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Jul 1, 2026

प्रकृतिः कैलाश-मानसरोवर में भी है फूलों की घाटी

 - सीताराम गुप्ता

मानसरोवर यात्रा के दौरान दिल्ली से अल्मोड़ा, घारचूला, मांगटी, गाला, मालपा व लमारी होते हुए बुधि पहुँचते हैं। बुधि से गुंजी का सफ़र शुरू होता है। कभी गर्मी लगती है तो कभी ठंड। रास्ते के पहले भाग में खड़ी चढ़ाई है। पहले कुछ यात्रा पैदल तय की उसके बाद की कुछ यात्रा घोड़े पर सवार होकर। इतनी खड़ी चढ़ाई है कि घोड़े पसीना-पसीना हो जाते हैं। वैसे हमें क्या हक़ है कि हम निरीह पशुओं पर इतना अत्याचार करें वो भी धार्मिक यात्राओं के दौरान। पशुओं से काम लेने की भी एक सीमा होनी चाहिए। कल मैंने घोड़े की आँखों में ज़बरदस्त गुस्सा देखा था। लगता था विद्रोह करने ही वाला है। मैं सहम सा गया था। मैंने साथ चल रहे घोड़े के स्वामी परदेसी से घोड़े की आँखों में व्याप्त गुस्से का ज़िक्र किया।

     परदेसी ने बतलाया कि साथ वाले घोड़े-घोड़ियाँ आगे चले गए हैं और ये अकेला पीछे रह गया है इसी से गुस्से में है; लेकिन मैं स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था कि उसका गुस्सा मुझ पर भी था। इन ख़तरनाक रास्तों पर घोड़े, खच्चर आदि जानवरों का चलना ही मुश्किल है पीठ पर सवारी बिठाकर अथवा बोझ लादकर चलना तो बहुत ही कष्टप्रद है इसमें संदेह नहीं। ख़ैर चलते-चलते छियालेख पहुँच जाते हैं। छियालेख पहुँचकर वहाँ  हमने सबसे पहले पूरी-छोले खाई और चाय पी।  छियालेख के बाद रास्ता कुछ ठीक है; लेकिन चढ़ाई-उतराई का क्रम समाप्त हो गया। ऐसी कोई बात नहीं; लेकिन कुछ रास्ता अपेक्षाकृत कम ऊँचा-नीचा था। यहाँ के लोगों के लिए तो ऐसा रास्ता समतल मैदान जैसा ही समझो। इसके बाद फूलों की घाटी आती है। छियालेख और गर्ब्यांग के बीच स्थित है यह फूलों की घाटी।

     इसे फूलों की घाटी ही कहा जाता है; लेकिन यह वो फूलों की घाटी नहीं है जो पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्ध है और जो उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में बद्रीनाथ के पास पुष्पावती नदी के समीप राज्य के चमोली ज़िले में पड़ती है। यह फूलों की घाटी उत्तराखंड से होकर गुज़रने वाली कैलाश-मानसरोवर यात्रा के मार्ग में पड़ती है जो राज्य के कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ ज़िले में स्थित है। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में स्थित फूलों की घाटी एक विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क का एक भाग है और ये यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित फूलों की घाटी एक स्वतंत्र पर्यटक स्थल नहीं है जहाँ पर्यटक इसे देखने के लिए आते हों और इसका कारण है मार्ग का अति दुर्गम होना।

     गढ़वाल मंडल में स्थित विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए गोविंद घाट से घंघरिया तक 16 किलोमीटर की यात्रा पैदल अथवा घोड़ों पर की जा सकती है। गोविंद घाट से घंघरिया तक हेलिकॉप्टर सेवा भी उपलब्ध है, जबकि कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित इस दुर्गम फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए लंबी ट्रैकिंग अपेक्षित है। पहले यहाँ तक पहुँचने के लिए तीन दिन की ट्रैकिंग अपेक्षित थी; लेकिन अब यहाँ पास तक सड़कें बनाई जा रही हैं। लोग बतलाते हैं कि सड़कें बनाने से यहाँ के फूलों और औषधी

य पौधों और दूसरी वनस्पतियों को नुकसान भी पहुँच रहा है। इस फूलों की घाटी को भी विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित फूलों की घाटी की तरह ही संरक्षित किया जाना चाहिए। मुझे इन दोनों ही फूलों की घाटियों को देखने का सुअवसर मिला है। दोनों का अपना-अपना विशिष्ट सौंदर्य है।

     छियालेख उच्च हिमालय का प्रवेश द्वार है क्योंकि यहीं से उच्च हिमालय का प्रारंभ होता है। यहाँ से चलने के कुछ देर बाद फूलों की घाटी आती है। अगस्त-सितंबर के महीनों में लगभग चार किलोमीटर क्षेत्र में फैली छियालेख घाटी सैकड़ों प्रजातियों के मनमोहक फूलों से महक उठती है; क्योंकि यहाँ सामान्य पर्यटकों का आना असंभव है अतः केवल कैलाश-मानसरोवर यात्री अथवा स्थानीय व्यक्ति ही अपनी यात्रा के दौरान इस घाटी के अद्वितीय सौंदर्य का आनंद उठा सकते हैं। पहाड़ों की निचली ढलानों पर तथा घाटी से गुज़रने वाले रास्ते के आसपास विभिन्न प्रकार के असंख्य नन्हे-नन्हे फूल रंग-बिरंगी चादर-सी बिछी दिखलाई पड़ रही है। विविध आकार और वर्ण के फूल चारों और दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे-ऐसे रंग के फूल कि पहले कभी भी कहीं देखे ही नहीं। नीले, पीले, सफ़ेद, बैंगनी और न जाने कितने रंगों के ख़ूबसूरत फूल।

     कुछ फूलों का रंग तो ऐसा पारदर्शी नीला, कि लगता हैं मानो अभी-अभी नील मिले पानी में डुबोकर निकाले गए हों। सभी रंगों के फूलों में पर्याप्त विविधता है; लेकिन नीले रंग के फूलों में इतनी अधिक विविधता है कि रंगों की सूची बनाना भी संभव नहीं। इनमें से अनेक प्रजातियाँ औषधीय गुणों से भी युक्त हैं। फूल तो फूल उनके पौधों की पत्तियाँ भी विविधता व विशिष्टता लिए हुए ही हैं। एक बात ज़रूर है और वो ये कि फूल अपेक्षाकृत छोटे आकार के हैं। 

     बुधि कैंप में भी डेलिया व होलीहॉक्स व अन्य कई क़िस्म के फूलों के पौधे लगे हुए थे; लेकिन ये पूर्ण विकसित बड़े आकार के थे।   

 फूलों की घाटी और अन्य पेड़-पौधे व वनस्पतियाँ यात्रा मार्ग को अविस्मरणीय बना देती हैं।

सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली – 110034, मोबा- नं. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in


Apr 1, 2026

मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ


 -  अजय मोहन

प्रशांत और हिंद महासागर से जुड़ा है मौसम का बदलता पैटर्न

फरवरी मध्‍यम में गर्मी की दस्तक के बाद मार्च में ही हीटवेव का आना गंभीर संकेत है। इसके पीछे क्या कारण हैं, जानिए इस रिपोर्ट में जो हाल ही में वैज्ञानिकों ने तैयार की है।

भारत में मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सामान्यतः ला नीना जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र वैश्विक तापमान को कुछ हद तक ठंडा करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के असर को कमजोर कर दिया है। इसका परिणाम यह है कि भारत में सर्दियाँ  छोटी होती जा रही हैं और गर्मी पहले से कहीं जल्दी दस्तक दे रही है। और वर्तमान में चल रहे मार्च के महीना में ऐसा देखने को भी मिल रहा है। 

एक समय था जब मार्च के मध्‍य तक उत्तर भारत में लोग कम से कम हाफ स्वेटर पहन कर रहते थे। दिन में भले ही थोड़ी गर्मी हो, लेकिन रातें ठंडी रहती थीं। ओर जब बात हीट वेव की आती थी, तब मार्च में लोग केवल यह सोच कर रहत में रहते थे कि अभी मई-जून दूर है। लेकिन अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा है। 

क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष भी भारत में फरवरी के पहले पखवाड़े में ही सर्दी लगभग समाप्त हो गई और कई क्षेत्रों में असामान्य रूप से जल्दी गर्मी शुरू हो गई। यह बदलाव केवल तापमान का नहीं है, बल्कि इससे जल संकट, कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

फरवरी से ही बढ़ने लगी गर्मी

मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी के दूसरे पखवाड़े से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। कई स्थानों पर तापमान हीटवेव की सीमा तक पहुंचने लगा।

तीन प्रमुख स्थान जहाँ हीटवेव जैसा महसूस हुआ वो हैं:

1. मुंबई : जहाँ 10 मार्च को तापमान 40°C दर्ज हुआ, जो सामान्य से 7.6°C अधिक था और इसे गंभीर हीटवेव की श्रेणी में रखा गया।

2. दिल्ली-एनसीआर : यहाँ अधिकतम तापमान लगभग 35°C रहा, जो सामान्य से 5–7°C अधिक है।

3. हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र: पहाड़ होने के बावजूद यहाँ सामान्य से 5.1°C से 8°C अधिक तापमान दर्ज किया गया।

मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मार्च से मई के बीच देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक हीटवेव वाले दिन देखने को मिल सकते हैं।

क्या होता है हीटवेव?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) हीट वेव को इस प्रकार परिभाषित करता है- जब तापमान सामान्य से काफी अधिक हो या वास्तविक तापमान एक निश्चित सीमा पार कर जाए तब उस क्षेत्र में हीट वेव घोषित की जाती है। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार तापमान का पैमाना इस प्रकार है- 

• मैदानी क्षेत्रों में: जब अधिकतम तापमान 40°C या उससे अधिक हो

• पहाड़ी क्षेत्रों में: जब तापमान 30°C या उससे अधिक हो

• तटीय क्षेत्रों में: जब तापमान 37°C या उससे अधिक हो

यदि यह स्थिति लगातार दो दिन तक बनी रहती है और एक से अधिक मौसम केंद्रों पर दर्ज होती है, तब इसे आधिकारिक रूप से हीटवेव घोषित किया जाता है।

हीटवेव को विस्तार से समझिए इस टेबल में -

 क्षेत्रआधार मानदंडहीटवेव (Heatwave)गंभीर हीटवेव (Severe Heatwave)
 मैदानी क्षेत्र   (Plains)जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 40°C या उससे अधिक होसामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 45°Cसामान्य से 6.4°C से अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 47°C
 पहाड़ी क्षेत्र   (Hills)जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 30°C या उससे अधिक होसामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिकसामान्य से 6.4°C से अधिक
 तटीय क्षेत्र  (Coastal)जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 37°C या उससे अधिक होसामान्य से 4.5°C या उससे अधिक

सर्दियाँ  क्यों हो रही हैं छोटी?

रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष उत्तर भारत में दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई।

• फरवरी में 81% वर्षा की कमी दर्ज की गई।

• सामान्यतः फरवरी में लगभग 22.7 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल 4.2 मिमी बारिश हुई।

इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) सामान्य से अधिक आए, लेकिन अधिकांश कमजोर रहे और पर्याप्त बारिश नहीं कर सके। कम बारिश और बादलों की कमी के कारण तापमान तेजी से बढ़ने लगा और सर्दी जल्दी समाप्त हो गई।

ला नीना भी नहीं रोक पा रहा गर्मी का बढ़ना

आमतौर पर ला नीना प्रशांत महासागर में ठंडे समुद्री तापमान से जुड़ा एक जलवायु चक्र है, जो वैश्विक तापमान को कुछ हद तक कम करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह पैटर्न बदलता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025, ला नीना की स्थिति के बावजूद 1901 के बाद आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। पिछले 11 वर्षों में से सभी 11 वर्ष रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ गया है कि अब प्राकृतिक शीतलन प्रभाव भी पर्याप्त नहीं रह गया।

बढ़ती आर्द्रता और ‘वेट बल्ब तापमान’ का खतरा

तटीय क्षेत्रों में केवल तापमान ही नहीं, बल्कि नमी भी तेजी से बढ़ रही है। इससे वेट बल्ब तापमान बढ़ता है। यानी वह तापमान जिसे शरीर महसूस करता है। जब नमी अधिक होती है तो शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इससे हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ने के साथ-साथ अन्‍य कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी

वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंद महासागर का तेजी से गर्म होना भी मौसम के असंतुलन का बड़ा कारण है।

• 1950 से 2020 के बीच हिंद महासागर का तापमान लगभग 1.2°C प्रति शताब्दी की दर से बढ़ा।

• भविष्य के मॉडल बताते हैं कि 2000 से 2100 के बीच यह वृद्धि 1.7°C से 3.8°C प्रति शताब्दी तक हो सकती है।

यह समुद्री गर्मी मानसून, वर्षा और चक्रवातों के पैटर्न को भी प्रभावित कर सकती है। समुद्र का तापमान जितना अधिक होगा मॉनसून में आने वाले चक्रवात उतने अधिक विनाशकारी होंगे। बीते वर्षों में बुलबुल, फानी, मोचा, सितरंग, आदि कितने भयावह थे, यह भारत व पड़ोसी देशों के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अच्‍छी तरह जानते हैं।   

उत्तर भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

उत्तर भारत विशेषकर इंडो-गंगेटिक मैदान, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली पहले से ही गर्मी की लहरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र हैं। यहाँ पर मई-जून में लू चलना आम बात है। हीट-वेव के दिन बढ़ने के कारण गर्म हवाएँ और अधिक गर्म हो सकती हैं। 

इससे इन राज्यों में निम्नलिखित जोखिम बढ़ सकते हैं:

1. लंबी हीटवेव से ज्यादा समय तक गर्म हवाएँ

2. रात्रि के तापमान में वृद्धि 

3. पेट संबंधी बीमारियों का खतरा 

4. जल संकट और भूजल पर दबाव

5. गेहूं जैसी रबी फसलों पर असर

6. शहरी क्षेत्रों में हीट आइलैंड प्रभाव

7. श्रम उत्पादकता में गिरावट 

भारत में मौसम के पैटर्न के बदलने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान बढ़ने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान में परिवर्तन

1901 से 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी का परिणाम है, हालांकि मानव गतिविधियों से उत्पन्न एरोसोल तथा भूमि उपयोग और भूमि आवरण (LULC) में बदलाव इसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। पिछले तीन दशकों (1986–2015) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस और सबसे ठंडी रात का तापमान लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।

समुद्र के स्तर में वृद्धि

वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण महाद्वीपीय हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्री जल का तापीय प्रसार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते दुनिया भर में समुद्र का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है। उत्तरी हिंद महासागर (NIO) में 1874 से 2004 के बीच समुद्र स्तर में वृद्धि की दर लगभग 1.06 से 1.75 मिमी प्रति वर्ष रही, जो पिछले लगभग ढाई दशकों (1993–2017) में बढ़कर करीब 3.3 मिमी प्रति वर्ष तक पहुँच गई है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात

बीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर 1951–2018 के बीच उत्तरी हिंद महासागर बेसिन में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की कुल वार्षिक संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इसके विपरीत, मानसून के बाद के मौसम में आने वाले बहुत गंभीर चक्रवाती तूफानों (Very Severe Cyclonic Storms - VSCS) की आवृत्ति पिछले दो दशकों (2000–2018) में स्पष्ट रूप से बढ़ी है, जिसमें औसतन प्रति दशक लगभग एक अतिरिक्त घटना दर्ज की गई है।

हिमालय में परिवर्तन

हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में 1951 से 2014 के बीच औसत तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के दशकों में इस क्षेत्र के कई हिस्सों में हिमपात में कमी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रवृत्ति देखी गई है। हालांकि इसके विपरीत, उच्च ऊंचाई वाले काराकोरम हिमालय में सर्दियों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक हिमपात हुआ है, जिसके कारण यहाँ के ग्लेशियर अन्य क्षेत्रों की तुलना में सिकुड़ने से काफी हद तक बचे हुए हैं।

भारी वर्षा और सूखा

1950 से 2015 के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं—यानी एक दिन में 150 मिमी से अधिक बारिश—की आवृत्ति में लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, 1951 से 2015 के दौरान भारत में सूखे की घटनाओं की संख्या और उनका भौगोलिक विस्तार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।

आगे क्या करना होगा?

रिपोर्ट के माध्‍यम से विशेषज्ञों ने कहा है कि बदलते मौसम से निपटने के लिए केवल चेतावनी र्याप्त नहीं होगी। इसके लिए कई स्तरों पर कदम जरूरी हैं:

• शहरों में हीट एक्शन प्लान लागू करना

• जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना

• जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना

• शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र और जल निकायों का संरक्षण

कुल मिलाकर भारत में मौसम के पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सर्दियों का छोटा होना और गर्मी का जल्दी आना अब अपवाद नहीं बल्कि नया सामान्य बनता जा रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन रणनीतियाँ  नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव, जल संकट और मौसम की अनिश्चितता भारत के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है। ( indiawaterportal) ■

प्रकृतिः घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है

 दक्षिण-पूर्वी ब्राज़ील के जंगल में नदी का किनारा है। हल्की बयार बह रही है। इस बयार में, पेड़ की शाखों से लटकी काई-युक्त लताएँ/टहनियाँ लटकन की तरह डोल रही हैं। यदि नज़ारा आपको महज़ कुदरती सजावट लगे, तो जान लीजिए कि कुदरती शिकारियों की तरह आप भी धोखा खा गए हैं। आप यदि इस ‘सजावट’ पर ज़रा गौर फरमाएँगे, तो पाएँगे कि इन लटकनों से घोंसलों को सजाया गया है और घोंसलों में पक्षी के अंडे/चूज़े रखे हैं। निराश न हो, यह सजावट थी भी शिकारियों को चकमा देने के लिए।

बायोलॉजी लेटर्स के अध्ययन के अनुसार, ब्लू मैनाकिन (Chiroxiphia caudata) नामक चिड़िया अपने अंडों और चूज़ों की सुरक्षा के लिए घोंसलों में लंबी-लंबी लटकनें लटका देती है, ताकि टूकेन समेत अन्य शिकारियों को उनके घोंसले, घोंसले-जैसे न लगें और वे इनसे दूर ही रहें। ऐसा करने से इन शिकारियों द्वारा हमले की संभावना 10 गुना कम हो जाती है। हालाँकि बड़े शिकारी-पक्षियों के आक्रमण की संभावना तो फिर भी बनी रहती है, वे घोंसले पहचान सकते हैं। 

वैज्ञानिकों को काफी समय से यह पता था कि ब्लू मैनाकिन और अमेरिका की कई अन्य पक्षी प्रजातियाँ  घोंसलों में लटकन लटकाती हैं। उनका अनुमान था कि ऐसा शायद वे छद्मावरण देने के लिए करती होंगी। यानी ऐसा करने से घोंसले आसपास के परिवेश में घुल-मिलकर शिकारियों की नज़रों से ओझल रहते होंगे: लेकिन यह अनुमान पक्का नहीं था। एक विवाद यह था कि लटकनदार घोंसले तो ज़्यादा नुमाया हो सकते हैं और आसानी से पहचाने जा सकते हैं।

इस विवाद को सुलझाने के लिए फेडरल युनिवर्सिटी के पक्षी विज्ञानी मर्सिवल रॉबर्टो फ्रांसिस्को के दल ने ब्लू मैनाकिन द्वारा परित्यक्त घोंसलों की निगरानी करने का सोचा। जब ब्लू मैनाकिन का प्रजनन काल खत्म हो गया, तब पक्षी विज्ञानी कैसियानो मार्टिंस जंगल से 50 खाली और परित्यक्त घोंसले और उनकी काई-युक्त लटकन ले आए। प्रयोगशाला में उन्होंने प्लास्टिसिन (मॉडलिंग क्ले) से असली जैसे अंडे बनाए और हर घोंसले में ऐसे दो नकली अंडे रख दिए। फिर, अगले दो प्रजनन मौसम में इन घोंसलों को जंगल में ऐसी जगहों पर रखा, जहाँ कुदरती तौर पर काईदार लटकन बहुत कम पनपती है। शोधकर्ताओं ने कुछ घोंसलों पर लटकन लगी रहने दी, और कुछ की लटकन हटा दी। और घोंसलों की इंफ्रारेड कैमरे से निगरानी की।

लटकन होने का फर्क साफ दिखा। लटकन-विहीन 54 घोंसलों में से ग्यारह (20 प्रतिशत) घोंसलों से अंडे चोरी हुए थे, जबकि लटकन वाले 54 घोंसलों में से सिर्फ एक  अंडा चोरी हुआ था।

अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि लटकनदार घोंसले बनाने वाले पक्षी दरअसल अपने घोंसलों को न तो छुपाने की कोशिश करते हैं, न आसपास की किसी अन्य चीज़ जैसा दिखाने की। बस कोशिश यह होती है कि घोंसलों को ऐसे आकार दें कि वे घोंसले जैसे न दिखें, ताकि शिकारियों को पता न चले। हालांकि यह तरीका स्तनधारी या उन शिकारियों के विरुद्ध काम नहीं करेगा, जो शिकार खोजने के लिए गंध का सहारा लेते हैं। 

बहरहाल, एक सवाल बना हुआ है: इन घोंसलों पर काईदार जगहों पर ज़्यादा हमले क्यों होते हैं; क्योंकि यहाँ तो घोंसले अधिक ओझल होना चाहिए। शायद टूकेन पक्षी समझ गया हो कि ब्लू मैनाकिन अपने घोंसले काईदार जगह पर बनाता है। (स्रोत फीचर्स) ■


Feb 1, 2026

प्रकृतिः क्या पौधे भी संगीत सुनते हैं?

सुनकर क्या करते हैं?

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

“क्या आप अपने पौधों को संगीत सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं, जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।

इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?

दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भाँप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।

एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन  या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं। 

कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियाँ  पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियाँ, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति और हॉरमोन नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।

पादप ध्वनि विज्ञान

20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जाँचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।

अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा।

भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।

इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएँ , पौधे अच्छे से लहलहाएँ गे। (स्रोत फीचर्स) ■

Jan 1, 2026

प्रकृतिः आते हैं नभ से जल के मेहमान

 - रविन्द्र गिन्नौरे 

    प्रवासी पक्षियों का आगमन बदलते मौसम की सूचना सुखद जलवायु के साथ होता है। हर बरस हजारों मील की यात्रा करके पक्षी भारत सहित दूसरे देशों में सर्दियों में इसलिए आते हैं कि यहाँ का मौसम उनके लिए अनुकूल है। ऐसे पक्षियों की मूल भूमि का तापमान काफी गिर जाता है, जहाँ उन्हें अपना भोजन जुटाने के साथ अनुकूल वातावरण नहीं मिलता। विश्व स्तर पर प्रवास करने वाले पक्षियों के अपने निर्दिष्ट स्थान हैं। नियमित रूप से साल दर साल पक्षी प्रवास कर अपना निवास बनाकर प्रजनन वहीं करते हैं जहाँ उनका भोजन भी उपलब्ध रहता है।

   सदियों से पक्षियों का प्रवास चल रहा है, जिसे मानव ने बहुत बाद में जाना। चार दशक पूर्व तक इन पक्षियों का शिकार काफी होता रहा। शिकार के कारण पक्षियों ने अपनी जगह भले बदली परंतु प्रवास करना नहीं छोड़ा। पक्षियों की संख्या में कमी जरूर होती थी, परंतु उस खतरनाक स्थिति में नहीं पहुँचती थी कि इनकी प्रजाति ही विलुप्त हो जाए। बढ़ते प्रदूषण के कारण पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। बदलते मौसम और फसल चक्र में परिवर्तन के कारण प्रवासी पक्षी अपनी निर्धारित ठौर से भटकने को मजबूर हो गए हैं।

    तूफान और बाढ़ जैसी विभीषिका लगातार होने के कारण पक्षियों के प्रवास में बाधा पड़ती है। वैसे प्राकृतिक घटनाओं का आभास पक्षियों को पहले ही हो जाता है। ऐसे स्थिति में पक्षी तूफान के बाद, प्राकृतिक स्थिति निर्मित होते ही आ जाते हैं। 

      भारत में शरद ऋतु आते ही कुररी पक्षी (arctic tern) उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव के लिए उड़ान भरता है और वसंत आने पर प्रजनन करने अपने घर लौट आता है। यही कोई 35 हजार किलोमीटर की खतरों से भरी तूफानी यात्रा करके हर साल सफ़र करता है कुररी। आश्चर्य है कि कुररी पक्षी दो विपरीत ध्रुवों को जोड़ता है।

    सर्दियों के मौसम में खंजन भी आता है। तुलसी दास रामचरित मानस में लिखते हैं, 

'जानि सरद रितु खंजन आए, 

पाइ समय जनु सुकृत सुहाए।' 

           यह हमारे पुण्यों का सुफल है कि शरद ऋतु में खंजन आए। खंजन हर साल 5000 किलोमीटर दूर साइबेरिया, मंगोलिया आदि से हिमालय पार करके आते हैं। जो देश के जलाशयों को सुंदर तथा जीवंत बनाते हैं।

 खूबसूरत प्रवासी पक्षी-   रंग बिरंगे खूबसूरत अदा लिए तरह तरह के पक्षी नम भूमि में मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। स्वेंसन बाज (Swainsons's hawk) उत्तर-पश्चिमी अमरीका से चल कर अर्जेंटाइना पहुँचते हैं। खंतिया हंसक (shoveller) यूरेसिया से भारत तथा अन्य देशों में प्रवास करते हैं। लाल वारिरंक (red knot) कनाडा के ध्रुवीय क्षेत्रों से दक्षिण अमेरिका के दक्षिण कोने पेटागोनिया तथा तियेरा दैल फ्यूएगो में प्रवास करते हैं। ये प्रवासी पक्षी अपनी ख़तरनाक यात्रा के दौरान भूमध्य रेखा क्षेत्र के सदाबहार वनों को पार करते हैं। किन्तु, वहाँ रुकते नहीं ? क्योंकि पक्षी अपने गृह क्षेत्रों के समान ही प्राकृत वास तथा आहार पाना चाहते हैं। इस लिए ही अलास्का जैसे शीत प्रधान क्षेत्र में ध्रुव कूजिनी (arctic warbler) भूमध्यरेखीय फिलीपींस जैसे ग्रीष्म वर्षा के क्षेत्र में प्रवास करती है। 

आहार और आश्रय के लिए यात्रा पक्षियों के लिए मनोरंजन नहीं है। उनका प्रवास तो जीवन-मरण की यात्रा है। जो मौसम के अनुसार, आहार-शून्य होते प्रजनन क्षेत्र से पर्यावास के लिए साहसिक अभियान के साथ उड़ान भरते है। जब भी पक्षी के गृह क्षेत्र में आहार का 'अकाल' पड़ना शुरू होता है, पक्षियों को विशाल साहसिक उड़ान भरने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

    वास्तव में पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं, उनमें खोजने, घूमकर खोजने की सहजवृत्ति बराबर कार्य करती है। इसी सहजवृत्ति के कारण मानव सारी पृथ्वी पर फैले। प्रवास करने वालों की खोज या तो ऐसे आवास की होती है, जहाँ उन्हें बेहतर या घर जैसा माहौल मिल सके, जहाँ वे अपने घर जैसे आहार-शून्य मौसम में निर्भर रह सकें। पक्षियों को फल और कीट तो हमेशा रूचिकर लगते हैं। उनके शावकों को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन भरे कीट भी जरूरी होते हैं। अपने शावकों को वे भरपूर मात्रा में कीट मिले! संभवतः इसीलिए वयस्क पक्षी फलाहारी भी हो जाते हैं।

मौसम और जलवायु-

उत्तरी गोलार्द्ध में जब उत्तरी क्षेत्र में अत्यधिक ठंड पड़ती है, तब दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करें तो पहले समशीतोष्ण तथा बाद में भूमध्यरेखीय गर्म जलवायु मिलती है और उड़ते  रहें तो दक्षिणी गोलार्द्ध की ग्रीष्मकालीन भूमध्यरेखीय उष्ण जलवायु मिलती है। इससे भी और आगे उड़ते रहने पर समशीतोष्ण जलवायु मिलती है।

   अतएव अधिकतर पक्षी प्रवास उत्तर-दक्षिण दिशाओं में होते हैं। जैसे अभी तक की जानकारी के अनुसार पोइड क्रेस्टेड ककू दक्षिण अफ्रीका से मानसून आते ही भारत में प्रवास के लिए आते हैं जो वर्षा ऋतु पश्चात् लौट जाते हैं। चातक पक्षी अपने प्रवास क्षेत्र में प्रजनन करते हैं। यह उस नियम का अपवाद है, जिसमें माना जाता है कि प्रवासी पक्षी अपने गृह क्षेत्र में ही प्रजनन करते हैं; लेकिन इन्हें प्रजनन क्षेत्र में शावकों के साथ पालन के लिए पूरा समय नहीं मिलता। इस समस्या के हल के लिए मादा चातक अपना अंडा दूसरे पक्षी के घोंसले में देकर निश्चिंत हो जाती है।

     पक्षियों के प्रवास मार्ग का निर्धारण पर्वत श्रृंखलाओं, सागर तटों, हवाओं की दिशा, नदियों तथा विकास प्रक्रिया आदि से होता है। आहार की सुलभता, शिकारी पक्षियों, जानवरों तथा मनुष्यों से सुरक्षा तथा लाखों पक्षियों के ठहरने के स्थान भी प्रवास मार्ग का निर्धारण करते हैं। यथा संभव हवा की दिशा के अनुकूल उड़ना ही पक्षियों के लिए लाभकारी होता है। हवा का वेग उनके वेग में जुड़कर उनके यात्रा वेग को बढ़ाकर उनकी यात्रा समय कम कर देता है।

भारत में आने वाले प्रवासी पक्षी -

  भारत में प्रवास करने वाले पक्षियों में ग्रेट व्हाइट पेलिकन जो मुख्य रूप से यूरोप और मध्य एशिया से आते हैं इन्हें असम और उत्तर प्रदेश में देखा जाता हैं। द रफ, यूरोप और साइबेरिया से आते हैं यह उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा जाते हैं। ब्लूथ्रोट अलास्का से राजस्थान के भरतपुर पहुंचते हैं।ग्रेटर फ्लेमिंगो अफ्रीका और यूरोप से आकर गुजरात के पक्षी अभयारण्यों में विचरण करते हैं। द गैडवाल यूरोप और उत्तरी अमेरिकी से मध्यप्रदेश और ओडिशा की ओर जाते हैं। स्पॉटेड रेडशैंक आर्कटिक और यूरोप आकर हरियाणा के जलाशयों में रहते हैं। रोजी पेलिकन यूरोप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में ठहरते हैं। ब्लू-टेल्ड, बी-इटर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया से आते हैं, जिन्हें दक्षिण भारत की नमभूमि में देखा जा सकता हैं। साइबेरियन सारस (साइबेरियन क्रेन): पश्चिमी साइबेरिया से आते हैं जो भरतपुर नेशनल पार्क की शोभा बढ़ाते हैं। यूरेशियन स्पैरोहॉक ज्यादातर उत्तरी एशिया, यूरोप, साइबेरिया और टुंड्रा क्षेत्रों से लंबा सफर करके भारत में आते हैं और मार्च तक भारत में रहते हैं।

छत्तीसगढ़ में आने वाले प्रवासी पक्षी- 

   छत्तीसगढ़ में सर्दियों के मौसम में कई प्रवासी पक्षी आते हैं जो हजारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करके यहाँ डेरा डालते हैं। प्रमुख प्रवासी पक्षियों में गार्गनीज़, टफ्टेड डक, साइबेरियन स्टोनचैट, ब्लैक स्वान, कार्लोलाइन डक, क्रिस्टेड डक, मस्कोवी डक आदि शामिल हैं। इसके अलावा, गिधवा परसदा, बारनवापारा में दुर्लभ मलार्ड पक्षी आने लगे हैं, जो यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका के ठंडे इलाकों से आते हैं। सरगुजा संभाग में पाइड एवोसेड और मार्श हैरियर जैसे  विदेशी प्रवासी पक्षियों का भी आगमन होता है। धमतरी जिले में यूरोप, रूस, अमेरिका, साइबेरिया और अन्य दूर देशों से कई प्रवासी पक्षी आते हैं जैसे पैसेफिक गोल्डन प्लोवर, व्हिम ब्रेल, डनलीन, रिवर लैपविंग और टैमनिक स्टींट।ये पक्षी छत्तीसगढ़ के जंगलों, जलाशयों और दलदली इलाकों में प्रजनन और प्रवास करते हैं, जिससे प्रदेश की जैव विविधता समृद्ध होती है।    

    छत्तीसगढ़ वन विभाग और स्थानीय लोग अब पक्षी संरक्षण के लिए जागरूक हुए हैं। 

छत्तीसगढ़ के प्रवासी पक्षी- गार्गनीज़, टफ्टेड डक, साइबेरियन स्टोनचैटब्लैक स्वान, कार्लोलाइन डक, क्रिस्टेड डक, मस्कोवी डकमलार्ड (दुर्लभ प्रजाति) पाइड एवोसेड, मार्श हैरियर पैसेफिक गोल्डन प्लोवर, व्हिम ब्रेल, डनलीन, रिवर लैपविंग, टैमनिक स्टींट आदि हैं। छत्तीसगढ़ प्रवासी पक्षियों की विविधता जैविक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। 

       पक्षियों के आगमन से तालाब, झील का इलाका चहचहाहट से गूँज उठता हैं। मनमोहक पक्षियों को निहारने का आनन्द हर साल आता है सर्दियों में।

ravindraginnore58@gail.com