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Aug 1, 2026

हाइबनः अगले जनम...

  -  प्रियंका गुप्ता 

आज सुबह सोकर उठी तो आँगन में दीदी की अजीब सी गुनगुनाहट आ रही थी...अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो...। आवाज़ कुछ रुँधी थी या फिर माँजे जा रहे बर्तनों और नल के पानी का शोर था, तुरन्त समझ नहीं पाई। पास जाकर देखा तो दीदी की आँखों से टपाटप आँसू गिर रहे थे। मैं घबरा गई थी...दी और आँसू...इम्पॉसिबिल...। मेरी दी तो कितनी हँसमुख हैं...हमेशा खिलखिलाने वाली...फिर आज क्या हो गया?

उनके हाथ से भगौना छीनकर मैंने किनारे डाल दिया, "बताओ दी, क्या हुआ...? रो क्यों रही...?"

कुछ बोलने की बजाय दी की सुबकियाँ बँध गई। मेरा जी घबराने लगा...कहीं किसी प्यार-व्यार का चक्कर तो नहीं? पर नहीं...अगर ऐसा होता तो दी मुझे तो ज़रूर बताती...तो फिर...?

"तुम्हें मेरी कसम दी, बताओ तो...मेरा दिल घबरा रहा है...।" मैंने अपने हाथों में उनका चेहरा लेकर जबरिया अपनी ओर घुमा दिया।

किसी तरह शान्त होकर दी ने जो बताया, उसका लब्बोलुआब ये था- कल शाम को जब दी ऑफ़िस से लौट रही थी, तो रिक्शे की तलाश करते-करते वो पैदल ही चली जा रही थी। थोड़ा झुटपुटा हो गया था, सो सावधानीवश उन्होंने सूट की चुन्नी से अपना सिर और मुँह भी लपेट लिया था। तभी जाने कहाँ से पीछे से आता एक साइकिल सवार मानो जानबूझकर उनके ऊपर गिर पड़ा। इस गिरने की एक्टिंग के दौरान उसके लिजलिज़े हाथ दी के शरीर पर जिस तरह से रेंग गए, बताते-बताते दी गिनगिनाहट से भर गई।

"तुम्हें उसे घुमाकर एक थप्पड़ देना था दी...वो कमीना भी याद रखता ज़िन्दगी भर...।" सुनकर मैं गुस्से से तमतमा गई।

"मारा था गुड़िया, उस समय मेरा भी यही इंस्टेण्ट रियक्शन था...पर जानती हो, उस बेशर्म, घिनौने इंसान ने क्या किया...? मेरा हाथ पकड़कर चूम लिया और फिर जो कहा न...वो मैं बोल नहीं पाऊँगी। मेरे मन और तन दोनों से उसके गन्दे, घिनौने स्पर्श की याद नहीं जा रही। मुझे अपने लड़की होने से नफ़रत हो रही। न मैं लड़की होती, न कोई मेरे साथ ऐसा करता। क्या जीवन में आगे बढ़ने, कुछ करने का सपना देखना एक लड़की के लिए गुनाह है...? क्या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, जन्म से लेकर मौत तक हम सिर्फ भय में जीते रहेंगे? क्या तन-मन से जीवन भर किसी पुरुष के अधीन रहकर, उसकी चाकरी करना ही हमारी नियति है...? क्या हम इंसान नहीं...? इंसान के नाम पर हमारे समाज में खुले घूम रहे हैवानों को काबू में करने की बजाए सिर्फ हम लड़कियों पर बन्दिशें क्यों लगाई जाती हैं...? क्यों सिर्फ हमें सिखाया जाता है कि हम कैसे हँसे-बोलें, कैसे पहने ओढ़ें, कैसे घुटकर जिएँ...? क्यों नहीं लड़कों को बचपन से सिखाया जाता कि एक लड़की भी जीने का हक़ रखती है, खुली हवा में साँस लेने की चाहत होती है उसे...और सबसे बड़ी बात...एक लड़की भी इंसान है...।"

मैं तो दी की बात से निरुत्तर हूँ अब तक...आप के पास इसका जवाब है कोई...?

अगले जन्म

बेटी होकर जीना

चाहेगा कौन?

सम्पर्कः ‘प्रेमांगन’, एम आई जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र)


Aug 1, 2025

हाइबनःनदी का दर्द

  - डॉ. सुरंगमा यादव

बदरीनाथ धाम के लिए हम सब बदायूँ से सुबह सात बजे निजी वाहन से निकले। हल्द्वानी तक तो पहाड़ी और मैदानी रास्तों में अधिक अंतर पता न चला; परन्तु उसके बाद हम जैसे -जैसे ऊपर चढ़ते गए, पहाड़ काटकर बनाए  गए गोल घुमावदार रास्ते रोमांच मिश्रित भय की अनुभूति कराने लगे। जब गाड़ी ओवरटेक होती, तो नीचे गहरी खाई देखकर जान ही सूख जाती। पहाड़ों से बहते हुए झरने दुग्ध की धवल धार से प्रतीत हो रहे थे। मन में सहसा प्रश्न  उठा, अपने  अंतस्तल से निर्मल, शीतल, शुद्ध जलधार प्रवाहित करने वाले पहाड़ों को कठोर क्यों कहते हैं? दूर तक फैले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर बहते हुए झरनों की पतली धार आँसुओं की सूखी रेखा-सी  प्रतीत हो रहे थे। शायद अपनी ऊँचाई  के कारण एकाकी पहाड़ स्वयं को ही अपना सुख-दुःख सुनाकर हँसते-रोते रहते हैं।  जागेश्वर जी पहुँचते- पहुँचते अँधेरा हो गया। ड्राइवर ने रात्रि में आगे चलने से मना किया, तो हम लोग रात्रि विश्राम के लिए वहीं रुक गए। प्रातः हमने अपनी यात्रा पुनः शुरू की।  दोपहर होते- होते हम उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बदरीनाथ धाम पहुँच गए। अलकनंदा  का जल हल्का हरा रंग लिये हुए इतनी तीव्र गर्जना और वेग के साथ बह रहा था, मानो पहाड़ रूपी पिता के घर से विदा लेते समय मन में भावनाओं का रेला उमड़ पड़ा हो। जल इतना निर्मल कि उसमें पड़े हुए पत्थर भी साफ नजर आ रहे थे। यही पहाड़ी नदियाँ सागर से मिलने की आतुरता में अपने मैदानी सफर में कितनी मलिन हो जाती हैं!

सागर दूर

मैदानों संग नदी

हुई बेनूर।


May 2, 2025

हाइबनः प्रवासी पक्षियों का आश्रय चिल्का झील

  - अंजू निगम 

उड़ीसा के चंद्रभागा तट से टकराती समुद्र की उत्कट लहरें। कतार में लगे, हवा के साथ दौड़ लगाते नारियल के विशालकाय वृक्ष। इन वृक्षों के समानांतर चलती सीधी-सपाट सड़क, चिल्का झील तक पहुँचती है। चिल्का का विहंगम दृश्य मन को सम्मोहित कर गया। सैलानियों का जमावड़ा और जल- क्रीड़ा करते प्रवासी पक्षी। ईश्वर ने मानो किसी कुशल चितेरे- सा प्रकृति को अनंत तक कैद कर रखा हो। दूर तक फैला जल- क्षेत्र और क्षितिज से मानो होड़ करता, धुँधला- सा नजर आता एशिया का सबसे बड़ा लैगून।

लैगून देखने की उत्सुकता लगभग हर सैलानी को थी। हम भी इतनी दूर लैगून को पास से देखने की इच्छा लेकर ही आए थे। नीली, साफ, स्वच्छ चिल्का झील और  समुद्र के पानी का खारापन आपस में मिल, जीवन का एक सुदंर संदेश दे रहे थे। मीठा और खारा भी आपसी सामंजस्य स्थापित कर एक- दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार कर, साथ साथ प्रवाहित हो रहे थे।

चिल्का की झील

प्रवासी पक्षियों को

देती आश्रय     ■


Apr 1, 2025

हाइबनः तुम बहुत याद आओगे

  - प्रियंका गुप्ता

उस रात जाने क्यों मन थोडा उदास- सा था...अजीब सी बेचैनी। बहुत सारी बातें थी मन में; पर समझ नहीं आ रहा था कि बेचैनी थी आखिर किस बात पर। अजीब- सा अहसास। बहुत हद तक कारण अगले दिन समझ आ गया,जब शैडो के जाने की ख़बर मिली।

शैडो, कहने को किसी को जो हिकारत से कहा जाता है, वह था। यानी कि गली का कुत्ता, स्ट्रीट डॉग था वह। मेरी गली का एक वफादार बाशिंदा। बहुत सारे इंसानों से ज्यादा भावनाएँ मैंने उसमें देखी थी। इंसानी हिसाब से देखा जाए, तो वो एक दीर्घायु जीकर गया। तेरह साल की उम्र, जब कुत्तों की अधिकतम आयु शायद चौदह साल ही होती है।

अंतिम के तीन दिन, जब उसने खाना-पीना छोड़ा, उसके पहले तक वो सचमुच शैडो बनकर मेरे साथ चला। नाम उसका वैसे मोती था; पर जब वह इस मोहल्ले में आया था, जाने कैसे चुनमुन ने उसे `शैडो' बुलाना शुरू कर दिया था। वह अपने दोनों नाम पहचानता था, बातें समझता था। रात को मेरे गेट का ताला बंद होने से पहले अगर किसी दिन वो कहीं लापता होता और रोटी न खा पाता, तो दूसरे दिन सुबह गेट खोलते ही एक ख़ास अंदाज़ में शिकायत होती मुझसे और मेरे इतना कहते ही-हाँ-हाँ, समझ गए, कल खाना नहीं मिला था न, अभी देते हैं। बिलकुल शांत हो जाता था।

लम्बाई-चौडाई यूँ थी कि अपनी जवानी के दिनों में कि मजाल है कोई अनजान मोटरसाइकिल वाला भन्नाटे से सही सलामत गली से गुज़र सके। इसलिए बच्चों का लाडला था शैडो; क्योंकि गली क्रिकेट में फील्डिंग के साथ-साथ वो इस तरह के घुसपैठियों से भी सबको बचाता था।

एक वफादार साथी की तरह न जाने कितनी दूर तक वो अक्सर मेरे साथ चला है, एक बच्चे की तरह न जाने कितनी बार दो पैरों पर खड़े होकर गले लगा है और जाने कितनी बार किसी अनजान को मेरे दरवाज़े पर ऐंवेही फटकने से भी रोका था।

लोगो को अपनी भयानक आवाज़ से कँपा देने वाला शैडो हमारे झूठमूठ धमकाने पर यूँ दुबक जाता था कि बरबस हँसी आ जाती थी। जिसने उसे कुछ सालों पहले तक देखा था, वो उसे ‘गली का कुत्ता’ कहने की बजाय ‘गली का शेर’ ही कहते थे।

वह किसी एक का नहीं था, फिर भी सबका था। मौत को अपना बना वो तो अपने कष्टों से मुक्ति पा गया; पर आज भी जब मेरी ही तरह उसे इस गली के कई लोग याद करते हैं, तो ऐसे में मुझे उन लोगों पर तरस आता है, जो अपने कर्मों के कारण ऐसी याद से भी वंचित हैं, उस प्यार से वंचित हैं, जो एक ‘गली का कुत्ता’ पा गया।

शैडो के जाने के बाद उसकी विदाई में बस एक ही बात दिल में गूँजी थी- तुम बहुत याद आओगे, हमेशा याद आते रहोगे, हर उस पल में जब कोई साया साथ चलेगा।

वफ़ा की सीख

बेजुबान दे जाते

नेह से भरे।

Jan 1, 2025

हाइबनः ब्रह्मताल सम्मिट पॉइण्ट

  - भीकम सिंह 

   गाइड ने एक-एक करके सभी के चेहरे पर टॉर्च की सीधी रोशनी डाली । यद्यपि गाइड सभी का चेहरा नहीं देख पा रहा था - झीनी रोशनी के घेरे में शरीर का ढाँचा भर देख पा रहा था। ट्रैकर से जितना बन पड़ रहा था, वे ब्रह्मताल सम्मिट पॉइण्ट  की ओर खिसक रहे थे । आकाश का अधिकांश हिस्सा साफ हो चुका था। एक - आध तारा ही चमक रहा था। सभी ने अपनी टॉर्च बन्द कर ली थी। पीठ पर रुकसैक चिपकाए,  11227 फीट की ऊँचाई पर चढ़ आए थे। पैरों में ताकत नहीं थी। आली बुग्याल के पीछे पहाड़ पर लालिमा जैसा दिख रहा था। धड़कने थामें हुए सभी ट्रैकर कैमरों का शटर खोल रहे थे। एक जनवरी के सूर्योदय की थोड़ी- सी रोशनी ऊपर उठकर पहाड़ों को प्रकाशित कर रही थी। ट्रैकर का फोटो शूट अनवरत चल रहा था। सूर्योदय हो चुका था। अभी वह पेड़ की दो शाखाओं के बीच टिका था ; लेकिन देखते-देखते ऊपर चढ़ गया। झंडी टॉप पर आते-आते सूर्य देवता सिर पर आ चुके थे। मैंने चारों ओर निगाह दौड़ाई। ब्रह्मताल नजरों से ओझल हो रहा था ।

 धूप- सिंचित

नए वर्ष की भोर

मन विभोर ।

Jun 1, 2024

हाइबनः जीवन-धारा

 डॉ. सुरंगमा यादव

बद्रीनाथ धाम के लिए हम सब बदायूँ से सुबह सात बजे निजी वाहन से निकले। हल्द्वानी तक तो पहाड़ी और मैदानी रास्तों में अधिक अंतर पता न चला; परन्तु उसके बाद हम जैसे -जैसे ऊपर चढ़ते गए, पहाड़ काटकर बनाए गए गोल घुमावदार रास्ते रोमांच मिश्रित भय की अनुभूति कराने लगे। जब गाड़ी ओवरटेक होती. तो नीचे गहरी खाई देखकर जान ही सूख जाती। पहाड़ों से बहते हुए झरने दुग्ध की धवल धार- से प्रतीत हो रहे थे। मन में सहसा प्रश्न  उठा , अपने  अंतस्तल से निर्मल, शीतल, शुद्ध जलधार प्रवाहित करने वाले पहाड़ों को कठोर क्यों कहते हैं? दूर तक फैले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर बहते हुए झरनों की पतली धार आँसुओं की सूखी रेखा-सी  प्रतीत हो रहे थे। शायद अपनी ऊँचाई  के कारण एकाकी पहाड़ स्वयं को ही अपना सुख-दुःख सुनाकर हँसते-रोते रहते हैं।  जागेश्वर जी पहुँचते-पहुँचते अंधेरा हो गया। ड्राइवर ने रात्रि में आगे चलने से मना किया तो हम लोग रात्रि विश्राम के लिए वहीं रुक गए। प्रातः हमने अपनी यात्रा पुनः शुरू की। दोपहर होते-होते हम उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बद्रीनाथ धाम पहुँच गए। अलकनंदा का जल हल्का हरा रंग लिये हुए इतनी तीव्र गर्जना और वेग के साथ बह रहा था। मानो पहाड़ रूपी पिता के घर से विदा लेते समय नदी के मन में भावनाओं का रेला उमड़ पड़ा हो। जल इतना निर्मल कि उसमें पड़े हुए पत्थर भी साफ नजर आ रहे थे। यही पहाड़ी नदियाँ खिंचती चली जाती हैं सागर की ओर, अंततः लंबी यात्रा के बाद सागर में मिलकर ही विश्राम लेती हैं। जीवन भी एक लंबी यात्रा  है। एक दिन उसे विश्राम लेना ही है। फर्क सिर्फ इतना है, नदी को यात्रा की दूरी ज्ञात है , जीवन की यात्रा कब कहाँ समाप्त होगी यह अज्ञात है।  

जीवन गति

पथिक को अज्ञात

कहाँ है इति। 

Nov 6, 2023

हाइबनः दिव्य सम्बन्ध

  - अनिता ललित

हमारे कमरे के सामने बाल्कनी और उससे लगी हुई, खुली छत है, जिसकी शोभा सुंदर रंग-बिरंगे फूल और हरे-भरे पौधे बढ़ाते रहते हैं। वहाँ बैठना परिवार के हम सभी सदस्यों को बहुत भाता है, विशेषकर जब मौसम थोड़ा ठंडा हो या बारिश हो रही हो। बारिश की बूँदें जब फूलों की पँखुड़ियों और हरी-हरी पत्तियों पर नाचती हुई गिरतीं हैं तो यूँ लगता है, जैसे मोतियों की अनगिनत लड़ियाँ खनक रही हों। सर्दियों में धूप के पीछे जितना भागो, वो उतनी ही छिटककर दूर... और दूर भागती चली जाती है -धूप के साथ इस लुकाछिपी के खेल का अपना अलग ही मज़ा है।

   पता नहीं कब और कैसे, वहाँ हमने पंछियों को दाना डालना शुरू कर दिया। पहले गिलहरी आती थी, फिर कबूतर आए, फिर गौरैया ... और अब तो न जाने कितनी तरह की सुंदर-सुंदर नन्ही-मुन्नी और थोड़ी बड़ी चिड़ियाँ भी आने लगीं। किसी के गले में लाल धारी और पेट का कुछ हिस्सा सफ़ेद है, सिर पर कलगी जैसी बनी हुई है -इसकी बोली बहुत ही मीठी है; कोई पूरी धानी रंग की -ऐसी कि पत्तियों में छिप जाए; कोई ऐसी तराशी हुई कि लटकती बेल की टहनी पर टेढ़े बैठकर अपनी लंबी व तीखी चोंच सीधे फूलों के अंदर घुसा देती है -शायद फूलों का रस पीती होगी; कोई पीली चोंच वाली -जो बारी-बारी से पानी में डुबकी लगाकर गमलों के सिरे पर या छत की रेलिंग पर बैठ जाती हैं; कुछ फ़ाख़्ता हैं -वो भी ऊपर बिजली के तार पर बैठकर इंतज़ार करती रहती हैं, दाना डलने का। सब समूह में चार-पाँच इकट्ठे आतीं हैं। सुंदर रंगों से सजी हुई तितलियाँ और उनके बच्चे भी इधर से उधर पंख झुलाते हुए दौड़ते रहते हैं, जैसे छुआ-छुआई खेल रहे हों, काले भँवरे भी वहीं मँडराते रहते हैं। अब ये सारे हमारे ही परिवार का हिस्सा बन गए हैं।  

 पहले पानी का एक बर्तन रखा हुआ था, मगर वो जल्दी ही खाली होने लगा, तो दो रखे, फिर तीन और अब चार बर्तन रखे हैं हम लोगों ने -किसी में आकर वे छई-छप्पा-छई करती हैं, तो किसी में से पानी पीती हैं। कबूतर भी उसमें नहा जाते हैं। यही नहीं, कौवे महाराज भी कुछ महीनों से आकर अब काँव -काँव करने लगे, तो उनके लिए भी रोटी बनने लगी, वो भी समय-समय पर आने लगे। कभी-कभी तो कौवे महाराज किसी और के यहाँ से रूखी रोटी लाकर यहाँ पानी के बर्तन में भिगो देते, फिर मुलायम होने पर उठा ले जाते। गिलहरी तो सबसे अधिक शैतान और पेटू! कोई खाए या न खाए, वो आंटी तो सबका खाना खा जाती हैं। चाहे बाजरा हो या ब्रेड या रोटी या बिस्किट  ... ये सब चट कर जाती हैं, मुँह में दबाकर भाग जाती हैं। एक नहीं, इनका पूरा मोहल्ला यहाँ दावत खाने आ जाता है, सात-आठ गिलहरियाँ! किसी से नहीं डरतीं। भगाना पड़ता है उन्हें। उनका बस चले, तो बाजरे का डिब्बा भी खा जाएँ!

   ये सिलसिला अब रोज़ का हो गया है। सुबह से ही गिलहरी की कर्र-कर्र, कबूतर की गुटरगूँ, गौरैया की चीं-चीं और कौवे महाशय की काँव-काँव शुरू हो जाती है। सवेरे उठकर सबसे पहला काम छत पर दाना डालना होता है। फिर नाश्ते के समय चिड़ियों के लिए ब्रेड, फिर दोपहर खाने के पहले फिर दाना डाला जाता है, और शाम को एक बार और। अब तो छत पर किसी काम से निकलने पर ही एक-दो सफ़ेद कबूतर आकर सामने बैठ जाते हैं, डरते नहीं वो! एक तो आकर पास ही टहलता रहता है और हर थोड़ी देर बाद आकर हमारी कुर्सी पर बैठकर कमरे में झाँकता रहता है। कुछ बोलो, तो गर्दन टेढ़ी करके आँखें भी घुमाता है और दाने के डिब्बे की तरफ़ देखता है। दाना डालो, तो भागकर खाने लगता है। कभी-कभी डर लगता है कि ज़्यादा खाने से उसकी तबीयत न ख़राब हो जाए। मगर जिस तरह से वो सामने आकर बैठ जाता है, तो थोड़ा- सा देना पड़ता है कि इतनी आस लगाए हुए है। उसका नाम हमने ‘नॉटी’ रख दिया है।

    कौवे महाराज भी आकर कभी रेलिंग, फिर गमले पर और फिर ज़मीन पर फुदकते रहते हैं और ब्रेड या रोटी का टुकड़ा उठाकर खाते हैं। कभी-कभी जब उनका दूसरा साथी भी आ जाता है, तो उस टुकड़े को लेकर अपनी चोंच से उसकी चोंच में खिलाते हैं -कौवे को हमने ऐसा करते पहली बार देखा है।

    कुछ दिनों के लिए घर से बाहर जाएँ, तो छत का रास्ता खोलकर जाना पड़ता है, जिससे घर के कामों में मदद करने वाले अंदर आकर, पौधों को पानी व इन सबको समय पर दाना-रोटी दे सकें। फ़ोन से उन्हें याद भी दिलाते रहते हैं। एक ख़ूबसूरत दैवीय रिश्ता -सा बन गया है सबसे, जो दिल को बहुत सुकून देता है।

बिन बोले ही

समझे दिल की बात

मन विभोर।

 

दैवीय रिश्ता

पंछियों ने बनाया

सुकून देता। 


May 1, 2023

हाइबनः 1.भँवर, 2 .दूसरा कबूतर, 3. पट्टे का दर्द

  -   सुदर्शन रत्नाकर

 1.भँवर

 उगते सूर्य का मनोरम दृश्य मुझे सागर के किनारे खींच कर ले गया। आसमानी झील में खिलता लाल कमल ,जैसे नवेली दुल्हन शर्माते हुए धीरे-धीरे चली आ रही हो। थोड़ी ही देर में सारी सृष्टि  सुनहरी किरणों से सुसज्जित हो इठलाने लगी । पेड-पौधे,फूल-पत्तियाँ किरणों को चूमने लगे। पक्षी चहचहाने लगे ।नहाने के लिए किरणें लहरों पर उतर आईं, उस समय ऐसा लग रहा था मानों वे खुशी से नृत्य कर रही हों। मंद- मंद बहती पवन, लहरों का ऊँचा उठना और फिर नीचे गिरना मन को आकर्षित कर रहा था । ऐसा दृश्य देख कर मेरा मन मचल उठा। लहरों में झूलती उन किरणों को छूने का लालच मन में आ गया। जो अब चाँदी की तरह लहरों पर चमक रही थीं। मैं पानी में उतर गई। लहरों के संग खेलती आगे बढ़ती गई, उनका स्पर्श मुझे रोमांचित करने लगा लेकिन मैं यह भूल गई कि जितना आगे बढ़ रही हूँ उतनी ही सागर की गहराई और लहरों की ऊँचाई बढ़ रही है पर मैं रुकी नहीं , आगे बढ़ती ही गई, अब पानी मेरी कमर तक आ गया था और फिर जैसे ही एक उफनती हुई लहर मेरे पास आई, रेत मेरे पाँवों के नीचे से खिसक गई। मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं नीचे गिर गई। अब केवल मेरा सिर बाहर था। मैंने उठने की कोशिश की; लेकिन उठ नहीं पाई, घुटनों पर दबाव के कारण फिर से गिर गई। मेरे आसपास कोई नहीं था, जिसे आवाज़ देकर सहायता माँग लेती। सागर में नहाता हुआ सूरज भी आगे बढ़ गया था। थोड़े ही समय में कितनी ही लहरें मेरे ऊपर से निकल गईं। हर बार लगता ये लहरें मुझे निगल जाएँगी। मृत्यु की शंका मुझे भयभीत करने लगी। मुझे इस दुनिया का मोह, उत्तरदायित्वों का भँवर अपनी ओर खींचने लगा और मैं लहरों की तरह उठती गिरती रही।

    मैं प्रकृति का उत्सव देखने आई थी; लेकिन मृत्यु के भय ने सब कुछ भुला दिया।  मुझे तैरना नहीं आता, फिर भी मैं उठने की अपेक्षा  पानी में लेट कर हाथ -पाँव मारने की कोशिश करने लगी। मेरी कोशिश कामयाब होने लगी। मैं पहली लहर के साथ आगे बढ़ी। दूसरी लहर के साथ थोड़ा और आगे हुई और फिर धीरे -धीरे मैं उनके साथ- साथ किनारे की ओर बढ़ने लगी थी। मेरे प्रयास  ने मुझे किनारे पर पहुँचा दिया, जहाँ जीवन खड़ा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने सागर को ओर देखा, लहरें अब भी अठखेलियाँ कर रही थी। किरणों ने अपना सौन्दर्य खो दिया था और अब उष्मा दे रही थीं। प्रकृति वैसे ही मुस्कुरा रही थी। मैं सागर के किनारे बालू पर निढाल लेट गई। मृत्यु मेरे पास से निकल गई थी; लेकिन उसका अहसास मेरे अन्तर्मन को अभी भी छू रहा था। मृत्यु जीवन का सत्य है और मोह जीवन का भँवर है, मृगतृष्णा है।

मृत्यु का डर

मृत्यु से भयावह

डराता मन।

2 . दूसरा कबूतर

मेरे घर की रसोईघर के सामने की दीवार पर सूर्योदय से पहले ही कबूतरों का एक जोड़ा  बैठता था। वे दोनों थोड़ी देर किलोल करते, और फिर उड़ जाते। मैंने उन्हें दाना डालना शुरू कर दिया। वे इधर-उधर देखते, नीचे उतरते,दाना चुगते,कटोरे में रखा पानी पीते और दीवार पर जा बैठते हैं। यह क्रम कई दिन से चलता आ रहा है। मुझे भी सुबह- सुबह उन्हें देखने की आदत हो गई है। किसी दिन भूल जाऊँ या देर से किचन में आऊँ, तो वे गुटरगूँ करके, पंख फड़फड़ाकर मुझे याद दिला देते हैं। अब मेरी दिनचर्या कबूतरों को दाना डालने से शुरू होने लगी है।

        कभी- कभी ऐसा होता है कि जब मैं दाना डालती हूँ , एक ही कबूतर दीवार पर बैठा होता है; लेकिन वह तब तक नीचे नहीं उतरता, जब तक दूसरा न आ जाए। दूसरे के आते ही वे दाना चुगने में व्यस्त हो जाते हैं। प्यार और सहयोग की भावना तो पक्षियों में भी होती है।

     कल एक ही कबूतर दीवार पर बैठा था। मैंने दाना फैला दिया, सोचा दूसरा कबूतर आएगा, तो चुग लेंगे। पर दूसरा कबूतर बड़ी देर तक नहीं आया। मेरा ध्यान बार-बार उसकी ओर जा रहा था। मैंने देखा उसकी आँखें पनीली थीं। पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगा कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता है, कुछ बताना चाहता है;  पर निरीह पक्षी बोल तो सकता नहीं। अपना दर्द ,अपनी भावनाएँ कैसे बताये। मैं अपने कामों में व्यस्त  हो गई। थोड़ी देर बाद यूँ ही मैंने खिड़की के  नीचे झाँककर देखा, तो वहाँ कबूतर के पंख फैले हुए थे ।लगता है,  बिल्ली जो कुछ दिन से घर के बाहर घूम रही थी,  कबूतर उसका शिकार हो गया है।  दूसरा कबूतर दीवार पर बैठा अभी भी मेरी ओर देख रहा था और फिर बिना दाना खाए वहाँ से उड़ गया। मेरा मन पीड़ा से भर गया।

निरीह पक्षी

किससे कहे पीड़ा

दिल तो रोता।

3. पट्टे का दर्द

   मालकिन जब भी कहती हैं, “कूरो ,चलो घूमने चलें।” मेरा मन बल्लियों उछलने लगता है। एक यही तो समय होता है, जब मैं आज़ादी की साँस ले सकता हूँ ; लेकिन मेरी आधी उत्सुकता वहीं समाप्त हो जाती है ,जब वह कहती हैं, “ कूरो, अपना पट्टा लाओ, पहले पट्टा बाँधेंगे फिर बाहर चलेंगे।” सारा दिन मुँह उठाए एक कमरे से दूसरे कमरे में घर के बंदों को सूँघता घूमता रहता हूँ। बाहर से कोई आता है, तो मैं अजनबी को देखकर भौंकने लगता हूँ तब मैडम मुझे कमरे में बंद कर देती हैं और यह सजा घंटों चलती है। खाना नहीं खाता, तो कहती हैं ,खाना नहीं खाओगे, तो नीचे कुत्तों को दे आऊँगी।” भूखे रहने के डर से खा लेता हूँ । कभी-कभी बालकनी में जाता हूँ, तो वहाँ लगी लोहे की सलाख़ों में से सिर निकालकर नीचे झाँकने की कोशिश करता हूँ-चौबीसवीं मंज़िल से मुझे कुछ दिखाई तो देता नहीं, सिर और चकराने लगता है। बस नीचे से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें सुनाई देती हैं; इसलिए पट्टा बाँधकर ही सही, बाहर जाने को तो मिलता है।

 लिफ़्ट से निकलते ही तेज़ कदमों से बाहर जाने की कोशिश करता हूँ। कितना अच्छा लगता है। मेरे जैसे और भी अलग-अलग नस्लों  के कुत्ते अपने- अपने मालिकों के साथ घूमते मिल जाते हैं। पर मैडम मिलने नहीं देती। बस अपनी सहेली के कुत्ते से बात करने देती हैं।  “कूरो, देखो ऑस्कर तुम्हारा दोस्त, मिलो इससे।” पर मुझे ऑस्कर अच्छा नहीं लगता। बड़ा अकड़ू है। है भी तो मुझसे कितना बड़ा। खेलते हुए मुझे दबोच लेता है। कई बार तो खरोंचें भी मार देता है। अभी तो अच्छा है, मेरे बाल घने हैं। चोट कम लगती है।

   मैडम प्यार तो करती हैं ; लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है, वह नहीं करने देतीं। मेरा दिल चाहता है- वह मेरा पट्टा खोल दें और मैं भागकर अपने दोस्तों से मिल लूँ ।जानते हैं आप मेरे दोस्त कौन हैं। अरे! वही जिनकी आवाजें मैं बालकनी से सुनता हूँ। मुझे नीचे आया देख वह मेरे आगे-पीछे चलने लगते हैं। मुझसे मनुहार करते हैं। मैं भी उनसे लिपटने, खेलने की कोशिश करता हूँ ; पर मैडम मेरा पट्टा खींचकर कहती हैं, “नो कूरो, डर्टी डॉगी ।”  मैं उनकी बात कहाँ सुनता हूँ। पट्टा खींचते-खींचते भी उनके साथ खेल लेता हूँ, बात कर लेता हूँ। जब वह मेरा पट्टा देखकर हँसते हैं, तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है । मैं कहता हूँ, “पट्टा है तो क्या हुआ , अच्छा खाना तो मिलता है।” पर वो सब-से बड़ा  ब्राउनी हमेशा कहता है ,पट्टे से तो भूखा रहना बेहतर है।”  शायद  वह ठीक कहता है। कितनी आज़ादी से घूमते हैं ये सब, लेकिन उनके भूखे रहने से मैं दुखी हो जाता हूँ , इसलिए कई बार मैं अपना खाना जानबूझकर नहीं खाता। तब मैडम वही खाना इनको दे देती हैं। मुझे अच्छा लगता है। जब मेरे दोस्तों को भरपेट खाना मिल जाता है, तब मैं अपने पट्टे के दर्द को भूल जाता हूँ।

मूक ये प्राणी

विचित्र है मित्रता

सीखो मानव।

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सम्पर्क: ई-29,नेहरू ग्राउंड फ़रीदाबाद-121001 

Jul 1, 2022

हाइबनः सर्कस का शेर

- भीकम सिंह

   उत्तर प्रदेश के जनपद गौतम बुद्ध नगर की दादरी के स्थानीय विधायक ने भारत सर्कस का उद्घाटन अपने कर कमलों से किया। परसों यह खबर स्थानीय समाचार पत्रों की सुर्खियों में रही और आज समाचार सुनकर स्थानीय लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया,  पिंजरे से शेर गायब होने का सवाल खड़ा हो गया । वन- विभाग के कुछ  कर्मचारी छुपते-छुपाते कोहनी के बल रेंगते रेलवे लाइन की ओर बढ़े,  कभी पटवारी के बाग की ओर पुराने ऊँचे-ऊँचे झुरमुटों की ओट लेकर, कभी कोट के पुल पर मोर्चा लगाए छिपे बैठे रहते, लेकिन शेर पकड़ में नहीं आ रहा था। गाँवों में डर का अंधकार गहराता जा रहा था, शेर पकड़ने की गतिविधियाँ भी तेज होने लगी थी ।

  वन -विभाग की चौतरफा मोर्चाबंदी देखकर शेर लुहारली के जंगल में देखा गया, ऐसी खबर स्थानीय समाचार पत्रों में छपी।  गाँव के घरों के सब खिड़की दरवाजे बंद, आधी रात को राजकुमार भाटी ने तंद्रा में सोचा कि उसके कमरे का दरवाजा खुला है और उन्हें बैठा हुआ शेर नजर आया। शेर को देखकर राजकुमार भाटी का पूरा शरीर पसीने- पसीने हो गया।  शेर क्रोध भरी मुद्रा में कमरे के दरवाजे के बीचो- बीच लंबे कानों को हिला रहा था, दूर कहीं खेत में चल रहे  पम्पिंग सैट की धुक- धुक शेर की उफनती साँसों से सह- सम्बन्ध स्थापित कर रही थी । मन ही  मन राजकुमार भाटी ने सारी ऊर्जा समेटकर पिता जी को आवाज़ लगाई और आँखें अर्जुन की आँख की तरह सिर्फ और सिर्फ शेर के हिलते कानों पर स्थिर की । अचानक राजकुमार भाटी के मन में एक दूर की कल्पना अँखुवा गई कि यदि धड़ मारे,  मरे रहने का नाटक करें, तो शेर हमला नहीं करता?  सशंकित दिमाग शेर के कानों को गौर से विश्लेषित करने लगा, जो लगातार हिल रहे थे, शेर चौकन्ना हो  गया है ; लेकिन अभी तक दरवाजे के बीचो-बीच बैठा है । फिर राजकुमार भाटी को पिता जी की आवाज़ सुनाई दी- ''घबराना मत ! राइफल लेकर प्रधान जी छत पर आ गए हैं, चुपचाप खाट पर ही पड़े रहना। इसी धमाचौकड़ी और हो -हल्ले के बीच राजकुमार भाटी की माँ की आँख खुल गई, जो बिना किसी का नोटिस लिये छत पर आ गई थी।  झटके से मक्का के बोरे को कोनों (कान) से पकड़कर उठा लिया, जो राजकुमार भाटी को शेर की तरह दीख रहा था । दरअसल बूँदा- बाँदी के डर से राजकुमार भाटी की माँ सूखी मक्का के बोरे को रात में भरकर रख गई थी। कमरे के अंदर इसलिए नहीं रखा था कि आहट से उसके बेटे की नींद टूट जाएगी; लेकिन इस कवायद में पूरा मौहल्ला जाग गया ।

                    करवा देता

                  अजीब करतूत

                   भय का भूत।

Aug 1, 2021

तीन हाइबन

-अनिता मंडा

 1. दीवार का मन

दीवारों के बिना छत कैसे रहेगी इसी फ़िक्र में जर्जर दीवारें जी जान से खड़ी रहती है। भुरभुरी होकर बिखरने तक, अपने लिए शायद ही कोई पल जीती हों। दुआ भी करती हैं तो छत कायम रहने की। सिर पर छत एक दिलासा है कि तुम सुरक्षित हो। यह दिलासा पुख़्तगी तय करता है कि तूफ़ान आए या बिजली गिरे; बच जाओगे। बचे रहने की कयावद ही जीवन के सफ़र की मूल भावना है। बचे रहें हम, बचा रहे हममें कुछ। रिक्त मन की परिधि कितनी बड़ी हो जाती है कि अकेलेपन से घबराकर मन बाहर भाग छूटता है। बाहर से जो मिल जाए तुरंत भर लिया मन में। एक पल भी स्वयं का साथ भारी प्रतीत होता है। तो... जो स्वयं को इतना भी नहीं सहन कर पा रहे, कोई दूसरा कैसे सहन करेगा। परन्तु चाहना तो है। चाहना है स्वीकारोक्ति की, साहचर्य की। साहचर्य से उपजे सुख का आकाश अनन्त क्यों नहीं बना पाते। उसमें शुबहों के काले बादल हैं। शिकायतों के अंधड़ हैं। जो साफ़ नज़र आ रहे थे, वही नज़ारे कुहरे की आड़ ले लेते हैं। पल में मन का दृश्य ओझल। सुख-चैन की बाँसुरी पल में क्रंदन करने लगती है। समय की डोर हाथ से छूटती जान पड़ती है। भागते-भागते साँसों की डोरी तनने लगती है। व्यथित तन, खंडित मन, पागल हाथी- से उन्मादित स्वप्न। कहाँ जाना है? क्या पाना है? किसके लिए है हृदय की सारी पूँजी? क्या तलाश पूरी होगी? क्या अब भी पाँव इस योग्य हैं कि भाग सकें? क्या फेफड़े इतनी हवा भर पाएँगे स्वयं में कि धुँधली दृष्टि साफ़ साफ़ देख सके। हज़ार-हज़ार उलझनों से जूझता मन क्या कोई सिरा पकड़पाएगा, जिसके सहारे चल कर चक्रव्यूह भेदा जा सके। भीतर के अनगिन युद्ध; बाहर के अनगिन युद्ध। भीतर के नरक; बाहर के नरक। इन सबसे उपजी थकान का ढेर इतना ऊँचा है कि उसकी परछाई ही सारा उजाला पी जाती है। अवसाद के छोनेकानी उँगली थामे चलते हैं। जिन दीवारों के सहारे पीठ टिकाई,वे भी तो कितनी जर्जर हैं, पता नहीं कब दरक जाएँ। काश कि हम इन जर्जर दीवारों का मन  पढ़ पाते। 

1

पोंछ भी दो ना

शुबहों की कालिख़

बाँच लो मन।

2

गहरी खाई

बढ़ती परछाई

साँझ है आई।


2. असाढ़

 आषाढ़ प्रतीक्षा की पूर्णता का महीना है। झमाझम संगीत और माटी की सौंधी सुरभि का महीना है। धरती की दरारों में छिपा अँधेरा बादलों की गड़गड़ाहटों से भय खाता है। बूँदों के पोरअहिस्ताअहिस्ता धरती को गुदगुदाते हैं, हरापन धरती की खिलखिलाहट है। तपस्वी पेड़ों की साधना का वरदान असाढ़ बादलों के लिफ़फ़ों में बूँदों के ख़त लाता है। अपना दुःख, ताप धोकर पेड़ सरसाते हैं। सारे लोकगीत असाढ़ पर पाँव धर सीधे सावन का झूला झूलने की हड़बड़ी में हैं। इन सबसे अनभिज्ञ असाढ़ मदमस्त हाथी सा गुज़रता है, गरजता है, बरसता है। एक आवेग हर कहीं भर देता है। नदियों की मंथरता टूटती है। पंछियों के गान फूटते हैं। जंगल कच्चे हरे से उफनता है। खेतों में हल के माँडने आस से हरे होते हैं। पर्वत, नदियाँ, जंगल, खेत, वनस्पति, जीव सब असाढ़ की छुवन से स्पंदित हो गाते हैं। बारिश सुख का संगीत रचती है, इंद्रधनुष का सतरंगी सितार प्रकट होता है, मानो अम्बर के आँगन रंगोली पूर दी हो किसी ने। कण-कण में अनुराग की उपस्थिति है बारिश।

1

असाढ़ माह

अनुराग उपजे

मेघ बरसे।

2

बंजारे मेघ

गाएँ मल्हार राग

जागे हैं भाग।


3. गुलमोहर

चिलचिलाती धूप में जब आँखें खुलते हुए स्वतः सिकुड़ जाती हैं, सिर को छाँव का आसरा याद आने लगता है, हवा में बढ़ते तापमान की धमक त्वचा पर हमला कर चुभने लगती है तभी जेठ माह की धूप को मुँह चिढ़ाता गुलमोहर रंग पहनने लगता है। धीरे- धीरे हरा झड़ कर विरल हो जाता है और केसरिया, नारंगी, लाल हावी होता जाता है। धूप जब छाँव के अस्तित्व को मिटाने उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने लगती है गुलमोहर के फूल किसी योद्धा की भाँति  मुकाबले में डट जाते हैं। फूलों को कोमल समझा जाता है। उनकी सुंदरता बरबस मन मोह लेती है, दृष्टि बाँध लेती है। मधुमक्खियाँ उन पर उत्सव मनाती हैं। चूम-चूम कर रस का संचय करती हैं। शहद चुम्बनों का संचय है। तभी तो इतना मीठा  इतना विशुद्ध, गुणकारी है।

फूल कड़ी धूप में भी मुस्कुराना नहीं भूलते। अपनी एक मुस्कान से देखने वालों को ख़ुशी मिलती है तो ये काम इतना कठिन भी नहीं न। फिर हँसकर जिया जाए या मुँह लटकाकर जीना तो है ही। ख़ुशबू कभी अपने फूल में लौटकर नहीं आती; पर पहचानी तो उसी के नाम से जाती है। हमारी मुस्कान भी वही ख़ुशबू है, जो हमारी छवि के साथ ही किसी हृदय में बसी रह जाती है। एक मुस्कान जितना- सा जीवन और कितने सुनहरे रंग। प्रकृति की कितनी बड़ी पाठशाला हमारे इर्द-गिर्द मौजूद है। कितना बड़ा कैनवस नित्य सजता  है। कितने रंग रोज़ अपना स्वरूप बदलते हैं। आँखें होते हुए भी कितना कुछ अनदेखा छूट जाता है हमसे। कितना निकल पाते हैं हम मन में लगे जालों को हटाकर। देखने की एक दृष्टि परिमार्जित करते ही दृश्य कितना कुछ कह जाते हैं। समझा जाते हैं। तो क्यों न गुलमोहर को देख कुछ पल को एक गुलमोहर अपने भीतर भी उगा लें जो जीवन के घाम को सहकर खिल उठे। जिसका मकरन्द किसी का सानिध्य चूमकर शहद सा मीठा बन जाये।

गुलमोहर

धूप में मुस्कराए

जीना सिखाए।

Jan 15, 2019

सच्चा साथी

हाइबन
सच्चा साथी 
 प्रियंका गुप्ता

उस रात जाने क्यों मन थोडा उदास सा था...अजीब सी बेचैनी...। बहुत सारी बातें थी मन में, पर समझ नहीं आ रहा था कि बेचैनी थी आखिर किस बात पर...। अजीब सा अहसास...। बहुत हद तक कारण अगले दिन समझ आ गया...जब शैडो के जाने की ख़बर मिली...।
शैडो...कहने को किसी को जो हिकारत से कहा जाता है...वो था...यानी कि गली का कुत्ता...स्ट्रीट डॉग था वो...। मेरी गली का एक वफादार बाशिंदा...। बहुत सारे इंसानों से ज्यादा भावनाएँ मैंने उसमे देखी थी...। इंसानी हिसाब से देखा जाए तो वो एक दीर्घायु जी कर गया...। तेरह साल की उम्र...जब कुत्तों की अधिकतम आयु शायद चौदह साल ही होती है...।
अंतिम के तीन दिन, जब उसने खाना-पीना छोड़ा...उसके पहले तक वो सचमुच शैडो बन कर मेरे साथ चला...। नाम उसका वैसे मोती था, पर जब वो इस मोहल्ले में आया था, जाने कैसे चुनमुन ने उसे `शैडो' बुलाना शुरू कर दिया था...। वो अपने दोनों नाम पहचानता था...। बातें समझता था...। रात को मेरे गेट का ताला बंद होने से पहले अगर किसी दिन वो कहीं लापता होता और रोटी न खा पाता, तो दूसरे दिन सुबह गेट खोलते ही एक ख़ास अंदाज़ में शिकायत होती मुझसे...और मेरे इतना कहते ही...हाँ, हाँ, समझ गए, कल खाना नहीं मिला था न...अभी देते हैं...बिलकुल शांत हो जाता था...।
लम्बाई-चौडाई यूँ थी कि अपनी जवानी के दिनों में कि मजाल है कोई अनजान मोटरसाइकिल वाला भन्नाटे से सही सलामत गली से गुज़र सके...। इसलिए बच्चों का लाडला था शैडो...क्योंकि गली क्रिकेट में फील्डिंग के साथ साथ वो इस तरह के घुसपैठियों से भी सबको बचाता था...।
एक वफादार साथी की तरह न जाने कितनी दूर तक वो अक्सर मेरे साथ चला है, एक बच्चे की तरह न जाने कितनी बार दो पैरों पर खड़े हो कर गले लगा है...और जाने कितनी बार किसी अनजान को मेरे दरवाज़े पर ऐन्वेही फटकने से भी रोका था...।
लोगो को अपनी भयानक आवाज़ से कँपा देने वाला शैडो हमारे झूटमूठ धमकाने पर यूँ दुबक जाता था कि बरबस हँसी आ जाती थी...। जिसने उसे कुछ सालों पहले तक देखा था, वो उसे `गली का कुत्ता' कहने की बजाए `गली का शेर' ही कहते थे...।
वो किसी एक का नहीं था, फिर भी सबका था । मौत को अपना बना वो तो अपने कष्टों से मुक्ति पा गया, पर आज भी जब मेरी ही तरह उसे इस गली के कई लोग याद करते हैं, तो ऐसे में मुझे उन लोगों पर तरस आता है जो अपने कर्मों के कारण ऐसी याद से भी वंचित हैं, उस प्यार से वंचित हैं, जो एक `गली का कुत्ता' पा गया...।
शैडो के जाने के बाद उसकी विदाई में बस एक ही बात दिल में गूँजी थी...तुम बहुत याद आओगे, हमेशा याद आते रहोगे...हर उस पल में जब कोई साया साथ चलेगा...।
वफ़ा की सीख
बेजुबान दे जाते
नेह से भरे