2025

व्यंग्यःअफ़सरनामा

 - डॉ मुकेश असीमित 

अफ़सर नाम का प्राणी वह है, जो दफ्तरों में पाया जाता है। वैसे तो सरकारी, अर्ध-सरकारी, और गैर-सरकारी सभी दफ्तरों में यह पाया जाता है। कुछ अर्जित, कुछ जबरन, कुछ जुगाड़ू, और कुछ कबाड़ी - हर प्रकार के अफ़सर होते हैं। अफ़सर काम नहीं करते, काम की चिंता करते हैं। गधे की तरह जिम्मेदारियों का बोझ ढोते हैं- जिम्मेदारी काम करवाने की और साथ में काम की चिंता का बोझ उठाने की।

इनका कोई समय नहीं होता; ये समय और स्थान से परे, ब्रह्मस्वरूप होते हैं। ये ऑफिस के कण-कण और जड़-चेतन में विराजमान रहते हैं। इसलिए कुर्सी पर दिख सकते हैं, नहीं भी दिख सकते हैं, या दिखते हुए भी नहीं दिख सकते हैं और नहीं दिखते हुए भी दिख सकते हैं।

अफ़सर को कभी भी नौकर मत समझिए। इनके चाल-ढाल और रंग-ढंग सब अलग और जुदा-जुदा होते हैं। ये तो सारी जनता को अपना नौकर समझते हैं। नौकर के साथ चाकर जुड़ा होता है, लेकिन अफ़सर के साथ क्लब, विदेशी दौरे, महँगी शराब, और अनगिनत मीटिंग्स जुड़ी होती हैं।

अफ़सर का मुख्य भोजन रिश्वत है। ये सर्वाहारी होते हैं। वैसे तो रिश्वत में विविधता की परवाह नहीं करते, जो भी मिले खा सकते हैं। कुर्सी, टेबल, फाइल, पेन, पेंसिल, कूड़ा-कचरा, यहाँ तक कि सड़कें और पुल तक निगल सकते हैं। इनका पेट बहुत बड़ा होता है। इनके जूते भी बड़े आकार के होते हैं, जो हर समय इनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर चलते रहते हैं। ये जूते कभी थकते नहीं, कभी रुकते नहीं।

ये सोचते बहुत हैं- दफ्तर के बारे में, काम के बारे में। सोचते-सोचते इन्हें अक्सर झपकी लेनी पड़ती है। बिना झपकी के, इनके ख्याल बेलगाम हो जाते हैं। पलकों में ख्यालों को बंद कर लेते हैं और फिर ख्यालों की 'वोमिट' करने के लिए मीटिंग बुलाते हैं। दफ्तरों में, फाइलों के ढेर के पीछे, आपको ये अक्सर झपकी लेते हुए मिलेंगे।

इनका मुख्य काम मीटिंग करना है। हर समस्या का हल मीटिंग ही होती है। किसी भी काम को टालने का, और कोई उपाय न हो तो मीटिंग; न करने का कोई और बहाना न हो तो मीटिंग। ये कोई भी काम अपने कंधे पर नहीं लेते और क्रेडिट से कोसों दूर रहते हैं। किसी भी निर्णय से पहले ये मीटिंग जरूर करते हैं, ताकि किसी भी असफलता का ठीकरा दूसरों के माथे पर फोड़ा जा सके।

अगर मीटिंग से समय मिले,  तो ये दौरे पर निकल जाते हैं। दौरे कई प्रकार के होते हैं, जो ज्यादातर मौसम के अनुसार तय किए जाते हैं। गर्मी हो, तो किसी ठंडे स्थान पर और सर्दी हो, तो किसी गर्म स्थान पर।

इनको ऑटोग्राफ देने का कोई शौक नहीं होता; फाइलों में इनके ऑटोग्राफ माँगे जाते हैं। ये शान से कहते हैं, जैसे दीवार फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कहा था—"जाओ, पहले उसके ऑटोग्राफ लाओ, फिर उसके, फिर उसके... तब मेरे पास आना तुम... आखिर में मेरे ऑटोग्राफ!"

बड़े अफ़सर बड़े दौरे पर होते हैं, कभी-कभी विदेश तक चले जाते हैं। सेमिनार, जिमखाना, डाक बंगला और रेस्ट हाउस में इन्हें बहुतायत से देखा जा सकता है। अफ़सर को सबसे ज़्यादा डर यूनियन वालों से लगता है। इन्हें मालूम है कि इनसे बड़ा अफ़सर इनका तबादला कराए न कराए, यूनियन का अध्यक्ष ज़रूर करवा सकता है। डर इस कदर है कि अगर यूनियन अध्यक्ष की सलामी का भी जवाब नहीं दिया, तो इन्हें डर है कि यूनियन हड़ताल पर जा सकती है।

हर अफ़सर के ऊपर एक अफ़सर होता है, जो उसे हड़काता है। यह इस हड़कन को अपने पास नहीं रखते, तुरंत निर्लिप्त भाव से नीचे वाले को ट्रांसफर कर देते हैं। नीचे वाला बाबू को, और बाबू उसे अपनी जेब में रखकर हाथों से मसल देता है, जैसे चींटी को मसल रहा हो।

हर अफ़सर के ऊपर एक जासूस होता है, और वो इसकी बीवी के सिवा कोई दूसरा नहीं होता। और हर अफ़सर के नीचे दो-चार जासूस होते हैं, जो दिन भर ऑफिस की सभी जायज़-नाजायज़ गतिविधियों की गंध इन्हें सुँघाते रहते हैं।

अफ़सर को घर जेल लगता है और दफ्तर एक पिकनिक स्पॉट। अफ़सर के दफ्तर में घड़ी भी अफ़सर के हिसाब से चलती है। सर्दियों में धूप में मूँगफली खाते हुए दिखेंगे, और गर्मियों में ए.सी. की ठंडी हवा खाते हुए। अफ़सर जहाँ होता है, वहीं दफ्तर लग जाता है, बिल्कुल शहंशाह की तरह। जब तनाव होता है, तो मीटिंग होती है। मूड फ्रेश हो, तो मीटिंग होती है। कुछ नहीं हो रहा हो, तब एक मीटिंग तो ज़रूर आयोजित करनी होती है, सिर्फ इसलिए कि पता करें कि आज कुछ क्यों नहीं हो रहा दफ्तर में।

बाबू से पूछते रहते हैं, "अच्छा, बताओ, आज मैं कैसा लग रहा हूँ?" बाबू कहते हैं, "साहब जी, इस बात पर तो एक मीटिंग आयोजित कर ली जाए। सबकी सर्वसम्मति से पता भी लग जाएगा कि आप कैसे लग रहे हैं। अब मैं अकेला कहूँगा, जनाब, तो छोटे मुँह बड़ी बात होगी।" बस, इसी बात पर एक मीटिंग आयोजित करनी पड़ती है।

अफ़सर की नई टाई की प्रशंसा के लिए भी एक मीटिंग आयोजित की जाती है। नीचे ओहदे वाले दफ्तर में किसी कर्मचारी की खुशी बाँटने को पार्टी करते हैं, तो अफ़सर उस खुशी को काफूर करने के लिए मीटिंग करते हैं। अफ़सर होना मतलब कुर्सी और उस पर टँगा उनका कोट। कोट के अंदर अफ़सर का होना ज़रूरी नहीं है। जैसे भरत ने अयोध्या का राज्य चलाने के लिए राम जी की खड़ाऊँ ली थी, वैसे ही इनका कोट दफ्तर का राज्य चलाता है। इससे बढ़िया रामराज्य आपको देखने को नहीं मिलेगा।

ये कहीं भी जाएँ, अपना कोट कुर्सी पर टाँग देना नहीं भूलते। अगर बड़ा अफ़सर भी आ जाए, तो कोट देखकर कोई भी कह सकता है - "अफ़सर तो हैं; लेकिन किसी ऑफ़िशियल काम से इधर-उधर गए होंगे।" 

सम्पर्कः गर्ग हॉस्पिटल ,स्टेशन रोड गंगापुर सिटी राजस्थान 322201 mail ID drmukeshaseemit@gmail.com

May 2, 2025

व्यंग्यः दास्तान-ए-सांड

  - डॉ. मुकेश असीमित

जन्म दिवस मेरा अभी दूर है। परिवार में एक महीने पहले ही चर्चा शुरू हो गई है कि इस दिवस को कैसे अनूठा बनाया जाए। इस बार गायों को चारा और गुड़ खिलाकर मनाने का फैसला हुआ है। शहर में भी देखा-देखी कई गौ आश्रम खुल गए हैं। जब से हमारे आयुर्वेदिक प्रचारक योग गुरु बाबा ने हर सौंदर्य प्रसाधन, खानपान, दवा-दारू में गाय का तड़का लगाया है, देश में गायों के प्रति प्रेम उच्च कोटि का जाग्रत हो गया है। गाय और गाय के सभी उत्पाद, जैसे गौमूत्र, दूध, दही, घी, योगर्ट, गोबर, पनीर- सब ५-स्टार रैंकिंग वाले शो रूम में सज गए हैं। देसी गाय की पहुँच अब देशवासियों के लिए अपनी औकात से बाहर की बात हो गई है।

यूँ तो बचपन से ही गाय हमारे पाठ्यक्रम में थी। गाय पर निबंध से लेकर, बगल में भूरी काकी की काली गाय के गोबर से थापे उपले, होली पर बनी बालुडीयाँ, और सुबह-सुबह गाय के दूध के जमाए दही को बिलोकर निकाले जाने वाले मक्खन से बाजरे की रोटी चुपड़कर खाने तक, गाय से हमारा नाता जुड़ गया है। सुबह-सुबह गाय को रोटी देने का काम हम बच्चों से ही करवाया जाता। गाँव में गाय को दरवाजे पर नहीं बुलाया जाता, बल्कि गाय को रोटी खिलाने के लिए जहाँ गाय बँधी होती थी, वहीं जाते थे। आजकल गायों ने शहर के परिवारों को आलसी बना दिया है और खुद अपनी रोटी के जुगाड़ में घर-घर जाकर दरवाजे की साँकल खटखटाती मिलती हैं।

पंडित जी के कर्मकांडों की दक्षिणा स्वरूप गौदान जहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण दान होता था, उसकी जगह अब पंडित जी हाई-टेक सुविधा से दक्षिणा की राशि UPI से अपने मोबाइल में ट्रांसफर करवा लेते हैं। गायें पंडित जी के आँगन से निकलकर अब गौ आश्रम में हाँक दी गई हैं। मेरे जैसे लोग, जिन्हें अपना जन्म दिवस यादगार बनाना है, इन्हीं आश्रमों में जाकर गायों को घास चराने वाले हैं। साथ ही फोटो खींचकर फेसबुक पर डालकर अपने गौ प्रेम की असीम झलक प्रदर्शित करने वाले हैं।

बचपन में हमें दो ही माताएँ बताई गई थीं—एक, हमें चप्पलों से पीटकर संस्कार भरने वाली हमारी मम्मी, और दूसरी गाय माता। पिताजी भी दो हैं, यह भी बचपन में ही जान लिया। एक, हमारे खाल उधेड़ने की गाहे- बगाहे धमकी देने वाले पिताजी, और दूसरे, महात्मा गांधी जी, जिन्हें हमारे स्कूल के मास्साब ने बेंत की सुताई से आखिरकार रटा ही दिया था; लेकिन इसी बीच गायों के भाई, बाप, खसम स्वरूप बैल और साँड से भी बचपन से जुड़ाव रहा। पापा के मुँह से कभी-कभार हमें “बनिया का बैल ही रहेगा तू" सुनने को मिल जाता। उस समय हम नहीं समझते थे कि पापा का मतलब हमें बेकार, निकम्मा, निठल्ला साबित करने का था। बैल की दुर्दशा उस समय इतनी दिखती नहीं थी, जितना पापा हमें “बनिया का बैल” कहकर उसकी महिमा को कम आँकते थे।

सुबह-सुबह गाँव की कच्ची सड़कों की गंडारों में बैल गाड़ी खींचने वाले ये बैल, किसान की चाबुक की मार और पूँछ मरोड़कर बैलगाड़ी को एक्सेलरेटर देने का काम करते। बैल के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज़ सुबह-शाम गाँव की गलियाँ गुंजायमान करती। गाँव के बाहर खेतों में ये बैल हल में जुते जुताई करते, तेली के कोल्हू में तेल निकालते, धुनिया की रुई धुनते, और इक्के-दुक्के पक्के मकान बनाने में गारे-चूने के मिश्रण की चिनाई करते।

धीरे-धीरे मशीनीकरण ने पैर पसार लिए। किसानों को मशीनों का चस्का लग गया। ट्रैक्टर आने लगे, बैलों के काम को मशीनें खा गईं। बैल निरीह प्राणी बनकर बेकार हो गए। विसंगति यह है कि जहाँ गाय हिंदू धर्म में पूजनीय है, वहीं बैलों के लिए किसी ने नहीं सोचा। अगर गाय को माता माना गया, तो बैल को भी छोटा-मोटा बाप बना दिया जाता; लेकिन इंसान है न, गधे को तो बाप बना सकता है, पर बैल को नहीं।

आज ये बैल शहर की हर गली-मोहल्ले में दयनीय हालत में पड़े हैं। गौ आश्रम वाले गायों को पकड़-पकड़कर आश्रम में ढकेल रहे हैं। संस्था के सदस्यों को गाय और बैल में अंतर पहचानने की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। कई बार कुछ नए, अतिउत्साहित सदस्य गलती से बैल को पकड़ लाते हैं। गौ आश्रम के चालक उन्हें बैलों को लौटाने का आदेश देते हैं, और ऐसे सदस्यों को संस्था से बाहर कर दिया जाता है।

जहाँ स्टॉक मार्केट बुल और बेयर के भँवरजाल को कवरेज देता है, वहीं असल में जो वास्तविक बुल (बैल) सड़क पर पड़ा है, उसके लिए कोई कवरेज नहीं। स्कूल में बुलिंग किए जाने वाले बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है; लेकिन सड़क पर बुलिंग का शिकार होने वाले इस निरीह बैल पर किसी का ध्यान नहीं। अपनी दुर्दशा से पीड़ित यह बैल कभी-कभी साँड का उग्र रूप धारण करके सड़क पर कुंठापूर्वक लड़ते हैं। उस समय क्षणिक रूप से बाजार और शहर के नागरिकों का ध्यान उनकी ओर जरूर जाता है; लेकिन वह भी गाली-गलौज और उनके जीवन को धिक्कारने के रूप में ही मिलता है।

बैल अपनी दुर्दशा पर आँसू बहाता हुआ शहर की गलियों, सड़कों और नालों पर पड़ा मिल जाएगा। शहर वाले सड़क और नाली की दुर्दशा पर आँसू बहाएँगे। न्यूज़पेपर वाले नगर पालिका को गालियाँ देते नजर आएँगे कि फलां जगह साँड नाली में पड़ा हुआ तीन दिन हो गया, नालियाँ अवरुद्ध हो गईं, नालियों का पानी सड़क पर आ गया। नगर पालिका ने शहर की नालियों की सुध नहीं ली ; लेकिन कहीं भी यह शिकायत सुनने को नहीं मिलेगी कि नगर पालिका ने साँड की सुध नहीं ली।

नगर पालिका भी क्या करे! सरकार ने गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए तो विभिन्न मदों में बजट दे रखा है ; लेकिन इन साँडों के लिए कोई बजट है ही नहीं। तो खर्च कैसे करें? साँडों के लिए न कोई यूनियन है, न चुनावी वादों में इनका नाम लिया जाता है। कई बार नेताओं की रैली में ये घुसकर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते हैं; लेकिन नेताजी इसे रैली की सुरक्षा व्यवस्था में हुई लापरवाही बताते हुए विरोधी पार्टी की मिलीभगत पर ठीकरा फोड़ देते हैं और इसे एक और चुनावी मुद्दा बना लेते हैं।

बरसात में जब जमीन गीली हो जाती है, तो ये साँड सूखी जमीन की तलाश में  बीच सड़क पर आश्रय लेने लगते हैं। लोग अपने वाहनों की चिल्लपों मचाते हुए, इनके अज्ञात मालिकों को गालियाँ देते हुए निकल जाते हैं। बेचारे साँड करें भी तो क्या? इनकी यही कुंठा कई बार उन्हें रोटी खिलाने वाले धर्मप्रेमी बुजुर्गों और महिलाओं पर भी निकल जाती है।

कारण? हर कोई अपनी-अपनी नजर से बताएगा। कुछ दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि "हड्डी जोड़ने वाले डॉक्टरों ने इन्हें खासतौर पर सब्जी मंडियों में छोड़ रखा है, ताकि ये हमारे लिए मरीज निर्माण करें।" खैर, जितने मुँह उतनी बातें ; लेकिन वजह साफ है। जो भी रोटी खिलाने जाता है, वह आशा करता है कि गाय को खिलाएगा। जब गाय नहीं मिलती, तो मजबूरी में साँड को खिलाना पड़ता है, और शायद यही बात उन्हें पसंद नहीं।

जलीकट्टू जैसे पारंपरिक त्योहारों की मान्यता एक बार कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर काफी बवाल मचा। व्हाट्सएप ने जमकर ज्ञान फॉरवर्ड किया। ट्विटर ने अपनी चहचहाहट से माहौल गर्माया। फेसबुक और यूट्यूब पर वीडियो की बाढ़ आ गई; लेकिन कुछ दिनों बाद जनता यह भूल गई कि आखिर लड़ाई किसके लिए लड़ी जा रही थी। इंसान बुल फाइट के जरिए अपनी ईगो की भूख शांत करने की फिराक में है और इसमें खुश है। बुल को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।

अब मुझे बस एक ही आसरा लगता है—उन कथा वाचकों का, जो आजकल समाज सुधारक, मोटिवेटर और प्रेरक का काम संभाले हुए हैं। इनके एक इशारे पर जनता दिन को रात कर देती है। अगर ये इनकी सुध लें और बुल की असलियत को उजागर करें—जो कि पुराणों में अच्छे से वर्णित है, जहाँ यह नंदी, भगवान शिव की सवारी है—तो इसे सार्वजनिक रूप से "नंदी" नाम से पुकारा जाए। कोई इसे बैल या साँड नहीं कहेगा। मुझे लगता है कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग भगवान शिव की इस सवारी को फिर नजरअंदाज नहीं करेंगे। इनके लिए भी "नंदी आश्रम" खुलने लगेंगे।

कम से कम इन कथावाचकों से अनुरोध है कि इस मामले की गंभीरता को पहचानें और अपने चढ़ावे में से कुछ अंश इन नंदियों के कल्याणार्थ अलग रखकर एक अच्छी शुरुआत करें। ■

मेल आईडी: drmukeshaseemit@gmail.com


Dec 1, 2024

व्यंग्यः मुझे भी वायरल होना है

 - डॉ. मुकेश असीमित

मैं परेशान, थका-हारा देवाधिदेव, पतिदेव, अभी बिस्तर पर उल्टे मुँह पड़ा ही था कि न जाने कहाँ से नींद ने मुझे आगोश में ले लिया और मुझे सपना भी आया। जी हाँ, वैसे तो नींद के खर्राटों की आवाज़ से डरकर सपने पास आते ही नहीं, जब घरवाले पास नहीं आते तो सपनों की क्या मजाल। खैर, सपना भी अच्छा था, हकीकत से कोई ताल्लुक नहीं रखता था। मैं सेलिब्रिटी बन गया था, जी हाँ, एक बहुत बड़ी सेलिब्रिटी। रातों-रात स्टार बनने वाली सेलिब्रिटी, अख़बार के मुख पृष्ठ पर छपने वाली सेलिब्रिटी, चमचमाती गाड़ी के खुले दरवाजे से सटकर पोज़ देने वाली सेलिब्रिटी, मैगज़ीन के पेज थ्री में छपने वाली सेलिब्रिटी, पपराज़ी की शिकार सेलिब्रिटी। जी हाँ, मेरा एक शॉर्ट वीडियो, जिसे रील कहते हैं, वायरल हो गया। यह रील भी कोई मेरी तुच्छ बुद्धि से निकले हुए ज्ञान चक्षुओं को खोलने वाला प्रेरक वीडियो नहीं था, न ही मेरे चिकित्सा ज्ञान से लाभान्वित करने वाला था। वह तो मेरी कहीं दबकर रह गई नृत्य कला प्रतिभा का भोंडा प्रदर्शन था। यह मेरी ससुरालवालों की शादी में, साली की मनुहार भरे अनुनय-विनय के कारण, अपने आपको रोक नहीं पाने का नतीजा था, जिसे श्रीमती जी ने सोशल मीडिया पर डाल दिया। और जिसे दर्शकों ने जमकर देखा। वीडियो पर 1 मिलियन का करिश्माई लाइक आ चुका था। मेरे पास 1 करोड़ का चेक भी आ गया था, जो मैंने हाथ में ले रखा था। 

मेरे घरवाले मेरे आगे-पीछे नाच रहे थे। पहली बार सभी घरवालों को मेरे आगे-पीछे नाचते देख रहा था। शायद पहली बार उन्हें लगा कि मैं, एक नाकारा निकम्मा सा आलसी जीव, भी परिवार को कुछ खुशियाँ दे सकता हूँ। चलो, उन्हें कुछ तो मुझमें खूबी नज़र आई जो उन्हें खुशियाँ दे सकती थी। बेटे के हाथ में कोई ऑटो मैगज़ीन थी, जिसमें कम से कम 10 मॉडलों की श्रंखला में बड़ी गाड़ियों का चयन कर रखा था। श्रीमती जी की बरसों की नौलखा हार की चाहत पूरी होने की चमक उसकी आँखों में थी। 

नौलखा हार की चाहत तो शादी के पहले साल से ही थी, लेकिन महंगाई की मार और मेरे बार-बार के इनकार ने इस नौलखा हार को सिर्फ नाम का नौलखा और हकीकत में 50 लाख का कर दिया था। अब तो श्रीमती जी ने भी कहना बंद कर दिया था। मुझे भी विश्वास नहीं हुआ कि मेरे दो-चार कमर मटकाने वाले स्टेप लोगों को इतने पसंद आ जाएँगे। सच पूछो, तो मारे खुशी के अब खुलकर मेरी प्रतिभा खुली सांस लेने लगी, मतलब कि नाचने लगा। मुझे नाचते देख बीबी बोली, "रुको, रील बनाने दो।" यानी कि अब मेरे नृत्य का इस प्रकार का मोनेटाइजेशन देखकर सभी बड़े खुश थे।

यूँ तो जब से होश सँभाला, तब से एक ही हसरत थी- फेमस होना, सेलिब्रिटी बनना। इसके लिए जो जतन मेरी तंगहाली और मुफलिसी में मैं कर सकता था, वे किए। यानी कि सपने तो देख ही सकता था, तो खूब सपने देखे। कभी फिल्मों का हीरो बना, फिल्मों में डायलॉग डिलीवरी देखते ही बनती थी। ये बात और है कि मेरी इस कलाकारी को देखने वाला मैं ही था। कार रेसिंग, सिंगिंग, इंस्ट्रुमेंट प्लेइंग, यानी कि हर अव्वल दर्जे के काम जो पेज थ्री की सेलिब्रिटी भरी दुनिया में होते हैं, वे किए। पेज थ्री की दुनिया में क्या होता है, वह तो वैसे भी हकीकत हो जानी थी। तो कभी रॉक स्टार बना, कभी हीरो तो कभी क्रिकेट का धोनी। यूँ तो कभी भी बैट के हाथ नहीं लगाया, या यूँ कहिए किसी ने बैट को हाथ लगाने ही नहीं दिया। बचपन में क्रिकेट में मुझे बस एक ही काम मिलता था- गेंद जो पाले से बाहर चली जाती, उन्हें दौड़-दौड़कर लाना और बॉलर को पकड़ाना। लेकिन हकीकत में जो क्रिकेट के सहायक प्लेयर के रूप में पानी पहुँचाने का काम करते थे, वही करते रहे। लेकिन सपनों में हमेशा धोनी जैसे ही बनते थे। अब जैसे-जैसे समय ने करवट ली, सपने भी बदलने लगे।

कॉलेज के समय में हमें सपने आने लगे कि कॉलेज की सारी लड़कियाँ हम पर मर रही हैं। और इतनी मर रही हैं कि देवानंद स्टाइल में हम गर्ल्स हॉस्टल के बाहर चहल-कदमी कर रहे हैं। गोलगप्पे की ठेली पर चाय पीने के लिए तो हॉस्टल की छत से लड़कियाँ कूद रही हैं हम पर मरने के लिए। सपनों में कई बार हम गिरफ्तार भी हुए, इतनी सारी लड़कियों को ‘मारने’ के इल्जाम में। लेकिन हकीकत में जो बने वह तो हमने सपने में देखना तो दूर, सोचा ही नहीं था- डॉक्टर, वो भी हड्डियों का। मुझे याद है करौली के हॉस्पिटल में, एक बार हम दादाजी जो कि वहाँ भर्ती थे, पापा के साथ उँगली पकड़ते हुए पहुँचे थे। वहाँ पास ही कटे हुए प्लास्टर का एक ढेर पड़ा था, उसमें उन प्लास्टरों के हाथ-पैर देखकर हमारे हाथ-पैर फूल गए। हम डर के भागे कि अब कभी हॉस्पिटल के दर्शन नहीं करेंगे। लेकिन नियति को जो मंजूर होता है, वही होता है।

खैर, शादी हो गई। उसके बाद तो हकीकत की सच्चाई तले सारे सपने ऐसे दबे कि अब तो सपने भी घुट-घुट कर आते हैं। सपनों की जगह अब खर्राटों ने ले ली है ; लेकिन कभी-कभी सपने भी फड़फड़ाकर बगावत स्वरूप आ ही जाते हैं। खैर,आज का सपना खास है। मेरे लिए एक्स्ट्रा कमाई का एक जरिया लेकर आया है। डॉक्टरी चले तो ठीक, नहीं तो रील बनाने लगूँ। आजकल की हर उम्र की पीढ़ी, गरीब-अमीर, गाँव-देहात, शहर सभी इसे अपना मुख्य धंधा बना चुके हैं। धंधा कभी गंदा नहीं होता, इसलिए रील बनाई जा रही है। इसके लिए लोगों ने अश्लीलता और भोंडेपन की चरम सीमा को भी लाँघ दिया है। सेक्स और कामुकता, जो कभी हिंदी फिल्मों की बी-ग्रेड फिल्मों तक सीमित थी और पर्दे तक सीमित थी, अब पर्दे से बाहर आ गई है। लोगों के अँगूठे के इशारे पर आ गई है। हर जगह एक ही दुहाई- बस वीडियो वायरल हो जाए। वीडियो वायरल करने के नुस्खे परोसने के नाम पर रील बनाकर लोग रीलों को वायरल करना चाहते हैं। मजेदार बात यह है कि वीडियो कैसे वायरल की जाए इसके नुस्खे बताने वाले रील ज्यादा वायरल हो रहे हैं। नुस्खे अपनाने वाली आत्माएँ अभी भी अपने वीडियो के वायरल होने की गुहार लगा रही हैं।

पत्नियों ने पतियों को रील बनाने में लगा रखा है। वह बेचारा अपना ऑफिस, काम-धंधा छोड़कर बस बीवी की रील बनाए जा रहा है। कहा बीवी पतिदेव की रील बनाती थी, उसे छटी का दूध याद दिलाती थी, अब उल्टा हो गया है। सास-बहू में अब नोक-झोंक नहीं, कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, सभी मिलकर रील बना रहे हैं। मुझे तो लगता है सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। रील बनाने वालों को प्रोत्साहित करे, बेरोजगारी की समस्या हल हो जाएगी। पति-पत्नी, सास-बहू की नोक-झोंक खत्म, लोकतंत्र में 'अच्छे दिन आ गए हैं' का फील-गुड वाला अहसास। बस देश की जनता को रील बनाने में लगा दो। सरकार विशेष सब्सिडी इन्हें दे। इनके लिए स्पेशल डेटा पैकेज उपलब्ध कराए। जगह-जगह सड़कों पर रील स्टूडियो खुलवाए। कहाँ फ्री का डेटा! यही नहीं, हर नागरिक को दिन के चार घंटे रील देखने में स्पेंड करना आवश्यक किया जाए। रील देखेंगे नहीं तो वायरल कैसे होगी? वायरल नहीं होगी तो रील का बुखार कैसे चढ़ेगा? सच ही तो है, रील का जब तक वायरल देश की जड़ों में नहीं घुसेगा, यह बुखार नहीं चढ़ेगा। एक बार बुखार चढ़ जाएगा तो देह की सभी समस्याएँ चुटकियों में हल हो जाएँगी। 

अब देखो न, बेचारे रील बनाने वाले क्या-क्या जतन नहीं करते। कोई अपनी माँ-बाप की अर्थी को कंधा देते वक्त रील बना रहा है, कोई पड़ोसी के घर हुई मारपीट, लूट, हत्या की रील। कोई अपनी डूबती हुई अर्थी की रील बना रहा है, तो कोई ट्रेन से कूदकर आत्महत्या करने जा रहे अपने साथी की रील। कितना असंवेदनशील होना पड़ता है, अपने दिल को पत्थर जैसा बनाना पड़ता है तब कहीं जाकर कोई ऐसी रील बनती है जो वायरल हो सके। मुझे तो इन रील बनाने वालों को झुककर सलाम करना चाह रहा हूँ।

इधर जैसे ही मेरी श्रीमती जी ने रील बनानी शुरू की, मेरी कमर कुछ ज्यादा ही जोश में मटकने लगी। तभी पास में सो रही श्रीमती जी ने झिंझोड़कर मुझे उठाया, "क्या कर रहे हो? क्यों कमर हिलाए जा रहे हो?" मैं हड़बड़ाकर उठा, अपनी चादर वापस खींची और पैरों को उसमें समेटकर सो गया ; क्योंकि हकीकत ने वापस अपना आधिपत्य जमा लिया था। और मुझे "जितनी चादर हो उतने पैर पसारिए" की हिदायत देकर वापस अपनी चिर-परिचित नथुने फुलाकर खर्राटे वाली नींद लेने को प्रोत्साहित किया।

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