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Dec 6, 2020

किताबें- जाबाज़ वीरों की सत्य कहानियाँ

- स्वराज सिंह

पुस्तकः निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ

लेखिका: शशि पाधा

 प्रकाशक: प्रतिभा प्रतिष्ठान

नई दिल्ली, पृष्ठ: 150,मूल्य: 300/-

भारतीय जनमानस को प्रेरित करने वाली, देश के प्रति देशवासियों को उनका कर्तव्य याद दिलाने वाली जाबाज़ वीरों की सत्य कहानियाँ जो आज की पीढ़ी के लिए किसी भी धर्म ग्रंथ से बढ़कर है। देश धर्म से कहीं ऊपर होता है इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ लिखने वाली लेखिका श्रीमती ‘शशि पाधा’ जी, जिनकी रगों में ही देश भक्ति रची बसी है। श्रीमती शशि पाधा जी हिंदी की जानी मानी हस्ताक्षर हैं। ‘निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ’ से पहले इनकी पुस्तक ‘शौर्य गाथाएँ’ बहुत ही लोक प्रिय रही। लेखिका के पति पैरा स्पेशल फोर्स में उच्च पद पर रहे। इन्होंने इन सभी योद्धाओं को बहुत नजदीक से देखा। ऐसे योद्धाओं की कहानियों को जन-जन तक पहुँचाना इनका जुनून बन चुका है। ऐसे वीरों की कहानियाँ लिखकर लेखिका, आधुनिक पीढ़ी को देश के प्रति उनके दायित्व को याद दिलाना और उनमें नैतिक मूल्यों का समावेश करना चाहती है।

इस पुस्तक में पहली ही कहानी ‘एक अंतहीन प्रेमकथा’ अशोक चक्र से सम्मानित एक जांबाज़ योद्धा लांसनायक मोहन गोस्वामी की कथा है जिसने सितंबर 2015 में कुपवाड़ा में 10 दिन के अंदर 11 आतंकवादियों को दोज़ख में पहुँचा दिया और अंत में अपने घायल साथियों की जान भी बचाई। इसी दौरान आतंकवादियों की गोलियाँ इस जाबांज़ की जांघ और पेट मे आकर लगती है और यह योद्धा वीर गति को प्राप्त हो जाता है।लेखिका मोहन गोस्वामी के परिवार से मिलती है। उनकी पत्नी ‘भावना’ जो बहुत ही दृढ़ निश्चय वाली महिला है। उनकी जिजीविषा और दृढ़ता, जीवन में आगे बढ़ने की उनकी ललक प्रेरणा दायक और अनुकरणीय है।

‘अपनी आत्मा का कप्तान’ एक ऐसे योद्धा और उसके परिवार की कथा है जिसको सुनकर रौंगटे खड़े हो जाते है। कीर्ति चक्र से सम्मानित शहीद कैप्टन दविंदर जस्स पैरा स्पेशल फोर्स का जवान था जो आतंकवादियों का खात्मा करते हुए शहीद हो गया। बहुत अल्प समय के लिए ही यह सेना में अपनी सेवाएँ दे सका। इनका सपना भी सेना में जाना था और कमांडो बनना था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद एम बी ए किया और डिलाइट कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी पर थे, तभी उसे आई एम ए  से ट्रेनिंग के लिए पत्र आया। वह सब कुछ भूलकर अपना सपना साकार करने के लिए ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया। कैप्टन दविंदर जस्स  की कथा के साथ-साथ उनके परिवार की कहानी भी प्रेरणा देने वाली है।

‘मिट्टी का मोह’ 1965 भारत पाकिस्तान युद्ध की एक ऐसी कथा है, जो लेखिका के पति केशव पाधा से जुड़ी है। इस कथा में बर्की गाँव में रहने वाले चिरागदीन है ,जो वृद्ध और पत्नी के बीमार होने के चलते अपना गाँव नहीं छोड़ सके। 1965 के युद्ध मे बर्की गाँव भारत के कब्जे में आ गया था। काफी दिन इस गाँव में भारतीय सेना रही। इन बुजुर्ग लोगों से भारतीय सैनिकों की आत्मीयता बढ़ गई। आखिर हैं तो इंसान ही। लेखिका के पति ने एक दिन चिरागदीन से उनकी इच्छा पूछी। उन्होंने कहा मेरा जन्म जालंधर के पास एक गाँव मे हुआ था। उसने कहा आप मुझे मेरे गाँव ले जाइए। मरने से पहले अपना जन्म स्थान देखना चाहता हूँ। कैप्टन केशव पाधा ने उनकी इस इच्छा को पूरा किया। बाद में ताशकंद समझौते के कारण भारतीय सेना को वापस आना पड़ा। इस वृद्ध ने लेखिका के पति कप्तान पाधा को एक कटोरा मिट्टी औए एक कुरान की प्रति भेंट की लेखिका ने इस अमूल्य भेंट को सदा  सँभाल कर रखा।‘मिट्टी का मोह’ कथा मर्म को छू लेने वाली है। यह भावनाओं को छूने वाली एक ऐसी कथा जिसको पढ़ने के बाद कोई भुला नहीं सकेगा।

‘उद्यम से अधिकार तक बढ़ते कदम’ नियति से लड़ने वाले और उसे परास्त करने वाले ऐसे संकल्पी सैनिक की प्रेरक कथा है, जिसका विद्यालयी पाठ्यक्रम में होना बहुत जरूरी है। नवीन गुलिया ने तीन साल एन डी ए की तैयारी की और  परीक्षा पास कर इंडियन मिलिट्री अकादमी में ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया। नियति देखिए कि पासिंग आउट परेड की पूर्व संध्या पर एक बाधा दौड़ पार करते समय अपने किसी साथी का हल्का -सा धक्का लगने से संतुलन बिगड़ने से नौ फिट की दीवार से सिर के बल नीचे गिरे। गिरने से गर्दन के पास मस्तिष्क से जुड़ने वाली रीढ़ की हड्डी टूट गई। उसका शरीर पूरी तरह से पक्षाघात का शिकार हो चुका था। इलाज के लिए देहरादून से दिल्ली और फिर इन्हें पुणे के सैन्य अस्पताल ले जाया गया। शल्य चिकित्सा के द्वारा डाक्टर्स ने उनकी रीढ़ की हड्डी को जोड़ा। लगभग दो वर्ष तक सैन्य अस्पताल में रहने के बाद नवीन गुलिया को सेना से सेवानिवृत्त कर दिया गया। उनके सेवानिवृत्ति के प्रमाणपत्र पर लिखा था-100 प्रतिशत Disabled for life । पुणे में रहते हुए ही इन्होंने 99 प्रतिशत अंको के साथ दो साल का कम्प्यूटर कोर्स पास कर लिया था। इनकी संकल्प शक्ति का कमाल है कि इन्होंने 18632 फिट ऊँचे मार्सिमिक दर्रे पर टाटा कंपनी द्वारा उपलब्ध कार से पहुँचकर ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड’ में अपना नाम दर्ज कराया। ( यह कार कुछ इस तरह बनाई गई थी कि जिसे विकलांग नवीन गुलिया जी चला सके)  इनके साथ इस अभियान में कई पत्रकार भी थे। इनकी यह कथा बहुत ही प्रेरणा दायक है। ऐसे जीवट वाले व्यक्ति समाज के लिए अनुपम उदाहरण है जो हताश निराश व्यक्तियों में आशा का संचार कर सकते हैं।आज भी ये गुरुग्राम के पास अपने ग्राम ‘बरहाना’ सामाजिक कार्यो में लगे है और अनेक युवाओं को भावी जीवन के लिए तैयार कर रहे हैं। इनका मानना है-‘मैं एक सैनिक हूँ। मैं फौजी सैनिक न बन सका,किन्तु एक सामाजिक सैनिक तो हूँ।आज की सबसे बड़ी लड़ाई समाज सुधार की लड़ाई है और इस लड़ाई के मैदान में मैं एक अथक योद्धा हूँ।’

‘वीर स्थली का सिंह नाद’ में लेखिका ने 1 जुलाई 2016 को 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस के 50 वें स्थापना दिवस का वर्णन किया। इस समारोह सेना में सेवानिवृत्त हुए अधिकारी और इस यूनिट के शहीद हुए सैनिकों के परिवार भी आए हुए थे। लेखिका भी सपरिवार समाहरोह में आमंत्रित थी। लेखिका ने 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस के योगदान और इससे जुड़ी स्मृतियों को सुंदरता से उकेरा है। जिससे ये क्षण और भी यादगार बन गए।

‘अनाम सैनिक’ में लेखिका ने पूर्वोत्तर फैले उग्रवाद को समाप्त करने के लिए चलाए गए अभियान का उल्लेख किया है। के1 पैरा स्पेशल फोर्सेस की कमान लेखिका के पति ‘कर्नल पाधा’ ने सँभाल रखी थी। इन सभी सैनिकों को हैलीकॉप्टर द्वारा जंगल में उतारा गया। रात्रि को विश्राम करने के लिए इन्होंने एक टीले को चुना। वहाँ रात गुजारने के लिए ज़मीन खोदते है तो उन्हें वहाँ दो हैलमेट,अस्थि अवशेष और दो जापनी रायफल्स मिली। जाँच करने पर अनुमान लगाया  कि ये द्वितीय विश्व युद्ध में किसी हमले में मारे गए दो जापानी सैनिकों के अस्थि अवशेष हैं और उन्हीं की ही ये रायफल्स हैं। बाद में यूनिट से धर्म गुरु को बुलाकर उनका संस्कार किया गया और वहाँ एक चिह्न लगाया-‘विश्व युद्ध में शहीद हुए दो गुमनाम जापानी सैनिकों का स्मृतिस्थल।’

लेखिका ने युद्ध और युद्ध के बाद के अनेक पक्षों को अपनी इस पुस्तक में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इस प्रकार की रचनाएँ आज के समाज के लिए प्रेरक और मार्गदर्शक है।

Email- swarajharipur@gmail.com)

Apr 16, 2018

मूल्यांकन पद्धति पर उठते सवाल?

मूल्यांकन पद्धति पर उठते सवाल?
-स्वराज सिंह
सभी साक्षर बनेंगे तभी समाज की उन्नति होगी और देश आगे बढ़ेगा। निरक्षरता पग-पग पर व्यक्ति को अहसास कराती है कि यदि हम भी पढ़ लिए होते तो अच्छा होता। निरक्षर व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करने जाए या निकालने या किसी कार्यालय में, वह सहायता के लिए दूसरों का मुँह ताकता है। अपनी निरक्षरता के कारण उसे पग-पग पर हानि उठानी पड़ती है।
 6 से 14 साल बच्चों को साक्षर बनाना, साक्षरता अभियान का लक्ष्य है। यह सरकार और शिक्षकों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। विद्यालय से छात्रों का पलायन आज भी नहीं रुक रहा है। अभी कुछ दिन पहले नेशनल अचीवमेंटसर्वे(NAS)  की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार के स्कूलों में अभी भी ऐसे अनेक छात्र हैं, जो पढऩा-लिखना भी नहीं सीख पाए। इसके पीछे के कारणों की गंभीरता से खोज करने की आवश्यकता है। सरकार सभी छात्रों को साक्षर बनाने के लिए एक लक्ष्य निर्धारित करती है ,परंतु इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सबसे बड़ी समस्या आती है, छात्रों का स्कूल ही न आना। आज तक कोई भी प्रलोभन छात्रों को स्कूल तक लाने में पूरी तरह कारगर सिद्ध नहीं हुआ। सरकार अथक प्रयास करती है कि सभी बच्चें पढ़े। दिल्ली सरकार इस बार गर्मियों की छुटटियों में ‘मिशन बुनियाद’ कार्यक्रम चला रही है। इस कार्यक्रम के लिए पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया। शिक्षा विभाग का लक्ष्य है कि छठी से आठवीं तक का हर बच्चा अपनी कक्षा के स्तर तक का पढऩा-लिखना सीख जाए। परंतु यहाँ भी विद्यालय प्रमुख और अध्यापकों के लाख बार बुलाने के बाद भी छात्रों के विद्यालय न आने की समस्या आने वाली है। गर्मियों के अवकाश में अनेक अभिभावक अपने बच्चों के साथ अपने गाँव लौट जाते हैं और वे जाने से पहले पूछना भी जरूरी नहीं समझते। अभिभावकों का सहयोग नहीं मिलने के कारण इच्छित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाता।
प्राथमिक स्तर की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर कई वर्षों  से NDP( No Detention Policy) चल रही है। आठवीं तक कोई छात्र फेल नहीं हो सकता, इसलिए छात्रों ने पढऩा-लिखना बिलकुल छोड़ दिया। आठवीं तक तो छात्र स्कूल में नाम लिखवाकर वर्ष भर स्कूल न भी आए, तो भी वह पास हो जाता है। बस उस छात्र को एक दिन आकर उत्तर पुस्तिका पर केवल रोल नम्बर लिखने की ज़रूरत है। परीक्षक द्वारा उसकी उत्तर पुस्तिका पर शून्य अंक दे देने पर भी वह अगली कक्षा में चला जाएगा। आठवीं तक के छात्रों के माता-पिता चाहें तो भी उसे फेल नहीं कर सकते। छात्रों में पढऩे की आदत बिल्कुल भी नहीं रही या ये कहे कि आदत पड़ी ही नहीं। पढऩे की उम्र में जिसने नहीं पढ़ा वह आगे चलकर क्या पढ़ेगा? 14 वर्ष तक का छात्र पढऩे- लिखने में अच्छी तरह पारंगत हो जाना चाहिए परंतु NDPपॉलिसी ने छात्रों की नींव को पूरी तरह खोखला बना दिया। नौंवी कक्षा में वह कमज़ोर नींव के साथ आता है। कमज़ोर नींव पर भला मज़बूत भवन कैसे बन सकता है। पिछले दो तीन वर्षोँसे 9वीं कक्षा की SA (संकलित मूल्यांकन) में 25प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य कर दिया। छात्रों की पढऩे की आदत  है नहीं; अतरू  मैं जिस विद्यालय की बात कर रहा हूँ ,वहाँ 9वीं में 300 में से केवल 78 छात्र ही SA परीक्षा में 25प्रतिशत अंक ले पाए। बाकी बच्चे फेल हो गए।
हमारी शिक्षा व्यवस्था में अनेक खामियाँ आ चुकी हैं। यदि शिक्षा व्यवस्था में खामियों की सही जानकारी चाहिए तो शिक्षकों से अवश्य बात करनी चाहिए। शिक्षकों से ही क्यों; बल्कि विद्यालय के छोटे-बड़े हर कर्मचारी से। हर व्यक्ति कोई न कोई गहरी बात बताता है और अच्छा सुझाव भी देता है। परंतु विडम्बना यह है कि पॉलिसी ऐसे लोग बनाते है, जो स्कूली शिक्षा से जुड़े हुए नहीं होते। शिक्षक छात्रों का हित चाहते है। वे चाहते है कि सभी छात्र पढ़े ,परंतु जब छात्र स्कूल ही न आएँ, किताब कॉपी न लाएँ तो अध्यापक किसे और कैसे पढ़ाएँ? अभिभावक बुलाने से भी बच्चे के बारे में बात करने स्कूल नहीं आते। उनकी भी अपनी मजबूरी है, उन्हें अपनी दैनिक दिहाड़ी छोड़कर आना पड़ता है।
आज का अध्यापक औपचारिकताओं के बंधन में पूरी तरह जकड़ा हुआ है। अध्यापक को अध्यापक कम, काम करने की मशीन ज्यादा समझा जाता है। अध्यापक और छात्र के बीच के संबंध न जाने कहाँ खो गए हैं। भावात्मक संबंधों का ह्रास हो रहा है।
हमारी शिक्षा व्यवस्था की परीक्षा प्रणाली परीक्षार्थी का सही मूल्यांकन करने में असमर्थ है। इस वर्ष सीबीएससी बोर्ड ने इस प्रणाली में सुधार की कोशिश की तो इस परीक्षा- प्रणाली की विद्रूपता सामने आया। मैं खुद मुख्य परीक्षक के रूप में मूल्यांकन स्थल पर था। सीबीएससी के निर्देशानुसार एक ही आंसर सीट को फोटो कॉपी कराकर सभी परीक्षकों से मूल्यांकन कराया गया। एक ही छात्र की आंसर सीट पर भिन्न- भिन्न परीक्षकों ने भिन्न-भिन्न अंक दिए। अंकों का अंतर हैरान कर देने वाला था। एक परीक्षक ने 46 अंक दिए ,जो सबसे कम थे और दूसरे परीक्षक ने उसी आंसर सीट पर 73 अंक दिए जो सर्वाधिक थे। ऐसी मूल्यांकन पद्धति छात्रों के साथ भला कहाँ न्याय कर सकती है। मूल्यांकन पद्धति को न्यायकारी बनाने के लिए अब और कदम भी उठाने की आवश्यकता है।
वर्तमान समय में जो शिक्षा व्यवस्था है, उससे लाख बेहतर हमारी पहले की शिक्षा व्यस्था थी। हमने आधुनिक बनने के चक्कर में पुराने को छोड़ दिया और नए को ढंग से अपना नहीं पाए। हमारी स्थिति वही हो गई,‘धोबी का कुत्ता घर का न घाट का’। अब आवश्यकता है निरन्तर खोखली होती शिक्षा की जड़ को नष्ट होने से बचाया जाए। अपने देश की परिस्थिति एवं परिवेश के अनुरूप ही शिक्षा-नीति निर्धारित की जाए। छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। स्कूल में 20 प्रतिशत उपस्थिति वाला छात्र 70 प्रतिशत अंक कैसे लाएगा? उसके खराब परीक्षा-परिणाम के लिए किसी शिक्षक को कैसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा? अभिभावक की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है। बोर्ड अपना परीक्षा-परिणाम सुधारने के लिए क्या रचनात्मक काम कर रहा है, उस पर भी नज़र रखना ज़रूरी है। हमारी पूरी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। अगर आज हम इस पर ध्यान नहीं देंगे तो कल पछताने के लिए समय नहीं मिलेगा। कमोबेश यही स्थिति पूरे देश में मिलेगी। हमें जाग जाना चाहिए, अन्यथा फिर वही होगा-सब कुछ लुटाकर होश में आए तो क्या किया?
सम्पर्क: 61, दिल्ली सरकार आवासीय परिसर,सैक्टर-11 रोहिणी दिल्ली 110085

Aug 12, 2015

शिक्षा में अराजकता

सब कुछ लुटाकर होश में आए 
तो क्या किया?
 -स्वराज सिंह
 आज का चौंका देने और व्यथित करने वाला समाचार 'छह लाख तीस हज़ार मेडिकल छात्रों को 4 हफ़्ते में दोबारा देनी होगी परीक्षा’-यह आदेश सुप्रीम कोर्ट को देना पड़ा। कारण-परीक्षा की आंसर की लीक होना। इस काम में संलिप्त छात्र, शिक्षक और डॉक्टर पकड़ में आए। लीक करने  का सौदा 15-50 लाख में हुआ। क्यों हुआ ऐसा? हमेशा इस तरह की घटनाएँ क्यों होती हैं? कुछ प्रदेशों में नकल का खुला ताण्डव होता रहा। कुछ ऐसे भी स्थान हैं, जहाँ सीढ़ी लगाकर नकल कराने की घटनाएँ नहीं होतीं। क्या वे संस्थाएँ पाक- साफ़ हैं। छापामार दस्ते अपने आने की सूचना पहले दे दें या चालाक लोग अपने सूत्रों से पहले ही पता कर लें, तो कुछ भी पता नहीं लगेगा। कहीं-कहीं ऊपर के अधिकारियों का नकल कराने में मौन सहयोग होता है। इस तरह से स्कूली परीक्षाएँ पास करने वाले हर बार कुछ न कुछ रास्ते तलाश लेंगे। जो आज पचास लाख देकर पेपर या 'आंसर की’खरीदेगा वह कल जन सेवा करेगा या लूट का बाज़ार खड़ा करेगा?
आज हमारे देश में शिक्षा का स्तर इतना गिर चुका है कि जब मैंने इसकी हक़ीक़त को जानने का प्रयास किया तो हक़ीक़त जानकर मैं सन्न रह गया। मेरे एक परिचित का बच्चा दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है। वह 9वीं कक्षा में इस वर्ष फेल हो गया। उन्होंने मुझे अपने बच्चे के फेल होने के बारे में बताया।  मैंने अपने कुछ परिचित शिक्षकों से इस सम्बन्ध में गहराई से बात की, तो पता लगा यह सब CCE  पैटर्न और NDP( No Detention Policy) की देन है। आठवीं तक कोई छात्र फेल नहीं हो सकता ,इसलिए छात्रों ने पढऩा-लिखना बिलकुल छोड़ दिया। आठवीं तक तो छात्र स्कूल में नाम लिखवाकर वर्षभर स्कूल न भी आए, तो भी वह पास हो जाता है। बस उस छात्र को एक दिन आकर उत्तर पुस्तिका पर केवल रोल नम्बर लिखने की जरूरत है। परीक्षक उसकी उत्तर पुस्तिका पर शून्य नम्बर दे देगा और वह अगली कक्षा में चला जाएगा। आठवीं तक छात्र के माता-पिता चाहें तो भी उसे फेल नहीं कर सकते। छात्रों में पढऩे की आदत बिल्कुल नहीं रही या ये कहे कि आदत पड़ी ही नहीं। पढऩे की उम्र में जिसने नहीं पढ़ा वह आगे चलकर क्या पढ़ेगा? यही कारण है कि यह छात्र 9वीं कक्षा में फेल हो गया। पिछले वर्ष से 9वीं कक्षा की SA संकलित मूल्यांकन) में 25 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य कर दिया। छात्रों की पढऩे की आदत  है नहीं ; अत: मैं जिस विद्यालय की बात कर रहा हूँ वहाँ 9वीं में 300 में से केवल 75 छात्र ही SA परीक्षा में 25 प्रतिशत अंक ले पाए। बाक़ी बच्चे फेल हो गए। उन्होंने बताया कि 2014-2015 तक जो विद्यार्थी ग्यारहवीं कक्षा में आते थे उनमें से बहुत से SA परीक्षा में फेल होते थे ,परंतु वे दसवीं की FA (रचनात्मक मूल्यांकन) के 40 अंकों के आधार पर परीक्षा उत्तीर्ण कर लेते थे। तब 25 प्रतिशत की शर्त नहीं थी। SA व FA के नम्बर जुड़कर पास होते थे। 9वीं कक्षा में यदि SA परीक्षा में 25% अंक लाने की शर्त न होती, तो ये सभी पास हो गए होते। इनकी बातों में मुझे सच्चाई नज़र आई। मैंने सोचा यदि शिक्षा व्यवस्था की सही जानकारी चाहिए तो शिक्षकों से अवश्य बात करनी चाहिए। शिक्षकों से ही क्यों; बल्कि विद्यालय के छोटे-बड़े हर कर्मचारी से। हर व्यक्ति कोई न कोई गहरी बात बताता है और अच्छा सुझाव भी देता है। परंतु विडम्बना यह है कि पॉलिसी ऐसे लोग बनाते है, जिनका स्कूली शिक्षा से कोई नाता नहीं होता। शिक्षक भी छात्रों का हित चाहते है; परंतु जब छात्र स्कूल ही न आए, आए तो किताब कॉपी न लाए तो अध्यापक किसे और कैसे पढ़ाएँ। अभिभावक बुलाने से भी बच्चे के बारे में बात करने स्कूल नहीं आते। पैसा लेने जरूर आ जाते हैं। ड्रेस के लिए मिले पैसे से ड्रेस नहीं खरीदते और किताबों के लिए मिले पैसे से किताबें नहीं खरीदते।
सरकार द्वारा छात्रों को हर सम्भव सहायता प्रदान करने के बाद भी छात्रों का विद्यालय से पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है। शाम की पाली के विद्यालयों की स्थिति और भी भयावह है, अधिकतर बच्चें अपने घर के किसी न किसी काम काज़ से जुड़े होते है; कोई पटरी बाजार लगता है, कोई सब्जी बेचता है, कोई किसी होटल में कार्य करता है। होटल में काम करने वाले एक छात्र से बात हुई, उसका कहना था कि उसके घर में बहुत ही अशांति है। बार-बार इस छात्र का नाम कट जाता था फिर भी इसके माता-पिता स्कूल नहीं आते थे। यह छात्र अनेक तरह के नशे करता था। आखिर दो साल फेल होकर वह छात्र घर बैठ गया। सरकारी विद्यालयों में जो छात्र पढऩे आते है , वे बहुधा मज़दूरी करने वाले परिवारों से है। आठवीं कक्षा में पढऩे वाले एक छात्र ने इसी साल अपने पिता का मर्डर कर दिया; कारण यह था कि उसका पिता रोज़ दारू पीकर घर में हंगामा करता था और उसकी माँ को पीटता था। घर का जो सामान हाथ लग जाए, उसे बेच लेता था। एक दिन अपनी माँ का पिटना इससे देखा नहीं गया; इसने कृपाण से अपने पिता पर वार कर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। यह छात्र अभी भी पढ़ रहा है और किसी प्रकार अपना घर भी चला रहा है।
स्कूलों में बँटने वाला मिड डे मील भी जी का जंजाल अधिक है। एक तो उसे बाँटने की जिम्मेदारी ऊपर मिड डे मील की गुणवत्ता। आए दिन मिड डे मील खाने से बीमार होने वाले छात्रों के समाचार आते रहते है।  विद्यालय का काफी समय मिड डे मील बाँटने में ही लग जाता है। अब तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बन पाई कि समय भी बच जाए और गुणवत्ता को भी बनाया जा सके। कब, कहाँ, कौन क्या लापरवाही कर दे; कुछ पता नहीं।
बारहवीं का परीक्षा परिणाम भी यहाँ नक़ल के बल पर ही आता है। स्कूलों के शिक्षक परीक्षा केंद्रों पर जाकर नक़ल कराते है। अधिकारी भी चाहते है कि उनके क्षेत्र के विद्यालयों का रिजल्ट अच्छा रहे , अत: वे भी नक़ल रोकने के स्थान पर उसे बढ़ावा देते हैं। सी बी एस ई बोर्ड के परीक्षा सेंटर आपस में ऐसे स्कूलों में डालें जाते है, जहाँ छात्रों को एक-दूसरे विद्यालयों की नक़ल में सहायता मिल सके। बहुत से छात्र तो ऐसे है जो अपना नाम भी नहीं लिख पाते। ग्यारहवीं कक्षा में पढऩे वाले अधिकतर छात्र किताब पढऩे में असमर्थ रहते है। शिक्षा का स्तर गिरने का एक बड़ा कारण स्कूलों में वर्ष भर बँटने वाला पैसा भी है। अध्यापक वर्षभर विभिन्न योजनाओं के तहत पैसा बाँटने और छात्रों के एकाउंट खुलवाने में लगे रहते हैं।
प्रधानाचार्यों का ध्यान छात्रों की शिक्षा की और कम विभिन्न मदों में खरीदारी से मिलने वाले कमीशन में अधिक रहता है। ज्यादातर हैड ऑफ स्कूल ऐसे हैं, जो सामान उन्हीं डीलर से खरीदते है,जो ज्यादा कमीशन देते है। कुछ तो ऐसे हैं, जो एजेंट से खाली बिल लेते है। सामान पहले का ख़रीदा हुआ ही दिखा देते है। अधिकतर स्कूलों में सामान की खरीदारी के लिए कोई कमेटी भी नहीं होती । यदि होती है तो उसमे ऐसे लोगों को रखते है, जो विद्यालय प्रमुख से गाहे- बगाहे कोई न कोई लाभ उठाते रहते हैं। उनको जहाँ भी कहा जाए, वे आँख बंद करके हस्ताक्षर कर देते है।
 शिक्षकों को पढ़ाई के इतर भी अन्य कार्य करने पड़ते हैं, जैसे-कभी मकान गणना, कभी जनगणना तो कभी आर्थिक सर्वे। चुनाव ड्यूटी के दौरान तो छात्रों की पढ़ाई बिलकुल चौपट हो जाती है। चुनावी ट्रेनिग जो काम एक दिन में हो सकता है, चुनाव आयोग द्वारा  उसके लिए कई-कई दिन बुलाया जाता है। अनेक विद्यालयों में अध्यापकों को अपने ऑफिस के कार्य भी स्वयं करने पड़ते है।
यदि हम शिक्षा के स्तर में सुधार चाहते हैं तो अन्य उपायों के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि स्कूलों में एजेंट के माध्यम से की जाने वाली ख़रीदारी पर अंकुश लगाया जाए और पहले की तरह सुपर बाज़ार और कॉपरेटिव स्टोर जैसी संस्थाएँ स्थापित की जाए, जहाँ विद्यालयों की ज़रूरत का सभी सामान मिल सके। इससे विद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकेगा। विद्यालयों के मुखिया का ध्यान पूरी एकाग्रता के साथ विद्यालय और विद्यार्थियों के हित में लग सकेगा। कुछ वर्ष पहले विद्यालयों में छात्रों की दाखिला प्रक्रिया केन्द्रीयकृत करके दाखिले में धाँधली को लगभग बंद कर दिया गया। इसी प्रकार के प्रयास से विद्यालय के लिए  खरीदारी में होने वाले भ्रष्टाचार को रोका जा सकेगा।

 शिक्षा में सुधार के लिए छात्रों की दसवीं बोर्ड की परीक्षा को अनिवार्य बनाया जाए। एक सेक्शन में छात्रों की अधिकतम संख्या निश्चित की जाए। CCE पैटर्न को तुरंत समाप्त किया जाए, स्न्र परीक्षा का वेटेज कम की जाए तथा NDP (No Detention Policy) को तुरंत समाप्त किया जाए, तभी छात्रों का रुझान पढाई की और हो सकेगा। अन्यथा बिना पढ़े-लिखे ही पढ़े-लिखों की कतार लंबी होती चली जाएगी और जो आने वाले समय में समाज के लिए बहुत ही घातक सिद्ध होगा।कामचोरी करने वाले शिक्षकों पर अंकुश लगाया जाए। सरकारी स्कूलों में  करोड़ों रुपये वेतन आदि पर खर्च होते हैं। समय-समय पर  शिक्षकों का भी मूल्यांकन होना चाहिए कि उन्होंने जो बरसों पहले पढ़ा था, उसी पर निर्भर हैं, उसी की जुगाली कर रहे हैं या कुछ नया भी पढ़ रहे हैं। कम से कम पाँच साल में किसी परीक्षा के माध्यम से यह मूल्यांकन किया जाए। सम्भव  है बहुत से शिक्षक उत्तीर्ण भी न हो सकें। निरन्तर खोखली होती शिक्षा की जड़ को नष्ट होने से बचाया जाए। अपने देश की परिस्थिति एवं परिवेश के अनुरूप ही शिक्षा-नीति निर्धारित की जाए। छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। स्कूल में 20 प्रतिशत उपस्थिति वाला छात्र 70 प्रतिशत अंक कैसे लाएगा? उसके खराब परीक्षा-परिणाम के लिए किसी शिक्षक को कैसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा? अभिभावक की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है। बोर्ड अपना परीक्षा-परिणाम सुधारने के लिए क्या रचनात्मक काम कर रहा है, उस पर भी नज़र रखना ज़रूरी है। हमारी पूरी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। अगर आज हम इस पर ध्यान नहीं देंगे तो कल पछताने के लिए समय नहीं मिलेगा। कमोबेश यही स्थिति भारत भर में मिलेगी। हमें जाग जाना चाहिए, अन्यथा  फिर वही होगा-'सब कुछ लुटाकर होश में आए तो क्या किया?’