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Feb 1, 2026

प्रेरकः पिंजरे का संगीत और पहाड़ की गूँज

  - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल 

एक राज्य में एक बहुत ही कुशल बाँसुरी वादक रहता था। उसके पास दो शिष्य थे— आर्यन और कबीर।

एक दिन गुरुजी ने दोनों को अलग-अलग काम सौंपे। उन्होंने आर्यन को राजमहल के एक भव्य कमरे में भेजा, जहाँ सोने का एक पिंजरा था। उस पिंजरे में एक दुर्लभ पक्षी था। आर्यन का काम था उस पक्षी को समय पर सबसे उत्तम फल खिलाना, रेशम के बिछौने पर सुलाना और उसे जंगली जानवरों से बचाकर सुरक्षित रखना।

दूसरी ओर, गुरुजी ने कबीर को अपने साथ एक ऊँचे और पथरीले पहाड़ पर चलने को कहा। वहाँ पहुँचकर गुरुजी ने एक जंगली पक्षी की ओर इशारा किया,  जो तेज़ हवाओं के बीच एक पेड़ की टहनी पर बैठा था।

एक महीने बाद, गुरुजी ने दोनों शिष्यों को बुलाया और पूछा, "तुमने क्या सीखा?"

आर्यन ने गर्व से कहा: "गुरुजी, राजमहल का वह पक्षी सबसे सुखी है। उसे न भोजन की चिंता है, न शिकारियों का डर। वह दिन भर बस आराम करता है। उसे वह सब प्राप्त है,  जो एक जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए चाहिए।"

गुरुजी मुस्कुराए और फिर कबीर की ओर देखा।

कबीर धीमे स्वर में बोला: "गुरुजी, मैंने उस पहाड़ी पक्षी को देखा। उसे भोजन के लिए मीलों उड़ना पड़ता है। कभी बारिश में भीगता है, तो कभी बाज से अपनी जान बचाता है। लेकिन, जब वह सूरज ढलते समय अपनी पूरी ताकत से चहकता है, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गूँज होती है। वहीं जब मैं आर्यन के साथ उस महल वाले पक्षी को देखने गया, तो वह सोने के पिंजरे में बैठा सिर्फ फड़फड़ा रहा था। उसके पास सब कुछ था, पर उसकी आँखों में चमक नहीं थी।"

गुरुजी ने दोनों को पास बिठाया और कहा: "जीवन में दो तरह की शांति होती है। एक वह, जो 'दबाव और सुरक्षा' से आती है- जैसे महल का वह पक्षी। वहाँ तुम्हारी ज़रूरतें तो पूरी होंगी, लेकिन तुम्हारी आत्मा मर जाएगी।

दूसरी शांति वह है, जो 'चुनौतियों और स्वतंत्रता' से आती है। पहाड़ का वह पक्षी जोखिम उठाता है, लेकिन वह अपनी पूरी क्षमता से आकाश को नापता है। असली खुशी सुरक्षा में नहीं, बल्कि स्वयं को खोजने के संघर्ष में है।"

शिष्यों को समझ आ गया कि केवल पेट भरना और सुरक्षित रहना 'जीना' नहीं है। असल में खुश वही है, जिसके पास अपनी उड़ान के लिए खुला आसमान है। ■

मोबाइल- 7838090732

Mar 7, 2024

व्यंग्यः अर्थों का दिवंगत होना

 

  - डॉ . गिरिराजशरण अग्रवाल

बाबू चंडीप्रसाद अपने ज़माने के बड़े ही अद्भुत आदमी थे। और सब, तो अपनी माई के लाल होते हैं, वह रज़ाई के लाल थे। 'रज़ाई' शब्द हमने जानबूझकर प्रयोग किया है, क्योंकि चंडीप्रसाद स्वयं भी प्रचलित शब्दों और मुहावरों के कट्टर विरोधी थे। फिर चंडीप्रसाद जैसे माई के लाल पर 'रज़ाई का लाल' मुहावरा ही फिट बैठता है, 'गुदड़ी का लाल' नहीं। इस बात को आप जानते ही हैं कि रज़ाई यदि अपने-आपमें मध्यम वर्ग की द्योतक है, तो गुदड़ी निम्न वर्ग की। साथ ही यह बात भी आप भली-भाँति जानते हैं कि गुदड़ीवाला निम्नवर्ग राजनीतिक खिला़ड़ियों की खेल-प्रतियोगिता में फुटबाल का काम करता है। एक पक्ष के खिलाडि़यों द्वारा किक मारी गई, तो इधर, दूसरे खिलाडि़यों के द्वारा ठोकर मारी गई, तो उधर। भारी गुत्थम-गुत्था के बाद अगर कोई पक्ष गोल दागने में सफल हो जाए, तो सफल पक्ष सत्ताधारी, असफल रह जाने वाली टीम विपक्ष की मारा-मारी। रह गई फुटबाल, तो अगली प्रतियोगिता तक उसका कोई काम, कोई महत्त्व नहीं। वह या, तो क्रीड़ा-सामग्री के भंडार में चुपचाप पड़ी रहेगी अथवा समय-समय पर फूँक भरने के काम आएगी। फुटबाल और जनता फूँक भरने के लिए और खेल-प्रतियोगिता के दौरान किक मारने के लिए ही होती है।

क्षमा कीजिए, हमने जनता बनाम फुटबाल की यह व्याख्या अपनी बुद्धि से नहीं की है। चंडीप्रसाद जी की बुद्धि सक्रिय रही है इस कार्य में। चंडीप्रसाद बेचारे अपने अंतिम दिनों में एक नया शब्दकोश संकलित कर रहे थे कि समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो गए। आपको यह बात भी याद दिलाना अच्छा रहेगा कि ऐसे ‘रज़ाई के लाल’, जिन्हें समाज दिखावे के लिए भी प्यार नहीं करता, समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो जाते हैं। यह बात अलग है कि प्यार , तो उन्हें भगवान् भी नहीं करता, पर वे वन-वे वाला इश्क़ करते हुए भगवान् की झोली या उसकी खोली में पहुँच ही जाते हैं।

अब आपको यह जानकर दुख या आश्चर्य नहीं होगा कि चंडीप्रसाद जी ने शब्दकोश लिखते-लिखते अचानक आत्महत्या कर ली और धींगामुस्ती करके ज़बरन भगवान को प्यारे हो गए।

   जब तक चंडीप्रसाद जीते रहे, ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारा करते रहे; लेकिन हमें अंत तक यह आश्चर्य रहा कि चंडीप्रसाद जी को ट्यूशन मिल कैसे जाते थे? यह आश्चर्य उस वक़्त भी है, जब चंडीप्रसाद धाँधली से भगवान् को प्यारे हो चुके हैं। यह भी अजीब बात है कि आदमी लोक से परलोक चला जाता है; लेकिन आश्चर्य छोड़ जाता है। बाबू चंडीप्रसाद भी विरासत में दो चीज़ें छोड़ गए। एक, तो आश्चर्यचकित कर देनेवाला अपना अधूरा शब्दकोश और दूसरा हाफ़ कोट यानी बंडी। चंडीप्रसाद जब तक जीवित रहे, बंडी जुड़वाँ बच्चों की तरह उनके साथ चिपकी रही। सच कहें,  तो चंडी और बंडी एक-दूसरे के पूरक थे, बंडी के बग़ैर चंडीप्रसाद चंडीप्रसाद नहीं लगते थे। ऐसा लगता था जैसे वह चंडीप्रसाद होकर भी चंडीप्रसाद होने का ढोंग कर रहे हों। यही कारण था कि लोग चंडीप्रसाद की जगह उन्हें बंडीप्रसाद कहने लगे थे; लेकिन सामने नहीं, पीछे-पीछे, क्योंकि हमारे यहाँ सच्ची बात सिर्फ़ पीठ-पीछे कही जाती है, सामने सच्ची बात कहने वाले या तो पागल होते हैं या मूर्ख अथवा दोनों का मिश्रण।

  चंडीप्रसाद जी पागल थे या मूर्ख या दोनों का मिश्रण, यह , तो हम नहीं कह सकते, पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि और बहुतों की तरह चूँकि वह भी मुँह-दर-मुँह होकर सच नहीं बोल सकते थे, इसलिए लिखकर सच बोलते थे। इस सच बोलने में चंडीप्रसाद की बंडी हमेशा उनकी सहायक बनी रही। बंडी की बगली ज़ेबों से काग़ज़ों का जो पुलिंदा प्राप्त हुआ, वह दो बातें सिद्ध करता है, एक, तो यह कि घाघ टाइप के लोग सच को बगल में दबाकर रखते हैं और उनके मरने पर सच का जो पुलिंदा सामने आता है, वह भयंकर विस्फोट करने के लिए काफी होता है।

उदाहरण के लिए चंडीप्रसाद जी ने अपने अपूर्ण शब्दकोश की भूमिका बाँधते हुए लिखा था कि अब समय आ गया है कि हिंदी का पूरा शब्दकोश संशोधित करके दोबारा लिखा जाए। संशोधित करने की बात को सिद्ध करते हुए चंडीप्रसाद ने लिखा कि जब भारत का संविधान एक बार नहीं दर्जनों बार संशोधित किया जा सकता है , तो शब्दकोश में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं हो सकते? चंडीप्रसाद जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि मातृभूमि के अतिरिक्त कभी कोई और भूमि मेरे पास नहीं रही, इसलिए सदा भूमिकाओं पर ही सं, तोष करना पड़ा। चंडीप्रसाद जी ने लिखा है कि मैंने जीवन-भर कभी कोई किताब पूरी तरह नहीं पढ़ी, किताबों की भूमिकाएँ पढक़र ही अपनी भूमिहीनता की संतुष्टि करता रहा। पर जीवन के अंतिम चरण में मैंने इस रहस्य को समझा कि भूमि अपनी हो, तो जैसी भी हो, जोतनेवाले को फसल मिल ही जाती है, किंतु यह जो भूमि का पॉकिट एडीशन भूमिका है, इससे तो भ्रम और भटकाव के अतिरिक्त कोई और फसल मिलती ही नहीं। हमारा विचार है कि चंडीप्रसाद को भूमिकाएँ पढ़ते-पढ़ते ही एक नया शब्दकोश लिखने का विचार आया था; लेकिन उन्हें इस ख़तरे का भी पूरी तरह अनुमान था कि उनके द्वारा लिखे जा रहे शब्दकोश को देश के धनकोश वाले महापुरुष स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि प्रचलित अर्थों वाले शब्दों से उनके स्वार्थ जुड़े हैं।

चंडीप्रसाद ने अपनी भूमिका में यह भी लिखा है कि प्रचलित शब्दों की नई व्याख्या इसलिए भी ज़रूरी हो गई है कि शब्द अब सच को छिपाने अथवा सुननेवालों को भ्रमित करने अथवा धोखा देने के लिए प्रयुक्त होने लगे हैं। उनके अनुसार यह त्रासदी गुदड़ीवाले यानी जनसाधारण अधिक झेल रहे हैं। वे अपनी अज्ञानता और अज्ञानता से भी अधिक सरलता के कारण शब्दों के आज भी ठीक वही अर्थ लेते हैं, जो पुराने शब्दकोशों में लिखे हैं। इसलिए पछताते हैं और उस समय पछतावे से कुछ होता नहीं, जब चिड़ियाँ खेत चुगकर चली जाती हैं। चंडीप्रसाद ने चिड़ियों का खुलासा नहीं किया। चिड़ियों से शायद उनका अभिप्राय बिना पंख के उड़नेवाले उन जंतुओं से है, जो उड़ते,  तो हैं, किंतु उड़ते हुए दिखाई नहीं देते।

लंबी भूमिका के अतिरिक्त चंडीप्रसाद जी की जेब से जो एक छोटा-सा पुर्जा बरामद हुआ, उसमें पुराने शब्दों की नई लेकिन विस्तृत व्याख्या की गई है। उदाहरण के रूप में कुछ शब्दों के सच्चे-सही अर्थ आप भी देखिए-

 प्रेम : व्यक्तिगत स्वार्थ का एक अटपटा शब्द, जिसमें दोनों ही अपना- अपना सुख लाभ एक-दूसरे के जीवन में खोजने और प्राप्त करने के लिए सदैव एक-दूसरे को भ्रमित करते रहते हैं। ब्रैकिट में चंडीप्रसाद ने लिखा है, मानव-जाति के पास इससे ज़्यादा दिखावटी और बनावटी शब्द और कोई नहीं है।

 धर्म : विधि-विधान की एक ऐसी व्यवस्था, जिसे अपने सामयिक हितों के लिए मन-मरज़ी के अनुसार , तोड़ा-मरोड़ा जा सकता हो। यह धर्मात्माओं, समाज-सुधारकों, राजनेताओं के हाथ की लाठी भी है, जिसके द्वारा वे हम सबको हाँकने का सफल प्रयास करते हैं। यह मानव-प्रेम के नाम से दानव-प्रेम की ओर ले जाता है ; लेकिन इसके प्रेमी-प्रेमिकाएँ समझते यही हैं कि वे धर्म- प्रेम का प्रचार कर रहे हैं। इसे सरल भाषा में हाथी के दाँत भी कहा जा सकता है, जो खाने के और होते हैं, दिखाने के और।

राजनीति : नीति शब्द इसमें केवल सुंदरता बढ़ाने के लिए जोड़ दिया गया है। जैसे अँगूठी में लाल-नीला नग जोड़ दिया जाता है। वैसे यह राज+काज ही है, नीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि नीति क्षण-क्षण बदलती रहती है, जबकि राज स्थायी रूप से सदा चलता रहता है। इसलिए नीतिविहीन राज का अर्थ होता है-निराज। कुल मिलाकर राजनीति को संशोधित कर निराजनीति कर दिया जाना चाहिए। यह अति आवश्यक है।

देशप्रेम: निर्वस्त्र होकर देश को नंगा करना। वैसे भी प्रेम की वासना अपने अंतिम चरण में एक-दूसरे को निर्वस्त्र करने पर उतारू हो जाती है, इसी अनिवार्यता पर चलते हुए अधिकतर देशप्रेमी देश के कपड़े उतारकर अंत में स्वयं भी निर्वस्त्र होकर नृत्य करते दिखाई देते हैं।

 लोकतंत्र: आधुनिक दुनिया का सबसे लोकपि्रय खिलौना, जो कई देशों को ख़ून की भेंट देकर प्राप्त हुआ। यह बच्चों को दिए जाने वाले झुनझुने से अलग प्रकार का एक झुनझुना है। टीन से बने झुनझुने से बच्चे तथा शब्दों से बने इस झुनझुने से सभी प्रौढ़ पुरुष-नारियाँ एवं वृद्ध लोग खेलते हैं और मदारी के इशारे पर जमूरों की तरह नाचते हैं। इसमें समस्याएँ उत्पन्न की जाती हैं, हल नहीं की जातीं। सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र वह होता है, जिसमें लोगों को गाली देने और गोली खाने की आज़ादी है। फिर भी लोग झुनझुना बजाते रहें और खेलकर दिल बहलाते रहें।

मानव-अधिकार: अधिकारहीन लोगों द्वारा खड़ा किया गया ऐसा बखेड़ा, जिसका वास्तव में कोई अर्थ नहीं है। पिछले लंबे समय से इस शब्द को नया अर्थ देने का प्रयास किया जा रहा है; लेकिन यह अर्थ को ग्रहण नहीं कर पा रहा है। इसलिए मानव-अधिकार का मतलब है-चीख़-पुकार, शोर-शराबा, हाहाकार।

 मंत्रिमंडल: राजा-महाराजाओं का संग्रह। सामंतशाही में राजा एक होता था, लोकशाही में अनेक राजा होते हैं। पहले एक अकेला राजा खाता था, अब कई मिल-बैठकर खाते हैं। खाने की क्रिया एक-जैसी है। बस खानेवालों की संख्या बढ़ गई है।

 विपक्ष: सिर्फ़  ग़लत को ही ग़लत नहीं, सही को भी ग़लत सिद्ध करके अपनी उपस्थिति दर्ज करानेवाला महा अनुभवियों का वह गिरोह, जिसका अपना कोई चूल्हा नहीं होता। वह हमेशा दूसरों के चूल्हों पर अपनी रोटियाँ सेंकता है। अगर देश में कहीं कोई और बढि़या चूल्हा उपलब्ध न हो, तो वह सीता मैया की रसोई में भी घुसने से नहीं चूकता।

  स्पष्टवादिता: चापलूसी की एक अद्भुत प्रणाली। कहा जाता है कि एक सज्जन किसी बहुत बड़े धन्नासेठ के पास कोई आवश्यक काम लेकर पहुँचे। वह जानते थे कि सेठ जी बहुत कट्टर सिद्धांतवादी आदमी हैं, मक्खनबाज़ी से चिढ़ते हैं और दुत्कारकर निकाल देते हैं। यह सज्जन ठहरे एक काइयाँ आदमी, आए और अभिवादन के उपरांत तुरंत बोले-'सेठ जी, ये गुण , तो लाख टके का है आपमें कि आप ख़ुशामदियों को पास नहीं फटकने देते। आप दूर से ही उन्हें फटकार देते हैं।' सेठ जी ने अपनी प्रशंसा सुनी , तो गद्गद् हो उठे और आगंतुक का कार्य चुटकी बजाते कर दिया। स्पष्टवादिता की यह प्रणाली लाभदायक भी है और सम्मानजनक भी।

नमूने के इन शब्दों और उनके नवीनतम अर्थों को देखते हुए अब हम आपको यह बताना चाहेंगे कि बाबू चंडीप्रसाद ने अपने शब्दकोश की चर्चा करते हुए यह भी लिखा था कि मानवजाति के उपयोग में आनेवाले सारे ही शब्द पिछली एक शताब्दी से झूठ की लंबी खूँटी पर उलटे लटके हुए थे, जैसे आपने देखा होगा कि पुराने घरों में चिमगादड़ें उलटी लटकी रहती हैं। मैंने और कुछ नहीं किया, बस शब्दों के अर्थों को उनकी खूँटियों पर सीधा लटका दिया है। चंडीप्रसाद ने यह भी लिखा है कि झूठ को एकदम सच की तरह बोलने की प्रयोगात्मक कला, जो वर्तमान आदमी की अद्भुत विशेषता बन गई है, गहरे शोध और अनुसंधान का विषय है। अगर यह अनुसंधान न किया गया , तो शब्दों के असली अर्थ इसी तरह दिवंगत हो जाएँगे, जिस तरह मृत आदमी की आत्मा दिवंगत हो जाती है।  

                             ■


Apr 5, 2021

तीन ग़ज़ले

 

- डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल 

एक

फूल सपनों के खिलेंगे, कामना करते चलें

साथ लाएँगे, बहारें, फ़ैसला करते चलें

 

जिदगी सुलझा ही लेगी अपने हर उलझाव को

उलझनें जितनी भी हैं, दिल से जुदा करते चलें

 

आने वालों को न करने दें अँधेरों का सफ़र

आँधियों के दरमियाँ रोशन दिया करते चले

 

चाहते हों जिदगी में लोग यदि अपना भला

उनसे यह कहिए कि वे सबका भला करते चलें

 

उठ न पाएगी कभी दीवार यह अलगाव की

हम ख़फ़ा होने से पहले ही गिला करते चलें

 

दो

गर नहीं है रास्ता तो रास्ता पैदा करो

जिदगी में जिदगी का हौसला पैदा करो

 

हर अँधेरे को नई इक दीपमाला भेंट दो

हर निराशा से नई संभावना पैदा करो

 

दे सको तो मोम को भी रूप दो फौलाद का

कर सको तो पत्थरों में आईना पैदा करो

 

दर्ज कर दो कल के काग़ज़ पर भी अपने दस्तख़त

आज के जीवन से कल का सिलसिला पैदा करो

 

ले के अंबर से धरा तक जितने भी संदर्भ हैं

सब तुम्हारे हैं, सभी से वास्ता पैदा करो

 

 तीन

रोशनी बनकर पिघलता है उजाले के लिए

शम्अ जल जाती है घर को जगमगाने के लिए

 

हमने अपनों के लिए भी मूँद रक्खा है मकाँ

पेड़ की बाहें खुली हैं हर परिदे के लिए

 

प्रेम हो, अपनत्व हो, सहयोग हो, सेवा भी हो

सिर्फ़ पैसा ही नहीं, हर बार जीने के लिए

 

जितने भी काँटे हैं पग-पग में वे चुनते जाइए

रास्ते को साफ़ रखना आने वाले के लिए

 

एक दिन जाना ही है, जाने से पहले दोस्तो

यादगारें छोड़ते जाओ, जमाने के लिए

 

Director,Hindi Sahitya Niketan, 07838090732

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Nov 3, 2020

दो ग़ज़लें

- डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल


1. नन्ही-सी लौ

न हो दुख-दर्द का साथी तो तन्हा काट देता है
मुसीबत में भी इंसाँ वक़्त अपना काट देता है


नहीं होती है ताक़त जिनमें तूफ़ानों से लड़ने की
उन्हीं शाखाओं को आँधी का झोंका काट देता है


अगर फैलाव में पानी के बाधा बनने लगता है
ख़ुद अपना ही किनारा आप दरिया काट देता है


मजा ये है कि सबके साथ हँसते-खेलते गुज़रे
वो जीवन क्याजिसे इंसाँ अकेला काट देता है


बहुत नन्ही-सी लौ दीपक की हैलेकिन ये कहती है
अँधेरी रात का परदा उजाला काट देता है




2. ओस की बूँदों में

धूप बनकर फैल जाओचाँदनी बनकर जियो
घुप अँधेरा छा न जाएरोशनी बनकर जियो


फूल बन-बनकर बिखरती हैतपन देती नहीं आग
बनकर ख़ाक जीनाफुलझड़ी बनकर जियो


आज तक जीते रहे होअपनी-अपनी जिदगी
दोस्तो! इक-दूसरे की जिंदगी बनकर जियो


ओस की बूँदों में ढलकर तुम अगर बिखरे तो क्या
दूर तक बहती हुई शीतल नदी बनकर जियो


आदमी के रूप में पैदा हुए तो क्या हुआ?
बात तो तब है कि सचमुच आदमी बनकर जियो

 

Director- Hindi Sahitya Niketan, 07838090732
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Jul 10, 2020

तू रुककर न देख

तू रुककर न देख

- डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल

ज़िंदगी में डर बहुत हैं, पर उन्हें दमभर न देख
रास्ते में गर निकल आया तो फिर पत्थर न देख

दोस्ती हर पल बदलती है, नया कानून है 
देख ले किस किसको मिलती है, मगर अंदर न देख

कब कहा था रास्ते आसान हैं, ए ज़िंदगी 
पर मिली है तो इसे जीबारहा मुड़कर न देख

आने वाली रुत डरायेगी तुझे मालूम था 
पतझरों से डर नहीं, वीरानियाँ जीकर न देख

जिसको चाहो वह मिले अक्सर जरूरी तो नहीं 
अवसरों को छीन ले, अलगाव में जीकर न देख

एक पल संकल्प का सुलझा ही देगा गुत्थियाँ
मंज़िलें मिलकर रहेंगी, दोस्त तू रुककर न देख

Dec 12, 2019

भेंट एक लेखक से

भेंट एक लेखक से
- डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल
नित नए लोगों से भेंट करना और भेंट के दौरान उनकी छठी तक के दूध का हिसाब-किताब मालूम करना हम भारतवासियों की राष्ट्रीय हॉबी है। बिल्कुल इसी तरह जैसे दरिद्रता हमारा राष्ट्रीय गुण है और इस राष्ट्रीय गुण को स्थायी बनाए रखने के लिए विदेशी वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेना हमारे वित्तमंत्रियों की हॉबी है।
सो, उस दिन एक साहब से मुलाक़ात हुई. हमने आदत के अनुसार उनका नाम पूछा। नाम था पं श्यामबिहारी लाल शर्मा। बताया गया 'लेखक हैं।' सच मानो, सुनकर बड़ी निराशा हुई. अगले सारे सवाल जैसे 'वेतन कितना मिलता है?' या 'ऊपर की आमदनी कितनी हो जाती है?' आदि मन-ही-मन में घुटकर रह गए. दरअसल, हम भारतीय पहली भेंटवार्ता में ही व्यक्ति के स्टेंडर्ड का पता लगा लेते हैं और क्षण-भर में यह निर्णय भी कर लेते हैं कि नवपरिचित सम्बंध बनाए रखने के योग्य है या नहीं! वैसे हम जानते हैं कि संपन्न व्यक्ति भी समय पड़ने पर चावल के चार दाने उधार देने से कतरा जाता है, पर आदमी को यह गर्व तो रहता ही है कि उसकी मित्र-मंडली में नंगे-बूचे लोग ही हीं हैं, खाते-पीते संपन्न लोग भी हैं। पराए पैसे पर इतराना हमारी दूसरी राष्ट्रीय हॉबी है।
'लेखक हैं।' यह सुनना था कि हम भुन-से गए. क्रोध हमें इस बात पर था कि होश सँभालते ही लेखकों की जिस भीड़ ने हमारा घेराव शुरू किया था, उसका सिलसिला आज तक जारी है। प्राइमरी स्कूल से लेकर एम.ए. की पढ़ाई पूरी करने तक ये लेखक लोग हमारी छाती पर कुछ इस तरह सवार रहे, जैसे वह हमारी छाती न हो, उनका अपना बैडरूम हो। वैसे हमें शक है कि लेखकों के घर में बैडरूम नाम की कोई चीज़ होती होगी।
तो साहब, होश सँभालते ही हम विद्यार्थी बन गए या यूँ कहिए कि बना दिए गए. रात-रात भर लेखकों की जीवनियाँ रटते। कब पैदा हुए, कब वीरगति को प्राप्त हुए, कौन-कौनसी पुस्तकें लिखीं और क्या-क्या तीर मारे? उनकी रचनाओं का अर्थ याद करते। लेकिन सुबह होते ही लगता कि दिमाग़ का मैदान जो है, वह सारा साफ़ है। बहुत सोचते और बहुत देर तक सोचते लेकिन दिमाग़ में कुछ होता, तभी तो सामने आता। आख़िर सब्र करना हम भारतीयों की तीसरी हॉबी है।
परीक्षा होती तो प्रश्न-पत्र देखकर हमारा ख़ून खौल जाता। लिखा होता-नीचे लिखे गद्यांश का संदर्भ-सहित अर्थ लिखो और यह भी लिखो (या बताओ) कि लेखक द्वारा लिखी गई इन पंक्तियों से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है? अथवा निम्नलिखित पद्यांश का अर्थ अपने शब्दों में विस्तार से लिखो और यह भी बताओ कि इसका लेखक कौन है और यह अंश उसकी किस पुस्तक से लिया गया है? अथवा प्रेमचंद की जीवनी कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखो।
हद हो गई हमारा क्या लेना-देना इन व्यर्थ के सवालों से? यहाँ तो 'करे कोई और भरे कोई' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यानी 'करनेवाला कवि और भरनेवाला रवि'
मरता क्या न करता !   हम भी एक ही काइयाँ थे। लेखकों के चंगुल से बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ ही निकाला। वह  नक़ल मारनी शुरू की कि बस इस कला में पूरे दक्ष हो गए। छोटी-छोटी पर्चियाँ जेब में रखकर परीक्षा-कक्ष में जाते। यह अमुक लेखक की जीवनी  है, यह अमुक की। यह अमुक पद्यांश का भावार्थ है, यह अमुक का। अब यह बात अलग है कि अक्सर एक लेखक की जीवनी दूसरे के और दूसरे की तीसरे के नाम लिखी जाती और सारा गुड़ गोबर हो जाता। वैसे गोबर करना भी तो हमारी राष्ट्रीय हॉबी है। है कि नहीं?
हाँ, तो हम बता रहे थे कि लेखकों ने बचपन से ही जो हमारी गुद्दी ऐंठनी शुरू की सो अब तक ऐंठ रहे हैं। परीक्षा-कक्ष में यह सोचकर ग़ुस्सा आता था कि अमुक लेखक की जीवनी लिखें और कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखें। क्या धाँधली है? यानी हम आम भी आपको खाने को दें और गुठलियाँ भी गिनें। सो, हम जब तक विद्यालय में रहे, आम भी खिलाते रहे और गुठलियाँ भी गिनते रहे।
विद्यालय-जीवन से निकलकर जब यथार्थ के जीवन में आए, तब भी क्रम टूटा नहीं, क्योंकि कान पकडक़र बैठकें लगाने के अलावा जीवन का और कोई अर्थ हमारे लिए है ही नहीं। लेकिन इस त्रासदी के पीछे भी हाथ भाँति-भाँति के लेखकों का ही है। न हम इनकी जीवनियाँ रटते, न मेहनत से काम करके खाने की आदत डालते और न इस हालत में पहुँचते। सीधे-सीधे हाज़ी मस्तान बनकर मौज़ उड़ाते। नोट कीजिए कि जनाब हाज़ी मस्तान को किसी भी छोटे-बड़े लेखक की जीवनी याद नहीं है, यह अलग बात है कि वह जीवित लेखकों के अब तक एक सौ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की अध्यक्षता कर चुके हैं। हाज़ी साहब इस रहस्य से परिचित हैं कि लेखक बनने से ज़्यादा लेखकों के सम्मेलन की अध्यक्षता करना सम्मानजनक होता है।
बात काफी दूर निकल गई. हम पं. श्यामबिहारीलाल शर्मा की बात कर रहे थे। हमने उन्हें सिर से पाँव तक घूरकर देखा। कहीं-से-कहीं तक कोई निशानी ऐसी नहीं मिली, जिससे प्रमाणित होता कि वे लेखक हैं। सूटेड-बूटेड, मोटे-ताज़े, हँसते-खेलते। न तो उलझे हुए लंबे बाल, न बढ़ी हुई लंबी दाढ़ी। लेखक तो बेचारा समाज में इंकलाब लाने के लिए जीवन-भर क़लम घसीटता है, पर इंकलाब तो आता नहीं, लेखक का 'जिंदाबाद' अवश्य हो जाता है। लगता है, यह लेखक-वेखक कुछ नहीं है। यदि है तो डुप्लीकेट। लेखक तो मंटो था, घंटों उकड़ू बैठकर क़लम घिसता रहता था और जो समय बाकी रहता था उसमें एडि़याँ रगड़ता था, कभी फ़र्श पर तो कभी खाट पर। तब कहीं जाकर एक कहानी पूरी होती थी। कहानी पूरी होते ही मंटो भागता बाज़ार की ओर, जहाँ किसी प्रकाशक के हाथ घास के भाव कहानी बेचता और मंटो से एकदम 'मंटो साहब' हो जाता।
लेखक तो मुंशी प्रेमचंद थे। समाज उन्हें उस वक़्त तक यह याद दिलाता रहा, जब तक वे जीवित रहे कि लेखक होने की तुलना में मुंशी होना अधिक सम्मानसूचक है। इसलिए जीते-जी ही नहीं, वरन् मरने के बाद भी 'मुंशी' का शब्द उनके नाम का दुमछल्ला बना रहा। मरने के बाद सचमुच बहुत शोधकार्य हुआ मुंशी प्रेमचंद पर, पर शोध इस बात पर भी होनी चाहिए थी कि प्रेमचंद के व्यक्तित्व में लेखक अधिक था या मुंशी और यदि उनमें लेखक अधिक था तो मुंशी उपाधि उन्हें किस कारण दी गई?
गिनती के क्षणों में दर्जनों लेखकों के चेहरे हमारे मन-मस्तिष्क पर उभरे और ग़ायब हो गए, किंतु पं। श्यामबिहारी लाल शर्मा जैसे साफ़-सुथरा, चमकदार, ख़ुशहाल चेहरा उनमें से किसी का नहीं था। सारे के सारे फक्कड़, सारे घनचक्कर, सबके सब खल्लास। संदेह हुआ कि हम भारत में हैं या किसी और देश में। क्या सचुमुच हमारे देश में लेखकों की कायापलट हो गई है? लेकिन विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि कल तक तो हमने अपने ही शहर में कई लेखकों को जूतियाँ चटखाते और सडक़ नापते देखा था। हमने एक बार फिर अपनी पैनी दृष्टि उन पर डाली। फिर पूछा-'कितना कमा लेते हो भाई, लेखन-कार्य से?'
तुरंत उत्तर मिला-'कभी हज़ार, कभी पाँच सौ रुपए प्रतिदिन।'
प्रतिदिन शब्द आश्चर्य भरी चीख़ बनकर हमारे होंठों से फूट पड़ा। मन ही मन दुहराया-'हज़ार रुपए प्रतिदिन। यानी कि तीस हज़ार रुपए महीना। बाप रे बाप! दाता दे और बंदा ले। काश, हम भी लेखक होते और इसी टाइप के होते।' मन-ही-मन सोचा कि ये या तो पि ल्मी-जगत के लेखक हैं अथवा कवि-सम्मेलनों के चुटकुलेबाज़ कवि। वैसे लेखक तो हरगिज नहीं हो सकते, जैसे मुंशी प्रेमचंद जी थे, निराला जी थे या जैसे। हमने नामों की सूची आगे नहीं बढ़ाई. क्योंकि हमें ख़तरा था कि किसी एक नाम पर पहुँचते-पहुँचते हमारा हार्ट फेल हो जाने की नौबत आ सकती थी। हम स्वयं तो फेल हो जाने को हँसी-ख़ुशी सहन करने के आदी थे, किंतु हार्ट फ़ेल हो जाने की बात तो सोच भी नहीं सकते थे। असमंजस के गहरे सागर से अपना सिर उभारते हुए हमने पूछा-'क्यों लेखक जी, यह तो बताओ कि आप लिखते क्या हैं? फिल्मी कहानियाँ लिखते हैं आप? (यह बात नोट करने की है, हम उन्हें श्यामबिहारी लाल कहते-कहते एकदम' लेखक जी'कहने पर उतर आए थे, क्योंकि अच्छे पैसे वाला या अच्छे पैसे कमानेवाला हो तो हम जैसे टटपूँजिए पर उसका रुआब तो पड़ता ही है। सम्मान भी वह अपना हम जैसे लोगों से करवा ही लेता है।) लेखक साहब ने हमारा सवाल सुना तो तिरस्कार-भरे भाव से बोले-' नहीं साहब। फिल्मी-इल्मी कहानियों से क्या लेना-देना है हमें? हम कोई उल्लू या उसके पट्ठे नहीं है, जो रात-रात भर जाग कर फिल्मी कहानियाँ लिखें और बॉक्स ऑपि स पर उनके फ़्लाप होने का तमाशा भी देखें। '
भाई श्यामबिहारीलाल ने फिल्मी-लेखकों पर इतना लंबा लेक्चर दिया कि हम अपनी सुध-बुध भूल गए. हमें विश्वास हो गया कि पि ल्मी लेखकों से अधिक अस्वीकार्य प्राणी शायद ही दुनिया में हो। हमने साहस जुटाकर पूछा-'तो आप क्या गीतकार हैं?'
लेखक जी बोले-'नहीं जी.' और 'जी' पर उन्होंने इतनी दूर तक साँस खींची कि उनकी 'जी' हमारे जी का जंजाल बन गई. हमने फिर पूछा-'तो क्या आप कहानीकार हैं?'
इस बार उनकी त्योरी पर बल पड़ गए. झुँझलाकर बोले-'अरे साहब, कह तो दिया कि हम कहानीकार नहीं हैं और गीतकार भी नहीं हैं।'
'हो न हो, आप अवश्य ही व्यंग्यकार होंगे।' लेकिन लेखक जी ने इस 'कार' को भी अस्वीकार कर दिया और हम बेकार के संकट में पड़ गए. सोच रहे थे कि ये कैसे लेखक हैं, कहानी यह लिखते नहीं, कविता यह करते नहीं, व्यंग्य यह सुनते नहीं। तो क्या कोई और विधा प्रचलित हो गई है इन दिनों साहित्य के क्षेत्र में, जो हज़ार-पाँच सौ रुपये रोज़ ही रायल्टी दिला देती है। इच्छा हुई कि पूछें, 'वह कौनसी विधा है, जिसमें आप लिखते हैं और इतनी मोटी रक़म लेते हैं।'
कुछ पल दोनों के बीच चुप का परदा तना रहा। हमारे मन में जिज्ञासा बिजली की तेज़ी से दौड़ रही थी और हम सोच रहे थे कि इस नई विधा का पता चले तो इस पर पुस्तक ही संपादित कर दें।
साहस करके पूछा-'भाई साहब, यह तो बताइए कि आप लिखते क्या हैं?'
लेखक साहब ने झट उत्तर दिया-'दस्तावेज़।'
सारी बात समझ में आ गई। रजिस्ट्री कार्यालय का नक़्शा आँखों में घूम गया। ज़मीन, मकानों के बयनामे कल्पना में उलट-पुलट होने लगे, 'अमुक पुत्र, अमुक निवासी, अमुक स्थान का हूँ।'
जी चाहा, हास्य-व्यंग्य का यह पुलिंदा बगल में दबाए फिरने की जगह और कलम जेब में अटकाकर गली-गली घटनाओं की खोज में भटकने की बजाय काश हम ऐसे ही एक दस्तावेज़-लेखक होते और हज़ार पाँच सौ रुपए रोज़ ऐंठकर मौज़ की वंशी बजा रहे होते। हमारे मुँह से निकला--‘भारत का एक महान् लेखक श्यामबिहारी लाल दस्तावेज़ लेखक।