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Jul 1, 2025

व्यंग्यः युद्ध और बुद्ध के बीच ट्रेड युद्ध की तीसरी टाँग

  - बी. एल. आच्छा

   युद्ध के दौरान महान  चिन्तकों के चेहरे पिघले-पिघले नजर आते हैं। जैसे सूरज की तीखी झुलसाती किरणों से  रुआँसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं। उनकी चतुर समाधि में भूकम्प आ गया है। कितनी कविताएँ। कितनी संवेदनाएँ। बच्चों के मासूम चेहरे। अपने दर्शन की विडियो- क्रांति। सभ्यता का विनाश । पूरा     मानवतावादी चैप्टर तैरने लगता है। तब वे बुद्ध की बात करते हैं। सो भी हँसते हुए बुद्ध की नहीं। उनकी अश्रु- लहरियाँ सीमा पार जाकर वैश्विक चीत्कार बन जाती हैं।

        पर जब हमला हो ही गया हो, तो चौबीस घंटे में उत्तर माँगते हैं। कब दोगे जवाब? क्या इतनी भी तैयारी नहीं है? इतनी बेचैनियाँ कि सत्ताएँ व्यंग्यों-तंजों में नागफनी चुभन का शिकार बना दी जाती हैं। सोच ही नहीं पाते कि युद्ध को कितने कोण चाहिए? कितने गलियारों से आती विरोधी हवाओं को भेदने का चक्रव्यूह रचना पड़‌ता है। कैसी मार ?  कितनी मार ? कौन- कौन पाले में  आएगा? कौन छुपी मदद पहुँचाएगा? युद्ध का अर्थशास्त्र कितना होगा? अजीब- सा है, जब युद्ध होता है, तो शांति चाहिए। हमले हो जाएँ, तो जवाब देने की मिसाइली तल्खी।

        पर दो की लड़ाई में तीसरा अपना काम साधता है। यह तीसरी टाँग कभी दृश्य, कभी अदृश्य होती है। पिटते-मरते से क्या लिया जा सकता है? भाइयों की तकलीफ में कोई फूटी कौड़ी निकालते भी देर लगाता है; मगर कूटनीति  में कंगाली-फटेहाली में भी मित्रता के थेगले दौड़े चले आते हैं। यही देश-विदेश की कूटनीति की अपनी नागफनियाँ हैं। सुहानी लगती हैं, जब कोई  किसी मुल्क के लिए युद्ध का दहेज ले आता है, फिर अपना कब्जा जमाते चले जाता है।

   मुझे ज्योतिष का ज्ञान  नहीं; पर डर और विश्वास गहरा है। युद्ध में लड़ते तो दो ही देश है, पर तीसरे घर में बैठा शनि अपना काम घर बैठे ही कर जाता है और सातवें का मंगल अपना पराक्रम दिखा जाता है। यों राहु और केतु के अदृश्य खेल एक देश को हथियारों के जखीरे दे जाते हैं। पिटता हुआ भी इन विदेशी जखीरों से खेलता रहता हैं।  तीसरे घर का स्वामी ग्रह हथियारों का व्यापार कर जाता है। युद्ध भूमि पर लड़ता हुआ देश पिट भी जाता है और हथियारों की देनदारी से गुलाम बनता चला  जाता है। जिसको मारना होता है, उसे- इसे वे खिलाते-पिलाते भी अच्छा हैं। ऐसे में लगातार दुहते जाना, युद्धों का बाजार - लाभ बन जाता है।

       युद्ध और बुद्ध के बीच ये  शांति के मुखौटे कभी नोबेल पुरस्कार की सुर्खी बनने लगते हैं; पर भीतर- भीतर में ट्रेड- कूटनीति का सूचकांक शूट+ अप करवा देते हैं। उनको जलते-मरते  पंचलकड़ी ही तो देनी है; पर वे उस दशा तक पहुँचने नहीं देते। दिलासे दे जाते हैं। सहायता को मानववादी मुखौटा लगाकर कुश्ती के  पह‌लवान को फिर खड़ा करते हैं। पिटेगा, तो फिर सहायता शर्तों की हथकड़ी में। ले जाओ कर्जा हम से, दुनिया के फंडों से। यह अदृश्य टाँग न युद्ध देखती है, न बुद्ध। यदि  जातक  कथाओं वाले बुद्ध  होते, तो बुद्धत्व  समझ पाते; पर वे  युद्ध  और बुद्ध  से ज्यादा  सांसारिक प्रबुद्ध हैं। व्यापार युद्ध में छलांग की तीसरी टाँग तो अंतरराष्ट्रीय महाजनी संस्कृति का नाग‌फनिया ऋण- जाल है। हरी- हरी काई जैसा कार्पेट‌नुमा सत्कार पर सदा- सदा की बिछलन।

     अब कोई बुलाए न बुलाए, पर कुछ निछावर करते रहो। मौके पर कूदमकूद लगा जाओ। मिसाइलें भी दाग दो। सौदा हो जाए, तो घोर विरोधी से भी गलबहियाँ कर लो। मिलती गलबहियाँ  हैं; पर नजर  जियो- पॉलिटिक्स पर। पराई धरती  से कैसे कूटनीति साधी जा सकती है। दोस्ती भी कोई निर्मल मन की रागिनी नहीं है। मौका पड़ने पर छल- छद्‌म से उसी देश को युद्ध- राग में झोंक देते हैं। अपनी हथेलियाँ पाक- साफ बताते  हथियारों की डील कर जाते हैं।

      इन दिनों आँखें उतना काम नहीं करतीं। जैसे डॉक्टर नाड़ी नहीं देखता, जाँचों से  नुस्खे लिखता है। ऐसे ही परमशक्तियों के पास सेटेलाइट आँखें हैं। उस देश की धरती में छुपे खजाने को देखने वाली आँख है। तकनीक के हाथ हैं। धरती में छुपे मूल्यवान खनिजों को अपना बनाकर पराई धरती से अपना व्यापार चलाने की व्यापार - फनियाँ  हैं।  खिलाने और खरीदने के व्यापार युद्ध हैं। युद्ध- राग भी, शांति का बुद्ध- राग  भी। पर इन रंगीन  रेपरों में छुपा व्यापार युद्ध का प्रबुद्ध- राग हैं। जैसे छह अँगुलियों वाला या पीठ पर जीभ वाला नन्दी अलग ही होता है, वैसे  ही  युद्ध और बुद्ध  के फलसफे में तीसरी टाँग वाले प्रबुद्ध कुछ अलग ही होते हैं।

सम्पर्कः फ्लैट नं-701 टॉवर-27, नॉर्थ टाउन अपार्टमेंट, स्टीफेंशन रोड (बिन्नी मिल्स) पेरंबूर चेन्नई (तमिलनाडु)-600012, मो-9425083335


Apr 1, 2024

. व्यंग्यः ट्रेम्पोलीन में कूद झमाझम

 - बी. एल. आच्छा

मजेदार होता है ट्रेम्पोलिन | बड़े होने पर तो कूदना शरमा देता है। मगर शादी में यह महाखिलौना मुफ्त झमाझम कूद का आनन्दोत्सव बन जाता है। उसके भीतर का स्पंज इतना उचकाता है,  गिराता है और उठाता है कि बच्चों की रग-रग खिल जाती है। सोशल मीडिया के ट्रेम्पोलिन सरीखे प्लेटफार्म पर कुछ ऐसा ही, मगर कई किलोवाट का स्पंज होता है। खींचता है, उचकाता है, बहुत कुछ बटोर लाता है। अलबत्ता मीडिया का तहखाना विज्ञापनों के बाजार की कैश जुगत से ही इसे तौलता है। ट्विटर की चिड़िया आकाश नपवा देती है- लड़न्त-भिड़न्त चोंचों का शाब्दिक कोलाहल। टी वी टी टुट् टुट्, चल हुट | वाट्सएप तो प्रकोष्ठ- सा टुच्चक टुच्चक गेंदबाजी की तरह।

असली ट्रेम्पोलिन तो फेसबुक है। चाहे जितना कूदो। वर्तमान में कुदाओ । इतिहास की स्मृतियों को बार-बार कुदाओ। घर-भर को कुदाओ। कभी थकने का नाम ही नहीं लेता। यह स्पंज जितना गहरे धँसाता है, उतना ही कंचनजंघा के शिखर पर भी पहुँचा देता है। कुछ छपा नहीं कि मैं झट फेसबुक पर अपलोड कर देता हूँ- 'आज मैं यहाँ, आज मैं वहाँ।' फिर फटी आँखों से अपनी कूद को लाइक्स-कमेंट्स से निहारता- तौलता रहता हूँ। सुबह सुबह के अनिवार्य कर्म से भी अधिक अनिवार्य  मुक्तिदायक कर्म | और रिश्ते ऐसे कि इधर पोस्ट , उधर से लाइक्स | कायमचूर्ण की तरह पाचक- बहुत खूब ।बहुत बढ़िया | क्या बात है! और कमेंट लंबा आ जाए तो तकदीर खुली । फिर  रिटर्न  गिफ्ट में धन्यवाद का  सिलसिला टोटल लाइक्स का प्रसाद बन जाता है।

मजहब और इलाकों से निरपेक्ष दोस्ती का अनजाना बिनअर्थशास्त्र का समाजशास्त्र फेसबुकिया लाइक्स में कुलांचे भरता है।' कामायनी' 'में' क का प्रयोग फेसबुकिया बधाइयों की संख्या से कम पड़ जाएगा। महाकाव्यों-महाउपन्यासों को बधाई के पेस्ट  से खड़े खड़े निपटा देता है। इधर मेरे मित्र कह रहे हैं -" कितनों को विनम्र श्रद्धांजलि देते जाओगे?"मैने कहा- "किसी भी शवयात्रा में जाते हैं तो तीन घंटे पूरे ! मगर फेसबुकिया रिश्तों में शवऔर श्मशान के जलते चित्रों के साथ इतनी देर में दो चार सौ को निपटाया जा सकता है। न नहाना, न धोना ।विनम्र श्रद्धांजलि  के साथ केवल ऊपर पहुँचाना।

 इधर सेटेलाइट से मेरे दिवंगत पिता मैसेज दे रहे हैं- "कभी हमें भी याद कर लिया कर बेटे !बीस-तीस साल पुराने मित्र-पिताजियों और माताजियों को नमन करते जा रहे हो तो हम भी.... ?" इधर मेरे साला- श्री व्यंग्यात्मक फरमान जारी कर रहे हैं- "हिमाचल- मेघालय, टोरंटो डच-गुयाना के अनजाने मित्रों के पड़पोतों को बधाई दिए जा रहे हो और मेरे बेटे के लिए एक भी पोस्ट नहीं ? "धन्य हैं वे लोग , जो फेसबुकिया नाट्य मंचन पर अपने दाम्पत्य की कूटनीति को साध लेते हैं। धन्य हैं वे, जो संपादक जी को हृदयतल से आभार व्यक्त करते हैं। उन्होंने संपादक जी का हृदयतल छू लिया, हम तो हृदय- नली में भी नहीं अटक पाए।

मुझे भी देखा-देखी रोग लग गया है। शादी के बाद जिस एल्बम को निहारा तक नहीं, उसके पुराने फोटो 'इतिहास में आज' की तरह पोस्ट करने के लिए फेसबुक के हेलीपेड पर खड़ा हूँ।  किसी की रचना छपी हो तो तड़ से लिख देता हूँ- "याद आया, 1984 में हमारी भी इसी विषय पर रचना छपी थी। और पीलीपट्ट कतरन चिपका दी। उस जमाने का बिन फेसबुकिया यौवन इस चौथेपन में ब्याज सहित झमाझम। नेताओं के तो ट्रेम्पोलिन ही दस-बीस । इस पार्टी के ट्रेम्पोलिन से दूसरी -छठी के। पर बचपन की तरह इस ट्रेम्पोलिन पर पोतों-पड़पोतों सहित और इतिहास बनी पीली कतरनों- अभिनंदनों के साथ कूदने को हर सुबह मैं फेसबुक हेलीपैड पर तैयार।

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Sep 1, 2023

व्यंग्यः ऐसी बानी बोलिए, जमकर झगड़ा होय

  - बी. एल. आच्छा

चुनावी सभा में खाली कुर्सियाँ देखकर उम्मीदवार जी दुखी हो गये। हथेली में दूसरे हाथ की मुट्ठी ठोकते हुए कहे जा रहे थे-"क्या करूँ ? कैसे भीड़ बटोरूँ?" उदास चेहरे और एकान्त को देखकर पेड़ से लटका बेताल उनकी लोकतंत्रिया पीठ पर आकर चिपक गया। उम्मीदवार जी भौंचक । मुस्कुराते  हुए बेताल बोला -"तुम्हारे उदास चेहरे को देखकर मन भर आया। मैं तुमसे न सवाल पूछूँगा, न सिर काटने की शर्त । इस बार सवाल तुम करो, उत्तर मै दूँगा।"     

 उम्मीदवार ने पूछा - "ऐसा क्या बोलूं कि वोटर मेरा कायल हो जाए !" बेताल ने कहा-" अरे यह तो पहले से ही कहा हुआ है- ऐसी बिनी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को सीतल करे आपहुँ सीतल होय।"

 उम्मीदवार जी को खुन्नाट हुई। बोले-  इतनी ठंडी बानी से तो वोटर की उँगली पर बर्फ ही जम जाएगी। ठंडी फिल्म, ठंडे बोल । बॉक्स ऑफिस और बेलट बॉक्स दोनों जम जाएँगे। अगरचे वोटर शीतल हुआ तो अपुन तो माइनस टेंपरेचर में।" बेताल ने कहा-" समझदार हो गये हो। जमाने की रंगत में पगे हुए। इस जमाने के शब्दों की टकसाल में उल्टा-पुल्टा, गड्डमगड्डा लट्ठमलठ्ठा ही बजते हैं। तो सुनो, इस शीतल वाणी को  प्रेशर कूकर या माइक्रोवेव डाल दो - " ऐसी बानी बोलिए जमकर झगड़ा होय ।"

 उम्मीदवार की बाँछें खिल गयी । बोला 'मन तो मेरा भी होता है कि अपनी जबान निकालकर सिर पर लगा दूँ।" बेताल ने कहा-'अरे तुम तो शब्दों को ऐसा फेंको जैसे भाड़ में सिककर चना फटकर उछल जाता है। फिर  बोलकर चुप कर जाओ । काँव -काँव  चलती रहेगी। चल छैंया छैंया की तरह चल चैन लिया- चैन लिया फर्राटे भरते हुए। अखबार- अखबार सुर्ख़ियाँ बन जाएँगी। "

"मगर कभी ये आड़े- तिरछे शब्द पत्थर की तरह मुझ पर आने लगे, तो  नोटिस आने लगे तो ?" उम्मीदवार ने कहा। बेताल बोला- औरों को गर्माते अपने को गर्म करो।  अभिव्यक्ति की आजादी में अपने रंग भरो ।फिर भी कुछ रह जाए तो माफी दर्ज करो।" उम्मीदवार ने कहा "वाह बेताल ! कितनी माकूल सलाह । इन दिनों विडियो, ऑडियो, म्यूजिक और नारे भी जबरदस्त-चलन में हैं। क्या करूँ ?" बेताल बोला- हाँ, जमाने को समझो। तुम्हारी जबान से बड़ी ऑनलाइन जबान है। एक बार जबान हिला दो, फिर वह लॉरी में लगे माइक ही तरह बोलती- दिखती रहेगी। तुम भी गाने बनवाओ-" का.. बा.. ।" उत्तर में " का.. का... बा"। दर्जनों विडियो चलवाओ। फिर भी न बने तो राग मुफ्तिया को सप्तम सुर में बजवाओ।"

  उम्मीदवार ने पूछा-"ये राग मुफ्तिया क्या है?" बेताल हँस पड़ा।बोला- "एजेण्डा बनाओ, जो मुफ्त में दिया जा सकता है। फिर देखो, मुफ्त लाइनिया होइ। अब उनको  मिसाइल- सुपर मिसाइल मत गिनाओ। न गलवान घाटी।  शब्दोस मिसाइल से ही इतना धुआँ फैल जाए कि सामने वाला धुआँ- धुआँ हो जाए। शब्दवेधी बाण तन्नाट।गीतों की कजरिया वोट की लय साधने लगे।नारे खनकने लगें।तुम तो पूँछ पर पैर रख दो। बैठे हुए जबानी घोड़े दौड़ने लगेंगे। छुकछुकिया जबानों की बकरोली खुदबखुद पस्त हो जाएगी।" बेताल ने फिर कहा-"अभी इतना ही। लोकतंत्र का नया चेहरा आएगा,तो नए पाठ समझने आ जाना।" और बेताल फिर डाल पर लटक गया।

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Oct 3, 2021

व्यंग्य- घटनाओं की सनसनी

- बी. एल. आच्छा

      इलेक्ट्रॉनिक चैनल के मुख्य संपादक से मैंने ऐसे ही पूछ लिया-आपने मिडल ईस्ट में राकेटों की वर्षा खूब दिखाईपर आप आकाशगंगा में छिटकते-  टूटते- वर्षा से बरसते सितारों को खबर क्यों नहीं बनातेकभी ट्यूलिप के खिलते फूलों और कचनार की कलियों के सौंदर्य से दर्शकों को क्यों नहीं महकाते?’ वे हँसने लगे- यह सब तो कविता की दुनिया के सितारे हैं‌ । चैनल कभी एक झलक  दे भी जाए तो न्यूज़ हंट नहीं बनते।

       मैंने फिर सवाल किया-पर जब शनि और मंगल आमनेसामने भयानक ग्रह योग बनाते हैंतब तो आप सुबह से शाम ....।

ठहाका लगाते वे बोले- हम लोगों के मनोविज्ञान को समाचारों का बाजार क्यों न बनाएँ ? खगोलीय घटना है। भय के मनोविज्ञान से सभी को सचेत तो करना होगा ना?’

मेरा सवाल फिर जोर मारने लगा-इन घटनाओं को दिखाते समय कुछ ऐसे दृश्य और प्रभाव खड़े कर देते हैं कि....‌। वे बोले-अरे भाईचैनल की दुनिया कोई किसी कवि की अनुभूति तो है नहीं कि किताब में छपकर आ जाए और परम तुष्टि‌। अब तो किताब छपने से पहले ही कवर पेज की नुमाइश से दर्शकों की आँखों की रौशनी पहले बढ़ाते हैं। लाइक और कमेंट्स में ।

मैंने कहा-आखिर खुद कवि ही अपनी किताब की सोशल मीडिया पर नहीं नचाएगा तो बिकेगी कैसे?’

         चेहरे की मुस्कान और जबान के समीकरण में वे बोले-जनाब! कितना जरूरी है! अब आत्मा की आवाज की जगह बॉडी लैंग्वेज कितनी असरदार होती हैसमाचार वाचक-वाचिका की केश- राशि के साथ उँगलियों- हथेलियों के साथ नाचती हुई आँखों से भी अपना बाजार बनता है‌।

मैंने कहा- जरूरी है।

वे बोले-यही तो मैं कह रहा हूँ । संतों की कथाएँ  कितनी सादी होती थीं। जब से सारे वाद्ययंत्र गायकी के साथ आ जाते हैं , तो बात ही कुछ और! कितने सादे से लगते थे ज्योतिषी। अब उनके फेशियलरत्न- हार ,ज्योतिषाना वेशभूषा के कट्स देखिए। और दूर क्यों जाएँ ? गरीबी और मजदूरी पर कविता सुनानेवाला कवि भी कुछ ऐसे- वैसे ही नहीं आता। लकदक दिखकर ही भूख की व्यथा गा जाता है।

       मैंने कहा-आपने तो सारे  चैनल को हाथहिलाऊ मुद्राओं का थिएटर बना दिया हैमगर आजकल युद्धों के समाचारों में भी आपके वीडियो राग कोमल गांधार और भीमपलासी को छोड़कर मालकौंस को भी युद्धकौंस बनाते जा रहे हैं ।

वे बोले-अरे भाई आप तो महासागर में छुपी परमाणु पनडुब्बी की तरह मुझसे सारे छुपे अंदाज उगलवा रहे हैं ।

मैंने कहा- मन में सवाल तो आते हैं। अमेरिकी बेड़ा प्रशांत महासागर में पहुँचने के लिए लहरों को चीरना शुरू ही करता  है कि राग मालकौंस युद्धकौंस में आग उगलने लगता है‌ । मिसाइलें सप्तम आलाप के बजाय  इक्कीसवें सुर में लंबे समय तक हूँ ..ऊँ... ऊँ ...ऊँ अलापने लगती है। राग हिंडोल भी फीका पड़ जाता है। कई कई टैंकों के साथ राग टेंकेश्वरी का आलाप। परमाणु युद्ध की आशंकाओं में आकाश में काले स्याह बादलों के बीच राग ज्वालेश्वरी की टंकार बजने लगती है। सुपर सोनिक का घड़घड़ाट राग। कभी राग राफैली। दुनिया भर के धड़ामधड़ूम रागों का महानाद। और थोड़ी सी सफलता मिले तो राग जयजयवंती ।

     हँसते हुए मेरी बात काट दी-अरे आप तो हमारे लिए नए संगीत राग रच रहे हैं भाई ! बहुत खूब ।आप भी जानते हैं कि महाभारत में युद्ध की शस्त्रलीला ने कितना दर्शकों का कितना बड़ा बाजार बना दिया। चलोवो तो ऐतिहासिक ग्रंथ था आस्था और न्याय का ।पर हमारे पास तो बाजार है। आप कितना ही कोसें, टीआरपी को लेकर ।लेकिन हवाओं में सनसनी न हो और टी वी के दंगलों में  राग गुत्थमगुत्था न हो तो दर्शक आएगा ही क्यों ?’

मैंने भी तीर मार दिया –फिर तो इन दंगलों में भी जब वक्ता का सुर पंचम -सप्तम में हो तो तबले पर थापहद से बाहर हो तो नगाड़े पर डंका और जब बात हाथापाई पर आ जाए तो राग तुरही ....!

वे बोले –भाईजरा व्यंगैले हो रहे होथोड़ा ...!

  मैंने कहा-चलिए छोड़िए मेरा अंतिम सवाल है । जब घटनाओं की सनसनी नहीं होती तो चैनलों के उठाव के लिए क्या .‌‌..।

वे बोले- आजकल यह दिक्कत नहीं होती । कहीं न कहीं से चैनलों की भूख को बढ़िया सा परोसा मिल ही जाता है ।


सम्पर्कः  फ्लैटनं-701, टॉवर-27, नॉर्थ टाउन अपार्टमेंटस्टीफेंशन रोड (बिन्नी मिल्स), पेरंबूर, चेन्नई (तमिलनाडु)-600012, मो. 

Apr 5, 2021

व्यंग्यः हमरा लोकतंत्र खेला हौबे

-  बी. एल. आच्छा

  चुनाव भी लोकतांत्रिक खेला है। जब भी होता हैनया-नया खेला हुइबे। लोकतांत्रिक खेला -बुद्धि इतनी चतुर कि तुम डाल- डाल हम पात -पात को भी धता बता देती है। हर बार नए पंगे। नए दाँव। बुद्धि के तीर। शब्दों की खिलंदड़ी। नए नए फंडे। वह जमाना भी था जब मत पेटियां छीन ली जाती थीं। लोग मतपत्रों पर सीरियल से ठप्पा लगाकर मतपेटी में ठूँस देते थे। गीली स्याही के इंप्रिंट  न्यायालयों में अकथ कहानी कहते जीत को खारिज कर जाते थे। अब  ईवीएम का फंडा। जीते तो मशीन सही, हारे तो ईवीएम को फाँसी।

   पर चुनावी रण के सिपहसालार चाकू- छुरी जैसी बुद्धि से नहींशब्दों के मिसाइल हथियारों से भेद जाते हैं। कभी समान नाम और जाति वाले उम्मीदवारों की तलाश,  मतिभ्रम हो जाए मतदाताओं को।  तगड़ा उम्मीदवार हो तो बीमार  या नब्बेपार को चुनावी मुकुट पहना दें। संसारगमन कर गएतो चुनाव स्थगित।  

   चुनावों ने वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान पर भी दाँव चलाए। प्याज का चुनावी गणित आँसू और  पुलक का,हार और जीत का प्रतिमान। चुनाव चिह्न में गाय बैल भी जमेतो आस्थाओं के निचोड़ मतपत्रों की स्याही बने। किरसानी इलाके में हलधर वोट खींचता रहा। जेट और चंद्रयान के जमाने में साइकिल गरीबों की तरफदार। कभी सारी इंजीनियरिंग के बावजूद झाड़ू का राजधानीत्व कायम हुआ लुब्बेलुबाब यही कि प्रतीक वोट सहेजवा बनते गए। इतनी भयंकर तरक्की और ये आदिम प्रतीक। लगता है कि हुगली नदी गंगोत्री तक जा रही है।

    फिर आई वोटों को मुफ्तिया लीला का आविष्कार। दो रुपये किलो चावल। मुफ्त टीवी। कभी लैपटॉप। कभी साइकिलें। कभी कन्यादान के सामान। कभी सब्सिडी। कभी कर्ज माफी। कभी मुफ्त चिकित्सा। संकड़ी जेबवालों  की जबानें इतनी उदार कि चुनाव में हर चीज बाँटने को तैयार। सब कुछ लेते जाओमगर वोट देते जाओ। और गाँठ का लगता भी क्या है? अपनी कंपनी की बस से एक्सीडेंट हो जाए तो दो दो हजार। मगर सरकारी से हो जाए तो दो- दो लाख। वेतनमान की तरह रैलियों दुर्घटनाओं के लिए भी मृत्युमान निर्धारित होना चाहिए। अपनी पॉकेट से तो जा नहीं रहा।  सीधी सी बात-उसका तुझको देते क्या लागे मेरा ?’

   शब्दों का खेला भी खूब खैलाबे। चायवाला क्या कह दियाज्वारभाटा आ गया। कहनेवाले की तकदीर बिखर गई । लोग क्रिकेट की बॉल पर  छक्का लगा जाते हैं। किसी की जुबान से कोई शब्द अगले की किस्मत से फिसल  जाएफिर तो गुगली ही गुगली। कोई स्याही फेंक दें चेहरे परसहानुभूति का पूरा अखबार बिना शब्दों के छप जाता है। कोई पत्थर फेंक दें। नाक पर लग जाए तो बिना मास्क वाले दिनों में नाक की बड़ी पट्टी मतदान तक चुपके-चुपके वोट सहेजवा बन जाती है। अगर कोई नामीगिरामी स्वर्ग मार्ग पर चल देतो सहानुभूति की लहर चुनावी नैया पार करा देती है।

  टिकाऊ और बिकाऊ का चुनावी फंडा अपनी चाल चलता है। खुद के पाले में आ जाए , तो नेकी नेकी। दूसरे वाले में जाए तो बिकाऊ बिकाऊ। लोग असल गलवान घाटी की बात नहीं करते पर चुनाव में  अपनी तरह की घाटियाँ ईजाद कर लेते हैं। संविधान है , धाराएँ हैंप्रशासन के डंडे हैं , मगर चुनावों के दिमागी झंडे हर बार नए डंडो को तलाशते हैं। लग जाए चोट तो सहानुभूति की पट्टियाँ मतदान से पहले उतरने से इंकार कर देती हैं। युद्ध और प्रेम में नियम नहीं चलते। मगर चुनावी रण में नियमों को साधते गलियारे खेला हुईबे का लोकतंत्र मुखर कर जाते हैं ।

सम्पर्कः फ्लैट  -701  टावर-27, नॉर्थ टाउन अपार्टमेंट, पेरंबूरचेन्नई (टी एन), पिन-600012, मोबा-9425083335

Mar 8, 2020

रचना प्रकाशन के सोलह संस्कार

रचना प्रकाशन के सोलह संस्कार
-बी.एल.आच्छा          
रचना प्रसव पीड़ा का उपहार है। जीवंत है तो संस्कार होंगे ही। यह  मनुस्मृति नहीं, शास्रीय तर्ज पर रचना-प्रसूति के संस्कारों का नामकरण। पुराने हों या सोशल मीडिया के एल्बमी प्रसंस्करण हों। शास्त्रीय भाषा में बिना व्यंग्य -लक्षणा -व्यंजना के।
रचनाधान - लेखक के भीतर एक फ्लैश, ट्रांसफार्मर उड़ने की सी अंतर्ध्वनि,फड़कता बिंब और चेहरे की पुलक। जैसे  मितली के बाद अस्पताल से पॉजिटिव का संकेत।  भावगर्भ संस्कार -कई दिशाओं में परिंदे उड़ान भरने  लगते हैं ,चोंच में कुछ उड़ेल देते हैं; दर्शन और मसाले । शिराओं में झनझनाहट , सोते हुए जागते सपने। शब्दप्राशन संस्कार - अन्नप्राशन की तरह भाव का शब्दप्राशन। ये ही कला के तीन क्षण। भाव -संवेदना से शब्द -संवेदना की रचनाप्रक्रिया।
     प्रथम- पाठक -श्रवण संस्कार- पत्नी मित्र या किसी रचनाकार के समक्ष पाठ। सुनाते ही पूछ लेते हैं , मालवी मानुष की तरह-कैसे बने लड्डू -बाफले! पत्र-पत्रिकार्थ प्रेषण संस्कार -फेसबुक पर नये व्यंग्य के शुरुआती  सौ शब्द ... और संभव हो तो अनुबंधित पत्रिका का नाम या उपन्यास के दस हजार शब्द लिख लेने की सूचना। और रचना ई-मेल से  अनछपे रहने तक फिर फिर  ईमेल। गोष्ठी -सुनावन संस्कार- रचनाकार  द्वारा आतुरता से  टटकी- ताजी कली बता कर रचना पाठ और वाह वाह के लिए कातर नयन और श्रवण। आकाशवाणी -दूरदर्शन- प्रदर्शन संस्कार -आकाशवाणी केंद्र पर रिकॉर्डिंग के पहले चित्र खिंचवाकर  फेसबुक पर दुर्लभ अनिर्वचनीय क्षणों का फेसबुक पोस्टिंग। भूमिका लिखावन संस्कार - पुस्तक की भूमिका और फ्लैप किसी पुरस्काराना कदकाठी वाले, अकादमिक पुरुष , साहित्यिक राजनेता  या पहुँच वाले नामवर व्यक्तित्व के दो शब्द । पुस्तक-छपावन संस्कार- फेसबुक पर अनुबंध... बधाई ..बधाई, कवर ग्राफिक्स ...सुंदर ..सुंदर..., पुस्तक प्रकाशित ....वाह वा... बधाई.. बधाई। संतानोत्पत्ति का -सा बधावन संस्कार। विमोचन -लोकार्पण संस्कार- सदाबहार अतिथि से ,जो अखबार की सुर्खी बन जाए। नरमदिल समीक्षक, जो सूरजमुखी की तरह किताबमुखी-लेखकमुखी हो। अखबारों में सचित्र प्रकाशन के जुगाड़ । सोशल मीडिया पर इस  वैश्विक घटना का  ताबड़तोड़ सचित्र समाचार। जैसे चंद्रयान दो , धरती की कक्षा पार कर गया हो। कुछेक का मत  है-अनाम पाठक पढ़ ले तो स्वयमेव विमोचन । पर घोड़े पर बैठकर बिंदोली के बगैर  कैसी शादी ? समीक्षा- लिखावन संस्कार- अपने ही लक्ष्मीयुक्त रक्तचंदन से छपी पुस्तकों का पत्रिकाओं को  समीक्षार्थ प्रेषण। प्राप्त समीक्षा पुस्तक सहित इमेल। प्रकाशित होते ही फेसबुक पर।  बधाइयों की भ्रमर गुंजन। अर्ध-मूल्यपावन संस्कार- विमोचन के दिन आधे मूल्य पर पुस्तक- विक्रय, श्रोताओं के संकोच से जुड़ी विक्रय कला। बधाई पावन संस्कार- सोशल मीडिया पर , इंस्टाग्राम -फेसबुक व्हाट्सएप समूहों में चित्रात्मक रपट। प्रशंसा ,बधाई ग्रहण और सामूहिक या व्यक्तिशःआभार । इतनी कि गूगल भी बधाइयों से मितलाने लगे। पुस्तक पहुँचावन संस्कार - जैसे विवाह के बाद लड्डू घर -घर, वैसे ही किताबें मित्रों लेखकों को हाथों-हाथ या रजिस्टर्ड। कोर्स लगावन संस्कार- सधे लेखक और प्रकाशक द्वारा रचना को पाठ्यक्रम में लगाने की जुगाड़ -तकनीक। पुरस्कार हथियावन संस्कार - अकादमियों- संस्थानों, निजी प्रतिष्ठानों की विज्ञप्ति और प्रविष्टियाँ। पुरस्कार के लिए  कद-काठी वाले के साथ पर-जन्य यज्ञ। यों छोटी मोटी संस्थाओं  के पुरस्कारों पर चौकस नजर।
प्रिय पाठक! ये सोलह संस्कार अनुभवजन्य हैं। अंतिम भी नहीं। अलबत्ता रचना को अक्षर ब्रह्म मानते हुए पुरस्कार के बाद के संस्कारों को विराम दे दिया है। संस्कारों के नामकरण की भाषा संशोधनाधीन है।
सम्पर्कः  36 , क्लेमेंट्स रोड सरवना स्टोर्स के पीछेपुरुषवाकम् ,  चेन्नई (तमिलनाडु)- 600007, मोबा. 94 250 -83335  

Jun 11, 2018

हरी जबानों की व्यथा


हरी जबानों की व्यथा

-बी. एल .आच्छा
बूढ़ा तो नहीं हुआ हूँ
पर तुम मेरे बौने कद से
नाप रहे हो
मेरे जीवन का वैलेंटाइन ।

सड़क किनारे आते ही
मैं भी बन गया महानगर का पेड़
छाँग दी गईं थी डालें
काट दिया गया
बिजली के तारों का
अतिक्रमण करता
मेरा बढ़ता हुआ ऊँचा शीर्ष
सभ्यता के बुलडोजर से
कुछ कुछ दिनों में
ला दिया गया अपने बौनेपन में।

आज भी हुलस है
किसलय फूटते हैं आज भी
प्लाज्मा टपकता है
और गोंद की तरह
चिपक जाता है।
बासंती बहारों में
अब भी खिलते हैं फूल
कोयल -राग लिए
नई डालियों का आसन
कि श्रोता बन जाएँ शेष पाखी भी।

उलझती हैं पतंगे भी
डोरें देशी-विदेशी भी
पर उड़ते हुए धुएँ
और  पीलौंधी धूलों से
वैसा ही हो जाता हूँ
जैसे ढुलाई करते करते
सीमेंट का आदमी।

तंत्र और सभ्यता ने
पाट दी है मेरी जमीन
बेबसी है मेरी
पर लोकतंत्र की चीख में भी
कौन नहीं है बेबस
आधार कार्ड के बावजूद।

सपाट और सिक्स लेन
डामर और सीमेंट
इनके भीतर भी
फैलाता हूँ जड़ें
यही आस लिए
कि मेरी सघन डालें
कटती पिटती भी
देती रहेंगी छायाएँ
फूलों के मखमली रूप
नव पल्लव के सुकुमार रूप।
बटोहियों के लिए क्षण भर का विश्राम
पक्षियों के लिए अक्षय उड़ान
कभी नहाऊँगा बारिश में
यही होगा उत्सव विधान।

ऐसा नहीं कि तुम
नहीं चाहते मुझे।
बचाना चाहते हो
बुलडोजर और तिजोरियों में
कैद होते हैं जंगल से
कभी लाल सिंदूर चढ़ा देते हो
पत्थर रखकर
और जरा सा हवन- धूप।

पर सभ्यताओं के दारुण स्वार्थ
नियति बन जाते हैं
मेरे कद और जीवन की।
और चमकीली कारों के शीशों से झाँकती
तुम्हारी संवेदनशील आँखें भी
उठावने की तरह रस्म निभा जाती है।

फिर भी
कभी कोई पाखी
चोंच में उठा ले जाएगा मेरा बीज
और गिरा देगा किसी गाँव के मुहाने पर।
कभी फैल गया सुंदर वन की तरह
तो सूखती  सभ्यताएँ भी
पिकनिक मनाने आएँगी।

हमें बहुत चाहती है दुनिया
हरे बानक और पंछियों के
कलरव के साथ
इसीलिए तो छाये  रहते हैं चित्रों में
मीडिया हमसे करवाता है फेशियल।

अब न कोई  देखता है
खिलते हुए गुलाब
ना तड़ाग की अरुणाई में
खिलते कमल दलों को ;
फिर भी सुबह शाम
सरकाते रहते है
वाट्सएप और फेसबुक पर।

स्कूली बच्चे भी
इन्हीं चित्रों से जानते हैं
हम प्रकृति के वाशिंदों को।

पूरा जंगल है
तुम्हारी
मोबाइल मुट्ठी में
पर वह सुख कहाँ
जब सघन छाया में कहकहे लगाते हो
और हम भी
मानवी छुअन से
खिल जाते हैं।

पर अब हम हैं
इस छुअन से परे
और तुम सब भी
हमारी मादक छवि से दूर
केवल मोबाइल मुट्ठी में।

सम्पर्कः 36 क्लीमेंस रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे, पुरुषवाकम्, चेन्नई (तमिलनाडु) 600007 (Mob. 094250 83335)

Dec 18, 2017

नींबू मिर्ची की जमाना

नींबू मिर्ची की जमाना 
-बी.एल. आच्छा
इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान पर लटके हुए नीबू-मिर्ची को लटके देखा तो मैं चकरा गया। मुझे लगा जैसे न्यूटन का सतरंगी पंखा उलटी दिशा में घूम गया हो। यों मेरे उन दोस्तों की कमी नहीं है, जो इन्टरव्यू में जाने से पहले कार के आगे नीबू-मिर्ची रखकर उन्हें पहिए से कुचलते हुए लक्ष्य तक पहुँचते हों। कार को आगे-पीछे करके उसे हलाल किए बगैर सुकून नहीं मिलता। यों लगता है कि जमाना ही नीबू-मिर्ची का है। शायद कोई पैर दे जाए तो विपदाओं की झोली सामने वाले के गले में डल जाए। सुधरी हुई नजरों के जमाने में आज भी नजर लग जाने का डर इस कदर समाया हुआ है कि चश्में की दुकानें भी बुरी नजर से बचने के लिए नीबू-मिर्ची के बगैर राहत का अनुभव नहीं करतीं। यों परमात्मा तक पहुँचा देने वाली सड़कों के यमदूत वाहन भी लिख ही जाते हैं- बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला।पता नहीं चमत्कारों की छुट्टी कर देने वाले वैज्ञानिक चमत्कारों के जमाने में भी मन का विश्वास क्यों नीबू-मिर्ची में जाकर लटक जाता है, विक्रम के वेताल की तरह। नीबू-मिर्ची से विटामिन सीपाकर सड़कें तो नहीं सुधर पाईं, अलबत्ता आदमी का कमजोर विश्वास नीबू-मिर्ची में जाकर लटक गया।
अजूबा तो तब लगा, जब इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान के उद्घाटन पर वैक्यूमक्लीनर के दसियों पीस बगले झाँकते रहे और सगुनके रूप में झाड़ू प्रतिष्ठित हुई। तमाम महँगे प्रसादों के बीच चना-चिरौंजी की तरह। पास में रखी नमक की थैली ने भी झाडू से ही जुगलबन्दी कर ली और जरा-सी भीड़ बढ़ी तो नजर के डर से नीबू-मिर्ची भी दुकानदार के मन के ऑर्केस्ट्रा को संगत देते हुए लटक गए। पता नहीं, विज्ञान के चमत्कारों को यह निरीह और इकलौती झाड़ू कितनी टक्कर दे रही है कि प्रगति की इबारत रचने वाले विज्ञान को भी झाडू की अध्यक्षता में उद्घाटित होना पड़ रहा है। लगता है कि तमाम मशीनी जाँचों के बाद भी बीमारी पकड़ में नहीं आ रही है और आदमी अपने आदिम भय को नीबू-मिर्ची में टटोल रहा है।
यों देखा जाए तो जमाने की चाल ही इलेक्ट्रॉनिक हो चली है। हर काम के लिए मशीन और आदमी बेकार। कभी वॉशिंग मशीन का तो कभी आटा चक्की का मोहक संस्करण। कभी रोटी बेलने की मशीन तो कभी झाड़ू लगाने की। यों जूतों तक से मशीनी पहियों के प्रयोग जारी हैं। जापान में टूथब्रश भी बिजली से दाँतों पर दौड़ता है। जमाना शायद यह भी आए कि सड़कें खुद चलें। और आदमी भी इन्हीं इलेक्ट्रॉनिक चीजों से घर भरने लगा है। आदमी का आदमीपन है इनसे। विद्वान आदमी भी कार और कम्प्यूटर में सवार होकर ही विद्वान दिख पाता है। घर में इन सुख-सुविधाओं का अम्बार हो तो आदमी का बंगला अपनी बस्ती में टीले की तरह ऊँचा उठ जाता है।
पिछली बार मैं भी घर में वॉशिंग मशीन ले आया। वॉशिंग मशीन का वैसा ही स्वागत हुआ जैसे गोदानके होरी के घर में गाय का। मशीन पर स्वस्तिक बना। नजर के लिए काली बिन्दी लगी। पड़ोसियों की ईष्र्या से बचने के लिए प्रसाद के पेड़ों ने राहत दी। मशीन में गलबहियाँ डाले घूमते कपड़ों ने शरीर को हल्का किया। सभी खुश नजर आए। पर एक दिन श्रीमतीजी के हाथ और अँगुलियों में दर्द हुआ। घर के जतन खरे नहीं उतरे तो डॉक्टर का सहारा लिया। डॉक्टर ने दवा तो कम दी, मगर मशविरा ज्यादा दिया। बोले- 'आपके घर में कपड़े तो वॉशिंग मशीन से धुलते हैं, तो धोते रहिए। पर हाथों से कपड़े निचोडऩे का कसरती अभिनय पूरे जोर से करिए वरना इन अंगुलियों की पकड़ जाती रहेगी। हाय रे, बड़ी मुराद और मशक्कत से मशीन आई। स्वस्तिक और काजल लगे। मशीन की नजर लग गई। हाथ में गीले कपड़े लिये बिना वे कपड़े निचोडऩे की फिजियोथेरेपी करती रही।
इधर घर में कोई नया उपकरण आता है तो बाँछें खिल जाती हैं। इस बार तय किया कि गेहूँ घर में ही पिसेंगे। लोग लाखों-करोड़ों के घोटालों की सुर्खियों को पचा जाते हैं, मगर शरबती को मैक्सिकन में बदल देने की आशंकाभरी हेराफेरी से समझौता नहीं कर पाते। सो चक्की आ ही गई। कुछ महीनों बाद श्रीमती का पेट दर्द होने लगा। कमर दुखने लगी। डॉक्टर ने लम्बी पर्ची और कई जाँचों के साथ देशी नुस्खा बताया- आपने कभी पत्थर की घरेलू चक्की चलाई है?’ यों चक्की की बात सुनकर कबीर याद आ गए - ताते या चाकी भली पीस खाय संसार। मगर वे बोलीं – माँ मुझे गोदी में सुलाकर ही चक्की चलाती थीं।डॉक्टर साहब ने कहा – आप चक्की भले ही न चलाएँ, पर चक्की चलाने का कसरती अभ्यास करते हुए पेट और कमर को हिलाते रहें।बिसूरती नजरों से आटा चक्की को दुखते हुए वे पत्थर चक्की का अभ्यास करने लगीं। कभी-कभी घर के लोग इन बिन-संवादी मूक नाटकों को देखकर हँसने लगते हैं। पर इन दिनों वे बावजूद दो-दो मिक्सरों के यशोदा की तरह छाछ बिलौने का नाटकीय अभ्यास कर रही हैं। कृष्ण की जगह मशीन पर काजल का दिठौना लगा है और यशोदा इलेक्ट्रॉनिक युग में छाछ बिलौने का अभ्यास कर रही है।
यों इन दिनों मशक्कत में लगी दादी के मन में पोती के हाथ पीले करने की चिन्ता सता रही है। उनके अपने सपने हैं। हर तरह से पोती की ससुराल मल्टी हो। सुख-सुविधाओं का कुबेर उसी के घर में थमा रहे। कहती भी हैं – मैं तो अपनी पोती को सब चीजें दूँगी। घर भी ऐसा देखूँगी कि रत्तीभर  तकलीफ न उठानी पड़े।लड़की की माँ ने टोकते हुए कहा, ‘माँजी, फिर भी काम तो करना ही पड़ेगा ना, जब वह पराए घर जाएगी।दादी तपाक से बोली- मैं तो अपनी पोती को ऐसे घर में दूँगी कि उसे उठकर पानी भी न पीना पड़े।मन में आया कि माँ से कहूँ कि यह लड़की इन सुख-सुविधाओं के अम्बार में जवानी तो काट लेगी, मगर बुढ़ापे में कमर दर्द के लिए कपड़े निचोडऩे, चक्की चलाने और छाछ बिलौने का फिजियोथेरेपिकल नाटक करती रहेगी। पोती का संस्करण दादी में बदल जाएगा। मगर माँ कहीं नाराज न हो जाए, इसलिए चुप्पी साध गया।
इन दिनों टी.बी. का रोग तो मुट्ठी में आ गया है, पर आदमी टी.वी. की मुट्ठी में चला गया है। टी.वी. के सामने बिस्तर पर पड़े-पड़े ही बातों के चौके-छक्के जड़ता रहता है, मगर सलामी बल्लेबाज के रन आउट या टुच्चक-टुच्चक होते ही पाँव पटकने लगता है। बिस्तर पर पड़े-पड़े खाते और देखते उसका वजन माशाअल्ला हो गया है। कभी क्लोरोस्ट्रोल नप रहा है, तो कभी ब्लड शुगर। हार-थककर वे मॉर्निंगवॉक करने लगे हैं। जॉगिंग की वेशभूषा में फब रहे हैं। न हो तो मशीन पर लेटे-बैठे ही मोटापा घटाने की कवायद कर रहे हैं। दिनचर्या के लिए पसीना बहाने की साधना से उन्हें लगता है कि कहीं इस कर्मयोग से रिएक्शन न हो जाए। यों किसानों को भी धूप में हल चलाते देख वे तारीफ से अघाते नहीं हैं। पर बाइक पर चलते-चलते गर्दन और कान के बीच मोबाइल की घुसपैठ करवाते ही रहते हैं।  चाहे स्पॉन्डेलाइटिस जोर मार जाए, मगर वे इलेक्ट्रॉनिक दिनचर्या के मेघनादी-पाश से बाहर नहीं निकल पाएँगे। उनका बस चले तो घुमावदार सीढिय़ों से बाइक पर बैठकर किचन तक पहुँचें और उतर आएँ। जमाने को पैरों की जरूरत कहाँ है? पर जब टखने बजने लगते हैं तो पैर इलेक्ट्रॉनिक युग में पैदल चलने की आदिम माँग करने लगते हैं। पता नहीं, इस इलेक्ट्रॉनिक युग में पत्थर युग क्यों जिन्दा हाथ हिलाने लगता है। तमाम मशीनी परीक्षणों के बीच आदिम विश्वास क्यों फहराने लगता है? यह आदमी के कर्म की हार है या मशीनों की जीत - मुझे नहीं मालूम। पर इलेक्ट्रॉनिक युग के आदमी के पसीने की पुकार कहीं न कहीं आदिम माँग की तरह असरदार हो जाती है। कभी हारती है तो नीबू-मिर्ची में, कभी जीतती है तो आदमी के पसीने में।


लेखक परिचय: बी. एल. आच्छा- जन्म: 05-02-1950, स्थान -देवगढ़ मदारिया  राजस्थान , शिक्षा-एम.ए.हिन्दी, 1971 (उदयपुर विश्वविद्यालय), से.नि.प्राध्यापक हिन्दी, उच्च शिक्षा विभाग, मध्यप्रदेश शासन, प्रकाशन: 1-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास, 2-सर्जनात्मक भाषा और आलोचना, 3 'जल टूटता हुआ' की पहचान, 4 -आस्था के बैंगन, (व्यंग्य), 5- पिताजी का डैडी संस्करण (व्यंग्य), संपादन- सृजन संवाद- लघुकथा विशेषांक। पुरस्कार: 1- देवराज उपाध्याय आलोचना पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर, 2- पं. नंददुलारे वाजपेयी आलोचना पुरस्कार, म.प्र.साहित्य अकादमी, भोपाल, 3- समीक्षा सम्मान, म.प्र.लेखक संघ, भोपाल, 4-भाषा भूषण सम्मान साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा। सम्पर्क- 36 क्लीमेंस रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे, पुरुषवाकम्, चेन्नई (तमिलनाडु) -600007, Email-  balulalachha@yahoo.com

Feb 19, 2017

गुरुजी का सर होते जाना

गुरुजी का 
सर होते जाना
- बी. एल. आच्छा
'गुरुजीऔर 'सरमें फेब्रिक का अन्तर है। वैसे ही जैसा नवजागरण और उत्तर-आधुनिकता में। गुरुजी बड़े आत्मीय और सीधे सच्चे सांस्कारिक प्राणी लगते हैं और 'सरका प्रशासकीय तबका 'पर्सनेलिटीबनकर चौंकाता है। गुरुजी तो पुराने संस्कारों के जीवित संस्करण हैं। मगर 'सरतकनीकी दुनिया के असरदार पुरजे।
यों तो वे भी 'सर ही हैं,  मेरे पड़ोसी भी। पर उनकी सादगी का कायल होकर मैं उन्हें आत्मीयतावश 'गुरुजीही कहता हूँ। उम्र में 7-8 बरस बड़े हैं, पर आदर के साथ जरा दोस्ताना अंदाज भी मेरे उनके बीच रचा बसा है। अकसर किताबों में डूबे रहते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। पर न दिखावा, न प्रदर्शन। फिर भी न जमाने के शिक्षाशास्त्र पर भी उनसे बहसबाजी हो जाती है। एक दिन मैंने उनसे कहा -'गुरुजी, यह जमाना तो स्मार्ट मोबाइल से लेकर स्मार्ट सिटी तक स्मार्ट ही स्मार्ट है। अब तो पुराने जमाने के सम्राट को भी स्मार्ट होना पड़ता है। अब छठा वेतनमान भी खत्म होने को है, सातवाँ लागू हो जाएगा। थोड़ा आप भी तो स्मार्ट हो जाएँ।चाय पर अनौपचारिक चुहल के साथे मैंने कहा। उन्होंने ठहाका लगाया। बोले - अरे भई,  साठ का पाठ तो उम्र ही पढ़ा रही है। फिर लिखना-पढऩा तो चलता ही रहता है। किताबें भी छपी है। भाषण भी दे ही आता हूँ। अब बताओ, और कैसे स्मार्ट हुआ जाए ?
मैंने मुस्कुराते हुए कहा - एक दिखनौटी सी कार और स्मार्ट सा मोबाइल भी ले लीजिए। अच्छी सी कार से उतरेंगे तो लगेगा कि कोई प्रोफेसर आया है। दमदार है। ऐकेडमिक हैं और फु र्सत में, मोबाइल या माउस पर अँगुलियाँ चलाते रहेंगे तो भी 'लेपटॉपसरीखे टिपटॉप हो जाएँगे। फिर आप नहीं पढ़ाएँगे तब भी इम्प्रेशन तो बना ही रहेगा।
वे फिर पुराने गुरुजियों सरीखा ठहाका मारते हुए बोले - 'अरे भई मुझसे एक अखबार के संवादाता ने पूछ लिया था। यही कि नये वेतनमान से शिक्षा में क्या बदलाव आएगा? मैंने उनसे कहा कि जो बोलूँगा वह आप वह छाप नहीं पाएँगे । पत्रकार ने कहा कि जो आप बोलेंगे, वह हम जस का तस सचित्र छाप देंगे। मैंने कहा कि इतनी बड़ी बिरादरी को आप नाराज नहीं कर पाएँगे। पत्रकार ने कहा - 'चलो न सही, पर आखिर आप कहना क्या चाहते हैं ?’ मैंने कहा 'अब लोग किताब नहीं कार ही बदलेंगे।पत्रकार इस गुणात्मक अंतर की बात सुनकर चुपचाप चल दिये। अब आप हैं कि गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मुझसे इस बुढ़ापे में कार खरीदवा रहे हो।
हँसी तो मुझे भी आई। हँसा भी। पर मैंने कहा - 'गुरुजी यह ज़माना जितने दिखने का है उतना होने का नहीं।कपड़े-लत्ते तो क्या आपकी शर्ट ही एकेडेमिक दिखनी चाहिए, नये जमाने की स्मार्टनेस से पुरानेपन को धता बताती हुई। चलो न सही नये फैशन। पर पुराने सांसारिक टीचर भी धोती-कुर्ते के साथ एक उत्तरीय कंधे पर लटकाकर कार से आते हैं। पुराने बाबा लोग भी कितने नये फेशियल के साथ कार से उतरते हैं और अध्यक्षता की खास जगह बना लेते हैं। आखिर पुरानेपन को भी नये जमाने के रंगरोगन और टीम-टाम तो चाहिए ही न ? फिर मुद्राएँ भी ऐसी हों, तो भीतर के खालीपन को भी चुस्त अंदाज़ दे जाएँ। नये जमाने के नये छापा-तिलक तो सघने ही चाहिए न ?’ वे बोले- 'गुरुजी करके तो देखिए। कितने डायनेमिक और रैंक में ए-प्लस हो जाएँगे।वे हँसते-हँसते चुप हो ग
एक दिन उन्होंने मुझे कहा- 'देखो, हमारा शोध पत्र 'एकलव्यपत्रिका में छपा है।मैंनें कहा - 'गुरुजी यह तो बहुत अच्छा है। काफी छपे होंगे अब तक।वे बोले- बारह तो प्रकाशित पुस्तकें हैं। कई सारे शोध पत्र हैं। मैंने कहा - 'इन्हें पढ़ने वाले भी होते होंगे या अपने को ही बताना पड़ता है कि मेरा शोध पत्र छपा हैं।  वे बोले - अकसर बताना पड़ता है और इसकी सांख्यिकी भी नम्बर देती हैं। मैंने यों ही पूछ लिया - अच्छा गुरुजी यह बताइए कि आपने एक दो प्लॉट-मकान भी ले लिये हैं या...। वे बोले- 'यही तो हमारी दिक्कत हैं, लिखने-छपने के चक्कर में यह कोना तो सूना ही रह गया।  मैंने कहा- गुरुजी, ले लेते तो साठ-सत्तर लाख के आसामी तो हो ही जाते। हाँ,  पर इतना तो छपने-छपाने से मिल ही गया होगा?’ वे आक्रोश में बोले- 'अरे प्रकाशक कुछ देता है क्या? कई बार तो गाँठ का चन्दन घिसना पड़ता है।मैंने कहा - 'यह तो सरस्वती के प्रति ज्यादती है। चलो प्लॉट न सही, मकान न सही, कुछ शेयर वगैरह तो हैंडल करते ही होंगे।वे बोले - 'अरे किस पराये मुहल्ले की बात करते हो। यह तो अजनबी दुनिया है।मैंने कहा - 'गुरुजी फिर ग्रोथ कैसे होगी ?’ वे बोले -'ग्रोथ क्यों नहीं हुई ? देखो, मैं कोई आत्ममुग्ध तो हूँ नहीं, योग्यताएँ तो मेरे पास हैं ही।
            मैंने कहा- गुरुजी आपकी योग्यता पर तो जरा भी संदेह नहीं है। पर आज के जमाने में लोग योग्यता से ज्यादा योग्यता के लक्षणों से ही काम चला लेते हैं और बाकी समय 'ग्रोथमें लगा देते हैं। जिनके पास और कोई तरीका न हो तो वे अध्यक्षताओं से ही अखबारों में अपनी 'ग्रोथउपजा लेते हैं। शिक्षा तो लक्षण माँगती हैं और डिग्रियाँ उनको मानक बना ही देती हैं। पर पुराने खाँटी विद्वानों जैसा स्वाद अब कहाँ खो गया है ? पहले सब्जी मण्डी जाते थे तो देशी धनिये की गंध दूर से ही आती थी और अब धनिये की ढेरी को हिलाते हैं;  फिर भी नाक जस की तस रह जाती है। पर चलो वह न सही, पर नये जमाने के तेवर तो चाहिए ही न ?’ वे बोले - 'पता नहीं मुझे क्या समझाना चाहते हो ?’ मैंने कहा - गुरुजी आप में पुराना स्वाद तो हैं, पर नये जमाने की स्टाइल...। अब आप किसी समाज या कार्यक्रम में जाएँगे तो स्कूटर और कार का अंतर तो समझ में आ ही जाएगा। फिर समाज यह थोड़े ही पूछेगा कि आपके बायोडाटा में कितनी किताबें हैं और कितने शोध पत्र। न क्लास में ही ये सब बताने पड़ते हैं।
गुरुजी थोड़े कसमसा गये। बोले - 'भई तुम्हारी बातें मुझे आउट ऑफ  कोर्स लगती हैं। मैंने कहा - 'गुरुजी, इस पुरानेपन के चलते लोग ही अपने को आउटडेटेड किए जाते हैं। देखिए न स्मार्ट लोग लक्षणों के सहारे ही हर कहीं ठस जाते हैं और आप हैं कि योग्यताओं को छिपाते हुए दरकिनार होते जाते हैं। उन्होंने थका-सा जवाब देते हुए कहा - 'अरे भई अब जिन्दगी इतनी बेरंग निकल गई हैं। न प्लाट, न शेयर न कार। अब ये कारोबार कभी समझ में नहीं आए। लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि लक्षण ही उगा लेने चाहिए । पर करें क्या, बचपन में गुरुजी ने डंडा बरसाया और त्याग के संस्कार डाल दि। समझ में ही नहीं आया कि कॅरियर और पर्सनेलिटी क्या होते हैं? पर अब जले पर नमक क्यों छिडक़ रहे हो। चुप भी करो।
मैंने कहा - 'गुरुजी अब तक तो पावर ही था। अब 'पावर-पाइण्टमें पावर है। जमाना नयी टेकनीक में उतर आया है। कमाई भी किताबों से निकलकर नए अंदाज पकड़ रही है। वे बोले- 'अरे भई हमने तो धोती वाले गुरुजी को देखा था। अलबत्ता हम पतलून में आ गए। अब तुम्हारी नयी फैशन टेक्नालॉजी हमसे सने से रही।मैंने भी हार नहीं मानी। बोलो- 'गुरुजी, अस्सी साल का बूढ़ा बरमूडा पहनकर नए जमाने में फिट हो रहा है। आप भी सारे लक्षण उगाते हुए 'कॅरियरकी राह पर पर्सनेलेलिटी में हो जाइए।वे बोले- 'अरे भई, तुमने कैसा तनाव पैदा कर दिया है। मेरा शोध पत्र छपता है, तो लगता है कि सुन्दर- सा गुलाब इस पत्रिका के प्लॉट में खिल गया है। पर तुम्हारे लुभावने कीमती प्लॉट खरीदने या इधर उधर करने का कौशल तो तनाव पैदा कर रहा है। लगता है कि मैंने जिन्दगी अकारथ कर दी है।
मैंने कहा - 'गुरुजी मेरा मकसद तनाव देना नहीं हैं।वे बोले- 'फिर मुझे क्यों उस मायावी दुनिया में उलझा रहे हो ?’ मैंने कहा- 'गुरुजी, मैं तो आपके भाषण को सुनकर ही यह बात कह रहा हूँ। आपने कहा था कि जो नए के अनुसार नहीं चल पाता वह खत्म होता जाता है। जो वर्तमान को देखकर नयी गति पकड़ लेता है, वो बाद नदी के पानी की तरह नयी गति से बहने लगता है।इस बार गुरुजी ने कुछ नहीं कहा। पर उनके चेहरे से लग रहा था कि किताबें भी खरीदते रहेंगे, पर कार तो प्रायोरिटी से खरीदेंगे, गुणवत्ता के विकास के लिए। और गुरुजी नवजागरण की सांस्कारिकता से निकलकर भूमंडलीकृत हो जाएँगे।
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