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Oct 3, 2021

कलाकार- पंथी का देदीप्यमान सितारा- राधेश्याम बारले

संजीव तिवारी 

विश्व के सबसे तेज नृत्य के रूप में प्रतिष्ठित छत्तीसगढ़ के लोक कला पंथी नृत्य के ख्‍यात नर्तक पंथी सम्राट स्व. देवदास बंजारे के साथ डॉ. आर.एस. बारले का नाम देश-विदेश में चर्चित है। सतनामी समाज के धर्म गुरु परम पूज्य गुरु बाबा घासीदास जी ने संपूर्ण मानव समाज को सत्य, अहिंसा, भाईचारा, सद्भावना, प्रेम, दया, करुणा, विश्व बंधुत्व के साथ-साथ मनखे-मनखे एक समानजैसे अद्भुत संदेश दिया है। इन्‍होंनें छुआछूत भेदभाव को मिटाकर संपूर्ण मानव में सत्य का रास्ता दिखाया है। समाज नें बाबा के इन्‍हीं संदेशों को भावभक्ति से पंथीनृत्य के माध्यम से प्रचार प्रसार किया, कालांतर से यह नृत्य प्रदेश के लोकमंच का सिरमौर बना हुआ है। राधेश्याम बारले  लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी विधा, इस पारम्पारिक लोकनृत्य की साधना में विगत 40 वर्षो से साधनारत हैं एवं इसे आगे बढ़ाने हेतु कृतसंकल्पित हैं।
राष्ट्रीय चेतना के विकास मे लोक गीतों उवं नृत्यों की अहम भूमिका रही है। छत्‍तीसगढ़ का पंथी लोक नृत्य गीत लोक जीवन का ऐसा महाकाव्य है जिसमें जीवन धारा के साथ ही अंलकारो की मधुर झंकार भी है। पंथी गीत नृत्य में अतीत के दृश्यपटल में वर्तमान के संघर्षो का रंगबिरंगा चित्र भी है। लोकचेतना के उन्नयन में इसकी उल्लेखनीय भूमिका रही है। छत्तीसगढ़ तथा देश में सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण और संवर्धन में पंथी नृत्य ने एक विशेष पहचान बनाई है। पंथी आज देश ही नहीं विदेशों में प्रख्यात हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले की कला साधना और उसकी मेहनत से आज छत्तीसगढ़ में इस विधा की लगभग 200 से ज्यादा कला मंडलियों के 65 हजार पंथी नृत्य के कलाकार हैं। पंथी नृत्य भारत ही नहीं, अपितु विश्व के 70 देशों में अपनी पहचान बना चुका है, इसके नेपथ्‍य में डॉ. आर.एस. बारले के कला गुरु पंथी सम्राट स्व. देवदास बंजारे का अहम योगदान है।

डॉ. आर.एस. बारले नें भी अपने कला गुरु की इस मुहिम को आगे बढ़ाया है एवं अमेरिका एवं मैक्सिकों के पर्यटकों को छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति, लोक नृत्य पंथी का विशेष प्रशिक्षण देकर देश एवं प्रदेश का नाम रोशन किया है। इसके अलावा जाट कालेज, रोहतक (हरियाणा), सिक्किम, नामची, असांगथांग, गुवाहाटी, कालाहांडी, संबलपु, सिद्धि कॉलेज मध्य प्रदेश, नाट्य कॉलेज सतना मध्य प्रदेश आदि शहरों के स्कूली, कॉलेज के छात्र - छात्राओं को लोक कला पंथी नृत्य का प्रशिक्षण देकर कला के प्रति रचि पैदा कर राष्ट्रीयता एवं आत्मसम्मान तथा देश प्रेम की भावना को जाग्रत करने का अनुकरणीय पहल किया है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़, महाराष्‍ट्र, उड़ीसा, झारखण्ड आदि राज्यों के नक्सली क्षेत्रों में भी अपनी या से नक्सलियों को सही दिशा में जोड़ने के लिए हजारों कार्यक्रम प्रस्तुत कि हैं। जिससे प्रेरित कर आदिवासी अपने मूल जीवन में लौटकर खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं

9 अक्टूबर 1966 को ग्राम खोला, पोस्ट - धमना, तह. पाटन, जिला - दुर्ग में जन्‍मे डॉ. आर.एस. बारले का पूरा नाम डॉ. राधेश्‍याम बारले है।  इनके पिता का नाम स्व. समारू राम बारले एवं माता का नाम श्रीमती गैंदी बाई बारले है। इनके परिवार में पत्‍नी श्रीमती महेश्वरी बारले के साथ एक बेटी और दो बेटे हैं। वर्तमानमें वे एच.एस.सी.एल. कॉलोनी, मड़ोदा स्टेशन, पो. नेवई, जिला दुर्ग में रहते हैं। इन्‍होंनें एम.बी.बी.एस.(बायो.) के साथ ही इंदिरा कला संगीत विश्‍व विद्यालय से लोक संगीत में डिप्लोमा भी किया है। वे आकाशवाणी रायपुर के बी. हाई ग्रे एवं दूरदर्शन के नियमित कलाकार हैं। इन्‍होंनें पंथी नृत्य की शुरुआत सितम्बर 1978 से किया था। इन्‍हें राज्य अलंकरण गुरु घासीदास सामाजिक चेतना एवं दलित उत्थान सम्मान, राज्य अलंकरण प्रथम देवदास बंजारे सम्मान, राज्य अलंकरण डॉ. भवर सिंह पोते आदिवासी सेवा सम्मान प्राप्‍त हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले को भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा प्रथम देवदास बंजारे सम्मान, सामाजिक समरसता सम्मान, कलासाधक सम्मान, दाऊ महासिंग चंद्राकर सम्मान, जिला युवा पुरस्कार, सामाजिक कार्य एवं जन चेतना सम्मान, कला श्री सम्मान, पंथी रत्न सम्मान, कला रत्न सम्मान, लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, सतनाम फेलोशिप आवार्ड, धरती पुत्र सम्मान एवं छत्तीसगढ़ सतनामी रत्न सम्मान आदि सैकड़ों सम्मान प्राप्‍त हो चुके है।

डॉ. आर.एस. बारले नें विभिन्‍न जनकल्याणकारी कार्यक्रमों की प्रस्तुति पारंपरिक पंथी के माध्‍यम से दिया है जिसमें नशाबंदी, दहेज प्रथा, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ओं, परिवार नियोजन, साक्षरता, कुष्ट उन्मूलन, पर्यावरण, पल्‍स पोलियो, आयोडीन युक्त नमक, राष्ट्रीय सद्भाव, स्तनपान, महिला सशक्तीकरण, आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, इंद्रधनुष अभियान, पंचायती राज, कैंसर एवं एड्स आदि विषयों पर लगभग 200 मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से प्रेम, दया, अहिंसा, सद्भाव एवं राष्ट्रीय एकता का संदेश प्रदेश एवं देश के कोने-कोने में पहुँचाने का अनूठा कार्य किया है। इसके अलावा गीत एवं नाटक प्रभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, खेल युवा कल्याण विभाग, नेहरू युवा केन्द्र के माध्यम से सैंकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कैंप में सहभागिता के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत कर राज्य एवं देश के नाम को गौरवान्वित किया है।
डॉ. आर.एस. बारले पंथी के साथ ही नाट्य विधा के भी सिद्धस्‍थ कलाकार हैं इन्‍होंनें छत्तीसगढ़ के कई रंगमंचों पर स्‍व. प्रेम साइमन एवं पारकर लिखित सैकड़ों नाटकों का निर्देशन एवं उसमें अभिनय भी किया है। जिसमें पानी की जगह खून बहा, शहीद वीर नारायण सिंह, छत्तीसगढ़ समग्र दर्शन, असकट के दवई, बिन आखर पशु समान (साक्षरता पर अधारित), देश में दहेज की हुकुमत,शृंगी ऋषि का शिहावा (बस्तर दर्शन), भरम के भूत, लेड़गा देवार की दशमत कैना, प्रेम साइमन की आत्म कथा, देवदास बंजारे की आरुग फूल, सत्य ही सत्य, डाकू विक्रम सिंह, नाम के तहसीलदार आदि नाटकों में रंगमंची प्रशिक्षण एवं अभिनय किया है। देश के प्रमुख महोत्सव एवं राज्यों में भी इन्‍होंनें नाटकों का मंचन किया है जिसमें राजिम कुम्भ, शिरपुर महोत्सव, देवबलोदा महोत्सव, नागोद महोत्सव सतना (म.प्र.), बुरला उत्सव उड़ीसा गोदिंया महाराष्ट्र, नांमची सिक्कीम, सोनारी जमशेदपुर, उत्सव पुर्वाचंल गुवाहाटी, युवा उत्सव आदि महोत्सव प्रमुख हैं।

Apr 16, 2019

छत्तीसगढ़ के जसगीत

छत्तीसगढ़ के जसगीत
-संजीव तिवारी
छत्तीसगढ़ में पारंपरिक रूप में गाये जाने वाले लोकगीतों में जसगीत का अहम स्थान है। छत्तीसगढ़ का यह लोकगीत मुख्यत-  क्वांर व चैत्र नवरात में नौ दिन तक गाया जाता है। प्राचीन काल में जब चेचक एक महामारी के रूप में पूरे गांव में छा जाता था तब गांवों में चेचक प्रभावित व्यक्ति के घरों मै इसे गाया जाता था। आल्हाउदल के शौर्य गाथाओं एवं माता के श्रृंगार व माता की महिमा पर आधारित छत्तीसगढ़ के जसगीतों में अब नित नये अभिनव प्रयोग हो रहे हैं, हिंगलाज, मैहर, रतनपुर व डोंगरगढ, कोण्डागांव एवं अन्य स्थानीय देवियों का वर्णन एवं अन्य धार्मिक प्रसंगों को इसमें जोडा जा रहा है, नये गायक गायिकाओं, संगीत वाद्यों को शामिक कर इसका नया प्रयोग अनावरतचालु है।
पारंपरिक रूप से मांदर, झांझ व मंजिरे के साथ गाये जाने वाला यह गीत अपने स्वरों के ऊतारचढाव में ऐसी भक्ति की मादकता जगाता है जिससे सुनने वाले का रोमरोम माता के भक्ति में विभोर हो उठता है । छत्तीसगढ़ के शौर्य का प्रतीक एवं मॉं आदि शक्ति के प्रति असीम श्रद्धा को प्रदर्शित करता यह लोकगीत नसों में बहते रक्त को खौला देता है, यह अघ्यात्मिक आनंद का ऐसा अलौकिक ऊर्जा तनमन में जगाता है जिससे छत्तीसगढ़ के सीधे साधे सरल व्यक्ति के रग रग में ओज उमडपडता है एवं माता के सम्मान में इस गीत के रस में लीन भक्त लोहे के बने नुकीले लम्बे तारों, त्रिशुलों से अपने जीभ, गाल व हाथों को छेद लेते हैं व जसगीत के स्वर लहरियों में थिरकते हुए 'बोलबम' 'बोलबम' कहते हुए माता के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए 'बाना चढाते' हैं वहीं गांव के महामाया का पुजारी 'बैइगा' आनंद से अभिभूत हो 'माता चढे' बम बम बोलते लोगों को बगई के रस्सी से बने मोटे रस्से से पूरी ताकत से मारता है, शरीर में सोटे के निशान उभर पडते हैं पर भक्त बम बम कहते हुए आनंद में और डूबता जाता है और सोंटे का प्रहार मांदर के थाप के साथ ही गहराते जाता है ।
छत्तीसगढ़ के हर गाँव में ग्राम्या देवी के रूप में महामाया, शीतला मां, मातादेवाला का एक नियत स्थान होता है जहाँ इन दोनों नवरात्रियों में जंवारा बोया जाता है एवं नौ दिन तक अखण्ड'योति जलाया जाता है, रात को गाँव के पुरूष एक जगह एकत्र होकर मांदर के थापों के साथ जसगीत गाते हुए महामाया, शीतला, माता देवाला मंदिर की ओर निकलते हैं -
अलिन गलिन मैं तो खोजेंव,
मइया ओ मोर खोजेंव
सेऊकनइ तो पाएव,
मइया ओ मोर मालनिया
मइया ओ मोर भोजलिया.........
रास्ते में माता सेवा जसगीत गाने वाले गीत के साथ जुडते जाते हैं, जसगीत गाने वालों का कारवां जस गीत गाते हुए महामाया मंदिर की ओर बढता चला जाता है । शुरूआत में यह गीत मध्यम स्वर में गाया जाता है गीतों के विषय भक्तिपरक होते हैं, प्रश्नोत्तर के रूप में गीत के बोल मुखरित होते हैं -
कउने भिंगोवय मइया गेहूंवा के बिहरी
कउने जगावय नवराते हो माय...
सेऊक भिंगोवय मइया गेहूंवा के बिहरी
लंगुरे जगावय नवराते हो माय...
जसगीत के साथ दल महामाया मंदिर पहुंचता है वहाँ माता की पूजा अर्चना की जाती हैं फिर विभिन्न गांवों में अलग अलग प्रचलित गीतों के अनुसार पारंपरिक छत्तीसगढ़ी आरती गाई जाती है -
महामायलेलो आरती हो माय
गढ हींगलाज में गढे हिंडोलना
 लख आवय लख जाय
माता लख आवय लख जाय
एक नहीं आवय लाल लंगुरवा
जियरा के प्राण आधार...
जसगीत में लाल लंगुरवा यानि हनुमान जी सातों बहनिया माँ आदिशक्ति के सात रूपों के परमप्रिय भाई के रूप में जगह जगह प्रदर्शित होते हैं जहाँ माता आदि शक्ति लंगुरवा के भ्रातृ प्रेम व उसके बाल हठ को पूरा करने के लिये दिल्ली के राजा जयचंद से भी युद्ध कर उसे परास्त करनें का वर्णन गीतों में आता हैं । जसगीतों में दिल्ली व हिंगलाज के भवनों की भव्यता का भी वर्णन आता है -
कउन बसावय मइया दिल्ली ओ शहर ला,
कउन बसावय हिंगलाजे हो माय
राजा जयचंद बसावय दिल्ली शहर ला,
 माता वो भवानी हिंगलाजे हो माय
कउने बरन हे दिल्ली वो शहर हा,
कउने बरन हिंगलाजे हो माय
चंदन बरन मइया दिल्ली वो शहर हा,
बंदन बरन हिंगलाजे हो माय
आरती के बाद महामाया मंदिर प्रांगण में सभी भक्त बैठकर माता का सेवा गीतों में प्रस्तुत करते हैं । सभी देवी देवताओं को आव्हान करते हुए गाते हैं - 
पहिली मयसुमरेव भइया चंदा- सुरूज ला
दुसरे में सुमरेंव आकाश हो माय......
सुमरने व न्यौता देने का यह क्रम लंबा चलता है ज्ञात अज्ञात देवी देवताओं का आहवान गीतों के द्वारा होता है । गीतों में ऐसे भी वाक्यों का उल्लेख आता है जब गांवों के सभी देवी- देवताओं को सुमरने के बाद भी यदि भूल से किसी देवी को बुलाना छूट गया रहता है तो वह नाराज होती है गीतों में तीखें सवाल जवाब जाग उठते हैं - -
अरे बेंदरा बेंदराझन कह बराइन मैं हनुमंता बीरा
मैं हनुमंता बीरा ग देव मोर मैं हनुमंता बीरा
जब सरिस के सोन के तोर गढ लंका
कलसा ला तोर फोरहॉं, समुंद्र में डुबोवैं,
कलसा ला तोरे फोरहाँ ...
भक्त अपनी श्रद्धा के फुलों से एवं भक्ति भाव से मानस पूजा प्रस्तुत करते हैं, गीतों में माता का श्रृंगार करते हैं मालिन से फूल गजरा रखवाते हैं । सातों रंगो से माता का श्रृंगार करते हैं - -
मइयासांतों रंग सोला हो श्रृंगार हो माय...
लाल लाल तोरे चुनरी महामाय
लालै चोला तुम्हारे हो माय...
लाल हावै तोर माथे की टिकली
 लाल ध्वजा तुम्हारे हो माय....
खात पान मुख लाल बाल है
सिर के सेंदूर लाल हो माय...
मइया सातों रंग...
पुष्प की माला में मोंगरा फूल माता को अतिप्रिय है। भक्त सेउक गाता है - 
हो माय के फूल गजरा,
गूथौ हो मालिन के धियरी फूल गजरा
कउनेमाय बर गजरा कउने माय बर हार,
कउने भाई बर माथ मटुकिया
सोला हो श्रृंगार...
बूढी माय बर गजरा धनईया माय बर हार,
लंगुरे भाई बर माथ मटुकिया
सोला हो श्रृंगार ...
माता का मानसिक श्रृंगार व पूजा के गीतों के बाद सेऊक जसगीत के अन्य पहलुओं में रम जाते हैं तब जसगीत अपने चढाव पर आता है मांदर के थाप उत्तेजित घ्वनि में बारंबार ता बढाते हैं गीत के बोल में तेजी और उत्तेजना छा जाता हैं -
अगिन शेत मुख भारत भारेव,
भारेव लखन कुमारा
चंदा सुरूज दोन्नो ला भारेव,
तहूं ला मैं भारेहौं हां
मोर लाल बराईन,
तहूं ला मैं भरे हंव हाँ ...
गीतों में मस्त सेऊक भक्ति भाव में लीन हो, वाद्य यंत्रों की धुनों व गीतों में ऐसा रमता है कि वह बम बम के घोष के साथ थिरकने लगता है, क्षेत्र में इसे देवता चढना कहते हैं अर्थात देवी स्वरूप इन पर आ जाता है । दरअसल यह ब्रम्हानंद जैसी स्थिति है जहाँ भक्त माता में पूर्णतया लीन होकर नृत्य करने लगता है सेऊक ऐसी स्थिति में कई बार अपना उग्र रूप भी दिखाने लगता है तब महामाई का पुजारी सोंटे से व कोमल बांस से बने बेंत से उन्हें पीटता है एवं माता के सामने 'हूमदेवाता' है ।
भक्ति की यह रसधारा अविरल तब तक बहती है जब तक भगत थक कर चूर नहीं हो जाते। सेवा समाप्ति के बाद अर्धरात्रि को जब सेऊक अपने अपने घर को जाते हैं तो माता को सोने के लिये भी गीत गाते हैं -
पउढौ पउढौ मईयां अपने भुवन में,
सेउक बिदा दे घर जाही बूढी माया मोर
दसो अंगुरी से मईया बिनती करत हौं,
 डंडा ओ शरण लागौं पायें हो माय ...
आठ दिन की सेवा के बाद अष्टमी को संध्या 'आठेमें 'हूम हवनव पूजा अर्चना पंडित के .द्धारा विधि विधान के साथ किया जाता है । दुर्गा सप्तशती के मंत्र गूंजते हैं और जस गीत के मधुर धुन वातावरण को भक्तिमय बना देता है । नवें दिन प्रात-  इसी प्रकार से तीव्र चढावजस गीत गांए जाते हैं जिससे कि कई भगत मगन होकर बाना, सांग चढाते हैं एवं मगन होकर नाचते हैं । मंदिर से जवांरा एवं जोत को सर में उढाए महिलाएं कतारबद्ध होकर निकलती है गाना चलते रहता है । अखण्ड'योति की रक्षा करने का भार बइगा का रहता है क्योंकि पाशविक शक्ति उसे बुझाने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग करती है जिसे परास्त करने के लिये बईगा बम बम के भयंकर गर्जना के साथ नीबूचांवल को मंत्रों से अभिमंत्रित कर 'योति व जवांरा को सिर पर लिए कतारबद्ध महिलाओं के उपर हवा में फेंकता है व उस प्रभाव को दूर भगाता है । गीत में मस्त नाचते गाता भगतों का कारवां नदी पहुंचता है जहाँ 'योति व जवांरा को विसर्जित किया जाता है । पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ सभी माता को प्रणाम कर अपने गांव की सुख समृद्धि का वरदान मांगते हैं, सेऊक माता के बिदाई की गीत गाते हैं -
सरा मोर सत्तीमाय ओ छोडी के चले हो बन जाए
सरा मोर सत्ती माय वो ...
सम्पर्कः ए 40, खण्डेलवाल कालोनी, दुर्ग, मो. 09926615707

Jul 12, 2018

लतिका वैष्णव से बातचीत

लतिका वैष्णव से बातचीत
मोहक रंग संसार में लोकजीवन की चेतना
- संजीव तिवारी
जनजातीय चित्रकला में रुचि रखने वालों के बीच लतिका वैष्णव का नाम जाना पहचाना है। लतिका अपने चित्रों में बस्तर के आदिम राग को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त करती है। लोक तत्वों से परिपूर्ण उसके चित्रों, भित्ति चित्रों में लोक संगीत प्रतिध्वनित होती है। बस्तर के माटी की गंध से सराबोर लतिका के परिवार में बस्तर के विभिन्न लोक परंपरा से जुड़े कलाकार हैं। कला का यह संस्कार उसे इसी पारिवारिक परंपरा से प्राप्त हुआ है। उसकी यह पारंपरिक अभिव्यक्ति शैलीगत रूढ़ि के भीतर भी मौलिक है। हमने लतिका वैष्णव से इस संबंध में एक बातचीत की, प्रस्तुत है लोकचित्रकार लतिका वैष्णव से बातचीत के कुछ अंश -
बस्तर की लोक चित्रकला पर काम करने का विचार आपके मन में कैसे प्रकट हुआ?
मेरा जन्म अविभाजित बस्तर जिले के लगभग मध्य में स्थित छोटे-से नगर कोंडागाँव में हुआ जो आज सात जिलों में विभाजन के उपरान्त कोंडागाँव जिले के रूप में बस्तर सम्भाग का हिस्सा है। यह स्थान वर्षों से सांस्कृतिक नगरी के रूप में जाना जाता रहा है। कोंडागाँव नगर एवं इस जिले में ही सभी प्रकार की लोक कलाओं का समागम है, जो अन्य जिलों में बहुत कम देखने में आता है। मैं लोकचित्र-विधा से इसलिए जुड़ पाई क्योंकि मेरे पिता खेम वैष्णव एक प्रख्यात लोकचित्रकार, लोक संगीतकार एवं छायाचित्रकार भी हैं। मैंने जब से होश संभाला तब से मैंने हर पल अपने -आपको तूलिका, रंगों एवं लोकचित्रों के बीच पाया। इस तरह स्वाभाविक है कि मैं मेरी रुचि खिलौनों में कम और रंगों से खेलने में अधिक रही। फिर धीरे-धीरे कुछ ऐसा हुआ कि मेरी दैनिक गतिविधियों में पढ़ाई के साथ-साथ लोकचित्रकारी एक अनिवार्यता की तरह जुड़ गई। उम्र बढ़ने के साथ-ही-साथ लोकचित्रकला की बारीकियों की ओर अपने पिता के मार्गदर्शन में मेरा ध्यान केन्द्रित होता गया।
जैसा कि आप बता रही हैं कि आपका जन्म कोंडागाँव में हुआ, जो एक आदिवासी बाहुल्य जिला है। तो आपने अपने अध्ययन के साथ-साथ लोकचित्र की परम्परा को किस तरह से आत्मसात किया ?
यह मेरा परम सौभाग्य है कि मैं कोंडागाँव जैसी सांस्कृतिक नगरी में जन्मी हूँ तथा मुझे जन्म से ही विरासत के रूप में विभिन्न कलाओं को अपने पापा के माध्यम से जानने का अवसर मिला। कारण, आसपास के गाँवों में होने वाले लगभग हर महीने के मुख्य-मुख्य लोक एवं आदिवासी तीज-त्योहारों में, विवाह एवं अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में मेरा अपने पापा के साथ जाना होता रहा है। इन तीज-त्योहारों एवं अन्य प्रसंगों को मैं अपने बाल्यकाल से पापा के साथ देखती रही हूँ। इन्हें देखकर एवं अनुभव कर इनके  चित्रांकन के दृष्टिकोण से विभिन्न प्रतीकों को, जो मुझे बहुत ही आकर्षक लगते थे, उन्हें अपने ढंग से बनाकर या खींचकर उन चित्रों को  पापा को दिखाकर मार्गदर्शन लेती थी। समय-समय पर मम्मी के साथ भी विवाह, जन्म संस्कार एवं अन्य संस्कारों में भी जाना होता रहा है, जिसे मैं अपनी रुचि अनुसार ऑब्जर्व कर स्कैच कर लिया करती थी। इन्हें पापा के द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अनुसार संशोधित व परिमार्जित कर उसे प्रस्तुत करती थी। पापा मुझे प्रस्तुतीकरण की तकनीक भी बताया करते रहे हैं। सभी संस्कारों, कार्यक्रमों आदि को साक्षात रूप से देखने और उसे समझने का अवसर ही मेरे लिए एक ऐसा आधार बना जिसे मैं आत्मसात किए बिना नहीं रह सकी। 
चित्रकला के विभिन्न आयाम हैं किंतु आपने लोकचित्र को ही क्यों चुना ?
मेरे अध्ययन-काल में स्कूल में मुझे कई कार्यक्रमों में चित्रकला प्रतियोगिताओं में भाग लेना होता था। उन विषयों के अनुसार चित्र बनाना पड़ता था। किंतु बचपन से लोकचित्र बनाते हुए उन चित्रों में भी लोक जीवन का कुछ-न-कुछ अंश आ ही जाता था, जिसके कारण मुझे पुरस्कार के साथ-साथ प्रशंसा भी मिलती रही है। मुझे एक ऐसी पृष्ठभूमि जन्म से ही मिली, जिससे मेरा रुझान इस ओर ज्यादा हुआ। चित्रकला के विभिन्न आयामों में से अपने क्षेत्र की लोक कलाओं को विकसित करने का जो मेरे पापा का संकल्प था उसे मैंने भी चुनौती के रूप में स्वीकार कर आगे बढ़ाने का एक छोटा-सा प्रयास कर रही हूँ। वैसे तो फाइन आर्ट, कॉमर्शियल आर्ट, मॉडर्न आर्ट एवं अन्य विधाएँ चित्रकला में हैं, किंतु अपनी मिट्टी की पहचान बनाए रखने का जो संकल्प किया है, उसमें मैं अपना योगदान दे रही हूँ। इस विधा को जीवित रखना अत्यंत अनिवार्य है। कारण, यह विधा आज विलुप्त होने की कगार पर है।
जैसा कि बस्तर क्षेत्र में बेलमेटल, लौह शिल्प, काष्ठ शिल्प एवं अन्य शिल्प का विशेष महत्त्व वहाँ के समाज में प्रचलित है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक समस्त संस्कारों में परिलक्षित होता है। क्या लोक चित्र भी कहीं सभी संस्कारों में दिखाई पड़ता है?
यह आपने बहुत ही मार्मिक प्रश्न किया है जिसके उत्तर में मैं अपने अध्ययन से केवल इतना कहना चाहूँगी, कि जिस तरह बस्तर क्षेत्र में प्रचलित अन्य विधाओं को समाज के सभी संस्कारों में अंगीकृत किया हुआ है, जो मूर्त रूप में और स्थाई होने के कारण दिखाई पड़ता है। चूंकि लोक चित्र प्राय: मांगलिक अवसरों पर भित्ति एवं आंगन आदि पर चित्रित होते हैं और संबंधित प्रसंग सम्पन्न होने के साथ ये चित्र मिटा दिए जाते हैं। इस तरह इसमें स्थायीपन नहीं होने के कारण इसका विकाश शेष कलाओं के अनुरूप नहीं हो पाया है। किंतु जैसा कि हमारा संकल्प है, हम इसे अक्षुण्ण बनाने हेतु संकल्पित होने के साथ-साथ स्थायित्व प्रदान करने के लिए अभी भी जूझ रहे हैं। कारणइस विधा पर काम करने वाले कलाकार बहुत ही सीमित हैं तथापि इसे आगे बढ़ाने में काफी प्रयास करना पड़ रहा है। अब जहाँ इसके स्थायीकरण की बात आई है तो मैं आपको यह बताना चाहूँगी कि बस्तर क्षेत्र में प्रचलित अलिखित लोक महाकाव्य लक्ष्मी जगार, तीजा जगार, आठे जगार एवं बाली जगार में किए जाने वाले चित्रांकन के साथ-साथ अन्य संस्कारों में भी इसे अन्य रूप में जाना जाता है। बस्तर क्षेत्र के प्रख्यात लोक साहित्यकार हरिहर वैष्णव जो मेरे सौभाग्य से मेरे बड़े पिताजी (ताऊजी) हैं, ने उक्त चारों लोक महाकाव्यों का ध्वन्यांकन कर उसे लिपिबद्ध किया तथा देश के प्रख्यात प्रकाशन संस्थानों द्वारा इसका प्रकाशन भी किया गया है। इन जगारों की लोक गायिकाएँ (गुरूमाएँ)  अधिकांशत: पढ़ी लिखी नहीं हैं, जिन्हें लाखों पंक्तियाँ कंठस्थ रहती हैं। यह तथ्य अपने-आप में अकल्पनीय एवं अविश्वसनीय लगता है किन्तु सत्य यही है कि इन लोकगायिकाओं को ऊपर बताई गयी पक्तियाँ याद रहती हैं। इन्हीं लोक गायिकाओं (गुरूमाँओं) द्वारा गाए जाने वाले लोक महाकाव्य में लोक चित्र बनाने की परम्परा का प्रादुर्भाव देखने को मिलता है। जगार-आयोजन-स्थल पर बनाए जाने वाले चित्र जगार शैली के चित्रों के रूप में प्रचलित हुए हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सभी संस्कारों में क्षेत्र की विभिन्न जनजातियों के द्वारा बनाए जाने वाले चित्रों को हम पृथक- पृथक श्रेणी में रखते हैं। जिसे स्थानीय भाषा में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उदाहरण के तौर पर जमीन पर चावल और हल्दी के आटे से अंकित किए जाने वाले चित्रों को बाना/बाधा लिखना या फिर चऊँक(चौक) पूरना कहते हैं। कुछ अवसरों पर इसी आटे के घोल में हथेलियों को डुबाकर भित्ति अथवा मनुष्य या गोधन की पीठ पर बनाने वाले चिन्ह को हाता देना कहा जाता है। चावल के आटे के घोल में गिलास या कटोरी के ऊर्ध्व भाग को डुबोकर इनका चिन्ह गोधन के शरीर पर दियारी नामक त्यौहार पर दिए जाने की परम्परा है। विवाह के समय  चावल एवं हल्दी के आटे से किए जाने वाले चित्रांकन को चउंक पूरना कहा जाता है जबकि मृत्यु-संस्कार के समय किया जाने वाला चित्रांकन मरनी बाधा कहलाता है। इन सभी को हम थल चित्रों के नाम से जानते हैं। इसी तरह देह पर बनाए जाने वाले गोदना को देह चित्र कह सकते हैं। पुरातन काल में पत्थरों पर उकेर कर बनाए जाने वाले चित्र को शैलचित्र की श्रेणी में रखा गया है। बस्तर अंचल की गोण्ड जनजाति की माड़िया उपजाति के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति की मृत्यु होने पर उनकी स्मृति में बनाया जाने वाला चित्र मृतक-स्मृति-स्तंभ (माड़िया खम्भा) कहलाता है। भित्ति (दीवार) पर  बनाया जाने वाला चित्र भित्ति चित्र कहलाता है। जगार शैली के चित्रांकन के लिए किसी विशेष जनजाति अथवा जाति का होना आवश्यक नहीं है, किसी भी वर्ग की महिला अथवा पुरुष जगार गायकों, गुरूमाँओं के निर्देशानुसार चित्रांकन किया जाता है। अब चूंकि स्थायीकरण की बात आती है तो जगार आयोजन.स्थल में प्राय: आयोजन के बाद घरों की लिपाई-पोताई के समय उन चित्रों की भी पुताई कर दी जाती है, इसी तरह अन्य तीज-त्यौहरों या कार्यक्रमों में बनाए जाने वाले थल-चित्र भी अस्थाई होते हैं, जिसे कार्यक्रम के बाद मिटा दिया जाता है। गोंड जनजाति द्वारा बनाये जाने वाले मृतक-स्मृति-स्तंभ ही एक ऐसा स्थाई चित्रांकन है, जिसे उनकी (मृतक की) स्मृति में संरक्षित रखा जाता है। ठीक इसी तरह जगार शैली के लोक चित्रों को संरक्षित रखने के दृष्टिकोण से हमने इसे लुप्त होने से बचाने का प्रयास आरम्भ किया है। जिस तरह लोक साहित्यकार हरिहर वैष्णव द्वारा अलिखित लोक महाकाव्यों को लिखित रूप में प्रकाशन दिलाने का एक प्रयास किया गया है, ठीक इसी तरह हम चंद लोकचित्रकार भी इस लोक चित्रकला को अन्य विधाओं के समकक्ष रखने का प्रयास कर रहे हैं।
इस विधा के बारे में आपने अब तक जो बताया वह वास्तव में आपके गहरे अध्ययन को दर्शाता है इसे राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का भी प्रयास आपने किया है। इस परंपरा को कैसे संरक्षित और सवंर्धित किया जा सकता है? इस बारे में बताएँ।
मेरे पापा खेम वैष्णव, मैं और मेरी छोटी बहन रागिनी वैष्णव तथा मेरी फुफेरी बहन सरला यादव के अतिरिक्त राजेंद्र राव एवं सुरेन्द्र कुलदीप ऐसे लोक चित्रकार हैं जो इस विधा को जीवित रखने की दिशा में प्रयासरत हैं। आज के इस आधुनिकता, अंधानुकरण और प्रतिद्वंद्विता के चलते संस्कारों को बचाना कठिन तो लगता है किंतु संकल्प से सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह सत्य है। इसलिये इस वाक्य को ही दृढ़ता से हमें अमल में लाना अनिवार्य होगा तब जाकर इस विधा को संरक्षित किया जा सकता है। रही बात संवर्धन की, तो शासन के सहयोग के बिना इस दिशा में कुछ भी किया जाना असम्भव तो नहीं किन्तु कठिन अवश्य ही लगता है। 
आपके द्वारा बनाए गए लोकचित्रों का प्रदर्शन, प्रकाशन के साथ अब तक आपने कहाँ कहाँ चित्रांकन किया है ? अपनी उपलब्धियों के विषय में बताएँ।
मेरे द्वारा बस्तर अंचल के 'तीजा जगार'लछमी-जगारकी कथाओं के चित्रांकन किये गये हैं। इसी तरह विभिन्न तीज-त्यौहारों, जनजीवन, मेला-मड़ई, देवी-देवताओं, जतरा आदि विषयों पर केन्द्रित लोकचित्रों की प्रदर्शनी संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के कला वीथिका में हुई है। इसका शुभारंभ ललित कला अकादमी नई दिल्ली के चेयरमेन डॉ. के. के. चक्रवर्ती द्वारा किया गया। मेरे लोकचित्र भिलाई इस्पात संयंत्र के नेहरू आर्ट गैलरी, भिलाई में भी प्रदर्शित हुए है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग पारम्परिक व्यजंन आस्वादन केन्द्र 'गढ़कलेवा’, स्वच्छ भारत मिशन अन्तर्गत 'हमर-छत्तीसगढ़’, एवं केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री जे. पी. नड्डा के दिल्ली निवास में चित्रांकन किया गया। जवाहर नवोदय विद्यालय, कुरूद में 'बस्तर आदिवासी पेटिंग कार्यशालामें करीब 200 छात्र-छात्राओं को एक माह तक तक प्रशिक्षण दिया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित बस्तर की भतरी बोली पर आधारित बाल लोककथा 'बालमतिर भईंसके लिए आवरण चित्र निर्माण, लोक महाकाव्य लछमी-जगार के लिए आवरण पृष्ठ तैयार किया गया, जिसका प्रकाशन साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा किया गया। पाठ्य पुस्तक निगम द्वारा प्रकाशित 5 अंको के लिए लोकचित्र पर आधारित आवरण पृष्ठ।  सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र नई दिल्ली के गुरु-शिष्य परम्परा अन्तर्गत 3 वर्षों तक फेलोशिप प्राप्त। दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर द्वारा गुरु-शिष्य-परम्परा अन्तर्गत गुरु/प्रशिक्षक के रूप 6 माह तक 4 चार शिष्यों को प्रशिक्षित किया। राज्य स्वास्थ्य संसाधन केन्द्र, रायपुर द्वारा प्रकाशित, 12 एवं राज्य संसाधन केन्द्र, रायपुर द्वारा प्रकाशित 8 पुस्तकों के आवरण-चित्र एवं भीतरी रेखांकन/ चित्रांकन का कार्य किया। यूनिसेफ के लिए 5 फिलिप चार्ट (चित्रांकन एवं रेखांकन) का निर्माण। स्वास्थ्य सेवायें, छत्तीसगढ़ शासन के लिए संदर्शिका, पोस्टर निर्माण। 
आपके पारिवारिक माहौल के बारे में बताएँ। आप एक घरेलू महिला होते हुए भी अपनी कला-साधना के लिए कैसे समय निकाल पाती हैं
मेरा पारिवारिक माहौल आरम्भ से यानी मेरे दादा जी के समय से ही सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं पारंपरिक रहा है। इसकी वजह से महिला एवं पुरुष में कोई अंतर अथवा भेदभाव न करते हुए सभी को समान रूप से उनके कर्त्तव्यों एवं अधिकारों को निभाने में भरपूर सहयोग मिला है। यही कारण है कि मुझे भी इस क्षेत्र में पूरी स्वतंत्रता मिली सकी। यह कला मुझे पारंपरिक रूप से विरासत में प्राप्त हुई है। मैं चाहती हूँ कि हर परिवार में, विशेषकर महिलाओं को, ऐसा माहौल मिले जिससे कला, साहित्य एवं संस्कृति, और विशेष रूप से लुप्तप्राय विधाओं को संरक्षित करने सहायता मिले। इसके लिए महिलाओं को भी पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। ऐसा होने पर ही समाज में हम अपनी परंपरा को रचनात्मक ढंग से भावी पीढ़ी तक हस्तांतरित कर सकते हैं। आज के अत्याधुनिक और यान्त्रिक युग में प्रत्येक व्यक्ति पैसे के पीछे भाग रहा है और अपनी विलासिता की वस्तुओं को संगृहीत करने में जुटा हुआ है। ऐसे कठिन समय में न केवल पुरुषों अपितु महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी, अपना घरेलु दायित्व निभाते हुए भी कला एवं संस्कृति के विस्तार, संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में सुनिश्चित करनी चाहिए।
लेखक के बारे में: हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध ब्लॉगर। लम्बे अरसे से छत्तीसगढ़ की लोक कला/संस्कृति पर निरन्तर लेखन। विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। छत्तीसगढ़ी भाषा की आनलाइन पत्रिका 'गुरतुर गोठ डाट कामप्रकाशन एवं संपादन, हिन्दी ब्लॉनग 'आरंभका संचालन। दुर्ग, छत्तीसगढ़ में रहते हैं। 

Mar 10, 2017

…और हर साल गाँव पहुँच जाता हूँ...

और हर साल गाँव पहुँच जाता हूँ...
- संजीव तिवारी
छत्तीसगढ़ सहित भारत के सभी गाँवों में होली का पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, विकास की बयार गाँवों तक पहुँच गई है किन्तु उसने समाज में स्वाभाविक ग्रामीण भाईचारा को भी उड़ा कर गाँवों से दूर फेंक दिया। इसके बावजूद रंगों के इस त्यौहार का अपना अलग मजा है और गाँव में तो इस पर्व का उल्लास देखने लायक रहता है। गाँव मेरे रग-रग में बसा हैं इसलिए मेरे 13 वर्षीय पुत्र के ना-नुकुर के बावजूद हम छत्तीसगढ़ के शिवनाथ नदी के तीर बसे अपने छोटे से गाँव में चले गये होली मनाने ।
मुझे अपने बीते दिनों की होली याद आती है जब हम सभी मिलजुल कर गाँव के चौपाल में होली के दिन संध्या नगाड़े व मांदर के थापों के साथ फाग गाते हुए होली मनाते थे। समूचा गाँव उड़ते रंग-अबीर के साथ नाचता था। तब न ही हमारे गाँव में बिजली के तारों नें प्रवेश किया था और न ही ध्वनिविस्तारक यंत्रों का प्रयोग होता था। गाँव में प्रधान मंत्री पक्की सडक के स्थान पर गाडा रावनव एकपंइया (पगडंडी) रास्ता ही गाँव पहुचने का एकमात्र विकल्प होता था फिर भी इलाहाबाद, आसाम, जम्मू, कानपूर, लखनऊ और पता नहीं कहाँ कहाँ से कमाने खाने गए गाँव के मजदूर होली के दिन गाँव में एकत्रित हो जाते थे। अद्भुत भाईचारे व प्रेम के साथ एक दूसरे के साथ मिलते थे और फागगाते हुए रंग खेलते थे। नशा के नाम पर भंग के गिलास बँटते थे और अनुशासित उमंग व मस्ती छाये लोगों का हूजूम मिलजुलकर होली खेलता था।
अब गाँव में वो बात नहीं रही, आधुनिकता नें परंपराओं को पछाड़ दिया, बडे बुजुर्ग अपने गिर चुके दाँतों और ढ़ीली पड़ गई लगाम का रोना रोते हुए इसे त्यौहार के रूप में स्थापित करने पर तुले हुए हैं पर गाँवों में गली-गली खुले शराब के अवैध दुकान के प्रभाव से गाँव के लोगों को अब यह लगने लगा है कि होली, शराब के बिना अधूरी है। शराब से मदमस्त गाँव में होली का मतलब सिर्फ हुडदंग रह गया है। रंग में सराबोर गिरते-पड़ते, उल्टियाँ करते, लड़ते-झगड़ते लोगों का अमर्यादित नाट्य प्रदर्शन ।
इन सब का दंश झेलते होली के दिन संध्या तीन बजे मेरे चौपाल पहुँचने से अंधेरे घिर आने तक तीन जोड़ी सार्वजनिक नगाड़े फूट चुके थे। शराब में धुत्त लोग फागके नाम पर नगाड़ों पर, अपनी शक्ति आजमाइश कर रहे थे। शिकायतों व लड़ाईयों में समय सरकता जा रहा था। सार्वजनिक चौपाल में फागसुनने को उद्धत मन को तब सुकून मिला जब मित्रों नें मौखिक शक्ति प्रदर्शन किया और ईश्वर नें भी शराबियों को पस्त किया। और सभी रंजों को भुलाकर धुर ग्रामीण 'फागका मजा हमने लिया ।
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल...
पवन चले अलबेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल...
(बसंत में गोरी के बाल कंधों से उड़-उड़ रहे हैं क्योंकि अलबेला पवन चल रहा है)
पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष बहुत इंतजार व उदासी के बाद प्राप्त इन्हीं क्षणों से बार-बार साक्षातकार के बाद सोचता हूँ कि अब अगले साल गाँव नहीं आउँगा। पर जड़ों को पकड़े रहना पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है और हर साल गाँव पहुँच जाता हूँ।
Email- tiwari.sanjeeva@gmail.com

Mar 15, 2016

छत्तीसगढ़ में फाग

 राधे बिन होरी न होय

                                         - संजीव तिवारी

लोक गीत किसी भी भौगोलिक क्षेत्र की संस्कृति का ऐसा अभिन्न अंग हैं जिनमें हमारी प्रकृति व परम्पराओं की स्पष्ट झलक नजर आती है।
 छत्तीसगढ़ में लोकगीतों की समृद्ध परम्परा कालांतर से लोक मानस के कंठ कठ में तरंगित है। करमा, ददरिया जैसे सदाबहार गीत एवं भोजली, गौरा, जस व फाग गीत जैसे त्यौहारों पर गाये जाने लोक गीतों का अपना अपना महत्त्व है। वाचिक परम्परा के रूप में सदियों से यहाँ के किसान- मजदूर पारम्परिक लोकगीतों को गाते आ रहे हैं जिसमें प्यार है, चुहलबाजी है, शिक्षा है और समसामयिक जीवन का प्रतिबिम्ब भी है क्योंकि लोकगीत जन के मन में उल्लास व आनंद के साथ ही अपनी परम्पराओं को भी जीवंत रखने व लोक-शिक्षण का काम करती है। लोक-जीवन की स्पष्ट झलक लोक-गीतों में ही मुखरित होती है जिससे किसी क्षेत्र विशेष की सामाजिक जीवन को परखा व समझा जा सकता है। ऐसे सभी तत्वों को समेटा हुआ, ॠतुराज बसंत के आगमन में गाए जाने वाला, हमारा लोकगीत फाग है।
भारत के कोने कोने में फागुन में फाग गीत गाये जाते हैं एवं सभी स्थानों के फाग गीतों की विषय वस्तु राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंगों ही होते हैं । छत्तीसगढ़ के भी गली- गली में नगाड़े की थाप के साथ राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंग भरे फाग गीत जन- जन के मुँह से बरबस फूटने लगते हैं। बसंत पंचमी को गाँव के बईगा द्वारा होलवार में पूजा करने के बाद शुरू फाग गीत प्रथम पूज्य गणेश के आह्वान से साथ स्फुटित होता है-
गनपति को मनाव, गनपति को मनाव / प्रथम चरण गनपति को / काखर पुत गनपति ये, काखर हनुमान / काखर पुत भैरव हैं, काखर भगवान / प्रथम चरण गनपति को / गौरी पुत गनपित है, अंजनी के हनुमान / देवी सतालिका पुत भैरव हैं, / कौसिल्या के हैं राम / प्रथम चरण गनपति को ।
पद- राग और सुर- ताल के साथ फाग का आगाज होता है-
 'सुरू से पद अउ रागन मैं गावव, मैं गांववन सिरि रे गनेस’फाग तो आरंभ हो गया किन्तु राधा- कृष्ण नहीं आये हैं, वे मित्रों के साथ कुंजन में होरी खेल रहे है, राधा के बिना होली अधूरी है, जाओ मित्र उसे बुला लाओ, क्योंकि राधा के पीछे- पीछे कान्हा दौड़ै चले आयेंगें-
दे दे बुलउवा राधे को, / सुरू से दे दे बुलउवा राधे को / राधे बिन होरी न होय, / राधे बिन होरी न होय, दे दे बुलउवा राधे को।
फाग अपने यौवन में है नगाड़ा धड़क रहा है, राधा के आते ही उत्साह चौगुना हो जाता है। राधा किसन होरी खेलने लगते हैं, गायक के साथ मस्ती में डूबे वादक दो जोड़ी, तीन जोड़ी फिर दस जोड़ी नगाड़े को थाप देता है-  बजे नगाड़ा दस जोड़ी, राधा किसन खेले होरी। कृष्ण के शरारती प्रसंगों को गीतों में पिरो कर छत्तीसगढ़ का फाग जब नगाड़े से सुर मिलाता है तो बाल- युवा- वृद्ध जोश के साथ होरी है... होरी है.... कहते हुए नाचने लगते हैं, रंगों की बरसात शुरू हो जाती है -
छोटे से श्याम कन्हैया हो, / छोटे से श्याम कन्हैया मुख मुरली बजाए, / मुख मुरली बजाए छोटे से श्याम कन्हैया ! / छोटे मोटे रूखवा कदंब के, डारा लहसे जाए डारा लहसे जाए/ ता उपर चढके कन्हैंया, मुख मुरली बजाए मुख मुरली बजाए / छोटे से श्याम कन्हैया / सांकूर खोर गोकुल के, राधा पनिया जाए राधा पनिया जाए / बीचे में मिलगे कन्हैया, गले लियो लपटाए तन लियो लपटाए, छोटे से श्याम कन्हैया।
छत्तीसगढ़ में फागुन के लगते ही किसानों के घरों में तेलई चढ़ जाता है अईरसा, देहरौरी व भजिया नित नये पकवान, बनने लगते हैं । युवा लड़के राधा किसन के फाग गीतों में अपनी नवयौवना प्रेमिका को संदेश देते हैं तो साथ में गा रहे बुजुर्ग फागुन के यौवन उर्जा से मतवारी हुई डोकरी को उढ़रिया भगा ले जाने का स्वप्न सजाते हैं-
तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया, / तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया / फागुन के रे तिहार, तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया / कउने हा मारे नजरिया, कोने सीटी रे बजाए / कउने भगा गे उढरिया, फागुन के रे तिहार ... / टूरी हा मारे नजरिया, टूरा सीटी रे बजाए / डोकरी भगा गे उढ़रिया, फागुन के रे तिहार ....
छत्तीसगढ़ में लड़कियाँ  विवाह के बाद पहली होली अपने माता पिता के गाँव में ही मनाती है एवं होली के बाद अपने पति के गाँव में जाती है इसके कारण होली के समय गाँव में नवविवाहित युवतियों की भीड़ रहती है । इनमें से कुछ विवाह के बाद पति से अनबन के चलते अपने माता पिता के गाँव में बहुत दिनों से रह रही होती हैं । विवाहित युवा लड़की किसी अन्य लड़के से प्रेम करती है जिसके साथ रहना चाहती है पर गाँव के लड़के उसकी अल्हड़ता व चंचलता से जलते है वे उस लड़की की दादी से कहते हैं -
ये टूरी बड़ा इतरावथे रे, / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना / येसो गवन येला दे देते बूढ़ी दाई, / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना/ कहंवा हे मईके कहवां ससुरार हे / कहंवा ये जाही भगा के ओ बूढ़ी दाई / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना / रईपुर हे मईके दुरूगा ससुरार हे / भेलई ये जाही बना के ओ बूढ़ी दाई / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना।
फाग गीतों के प्रेम में चुहलबाजी भी है, केदार यादव के गाये ददरिया गीत को भी नगाड़े के चोट पर फाग का रूप दिया जाता है और मोहनी खाये टूरा मन नाचने लगते हैं-
का तै मोला मोहनी डार दिये गोंदा फूल / का तै मोला मोहनी डार दिये ना / रूपे के रूखवा म चढि़ गये तैं हा / मन के मोर मदरस ला झार दिये गोंदा फूल / का तै मोला मोहनी डार दिये ना।
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला अब गोरि के उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल / पवन चले अलबेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल / (बसंत में गोरी के बाल कंधों से उड़- उड़ रहे हैं क्योंकि अलबेला पवन चल रहा है)
फाग में प्रेम प्रसंग के साथ प्रेमिका को पाने के लिए शौर्य प्रदर्शन के प्रतीक रूप में जन जन के आदर्श आल्हा- उदल भी उतर आते हैं। खांडा पखाडते हुए आल्हा, उदल की प्रमिका सोनवा को लाने निकलता है, मस्ती से झूमते युवक गाते हैं -
उदल बांधे हथियार, उदल बांधे तलवार / एक रानी सोनवा के कारन / काखर डेरा मधुबन में, / काखर कदली कछार / काखर डेरा मईहर में, उदल बांधे तलवार ..... / आल्हा के डेरा मधुबन में, उदल कदली कछार / सोनवा के डेरा मईहर में, उदल बाँधे तलवार .....
प्रेम रस से सराबोर इस लोकगीत में बाल- युवा- वृद्ध सब पर मादकता छा जाती है पर उन्हें अपने प्रदेश व देश पर नाज है । राष्ट्रपिता के अवदान स्वरूप प्राप्त आजादी का मतलब उन्हें मालूम है, अंग्रेजों के छक्के छुडाने वाले गाँधी बबा भी फाग में समाते हैं -
गाँधी बबा झंडा गढ़ा दिये भारत में / अगरेज ला चना रे चबाय, अंगरेज के मजा ला बताए / गाँधी बबा झंडा गढा दिये भारत में / गडवईया गडवईया, गडवईया जवाहर लाल / गाँधी बबा झंडा गढा दिये भारत में ।
वाचिक परम्परा में सर्वत्र छाये इस लोकगीत में समय काल व परिस्थिति के अनुसार तत्कालीन विचार व घटनाएँ भी समाती रही हैं । चीन के आक्रमण के समय गाँवों में गाये जाने वाले एक फाग गीत हमें पोटिया गाँव के देवजी राम साहू से सस्वर सुनने को मिला आप भी देखें -
भारत के रे जवान, भारत के रे जवान / रक्षा करव रे हमर देस के / हमर देसे ला कहिथें सोनेकर चिरिया / चीनी नियत लगाए, चीनी नियत लगाए / मुह फारे देखे पाकिस्तान ह, येला गोली ले उडाव
येला गोली ले उडाव, नई रे ठिकाना हमर देश के / भारत के रे जवान, भारत के रे जवान .....
आजादी की लड़ाई, गांधी जी के सत्याग्रह, आल्हा उदल की लड़ाई के साथ समसामयिक विषयों का भी समावेश समयानुसार फाग में होता है -
अरे खाड़ा पखाड़ो दू दल में, आल्हा खाड़ा पखाड़ो दू दल में / उदल के रचे रे बिहाव, आल्हा खाड़ा पखाड़ो दू दल में।
रेलगाड़ी मजा उड़ा ले टेसन में / तोर धुआं उडय़ रे अकास,/ रेलगाड़ी मजा उड़ा ले टेसन में ।
फाग गीतों में आनंद रस घोलने का काम आलाप एवं कबीर से होता है। बीच बीच में अरे रे रे ..... सुन ले मोर कबीर से शुरू कबीर के दोहों को उच्च स्वर में गाया जाता है एवं पद के अंतिम शव्दों को दोंहों में शामिल कर फाग अपने तीव्र उन्माद में फिर से आ जाता है । कभी कभी राधा- कृष्ण के रास प्रसंग तो कभी प्रेम छंद भी कबीर के रूप में गाए जाते हैं। आलाप फाग शुरू करने के पहले उच्च स्वर में विषय वस्तु से सम्बन्धित छोटे छंद या पदों के रूप में किसी एक व्यक्ति के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है यथा-
लाली उड़य चुनरिया गोरी, लाली लाली बाती / रंग तो मैं हर लगाहूँ रंगरेली, जाबे केती केती हो...
 प्राय:  उसी के द्वारा उस गीत को उठाया, अर्थात शुरू किया जाता है । सरररा.... रे भाई सुनले मोर कबीर... के साथ चढ़ाव में बजते मादर में कुछ पलो के लिए खामोशी छा जाती है गायक- वादक के साथ ही श्रोताओं का ध्यान कबीर पढऩे वाले पर केन्द्रित हो जाती है। वह एक दो लाईन का पद सुरीले व तीव्र स्वर में गाता है। यह कबीर या साखी फाग के बीच में फाग के उत्साह को बढ़ाने के लिए किसी एक व्यक्ति के द्वारा गाया जाता है एवं बाकी लोग पद के अंतिम शब्दों को दुहराते हुए साथ देते हैं। इसके साथ ही कबीर के दोहे या अन्य प्रचलित दोहे, छंद की समाप्ति के बाद पढ़े जाते है पुन-  वही फाग अपने पूरे उर्जा के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुच जाता है। उतार चढ़ाव के बीच प्रचलित कबीर कुछ ऐसे प्रस्तुत होते हैं -
बिन आदर के पाहुना, बिन आदर घर जाए कि यारों बिन आदर घर जाए ।
मुँहु मुरेर के पानी देवय, अउ कुकुर बरोबर खाय कि यारों कुकुर बरोबर खाय।।
आधा रोटी डेढ़ बरी, सब संतन मिल खाय, कि यारों सब संतन मिल खाय।
आधा रात को पेट पिरावय, त कोलकी डहर जाए कि यारों कोलकी डहर जाए ।।
ललमुही टूरी बजार में बईठे, हरियर फीता गुथाय कि यारों हरियर फीता गुथाय।
वो ललमुही टूरी ला देख के, भइया सबके मुह पंछाय कि यारों सबके मुह पंछाय।।
पातर पान बम्भूर के, केरा पान दलगीर कि यारों केरा पान दलगीर।
पातर मुँह के छोकरी, बात करे गंभीर कि यारों बात करे गंभीर।।
होली की रात, होली जलने पर गाँव के होलवार में होले डांड तक यानी होलिका की सीमा तक, अश्लील फाग भी गाया जाता है ।यह अश्लील गीत होलिका के प्रति विरोध का प्रतीक है, होलिका को गाली देने के लिए सामूहिक स्वर में नारे लगाए जाते हैं , इसीलिए यहां किसी को गंदी गंदी गाली देने पर 'होले पढ़त हसकहा जाता है। होलिका के जलने से लेकर सुबह तक ये गीत चलते हैं फिर होलिका के राख को एक दूसरे पर उड़ाते हुए फाग गाते हुए गाँव तक आते हैं गाँव में आते ही इसकी अश्लीलता समाप्त हो जाती है । गोरी ओ तोर बिछौना पैरा के”साथ कुछ चुहलपन साथ रहती है -
मेछा वाले रे जवान, पागा वाला रे जवान / मारत हे अंखियाँ कच ले बान / कहंवा ले लानबोन लुगरा पोलका, / कहंवा ले लाबो पान / रईपुर ले लानबोन लुगरा पोलका, / दुरुग ले पान/ कहंवा ले लानबोन किसबिन, / कहंवा के रे जवान कहंवा के जवान / मारत हे अंखियां कच ले बान ।
छत्तीसगढ़ में फाग के लिए किसबिन यानी नर्तकी को बुलाया जाता था पूर्व में फागुन में नाच गान करने वाली किसबिनो का पूरा का पूरा मुहगा किसी किसी गांव में होता था जहां से किसबिन को निश्चित पारिश्रमिक पर लगा कर फाग वाले दिनो के लिए लाया जाता था । किसबिने मांदर की थाप पर नृत्य पेश करती थी -आमा के डारा लहस गे रे.... और जवान उस पर रंग गुलाल उडाते थे। कालांतर में यह प्रथा कुछ कुत्सित रूप में सामने आने लगी थी , अत: अब किसबिन नचाने की प्रथा लगभग समाप्त हो गई है । आधुनिक प्रयोगों में पुरुषों के साथ ही महिलाओं के द्वारा भी फाग गाया जा रहा है । सीडी- कैसेटों के इस दौर में फाग के ढेरों गीत बसंत पंचमी के साथ ही छत्तीसगढ़ में गूंजने लगा है मेरा मन भौंरा भी रुनझुन नाचता गाता हुआ फाग में मदमस्त है।
बसंत पंचमी से धड़के नगाड़े और उड़ते गुलालों की रम्य छटा होली के दिन अपने पूरे उन्माद में होता है। गाँव के चौक- चौपाल में गुंजित फाग होली के दिन सुबह से देर शाम तक अनवरत चलता है।  रंग भरी पिचकारियों से बरसते रंगों एवं उड़ते गुलाल में मदमस्त छत्तीसगढ़ अपने फागुन महराज को अगले वर्ष फिर से आने की न्यौता देता है-
अब के गये ले कब अईहव हो, अब के गये ले कब अईहव हो / फागुन महराज, फागुन महराज, / अब के गए ले कब अईहव / कामे मनाबो हरेली, कामे तीजा रे तिहार / कामे मनाबो दसेला, कब उडे रे गुलाल। अब के गये ले कब अईहव हो.../ सावन मनाबो हरेली, भदो तीजा रे तिहार/ क्वांर मनाबो दसेला, फागुन उड़े रे गुलाल। अब के गये ले कब अईहव हो.....
छत्तीसगढ़ का फाग इतना कर्णप्रिय है कि इसे बार बार सुनने को मन करता है । आजकल पारम्ंपरिक फाग गीतों सहित नये प्रयोगों के गीतों के ढेरों कैसेट- सीडी बाजार में उपलब्ध हैं जिससे हमारा यह लोकगीत समृद्ध हुआ है । पूर्व प्रकाशनों में फील्ड सांग्स आफ छत्तीसगढ़ व इसका हिन्दी अनुवाद छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का अध्ययन-  श्यामा प्रसाद दुबे, लोक गाथा-  सीताराम नायक, छत्तीसगढ़ के लोकगीत-  दानेश्वर शर्मा व फोक सांग्स आफ छत्तीसगढ़-  वेरियर एल्विन सहित छत्तीसगढ़ी लघु पत्रिकाओं में झांपी-  जमुना प्रसाद कसार, लोकाक्षर-  नंदकुमार तिवारी, छत्तीसगढ़ी -  मुक्तिदूत आदि एवं छत्तीसगढ़ के समाचार पत्रों के फीचर पृष्ठों में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी फाग संगृहीत हैं ;किन्तु जिस तरह से ददरिया व जस गीतों पर कार्य हुआ है वैसा कार्य फाग पर अभी भी नहीं हो पाया है इसके संकलन व संर्वधन एवं संरक्षण की आवश्यकता है।

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