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Aug 1, 2026

कविताः ठहरा हुआ पल

  - भावना सक्सैना

मन उदास है

क्यों, पता नहीं

कुछ चाहिए

क्या? ये पता नहीं


ये दुख भी नहीं कि रोकर बह जाए

ये ख़ुशी भी नहीं कि हँसकर जी जाए


बस एक ठहरा हुआ- सा पल है

जो दिन भर चुप रहता है

और रात होते ही

अपना हिसाब खोल देता है


रात आती है

तो अनकिए की आहट लाती है

कुछ सपने

जो बस सोचे गए

कुछ रास्ते

जो छूटते चले गए


कोई मलाल भी नहीं

कोई संतोष भी नहीं

बस एक हल्की- सी कसक

जिसका कोई नाम भी नहीं


वक़्त के साथ तहें जमती जाती हैं

बिना शोर, बिना शिकायत

हर तह में, थोड़ा- सा मैं हूँ

थोड़ा सा वो, जो कभी थी


और कुछ खाली जगहें भी

जहाँ होना था कुछ;

पर रह गया… बस ‘शायद’


मैं अकेली नहीं

पर कोई पास भी नहीं

भीड़ में चलती हूँ;

पर लगता है कदम अपने नहीं


जो है

उसे सहेज पाने का भरोसा नहीं

जो नहीं है

उसके मिल जाने  की आस भी नहीं


फिर भी,

कहीं बहुत भीतर

थोड़ी- सी गर्माहट है


जैसे ठंडी राख में

धीमी- सी आग

जो बुझी नहीं है पूरी


शायद यही काफ़ी है अभी

कि सब ख़त्म नहीं हुआ


कि इन जमी हुई तहों के बीच

कहीं एक साँस चल रही है


धीरे-धीरे ही सही

पर ये परतें खुलेंगी कभी

और उस दिन,


मैं खुद से कह पाऊँगी

कि ठहरना भी एक सफ़र था

और मैं…

रुकी नहीं थी

बस…

थोड़ा-थोड़ा खुद को 

समेट चलती रही।


May 1, 2026

कहानीः राही

   - भावना सक्सैना

अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस का अंतिम दिन था। होटल की लाबी एक व्यस्त नदी की तरह बह रही थी,  आवाज़ों का शोर, गले में लटके नाम पट्टों के साथ गुजरते प्रतिनिधि, कहीं हँसते हुए सेल्फ़ी लेते, कहीं औपचारिक मुस्कान के साथ तस्वीरें खिंचवाते लोग, और थकान से भरी शाम।

हर कोई यहाँ एक राही था, किसी अपने शहर से दूर, कुछ पाने या कहने की राह पर। इस बहाव के बीच वह, शांत चेहरे, सधी चाल और थोड़ी थकी आँखों वाली भारतीय प्रतिभागी, जैसे अपनी ही लय में चल रही थी। भीड़ में चलते हुए भी वह किसी से टकराती नहीं थी, जैसे उसकी अपनी एक अदृश्य परिधि हो, जिसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। लोग पास से गुज़रते, कंधे लगभग छूते, पर वह हर बार एक हल्का- सा मोड़ लेकर खुद को बचा लेती, जैसे उसे अपने चारों ओर की इस नपी- तुली दूरी की आदत हो। उसकी चाल में हड़बड़ी नहीं थी, पर ठहराव भी नहीं, बस एक सधी हुई लय, जिसमें वह भीड़ का हिस्सा होते हुए भी उससे अलग बनी रहती थी।

कभी- कभी कोई हँसी उसके पास आकर ठिठकती, कोई बातचीत उसके कानों से छूकर निकल जाती, पर वह उनमें शामिल नहीं होती, सिर्फ एक शांत दर्शक की तरह उन्हें गुजरते देखती रहती। ऐसा लगता था, मानो उसने अपने भीतर एक छोटा- सा एकांत रच लिया हो, जिसे वह हर जगह अपने साथ लिये चलती है, भीड़ के बीच भी, बिल्कुल सुरक्षित, बिल्कुल अकेला।

उसने अपना हर कार्य मुस्तैदी से पूरा किया था। भाषण, नोट्स, चर्चाएँ, सब होते हुए भी उसे भीतर एक बारीक- सी खलिश खाए जाती थी - घर की। शब्द वह बोलती थी, सुनती थी, लिखती भी थी, पर हर वाक्य के बीच जैसे कोई अधूरा विराम आ जाता, जहाँ मन अनायास ही कहीं और भटक जाता। सामने स्क्रीन पर चल रही प्रस्तुति के ग्राफ़ और आँकड़े धुँधले पड़ जाते, और उनकी जगह घर के छोटे छोटे दृश्य उभर आते - रसोई में रखी आधी भरी चाय की केतली, बच्चों के बिखरे जूते, सुबह की वह जानी पहचानी आवाज़ें।

कभी वह नोट्स बनाते-बनाते रुक जाती, जैसे किसी शब्द के अर्थ नहीं, अपने ही भीतर की कमी को समझने की कोशिश कर रही हो। आसपास लोग उत्साह से बहस कर रहे होते, नए विचारों पर सिर हिला रहे होते, पर उसे लगता वह इस पूरे दृश्य में उपस्थित होकर भी पूरी तरह शामिल नहीं है।

वह एक सप्ताह से इस अनजान शहर में है। उसे याद आया, सुबह की वह जानी पहचानी हलचल, बच्चों का स्कूल के लिए धीरे-धीरे तैयार होना, किसी का जूता ढूँढना, किसी का आख़िरी समय पर कुछ पूछ लेना… और रसोई में चुपचाप उठती चाय की भाप, जो हर दिन की शुरुआत को एक सधे हुए क्रम में बाँध देती थी।

वहाँ कोई विशेष घटना नहीं होती थी, सब कुछ सामान्य, लगभग रोज़ जैसा ही पर शायद वही साधारण सी निरंतरता उसे भीतर से थामे रखती थी। यहाँ, इस सजे सँवरे, व्यवस्थित माहौल में भी, उसे उस अनगढ़- सी दिनचर्या की कमी हल्के से महसूस होती रही।

यहाँ सब कुछ था - सुविधा, साज सज्जा, व्यवस्थित समय, बस वही सहज- सा अपनापन नहीं, जो बिना कहे हर कोने में बसा रहता है।

यह कोई ऐसा दुख भी नहीं था, जिसे वह किसी से कह सके, बस एक महीन- सी कसक, जो हर थोड़ी देर में भीतर कहीं हल्के से चुभ जाती। जैसे कोई धागा हो, जो उसे लगातार खींचकर उस जगह ले जाना चाहता हो, जहाँ उसका असली केंद्र है - उसका घर।

सम्मेलन समाप्त होने के बाद का आख़िरी दिन ख़ाली रखा गया था; ताकि सभी प्रतिनिधि शहर का भ्रमण कर सकें। सभी प्रतिनिधियों ने समूह बनाकर शहर घूमने की योजना बनाई, उसने बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “आप लोग जाइए… मैं आज थोड़ा आराम करूँगी।”

किसी ने ज़ोर नहीं दिया, सबको लगा, वह बस थकी है। पर थकान उसके तन की नहीं, मन की थी। वह अपने कमरे में लौटी, बैग एक ओर रखा और खिड़की के सामने जाकर बैठ गई। नीचे दूर- दूर तक उजली सड़कों की हलचल थी और भीतर उसकी स्मृतियों के कोने में घर का शांत प्रकाश। मोबाइल उठाकर उसने बच्चों की तस्वीरें देखीं, बड़ा बेटा हँसता हुआ, छोटा किसी मस्ती में… उन दोनों के बीच उसकी अपनी दुनिया के केंद्र छिपे थे। तभी इंटरकॉम बजा - ट्रिंग… ट्रिंग… 

उसने रिसीवर उठाया। एक शांत, परिचित सी आवाज़ थी। वही भारतीय प्रोफेसर, जो सम्मेलन में अक्सर उसके पास बैठता था। औपचारिक बातचीत ही होती थी, पर उसकी आँखों में एक धीमी थकान और गहराई वह कई बार नोट कर चुकी थी।

“आप नीचे नहीं आईं? सब लोग घूमने गए हैं,” उसने पूछा।

“मन नहीं था,” उसने सच में कहा।

“तो… कॉफ़ी?” उसके स्वर में एक सरल- सा आग्रह था।

“क्षमा चाहती हूँ, मुझे चाय पसंद है।”

“यहाँ चाय तो बस रंग मिली गर्म पानी जैसी है।”

वह हल्का- सा हँस पड़ी।

“आप सही कह रहे हैं; लेकिन मैं अपनी व्यवस्था से चलती हूँ।”

वह अचानक बोला, “अच्छा तो आप कोई स्पेशल चाय लेकर आई हैं… इंस्टेंट वाली, घर जैसी?”

“हाँ, है मेरे पास।”

वह थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, “अजीब लगे तो माफ़ कीजिए… क्या एक पैकेट मिल सकता है?

तलब ऐसी हो रही है कि पूछे बिना रहा नहीं गया।”

वह खुलकर हँस दिया।

“चाय के लिए संकोच कैसा? आइए।”

कुछ ही मिनट में दरवाज़े पर दस्तक हुई।

वह अंदर आया, थका हुआ, पर सहज। कमरे का माहौल शांत और गर्म था, जैसे दो यात्राओं के बीच किसी स्टेशन पर थोड़ी देर का ठहराव।

वह बैठा, उसने केतली में पानी गरम किया और पहले दो कपों में सिर्फ़ गर्म पानी डालकर कपों को गर्म कर दिया। फिर दो चाय के कप बनाकर सामने रख दिए।

कप हाथ में लेते ही जैसे उँगलियों तक एक परिचित गर्मी उतर आई - धीरे धीरे हथेलियों से होती हुई भीतर कहीं ठहरने लगी। उसने कप को ज़रा कसकर थाम लिया, जैसे उस ताप में कुछ अपना- सा पा लिया हो।

दोनों कुछ पल चुप रहे। भाप हल्के हल्के ऊपर उठती रही, और उस छोटे से विराम में कमरे की निस्तब्धता और साफ़ सुनाई देने लगी, जैसे शब्दों की कोई जल्दी नहीं हो। उसने पूछा-“आपका इधर का अनुभव कैसा रहा?”

वह हल्का- सा मुस्कुराई, “अजीब है… हर सम्मेलन की ही तरह। इतने लोगों के बीच होते हैं, फिर भी असली बातें कहने का मौका कहीं नहीं मिलता।”

वह भी मुस्कुरा दिया, “शायद इसलिए… किसी बिल्कुल अनजान से कह देना आसान हो जाता है।”

दोनों हल्के से हँस पड़े, बिना किसी औपचारिकता के, बस उस सहज सहमति पर, जो कब बन गई, पता ही नहीं चला।

वह मेज़ पर रखे कप के किनारे को उँगली से हल्के से घुमाते हुए बोली - “दिन भर इतने लोगों से मिलते हैं… पर शाम होते होते लगता है, जैसे किसी से बात ही नहीं हुई।”

वह हौले से मुस्कुराकर बोला, “हाँ… बातें बहुत होती हैं, पर ज्यादातर बस काम की होती हैं। अपने बारे में कहने का मौका कम ही मिलता है।”

एक पल को दोनों फिर चुप हो गए, पर यह चुप्पी अब अलग थी, उसमें हल्की सी पहचान घुल आई थी।

वह बोला, “और काम का दबाव… वह तो हर जगह एक- सा है, है न?”

वह हल्का- सा हँसी, “हाँ, बस नाम और जगह बदल जाती है।”

फिर थोड़ी देर बाद, जैसे बात अपने आप गहरी हो गई , “आप घर को… बहुत मिस करती हैं?

उसने सिर झुका लिया, “बहुत। शायद जितना कह नहीं सकती। मेरे माता- पिता… जब मैं छोटी थी, तभी गुज़र गए। रिश्तेदारों ने पाला… अच्छा पाला, पर घर जैसा अपनापन? वह कभी नहीं मिला। इसलिए जब अपना घर बना… अपनी दुनिया… तो हर बार उससे दूर होना मुझे किसी खालीपन की याद दिलाता है।”

उसने अनजाने में उसके दर्द के नीचे छिपे साहस को महसूस किया। वह धीरे से बोला, “मैंने भी घर जल्दी छोड़ दिया था। पर परिस्थितियाँ अलग थीं… मेरे पिता बहुत कठोर थे। हर बात पर डाँट, हर सपने पर प्रश्नचिह्न,असंतोष और अविश्वास। मैंने एक दिन बस… भाग जाने जैसा निर्णय लिया।”

उसकी आँखें थोड़ा चौड़ी हुईं ।

“भाग गए थे?”

वह सिर हिलाकर बोला,  “अठारह का था, ख़ुद को बड़ा समझने लगा था। जेब में बस तीन सौ रुपये; लेकिन मन में विश्वास बहुत था। जब पैसे ख़त्म हुए, तो पहले अख़बार बेचा, गलियों में घूम घूमकर। एक दिन बारिश में भीगते हुए भी बेचे थे, पन्ने नमी से भारी हो गए थे, किनारे मुड़ने लगे थे… पर लगा, अगर ये निकल जाएँ, तो रात की रोटी की चिंता नहीं रहेगी।”

वह हल्का- सा मुस्कुराया, जैसे कोई दूर की बात याद आ गई हो, “पहली बार जब कुछ पैसे हाथ में आए थे न… तो खर्च करने की जल्दी नहीं हुई। देर तक बस देखता रहा उन्हें। अजीब- सा लगता था कि ये सच में मेरे हैं।”

थोड़ा रुककर उसने आगे कहा, “फिर एक पंक्चर वाले की दुकान में काम मिला, हाथों में ग्रीस, कपड़े मिट्टी और कालिख से सने। कभी-कभी चाय की टपरियों पर भी… बस खाने भर को। कई रातें ऐसी भी रहीं जब ठीक से सोना नहीं हुआ, कहीं भी जगह मिल गई, तो वहीं लेट गया; पर नींद से ज़्यादा यह सुकून होता था कि दिन निकल गया।”

उसने एक हल्की साँस ली, “और हाँ… कभी-कभी काम माँगने जाता था, तो लोग देखे बिना ही मना कर देते।

बात छोटी थी, पर उस वक़्त… थोड़ा अजीब लगता था। जैसे आप सामने होकर भी कहीं दर्ज नहीं हो रहे।”

वह उसकी ओर देखती रही, घृणा या दया से नहीं, बल्कि उस शांत दृढ़ता के प्रति, जो इन साधारण- सी बातों में छिपी थी।

वह आगे बोला, “रात में ट्यूशन पढ़ाकर कुछ पैसे मिलते। किसी ने कहा- टाइपिंग सीख लो, काम आएगी। शुरू में उँगलियाँ बार बार अटकती थीं… बाकी लोग आगे निकल जाते थे। पर मैंने सोचा, रुकना तो वैसे भी नहीं है, तो वहीं बैठकर धीरे धीरे सीखता रहा।” वह हल्का- सा मुस्कुराया, “और पहली बार जब स्टेनो की परीक्षा पास की, तो लगा… जैसे अपनी ज़िंदगी में पहली ईंट खुद रखी है।”

“और अब?” उसने पूछा।

वह मुस्कुराया - ताज्जुब और विनम्र गर्व का मिला- जुला भाव था वह।

“अब… सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर हूँ। पर बेरी के पेड़ के नीचे बैठकर फटी उँगलियों से टायर पीटने वाला लड़का अब भी मेरे भीतर ज़िंदा है। शायद अच्छा है… वही मुझे नम्र रखता है।”

कमरे में जैसे शाम और गहरी हो गई।

चाय की भाप ऊपर उठती रही और उसके साथ दोनों की ज़िंदगी की परतें खुलती चली गईं।

वह बोली, “मेरे जीवन में प्रेम, ज़िम्मेदारी, संघर्ष, सब रहा। पर मैंने सीखा कि सबसे ऊँची दीवारें हमारे भीतर ही बनती हैं… और उन्हें गिराने का साहस भी भीतर ही होता है।”

“सही कह रही हैं,” वह बोला, “और शायद यही बात… मुझे हमेशा मेहनतकश बनाए रखती है। जो खोया, वह मेरा भाग्य था। जो पाया, वह मेरा परिश्रम।”

धीरे धीरे दोनों खुलते गए। न कोई बनावट, न कोई दिखावा। अजनबी होते हुए भी वे दो घंटे के लिए एक दूसरे के दर्पण बन गए थे।

जब बातें थम गईं, तो दोनों कुर्सियों पर सीधा बैठ गए, जैसे याद आया हो कि यह ठिकाना नहीं, बस ठहराव है।

दोनों अलग-अलग रास्तों के राही थे, अपनी-अपनी दिशाओं, अपने-अपने अनुभवों और थकानों के साथ चलते हुए। फिर भी उस शाम, अनायास ही, उनकी मंज़िल कुछ देर के लिए एक हो गई थी, जैसे दो रास्ते कहीं आकर हल्के से छू लेते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।

उस थोड़े से ठहराव में न कोई दावा था, न कोई अपेक्षा, बस साथ होने का एक शांत- सा बोध, जो बिना नाम के भी पूरा लगता था।

रात को टीम के साथ नीचे लॉबी में उतरे, तो दोनों ऐसे चले जैसे कभी मिले भी न हों। वही औपचारिक मुस्कान, वही दूरी। अगले दिन एयरपोर्ट पर चेक इन के दौरान वह उसके पास आया। “कल… आपसे बात करके अच्छा लगा। चाय और समय दोनों के लिए शुक्रिया। ऐसे कोई सुन ले… यह भी कम है जीवन में।”

वह बोली, “हाँ। कल का दिन थोड़ा आसान हो गया।”

फ्लाइट में दोनों दूर बैठे थे।

लैंड करने के बाद सामान बेल्ट के पास उन्होंने एक हल्की मुस्कान के साथ एक दूसरे की ओर सिर झुकाया, “अपना ख़याल रखिएगा।”

“आप भी।”

बस इतना। न कोई वादा था, न भविष्य की राह, न फ़ोन नंबरों का आदान-प्रदान। वे उतने ही अजनबी रहे जितने पहले थे: पर उन दो घंटों ने उनकी ज़िंदगी में एक शांत, अनाम सी जगह भर दी थी, जिसका कोई नाम नहीं था, पर जिसका असर धीमे- धीमे भीतर तक उतर गया। वे फिर अपने अपने रास्तों के राही बन गए। 

May 2, 2025

कविताः अम्मा का गुटका





 - भावना सक्सैना

चाची और अब छोटी भाभी ने

बड़ी सँभाल से रखा है

मटमैली जिल्द और

पीले पन्नों वाला

रामायण का एक गुटका

अम्मा का गुटका

देख उसे अनायास ही

भीग गईं अँखियाँ।

अम्मा के इस गुटके में

साँस ले रही हैं

कितनी कहानियाँ

कितने चित्र, कितनी स्मृतियाँ।

रामायण, गीता,  सुखसागर

गुनती, बाँचती अम्मा

पीछे कहीं बाबा की आवाज़

“अरी भागवान, बाल्टी में पानी भर

धूप में रखा या नहीं”

इसे देख जी उठा है बचपन

खुला ईंट बिछा आँगन

एक पीढ़ा, एक पलकिया

कहीं गाँव में मिलते हों शायद

शहर में तो नहीं दिखते 

न पीढ़ा, न पलकिया, न आँगन…

राम नाम की लूट है

गुनगुनाती

कँपकँपाते जाड़े में

हैंडपंप के पानी से स्नान कर

भीगे कपड़े निचोड़ती

भीगे बालों में खड़ी अम्मा

अपने ठाकुर जी और

लड्डू गोपाल जी को स्नान कराती

उनका शृंगार करती

धूप दीप सजाती, आरती देती

बतासा हाथ पर धर असीसती

सीधे पल्ले की धोती में

मुस्कुराती अम्मा

 काले फ़्रेम का चश्मा नाक पर चढ़ाए

फिर-फिर गीता के अध्याय दोहराती

जाड़ों की धूप

गर्मियों की लंबी दोपहर में

पढ़ती, सुनाती, समझाती अम्मा।


इस गुटके में महक है अम्मा की उँगलियों की

कुछ छंदों चौपाइयो पर हैं सही के निशान

उन्हें पढ़ा होगा, गुना होगा मेरी अम्मा ने बार-बार

या चिह्नित कर छोड़ा होगा आने वाली

पीढ़ी के लिए, किसी कुंजी स्वरूप

सब कुछ छोड़ मैं पढ़ना चाहती हूँ,

गुनना चाहती हूँ इसे

सब लागलपेट छोड़

हो जाना चाहती हूँ

अम्मा- सी सरल

उनका ही प्रतिरूप।

Jan 1, 2025

कविताः अंतराल

 -  भावना सक्सैना 



एक स्मृति की खोह है 

काली अँधेरी- सी कहीं 

मैं निकल आई हूँ उससे 

खींचती फिर वो वहीं…

 

कुछ अधूरे पन्ने हैं 

जिन पर लिखा जाता नहीं 

है कलम अब मौन प्रतिपल 

स्याही भी सूखी हुई- सी। 

 

गीत कुछ भूले हुए से 

मन की तह को टोहते 

विस्मृत किसी कंदरा से

स्वर उभरते वेदना के 

 

कैसे लौटूँ उस जगह 

दर जहाँ अब है नहीं 

लौटने का अर्थ होगा 

छोड़ना फिर खोह नई  


भूलना वह सब भी जो 

राहें सिखाती चल रहीं 

जो वहाँ से थी चली 

वो तो अब हूँ भी नहीं। 

 

समय रथ के पहिए संग 

विवर फैलते रहे 

विगत और वर्तमान को

कोई कैसे लेकर संग चले

 

मन ये अक्सर सोचता है  

कुछ नहीं अब है वहाँ 

कोई स्वर दबा फिर पूछता 

क्या सच में सब चुक गया?


अब वहाँ चेहरे हैं जो 

समय के सब चिह्न लिये 

पहचानते मुझको नहीं 

ज्यों अजनबी उनके लिए 

 

बरसों की इस राह ने 

बदला मुझे बदला उन्हें 

चली थी जो वहाँ से 

वो तो अब मैं हूँ नहीं। 

 

बरसों के अंतराल 

पाटने सरल नहीं 

फिर भी नित गहरे भीतर 

आस तो पलती रही। 

 


आस की कश्ती पकड़

चल समय संग बहते रहें 

कौन जाने कब कहाँ 

बिछुड़े हुए आकर मिलें।


Aug 1, 2024

लघुकथाः झूले का दाम

  -  भावना सक्सैना

शहर में बड़ा पार्क बना था। समाचार पत्र उद्घाटन की तस्वीरों से भरा हुआ था। रेडियो पर, टेलीविज़न के हर चैनल पर पार्क की चर्चा थी। मुनिया नहीं जानती थी 700 करोड़ कितना होता है ;लेकिन जब माँ ने नुक्कड़ की दुकान पर डबलरोटी लाने भेजा तो वहाँ कुछ सुन आई थी और इतना समझ गयी थी कि बहुत बढ़िया पार्क बना है! अपनी कालोनी के सूखी मिट्टी वाले रेलिंग टूटे व गायों के गोबर से भरे पार्क में बहुत दिन से जाना छोड़ दिया था। वहाँ के सभी झूले भी तो टूट चुके थे। बहुत जिद करने पर और माँ के मनाने पर पिताजी रविवार को नए पार्क ले जाने को मान गए। आलू पूड़ी, थर्मस, चिप्स, छोटे अन्नू का बैट-बॉल लिये पार्क पहुँचे तो दरबान ने गेट पर ही सारा खाना रखवा दिया, "अंदर खाना पीना मना है! जाते समय वापस मिल जाएगा; लेकिन बाहर का रास्ता दो नंबर गेट से है। यहाँ तक चलना कर आना होगा!"

अंदर अन्नू ने बॉल उछाली तो तुरंत एक गार्ड दौड़ा आया। - " अरे-अरे-रे ,बोर्ड नहीं देखते,क्या लिखा है - घास पर खेलना मना है!"

ताज़ा खिले गुलाब ने मुनिया की आँखों में चमक भर दी । उसने हौले से पंखुड़ी छुई तो माली चिल्लाया -‘अए लड़की ! फूल क्यों तोड़ रही है!”

वह रुआँसी हो उठी - ‘‘ पापा , मैं तो फूल छू रही थी !”

सुंदरता की फंकी लगा कर ट्रैक पर चलते बाहर निकलने को थे कि एकाएक मुनिया पूछ बैठी – " माँ झूले कितने के आते हैं?"       

Feb 1, 2023

कविताः प्राणशक्ति

  -भावना सक्सैना

घाम, पानी, शीत, आंधी

वह सभी कुछ सह चुका है

वक्त का दरिया लबालब

उसके ऊपर बह चुका है।

 

पौ फ़टे से दिन ढले तक

अनगिनत जो देखे दृश्य

ज़र्रा ज़र्रा रक्त में मिल

धमनियों को गह चुका है।

 

थाम न पाती शिराएँ

जम गया जो स्नायुओं में

बरसों बरस जमता रहा

जाने क्या-क्या तह चुका है।

 

सफर के इस मोड़ पर

रीतती जाती हैं आँखें

कल्पना में था महल जो

वो कभी का ढह चुका है।

 

पर नहीं सब कुछ थमा है

देख कोंपल फिर हरी हैं

बस ज़रा सा नेह जल दे

प्राण इसमें नहीं चुका है।

 

लगे जब सब कुछ चुका सा

बहुत तब भी रहता है...

बात बस एक दृष्टि की है

मन मेरा यह कह चुका है।

Sep 1, 2022

किताबेंः स्त्री संघर्ष का जीवंत दस्तावेज़

  - भावना सक्सैना

यादों के झरोखे (उपन्यास): लेखिका - श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर, प्रकाशन- 2021 (द्वितीय संस्करण), मूल्य : 300 /- पृष्ठ: 136, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, जे-19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110-059

स्त्री विमर्श समाज और साहित्य का अत्यधिक चर्चित विषय रहा है। परिवर्तन हुए हैं, हो रहे हैं। मंच सज रहे हैं नारे भी लगातार गूँज रहे हैं फिर भी नारी की स्थिति के सुधार में कोई विशेष अंतर नहीं है। और यह कारण पर्याप्त है पच्चीस वर्ष पूर्व लिखे स्त्री-प्रधान उपन्यास  यादों के झरोखे के पुनर्प्रकाशन के लिए। हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ कृति पुरस्कार व श्रेष्ठ महिला रचनाकार तथा वर्ष 2019 का महाकवि सूरदास जीवन साहित्य साधना सम्मान प्राप्त प्रतिष्ठित साहित्यकार श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर जी का उपन्यास यादों के झरोखे का द्वितीय संस्करण हाथ में आया, तो मन में सहज प्रश्न उठा कि पच्चीस वर्ष पुरानी कहानी आज कितनी प्रासंगिक होगी! पढ़ने के पश्चात् निःसंकोच कह पा रही हूँ कि संवेदनाओं को झकझोरती यह मर्मस्पर्शी कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी पच्चीस वर्ष पहले थी;  क्योंकि हम आज भी उसी समाज का हिस्सा हैं, जहाँ स्त्री लगातार अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। यह कहना निराशावादी लग सकता है कि हमारे समाज में आज भी हर मोर्चे पर अधिकतर स्त्रियों को स्वयं को साबित करना पड़ता है, चाहे वह समाज हो, घर-परिवार हो अथवा कार्यालय;  किंतु सुधार की दिशा में चलने का पहला कदम समस्या को पहचानना होता है, अतः आवश्यक है कि हम अपने समाज की इस समस्या को पहचानें और कोरे आडंबर व नारेबाजी से आगे निकलकर ठोस कदम उठाएँ। सुधार की दिशा में शिक्षा महत्त्वपूर्ण है और सुदर्शन रत्नाकर जी बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने बहुत सहज व सुंदर ढंग से इस तथ्य को रेखांकित किया है कि स्त्री को यदि अपनी समस्याओं से उबरना है, तो उसका एकमात्र हथियार शिक्षा ही हो सकती है। शिक्षा न सिर्फ व्यक्तित्व में निखार लाती है;  अपितु स्वावलंबी बनाने की दिशा में भी अग्रसर करती है। एक नया वितान खोलती है जहाँ आत्मनिर्भरता व आत्मगौरव का साथ मिलता है।

शिक्षा का महत्त्व और स्त्री जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती यह कहानी एक उपेक्षित पत्नी और उसकी पुत्री की है, जिसे पुत्री के शब्दों में फ्लैश बैक में कहा गया है अतः यादों के झरोखे शीर्षक सटीक है इस कथा के लिए। कहानी नई नहीं है, हर गाँव, कस्बे या शहर में कहीं न कहीं कोई नीरा अपना अभिशप्त जीवन काट रही है, किंतु कहन अद्भुत है। कहानीकार की शैली, शुरू से आखिर तक पाठकों को बांधे रखती है। अर्से बाद हुआ कि किताब उठाकर एक बार बैठी तो लगभग डेढ़ घंटे बाद उसे समाप्त करके ही उठी। 

माँ, नीरा की मृत्यु के पश्चात बचपन से लेकर, वर्तमान तक की जो रील मुक्ता के मस्तिष्क में चल रही है उस का साक्षी होता हुआ पाठक उसके दर्द में डूबने-तिरने लगता है। वह महसूसता है- पितृ स्नेह से वंचित बालिका की पीड़ा को, उलझता है उसके अनसुलझे प्रश्नों में। अबोध बाल-मन की पीड़ा की अभिव्यक्ति ऐसी है कि पाठक का मन न जाने कितनी बार उस उपेक्षित पीड़ित बालिका को अंक में भरकर ढाढस बँधाने को करता है और फिर इस बात में सांत्वना ढूंढ लेता है कि नरेन अंकल हैं उसके पास।

स्त्री प्रधान इस उपन्यास में स्त्री के दुख का जितना कारण पुरुष है, उससे कहीं अधिक दूसरी स्त्री है जो पुत्र मोह में और उसे सही राह पर लाने के प्रयास में दूसरी स्त्री को जीवन भर तिलतिल मरने के लिए मजबूर करती है। एक बार नहीं बार-बार! बाद में यह ग्लानि अवश्य उस पर हावी हो जाती है, किंतु तब भी वह उस पहली स्त्री को उसके दर्द से रिहा नहीं कर पाती, नाम के बंधन से मुक्त नहीं कर पाती। समाज के भय का छद्म आवरण ओढ़े नीरा अभिशप्त जीवन ही जीती रहती है, जब तक कि नरेन का आगमन नहीं होता।

यह उपन्यास नीरा के संघर्ष, उसकी इच्छा, उसकी कामना, पीड़ा, छटपटाहट का जीवंत दस्तावेज है। नीरा का सहज रूप से चुप चाप सहते जाना पाठक को अखरता तो है, फिर भी अपनी संतान को बचाने के उसके दृढ़ निश्चय के प्रति नत-मस्तक हो जाता है। नीरा और नरेन का पावन संबंध भी पाठक को मुग्ध करता है।  इस संबंध की परिणति यदि दैहिक हो जाती,  तो शायद यह पाठक को उतना प्रभावित न करती, जितना उसकी पावनता करती है। लेखिका ने बहुत ध्यान से किसी भी पल इस संबंध को कमजोर नहीं पड़ने दिया है,  यह उनकी परिपक्व विचारधारा को दर्शाता है जिसकी समाज में आवश्यकता भी है और वह अनुकरणीय भी है।

इस कहानी के पुरुषों में जहाँ एक बहुत कमजोर है, तो दूसरा सबल चरित्र का है। स्त्री की ममता और कर्तव्यनिष्ठा का सजीव चित्रण करते हुए भी सुदर्शन रत्नाकर जी ने पुरुष के कमजोर व सबल पक्षों को बखूबी उभारा है। इस उपन्यास का यह दूसरा संस्करण है, पहला संस्करण 1996 प्रकाशित हुआ था, अतः अढाई दशक पहले के समाज का चित्रण है जिस पर गौर न किया जाए, तो कुछ बातें पाठक को हैरत में डाल सकती हैं जैसे कि घर में टेलीविज़न आदि सुविधाओं का न होना, स्टोव पर खाना पकाया जाना इत्यादि। लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह है कि भौतिक वस्तुओं की उपलब्धता में जो परिवर्तन हुए हों, स्त्री की दशा उनसे कोई खास प्रभावित नहीं हुई है। मन कह उठता है कि महानगर में थोड़ा बहुत सुधार हुआ हो सकता है, भारत के गाँवों में स्थिति अभी भी बहुत नहीं बदली है वहाँ आज भी बहुत सी महिलाएँ दोयम दर्जे का जीवन जी रही हैं।

उपन्यास की भूमिका स्वरूप लिखे डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय जी के शब्द इसका समग्र रूपांकन करते हैं। वह कहते हैं – श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर का उपन्यास, यादों के झरोखे इस दिशा में एक सार्थक पहल है। छोटे कैनवस पर थोड़े से पात्रों को लेकर सहज रूप में लिखा यह एक मार्मिक उपन्यास है। इस उपन्यास की विशेषता इसकी पठनीयता एवं प्रभावकारिता हैं। साधारण सी परिस्थितियाँ एवं घटनाएँ असाधारण एवं प्रभावक कैसे हो जाती हैं, यह उपन्यास इसका ज्वलंत प्रमाण है।

उपन्यास में ही दिए हिमांशु जोशी जी के शब्दों को उद्धृत करना भी समीचीन होगा। वे लिखते हैं- इस कथा में कहीं कोई उतार-चढ़ाव न होते हुए भी एक दाह है, एक दंश है जो निरंतर चुभता रहता है... कि कहानी, कहानी न रहकर दर्द का एक दस्तावेज बन जाती है। 

Jan 1, 2022

लघुकथाः माँ

- भावना सक्सैना

हेलो, हाँजी, हाँजी...हाँ, लेकिन वो तो साइकिल चलाता ही नहीं आजकल।

क्या कह रहे हैं... कहाँ, कैसे... ओह

मैं कहीं रास्ते मे हूँ उसके पापा पहुँचते हैं। मैं उन्हें बताती हूँ।

उसको लगी तो नहीं...जी, जी, अच्छा। बहुत धन्यवाद आपका।

मेट्रो में सामने बैठी महिला अचानक उद्वेलित हो उठी थी। उसकी साथी के चेहरे पर प्रश्न, असमंजस, चिंता के भाव आ जा रहे थे। वह अपनी जिज्ञासा को संभाले अपनी मित्र को देख रही थी जो पति को फोन करके बता रही थी कि किसी अनजान व्यक्ति ने उसे फोन पर सूचित किया है कि उनका किशोर पुत्र साइकिल लेकर घर से निकला था और रास्ते में गिर कर मूर्छित हो गया। उन व्यक्ति ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया दिया है। उसने पति को ताकीद की, कि वह शीघ्रातिशीघ्र बेटे के पास पहुंचें।

पति से बात कर उसने पुनः उस व्यक्ति को फोन कर भरे गले से पूछा -हाँजी वह बच्चा ठीक तो है न, सर में तो नहीं लगी। होश में है न, खून तो नहीं बह रहा। जी, जी अच्छा, पहुँच रहे हैं।

फोन की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए आँसुओं को रोकने का प्रयास करती रही वह।

साथ बैठी उसकी मित्र उसकी पीठ पर हाथ फेर लगातार उसे मौन ढाढस बँधा रही थी।

फोन फिर बजा...

हाँ, अरे क्या हुआ, आप रो क्यों रहे हैं, वो ठीक तो है? कुछ बोलिये, क्या ज्यादा चोट लगी है? अब उसका सब्र टूट गया था।

मित्र ने फोन उसके हाथ से ले बात करनी शुरू की, हाँजी भाई साहब कैसा है नीटू। हौसला रखिये ठीक हो जाएगा। बात कर सकता है क्या? इनसे बात करा दीजिए न। बहुत परेशान हो गई हैं।

हाँ, एक मिनट बेटा... लो बात करो, ठीक है।

हाँ!!!

कहाँ गया था? कौन सी सड़क पर? साइकिल खराब थी, तो क्यों लेकर गया

आ गए मज़े

बेटा मैं लौटकर तुझसे बात करती हूँ।

फिर धीरे से...अच्छा लगी तो न ज़्यादा!!!

बेटा आज इतना कुटेगा कि याद रहेगी।

हम्म

फोन बंद कर फफककर रो पड़ी माँ।

Mar 5, 2021

कविता- सुनो

-भावना सक्सेना

सुनो!
हर खाँचे में
सही बैठने को
छील देती हो
क्यूँ हर बार
ज़रा सा मन
कब समझोगी!
आदर्श
आखिर कुछ भी नहीं होते।
हर बार
हर किसी ने
गढ़ा है उन्हें
अपने लफ़्ज़ों में
अपनी सहूलियत से...

तुम तो उपजी भी
शायद
एक आस को तोड़
जैसे बंजर परती पर
उग आई हो अमरबेल
या कोई पीपल
पत्थरों का सीना चीर।
इस तपती
रेतीली भूमि पर
तुम्हारा होना ही
है नमन योग्य
फिर क्यों शर्मिंदा हो
अपने होने पर
कि बार-बार
खुद को तोड़
अपने टुकड़ों से
भरती हो दरारें,
आंसुओं के
महीन रेशम से
करती हो रफू
जिंदगी के ताने-बाने,
जोड़ते रहने की
फितरत में
ढल गई हो तुम!

दोषी हो!
तुम ही अपनी
कि मौन रहीं सदा
और सहमत रहीं।
गढ़ा जाता रहा तुम्हें
बरसों बरस
उनके अनुसार
उम्मीदों की छैनी से
छीली जाती रही,
चमक की आस में
घिसी जाती रही,
हौसलों की आँच में
तपाई जाती रही।

क्या समझी नहीं
अब तक
कितना भी तपो
किसी का कुंदन बन पाना
नहीं है आसान
क्योंकि छिल-छिल कर
अस्थि स्तर तक भी
तुम पाओगी
या तुमसे कहा जाएगा
कि बस ज़रा सा
और होता
तो बेहतर था
तुम कितना ही
छिलो, घिसो या तपो
वो ज़रा सा
कम रह ही जाएगा

जिन मानकों को
रखा गया है
तुम्हारे सामने
उनमें से कोई
नहीं थी संतुष्ट।
ना सीता, ना राधा,
और न ही पार्वती
देवियाँ होकर भी थीं
अभिशप्त ज़रा ज़रा।
सूखने दो आंसुओं को
इनके नमक से
करना है तुम्हें
सत्याग्रह
बाहर आओ
अनंत वर्जनाओं से
कि तुम्हें ही तो
रचनी है सृष्टि
समझाना है
स्वार्थ सिंझी दुनिया को
कि किसी रोज़
दुनिया की सब औरतें
एकजुट हो अगर
बांध लेंगी अपनी कोख
तो सिमट कर
मिट जाएगा संसार।

Dec 6, 2020

कहानी- पूरा चाँद अधूरी बातें

-भावना सक्सैना

पढ़ते-पढ़ते आँख लग गयी थी शायद… खुली तो देखा रात बहुत गहरा चुकी थी। उठकर कुछ और करने का साहस न था तो उसने सोचा कि वापस नींद की गिरफ्त में खो जाना ही बेहतर होगा। टेबल लैंप बुझाया, तो चाँद भीतर चला आया। नर्म रोशनी पसर गई उसके ऊपर। नज़र चाँद पर ठहर गई। चाँद पूरा सा था… उसे देखती सोचने लगी, ये पूरा है या पूरा- सा है! जो पूरा दिखता है वह किसी के बिना कितना अधूरा होता है। अपने आप में क्या कभी पूरा होता है कुछ… सोचें तो किसी से मिलकर भी कहाँ पूरा हो पाता है, पूर्णता में दोष रहता ही है। बस एक ही तो है जो पूर्ण है! उसी से पूर्णता लेने के प्रयास में सब हैं और वह पूर्ण दे दे तब भी पूर्ण रहता है और हम सब कुछ लेकर भी अपूर्ण रहते हैं। 

जीवन में कितना कुछ रह जाता है। न चाहते हुए भी छूट जाता है और कभी तो जानबूझकर छोड़ना भी पड़ता है। अधूरी बातें एक- एक कर सामने पसरने लगीं। जब भी इन अधूरे टुकड़ों को समेटना चाहा है, उसे लगा है कि ये अधूरे टुकड़े अनन्त हैं। ये अनन्त चारों ओर गहमागहमी उत्पन्न करते हैं, फिर क्यों मन में एक शून्य व्याप्त हो जाता है। शायद अनन्त और शून्य एक ही हैं। शून्य, उसके आगे शून्य और, और आगे और भी बड़ा शून्य…  समझ नहीं आता कि क्या है जिंदगी में... जो है वो क्यों है और जो नहीं है वो क्यों नहीं है।

जाना ही नहीं है जब कहीं तो दौड़ते क्यों हैं?

क्या चाहिए? पता नहीं! क्यों चाहिए? पता नहीं। कभी उसने कुछ इसलिए चाहा कि वो होना चाहिए , तो कभी इसलिए कि वो किसी और के पास था और कभी तो सिर्फ इसलिए कि सब कहते थे वह उसे नहीं मिल सकता। जब- जब किसी चीज़ पर रोक लगी उसे पाने की उत्कंठा और बढ़ी। उसने अपनी ज़िद पूरी की, ज़िद में भी, नाराज़गी में भी... जहाँ तक का उसे याद आता है एक वक्त के बाद से उसने सिर्फ मन का सुना, मन का किया, आज़ाद कर लिया खुद को बंदिशों से और पंख पसार दिए प्रेम के खुले आकाश में। यह ज़रूर बाद में जाना कि बन्दिशें कभी समाप्त नहीं होतीं सिर्फ रूप बदलती हैं, विशेष रूप से स्त्री जाति के लिए। ये बंदिशें कभी औरों की लगाई होती हैं तो कभी अपनी ही, कभी प्रेम की होती हैं तो कभी नाराज़गी की। बहुत किया मन का फिर भी कभी आँख मीच कर सोचा तो पाया कि छोटी- छोटी कितनी ही बाते हैं जो नहीं की, कभी सभ्य होने के शगल में तो कभी अनजान, अनदेखी, अनचीन्ही बेड़ियों में जकड़े होने के कारण।

बहुत सी बातें हैं जो करने को दिल चाहता है, लेकिन कर नहीं पाता, भीतर का ही कुछ रोकता है उसे, उस नुक्कड़ की गुमटी पर बैठकर चाय पीने से जहाँ दो बड़े-बड़े पत्थर पर लकड़ी का एक लंबा तख्ता रखकर चायवाले ने उसे बेंच का आकार दे दिया है। उस चायवाले को स्टोव में पंप भरकर स्टोव की लौ और तेज़ करते हुए देखने और पीछे की ओर कप धोते लड़के को बैठकर देखना शायद उसकी क्लास स्वीकार नहीं करेगी। वो फेन मट्ठियाँ और यहाँ तक कि काँच के मर्तबान में रखी रंगबिरंगी मिठाइयाँ खाने को आज भी जी चाहता है, लेकिन वह रोज़ उसके पास से सैर करते हुए आगे बढ़ जाती है, कभी रुककर चाय नहीं पी वहाँ उसने। 

अकसर खयाल आता है कि काश अदृश्य होने की शक्ति होती उसके पास तो वहीं बैंच पर अदृश्य हो बैठ रहती और देखती व सुनती कि वहाँ जो एक हाथ में चाय औऱ दूसरे में सिगरेट फँसाकर खड़े होते हैं , वो इतनी संजीदगी से किस मसले पर चर्चा कर रहे होते हैं। 

 क्या ज़िन्दगी के संजीदा मसलों का हल नुक्कड़ की चर्चाओं में होता है? वह नहीं जानती; लेकिन कई बार उसे लगता है कि शायद ये नुक्कड़ की चर्चा न हो तो देश की अर्थव्यवस्था तो डूब ही जाएगी। न जाने वो कौन सा दिन होगा कि वह उस गुमटी पर चाय बनाने को कहकर वहाँ खड़े बुद्धिजीवियों से कह पाएगी कि सुनो, ये दुनिया ये देश तुम्हारे विमर्श से नहीं चलता। शायद ऐसा कभी हो ही न...

ज़िन्दगी के रेलमपेल में दौड़ते -भागते और रोज़ाना के रास्तों से गुजरते कितने चेहरे सामने आते हैं, जिन्हें देखने के इस तरह अभ्यस्त हो जाते हैं कि कोई परिचय या बात न होने पर भी वह ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। कुछ को देख सहज ही एक स्मित उभर आती है, जिसके प्रत्युत्तर में मिली मुस्कान दिन रोशन कर देती है।

कुछ हफ्ते पहले तक सुबह रसोई में काम करते देखती थी पीछे वाली बुजुर्ग महिला को। शायद अकेली रहती थी। नियम से 8 बजे तक उनका तौलिया बालकनी में सूखने आ जाता था।  शायद उनके घर के सामने वाली बालकनी में  धूप कम आती होगी, तो सर्दियों में पीछे ही कुर्सी डालकर बैठ जाती थी। छुट्टी होती तो  सारा दिन उसकी नज़रें वहीं घूमती रहती। बहुत बार मन किया कि उनसे जाकर मिले और उन्हें अपना फोन नंबर दे आ कि आंटी कभी भी जरूरत पड़े तो आप मुझे बुला सकती हैं। इस उम्र में भी उन्हें अपने सभी काम स्वयं करते देख एक गुनगुनी- सी मुस्कान फैल जाती है उसके चेहरे पर। सुबह हाथ में अखबार और दोपहर में कोई पुस्तक, शाम की ढलती धूप में चाय की प्याली। कभी वह पीछे की बालकनी में शाम को सूखे कपड़े उठाने जाती, तो मुस्कुराहटों का आदान प्रदान हो जाता था। अब कई दिनों से वह दिखाई न दी, तो बेचैनी बढ़ती जा रही है उसकी। किससे पूछे कि आण्टीजी कहाँ गई। फिर टहलने के बहाने पिछली गली में चली गयी थी एक रोज़ तो पता लगा था कि आण्टीजी कुछ अस्वस्थ हुई, तो उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया था। घर के आगे 'फ़ॉर सेल' का बोर्ड लगा था। उसका दिल रो उठा था… काश वह जाकर अपने मन की बात कह आई होती। वह कह भी आई होती, तो क्या उनके लिए कुछ कर पाती? कितने दिन तक उस बालकनी की खाली कुर्सी को देख मन में यही आता रहा था कि जीवन की परिणति कैसी होती है, कितने मन से उल्लास से परिवार बनाने वाले अकेले रह जाते हैं खाली नीड़ में।

एक लंबी सांस लेकर करवट बदली, तो खिड़की के बाहर के पेड़ की छाया से दीवार पर बन रही आकृतियों में उसे वो बुज़ुर्ग दंपती नज़र के आगे कौंध गए, जो रोज़ाना सामने वाले पार्क में कीर्तन में जाते थे। महिला जिस अदा से तैयार होती हैं, उन्हें देख दिल खुश हो जाता है। बहुत बार मन चाहा कि आंटी को कहा जाए कि आंटी आप बहुत सुंदर दिखती है आज भी, ईश्वर करे आप दोनों सदा यूँ ही साथ रहें हमेशा। लेकिन उस रोज जब ऑफिस से लौटते हुए यह सोचकर खुलकर मुस्कुराई कि आज पक्का बोलना है और आण्टी जी ने ब्लेंक -सा लुक दिया, तो शब्द भीतर ही जज़्ब हो गए। फिर एक सीख मिली कि ज़रूरी नहीं कि जैसा आप सोचते हैं, सामने वाला भी वैसा ही सोचता हो। वह आपकी भावनाओं से अलहदा सिर्फ आपका आवरण देखता है और अपने भरम बुनता है। उसके भीतर अपनी ही कहानियाँ होती हैं। 

हर व्यक्ति अपने भीतर एक अलग संसार लिये घूमता है। आप उसकी दुनिया में वहीं तक पहुँचते हैं, जहाँ तक वह अनुमति दे। और बहुत बार तो सामने वाला द्वार खोल बैठा होता है, तब भी आप उसके भीतर उतरने का साहस नहीं जुटा पाते कि आपको लगता है आप मन पर एक और बोझ नहीं उठा पाएँगे। मन हर बार किसी के दुख पर बेज़ार होता है, आहत होता है और फिर उसका उपचार करने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। 

 बस यही तो कारण था कि वह एक बार फिर छिलने का साहस न जुटा पाई थी।

कार्यालय परिसर के गेट पर खड़े गार्ड दिनचर्या में शुमार हैं, उनकी ड्यूटी बदलती रहती हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे रच बस गए हैं कि कुछ दिन न दिखें तो बेचैनी होने लगती है। राजस्थान वाली मुस्कुराती हुई गार्ड जिसे हेलो बोलने की आदत पड़ गई थी, जब कई दिन बाद दिखी और वह भी कुछ बुझी- बुझी- सी तो पूछने का बहुत मन था कि इतने दिन कहाँ थीं लेकिन मुस्कुराहट में सिमटे रिश्ते को शब्द न मिले। फिर वही चौड़ी मुस्कान के बीच से दोनों गुज़र गए थे और उस दिन के बाद वह फिर नज़र न आई। अब कहाँ खोजे उसे, बस प्रार्थना में याद करती है उसे कि जहाँ हो वह मुस्कुराती रहे।

वह पान वाला जिससे करीब 10-12साल पहले बड़े बेटे के लिए चिप्स खरीदती थी। बरसों हो गए उससे कुछ भी खरीदे; लेकिन उसकी मुस्कान वैसे ही खिलती है। कभी कभी यूँ ही जाकर उससे कुछ टॉफी और चिप्स खरीद लेती थी… उन टॉफियों में बचपन नहीं मिलता; लेकिन उस बुज़ुर्ग की मुस्कान मिल जाती। फिर जब लम्बी छुट्टी के बाद बहुत दिन बाद गुज़री उधर से तो वहाँ से उसका खोखा गायब था…  गार्ड से पूछा, तो पता लगा वह भी नया था, उसे कुछ नहीं मालूम। ऐसी न जाने कितनी मुस्कानें चलते- चलते मिलीं जीवन में और फिर खो गईं।

वो रिक्शावाला जिसके रिक्शे में बमुश्किल चार- पाँच बार बैठी होगी, लेकिन फिर भी वो हर दिन आवाज़ लगाता है यह जानते हुए भी कि जरा -सा आगे खड़ी गाड़ी उसे ही लेने आई है। उसकी गुहार सुन मन करता है रोज़ का रिक्शा लगा ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती। क्या एक को बाँध देना अन्य से अन्याय न होगा, तो चलती रहती है। जब गाड़ी नहीं आती, तो जो सामने मिलता है वही ऑटो या रिक्शा ले लेती है। आज ही तोऑटो लिया तो देखा चालक बहुत बुज़ुर्ग थे। मन कर रहा था उन्हें एक ओर बिठाकर पूछे कि क्या मजबूरी है कि वह इस उम्र में भी काम कर रहे हैं। नहीं कह पाई, वो जो आगे इंतजार कर रहा था उस तक पहुँचने को देर हो रही थी।

बस प्रारब्ध खींचता जाता है और नियति की डोर से खिंचते हुए न जाने कितनी बातें छूट जाती हैं पीछे। कितने लम्हे यूँ खो जाते हैं संकोच में, फिसल जाते हैं, पर मन पर एक छाप एक मलाल छोड़ जाते हैं… और मन भटकता, उड़ता फिरता है अधूरी चाहतों में। 

सोने की कोशिश में उसने फिर आँखें बन्द कर लीं और फिर उसकी बन्द आंखों में रोशनी के दो टुकड़े तैर गए। वह अक्सर सोचती है कि बन्द आँखों में जो दो रोशनी के टुकड़े, रहते हैं आँखें खोलने पर बिखर, गायब क्यों  हो जाते हैं... यही जीवन है शायद, हर पल कुछ छोड़ता बिखरता दूर जाता सा… इसी एहसास के साथ आँख फिर बंद हुई और नींद ने आँचल में समेट लिया उसे। शायद नींद में ही पूर्णता है!

E-mail : bhawnavsaxena@gmail.com

Jun 6, 2020

भावना सक्सैना की दो कविताएँ

भावना सक्सैना की दो कविताएँ
1. जड़ें
आदमी की
जड़ें उग आती हैं घरों में...
उसे नहीं चाहिए
जानकारी देश दुनिया की
उसकी बादशाहत से बाहर
ताज़-ओ-तख़्त
सभी बेमानी हैं!
वह हरदम सोचता है
दीवारों पर चढ़ रही सीलन की
कभी छत  से उतरती
तो कभी ज़मीन से चढ़ती।


और छत पर धरी
पानी की टंकी के नीचे
उग आए पीपल की।


उस पीपल को वह
उखाड़ फेंकना चाहता है
नहीं चाहता पीपल
जो अपनी जड़ें फैला
उस घर पर बना ले
एक मज़बूत पकड़
उस पर रखना चाहता है
वह कायम
अपना साम्राज्य
अपना आधिपत्य।


उसे ख़ौफ़ नहीं है
समय का
जो रौंद देता है सब
उसने देखे हैं
समय की गर्त में
तिरोहित भग्नावशेष
फिर भी
आदमी स्वयं को
समझता है शाश्वत
कभी पीपल सा
तो कभी बरगद-सा
महसूसता है खुद को।


और जानबूझकर
भूला रहता है कि
ड़ें, शाखाएँ और पुष्प
सभी रह जाएँगे
और
सबके रहते भी वह
उखड़ जाएगा एक रोज़।
2. शब्द
शब्द
अपने आप में
होते नहीं काबिज़,
सूखे बीजों की मानिंद
बस धारे रहते हैं सत्व...
उभरते पनपते हैं अर्थों में
बन जाते हैं छाँवदार बरगद
या सुंदर कँटीले कैक्टस,
उड़ेला जाता है जब उनमें
तरल भावों का जल।


न काँटे होते हैं शब्दों में
और ना ही होते हैं पंख
ग्राह्यता हो जो मन मृदा की
पड़कर उसके आँचल में
बींधने या अँकुआने लगते हैं।


शब्द हास के
बन जाते हैं नश्तर, और
नेहभरे शब्द छनक जाते हैं
गर्म तवे पर गिरी बूंदों से
मृदा मन की हो जो विषाक्त।


कहने-सुनने के बीच पसरी
सूखी, सीली हवा का फासला
पहुँचाता है प्राणवायु
जिसमें हरहराने लगते हैं
शब्दों में बसे अर्थ।
प्रेम की व्यंजना में
बन जाते हैं पुष्प, तो
राग-विराग में गीत के स्वर
और वेदना में विगलित हो
रहते पीड़ादायक मौन।


शब्द प्रश्न भी होते हैं
हो जाते हैं उत्तर भी
मुखर भी और मौन भी
गिरें मौन की खाई में
तो उकेरते हैं संभावनाएँ।

अनंत संभावनाओं को
भर झोली में, शब्द
विचरते हैं ब्रह्मांड में
खोजते हैं अपने होने के
मायने और अर्थ।


क्योंकि शब्द
अपने आप में कुछ नहीं होते।

Dec 12, 2019

यादों की गुल्लक


यादों की गुल्लक

- भावना सक्सैना 

आज अचानक बैठे-बैठे
फूट गई यादों की गुल्लक
जंगल मे बहते झरने से
झर-झर झरे याद के सिक्के
गौर से देखा अलट-पलट कर
हर सिक्के का रंग अलग था,
खुशबू थी बीते मौसम की
पीर जगाती दिल में, लेकिन
मौसम थे खुशरंग वो सारे।
इक इक सिक्का
लिए कहानी आया बाहर
एक बड़ी सी ढेरी दस की
बाबा की जेबों से निकले
बस वो सिक्के नहीं है केवल
हर एक पर अक्स छपा है
लाड़ लड़ाते बाबा का और
पैताने कम्बल में छिपने पर
दादी की मीठी झिड़की भी।
छोटा वाला एक वो सिक्का
जिसकी चुस्की रंग-बिरंगी
लेते लेते छूट ग थी
त्योरी देख बुआ की उस दिन...
सैक्रीन से बैठ जाएगा
गला तुम्हारा, और
रंग भी ठीक नही ये
कुल्फी, सॉफ्टी मलाई-बर्फ
शुद्ध दूध से बनते सारे
लेना है तो कुछ अच्छा लो।
एक चवन्नी मेहनत की है...
टाल और चक्की की फेरी
बड़ी प्रिय वो इस कारण, कि
पाठ वो पहला
अपने बूते कुछ करने का
जिससे चलना सीखा अकेले
और इसी ने राह बनाई।
एक अठन्नी, ली थी ज़िद कर
मेले जाते जाते
रिब्बन, माला, चूड़ी, गुड़िया,
खेल-खिलौने रंग-बिरंगे
टिका नहीं मन किसी पर आ,
तो, वापस आई घूमघाम कर
तब से यूँ ही पड़ी हुई है
बाट जोहती मेले की फिर...
कैसे कहूँ प्रेम और सद्भाव के
अब वो मेले यहां नही हैं।
रुपया एक मोहब्बत वाला
तकना बस नुक्कड़, छज्जे से
मन की पींगें उड़ती ऊँची
सामने आ बस नज़र झुकाई
लाज और संस्कार का रंग
गहरा था तब किसी भी रंग से।
और कई हैं सिक्के इसमें
राज़ अनूठे दुबके छिप-छिप
रेज़ा-रेज़ा  ख़्वाहिश के रंग
यादें ऐसी फैल गयी हैं
सिरे समेटे से न सिमटे।
डूब गई आकंठ इन्हीं में
पूंजी लिए हुए बचपन की
भीगे नयन हृदय हर्षाता
वक्त काश वो फिर आ पाता।