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Aug 25, 2011

जन्म दिवस: 31 अगस्त


वह ताउम्र प्यार की पेशानी का पसीना पोंछती रहीं अमृता प्रीतम

- परितोष चक्रवर्ती
अक्सर लोग कहते हैं कि अमृता अपने आपको ही लिखती रहीं। पता नहीं यह कथन धनात्मक भाव लिए हुए है या ऋणात्मक, किंतु यदि ऐसा है भी तो यह काफी अभूतपूर्व साधना का मार्ग है। बहुत विरले ही होते हैं जो अपने आपको इस कदर जान सकते हैं कि उसे लिख भी सकें।
रेल के सफर में नींद की प्रतीक्षा में जब आप चुपचाप पड़े हों, आंखें बंद हों और मस्तिष्क जागता हो तो कभी- कभी आसपास की कुछ बातें छनकर इस तरह आपके करीब आती हैं कि उन बातों की गंध मस्तिष्क में बनी रह जाती है। अक्सर ऐसी सुगंधों के साथ स्मृतियां कई- कई रूप ले लेती है। मेरे घर का नाम 'आकृति' भी ऐसी ही किसी उनींदी सी यात्रा में एक सुगंध की तरह मेरे भीतर बस गया था। मैं नहीं जानता किस नन्हीं सी बच्ची को कौन सी मां ने दरवाजे के पास न जाने के लिए मना किया था-'आकृति उधर मत जाना,' और इसी समय यह नाम मेरे घर के लिए अंकित हो गया।
ऐसी ही एक यात्रा में मेरे बगल वाले कूपे से देर रात एक आवाज आती है, 'यार अब तो बत्ती बुझा दो, आखिर इस 'रसीदी टिकट' में पूरी रात को समेट लोगी क्या?' मैं आधी नींद में मुस्करा उठा था कि कहीं बगल वाले कूपे में कोई अमृता प्रीतम की आत्मकथा 'रसीदी टिकट' तो नहीं पढ़ रहा है! महिला का कंठ मेरे अनुमान को सच साबित कर जाता है- 'चादर से आंखें ढंक कर सो नहीं सकते क्या? तुम क्या जानो, यह 'रसीदी टिकट' अमृता प्रीतम की है जो उनके प्यार भरे जेहन पर चस्पा है। ये दुनियादारी के नाखून से निकाले नहीं निकल सकती, मैं तो सिर्फ रात ही जाग रही हूं।'
इच्छा हुई थी कि उठूं और अमृता को समझने वाली शख्सियत को देखूं, पर शालीनता की एक हद जो होती है। सुबह देखी जाएगी। सुबह देखा तो पड़ोस के कूपे में दो व्यापारी और दो जवान हंसते- ठठाते मिले, जाहिर है सुबह- सुबह अमृता को पढ़ते- पढ़ते वह रात वाली जोड़ी अपने गंतव्य पर उतर चुकी थी।
कई- कई बार कई- कई प्रसंगों में अमृता प्रीतम की चर्चाएं होती रहीं। कुछेक साल पहले कथा- लेखिकाओं के एक जमावड़े में एक आलेख पढऩे का अवसर मिला था। इसमें मैंने उस वाकये का जिक्र किया था जब इमरोज ने अपने संग- साथ के वादे को बिल्कुल ही अलग अंदाज में अमृता के माथे पर जड़ दिया था। हुआ यह कि कैनवास पर पेंटिंग करते हुए बातचीत के दरम्यान अमृता के माथे पर ब्रश से उसने एक चंद्रमा आंका था और बिना किसी रस्म अदायगी के अमृता के माथे पर सहयात्रा की मुहर लग गई थी। इमरोज खुद कहते हैं- 'हर दोस्ती या प्रेम एक अहसास का नाम है। यह अहसास मुझमें और अमृता, दोनों में था इसलिए हमारे बीच कभी यह लफ्ज भी नहीं आया- 'आई लव यू।' न ही मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं और न ही अमृता ने कभी मुझसे।'
अक्सर लोग कहते हैं कि अमृता अपने आपको ही लिखती रहीं। पता नहीं यह कथन धनात्मक भाव लिए हुए है या ऋणात्मक, किंतु यदि ऐसा है भी तो यह काफी अभूतपूर्व साधना का मार्ग है। बहुत विरले ही होते हैं जो अपने आपको इस कदर जान सकते हैं कि उसे लिख भी सकें। दोस्तोवस्की का लेखन भी आत्ममुग्धता का कहां था? कितने लोग हैं जो पीड़ा के फूल चुनकर अपने ही जेहन में गूंथ सके होंगे? आरोह पर तैरना बहुत आसान है, जबकि अवरोह में डुबकी लगाना उतना ही कठिन। दिल की परतों को अपने ही नाखून से खुरचकर भीतर झांककर देखने की प्रक्रिया कुंडलिनी जागृत करने से कमतर नहीं होती। जो वारिस शाह के कथन की गहराई में उतर सकती हो। उसने कभी निचली सीढिय़ों तक उतर कर अपने पांव नहीं धोए। दुख के पसीने को उतने ही ममत्व से वे अपने भिगोए आंचल से पोंछ लिया करती थीं, जैसे कालिया के प्रकोप से पूरे नंदगांव को निजात दिलाने वाले कृष्ण के भीगे बालों को राधा ने उसी तर्ज पर अपने आंचल से सुखाया था, मानो वह कृष्ण नहीं एक छोटा सा छौना हो, उसकी गोद में दुबका हुआ।
इमरोज और अमृता एक- दूसरे को, 'मैं तुम्हारा शीर्षासन, तुम मेरा प्राणायाम' कहा करते। अमृता कहती रहतीं कि 'जिंदगी की सारी कठिनाइयां छोटा सच है और इमरोज का साथ बड़ा सच।' अमृता और इमरोज शब्दों के अवगुंठन की तरह ही जिंदगी भर अपनी- अपनी पहचान को अक्षत रखकर आपस में जुड़े रहे क्योंकि अमृता ने कभी भी किसी की स्वतंत्रता को बांधने की कोशिश नहीं की। कतरा- कतरा दुख को वह गठरी की तरह जतन से रख लिया करती थी, लेकिन उस गठरी को खंगालकर एक- एक दुख को जब वह बाहर ले आती थीं तब तहों में छुपा दर्द मुस्कराहट की ताकत बन जाया करता था। वह ताउम्र प्यार की पेशानी का पसीना पोंछती रहीं।
'आक के पत्ते' उपन्यास का नायक हर जगह अपनी गुम हुई बहन को ढूंढता है तो 'यात्री' उपन्यास की पात्र सुंदरा अमृता की नब्ज में रमकर उसके अपने फलसफे में 4 वर्ष बाद उसके सामने खड़ी हो जाती है। 'एक सवाल' उपन्यास का नायक जगदीप भी अमृता की तरह ही मां की मौत की त्रासदी में अपना वजूद ढूंढता है। 'चट्टान' के पात्र भी अमृता के अंतस में छिपे हुए थे और जब कहानी में उतरे तो वे आज की दुनिया के व्यावहारिक पात्र बन चुके थे। घटनाओं को कलम तक पहुंचने में कभी बिल्कुल देर नहीं लगती तो कभी वे तीस- तीस बरस अंतस की पगडंडियों और सड़कों पर मचलती रहती हैं। यही अमृता के साथ भी हुआ। 'धरती', 'सागर और सीपियां', 'एक थी अनिता', 'एक सवाल', 'जेब कतरे' से लेकर 'पिंजर' तक असंख्य उदाहरण हैं जहां अमृता अपने पात्रों से रूबरू हो चुकी थीं या फिर स्वयं के एहसास से उन्होंने अपने पात्रों के घाव धोए!
मेरे मित्रगण अमृता के लेखन के प्रति मेरे अनुराग, गुलजार की नज्मों के प्रति मेरी दीवानगी, भारती की कनुप्रिया के प्रति अगाध श्रद्धा और अमृतलाल नागर और शिवानी के कथारस के प्रति आकर्षण को अतिरेक की संज्ञा देते हैं। मैं उन्हें समझा नहीं पाता कि वाल्मीकि की गोद में बाण से घायल होकर गिरा पक्षी यदि उनकी रचनात्मकता को एक महर्षि की संवेदना सौंप सकता है, यदि कृष्ण के पूरे जीवन में बांसुरी की उपस्थिति मानवीय तनाव को तरल कर सकती है, यदि किसन के माथे पर टिका मोरपंख प्यार की सम्यक व्यापकता को विकिरण दे सकता है तो मेरे अनुराग पर ऐतराज क्यों है? दंगे- फसाद पर और विभाजन की पीड़ा पर दुनिया भर के तर्कशास्त्रों के सामने रख लिखी कृतियों के बीच यदि अमृता प्रीतम रेशे- रेशे दुख और आंसुओं को पीकर जीने का संदेश पिंजर दे जाती हों तो क्या दंगों की तपिश पर मानवीय सोच की ठंडक बेमानी हो जाती है? यही अमृता के लेखन की ताकत है, यदि अमृता ने अपनी जिंदगी में करोड़ों सांसों को शामिल कर लिया है तो यह उनकी सहनशीलता है। अपने- अपने हिस्से के दुख को दुख की तरह देखना नया नहीं है। नया है दूसरों के दुख में अपने दुख को घोल कर दूसरों के दुख को सहने के काबिल बना देने की कोशिश करना। हां, एक जगह अवश्य अमृता बहुत भाग्यशाली थीं, तमाम अवरोधों, बदनामियों, गालियों के बीच वह वारिस शाह की व्यापकता की उंगली थामे बेखौफ चलती रहीं।
अमृता पंजाबी में लिखती रहीं पर हिंदी के पाठक उसे प्यार से पढ़ते रहे। मनुष्य की दुनिया में सब कुछ मीठा- मीठा भी तो नहीं है। जीवन में खटास की भी अपनी जगह है। 'जिंदगीनामा' को लेकर कृष्णा सोबती और अमृता के बीच एक 'फांस' के होने को लेकर हिंदी की साहित्यिक बिरादरी ने मति- गति के मजे भी लिए, पर अमृता ने किसी मकड़ी को संबंधों पर जाला बुनने की इजाजत ही न दी। आखिर 'मित्रो मरजानी' को संक्षिप्त सा 'बाय' कहा और अलविदा कह गई अमृता।
उसने इमरोज के बुखार से तपते शरीर को साहिर की खूबसूरत यादों की चादर से ढांप लिया था। इमरोज चादर का मर्म और उसकी इयत्ता को मान देना जानते हैं इसीलिए इमरोज ने कभी भी अमृता के प्यार की व्यापकता को आंखें मिच-मिचाकर छोटी कंदराओं में नहीं देखा, वह तो कहता था, मेरे लिए तुम बेटी की तरह रही और तुम्हारे लिए मैं पुत्र की तरह। रिश्तों की सघनता में अमृता का लेखन, इमरोज का साहचर्य और मित्रों की दुनिया- ये अपने आप में आज के हिंदुस्तान में एक अनुष्टुप छंद की तरह है जो तमाम भ्रष्टाचार, विसंगतियों और ज्यादतियों के बीच जीवन के प्रति हमें आश्वस्त करता है। आज तुम नहीं हो अमृता, पर रचनाओं का अमृत कलश तुमने हमारे नाम कर दिया है। क्या इस ऋण को हम कभी चुका पाएंगे?
संपर्क- सी-29, 'आकृति' सेक्टर-3, देवेन्द्र नगर, रायपुर (छ.ग.) मो. 09229259201

Jun 5, 2010

चॉकलेट

चॉकलेट
-परितोष चक्रवर्ती
राजधानी के आने में सिर्फ 15 मिनट रह गये हैं। उसकी पाली के साथी अभी तक नहीं पहुंचे। कम से कम शेखू और जॉन को तो अब तक आ जाना चाहिए था।
पिंटू उस्ताद को देखने से लगता ही नहीं कि उसकी उम्र कुल जमा 13 वर्ष है। वह अपनी टोली का सबसे लम्बा और अधिक उम्र का लगता है।
बाप की दारूबाजी और रोज की मारपीट से वह इतना तंग रहता है कि अक्सर दो- दो बजे रात तक घर नहीं जाता। आठ दिन पहले की बात है, जब देर रात पुलिस की गश्त में वह पहाडग़ंज में पकड़ा गया था। वो तो भला हो जीआरपी के चंडी हवलदार का जो उस समय चाय पीने के लिए स्टेशन के बाहर निकले थे, ड्यूटी पर थे और उन्होंने इंस्पेक्टर से बात की थी और मिन्नत-खुशामद करते उसे छुड़ा लिया था। कहीं थाने में ले जाया गया होता तो निश्चित रूप से उसे बुक कर देते। फिर भी इंस्पेक्टर ने सीधे-सीधे नहीं छोड़ा, कसके तीन-चार हाथ जड़ ही दिये थे। खाये-पिये बदन का वह इतना वजनी हाथ था कि पिंटू के दांत हिल गये थे।
कमोबेश टोली के सब लड़कों के घर की यही कहानी है। शेखू का बाप नई दिल्ली स्टेशन का पुराना बिल्ले वाला कुली है। ढेर सारे भाई-बहन, कमाई कम, चिकचिक ज्यादा। उस पर दारू का तांडव। जॉन की कहानी कुछ अलग है। उसके पापा प्वाइंट्समैन हैं, उसकी दो मां हैं। बड़ी मां सिलाई-कढ़ाई करके अलग पैसा कमाती है और अलग झोपड़ी में रहती है। बड़ी मां के भी दो बच्चे हैं। जो स्कूल जाते हैं, पर जॉन के चार भाई-बहनों में सिर्फ बड़ी बहन ही पढऩे जाती है। एक सरकारी स्कूल है, पांचवीं तक। जॉन वहां जाता था लेकिन पढ़ाई-लिखाई में उसका मन नहीं लगता। उधर के प्राय: सभी बच्चे रेलवे स्टेशन के आस-पास छोटे-मोटे काम में लग जाते हैं।
इस नये काम की शुरूआत तो एक तरह से चंडी हवलदार के कहने से ही हुई। ये सच है कि चंडी हवलदार नि:स्वार्थ कोई काम नहीं करते, लेकिन पिंटू को फिर भी वे अच्छा मानते हैं। पिछले दिनों प्लेटफार्म नं. एक से लेकर दस तक जमाल की दादागिरी चलती थी। जमाल अपनी पसन्द की चीजें पहले खुद छांटता था, फिर बचा हुआ सामान अन्य लड़कों में बांटता था। बोतल और प्लास्टिक पैकेट और इन फेंकी हुई चीजों में कभी-कभार ही कोई अच्छी चीज मिल पाती। इस तरह के भेद-भाव से सब दु:खी रहते थे।
शेखू ने तो सीधे-सीधे जमाल पर हमला ही बोल दिया, 'तू हम लोगों को ठगता है, सारा अच्छा माल खुद निकाल लेता है। दस-दस गाडिय़ां अटेन (अटेंड) करने के बाद भी हमें नाश्ते तक का पैसा नहीं मिलता। तुम तो गाड़ी खंगालते नहीं हो, फिर भी सारा माल झपट लेते हो।'
खूब गुत्थमगुत्था हुई। बात और बिगड़ जाती कि चंडी हवलदार कहीं से प्रकट हो गये। उन्होंने उसी दिन प्लेटफार्म का बंटवारा कर दिया। एक से छह नम्बर तक के प्लेटफार्म जमाल और उसके साथियों के और सात से बारह नम्बर प्लेटफार्म पिंटू उस्ताद के हिस्से में। इस बंटवारे के साथ ही यह तय हो गया था कि सप्ताह में एक नम्बर की एक अद्धी चंडी हवलदार को देनी होगी और किसी एक दिन मुर्गा खिलाना पड़ेगा। गनीमत है कि पैसे की चर्चा चंडी हवलदार ने नहीं की। वैसे उनके हिस्से में नगद पैसे आते ही कितने हैं, जो हवलदार को देते?
उसके बाद भी झमेले कम नहीं थे। ट्रेन के आते ही कुलियों से पहले उन्हें ट्रेन में चढऩे की इजाजत नहीं थी। कई बार तो यात्रियों के छोड़े हुए अच्छे सामान कुली ही चेप लेते थे। पिंटू ने एक बार देखा कि फोटोखींचने वाला एक मोबाइल सीट पर पड़ा है। देवक सिंह कुली ने उसे चुपके से जेब में रख लिया था। पिंटू ने कुली को कहा भी कि सिर्फ पांच रुपये दे दे, नहीं तो सबको बता देगा। इतना कहना था कि उस कुली ने अपने दो आदमी बुला लिये और खाली कोच के अन्दर ही उसकी अच्छी-खासी पिटाई कर दी। पिंटू उस्ताद के पास सिवाय चंडी हवलदार के कोई सहारा नहीं था। अंतत: चंडी ने ही कुलियों के मेट से बात की और तय किया कि कोई भी यात्री गाड़ी प्लेटफार्म में पहुंचने के दस मिनट तक मवाली लड़के ट्रेन के भीतर नहीं जाएंगे, अब चाहे इससे कुछ हाथ लगे या न लगे। कुलियों से भी यह कौल ले लिया कि वे अब सिर्फ सामान उतारेंगे और चढ़ाएंगे, बाकी सामान नहीं छुएंगे। इस अलिखित संविधान पर सारा कारोबार चल रहा था।
चंडी हवलदार की सहानुभूति इन लड़कों के साथ एक दूसरी वजह से भी थी। दबी जबान से जमाल जैसे कुछ शरारती लड़के यह बात कहने से नहीं चूकते कि पिंटू उस्ताद और शेखू के घर में चंडी का आना-जाना वर्षों से है। इस बात को लेकर कभी-कभी पिंटू और शेखू को चिढ़ाया भी जाता रहा है। मगर ऐसी नोंक-झोंक और फब्तियों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। अक्सर पीकर घर लौटे हुए बाप जो तांडव मचाते हैं, उससे अब इन किशोरों के मन में रिश्तों की कोई खास अहमियत नहीं रह गई है। मारपीट, गाली-गलौज के बीच गुजरे हुए दिन में वे खुश तब होते हैं जब किसी ट्रेन के डिब्बे से उन्हें कोई नायाब-सी चीज पड़ी हुई मिल जाती है। बिज्जू के हाथ की वह घड़ी अब भी दूसरे लड़कों को चिढ़ाती रहती है। एक बार तो खुद हवलदार ने बिज्जू से 50 रुपये में वह घड़ी मांगी थी। ले-देकर बिज्जू ने एक पौव्वा लाकर हवलदार को दिया, तब कहीं जाकर हवलदार की नजर घड़ी पर से हटी...।
अब विम्पी रेस्टोरेंट के पास भी उन लोगों का जमा होना जीआरपी को खटकने लगा। पिंटू उस्ताद ने सभी को कह दिया कि होम सिग्नल के दायीं तरफ एक पान की दुकान है, वहीं सब लोग इकट्ठे हो जाएं। पान वाला तीरथराम वैसे बीसेक साल का है, लेकिन पिंटू से उसकी दोस्ती हो गई है। यात्री गाड़ी में यात्रियों द्वारा तम्बाखू के जितने पाऊच पिंटू और उसके साथियों को मिल जाते हैं, उन्हें वह करीब एक चौथाई कीमत पर खरीद लेता है। कभी-कभी इसके एवज में उन्हें उधारी में बीड़ी भी मिल जाती है।
पिंटू की उस छोटी-सी टोली में आठ-नौ साल से लेकर उसकी उम्र अर्थात बारह-तेरह साल तक के सात लड़के हैं। दो छोटे लड़के संजू और मन्ना साथ इसलिए रहते हैं कि बर्थ के नीचे घुसकर झांकने में सुविधा रहती है। छूटे हुए सामान अधिकतर ए.सी. डिब्बों में ही मिलते हैं। राजधानी एक्सप्रेस उनकी जुबान में 'गोल्डन ट्रेन' है। यह पिंटू का दिया हुआ नाम है।
केवल चंडी हवलदार से ही दोस्ती से काम नहीं चलता है। जीआरपी के इंस्पेक्टर भदौरिया को भी 15-15 दिनों में सलामी देनी पड़ती है। सभी लड़के मिलकर एक पूरा बोतल बैगपाइपर का भदौरिया को पहुंचाते हैं। पैसे की मांग भी भदौरिया ने की थी, तब चंडी हवलदार ने लड़कों का साथ दिया था और भदौरिया को समझाया था, 'हुजूर, ये पैसे कहां से दे सकते हैं? बड़े लोग भी एक-एक पैसा गिनकर रखते हैं। इनके लिए कोई क्या छोड़ेगा। गरीब लड़के हैं, इन पर रहम खाइए।'
पुलिसवालों की पुलिसवाले सुन लेते हैं। सो एक बैगपाइपर से अंतत: मामला निपटा।
कुछ सिपाही भी हैं जो बीच-बीच में कॉलर-वॉलर पकड़कर अक्सर दो-चार जमा देते हैं। इसका भी पिंटू ने नाम रखा है 'हुप्पी।' घर पर प्राय: सभी बच्चे अपने बाप से ऐसी 'हुप्पी' आये दिन पाते रहते हैं। साथी कहते हैं कि पिंटू ने ही अपनी स्टाइल से संजू बाबा वाली 'झप्पी' का विरोधी शब्द 'हुप्पी' ढूंढ लिया है। 'झप्पी' में प्यार टपकता है- तो 'हुप्पी' में घूंसा बरसता है।
बोतलबंद पानी की खाली बोतलें इकट्ठा कर वे पान की दुकान में जमा करते हैं। आजकल कुछ यात्री थोड़ा ज्यादा ही नियम-कायदे का पालन करने लगे हैं। बोतल को बिल्कुल मोड़कर फेंकते हैं। ऐसी तमाम बोतलों का भाव न के बराबर होता है। ढक्कन औरबोतल दोनों अलग-अलग कर ली जाती है। पिंटू उस्ताद ने दो व्यापारियों को ढूंढ लिया है जो ढक्कन और बोतल खरीद लेते हैं। साफ-सुथरी बोतल के एवज में 10 पैसे प्रति बोतल मिलते हैं और ढक्कन के पांच पैसे। मुड़ी-तुड़ी बोतलें वजन से बिकती हैं। इन बोतलों के बहुत कम पैसे मिलते हैं। सेठजी की मर्जी है, वे जितना दे दें। वैसे खंगालने को बाथरूम भी खंगाल लिया जाता है। वहां गलती से भी नहीं झांकता है तो संजू। उसका कहना है कि मैं बाथरूम का सामान देखता ही नहीं। दो-तीन बार बड़ा धोखा हो गया। औरतों वाले पैड अखबार में ऐसे लपेट कर छोड़े गये थे जैसे वह बड़ा कीमती सामान हो। पहले तो संजू को खून-वून देखकर डर लगा था, पर बाद में पिंटू उस्ताद ने अपनी भाषा में उसे समझा दिया था। तब से उसे घिन-सी आती है। हालांकि उसी टायलेट से उसे एक बार घड़ी मिल चुकी है लेकिन फिर भी वह टायलेट में अक्सर नहीं झांकता।
पिंटू का कहना है कि 'गरीब आदमी को काहे का घिन!' एक बार तो विदेशी लैट्रिन के पैन में उसे एक पर्स दिख गया था और उसने हाथ डालकर उसे निकाल लिया था। अब तक की सबसे बड़ी कमाई वही थी। तीन हजार नगद मिले थे। अक्सर चॉकलेट के आधे हिस्से इन्हें मिल जाते हैं तो बिना देर किये इसे वे निगल लेते हैं। हालांकि अलिखित नियम यह है कि जो भी सामान हाथ लगेगा वह पान दुकान के पास जाकर बांटा जाएगा लेकिन ये दोनों साथी चॉकलेट और खाने-पीने के सामान के मामले में उसे चट कर जाने में ही भलाई समझते हैं। दो शिफ्टों में काम को बांट लिया गया है। अपेक्षाकृत उम्र में छोटे बच्चों को रेलवे स्टेशन से रवाना होने वाली कुछ गाडिय़ों में अगले स्टापेज तक भेजा जाता है। एक झाड़ू करीब-करीब चार महीने तक काम में लाई जाती है। झाड़ू लगाने के बाद वे पैसे मांगते हैं और फिर दूसरी ट्रेन में ठीक उसी तरह सफाई करते और पैसे मांगते वापस होते हैं। पिंटू सिर्फ इनकी सुरक्षा के लिए साथ में जाता है तो कभी शेखू की ड्यूटी लगती है। जब स्क्वायड की चेकिंग होती है तब इनकी मुसीबत बढ़ जाती है। कभी-कभी कोई टीटी इन्हें बीच में ही ट्रेन रूकने पर बलात उतार देता है। एक बार तो संजू को पटरी के किनारे-किनारे दिल्ली स्टेशन तक लौटने के लिए 15 कि.मी. पैदल तय करने पड़े थे। एकत्रित पैसे में से कभी-कभी टीटी को भी कुछ चढ़ावा देना पड़ जाता है। यद्यपि हवलदार ने सबके मना कर रखा है कि कोई 'यार्ड' की तरफ नहीं जाएगा, क्योंकि यार्ड में आरपीएफ की ड्यूटी होती है। इनके हत्थे चढऩे पर जीआरपी वाले बीच-बचाव नहीं करते क्योंकि दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है।
जिस दिन रेलवे के बड़े अधिकारी का निरीक्षण होता है उस दिन पहले से ही खबर हो जाती है और मन मारकर उस दिन की रोजी का नुकसान सहना पड़ता है। कभी-कभी ऐसे दिनों में चंडी हवलदार उदार हो जाते हैं। कार स्टैंड पर उस तरफ जो चाय वाला बैठता है उसके जरिये वे लड़कों की टोली को आधा कप चाय पिलवा देते हैं। बच्चे खुश हो जाते हैं और हवलदार को बच्चों का आशीष इन शब्दों में मिलता है- 'चचा, आज जरूर आपको कोई मोटा धूर (आसामी) मिलेगा।' सुनकर हवलदार की अधपकी मूंछों पर मुस्कराहट फैल जाती है। ए.सी. डिब्बों के सामने जो साइड पॉकेट बने होते हैं, उन्हीं को खंगालने में सबकी रूचि रहती है। कभी-कभी सीट के नीचे भी कोई सामान छूट गया होता है। वे पहले ते बड़ी तेजी से हाथ डाल देते थे लेकिन अब जब से बमबाजी के किस्से होने लगे हैं, डरते-डरते ही पड़े हुए पैकेट को छूते हैं। बीच-बीच में पिंटू सबकी क्लास भी लेता है कि इस किस्म के पैकेट से दूर रहा जाए, ज्यादा संदेह होने पर हवलदार को भी इसकी सूचना दे दी जाए।
उस दिन मंगलवार था। तीन नम्बर प्लेटफार्म पर कोलकाता राजधानी एक्सप्रेस आ रही थी। उसके पहले ही एक पूरी ट्रेन बच्चे खंगाल चुके थे। पान दुकान से कुछ दूरी पर मन्ना और संजू एक पत्थर पर आकर बैठे। मन्ना और दिनों की अपेक्षा बहुत खुश था। वह थोड़ी देर तक चुप रहा, पर ज्यादा देर तक अपने को रोक नहीं पाया। उसने संजू से कहा- 'यार, आज बहुत अच्छी चीज मुझे मिली है, इसे मैं जमा नहीं करूंगा।' संजू ने उत्सुकता जताई, तो मन्ना ने अपनी जेब से बड़े जतन के साथ 'पर्क चॉकलेट का एक साबुत बार निकाला और सामने रख दिया।चॉकलेट का बार देखते ही संजू की बांछे खिल गईं, 'अरे ये तो प्रीति जिंटा वाली चॉकलेट है। ज्यादा चॉकलेट वाली एक्स्ट्रा लार्ज।'
मन्ना ने कहा- 'हां, ये ए.सी. फस्र्ट में मेरे को मिला।'
संजू ने कहा- 'चल, इसको आधा-आधा करके खा लेते हैं।'
मन्ना को यह बात अच्छी नहीं लगी, 'नहीं यार, मेरी छोटी बहन गुड्डी जब नायडू अंकल के यहां टी.वी. देखने जाती है तो लौटकर कहती है कि भइया, प्रीति जिंटा वाली चॉकलेट क्यों नहीं लाते? पापा भी कभी नहीं लाते। आज अचानक यह चॉकलेट मिली है, तो इसे मैं घर ले जाऊंगा। थोड़ी-सी खुद खाऊंगा और बाकी गुड्डी को दूंगा यार तू भी मेरे साथ चल। पहले गुड्डी को दिखाएंगे, फिर उसे खिलाएंगे बाद में हम दोनों भी थोड़ी-थोड़ी खा लेंगे।'
संजू तैश में आ गया, 'ऐसी बात है तो पहले सबके सामने सामान जमा करना होगा। तब तय होगा कि क्या किया जाए, और नहीं तो चुपचाप मुझे आधा दे और आधा तू अपने घर ले जा।'
मन्ना ने तड़पकर कहा- 'ठीक है, तू बता देगा तो बता दे! मैं भी बता दूंगा कि उस दिन सम्पूर्ण क्रांति एक्सप्रेस के ए.सी. में तुझे एक अंगूठी मिली थी जो तूने अपनी मां को दे दी थी। पिंटू उस्ताद को मैं भी यह बात बता दूंगा।'
इस धमकी का संजू पर तुरंत असर हुआ। उसका स्वर धीमा हो गया। उसने मनाने के स्वर में कहा- 'यार, तू मेरा अच्छा दोस्त है। मेरा मन कर रहा है चॉकलेट खाने का, चल आधे से थोड़ा कम दे दे।'
मन्ना ने चॉकलेट को पुन: अपनी जेब में रखते हुए कहा- 'नहीं यार, ये चॉकलेट मैं नहीं दूंगा। बोल तो रहा हूं घर चल, गुड्डी को चॉकलेट दिखाएंगे और आधा हिस्सा उसे देकर हम भी थोड़ी-थोड़ी खा लेंगे।'
लेकिन संजू का मन फिर भी नहीं मान रहा था। बार-बार उसे लग रहा था जैसे प्रीति जिंटा ने 'पर्क' की वह बड़ी चॉकलेट (एक्स्ट्रा लार्ज) मन्ना की जेब में छिपा दी है। उसके मुंह में चॉकलेटी स्वाद का पानी लबालब भरता जा रहा है...।
मन्ना ने भी टीवी पर प्रीति जिंटा को चॉकलेट के साथ देखा है। मगर चॉकलेट इतनी खूबसूरत दिखती है, इस बात का अहसास उसे आज हुआ। उसने बड़ी मुश्किल से अपने मन पर काबू किया और संजू को भी रोका। उसे रह-रहकर गुडिय़ा की याद आने लगी। महीनों से वह गाहे-बगाहे एक्स्ट्रा लार्ज चॉकलेट की बात करती रही है। उसने पहले से ही कह रखा था कि वह वही चॉकलेट इस बार राखी में लेगी, लेकिन संयोग बनता ही नहीं है। एक साबुत एक्स्ट्रा लार्ज चॉकलेट 15 रुपये में आता है। इतना तो दिन भर की कमाई से नहीं निकलता।
पिंटू उस्ताद कभी-कभी बड़ों की तरह बात करता है। वह कहता है... 'ये सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। टीवी में दिखा-दिखाकर ये हमारा पैसा छीन लेते हैं। साली अठन्नी वाली चॉकलेट में और इसमें फर्क ही क्या है? उसे परदे पर प्रीति जिंटा खाती है, इसे हम खाते हैं। इतना ही फर्क है न'
मन्ना को पिंटू की बात समझ में नहीं आती। उसे बस गुड्डी का चेहरा याद आ जाता है। इसीलिए वह इस पर्क के पैकेट को स्वयं भी चार-छह बार जेब से निकालकर देख चुका है। गुड्डी के चेहरे की खुशी की कल्पना मात्र से उसे सिहरन-सी होती है। तभी एक तेज सीटी की आवाज से दोनों चौक जाते हैं...
हावड़ा राजधानी के आने का संकेत हो चुका है। प्लेटफार्म पर चहल-पहल बढ़ गई है। संजू के मन-मस्तिष्क में अभी भी चॉकलेट बार का बड़ा साइज तैर रहा है, 'साले, मन्ना की ऐसी तैसी! आधा चॉकलेट दे ही देता तो क्या हो जाता? पाई हुई चीज पर भी इतना इतराना! पूरा का पूरा साबुत चॉकलेट-बार दुकानों और टीवी के बाहर इतने करीब से पहली बार उसने देखा था। काश आधा हिस्सा मिल जाता तो...'
वे दोनों प्लेटफार्म के उल्टे हिस्से में दौड़ पड़े थे। शायद राजधानी में कोई बेहतर खाने का सामान हाथ लग जाए?
अचानक एक चीख सुनकर संजू के सोचने का क्रम टूट गया। लूप लाइन को उसने पार ही किया था कि उसकी नजर सामने जा पड़ी। पता नहीं कैसे मन्ना दो नम्बर प्लेटफार्म से खाली रैक वाली एक गाड़ी के नीचे आ गया था। पूरे डिब्बे उसकी देह पर से गुजर गये थे। ड्राइवर ने जब तक ट्रेन रोकी, तब तक किसी का ध्यान मन्ना की ओर नहीं गया। संजू कुछ देर के लिए सन्न रह गया था...।
दोनों लाइनों के बीच मन्ना का आधा शरीर कटकर अलग हो गया था। कमर के नीचे का हिस्सा बाहर की ओर पड़ा था। हाफपैंट का ऊपरी हिस्सा खून से भींग गया था।
अचानक संजू को जैसे कुछ याद हो आया। वह तेजी से मन्ना के कटे हुए जिस्म की ओर दौड़ा। कोई और वहां पहुंच पाता, इसके पहले संजू लाश के पास पहुंच गया। हड़बड़ी में मन्ना के चेहरे की ओर भी देखने की फुरसत नहीं थी उसे। उसने अन्दाज से मन्ना के हाफपैंट की उसी जेब में हाथ डाला जिसमें चॉकलेट बार रखी थी। एक झटके से उसने खींचकर चॉकलेट निकाली और सरपट प्लेटफार्म की ओर दौड़ गया...।

Jan 20, 2009

आलेखः विकास की धमक और चावल की महक

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के परिणाम जनता के सोच के अनुरूप ही रहा। मतदाताओं ने अपने मन की टोह लेने की अनुमति किसी को नहीं दी।
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चुनाव घोषणा के पहले से ही कांग्रेस ने यदि तीन रुपए किलो चाव की योजना को चुनावी स्टंट कहना प्रारंभ कर दिया था तो भाजपा के लिए यह निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा रहा।


-परितोष चक्रवर्ती
छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विषय में यह बात फै चुकी है कि वे सहज, सर एवं बेदाग हैं। उनके पिछेल पांच वर्ष के कार्यकाल में उनके सहयोगी मंत्रियों के नाम पर कुछ आरोप-प्रत्यारोप गे जरुर लकिन मतदाताओं ने इस पर नोटिस नहीं मिला । खतरा यह है कि इस बार के मंत्रिमंडल में शामिल सहयोगी यदि यह मानकर चले कि जिस तरह चुनाव के समय जनता ने अन्य मंत्रियों पर लगे आरोपों का नोटिस नहीं मिला था, इस बार भी नहीं लेगें। तो ऐसे मुगाते वे न ही पालें तो अच्छा।



मुख्यमंत्री ने चुनाव के नतीजे आते ही अपने वक्तव्य में एक महत्वपूर्ण बात कही है- 'कोटवार से लेकर मुख्यमंत्री तक जवाबदेही तय की जाएगी।' संभवत: डॉ. रमन सिंह को इस वक्तव्य की पृष्ठभूमि में उपस्थित चुनौतियों का आभास अवश्य होगा। यदि इसके अनुपान में कड़ाई बरती जावेगी तो जो मंजर सामने आने लगेंगे उनका समायोजन बेहद कठिन कार्य होगा। पिछले मंत्रिमंडल में जब उन्होंने पहली बार फेरबद किया था तब की परिस्थितियों को वे भूले नहीं होंगे। ग्राम सुराज अभियान के समय जितने आवेदन पत्र इकट्ठे होते थे उन सभी पर नौकरशाहों द्वारा कार्यवाही नहीं होती थी इसकी जानकारी मिने के बाद दूसरे दौर में उन्होंने विकास यात्रा की योजना बनाकर, अधिकारियों को एक तरह से बाध्य किया जाना ने भी उनके अनुभवों को और पुख्ता किया। लेकिन विरासत में इस नई सरकार में भी उन्हें वे ही अधिकारी मिले हैं और उन्हीं कंधें पर जवाबदेही को टिकाना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।
सारे कयासों को एक तरफ रखकर छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के परिणाम जनता की सोच के अनुरूप ही रहा। छत्तीसगढ़ में मीडिया एवं छत्तीसगढ़ के चुनाव समीक्षकों के लिए इस बार के चुनाव परिणामों को लेकर एक धुंधलका सा भी बना हुआ था। लेकिन प्रदेश के मतदाताओं ने अपेक्षित एवं परिपक्व व्यवहार किया। चुनाव से पहले मतदाताओं ने अपने मन की टोह लेने की अनुमति किसी को नहीं दी। किंतु पहले चरण के मतदान के बाद अचानक कांग्रेसी खेमे के उत्साह में बहुत वृद्धि हो गई। छत्तीसगढ़ में ही नहीं मध्यप्रदेश और दिल्ली तक के कांग्रेस हितैषी चेहरों पर एक सुकून तैरने गा था। कुछ ऐसे समीक्षक भी थे जो पहले चरण के मतदान के पहले तक भाजपा के जीतने की भविष्यवाणी कर रहे थे बाद में उन्होंने भी अपने को सिकोड़ लिया . अंतिम चरण के मतदान के संपन्न होने के बाद के अट्ठारह दिन दोनों तरफ के राजनीतिज्ञों के रात-दिन काफी तनाव में गुजरे। अंतत: जो परिणाम आए उसे देखते हुए साफ तौर पर कहा जा सकता है कि एकीकृत मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ के मतदाता अब पूर्णत: जागृत मतदाता की श्रेणी में आकर अपने स्वयं के मुद्दे तय करने की स्थिति में आ गए हैं।
चुनाव घोषणा के पहले अलग से ही कांग्रेस ने यदि तीन रुपए किलो चावल की योजना को चुनावी स्टंट कहना प्रारंभ कर दिया था तो भाजपा के लिए यह निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा रहा। कांग्रेस की यह आलोचना गांव के लोगों तक को सुनाई दी और उन्हें ऐसा गा जैसे सस्ते में गरीबों को चाव मिना कांग्रेस को रास नहीं आ रहा है। कुछ लोग उल्टे गांव वालों के परिश्रम पर सवाल उठाने लगे कि इस सस्ते चावल के चलते मजदूर काम करने शहर नहीं आ रहे हैं। इस बात ने भी ग्रामीणों को तकलीफ पहुंचाई। भाजपा ने भी इसे एक हर के रूप में स्वीकार कर लिया, यहां तक कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को चाउंर वो बबा का संबोधन चाहे किसी ने दिया या न दिया हो लेकिन भाजपा ने इसे बहुत सहजता से चुनाव प्रचार में उपयोग किया। उधर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को हथियार की तरह उपयोग के लिए कमर कस ली थी। लेकिन भ्रष्टाचार को प्रमाणित करने के लिए जो धार चाहिए थी उनके हथियारों में नदारत रही। मतदाताओं को संभवत: पूर्व मुख्यमंत्री जोगी के द्वारा भ्रष्टाचार का विरोध करना उतना रास नहीं आया, किंतु दूसरी ओर भ्रष्टाचार की अति जहां और जिससे हुई वहां मतदाताओं ने संबंधित प्रत्याशी को अवश्य ही उसकी सजा दी। मुद्दों को तय करते वक्त कांग्रेस से एक गलती अवश्य हुई है, एक तरह उन्होंने तीन रूपए चावल की योजना का वादा जोडक़र भाजपा के ही मुद्दे को मजबूत कर दिया।
शहरी मतदाताओं को, इलेक्ट्रानिक चैन में जोगी की बॉडी लेग्वैंज और उनका यह कहना कि हां वे तानाशाह है, (5 प्रतिशत भ्रष्टाचार एवं जमाखोरी करने वो के लिए) संभवत: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी बड़े नेता द्वारा पहली बार अपने को खुलेआम तानाशाह घोषित किया गया। प्रबुद्ध लोगों का कहना यह था कि कैसे कोई बड़ी पार्टी का बड़ा नेता अपने को जाहिर तौर पर तानाशाह कह सकता है? जमाखोर एवं भ्रष्टाचारी कोई सर्टिफिकेट धारी नहीं होते अत: उस 5 प्रतिशत के बहाने जोगी किसी निरीह व्यक्ति के लिए तानाशाह नहीं होंगे इसकी क्या गारंटी है? इस कथन ने व्यापारियों के एक बड़े वर्ग को नाराज किया। दूसरी तरफ जहां-जहां भी जोगी के मुखा-मुखी डॉ. रमन सिंह हुए वहां-वहां डॉ. रमन की सादगी, शालीनता और संतुलन ने जनता को प्रभावित किया।

भाजपा अपनी पुरानी ताकत को दोहराने जा रही है यह कयास भी स्पष्टत: लोग नहीं गा पा रहे थे इसके पीछे निश्चित रूप से मतदाताओं की चुप्पी, कारक थी। इसके इतर मतदान का अधिक प्रतिशत पारंपरिक विश्लेषणों को यह आभास दे रहा था कि यह मतदान प्रतिशत संभवत: व्यवस्था विरोधी मत ही है, जो कांग्रेस के खेमे में गए। परिणाम आने के बाद मतदाताओं से बातचीत होने पर अधिक मतदान का जो खुलासा हुआ वह यह है कि वर्षो बाद पही बार एटीएम कार्ड की तरह खूबसूरत मतपत्र मिले थे जिसे उपयोग में लाने का उत्साह बड़े पैमाने पर मतदान का कारक बने। सभी राजनैतिक दों ने इस बार ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को बूथ तक लाने की मेहनत भी की थी। सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ की आम जनता में राजनैतिक चेतना का विकास भी अपेक्षित स्तर पर हुआ। इस क्रम का जारी रहना ही लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण है।
इस बार बसपा ने जितने जोर शोर से अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे उसकी तुना में उनकी प्राप्ति न के बराबर रही, केव दो सीटों में ही वे सिमट के रह गए। इसके कारणों की व्याख्या में लोग बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में बसपा का जनाधार अकेले अपने बूते पर अभी भी नहीं बन पाया है, यह किसी दूसरी बड़ी पार्टी के साथ जुडऩे पर ही अपनी सीट बढ़ा पाएगी। छत्तीसगढ़ बसपा में बड़े कद के नेता का अभाव भी एक दूसरा कारण है। इसी क्रम में एनसीपी इस बार कांग्रेस के साथ मिकर तीन सीट में चुनाव डऩे के बाद भी एक भी सीट नहीं निका पाई। इससे साफ हो गया कि एनसीपी का वजूद भी छत्तीसगढ़ में न के बराबर है। इसी तरह स्वतंत्र प्रत्याशियों को जनता ने तवज्जों नहीं दी। स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में दोनों ही बड़ी पार्टियों के बागियों ने बढ़-चढक़र हिस्सा लिया। न ही वे परिणाम को प्रभावित कर पाए न ही जीत पाए।

दोनों ही बड़ी पार्टियों ने विज्ञापन तंत्र के जरिए मीडिया में समान रूप से जगह बनाई किंतु विज्ञापन भी समाचार की तर्ज पर छपे होने के कारण पाठकों को धुंधके से बाहर नहीं ला पाए अर्थात स्थानीय अखबारों को पढक़र कोई भी पाठक परिणामों के विषय में पूर्वानुमान नहीं लगा पा रहा था।
ग्रामीण मतदाताओं को इलेक्ट्रानिक चैनल से कोई भी वास्ता नहीं रहा। वे अपने आसपास खेती-किसानी से लेकर सडक़, बिजली, पानी की सुविधा और धान के समर्थन मूल्य के मुद्दों पर भाजपा से काफी कुछ आश्वस्त थे। वे पिछे पांच वर्ष से कांग्रेस एवं दिगर पार्टियों से उनकी वांछित भूमिका की भी बाट जोह रहे थे, मगर देख समझ रहे थे कि कांग्रेस में आपसी खींचतान की ड़ाई टिकट वितरण तक जारी रही। एक ही पार्टी के तीन अध्यक्ष हो गए, एक के साथ दो कार्यकारी, बोनस में महेन्द्र कर्मा के तेवर एकदम अग थे। वी.सी. शुक्ल बिना पद पासंग की तरह समायोजन के लिए रखे जरूर गए थे लेकिन वे भी प्रभावी नहीं रहे। ऐन चुनाव के वक्त भ्रष्टाचार का आरोप, जो विधानसभा के पट पर कमजोर प्रमाणों के चलते दम तोड़ चुका हो जनता को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया। यहां पर एक बात अवश्य विचारणीय है कि नए छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में बिताए अपने तीन सा में जोगी अपनी टीम में सभी सकारात्मक एवं नकारात्मक बातों के लिए जिम्मेदार रहे किंतु बाद के पांच वर्ष के भाजपाई शासन में अकेले मुख्यमंत्री पूरे पार्टी की ओर से बेहतर छवि का निर्वाह कर रहे थे, भे ही पार्टी के कुछ सदस्यों पर दाग-धब्बों के आरोप लगे। दोनों ही मुख्यमंत्री की छवि में इस मूलभूत अंतर को भी आंका गया।
व्यवस्था विरोध की हर बिल्कुल नहीं चली । न ही सलवा जुडुम का मुद्दा भाजपा के खिलफ गया। इसके उलट सरगुजा और बस्तर में जो कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र हैं ने मतों के जरिए भाजपा को पूर्ण समर्थन दिया। बस्तर में कवासी लखमा की सीट पर विवाद का साया अभी भी हटा नहीं। ऐसी परिस्थिति में यदि मतदाताओं के बहुमत को आधार बनाया जाए तो सलवा जुडुम जो आदिवासियों का स्वत:स्फूर्त आंदोलन था उसे तमाम वाममार्गीय कोशिशों के बावजूद व्यापक सहमति मिली ।

अब यहां पर प्रश्न यह उठ सकता है कि महेन्द्र कर्मा को बलि क्यों देनी पड़ी? राजनीतिक समीकरण बताते हैं कि कभी-कभी सच्चाई का साथ देने की कीमत किसी न किसी को चुकानी पड़ती है। भे ही अकेले महेन्द्र कर्मा सलवा जुडुम के साथ थे किंतु उनकी पार्टी, कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से सलवा जुडुम का समर्थन नहीं किया। जोगी एक कांग्रेसी लीडर की हैसियत से सलवा जुडुम का खुलकर विरोध कर रहे थे। यही नहीं इस चुनाव ने जोगी की आदिवासी मुख्यमंत्री वाली कुटनीतिक मांग को भी ध्वस्त किया। यह बात जाहिरी तौर पर स्पष्ट है कि सलवा जुडुम के मसले में नक्सल गतिविधियों के चलते बेघर हुए लोगों के लिए शिविर की व्यवस्था किसी भी सरकार को करनी ही पड़ती। यदि आज ये शिविर बंद कर दिए जाएं और फिर से आदिवासी नक्सली हमलें के शिकार हों तो फिर विपक्ष में चाहे कोई भी हो, वह मानवीय संवदेना का मुद्दा उठायेगा।
भाजपा को अपनी सोशल इंजीनियरिंग एवं गांव-गांव तक विकास की धमक पहुंचाने की ललक और निश्चित रूप से चावल की महक ने अपनी पारी दोहराने का अवसर प्रदान किया। इन तमाम उपब्धियों के साथ डॉ. रमन सिंह की छवि ने भ्रष्टाचार के आरोपों को भी निरूत्साहित करने में सफलता पाई।

इन परिस्थितियों के विश्लेषण करने पर पता चलता है कि छत्तीसगढ़ के चुनाव समीकरण में अभी भी भाजपा और कांग्रेस ही दो प्रमुख प्रतिद्वंदी है और अब जनहित के छोटे-छोटे मुद्दे ही भविष्य के चुनाव में जीत हार के प्रमुख कारक साबित होंगे।
अविभाजित मध्यप्रदेश में जो कुछ भी छत्तीसगढ़ के हाथ लगा था वह मध्यप्रदेश के उतरन जैसा था। लेकिन पिछले पांच वर्ष में ढांचागत विकास के नाम पर सडक़, बिजली एवं पानी को छोड़ दें तो बड़े उद्योगों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठे। अभी भी छत्तीसगढ़ में बड़े उद्योगों के खाते में सिर्फ दो नाम हैं बाल्को एवं जिंदल। जबकि बड़े उद्योगों से जुड़ती हैं रोजगार की संभावनाएं। रोजगार के क्षेत्र में भी नई सरकार से ढेर सी अपेक्षाएं हैं। आईटी उद्योग पर सरकार की नजर अभी भी स्पष्ट नहीं है। जबकि छत्तीसगढ़ में आईटी आधारित उद्योग की संभावना बहुत हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी अपेक्षित ऊंचाई तक आना अभी शेष है।

आज के युग में कोई भी मनुष्य चाहे कितनी भी ऊंची कुर्सी पर बैठा हो उसे अगर अपनी छवि की चिंता है तो अपनी छवि बचाने की कीमत हर व्यक्ति को चुकानी पड़ती है यह कीमत किस स्वरूप में हो यह समय तय करता है व्यक्ति नहीं। इन परिस्थितियों में अपनी छवि को डॉ. रमन सिंह कितनी कुशलता से बनाए रखते हैं, यह आगामी पांच सालों में छत्तीसगढ़ भाजपा सरकार की नियति को भी तय करेगा।