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Feb 1, 2021

लोक संस्कृतिः लोक- चित्रांकन की अद्भूत परंपरा गोदना

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

लोक चित्रांकन का अभिप्राय उस चित्रांकन से है जो पर्व, त्योहार, अनुष्ठान और संस्कारों में किया जाता है। जिस प्रकार लोक कथाओं के कथानक में कोई न कोई संदेश छिपा होता है उसी प्रकार लोक चित्रांकन में भी संदेश छिपा होता है। लोक चित्रों में बिंदु, रेखा, त्रिभुज, आयत, त्रिकोण, वृत्त आदि का प्रयोग होता है और उसके संकेतात्मक अर्थ होते हैं। लोक चित्रांकन को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है:

1. आधार भूमि के आधार पर -

भूमिचित्र- भूमि या धरती पर बनाये जाने वाले चित्र।

भित्तिचित्र- भित्ति या दीवार पर बनाये जाने वाले चित्र।

पटचित्र- कागज, कपड़ा या पत्ते आदि पर बनाये जाने वाले चित्र।

देहचित्र- शरीर पर बनाये जाने वाले चित्र, जैसे मेंहदी, महावर और गोदना।

2. विषय के आधार पर -

अनुष्ठानिक- जैसे करवा चौथ का चित्र।

धर्मानुष्ठानिक- जैसे दीवार का सुरातू चित्र।

सामाजिक- जैसे हलछट का चित्र।

आध्यात्मिक- जैसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के चित्र।

3. माध्यम के आधार पर -

गोबर- जैसे नागपंचमी, हरेली पर बनाये जाने वाले चित्र।

खड़िया या गेरू- जैसे दीवारों पर सुरातू चित्र।

रंग- जैसे पिसे चावल, दूधिया पत्थर  के चूर्ण आदि से बनाये जाने वाले चित्र।

प्राकृतिक या कृत्रिम धूलि रंगों से रंगकर नौरता के चित्र।

ब्रुश या कलम से कागज और कपड़ा में बनाये जाने वाले चित्र।


4
. लोक संस्कारों के आधार पर -

जन्म के संस्कार जैसे चरूआ अलंकरण, षष्ठी के चित्र, ज्योति, सांतिया एवं हाते।

विवाह संस्कार के चित्र जैसे कुलदेव का पट चित्र, द्वार पर गणेश, स्वास्तिक और तलवारधारी रक्षक के चित्र।

भारत में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक प्रायः सभी क्षेत्रों में गोदना विद्यमान है। क्षेत्रीय आधार पर अनेक स्थानों में अपनी विशिष्टता लिए होती है। अनेक जनजातियों में भी अपने विशिष्ट अभिप्रायों को गोदना के रूप में शरीर में गुदवाया जाता है। मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिम में भील जनजामि का निवास है। दक्षिण पूर्वी भाग में गोंड़, बैगा, बिंझवार, कंवर, कमार, मुरिया, भतरा, दंडामी, माड़िया, दोरला और गोंड़ जनजाति और उपजातियां निवास करती हैं।पूर्वी क्षेत्र में ओरांव, कोरबा, पंडो तथा उत्तर में कोल, अगरिया तथा अन्य छोटी छोटी जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें गोदना, गुदना प्रचलित है। यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कृषक और दस्तकार जातियों में भी गोदना का प्रचलन व्यापक रूप से देखने को मिलता है। जनजातियों की भांति यद्यपि इन ग्रामीण जातियों के गोदने अपना पृथक वैशिष्ट्य लिए हुए तो नहीं होते, परन्तु उनके द्वारा अपना अभिप्रायों की व्यापकता भी नृतत्वशास्त्रीय दृष्टि से कम महत्त्व की नहीं कही जा सकती। बुंदेलखंड की पटेल, कोरी, बरई तथा अहीर जाति की स्त्रियों में गोदना का प्रचलन व्यापक रूप से देखने को मिलता है। बघेलखंड में सभी जनजातियों में और अनुसूचित जातियों में गोदना का अंकन शरीर में देखा जा सकता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ की सभी जनजातियों के अलावा तेली, कुरमी, राऊत, ढीमर, बंसोड़, पनका, गांड़ा, अगरिया, देवार, कृषक और दस्तकार जातियों में गोदना गोदवाने का व्यापक प्रचलन है।

गोदना का प्रचलन कब हुआ, यह बताना मुश्किल है लेकिन प्रागैतिहासिककालीन भित्ति चित्रकला से इसका उद्भव माना जा सकता है। इस काल में पहाड़ों की गुफाओं में रहने वाले आदि मानव अपनी मनोभावों को भित्तिचित्र के माध्यम से दीवारों में उकेर लेते थे जिनके अवशेष आज भी प्रदेश, देश और अन्य देशों में देखे जा सकते हैं। श्री निरंजन महावर अपने अनुभवों के आधार पर मानते हैं कि गोदना अंकन का आरंभ जादू और पराशक्तियों में विश्वास के कारण हुआ होगा ? क्योंकि गोदना अलंकरण इन्हीं जादू अथवा पराशक्तियों के प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करने वाले थे। कुछ गोदना टोटकेके लिए गुदवा जाते थे। कुछ गोदना का अभिप्राय प्रजनन से सम्बंधित था। पुरूषों में गोदना शौकिया तौर पर गोदवाया जाता है जिसमें फूल पत्तियाँ, स्वतः के नाम या किसी देवी- देवता की मूर्ति होता है। जबकि स्त्रियों को गोदना के लिए उचित पात्र माना जाता है। क्योंकि स्त्रियाँ मातृत्व की प्रतीक हैं, वह जननी है। अतः गोदना का आरंभ मूल रूप से दो उद्देश्यों के कारण हुआ। प्रथम कारण, गोदना के प्रतिरोधक अभिप्रायों का अलंकरण करके प्रतिकूल अभिचारों और जादू टोने से सुरक्षात्मक कवच का निर्माण करना और दूसरा कारण, प्रजनन शक्ति को जागृत कर मातृत्व को अनुनेय बनाना। अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि गोदना का आरंभ शारीरिक अलंकरण के उद्देश्य से कदापि नहीं हुआ था, जैसा कि अनेक नृतत्वशात्री मानते हैं। कालान्तर में अवश्य ही गोदना अंकन में सौंदर्य परक दृष्टिकोण का समावेश होने लगा और उसका विकास अलंकरण के रूप में स्थापित हो गया।

बस्तर के अबूझमाड़िया जनजाति की स्त्रियाँ अपने चेहरे एवं वक्षस्थल पर आड़ी तिरछी और सीधी रेखा के रूप में गोदना गुदवा लेती है, जिन्हें शारीरिक अलंकरण तो कदापि नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार बैगा जनजाति की स्त्रियाँ अपने माथे पर आड़ी तिरछी रेखाओं के बीचोंबीच चूल्हे का अंकन कराती हैं। मिथ्स ऑफ मिडिल इंडिया- वेरियर एल्विन पृ. 478 के अनुसार मंडला जिले के परधान गोंड़ जनजातियों में एक कथा प्रचलित है जिसमें गोदना की उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है।

कैलास पर्वत पर महादेव जी ने एक बार सभी देवताओं को भोज पर आमंत्रित किया। उस भोज में एक गोंड़ देवता भी सम्मिलित हुआ। देवगण अपनी अपनी पत्नियों के साथ आये थे। सभी देवियाँ पार्वती के साथ समूह में बैठी बातें कर रही थी। भोज के उपरांत गोंड़ देवता जाने को उद्यत हुए, तो देवियों के समूह में अपनी पत्नी को पहचान नहीं सके और भूलवश पार्वती के कंधे पर हाथ रखकर उनसे चलने के लिए कहा। जिससे पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गयी। महादेव जी वस्तु स्थिति को समझ ग और पार्वती जी को समझाने लगे। लेकिन पार्वती जी का गुस्सा शांत नहीं हुआ और दुबारा ऐसी भूल न हो सोंचकर उन्होंने प्रत्येक जाति के लिए गोदना निर्धारित कर देवियों के अंगों पर गुदवा दिया। तब से गोदना गुदवाने का प्रचलन हुआ।

गोदना से सम्बंधित एक मिथक जो उड़ीसा और उससे जुड़े छत्तीसगढ़ में प्रचलित है। उसके अनुसार पौराणिक काल में जब गोदना का प्रचलन नहीं हुआ था, तब जमदेव (यमराज) को इस बात का पता लगाने में अत्यधिक कठिनाई होती थी कि अमुख व्यक्ति स्त्री है या पुरुष। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उन्होंने अपनी बहू के शरीर में काजल से कुछ चिह्न अंकित कर उसे सुई चुभाकर गोद दिया। उस चिह्न के गोदे जाने पर उनकी बहू सुन्दर दिखने लगी। तब उन्हें मृत्युलोक भेजते हुए कहा कि तुम गाँव गाँव घूमकर सारंगी बजाकर लोगों को एकत्र करके अपने गोदना दिखाकर स्त्रियों के शरीर पर गोदना गोदने का कार्य करो। जब ऐसा किया जाने लगा , तब से गोदना गुदवाने के लिए स्त्रियाँ तत्पर होने लगी। उस काल में यह बात भी प्रचलित होने लगी कि मरणोपरांत शरीर के साथ गोदना ही जाता है बाकी सभी भौतिक वस्तुएँ यहीं छूट जाती हैं।

शरीर को सजाने की परंपरा मानव में  जन्म से होता है। खासकर स्त्रियों में नखशिख सौंदर्य सज्जा की शास्त्रीय व्याख्या सोलह शृंगार के रूप में भारतीय वाड्गमय में बहुत पहले से होती रही हैं। सोलह शृंगार अलग अलग समय में भिन्न भिन्न रहा है लेकिन अंग राग, महावर, ठुड्डी पर तिल, आँखों में अंजन आदि का वर्णन प्राचीन काव्यों में मिलता है। उत्तर काव्यों में मेंहदी, ओंठों को लाल करना और ठुड्डी में तिल आदि का को सोलह श्रृंगार में शामिल किया गया है। समय के अनुसार नये नये प्रसाधन सोलह शृंगारों में जुड़ते गये और पुराने अनुपयोगी खारिज होते गये। लेकिन सदैव शृंगारों की संख्या सोलह ही रही है। इस सम्बंध में श्री अत्रिदेव विद्यालंकार का तर्क मुझे उचित लगता है। उनके अनुसार-‘‘भगवान की षोडश उपचार हुआ है, संस्कारों की संख्या भी सोलह है। चंद्रकला का स्थान सोलह माना गया है। संभवतः इन्हीं बातों को देखकर शृंगार भी सोलह गिने ग‘‘

संस्कृत कवि बल्लभदास ने अपनी पुस्तक सुभाषितावलीमें निर्णय सागर के उज्जवल नील मणि के अध्याय के राधा प्रकरण में, रीतिकालीन कवि आचार्य केशवदास ने अपनी रचना में, हिन्दी विश्वकोष के प्रणेता नगेन्द्रनाथ बसु ने अपने कोष में सोलह शृंगारों को अपनी अपनी दृष्टि से स्थान भेदों के साथ गिना हैं। आचार्य केशवदास को मेंहदी को सोलह शृंगार में सम्मिलित करने का श्रेय जाता है। निणर्यसागर में जिन सोलह शृंगारों की चर्चा है उसमें शरीर चित्रांकन का भी जिक्र है-

            आदो मंजन चीर हार तिलक नेत्रांजन कुंडले,

            नासा मौक्तिक केश पाश रचना सत्कंचुक नुपूरो।

            सौगंधय कर कंकणा चरणायोरागोरणान्मेला,

            ताम्बूल करदर्पण चतुरमा शृंगारकाः षोडश।।

अर्थात् नाक में मोती, नीवि बन्धयुक्ता, वेणी बंधन, कर्णावतस, अंगों को चर्चित करना, पुष्पमाला धारण करना, हाथों में कमल, बालों में फूल खोंसना, ताम्बूल खाना, चिबुक को कस्तुरी से चित्रित करना, काजल मकरी पत्रादि से शरीर को चित्रित कना, महावर, तिलक लगाना, शृंगार के प्रसाधन है।

कालिदास की रचनाओं के प्रसिद्ध टीकाकार मल्लिकानाथ ने मेघदूत की टीका करते हुये चार प्रकार के कचधार्य, देहधार्य परिधेय और विलेपन सौंदर्य प्रसाधनों का विस्तार से वर्णन किया है। शरीर सज्जा यानी देहधार्य के अंतर्गत उन्होंने स्तनों और बीहुओं पर सजावट कि जाने का उल्लेख किया है। कानों में जौ के बाल (अंकुर), शिरीष के पुष्प, केतकी के फूल, माथे और कपाल पर तमाल पत्र के रंगों से शरीर को सजाया जाता है। स्त्रियाँ यह सजावट स्तनों और बाहुओं पर भी करती थीं।

श्री बसंत निरगुणे ने अपने लेख गोदना में महाभारत काल के श्रृंगार कला का वर्णन किया है। महाभारत काल में शृंगार कला में निपुण स्त्री को सैरन्ध्रीकहा गया है। इसीलि विराट भवन में द्रौपदी सैरन्ध्री के रूप में अपना परिचय देती है। विराटनगर की महारानी की सेवा में उसे सोलह शृंगार के लिये रख लिया जाता है। द्रौपदी बालों की रचना वेणी बाँधने में निपुण थी। द्रौपदी सैरन्ध्री की व्याख्या करते हुए कहती है-इस जगत में बहुत सी स्त्रियां हैं जिनका दूसरों के घरों में पालन होता है और जो शिल्पकर्म के द्वारा अपना जीवन निर्वाह करती है, वे सदाचार से स्वतः सुरक्षित रहती हैं। ऐसी स्त्रियों को सैरन्ध्रीकहते हैं। विराटपर्व और अमरकोष में भी सैरन्ध्री शिल्पकारिका की चर्चा है।

रसेल और हीरालाल के अनुसार शरीर के विभिन्न अंगों में देवी-देवताओं के चिन्ह गुदवाने का रिवाज है, उनके स्थान भी निश्चित होते हैं:

पदमसेन देव - पाँव के देवता।

गजकरन देवी (हाथी देवता) - पैर के देवता।

कोड़ा देव (घोड़ा देवता) - सामने की ओर से पैरों के उपरी भाग के देवता।

हनुमान (शक्ति के देवता) - भुजाओं के देवता।

भीमसेन (रसोई के देवता) - पीठ पर।

झूलन देवी एवं कंटेश्वर माता (प्रतीकों के रूप में) - सीने पर।

विभन्न प्रकार के गोदना और उनका महत्त्व:- जनजातियों में विश्वासों और परम्पराओं के जीवंत प्रमाण का प्रतीक है गोदना। श्री निरंजन महावर के अनुसार, ‘गोदना शरीर के अलंकरण्र के साथ प्रजनन हेतु, मंगल एवं बुरी आत्माओं के कोप से सुरक्षार्थ गुदवाये जाते हैं। अधिकांश गोदना युवतियों के मासिक धर्म आरंभ होने के बाद और विवाह के पूर्व गुदवा जाते हैं। स्त्रियों के लि सौभाग्य और मातृत्व के प्रतीकों के रूप में इन गोदनों का धार्मिक अनुष्ठानों जैसा महत्व है।

     मोघिया जनजाति में स्त्रियों और पुरुषों में गोदना गुदवाने के अलग अलग उद्देश्य होते हैं। पुरूष शारीरिक स्वास्थ्य, भूत प्रेतों से सुरक्षा और जंगलों के हिंसक जंगली जानवरों से बचने के लिये गोदना गुदवाते हैं। जबकि स्त्रियाँ शारीरिक सौंदर्य और सुहाग चिह्न के रूप में गोदना गुदवाती हैं। गोदना की आकृति और उसका महत्त्व इस प्रकार है -

श्रीकृष्ण, शंकर जी, हनुमान जी एवं अन्य देवताओं की आकृति - ये व्यक्तियों को शक्ति प्रदान करते हैं। देवी विपत्तियों में रक्षा करती है तथा भाग्योदय में सहयोग देते हैं। हनुमान जी की आकृति शनि के प्रकोप से रक्षा करता है।

परी, स्त्री व अन्य देवियाँ - जंगलों में भूतप्रतों, चुड़ैलों, डायन आदि से रक्षा करती है। ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति के सीने में परी की आकृति होती है उसके निकट कोई चुड़ैल नहीं आ सकती।

साँप व बिच्छू - ये व्यक्तियों को जहरीले कीड़ों से रक्षा करते हैं। मान्यता है कि जिसके शरीर में साँप या बिच्छू का गोदना होता है उसे साँप और बिच्छू नहीं काटते। यदि काट भी ले तो उसका विष नहीं चढ़ता।

शेर, चीता और तेंदुआ - ये मोघिया देवी के उपासक हैं और ये तीनों देवी के वाहन हैं। अतः इन्हें पवित्र समझकर गुदवाते हैं। इससे उनकी रक्षा होती है और ये आस्था के प्रतीक भी होते हैं।

तोता, मैना, मोर पक्षी - ये शरीरिक सौंदर्य को बढ़ाता है।

फूल, पत्ती तथा विभिन्न प्रकार के बेल पौंधे - ये भी शारीरिक सौंदर्य को बढ़ाने के लिए गुदवाये जाते हैं। इसे जड़ी बुटियों का प्रतीक भी माना जाता है।

मछली - भगवान का अवतार और बाढ़ से रक्षा करता है।

बूंदा और त्रिशूल - चेहरे की सुंदरता के लिये गुदवा जाते हैं।

नाम - हाथों में अपना और सगे संबंधियों के नाम प्यार और सम्मान प्रदर्शित करने के लिये गुदवाये जाते हैं।

कलश - ये स्त्रियों के लिये आवश्यक सुहाग चिह्न है। मोघियों में विवाहित स्त्रियों की पहचान इसी गोदने से की जाती है।

नाक और कनपटी के बूंदा - नवजात शिशु के दीर्घायु होने के लिये गुदवाया जाता है।

छत्तीसगढ़ की अनेक जनजातियों में गोदना गुदवाकर शरीर में अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। डॉ. सरिता साहू और डॉ. किशोर अग्रवाल अपने आलेख में लिखते हैं-गोदना, मानव शरीर के वाह्य आवरण पर उकेरी गई आकृति होती है। गोदना गोदने के लिये पहले प्राकृतिक रूप से मिलने वाली लकड़ी जिसे स्थानीय भाषा में कीजा-कठवाकहा जाता है, के राख का लेप लगाकर शरीर में आकृतियाँ बनाई जाती हैं फिर सुई या काँटों की सहायता से इसके घोल को शरीर के चमड़ी के भीतर पहुँचाया जाता है। कुछ दिनों के बाद ये रंग स्थायी रूप से उभर जाता है तब ये गहरे नीले हरे रंग का दिखने लगता है जिससे शरीर की सुदरता बढ़ जाती है। प्रायः देवार, ओझा, बादी जनजाति की महिलाएँ गोदना गोदने का कार्य करती हैं। इन्हें गोदहारिनेंकही जाती है। ये महिलाएँ गाँव गाँव में घूमकर गोदना गोदा ले ....।करके आवाज देती हुई घूमती हैं। गोदना गोदते समय सुई की चुभन से होने वाले दर्द को कम करने वाली मधुर गीत भी गाती जाती हैं:

            भुजा माँ भुजबल गोदौं, हाथे माँ मूँदी गा।

            सुरता ला राखे रहिबे, झनी जाबे भूली गा।।

            गेदना गोदा ले रीठा लेले रे .....।

एक अन्य देवार गीत देखि:

            ये गोदना निसेनी सरग के, सुफल होय जिनगानी।

            गेदना गोदा ले मोर रानी ......।

            छदा देय पइरी चूरा, जीयत भर आय।

दाई देय कारी गोदना, उही माटी संग जाय।।

            कहावत है कि विवाह के समय ददा (पिता जी) के द्वारा दिया जाने वाला पैरी, चूरा और अन्य गहने जीयत भर शरीर की शोभा बनती है, मरने के बाद उसे शरीर से निकाल दिया जाता है जबकि शरीर का गोदना मरने के बाद भी शरीर के जाता है। एम दूसरे कहावत में स्वर्ग में अपनी माँ से भेंट करने के लिए बेटियाँ अपने शरीर (खासकर छाती) में गोदना गुदवाती हैं। देखि देवार गीत की एक बानगी -

                        लेत देत रेहेस दाई, चल देय परदेस।

                        छाती के गोदना दाई, संग होय भेंट।।

विजय चिन्ह गोदना - झारखंड राज्यके छोटा नागपुर की पहाड़ियों से लेकर छत्तीसगढ़ में सरगुजा और जशपुर के वनांचल में रहने वाले उराँव जाति की महिलाएँ अपने कपाल पर तीन खड़ी लकीर (111) गुदवाती हैं। यह गोदना उराँव महिलाओं की पहचान है। उरांव जनजाति रोहतासगढ़ के समीप निवास करती थी। इनके प्रमुख त्योहार सरहुलके अवसर पर जब सभी मदिरा पीकर उन्मत थे, उसी समय म्लेच्छों ने रोहतासगढ़ किले को हथियाने के लिए आक्रमण कर दिया। पुरूषगण तो मदिरा पीकर मस्त थे तब इस आक्रमण से निपटने के लिए महिलाएँ पुरुषों का वस्त्र धारणकर म्लेच्छों से युद्ध किया और विजय पा। इस विजय के प्रतीक स्वरूप उराँव महिलाओं ने अपने ललाट और कनपटी पर खड़ी तीन लकीर गुदवाई और इसे विजय परंपरा के रूप में स्वीकार किया। जशपुर की डॉ. उषारानी मिंज और अम्बिकापुर के डॉ. सुजय मिश्र से प्राप्त जानकारी के अनुसार उराँव जनजाति आज भी इसे जनी शिकार उत्सवके रूप में मनाते हैं। कहा जाता है कि म्लेच्छों ने 12 बार रोहतासगढ़ में हमला किया और उराँव महिलाओं ने उन्हों हराया। डॉ. उषारानी मिंज की पुस्तक हियाखोल राखेमें इसका उल्लेख है -

               
        
बारो बछारे जनी शिकार, जनी का मुड़ी राजा पागरी बांधय।

                        हाथे तलवार गोड़े घुघुर, जनी का मुड़ी राजा पागरी बांधय।

            आज भी उरांव जनजाति के विवाह संस्कार में पुत्री को विदा करते समय पिता धनुष और तीर देता है जिससे वह जनी शिकार उत्सवमना सके और आवश्यकता पड़ने पर अपनी रक्षा भी कर सके।

            रियासत काल में सुंदर स्त्रियाँ अपनी सतीत्व की रक्षा के लिए माथे और शरीर में गोदना गोदवाकर कुरूप बन जाया करती थीं। इस सम्बंध में गेगाधर की एक चौकड़िया की बानगी देखिए-

                        गुदना लागत गाल पे प्यारी, हमखों रजऊ तुम्हारौं,

                        गोरे बदन गाल के उपर, बन बैठो रखवारौ।

                        देखन देव नजर भी हमखों, घूंघट पट न डारौ,

                        गंगाधर की तरफ हेर के, दे दौ तनक इशारौ।।

            गोदना गुदवाने में बहुत दर्द होता है। गुदवाने वाली बालाएँ बहुत रोती हैं, तब बड़ी -बुजुर्ग महिलाएँ उन्हें पकड़ लेती हैं और कहती हैं कि जब तुम गोदना गुदवाने का दर्द सहन नहीं कर सकती, तो जीवन के अनेक दर्द को सहन कैसे करोगी? कुछ स्त्रियाँ गोदना गुदवाने की ललक में गुदवाते समय होने वाले दर्द को भूल जाती हैं। देखिये एक गीत -

                        बड़े कठिन के गुदना बाई गुदवाये नै उदनारी,

                        भींज गई अंसुवन सारी।

                        मैंने भौतई करे बहाने, मोर माता पिता खिसयाने,

                        पूरी ललक भई गुदनन की बहियां दीपन लगीं प्यारी।

                        बड़े कठिन के ....।

            गुदनापरक गीतों में अभी तक गारियाँ और फागें मिली हैं। ईसुरी ने भी गोदना पर फाग लिखी हैं:-

                        गुदना गुदवाये तन गोरें, खुले दरस रये तोरें।

                        डाड़ी पै बूंदा है सुन्दर, मुख चंदा के दोरें।

                        कोंचन कोंचन गुदे पपीरा, लिखी बाँह में मोरें।

                        ईसुरपांव पछेला देखे, पुतरी दो कर तोरें।।

            ठोड़ी पर बूंदा, कोंचों पर पपिहरा, बांहों पर मोरें और पैरों के पीछे पिंडलियों पर पुतरिया लिखना पारम्परिक रूपाकार हैं। गोदना गुदवाने में क्या दशा होती है, इसका एक चित्रण एक फाग में देखें -

                        गुदना गुदवाये रो दओ तो, तनक दरद न सहो तो।

                        अंसुआ चुर गिरे गालन पै, रनबन काजर बओ तो।

                        आँखें मींच ननद बारी खाँ, दोउ हांतन भर लओ तो।

                        ईसुरप्रान छनक गये मोरे, बिधना आड़ौ भओ तो।।

            गोदना गुदवाने में दर्द तो बहुत होता है लेकिन भक्ति भावना की निष्ठा सुदृढ़ हो तो दर्द सहा जा सकता है। देखिये एक फाग गीत -

                        गोदो गुदनन की  गुदनारी, सबरी देह हमारी।

                        माथे पै मकसूदन गोदौ, मांग में लिखै मुरारी।

                        बंईयन पै बनमाली भर देव, कर में कुंजबिहारी।

                        ईसुरकरा धरौ कन्हैया, मु, में तो मनहारी।।

छत्तीसगढ़ के गोदनाधारी रमरमिहा:- महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रमरमिहा लोग निवास करते है। छत्तीसगढ़ के पाँच सीमावर्ती जिलों रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, महासमुंद और रायगढ़ के सारंगढ़, घरघोड़ा, जांजगीर, चांपा, मालखरौदा, चंद्रपुर, पामगढ़, कसडोल, बलौदाबाजार और बिलाईगढ़ क्षेत्र के लगभग 300 गाँवों में पाँच लाख रमरमिहा निवास करते हैं। रामनामी पंथ अनुसूचित जाति की एक शाखा है जो संत कवि रैदास को अपने पंथ का मूल पुरुष मानते हैं। इन्हें रमरमिहा अथवा रामनमिहा कहा जाता है। रामनाम में सदा तन्मय रहने वाले ये लोग अहिंसक और शाकाहारी होते हैं। मदिरा से वे बहुत दूर होते हैं। शायद ही कोई ऐसा होगा जो श्रीराम के सगुण रूप को नकारता हो? लेकिन महानदी घाटी के ग्राम्यांचलों में बसे रमरमिहा लोग श्रीराम के सगुण रूप को नकार कर उसके निर्गुण रूप के उपासक हैं। हिन्दुस्तान में शायद ही कोई दूसरा पंथ होगा जो रामनाम में इतना रमा होगा जो अपने पूरे शरीर में रामनाम गुदवा ले। लेकिन रमरमिहा लोग पूरे शरीर में राम नाम गुदवाते हैं, हाँ तक पहनने-ओढ़ने के कपड़े और तम्बू के कपड़ों में भी राम नाम लिखा होता है। श्रीराम चरित मानस में भी कहा गया हैः- जय राम रूप अनूप निर्गुण प्रेरक सही अर्थात् हे राम! आपकी जय हो। आपके रूप अनुपम है। आप निर्गुण हैं और सत्य ही गुणों के प्रेरक हैं।

रामरमिहा के गुरू और गोसाई लोग रंगीन मोर पंखों वाले बांस के मुकुट धारण करने वाले होते हैं। इस पर भी रामनाम की काली पट्टी लगी रहती है। सौंदर्य वृद्धि के लिये आदिवासी संस्कृति में अंग लेखन और चित्रांकन की परंपरा गोदना अनेक आस्थाओं से जुड़ा है। गोदना आदिवासी महिलाओं का शृंगार ही नहीं बल्कि ऐसा परिधान है जो आजीवन तन से जुड़ा रहता है। गोदना को लोग चिन्हारीके रूप में गुदवाते हैं। ऐसे में गोदना अगर रामनाम का हो तो सोने में सुहागा ही होगा। अगर किसी रामरमिहा को ध्यान से देखें तो आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है क्योंकि हाथ, पैर यहां तक कि आंखों की पलकों में रामनाम खुदा रहता है। बचपन में रामनाम माथे पर गोदा जाता है। गोदना गोदते समय भजन कीर्तन होता है जिससे मन रामनाम में लीन हो जाये और पीड़ा का आभास तक न हो ? उम्र के हिसाब से शरीर के दूसरे भाग में गोदने का काम किया जाता है। पहले स्याही से रामनाम लिखा जाता है फिर सुई चुभोई जाती है। गोदना गोदने में दो सुई काम में लाई जाती है और काले रंग को अधिक गहरा तथा पक्का बनाने के लिये उस पर उपर से मिट्टी के तेल से निकला धुंआ लगा लेते हैं। गोदना गोदते समय गीत भी गाये जाते हैं: धूम कुसंगति कालिख होई। लिखिय पुराण मंजु मति होई।।

आज गोदना गुदवाने की परंपरा एक टोटमके रूप में प्रचलित है। देश विदेश के साथ हमारे देश में भी आज सभी जाति और धर्मो के अनुयायी अपने शरीर में गोदना गुदवाते हैं जो उनके शरीर को सुदर बनाते हैं। मेला ठेला और भीड़ भाड़ वाली जगहों पर ऐसे टोटम बनाने वाले मिल जायेंगे।

सम्पर्कः डागा कालोनी, चांपा

Oct 20, 2014

लोक साहित्य में पर्यावरण चेतना

            लोक साहित्य में         
   पर्यावरण चेतना
                 - गोवर्धन यादव

लोकसाहित्य पढऩे-लिखने में एक शब्द है, पर वह वस्तुत: यह दो गहरे भावों का गठबन्धन है। लोक और साहित्य एक दूसरे के सम्पूरक, एक दूसरे में संश्लिष्ट जहाँ लोक होगा, वहाँ उसकी संस्कृति और साहित्य होगा। विश्व में कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ लोक हो और वहाँ उसकी संस्कृति न हो।
मानव मन के उद्गारों व उसकी सूक्ष्मतम अनुभूति का सजीव चित्रण यदि कहीं मिलता है तो वह लोकसाहित्य में ही मिलता है। यदि हम लोकसाहित्य को जीवन का दर्पण कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोक सहित्य के इस महत्त्व को समझा जा सकता है कि लोककथा को लोकसाहित्य का जनक माना जाता है और लोकगीत को काव्य की जननी। लोकसाहित्य में कल्पना प्रधान साहित्य की अपेक्षा लोकजीवन का यथार्थ सहज ही देखने में मिलता है।     
लोकसाहित्य हम धरतीवासियों का साहित्य है, क्योंकि हम सदैव ही अपनी मिट्टी, जलवायु तथा सांस्कृतिक संवेदना से जुड़े रहते हैं। अत: हमें जो भी उपलब्ध होता है वह गहन अनुभूतियों तथा अभाव के कटु सत्यों पर आधारित होता है, जिसकी छाया में वह पलता और विकसित होता है। इसीलिए लोकसाहित्य हमारी सभ्यता का संरक्षक भी है।  
साहित्य का केन्द्र लोकमंगल है। इसका पूरा ताना-बाना लोकहित के आधार पर खड़ा है। किसी भी देश अथवा युग का साहित्यकार इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकता। जहाँ अनिष्ठ की कामना है, वहाँ साहित्य नहीं हो सकता। वह तो प्रकृति की तरह ही सर्वजनहित की भावना से आगे बढ़ता है।
संत शिरोमणि तुलसीदास की ये पंक्तियाँ 'कीरत भनित भूरिमल सोई-सुरसरि के सम सब कह हित होई ' अमरत्व लिए हुए है। गंगा की तरह ही साहित्य भी सभी का हित सोचता है। वह गंगा की तरह पवित्र और प्रवाहमय है, वह धरती को जीवन देता है। श्रृंगार देता है और सार्थकता भी। प्रकृति साहित्य की आत्मा है। वह अपनी मिट्टी से, अपनी जमीन से जुड़ा रहना भी साहित्य की अनिवार्यता समझता है। मिट्टी में सारे रचनाकर्म का अमृतवास रहता है। रचनाकर उसे नए-नए रुप देकर रुपायित करता है। गुरु-शिष्य परम्परा हमें प्रकृति के उपादान के नजदीक ले आती है। जहाँ कबीर का कथन प्रासंगिक है- 'गुरु कुम्हार सिख कुम्भ गढ़ी-गढ़ी काठै खोट- अन्तर हाथ सहार दे बाहर वाहे खोट' संस्कारों से दीक्षित व्यक्ति सभी प्रकार के दोष-खोट से मुक्त रहता है। इसमें लोकहित की भावना समाहित है। मलूकदास भी इन्सानियत की परिभाषा अपने शब्दों में यूँ देते हैं-'मलुका सोई पीर है, जो जाने पर पीर-जो पर पीर न जानई, सो काफ़िर बेपीर' दूसरों की पीड़ा समझने वाला इन्सान पशु-पक्षी का भी अहित नहीं सोच सकता। उसे वनस्पति के प्रति मैत्री का वह विस्तार साहित्य ही तो है।
जिज्ञासु व्यक्ति कुछ न कुछ सोचने की चेष्टा करता है। इस प्रकृति के सहचर्य से उसने बहुत कुछ सीखा है। उस काल के वेदज्ञ ब्राहमण चौदह विद्दाओं का अध्ययन करना अपना अभीष्ठ  मानते थे। सोलह कलाओं और चौदह विधाओं के अलावा वे संगीत, सामुद्रिक, ज्योतिषि, वेदाध्ययन काव्य, भाषाशास्त्र, पशुभाषा ज्ञान, तैरना, धातु विज्ञान, रसायन, रत्न परख, चातुर्य एवं अंग विज्ञान आदि अनेक विषयों में गहरी रूचियाँ रखते थे। इस बात के साक्षी है पुरातन भारतीय- ग्रंथ जो समय की सीमा को पार कर चुके हैं। मनुष्य के संचित ज्ञान और अनुभव के पहले पुस्तकाकार स्वरुप की याद आते ही दृष्टि स्वमेव ही वेदों की ओर चली जाती है। वेद वे वाड्मय जो ज्ञान कोष के रुप में सदियों से हमारा साथ देते आए हैं। ऋगवेद को सृष्टि विज्ञान की प्रथम पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। जल, अग्नि, वायु, मृदा, चारों वेदों की रचना के पीछे ये ही तत्व प्रमुख रुप से काम करते हैं। ऋगवेद मे अग्नि के रुपान्तरण कार्य और गुण की व्याख्या है, तो यजुर्वेद में विविध रुपों और गुण धर्मों की। सामवेद का प्रधान तत्व जल है, तो अथर्वेद पृथ्वी (मृदा) पर केन्द्रित है। पांचव तत्व आकाश तत्व है। सृष्टि की रचना करने वाले उस महान कुंभकार ने इन्हीं पांचों तत्वों के कच्चे माल को मिलाकर एक ऐसी ही रचना की, जो बेजोड़ है।
हमारी धरती के अस्तित्व का जो आधार है जिसे भारतीय मेधा ने भूमि माँ कहकर अभिनन्दन के स्वर अर्पित किए- माताभुमि: पुत्रोव्है पृथिव्या। अर्चन-अभिनन्दन के इन स्वरों में बहुत ही सार्थक भावभीना स्वर है। यह वैदिक पृथ्वी समूह माँ पृथ्वी की स्तुति का पावन सूत्र, प्रकृति प्रेम की अद्भुत मिसाल, पर्यावरण विमर्श का महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र, पर्यावरण प्रतिष्ठा का सारस्वत अनुष्ठान और उसके संरक्षण के लिए समर्पित शिव संकल्प, आसुरी वृत्तियों के अस्वीकार तथा दैवी वृत्तियों के स्वीकार का घोषणा-पत्र है। यह पृथ्वी की समस्त निधियों के विवेक सम्मत प्रयोग का आग्रही है। यह प्रेम के लिए नहीं, श्रेय के लिए समर्पित शोध का पक्षधर है। यह सामाजिकता, मंगलमयता में लीन हो जाने का आव्हान है। आज के पर्यावरण संकट की समस्त युक्तियों का एक सूत्रिय समाधान है। बीस कांड? ', इकतीस सूत्रों और पांच हजार नौ सौ इकहत्तर मंत्रों का महाकोष है। व्यक्ति सुखी रहे, दीर्घायु प्राप्ति करे। सदनीति पर चले, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं जीव जगत के साथ साहचर्य रहे, इन्हीं कामनाओं से ओत-प्रोत यह अद्भुत ग्रंथ है।
लोक चेतना तो संस्कृति और साहित्य की परिचालक शक्ति मानी जाती है। किन्तु वर्तमान मशीनी और कम्प्युटरी समाज से लोक चेतना शून्य होती जा रही है। आज जरुरी है कि साहित्य का मूल्यांकन लोकजीवन, लोक संस्कृति की दृष्टि से किया जाना चाहिए। जो लोकसाहित्य लोकजीवन से जुड़ा होगा वही जीवन्त होगा। माना भूमि: प्रयोग है पृथीव्या: अथर्ववेद कि ऋचा का महाप्राण है। लोकजीवन इस ऋ चा के आशय का प्रतिनिधित्व युगों से करता आ रहा है। यही लोक साहित्य की आधार शिला है। लोकसाहित्य परम्परा पर आधारित होता है। अत: अपनी प्रकृति मे विकाश-शील है। इसमें नित्यप्रति परिवर्तन की संभावना बनी रहती है। इसका सृजन युगपीडा एवं सामाजिक दवाब को भी निरन्तर महसूस करता रहता है।       
सांस्कृतिक परिस्थितियों का निर्वहन ही सभ्यता कहलाती है। कुछ विद्वान सभ्यता और र्संस्कृति को एक ही मानते हैं और उसके विचार में सभ्यता और संस्कृति का विकास समान रुप से होता है। का$फी गहराई से चिंतन करें तो सभ्यता का ज्यों-ज्यों विकास होता है, त्यों-त्यों संस्कृति का ह्रास होता है। खान-पान, पहनावा सब बदलता जाता है और उसका प्रत्येक पर प्रभाव पड़ता है।
लोकसाहित्य में लोककथा- लोकनाटक तथा लोकगीतों के रखा जा सकता है। जिसमें जनपदीय भाषाओं का रसपूर्ण-कोमल भावनाओं से युक्त साहित्य होता है। भारतीय लोक साहित्य के मर्मज्ञ आर.सी, टेम्पुल के मतानुसार लोक साहित्य कि साहित्यिक दृष्टिकोण से विवेचना करना उसी सीमा तक करना उचित होगा, जिस सीमा तक उसमें निहित सुन्दरता और आकर्षण को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे। यदि लोक साहित्य की वैज्ञानिक विवेचना की जाती है तो मूल विषय नीरस और बेजान हो जाएगा। लोक के हर पहलू में संस्कृति के दिव्य दर्शन होते हैं। जरुरत है तीक्ष्ण दृष्टि और सरल सोच की। लोक साहित्य के उद्भट विद्वान देवेन्द्र सत्यार्थी ने साहित्य के अटूट भंडार को स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते हुए कहा था- मैं तो जिस जनपद में गया, झोलियाँ भरकर मोती लाया।परलोक की धारणाएँ भी इन्हीं से जुडी है। सभी कर्मकाण्ड, पूजा-अनुष्ठान तथा उन्नत सांस्कृतिक समाज में मनुष्य के आचरण का निर्धारण इसी लोक में होता है। लोक हमारी सामाजिकता की गंगोत्री है और सभ्यता का प्रवेश द्वार भी। भारतीय जनमानस को श्रीमद् भगवद्गीता ने जितना प्रभावित किया उतना शायद किसी अन्य पुस्तक ने नहीं किया। वैष्णवी तंत्र ने गीता की जो व्याख्या की है, उसमें प्रतीक के रूप में पशु जीवन का महत्त्व प्रतिपादित होता है।
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दन:         
पार्थो वत्स सुधीर्भ?क्ता दुग्धं गीतामृतं महत।!
अर्थात उपनिषद गाय है , कृष्ण उनको दुहने वाले है, अर्जुन बछड़ा है और गीता दूध है। गीता मे प्रकृति को ईश्वर की माया के रूप में दर्शाया है। गीता के कुछ स्लोकों को (अर्थ) रेखांकित किया जा सकता है। जो तेज सूर्य और चन्द्रमा में है, उसे मेरा ही तेज मानों। मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके सभी भूत-प्राणियों के धारण करता हूँ। चन्द्रमा बनकर औषधियों का पोषण करता हूँ। जठ-राग्नि बनकर प्राणियों की देह मे प्रविष्ठ हूँ। प्राणवायु- अपानवायु से संयुक्त होकर चारों प्रकार से भोजन किए हुए प्राणियों के अन्न को पचाता हूँ। संपूर्ण भूतों (प्राणियों) के ह्रदय करता हूँ। (अध्याय।15)  
श्रीकृष्ण ने अपनी प्रकृति को अष्टकोणी बताया है। इसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश के साथ-साथ मन-बुद्धि एवं अहंकार की गणणा कि गई है। अपनी बाल-लीलाओं के माध्यम से उन्होंने जो दिव्य संदेश दिया उसका व्यापक प्रभाव लोकजीवन तथा लोकपरम्पराओं पर पड़ा। उस दिव्य संदेश के पीछे तात्पर्य यह था की वनस्पति, नदियाँ, पहाड, पशु-पक्षी, गौवें, जलचर और मनुष्य सभी इस प्रकृति के अंगीभूत स्वरुप हैं और सबका रक्षण, पोषण और विकास जरुरी है।     
पर्व और त्योहारों के इतिहास में हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास सृष्टि वस्तुत: सारे त्योहार ऐसे हैं जो प्रकृति की गोद में और प्रकृति के संरक्षण में मनाए जाते हैं। जैसे गोवर्धन पूजा, आवंला पूजन, गंगा सप्तमी, माह कार्तिक मे तुलसी पूजन आदि। ये सभी पर्व हमें अपनी प्राकृतिकता से सह संबंधो की परम्पराओं की याद दिलाते हैं ऐसे पर्व जो प्रकृति के विभिन्न घटक- को पूजने के दिन के रुप में मनाए जाते है, उसी पर्व के अवसर पर सम्पन्न क्रिया-कलाप और समारोह प्रकृति-प्रेम एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का नया वातावरण हमें प्रदान कर पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए उत्प्रेरित करते हैं। प्रकृति घटकों के सहसम्बन्ध हमें नई उमंग और प्रकृति प्रेम के नए उत्साह का अनुभव कराता है। भौतिक, सांस्कृतिक एवं लोभ मानसपटल पर नहीं होंगे तो स्वार्थमय भौतिक संस्कृति जैसे प्रदूषण प्रकट नहीं होंगे और पर्यावरण शुद्ध बना रहेगा।
विभिन्न तथ्यों एवं लोकजीवन की शैली के आधार पर निष्कर्ष में कह सकते हैं कि वृक्ष हमारी संस्कृति के विभिन्न अंग रहे हैं । भारत कृषि प्रधान देश है। अत: मृदा का संरक्षण आवश्यक है। प्राकृतिक अवस्था में मैदानी एवं पहाड़ी स्थानों पर लगे वृक्षों की जड़ जमीन को पकड़े रहती है, जिससे पानी का प्रवाह एवं हवा संतुलित रहती है। वृक्षों के अभाव में हवा एवं पानी पर नियंत्रण नहीं रहने से भूमि के रेगिस्थान में परिवर्तन होने की प्रबल संभावनाएँ बनती जा रही है। वनों की कटाई न करने के प्रति जन चेतना फ़ैलाने के उद्देश्य से आंदलनों को शुरु किया जाना चाहिए।
मनुष्य की प्रदूषित मानसिकता प्रकृति को किसी न किसी रुप में प्रदुषित करती है। अस्तु प्रकृति के प्रदूषण को रोकने के लिए संस्कृति की आत्मा, जिसमें प्रकृति की गूँज है, से अनुप्राणित होकर शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। अत: शिक्षण संस्थाओं में अध्ययनरत बालक-बालिकाओं को परम्परागत भारतीय शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।            
पूर्व की पीढिय़ों ने अपने समय में प्रकृति का पूर्ण विकास कर उनको भौतिक संपत्ति के रुप में बदलकर अगली पीढियों को प्रदान किया जाना है और यह माना है कि आने वाली पीढ़ी उन पूर्वजों का उपकार मानेगी, लेकिन वर्तमान पीढ़ी की तो भावी मानव के लिए जटिल समस्याएँ और प्रकृति के विध्वंस का आधार छोड़ कर जाने की संभावनाएँ बन रही है। आज रेगिस्थान बढ़ रहे हैं। जीव-जंतुओं की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त हो रही है। प्रकृति के वर्तमान दोहन के भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर ही अपनी योजनाओं का निर्माण करना चाहिए।

सम्पर्क: 103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001, goverdhanyadav44@gmail.com

Jul 18, 2009

छत्तीसगढ ज़हाँ जिंदगी नाचती है...

छत्तीसगढ़ ज़हाँ जिंदगी नाचती है...
- रामहृदय तिवारी
छत्तीसगढ़ - भारत का हृदय स्थल - एक प्यारा सा प्रान्त, जिसे इतिहास ने दक्षिण कौशल के नाम से पुकारा है, भूगोल ने धान का कटोरा कहकर स्नेह से दुलारा है, पुरातत्व ने जिसे महाकान्तार की संज्ञा से संवारा है- वहीं संस्कृति ने 'लोक कलाओं का कुबेर' कहकर अंचल का मान बढ़ाया है।
यह एक सच्चाई है कि कला और संगीत ने संभवत: किसी समाज को इतना अधिक प्रभावित और अनुप्राणित नहीं किया होगा, जितना इन्होंने हमें किया है। करमा, ददरिया और सुआ की स्वर लहरियां, पंडवानी, भरथरी, ढोलामारू और चंदैनी जैसी गाथाएं सदियों से इस अंचल के जनमानस में बैठी हुई हैं। यहां के निवासियों में सहज उदार, करुणामय और सहनशील मनोवृत्ति, संवेदना के स्तर पर कलारुपों से बहुत गहरे जुड़े रहने का परिणाम है। छत्तीसगढ़ का जनजीवन अपने पारंपरिक कलारुपों के बीच ही सांस ले सकता है। समूचा अंचल एक ऐसा कलागत लयात्मक- संसार है, जहां जन्म से लेकर मरण तक- जीवन की सारी हलचलें लय और ताल के धागे में गूंथी हुई हैं। कला गर्भा इस धरती की कोख से ही एक अनश्वर लोकमंचीय कला सृष्टि का जन्म हुआ है - जिसे हम सब 'नाचा' के नाम से जानते हैं।
नाचा छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की आबोहवा का एक महकता झोंका है। नाचा इस अंचल के सरल सपनों का प्रतिबिम्ब है। अनगढ़ जन- जीवन से जन्म लेने वाला सुगढ़ नाचा, सच पूछिए तो, ग्रामीण कलाकारों द्वारा पथरीली जमीन पर चन्दन बोने की हिमाकत है। समूचे छत्तीसगढ़ी लोक जीवन की नब्ज को टटोलने का सबसे कारगर माध्यम है नाचा।
नाचा का अलग रंग है, मस्ती है, प्रवाह है। एक ओर जहां इसमें परंपरा निर्वाह की चाह है, वहीं अनचाही परंपरा की चट्टानों को तोडऩे की अदम्य शक्ति भी है। नाचा, नगरीय रंगमंच के बौद्धिक विलास से ऊबे मन की विश्रान्ति है। उसमें लोगों के विमुग्ध करने और मन के तारों को झंकृत करने की अद्भुत क्षमता है और है आंसुओं को पीकर मुस्कान बांटने की सहज सरल चेष्टा। छत्तीसगढ़ अंचल की सम्पूर्ण सहजता, सरलता, मोहकता और माधुर्य जहां एक मंच पर सिमट आए हों, उस मंच का नाम नाचा है। अपनी दीनता, हीनता, अशिक्षा, उपेक्षा और अपमान की आग में तपकर ग्रामीण कलाकर जिस कला संसार की सृष्टि करते हैं, उस संसार का नाम है नाचा। नाचा नृत्य गीत और गम्मत का अनूठा संगम है।
इन सबके बावजूद, सदियों से उपेक्षित, तिरस्कृत और हेय समझे जाने वाले इस नाचा की ओर विद्वानों की दृष्टि अभी हाल के वर्षों में गई। नाचा ने ऐसे भी दिन देखे हैं, जब शिष्ट और सभ्रान्त समाज नाचा देखना अपनी गरिमा के विरुद्ध  समझता था। आज इस विश्वविख्यात नाचा पर बहुत कुछ लिखा गया है। इस पर आज अनेक शोधार्थी शोधकार्य में संलग्न हैं, कई पीएचडी की डिग्री ले चुके हैं। हालत आज यह है कि गांवों के चौपालों से उठकर महानगरों की अट्टालिक मंचों पर नाचा के भव्य प्रदर्शनहो चुके हैं। अपनी अनोखी शैली, सादगी, संप्रेषणीयता और आडंबरहीनता के कारण आज नाचा लोकमंचीय आकाश में एक चमकता हुआ नक्षत्र बन चुका है। 
साहित्यकारों, विद्वानों और कलामनीषियों ने नाचा को अपने-अपने ढंग से अलग-अलग अवसरों पर परिभाषित किया है। डॉ. शिव कुमार मधुर के अनुसार- नाचा अपने नाम के अनुरुप मूलत: नृत्य प्रधान विधा है। निरंजन महावर लिखते हैं- नाचा एक सर्वजातीय रंग विधा है, जिसका उद्भव और विकास ग्रामीण समाज में हुआ है तथा उसमें अनेक परंपरागत विधाओं ने सम्मिलित होकर उसे समृद्ध किया है नाचा मूलत: एक हास्य प्रधान नाट्य विधा है। मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद  से जुड़े नवल शुक्ल कहते हैं- नाचा नृत्य भाव और मुद्राओं का लयात्मक संसार है, यह आदमी की जिजीविषा और अभिव्यक्ति का संसार है। नारायण लाल परमार जी की राय थी कि- नाचा पूर्ण रुपेण एक जीवन केन्द्रित लोक विधा है। मनोरंजन और शिक्षण का जैसा मणिकांचन संयोग इसमें मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। नाचा अंचल के उत्थान पतन का आरसी है। डॉ. विनय पाठक के अनुसार- लोक नाट्य नाचा की सहजता उसका शृंगार है और उसका अल्हड़ कमनीय सुघड़ रुप उसका आकर्षण।  स्व. रामचन्द्र देशमुख कहते थे- नाचा छत्तीसगढ़ के गांवों में थके हारे ग्राम्य जीवन को नई स्फूर्ति देने वाला माध्यम है। ग्राम जीवन की सहजता, निश्छलता और बेलाग रिश्तों की पृष्ठभूमि है इसके साथ। सापेक्ष के संपादक डॉ. महावीर अग्रवाल लिखते हैं - शिष्ट जीवन की सारी सौजन्यता, रस सिद्धता और कलात्मकता नाचा के चुम्बकीय आकर्षण के सामने फीकी लगती है।  चर्चित कथाकार डॉ.परदेशीराम वर्मा कहते हैं - छत्तीसगढ़ चुप्पे लोगों का अंचल है और वह अपनी चुप्पी जिन माध्यमों से तोड़ता रहा है, उनमें सबसे सशक्त माध्यम नाचा है। अंचल की कल्पनाशीलता का अद्भूत लोकमंचीय विस्तार है नाचा।
यह तो हुई नाचा के द्रष्टा और साक्षी मनीषियों की राय। लेकिन स्वयं नाचा के कलाकारों से पूछें तो वे नहीं बता सकते हैं कि नाचा आखिर क्या है? वे बताने में नहीं दिखाने में माहिर हैं। साहित्य का इतिहास साक्षी है कि राम को भगवान मानकर स्तुतिगान करने वाले महर्षियों से ज्यादा भगवान का वास्तविक हाल उनका वह अभिन्न दास समझता है, जो अपना कलेजा चीरकर बता देता है- भगवान उसके लिए क्या है? ठीक वैसे ही नाचा के विनम्र कलाकार मंच पर अपना हृदय चीरकर बता देते हैं कि देखो नाचा ये है। 
नेमीचन्द्र जैन कहते हैं - रंगमंच कलात्मक अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसमें मनोरंजन का अंश अन्य कलाओं की तुलना में सबसे अधिक है। रंगकला हमारे आदिम आवेगों और प्रवृत्तियों को जागृत कर उन्हें एक सामूहिक सूत्र में बांधती है। नि:संदेह कश्मीर से केरल और कच्छ से कामरुप अंचल तक फैली हमारी रंगारंग नाट्य परंपरा विशाल, समृद्ध और जीवन्त है। उनमें  विविधता के बावजूद मौजूद, एक अंतर्सूत्र उनको एक अटूट रिश्ते से जोड़ता है। डॉ. मधुर लिखते हैं कि ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का भरत नाट्य शास्त्र कोई आकस्मिक उपज नहीं, वरन पूर्व परंपरा को लेकर की गई एक निश्चित योजना है। समुन्नत नाट्यकला की आधारशिला लोक जीवन में व्याप्त गीत और अभिनय की लोक शैलियां ही है। देश के विभिन्न प्रादेशिक लोकनाट्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसी रंग शैलियां भी हैं जो अपने सीमित अंचलों में जन रंजन का माध्यम है। जैसे बंगाल में कीर्तनिया, उडिय़ा में गंभीरा, महाराष्ट्र में गोंधल वैसे ही छत्तीसगढ़ में नाचा है।
स्पष्ट है कि नाचा किसी काव्य की तरह केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति नहीं है, न वह किसी चित्र या मूर्तिकला की तरह काल की बाहों में कैद कोई स्थिर रूप है। वह तो गतिशील झरने की तरह लोकजीवन की अनुभूतियों, आवेग, आकांक्षाओं और सपनों को सहज सादगी से अभिव्यक्ति देने वाला जीवंत मंच है।
अशिक्षित या अल्पशिक्षित मगर पारखी नजर वाले नाचा के कलाकार आमतौर पर खेतिहर मजदूर होते हैं। अपने जीवन और समाज की विसंगतियों को उजागर करने के लिए स्वयं अपनी सूझबूझ के अनुसार छोटे-छोटे प्रहसन रचते हैं, सामूहिक रूप से रिहर्सल करते हैं। निर्देशक नाम का कोई निर्दिष्ट व्यक्ति नाचा में नहीं होता। न ही उनकी कोई लिखित स्क्रिप्ट होती है। सब कुछ परस्पर सामंजस्य और साझेदारी में मौखिक रूप से चलता है। कई चुटीले और सटीक संवाद तात्कालिक  रूप में मंच पर ही बनते चले जाते हैं। ठेठ मुहावरों और पैनी लोकोक्तियों के सहारे हास्य व्यंग्य से ओतप्रोत संवादों को सुनकर दर्शक समूह हंस-हंस कर लोट-पोट तो हो ही जाता है, मगर हास्य के बीच कई ऐसी विद्रूपमय स्थितियां सामने आ जाती हैं कि दर्शक तय नहीं कर पाता कि वह हंसे या रोये।
नाचा अपने आप में एक टोटल थियेटर यानि परिपूर्ण नाट्यशैली है। उसमें उन्मुक्तता, चित्रण, रंगरचना तथा दृश्यविधान में यथार्थता के साथ-साथ दर्शकों की कल्पना शीलता को साथ लिए चलने पर बल अधिक समाहित रहता है। अभिनेता और दर्शक वर्ग के बीच घनिष्ट संबंध इसकी दूसरी मौलिक विशेषता है। नाचा में जीवन की मौलिक मान्यताओं और मानवीय मूल्यों को जोड़े रहने की गुंजाइश बराबर बनी रहती है। अपने गम्मतों के माध्यम से कलाकार दैनंदिनी जीवन की विद्रुपताओं और समस्याओं पर कटाक्ष एवं व्यंग्यपूर्ण टिप्पणियां करते चलते हैं।  सूक्ष्म हास्य बोध की अपनी इसी प्रतिभा के बल पर स्वयं पर भी हंसने में सक्षम ये जीवट ग्रामीण कलाकार तमाम विपरीतताओं के बीच आज अपनी अस्मिता के साथ तनकर खड़े हैं। मंच पर इनका इम्प्रोवाइजेशन-प्रत्युपन्नमति की अद्भूत क्षमता देखकर थियेट्रिकल जगत हैरान है।
नाचा का यह एक और उल्लेखनीय पहलू है कि बिना किसी संस्थागत प्रशिक्षण के लगभग सारे कलाकर गायन, वादन, नृत्य, अभिनय एवं रूपसज्जा से लेकर नाचा से संबंधित हर काम कर लेने में सिद्ध हस्त होते हैं। नाचा जैसा आडम्बरहीन मंच ढूंढना मुश्किल है। ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध कोई भी भूखंड इनका मंच होता है। यहां पाल परदे पखवाइयां जैसे तामझाम की कोई दरकार नहीं होती। साजिन्दों के बैठने के लिए साधारण सा तख्त मिल जाए तो बहुत है। सारे कलाकारों की वेशभूषा सामान्य ग्रामीणों जैसी ही होती है। अंगराग के लिए सफेद, पीली छुई, खडिय़ा, हल्दी-कुमकुम, काजल, मिट्टी, कालिख, नीला थोथा, मुरदार शंख जैसी सामान्य सुलभ वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। सारे कलाकार पात्रानुकुल अपना मेकअप स्वयं करते हैं। मंच के तख्त पर संगतकार बैठते हैं और मंच के तीनों ओर दर्शक वर्ग, जो देर रात से शुरु होने वाला नाचा और सुबह की लाली तक पूरी उत्कंठा और सहज  मुग्धता से देखता है और छक कर आनंद लेता है।
नाचा की समूची प्रस्तुति एक थिरकन और लयबद्धता के आरोह-अवरोह में बंधी होती है। कलाकारों की मुद्राओं में हलचल और भावाभिव्यक्तियों में, अभिनय नृत्य और अदाकारी में एक सहज लयबद्धता केवल देखने और महसूस करने की चीज है। नृत्य गीत कब खत्म होकर गम्मत में परिवर्तित हो जाता है, गम्मत फिर कब नृत्य गीत में स्वयमेव ढल जाता है तथा कभी-कभी नृत्य गीत और अभिनय चक्रवात की तरह कैसे एक रस और परस्पर आलिंगित होकर धूम मचा देते हैं- यह नाचा देखकर ही जाना जा सकता है।
नाचा में महिलाओं का निर्वाह पुरुष ही करते हैं। पुरुष ही परी बनते हैं। नचकहरीन और लोटा लिए नजरिया की भूमिका पुरुष ही निभाते हैं। इनकी अदाएं, हावभाव, चालढाल और भावभंगिमाएं इतनी अधिक स्त्रीसुलभ कोमलता और मोहकता के करीब होती हैं कि शिनाख्त करना मुश्किल होता है। नाचा में परी और जोक्कड़ दो ऐसे अद्भूत चरित्र हैं- जिनकी परिकल्पना का निहितार्थ भौंचक कर देता है। परी और जोक्कड़ के वेश विन्यास और रूप सज्जा में कलाकार अपनी पूरी कल्पना शक्ति उड़ेल देते हैं। परी इनके लिए सर्वश्रेष्ठ रूप सौंदर्य और मानवीय सम्मोहन की जीती जागती मिसाल है। उसमें आसमान में उडऩे वाली परी की तरह अलौकिकता का भी हल्का सा स्पर्श रहता है। दर्शक रस विभोर होकर परी की अनोखी अदाओं पर, उसकी लचक और नजाकत पर शुरु से आखिर तक फिदा होकर मुजरे लुटाता है। 'नाचा का जोक्कड़ निरंजन महावर के शब्दों में सर्कस के जोकर, संस्कृत नाटक के विदूषक या अंग्रेजी नाटक के क्लाउन की तरह नहीं है। नाचा का वह सर्वाधिक मुखर और जीवन्त चरित्र होता है। वह हंसाता है, मनोरंजन करता है, हास्य विनोद की सृष्टि बड़ी सहजता से करता है।' पर वह इतना ही नहीं होता। जोक्कड़ छत्तीसगढ़ी नाचा की सम्पूर्ण अस्मिता और अवधारणा के निचोड़ का जीता जागता प्रतीक है। परी और जोक्कड़ ही ऐसे चुम्बकीय चरित्र हैं जो रात-रात भर दर्शकों को बांधे रखने के रहस्य को साथ लिए रहते हैं। ब.व.कारन्त कहते थे कि 'लोक नाट्य का सीधा सादा अर्थ है वह लोगों के साथ रहा है और सदा रहेगा।' नाचा के अपने मूल स्वभाव में देहाती जनता के दैनिक जीवन, सुखदुख, आशा आकांक्षा हास्य उल्लास और आंसू तथा निराशा का एकांतिक एवं परिवेश के प्रति सहज जागरुकता और उसकी बेलाग अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। बाल विवाह को रोकने, विधवा विवाह को प्रचलित करने, छुआछूत की भावना का उन्मूलन करने, ऊंचनीच पर आधारित शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने में नाचा ने कभी भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। असहयोग आंदोलन के दिनों में अछूतोद्धार पर आधारित प्रहसन जमादारिन और स्वतंत्रता के आसपास के दिनों में विधवा विवाह पर मुंशी-मुंशइन नाम से खेले जाने वाले नाटक नाचा की चर्चित प्रस्तुतियां हैं। आज भी निरक्षरता और कुष्ठ उन्मूलन जैसे अन्य कई ज्वलन्त विषयों को लेकर अनेक नाचा मंडलियों ने अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय बखूबी दिया है और दे रहे हैं। 
नाचा का लोकमंचीय रूप आज जिस मुकाम पर है, वहां से हम पीछे मुड़कर देखते हैं- तो जहां तक हमारी दृष्टि जाती है, इसका स्वरूप ऐसी ही नहीं था जैसा कि वह आज है। अपने युग और परिवेश की बदलती तस्वीर की छाया स्वभावत: उस पर पड़ती रही है। एक युग था जब बिजली की व्यापक सुलभता नहीं थी। मशाल की रोशनी ही मंच का सहारा थी। माइक की व्यवस्था का भी सवाल ही नहीं था। गिने चुने वाद्यों में केवल चिकारा, मंजीरा और तबला जिसे कमर में बांधकर कलाकार खड़े-खड़े ही बजाया करते थे। खड़े साज के नाम से परिचित इस नाचा की शुरुआत ब्रम्हानंद के भजनों से होती थी। मंडई मेलों में, पर्वो, त्यौहारों में इस खड़े साज की अपनी लोकप्रियता थी।
फिर धीरे-धीरे मशाल की जगह गैस बत्ती ने ले ली। कुछ अतिरिक्त वाद्यों को शामिल किया गया। ढोलक और हारमोनियम के शामिल हो जाने से नाचा के आकर्षण में वृद्धि हुई। हारमोनियम मास्टर नाचा पार्टी के मनीजर कहलाने लगे। कई प्रसिद्ध नाचा पार्टियां इसी दौर में सामने आई। गुरुदत्त की नाचा पार्टी, मदराजी दाऊ की रिंगनी रवेली साज जिसमें ठाकुर राम, भुलवा, लालू, मदन जैसे अनमोल रत्न शामिल थे। इसी तरह धरम लाल कश्यप की नाचा पार्टी थी। उन दिनों इन नाचा पार्टियों की खूब धूम थी। इसी दौर में फिल्मी चाल चलन, ढंग, अदाएं और द्विअर्थी  संवादों का चलन भी खूब बढ़ा। यह नाचा में परस्पर प्रतिस्पर्धा, उत्तेजना और सनसनी पैदा करने का दौर था।
इसी बीच लगभग 70 के दशक में छत्तीसगढ़ी की सांस्कृतिक धरती पर नाचा के समान्तर कुछ अनूठे लोक मंचीय प्रयोग हुए। दाऊ रामचंद्र देशमुख जी एवं दाऊ महासिंह चंद्राकर जी जैसे समर्पित, संपन्न और जुनूनी कला साधकों ने क्रमश: चंदैनी गोंदा और सोनहा बिहान जैसी युगांतरकारी छत्तीसगढ़ी -मंचीय प्रस्तुतियां दीं, जिनकी उपलब्धियां अब अंचल के सांस्कृतिक इतिहास की धरोहर बन चुकी हैं। इन प्रस्तुतियों की भव्यता और चकाचौंध के समान्तर श्री हबीब तनवीर द्वारा एक अलग ही किस्म का लोक मंचीय प्रयोग चलता रहा।
हिन्दुस्तानी थियेटर फिर नया थियेटर के बैनर पर छत्तीसगढ़ी नाचा के कलाकारों, वाद्यों, गीतों एवं बोली को कच्चे माल की तरह अपने ढंग से अपनी प्रस्तुतियों में उन्होंने इस्तेमाल किया और अपनी विलक्षण प्रतिभा तथा सुनियोजित व्यूहरचना के तहत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पायी। कुल मिलाकर आशय यही है कि आज नाचा लोक नाट्य अपने विविध रुपों में पूरी ऊर्जा शक्ति और प्रभाव को लिए युग के साथ कदम मिलाता प्रवहमान है। छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की यह सरिता किस सागर में समायेगी- कौन कह सकता है। हम केवल कामना कर सकते हैं कि नाचा की यह आत्मीय तरंगिनी तब तक प्रवाहित रहे, जब तक इस अंचल के लोक जीवन में स्पन्दन है।