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Aug 18, 2018

टैग टीवी में हाइकु पर परिचर्चा

टैग टीवी में हाइकु पर परिचर्चा
कनाडा(टोरंटो) के टैग टी वी (TAG  T.V.) पर हाल ही में एक नया कार्यक्रम 'साहित्य के रंग शैलजा के संग आरंभ हुआ है, जो विभिन्न भाषाओं के साहित्य की विभिन्न विधाओं पर केन्द्रित होगी। शृंखला की पहली कड़ी में हाइकु के उद्भव और विकास पर भारत के श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु  से लम्बी बातचीत हुई। चर्चा में श्रीमती कृष्णा वर्मा और श्रीमती भुवनेश्वरी पांडे ने भी भाग लिया। डॉ. शैलजा सक्सेना द्वारा आयोजित इस परिचर्चा के यू ट्यूब का लिंक https://youtu.be/1QA0I2KCG0Y यहाँ दिया जा रहा है। कार्यक्रम में पढ़े गए कुछ हाइकु भी आपके अवलोकन के लिए यहाँ दे रहे हैं -
1- डॉ. भगवत शरण अग्रवाल
1. तुम्हारे बिना /दीवारें हैं, छत है/घर कहाँ है ?
2. वर्षा की रात /बतियाते मेंढक /चाय पकौड़ी।
2- डॉ. सुधा गुप्ता
1. लुक-छिपके/चारदीवारी फाँद/आ कूदा चाँद।
2. लाल गुलाल/पूरी देह पे लगा/हँसे पलाश।
3. नाज़ुक कली/आग की लपटों में/धोखे से जली।
3- डॉ. भावना कुँअर
1- लेटी थी धूप/सागर तट पर/प्यास बुझाने।
2- परदेस में/जब होली मनाई/तू याद आई।
4 – डॉ. हरदीप कौर संधु
1. पत्र जो मिला/लगा  बहुत पास/दूर का गाँव
2. भूल न पाया/जब-जब साँस ली/तू याद आया।
5- कमला निखुर्पा
1. आई हिचकी/अभी-अभी भाई ने/ज्यों चोटी खींची।
6- रचना श्रीवास्तव
1.बेटे का कोट/रोज़ धूप दिखाती/प्रतीक्षा में माँ।
2.आँसू से लिखी/वो चिट्ठी जब खोली/भीगी हथेली।
7- डॉ. जेन्नी शबनम
1. प्रेम बंधन/न रस्सी न साँकल/पर अटूट।
2-प्रीत रुलाए/मन को भरमाए/पर टूटे न।
8- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1. रजनी बाला/कहाँ खोया है बाला/हँसिया वाला।
2. पत्ता जो गिरा /मुस्कुराकर कहे/फिर आऊँगा।
 9- डॉ कुँवर दिनेश सिंह
1. मेघों का नाद/हृदय को बींधती /प्रिय की याद।
2. मन अधीर/दर-दर भटके /मौन समीर।
10- डॉ. कविता भट्ट
1. जब भी रोया/विकल मन मेरा/तुमको पाया।
2. तुम प्रणव/मैं श्वासों की लय हूँ/तुम्हें ही जपूँ।
3. पाहन हूँ मैं/तुम हीरा कहते/प्रेम तुम्हारा।
11- भावना सक्सेना
1. झील-दर्पन/देख रही घटाएँ/केश फैलाएँ।
12- अनिता ललित
1. माँ सिसकती/आँगन हुड़कता/हो बेटी विदा।
2. माँ तेरे आँसू/तूफानों में हैं सोते/ख़ुशी में 'सोते'
13- ज्योत्स्ना प्रदीप
1. सहेजे मैने /तेरे दिये वह काँटे /कभी ना बाँटे।
2. जीवन बीता/वह कभी बनी राधा/तो कभी सीता।
14- प्रियंका गुप्ता
1. प्रेम की नदी/सामने ही थी बही/प्यासी ही रही।
2. प्रेम की नदी/पार किया तो जाना/आग से भरी।
15- शशि पाधा
1. अक्षर झरे/कल्पना -सरसि से/गागर भरे|
16- सुदर्शन रत्नाकर
 1. सर्दी की रात/लोग सोएँ भीतर/चाँद अकेला।
 2. ज़रा सुनो तो/कराहते पर्वत/कटे हैं वन।
17- शैलजा सक्सेना
1- दिन कमान/धूप जलता तीर/ज़ख्मी शरीर!
2- सज्जित घर/खनकते न स्वर/बच्चे लापता!
18- कृष्णा वर्मा
नदी जल में/नहा के हवाएँ दें/सूर्य को अर्घ्य।

May 15, 2018

ट्विटर पर झूठी खबरें ज्य़ादा तेज़ चलती हैं

ट्विटर पर झूठी खबरें 
ज्य़ादा तेज़ चलती हैं
वर्ष 2006 से 2017 के बीच ट्विटर पर 30 लाख लोगों के पोस्ट के विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि यहाँ  झूठी खबरों की रफ्तार कहीं ज़्यादा तेज़ होती है।
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी की मीडिया लैब के सोरोश वोसोगी और उनके साथियों ने ट्विटर पर 1 लाख 26 हज़ार स्टोरीज़ को देखा। किसी ट्वीट को स्टोरी तब माना गया जब उसमें कोई दावा किया जाए। अर्थात् यह ज़रूरी नहीं कि ऐसा ट्वीट किसी समाचार संगठन की किसी स्टोरी से जुड़ा हो। इन दावों की तथ्यात्मक जांच छह  स्वतंत्र संगठनों द्वारा की गई। इनमें स्नोप्स, पोलिटीफैक्ट और फैक्टचेक शामिल हैं। और इस सबके बाद जो पता चला वह डरावना था। सूचना की हर श्रेणी में मिथ्या खबरें ज़्यादा दूर तक, ज़्यादा तेज़ी से आगे बढ़ती हैं बनिस्बत सच्ची खबरों के। और इनकी रफ्तार में अंतर कई गुना है।
ट्विटर पर सच्ची खबरों को 1500 लोगों तक पहुंचने में झूठी खबरों के मुकाबले 6 गुना ज़्यादा समय लगता है। कारण यह है कि झूठ को रीट्वीट किए जाने की संभावना 70 प्रतिशत ज़्यादा होती है। यह फर्क तब भी रहता है जब आप किसी अकाउंट की आयु, सक्रियता के स्तर और फॉलोअर्स की संख्या को अलग करके देखें। सबसे ज़्यादा वायरल झूठे पोस्ट राजनैतिक किस्म के थे।
आम तौर पर धारणा यह है कि कई संगठन रोबोटों को इस काम में लगा देते हैं। वे पोस्ट को रीट्वीट करते रहते हैं और इस प्रकार से झूठी खबरें फैलती हैं। लेकिन उपर्युक्त अध्ययन से यह भी पता चला कि झूठी खबरों को फैलाने में ऐसे स्व-चालित अकाउंट्स नहीं बल्कि वास्तविक लोगों की भूमिका थी। इस बात का पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने उन पोस्ट को छोड़ दिया था जिन्हें स्वचालित अकाउंट से भेजा गया था। इन पोस्ट का अलग से विश्लेषण करने पर पता चला कि रोबोट अकाउंट खबरों को फैलाने में भूमिका अवश्य निभाते हैं, किंतु वे झूठी और सच्ची खबरों के बीच भेद नहीं करते। 
साइंस  में प्रकाशित इन निष्कर्षों पर बैंगर विश्वविद्यालय के वायन बकीर कहते हैं कि लोग झूठी खबरों को कई कारणों से साझा करते हैं। इनसें सबसे बड़ा कारण है अचरज और आक्रोश का मिला-जुला एहसास। (स्रोत फीचर्स)

May 30, 2012

क्यों जन-विरोधी है हमारा मीडिया?

-जस्टिस मार्कंडेय काटजू

सभी देशप्रेमियों का, मीडिया सहित, यह फर्ज है कि वे इस संक्रमण से कम से कम पीड़ा और तत्काल उबारने में हमारे समाज की मदद करें। इस संक्रमण काल में मीडिया को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होती है क्योंकि इसका ताल्लुक विचारों से होता है, सिर्फ वस्तुओं से नहीं। अत: अपने मूल स्वभाव में मीडिया किसी अन्य साधारण व्यवसाय की तरह नहीं हो सकता।
भारत में मीडिया जो भूमिकाएँ निभा रहा है, उसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ऐतिहासिक संदर्भों को समझना होगा। वर्तमान भारत अपने इतिहास में एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है-  एक सामंती खेतिहर समाज से आधुनिक औद्योगिक समाज की ओर का संक्रमण।
यह एक बहुत पीड़ादायक और व्यथित कर देने वाला दौर है। पुराने सामंती समाज की चूलें हिल रही हैं और कुछ तब्दीलियां हो रही हैं, लेकिन नया, आधुनिक, औद्योगिक समाज अभी तक संपूर्ण ढंग से स्थापित नहीं हुआ है। पुराने मूल्य की किरचें बिखर रही हैं, सारी चीजें उबाल पर हैं। शेक्सपियर के मैकबेथ को याद करें, 'रौशन चीजें धूल धूसरित है और धूल धूसरित रौशन है'। जिन्हें पहले अच्छा माना जाता था, मिसाल के लिए जाति व्यवस्था, वह आज बुरी है (कम से कम समाज के जागरूक तबके में) और जिन्हें पहले बुरा माना जाता था, जैसे प्रेम के जरिए/ लिए शादी, वे आज स्वीकार्य हैं (कम से कम आधुनिक मानस में)।
सभी देशप्रेमियों का, मीडिया सहित, यह फर्ज है कि वे इस संक्रमण से कम से कम पीड़ा और तत्काल उबारने में हमारे समाज की मदद करें। इस संक्रमण काल में मीडिया को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होती है क्योंकि इसका ताल्लुक विचारों से होता है, सिर्फ वस्तुओं से नहीं। अत: अपने मूल स्वभाव में मीडिया किसी अन्य साधारण व्यवसाय की तरह नहीं हो सकता।
ऐतिहासिक तौर पर, प्रिंट मीडिया का उद्भव यूरोप में सामंती शोषण के खिलाफ जनता के एक सक्रिय हस्तक्षेप के बतौर हुआ। उस वक्त सत्ता के सभी स्थापित उपकरण दमनकारी सामंती अधिकारियों के हाथों में थे। अत: लोगों को एक नए माध्यम की जरूरत थी, जो उनका प्रतिनिधित्व कर सके। इसीलिए प्रिंट मीडिया को 'चौथे स्तंभ' की तरह जाना जाने लगा। यूरोप और अमरीका में यह भविष्य की आवाज का प्रतिनिधित्व करता था, जो स्थापित सामंती अंगों- अवशेषों, जो कि यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे, के विपरीत था।  इसीलिए मीडिया ने सामंती यूरोप को, आधुनिक यूरोप में परिवर्तित करने में एक अहम भूमिका अदा की है।
मेरे ख्याल से भारत की मीडिया को एक वैसी ही प्रगतिशील भूमिका का निर्वहन करना चाहिए, जैसी कि यूरोप की मीडिया ने उसके संक्रमण काल में निभाया था। ऐसा वह पुरातन, सामंती विचारों और व्यवहारों- जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंध- मान्यताओं पर आक्रमण करते हुए और आधुनिक वैज्ञानिक और तार्किक विचारों को प्रोत्साहित करते हुए कर सकता है। लेकिन क्या हमारा मीडिया ऐसा कर रहा है?
मेरी राय में, भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनता के हितों को पूरा नहीं करता। वास्तव में इनमें से कुछ यकीनन सकारात्मक तौर पर जन विरोधी हैं। भारतीय मीडिया में तीन प्रमुख दोष हैं, जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूँ-
पहला, मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से  अवास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है।
वास्तविक मुद्दे भारत में सामाजिक- आर्थिक हैं, भयंकरतम गरीबी जिसमें हमारे 80 फीसदी लोग जीते हैं, कठोरतम महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा जरूरतों की कमी और पुरातन- पंथी सामाजिक प्रथाएँ जैसे 'ऑनर किलिंग', जातीय उत्पीडऩ, धार्मिक कट्टरताएँ आदि। अपने कवरेज का अधिकांश हिस्सा इन मुद्दों को देने के बजाय, मीडिया अवास्तविक मुद्दों को केंद्रित करता है- जैसे फिल्मी हस्तियाँ और उनकी जीवनशैली, फैशन परेड, पॉप संगीत, डिस्को डांस, ग्रह-  नक्षत्र शास्त्र, क्रिकेट, रियलिटी शो और अन्य कई मुद्दे।
इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि मीडिया लोगों को मनोरंजन मुहैया कराता है, लेकिन इसे अतिरेक में नहीं परोसा जाना चाहिए। इसके 90 फीसदी कवरेज अगर मनोरंजन से संबंधित हैं और महज 10 फीसदी ही ऊपर उल्लेखित वास्तविक मुद्दों के हैं तब तो कुछ ऐसा है, जो गंभीर रूप से गड़बड़ है। इसके अनुपात की समझदारी उन्मादी हो चली है। स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, कृषि और पर्यावरण सबको मिलाकर मनोरंजन को नौ गुना ज्यादा कवरेज मिलता है।  क्या एक भूखे या बेरोजगार व्यक्ति को मनोरंजन चाहिए या भोजन और रोजगार?
उदाहरण के लिए, हाल ही में मैंने टेलीविजन शुरू किया, और मैंने क्या देखा? कि मैडम गागा भारत आई हैं, करीना कपूर मदाम तुसॉद्स में अपनी मोम की मूर्ति के पास खड़ी हैं, एक व्यापारिक घराने को एक पर्यटक सम्मान दिया जा रहा है, फॉर्मूला वन रेसिंग आदि इत्यादि। इन सारी बातों का जनता की समस्याओं से क्या लेना देना है?
कई चैनल दिन भर और दिन के बाद भी क्रिकेट दिखाते रहते हैं। रोमन शासक कहा करते थे- 'अगर आप लोगों को रोटियाँ नहीं दे सकते तो उन्हें सर्कस दिखाइए।' लगभग यही नजरिया भारतीय सत्ता- स्थापनाओं का भी है, जिसे दोहरे तौर पर हमारा मीडिया भी सहयोग देता है। लोगों को क्रिकेट में व्यस्त रखो, ताकि वे अपनी सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा को भूल जाएँ। गरीबी और बेरोजगारी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो महत्वपूर्ण है वह ये कि भारत ने न्यूजीलैंड को हराया या पाकिस्तान हो तो और भी बेहतर, या तेंदुलकर या युवराज ने शतक मारा।
हाल ही में, द हिंदू ने प्रकाशित किया कि पिछले 15 सालों में ढ़ाई लाख किसानों ने आत्महत्या की है। लक्मे फैशन सप्ताह 512 मान्यता प्राप्त पत्रकारों द्वारा कवर किया गया। उस फैशन सप्ताह में, महिलाएँ सूती कपड़ों का प्रदर्शन कर रही थीं, जबकि कपास उगाने वाले पुरुष और महिलाएँ नागपुर तक की एक घंटे की हवाई दूरी पर आत्महत्या कर रहे थे। एक या दो स्थानीय पत्रकारों को छोड़, किसी ने इस कहानी को नहीं बताया।
यूरोप में, विस्थापित किसानों को औद्योगिक क्रांति द्वारा स्थापित कारखानों में रोजगार मिल गए थे। दूसरी ओर भारत में औद्योगिक रोजगार अब मुश्किल से मिलते हैं। कई कारखाने बंद हो गये हैं और अब 'रियल स्टेट' में तब्दील हो गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र में पिछले पंद्रह सालों में रोजगार में तीव्र गिरावट देखी गई है। मिसाल के लिए, टिस्को ने 1991 में 85,000 श्रमिक नियुक्त किए थे, जो तब 10 लाख टन स्टील का उत्पादन करते थे। 2005 में, इसने 50 लाख (5 मिलियन) टन स्टील का उत्पादन किया लेकिन यह सिर्फ 44,000 श्रमिकों के द्वारा किया गया। 90 के दशक के मध्य में बजाज 10 लाख दो पहिया वाहनों का उत्पादन करता था, जिसमें 24,000 श्रमिक कार्यरत थे। 2004 तक यह 10,500 श्रमिकों के साथ 24 लाख (2.4 मिलियन) वाहनों का उत्पादन कर रहा था।
तब ये लाखों विस्थापित किसान कहाँ गए? वे शहर जाते हैं, जहाँ वे घरेलू नौकर, सड़कों के किनारे ठेले- खोमचे वाले या यहाँ तक कि अपराधी भी बन जाते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि झारखंड की एक से दो लाख कम उम्र की लड़कियाँ दिल्ली में घरेलू नौकरानी का काम कर रही हैं। क्रूरतम गरीबी के चलते सभी शहरों में शारीरिक धंधे भयानक हैं।
ये सभी चीजे हमारे मीडिया द्वारा नजरअंदाज की जाती हैं, जो हमारे अस्सी फीसदी लोगों की कठोर आर्थिक वास्तविकताओं के प्रति नेल्सन की आँख जैसे नजर फेरे हुए है, और बदले में कुछ चमकते दमकते पोतेमकिन गाँवों की ओर सारा ध्यान गड़ाए हुए है।
दूसरा, मीडिया अक्सर ही लोगों को विभाजित करता है। जब कभी भारत में कहीं भी कोई बम विस्फोट होता है, कुछेक घंटों के भीतर ही टीवी चैनल कहना शुरू कर देते हैं कि इंडियन मुजाहिदीन या जैश-ए-मोहम्मद या हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लाम ने जिम्मेदारी कबूल करते हुए उन्हें एक ई-मेल या एसएमएस मिला है। यह नाम हमेशा ही एक मुस्लिम नाम होता है। अब ये ई-मेल या एसएमएस कोई भी ऐसे बुरे इरादों वाला आदमी भेज सकता है, जिसका मकसद सांप्रदायिक नफरत फैलाना हो। उन्हें टीवी स्क्रीन पर और अगले ही दिन प्रिंट मीडिया में क्यों दिखाया जाना चाहिए? इसके दिखाने का सीधा संदेश यह देना होता है कि सभी मुसलमान आतंकी हैं या बम- बाज हैं।
आज भारत में रहने वाले तकरीबन 92 से 93 फीसदी लोग विभिन्न तरह के विस्थापित जड़ों से ताल्लुक रखते हैं। अत: भारत में एक जबर्दस्त विविधता है- कई धर्म, जातियाँ, भाषाएँ, नृजातीय समूह। यह बेहद जरूरी है कि अगर हम लोगों को एकजुट और समृद्ध रखना चाहते हैं तो सारे समुदायों के प्रति सहिष्णुता और समानता हो। जो भी हमारे लोगों के बीच विभाजन के बीज बोता है, चाहे यह धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीयता किसी के भी आधार पर हो, वह वास्तव में हमारी जनता का दुश्मन है।
अत: ऐसे ई- मेल या एसएमएस को भेजने वाले भारत के दुश्मन हैं, जो हमारे बीच में धार्मिक आधार पर तनाव के जहरीले बीज बोना चाहते हैं। तो फिर मीडिया, चाहे या अनचाहे तरीके से, इस राष्ट्रीय अपराध का सहभागी क्यों बन जाता है?
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि इस संक्रमण काल में हमारी जनता को आधुनिक, वैज्ञानिक युग की ओर अग्रसर करने में मीडिया को सहायक की भूमिका अदा करनी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए मीडिया को तार्किकऔर वैज्ञानिक विचारों का प्रचार- प्रसार करना चाहिए, लेकिन ऐसा करने के बजाय हमारी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न तरह के अंध- विश्वासों को परोसता रहता है।
यह सच्चाई है कि बहुतायत भारतीयों का बौद्धिक स्तर बहुत कम है- वे जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंध- विश्वासों में जकड़े हुए हैं। हालांकि सवाल यह है- तार्किक और वैज्ञानिक विचारों के प्रचार- प्रसार के जरिए मीडिया को हमारे लोगों के बौद्धिक स्तर को उन्नत करना चाहिए, या इसे कमजर्फ स्तरों पर लुढ़कते हुए इसे कायम रखना चाहिए?
यूरोप में, पुनर्जागरण के युग में, मीडिया, जो कि उस वक्त सिर्फ प्रिंट मीडिया ही था, ने लोगों के मानसिक स्तरों में इजाफा किया, उसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तथा तार्किक चिंतन का प्रचार प्रसार करते हुए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाए। वॉल्तेयर ने अंधविश्वास पर आक्रमण किए और डिकेंस ने जेल, स्कूलों, अनाथालयों, अदालतों आदि की भयानक दशाओं की आलोचनाएं की। हमारी मीडिया को भी क्या यही सब नहीं करना चाहिए?
एक समय में राजा राम मोहन रॉय जैसे साहसी लोगों ने अपने अखबारों मिरातुल अखबार और संबाद कौमुदी में सतीप्रथा, बालविवाह और पर्दाप्रथा के खिलाफ आलेख लिखे। निखिल चक्रवर्ती ने 1943 के बंगाल अकाल की भयावहता के बारे में लिखा। प्रेमचंद और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने सामंती रिवाजों और महिलाओं के उत्पीडऩ के बारे में लिखा। सआदत हसन मंटों ने विभाजन के खौफ के बारे में लिखा। लेकिन आज की मीडिया में हमें क्या दिखता है?
कई चैनल नक्षत्र- शास्त्र पर आधारित कार्यक्रम दिखाते हैं। नक्षत्र- शास्त्र को खगोल- विज्ञान से गड्डमगड्ड नहीं किया जाना चाहिए। खगोल-  विज्ञान एक विज्ञान है, जबकि नक्षत्र-  शास्त्र पूरी तरह अंधविश्वास और गोरखधंधा है। यहाँ तक कि एक सामान्य विवेक भी हमें यह बता सकता है कि तारों और ग्रहों की परिक्रमा और किसी आदमी के 50 या 80 साल में मरने, या किसी के इंजीनियर या डॉक्टर या वकील बनने के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे देश में अधिकांश लोग नक्षत्र शास्त्र को मानते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए क्योंकि उनका मानसिक स्तर कमतर है। इस मानसिक स्तर में लोट- पोट होने और इसको जारी रखने के बजाए मीडिया को इसको उन्नत करने की कोशिश करनी चाहिए।
कई चैनल दिखाते हैं कि- जिक्र करते हैं और दिखाते हैं कि कोई हिंदू देवता कहां पैदा हुए थे, कहाँ- कहाँ वे रहे, वगैरह वगैरह। क्या यह अंध- विश्वास को फैलाना नहीं है?
मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि समूची मीडिया में कोई अच्छा पत्रकार नहीं है। कई बेहतरीन पत्रकार हैं। पी. साईनाथ एक ऐसे ही नाम हैं, जिनका नाम भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो कई राज्यों में किसान आत्महत्याओं के मामलों को उजागर करने की कहानी, जिसे कई सालों तक दबाया गया कभी कही ही नहीं जाती। लेकिन ऐसे अच्छे पत्रकार अपवाद हैं। बहुसंख्य ऐसे लोग हैं, जो जनहितों पर खरा उतरने की कोई चाहत नहीं रखते।
मीडिया के इन दोषों को दूर करने के लिए मुझे दो चीजें करनी हैं। पहला, मेरा प्रस्ताव है कि प्रत्येक दो माह या अन्य किसी निश्चित अंतराल में मीडिया के साथ (इलेक्टॉनिक मीडिया सहित) नियमित बैठकें हों। ये बैठकें समूची प्रेस कौंसिल की होने वाली नियमित बैठकें नहीं होंगी, लेकिन अनौपचारिक मेलजोल होगा जहाँ हम मीडिया से संबंधित मुद्दों पर विचार विमर्श करेंगे और उनका लोकतांत्रिक तरीके से, अर्थात बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश करेंगे। मेरा यकीन है कि 90 फीसदी समस्याएँ इन तरीकों से सुलझाई जा सकती हैं।
दूसरा, एक हद के बाद जहाँ मीडिया का एक हिस्सा उपरोक्त सुझाए गए लोकतांत्रिक प्रयासों के बावजूद इन्हें अनुत्पादक साबित करने की हठ पर अड़ा हो, कठोर उपायों की जरूरत पड़ेगी। इस संबंध में, मैंने प्रधानमंत्री को प्रेस आयोग अधिनियम में संशोधन करने का आग्रह किया है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस कौंसिल, जिसका संशोधित नाम मीडिया आयोग हो सकता है, के दायरे में लाया जाए और इसे और शक्ति- संपन्न बनाया जाए। मिसाल के लिए, सरकारी विज्ञापन बंद करना, या किसी अतिरेक स्थित में, कुछ समय के लिए मीडिया हाउस के लायसेंस को निरस्त करना। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- 'बिन भय होय न प्रीतÓ यद्यपि, इसका इस्तेमाल सिर्फ बेहद, अतिरेक स्थितियों में और लोकतांत्रिक उपायों के असफल होने के बाद ही किया जाएगा।
यहाँ एक आपत्ति हो सकती है कि यह तो मीडिया की स्वतंत्रता को बाधित करना है। ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती, जो कि अमूर्त और परम हो। सभी स्वतंत्रताएँ तर्कसंगत सीमा का विषय होती हैं, और इसमें जिम्मेदारी भी निहित होती है। एक लोकतंत्र में, हर कोई जनता के प्रति उत्तरदाई है, और इसीलिए हमारा मीडिया भी है।
निष्कर्षत: भारतीय मीडिया को अब आत्मचिंतन, एक उत्तरदायित्व की समझ और परिपक्वता विकसित करना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं हैं कि इसे सुधारा नहीं जा सकता। मेरी मान्यता है कि गड़बड़ी करने वालों में 80 फीसदी एक धैर्यपूर्ण बातचीत के जरिए, उनकी गलतियों को इंगित करके अच्छे लोग बनाए जा सकते हैं और धीरे- धीरे उन्हें उस सम्मानजनक रास्ते की ओर अग्रसर किया जा सकता है, जिस पर यूरोप का मीडिया नवजागरण काल में चल रहा था।
(www.ravivar.com से)
अनुवाद-  अनिल मिश्र *भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने यह आलेख हाल ही में पत्रकारों के लिये आयोजित एक कार्यक्रम में पढ़ा था।    

Sep 10, 2011

पत्रकारिता महज धन्धा न रह जाये...

- एल. एन. शीतल
कोई शक नहीं कि समाचार पत्र को चलाने के लिए विज्ञापन अनिवार्य हैं, लेकिन ऐसा भी हरगिज न हो कि विज्ञापनों की भीड़ में समाचार ढूंढऩे पड़ें। पाठकों को गुमराह करने, फुसलाने तथा उकसाने के लिए उत्पादों की प्रचार सामग्री को खबरों के रूप में परोसे जाने के चलन पर रोक लगाने का काम भी वह आयोग करे।
पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत और अंधकारमय वर्तमान से गुजरते हुए जब हम भविष्य की चुनौतियों पर दृष्टिपात करते हैं तो हमें संभावनाओं के अनेक टापू दिखायी देते हैं। कहीं ये टापू, बाजारवाद के मौजूदा ज्वार में न डूब जायें इसके लिए हमें उन सवालों के माकूल जवाब देने होंगे जिनकी वजह से इन टापुओं के दरकने या बेवक्त डूबने का
अंदेशा है।
एक अच्छा अखबार होने का मतलब है- लोगों के लिए, लोगों का अखबार। हर अखबार लोगों का हो, महज सत्ता प्रतिष्ठान या विज्ञापनदाता का न हो, लोगों के लिए हो, सत्ता प्रतिष्ठान या विज्ञापनदाता या फिर किसी व्यक्ति विशेष के लिए न हो। लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। ऐसा हो, इसके लिए जरूरी है कि हम और ज्यादा समय गंवाये बगैर ऐसे उपाय करें, जिनके कारआमद नतीजे हासिल हों और जो पत्रकारिता के भविष्य को उज्ज्वल बनायें।
इन उपायों की शृंखला में सबसे पहले एक ऐसा स्वायत्तशासी, उच्चाधिकार प्राप्त नीति नियामक आयोग बनाया जाना चाहिए जो मुख्य रूप से दो काम करे। एक तो यह, कि वह बेलगाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से होड़ ले रहे प्रिंट मीडिया द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता पर रोक लगाये। चूंकि, हमारे पाठक संगठित नहीं हैं, इसलिए उनके दीर्घकालकि सरोकारों से जुड़ी सामग्री के लिए, इस नियामक निकाय की भूमिका अत्यंत सार्थक रहेगी। वह निकाय तय करे कि कोई अखबार चित्रों या अन्य सामग्री ('लिंग वर्धक यंत्र', 'कंडोम के मजे', 'फुल बॉडी मसाज', 'दोस्ती करो और दिल खोलकर बातें करो' आदि के जरिये अश्लीलता न परोसे। दूसरे, उक्त नीति नियामक आयोग का दायित्व यह सुनिश्चित करना भी हो कि किसी भी अखबार में विज्ञापनों के लिए दिये जा रहे स्थान तथा समाचारों को मिलने वाले स्थान का अनुपात तर्कसंगत हो। जो अनुपात निर्धारित किया जाये उसका सख्ती से पालन भी हो।
कोई शक नहीं कि समाचार पत्र को चलाने के लिए विज्ञापन अनिवार्य है लेकिन ऐसा भी हरगिज न हो कि विज्ञापनों की भीड़ में समाचार ढूंढऩे पड़ें। पाठकों को गुमराह करने, फुसलाने तथा उकसाने के लिए उत्पादों की प्रचार सामग्री को खबरों के रूप में परोसे जाने के चलन पर रोक लगाने का काम भी वह आयोग करे। वह आयोग यह भी सुनिश्चित करे कि कोई भी सत्ता- प्रतिष्ठान 'मित्र' और 'शत्रु' अखबारों की आंतरिक तथा गुप्त सूची बनाकर विज्ञापनों की बंदरबांट न कर पाये। चुनावों के समय मीडिया के एक बड़े वर्ग की शर्मनाक हरकतों पर तो खुद शर्म भी बेहद शर्मसार है। ऐसी स्थिति में यदि यह सुझाव अमल में लाया जाता है तो पाठकों को मिलने वाली सामग्री का स्तर सुधरेगा उन्हें ज्यादा सामग्री मिलेगी तथा अखबारों की आजादी अप्रभावति रह सकेगी।
यह आरक्षण का दौर है। वंचितों को तर्कसंगत आरक्षण का विरोध नहीं किया जा सकता। इसलिए अखबारों में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्रामीण जनता तथा मजदूरों के दीर्घकालिक हितों को पोषित करने वाली सामग्री को समुचित तयशुदा स्थान अनिवार्यत: मिले, भले ही वे अखबारों को विज्ञापन देने की स्थिति में नहीं हैं। इसके लिए यदि कोई कानून भी बनाना पड़े, तो बनाया जाना चाहिए।
कहने के लिए अखबारों की ज्यादती के शिकार पाठकों और सरकारों के मनमाने रवैये से पीडि़त अखबारों की व्यथा-कथा सुनने के लिए एक संस्था है- प्रेस कौंसिल। लेकिन यह अधिकारविहीन संस्था एक तमाशा-मात्र बनकर रह गयी है। यह दोषियों को सिर्फ चेतावनी दे सकती है, दंड देने का हक इसे नहीं है। पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल हो, इसके लिए जरूरी है कि इस संस्था को, निर्वाचन आयोग की तरह, अखिल भारतीय स्तर पर 'प्रेस नियामक आयोग' का व्यापक स्वरूप दिया जाये और प्रदेशों में भी इसका राज्य स्तरीय ढांचा तैयार हो। यह आयोग जिला स्तर पर निगरानी जत्थे तैनात करे, जो शुरूआती स्तर पर पाठकों की शिकायतों की पड़ताल करके उन्हें अंतिम सुनवाई के लिए अग्रेषित कर सकें। इससे पाठकीय सरोकारों के प्रति अखबारों की जवाबदेही बढ़ेगी। चूंकि, प्रेस को अनौपचारिक तौर पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है, इसलिए परम आवश्यक है कि हमारे अखबारों की उत्पादन-प्रक्रिया पारदर्शी हो और उसमें पाठकीय सरोकारों के प्रति जवाबदेही भी तय हो। इसे सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि अखबारों में ऐसे लोग आयें, जो योग्य हों, अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति वचनबद्ध हों तथा वे अन्य व्यवसायों में कार्यरत लोगों की तुलना में मिशनरी जज्बे से ज्यादा भरे हों। ऐसे युवाओं को पत्रकारिता में लाने के लिए एक प्रतिस्पर्धी माहौल, सुनिश्चित भविष्य, तथा अच्छे वेतन अनिवार्य हैं। सभी समाचार पत्र अपने मशीनी संसाधनों जितनी तवज्जो अपने इंसानी संसाधनों को भी दें, यह निहायत जरूरी है। वर्तमान में अखबारों के आंतरिक ढांचे में सबसे बड़ा ग्रहण यही लगा है कि पत्रकारों की गुणवत्ता को तिरोहित कर प्रबंधनपरस्त नरमुंडों को प्रश्रय देने की परिपाटी चल पड़ी है। ऐसे पालित पत्रकारों के वेतन पर विशेष जोर न देने के पर्याप्त निजी कारण होते हैं। इसके लिए मौजूदा दोषपूर्ण कानूनी प्रावधानों को बदलना होगा। सभी विज्ञापनदाताओं के लिए यह अनिवार्य करना होगा कि वे सिर्फ उन्हीं अखबारों को विज्ञापन दें जो अपने पत्रकारों को निर्धारित वेतनमान दे रहे हैं।
चूंकि, अखबार नाम की संस्था के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है, इसलिए यही पारदर्शिता अखबारों के संसाधनों पर भी लागू होनी चाहिए। किसी भी पत्र-पत्रिका को शुरू करने की अनुमति दिये जाने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अखबार के प्रकाशन पर कितनी राशि खर्च होगी, वह कहां से आयेगी और अखबार चलाने वाले का आर्थिक आधार क्या है। ज्यादा उचित तो यह होगा कि अखबार चलाने वाले प्रतिष्ठान केवल अखबार ही चलाये, कोई और धंधा न करे, क्योंकि अखबार धंधा तो हो गये हैं, लेकिन उन्हें महज धंधा ही नहीं माना जा सकता। अन्य धंधों की तुलना में वे अंतत: एक मिशन भी हैं, चौथा स्तंभ भी हैं और जन-प्रतिष्ठान भी।
बाजारवाद की अंधी होड़ में मुख्य उत्पाद के साथ एक अन्य उत्पाद मुफ्त देने के भ्रामक विज्ञापन, दरअसल उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी है। यह धोखाधड़ी तमाम धंधों में धड़ल्ले से चल रही है। हालांकि यह होनी तो इन धंधों में भी नहीं चाहिए, लेकिन अखबारों में तो हरगिज नहीं। आज अखबारों में ऐसी लंबी- चौड़ी विज्ञापनबाजी को पाठक-प्रोत्साहन का नाम दिया जाता है। उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि यदि उनके पास पांच या पचास करोड़ रुपये के पुरस्कार देने के लिए धन हैं तो वे क्यों नहीं अखबार की कीमत कम कर देते, क्यों नहीं अखबार की सामग्री को ज्यादा पठनीय बना देते, क्यों नहीं विज्ञापनदाता की देहलीज पर माथा रगडऩे या विज्ञापन ऐंठने के लिए कमजोर विज्ञापनदाताओं को धमकाने की हरकतें बंद कर देते। यानी, यह तय किया जाना चाहिए कि कोई भी अखबार इस तरह के छद्म प्रलोभनों से अपने पाठकों को हरगिज नहीं भरमायेगा।
हमारे पत्रकारिता संस्थान पत्रकार नहीं, पीआरओ पैदा कर रहे हैं और वह भी अधकचरे। इस पर भी उन्हें मुगालता यह कि उनकी आधी- अधूरी जानकारी ही अंतिम सच है। जब वे किसी अखबार का हिस्सा बनने की प्रक्रिया से जुड़ते हैं तो उनके उस ज्ञान की पोल पहले दिन ही खुुल जाती है। यह दुरावस्था भविष्य के लिए एक भयावह संकेत है। आज दरकार इस बात की है कि मौजूदा पाठ्यक्रम में, बदलती चुनौतियों के अनुरूप आमूलचूल परिवर्तन किया जाये। शिक्षकों और शिक्षण-शैली को भी बदलने की जरूरत है। ऐसे शिक्षक लाये जाने चाहिए जिन्हें समुचित व्यावहारिक ज्ञान हो।
वर्तमान में पूरा भारतीय समाज पश्चिम के सांस्कृतिक हमले और आर्थिक घुसपैठ की चपेट मेें है। वह दरक रहा है। विडम्बना यह है कि लगभग सभी अखबार इस हमले और घुसपैठ को रोकने तथा पाठक को उससे आगाह करने के बजाय खुद उसके वाहक बन बैठे हैं। चूंकि, अखबार निकालने वाले लोग वही हैं, जो उस घुसपैठ से लाभान्वित हो रहे हैं, इसलिए वे पहरुए की भूमिका निभाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। भविष्य में पश्चिम का बाजार और ज्यादा हावी होगा, सांस्कृतिक हमला और ज्यादा तेज होगा, नतीजतन हमारे मूल्य तिरोहित होंगे, समाज विखंडित होगा और कुल मिलाकर हम कमजोर होंगे। अंदेशा इस बात का है कि अखबार अपने मौजूदा चरित्र को पकड़े रहने पर आमादा रहेंगे। मात्र पाठकीय दबाव ही ऐसा अकेला जरिया है, जिसके बूते अखबारों को सही रास्ते पर लाया जा सकता है। इसलिए भविष्य के वास्ते पाठकों की दोहरी जिम्मेदारी है कि वे न केवल उस खतरे से खुद आगाह रहें बल्कि अखबारों की दशा और दिशा को भी नियंत्रित रखें।
एक अंगेरजी अखबार के संपादक ने पद मुक्त होने के अवसर पर लिखे अपने 'विदा- लेख' में पाठकों को 'मी लॉर्ड' से संबोधित किया। कितना अच्छा लगता है पाठक के लिए 'मी लॉर्ड' का यह संबोधन! लेकिन इसी के साथ दु:ख भी होता है कि हमारे ज्यादातर अखबार अपनी कथनी और करनी के जरिये पाठकों के इस सम्मान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। हमें जागरूक पाठक होने के नाते अपनी इस अपमानजनक स्थिति को खत्म करना होगा। इसके लिए एक पाठकीय यज्ञ वक्त का तकाजा है जिसमें समिधा डालना हम सभी का युगधर्म है। तभी पत्रकारिता की उज्ज्वल संभावनाओं के जगमग टापू फैलते नजर आयेंगे।
संपर्क: 12, टाइप-4, सेक्टर बी, पिपलानी, भोपाल 462021 मो. 093018 20315

Mar 21, 2009

रोक सकेगी इस कुरीति को बालिका-वधू

रोक सकेगी इस कुरीति को बालिका-वधू
बस इच्छा यही है कि इसकी चमक उन अंधे मां बापों की आंखे खोलने में कामयाब हो जो अंधविश्वासों और कुरीतियों को अपने तर्कों की तलवारें चलाते हुए अपने बच्चों को होम किए जाते हैं....
-तनु शर्मा

बात करें अगर छोटे पर्दे की तो कुछ बात करने लायक नजर नहीं आता....चारों तरफ वही रंगे-पुते नकली और भयावह सास-बहू के चेहरे .......वही एक-एक शॉट के दस-दस रीटेक्स दिखाना.... जब तक कि कोई चैनल ही ना बदल दे......

लेकिन इन सबके उलट चैनल कलर्स पर आने वाला सीरियल बालिका-वधू अपनी लोकप्रियता की सारी सीमाएं लांघ चुका है......बेदम और उबाऊ हो रहे छोटे पर्दे पर बालिका-वधू एक ताज़ी सांस की तरह आया....

इस सीरियल में सब कुछ इतना गुंथा हुआ है कि कहीं कोई कमज़ोर कड़ी नजऱ नहीं आती ....बेहद सादगी के साथ इसका प्रैजेंटेशन, सभी किरदारों का सशक्त अभिनय, केंद्रीय पात्र आनन्दी का भोलापन और मां साब की भूमिका में सुलेखा सीकरी का किरदार इसमें जान डाल देता है।

पूरा सीरियल राजस्थान की पृष्ठभूमि में रचा गया है, हर चीज़ पर इतनी बारीकी से ध्यान दिया गया है....कि कहीं कोई कमी नजऱ नहीं आती......।

लेकिन एक बात जो थोड़ा कचोटती है वो ये है कि क्या सामाजिक बुराई -बाल विवाह--को दिखाने का थोड़ा भी लाभ समाज को मिलेगा...... टीआरपी मिल रही है, पैसा मिल रहा है, लेकिन क्या सामाजिक जागरुकता आ रही है ...... क्या वे मां-बाप जो इसे देख रहे है, पसंद कर रहे हैं......अपने आप को रोक पाएंगे जब आखा तीज़ आएगी और ना जाने कितने ही मासूम आनन्दी और जगिया की तरह इस बंधन में बांध दिए जाएंगे.....।

शायद किसी को याद भी नहीं होगा कि कुछ सालों पहले मध्यप्रदेश के धार जि़ले में एक महिला अधिकारी के हाथ काट दिए गए थे.... जो बाल विवाह जैसी कुरीति का विरोध कर रही थी..... मुझे पूरा विश्वास है कि कोई मुकदमा कायम नहीं हुआ होगा और किसी को सज़ा नहीं मिली होगी..... क्योंकि हम सब अपनी कानून व्यवस्था के बारे में बखूबी जानते हैं..... हमारे यहां कानूनी तौर पर अवैध घोषित कुरीतियां मरती नहीं हैं.. कोई वक्त गुजर कर भी सचमुच नहीं गुजरता।

इस सीरियल में आनंदी अनगिनत सवाल पूछती है लेकिन उसके जवाब उसे नहीं मिलते.... वह कमसिन, कोमल और निर्मल है और उसके ज़हन में हज़ार सवाल उठते हैं।

इस सीरियल में कहीं कोई कमी नहीं सब कुछ एक खूबसूरत जड़ाऊ हार की तरह.... बस इच्छा यही है कि इसकी चमक उन अंधे मां बापों की आंखे खोलने में कामयाब हो जो अंधविश्वासों और कुरीतियों को अपने तर्कों की तलवारें चलाते हुए अपने बच्चों को होम किए जाते हैं....

राज्य सरकारें भी बातें बड़ीं-बड़ीं करती है लेकिन कुरीतियों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती...... वोट बैंक के होव्वे ने ही इन कुरीतियों को पाला है और बढ़ावा दिया है।

email- tanusharma100@gmail.com

Feb 25, 2009

हम कितने जिम्मेदार हैं?

हम कितने जिम्मेदार हैं?
- उमेश चतुर्वेदी
टीवी को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच इसकी असल वजहों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। टीवी वाले नाटकीय और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार तो हैं, इसे अब टेलीविजन के न्यूजरुम में काम करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी मानने लगा है। 
उदारीकरण और बाजारवाद के दौर में जिस तरह अंधाधुंध टीवी का विस्तार हुआ है उसमें बौद्धिकता के लिए खास गुंजाइश की जगह नहीं रही.. लिहाजा टीवी माध्यम सहज ही बुद्धिजीवी वर्ग के निशाने पर आ गया है। इसके साथ ही इस माध्यम को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने का दौर तेज हो गया है। चूंकि प्रभावशाली प्रिंट मीडिया और बौद्धिक तबका इस आक्रमण अभियान में शामिल है इसलिए सरकार को भी मौका मिल गया है और उसने कुछ चैनलों को कारण बताओ नोटिस जारी करने में देर नहीं लगाई।
टीवी को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच इसकी असल वजहों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। टीवी वाले नाटकीय और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार तो हैं, इसे अब टेलीविजन के न्यूजरुम में काम करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी मानने लगा है। इसके बावजूद ना सिर्फ मुंबई हमले- बल्कि दूसरी ऐसी घटनाओं की भी ऐसी रिपोर्टिंग जारी है। इस मसले पर पूरी पड़ताल करने से पहले एक बार हमें समानांतर सिनेमा के दौर में जारी साहित्य और सिनेमा के आपसी रिश्ते और उसे लेकर जारी विवाद को भी याद कर लेना जरूरी होगा। पिछली सदी तीस के दशक में हिंदी कहानी के सबसे महत्वपूर्ण शिल्पकार प्रेमचंद ने मायानगरी में नया कैरियर बनाने को लेकर पांव रखे थे- लेकिन उन्हें मायावी दुनिया रास नहीं आई और वे बनारस लौट आए थे। पचास के दशक में मुंबई गए अमृतलाल नागर का भी वैसा ही अनुभव रहा। ये बात अलग है कि उन्हीं दिनों साहित्य की दुनिया से फिल्मी दुनिया में गए पंडित नरेंद्र शर्मा ने साहित्य से इतर फिल्मी दुनिया में नया मुकाम रचा। सातवें दशक में यही काम कमलेश्वर ने किया। लेकिन प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के दौर में सिनेमा को लेकर साहित्यिक हलकों में जो पूर्वाग्रह पनपा, वह कमोबेश आज भी जारी है। शायद यही वजह है कि कमलेश्वर रहे हों या फिर नरेंद्र शर्मा... उन्हें साहित्यिक जगत में वह सम्मान और आदर नहीं मिला जिसके वे हकदार रहे। कुछ ऐसा ही संबंध आज आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बीच भी है। इसीलिए जब भी टेलीविजन की दुनिया में मुंबई जैसी घटनाओं की गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग होती है पूरा का पूरा प्रिंट माध्यम उस पर पिल पड़ता है।
ऐसा नहीं कि 27 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले की ही टीवी ने अतिरेकी रिपोर्टिंग की। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले की भी ऐसी ही रिपोर्टिंग हुई। जयपुर और अहमदाबाद धमाके को लेकर भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने ऐसा ही कदम उठाया। आलोचना तब भी हुई, लेकिन इस बार ज्यादा बावेला इसलिए मचा क्योंकि एक चैनल ने ना सिर्फ एक कथित आतंकवादी का फोनो चलाया बल्कि अपने इस काम को सही साबित करने की कवायद में भी जोरशोर से जुट गया है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोई आतंकवादी किसी चैनल पर आकर ये प्रस्ताव रखे कि वह देश को उड़ाने या प्रधानमंत्री पर ही हमला बोलने का ऐलान करने वाला है तो क्या उसे टीवी अपना स्टूडियो और अपना पैनल कंट्रोल रूम इसके लिए मुहैय्या कराएगा। सवाल ये भी है कि क्या किसी पत्रकार के पास किसी मासूम लडक़ी या महिला से बलात्कार का फुटेज है तो उसे भी बिना सेंसर्ड और बिना संपादन दिखा दिया जाएगा। करीब छह साल पहले आगरा में एक अध्यापिका का उसके ही कुछ छात्रों ने बलात्कार किया। इसकी फुटेज किसी के पास क्या होती, लेकिन अपने दर्शकों को ये घटना दिखाने के लिए एक प्रमुख चैनल ने बाकायदा इस रेप कांड का नाट्य रूपांतरण कराया और उसे खबर में वांछित जगह पर संपादित करके चलाया भी। उसका भी तब विरोध हुआ था।
टेलीविजन चैनलों में एक वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि खबर की सच्चाई दिखाने के लिए उसका ये कदम जायज है। इसी आधार पर 2004 में गुजरात के एक खास संप्रदाय के साधुओं की यौन लीला को एक चैनल ने बाकायदा बिना किसी संपादन के दिखाया था। लेकिन हकीकत ये थी कि न्यूज रूम में काम करने वाले अधिकांश पत्रकार इससे सहमत नहीं थे। महिला पत्रकारों की न्यूज रूम में हालत क्या थी उन्हें ही पता है, जो उस समय न्यूज रूम में थीं।
बहरहाल जो ये चैनल मान रहे हैं कि सच्चाई के लिए ये सारी चीजें उन्हें दिखाने का हक है । पत्रकारिता में बुराई को उजागर करने के लिए बुराई को ज्यों का त्यों दिखाने का एक वर्ग तेजी से इन दिनों बढ़ा है। बुराई दिखाई जाए... उसे लेकर दर्शकों और पाठकों का आगाह किया जाए- इससे शायद ही किसी को एतराज होगा। लेकिन इसकी सीमा क्या होगी? यह तो कहीं न कहीं उन्हें तय करना ही होगा। अन्यथा उन्हें अमेरिका के नैकेड न्यूज नामक चैनल को भी दिखाने से गुरेज नहीं होगा। इंटरनेट पर भी वह चैनल मौजूद है। नेकेड न्यूज नाम के इस चैनल के सारे एंकर बिल्कुल नंगे इंटरव्यू लेते या लेती हैं। खबरें भी नंगे बदन ही पढ़ी जाती हैं। दरअसल बहस और आलोचना की वजह भी यही है कि अगर ऐसा किया गया तो औरों से अलग और बौद्धिक दिखने वाले पत्रकार वर्ग और बाकी लोगों के विवेक में फर्क कहां रह जाएगा।
मार्च 2002 में गुजरात दंगों में खुलेआम लोगों को जलाने की घटनाओं की रिपोर्टिंग को लेकर भी विवाद हुआ था। लेकिन तब इसकी मुखालफत नहीं हुई थी। प्रिंट मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग ने इसका समर्थन किया था। इसकी रिपोर्टिंग करने वाले लोगों ने तब के विरोधियों के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया था। विरोधियों का तर्क था कि इससे हिंसा को और बढ़ावा मिला। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमले के बाद चीजें बदल गईं हैं। पूरे देश में इस घटना को लेकर विरोध के सुर उठ रहे हैं। लिहाजा टीवी में काम करने वाले लोगों का बड़ा तबका इस घटना को लेकर रक्षात्मक बना हुआ है।
मुंबई हमले पर टीवी ने क्या-क्या किया... इसे तकरीबन पूरे देश ने देखा है। कुछ लोगों का सवाल है कि ताज होटल से छुड़ाए गए बंधकों से टीवी वालों ने पूछा कि आपको कैसा लग रहा है। प्रिंट के कई दिग्गजों ने इसकी भी आलोचना की है कि टीवी पत्रकारों ने सामान्य शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखा और बदहवास लोगों का इंटरव्यू करने या उनकी बाइट लेने के लिए दौड़ पड़ा। ये सच है कि टीवी वाले इस सवाल का प्रतिकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन क्या यह कार्य इतना गिरा हुआ है कि इसकी आलोचना की जाए। क्या किसी सार्वजनिक माध्यम का यह दायित्व नहीं बनता कि वह दुनिया को यह बताए कि आतंकी हमले के दौरान ताज होटल के अंदर क्या हो रहा था और इसका आंखों देखा हाल बताने के लिए बंधकों के अलावा और दूसरा कौन हो सकता है। ऐसे सवाल तो प्रिंट के पत्रकार भी पूछ रहे थे और केस हिस्ट्री तो अगले दिन के अखबारों में भी इंटरव्यू और बंधकों की आपबीती के रूप में भरी पड़ी थी। लेकिन उस पर सवाल तो नहीं उठा।
यह सच है कि टीवी की अतिरेकी रिपोर्टिंग से शुरू में आतंकियों को मदद मिली। यह गलती इतनी बड़ी है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को सबक लेना चाहिए। लेकिन कभी किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि टीवी के न्यूज रूम में आखिर ऐसा क्यों होता है। ये सच है कि टीवी रिपोर्टर इस दौरान हर गतिविधि पर नजर गड़ाए हुए थे। पल-पल की खबरें अपने पैनल कंट्रोल रूम को भेज रहे थे। लेकिन ये भी उतना ही सच है
कि इसे जनता को दिखाने- अपने चैनल पर चलाने और न चलाने का फैसला उनके आका ले रहे थे। टेलीविजन न्यूज रूम का आज के दौर में जैसा विकास हुआ है और टीआरपी की गलाकाट प्रतियोगिता पर जिस तरह बाजार और विज्ञापनों की दुनिया टिकी हुई है उसके चलते न्यूज रूम का कोई आका अगर दूसरे चैनल पर ऐसी रिपोर्टिंग दिख गई तो अपने चैनल पर जाया करने से रोकने का दुस्साहस नहीं कर सकता। टीवी न्यूजरूम के प्रमुख लोगों की निगाह अपने प्रतिद्वंद्वी चैनलों पर लगी रहती है। अगर सामने वाले चैनल के रिपोर्टर ने अतिरेकवादी भूमिका निभाई तो न्यूज रूम में दहाड़ सुनाई देने लगती है। रिपोर्टर और कैमरामैन को मोबाइल पर निर्देश दिए जाने लगते हैं कि वैसा ही कुछ करके दिखाओ जैसा सडक़ पार या पड़ोस का चैनल करके दिखा रहा है। यही वजह है कि एक दौर में ताज की रिपोर्टिंग कर रही सभी टीमों के रिपोर्टर सोकर रिपोर्टिंग करते दिखे। जबकि उनके कैमरा मैन पहले की ही तरह खड़े थे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गोली लगने का खतरा सिर्फ रिपोर्टरों को था और कैमरामैन बुलेटप्रूफ पहनकर महफूज थे। निश्चित रूप से इसका जवाब ना में है। अगले दिन के अखबारों में ये पूरी की पूरी तस्वीर छपी भी और आम लोगों तक ये नाटकीयता पहुंची भी। इन तस्वीरों ने भी टीवी रिपोर्टिंग को लेकर सवाल उठाने का मौका दिया।
लेकिन इस पूरी आलोचना और बहसबाजी के दौर में टेलीविजन न्यूज रूम के असल संकट पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। एक-दो दशक पहले तक जो लोग पत्रकारिता में आ रहे थे उनके सामने दुनिया को बदलने और कुछ कर दिखाने का जज्बा हुआ करता था। लेकिन बाजारवाद के दौर में ये हकीकत बदल गई है। टीवी के लोग खुद को पत्रकार भले ही कहें लेकिन एक पूरी की पूरी पीढ़ी अब नौकरी करने आई है। गली-मोहल्ले के पत्रकारिता संस्थानों से लाखों रूपए की फीस देकर कथित पढ़ाई के बाद निकले नए लडक़े-लड़कियों का नजरिया साफ है। उनका मानना है कि वे नौकरी करने आए हैं पत्रकारिता करने नहीं। शायद यही वजह है कि उन्हें जब भी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारीय मानदंडों की अवहेलना करने को कहा जाता है, वे वैसा करने में देर नहीं लगाते। लाखों रूपए के कर्ज की रकम पर मिली शिक्षा से निकले पत्रकार ने दम दिखाया तो उसकी नौकरी जा सकती है।
रही बात न्यूज रूम के आकाओं की तो उनकी भी हालत कुछ बेहतर नहीं है- सिवा मोटी पगार के। नौकरी पर लगातार लटकी तलवार के चलते वे भी पत्रकारीय दंभ और मानदंड पर कायम रह नहीं पाते। टीआरपी गिरी नहीं कि नौकरी पर लटकी तलवार और नजदीक हुई। बाजारवाद ने लोगों के सामने आदर्शों के लिए जगह नहीं छोड़ी। ऐसे में चाहे लाख सवाल उठे होना तो वही है जो बाजार चाहता है। टीवी पर सवाल उठाना कुछ वैसा ही है जैसे बाजार में रहकर बाजार का विरोध...
दरअसल हर पेशे की एक नैतिकता भी होती है। आजादी के आंदोलन की कोख से निकली भारतीय पत्रकारिता के लिए पहले इसकी जरूरत नहीं रही। आजादी के आंदोलन का पत्रकारिता भी एक उपादान रही है। चूंकि तब पत्रकारिता का मकसद आजादी पाना था, इसलिए उसमें राष्ट्रीय आंदोलन की वे सारी चीजें समाहित हो गई थीं, जिसके बल पर राष्ट्रीय आंदोलन ने गति पकड़ी और उफान पर रहा। आजादी के बाद के करीब एक दशक तक पत्रकारिता उसी रोमांसवाद से प्रभावित रही। लेकिन नब्बे के दशक में शुरू हुए बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता ने अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला छुड़ाना शुरू किया। चूंकि टेलीविजन इस बाजारवाद के दौर में ही पनपा, उभरा और विराट बना, इसलिए उसने बाजारवाद की तमाम खासियतें बेरोकटोक खुद में समाहित कर लीं।
अखबार में संपादकीय टीम की मीटिंगों में जहां महंगाई, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की बदहाली सबसे बड़ा मुद्दा रही हैं, टेलीविजन न्यूज रूम की मीटिंगों में नए ब्रांड के कपड़े, फैशन शो और कार की गिरती-बढ़ती कीमतों का मसला छाया रहता है। वैसे टीवी पर सवाल उठाने वाले प्रिंट माध्यमों की बैठकों में धीरे-धीरे ही सही टीवी का ये रोग आता जा रहा है। रही-सही कसर टैम रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी की माया ने पूरी कर दी है। टैम का जो पैमाना है उस पर भी बाजारवाद की चीजें ही हावी हैं। ऐसे में ये सोचना कि इस व्यवस्था पर टिका टेलीविजन उद्योग और उसके पत्रकार पेशेवर नैतिकता के तहत ही काम करेंगे, बिल्कुल बेमानी है।
वकालत, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी जैसे पेशों की नैतिकता निर्धारित करने , उनकी आचार संहिता बनाने के लिए बार कौंसिल और मेडिकल कौंसिल जैसे संगठन हैं। लेकिन मीडिया के लिए ऐसा कोई पेशेवर संगठन नहीं है जिसके जरिए पत्रकारों को नैतिक दायरे में बांधे रखने का काम किया जा सके। मुंबई हमलों के बाद एक बार फिर से मीडिया के लिए ऐसे ही एक पेशेवर संगठन की जरूरत बढ़ती जा रही है। ताकि वह मीडिया और उसमें काम करने वाले लोगों के लिए एक मानदंड तय करे। उनकी आचार संहिता तय करे और उसे लागू करने की नैतिक जिम्मेदारी भी उठाए।
सूचना और प्रसारण मंत्री रहते सुषमा स्वराज ने 2002 में मीडिया कौंसिल के गठन का सवाल जब उछाला था, तब इसका ना सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और घरानों ने भी विरोध किया था। पत्रकारों का एक तबका तो खैर आगे था ही। लेकिन अब इसे लेकर भी सहमति बनती दिख रही है। टीवी पत्रकारों का एक बड़ा तबका भी मानने लगा है कि कम से कम उन्हें भी पेशेवर नैतिकता और आचार संहिता के दायरे में बंधना ही होगा। पेशेवराना अंदाज को जब तक संरक्षण नहीं दिया जाएगा, टीआरपी के बाजारवादी पैमाने बदले नहीं जाएंगे... टीवी माध्यमों को नैतिकता और देशहित के नाम पर जिम्मेदार ठहराना आसान नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आचार संहिता बनाने की वकालत करने वाले दिग्गज पत्रकार और राजनेता इस मोर्चे पर सचमुच तैयार हैं।