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Jun 1, 2026

तापमानः जम्मू-कश्‍मीर की वादियों पर हीटवेव का प्रकोप

  -  अजय मोहन

जम्मू-कश्‍मीर में जो तपिश जून के मध्‍य में आनी थी, वो मई में ही आ चुकी है। जून की सोच कर लोगों में अभी से भय है। ऊपर से बढ़ती गर्मी के कारण यहाँ के तमाम झरनों और अन्य जल स्रोतों अभी से संकट मँडराने लगा है।

वर्ष 2026 में गर्मी का यह मौसम एक के बाद एक रिकार्ड तोड़ रहा है। पहले अप्रैल में हीटवेव की घटनाओं का चढ़ता ग्राफ और फिर मई महीने में तमाम शहरों में तापमान 45 के पार पहुँचा। बढ़ती गर्मी का असर अब जम्मू-कश्‍मीर की वादियों तक पहुँच गया है। 20 मई को श्रीनगर में 30.7 डिग्री और जम्मू में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ। दोनों ही शहर धीरे-धीरे अपने ऑल टाइम हाई तापमान की ओर बढ़ते दिखाई दिए। श्रीनगर और जम्मू के साथ-साथ राज्य के 9 जिलों में हीटवेव का प्रकोप जारी है।

इस बढ़ते तापमान ने केवल जन-जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि घाटी में बहने वाले झरनों और पीने के पानी पर चिंता बढ़ा दी है।  

जम्मू-कश्‍मीर के विभिन्न जिलों में 10 साल का तापमान रिकॉर्ड 

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस साल मई में सबसे अधिक 30.7 डिग्री तापमान दर्ज हुआ। जबकि मई 2025 में 34.4°C दर्ज किया गया था। पिछले वर्ष मई का महीना बीते 10 वर्षों में सबसे गर्म था। हालाकि श्रीनगर में मई माह में सबसे अधिक तापमान 1968 में दर्ज हुआ था। तब यहाँ पारा 36.4 डिग्री पहुँच गया था। 

2016-2024 के बीच दर्ज सभी अधिकतम तापमानों से अधिक है। इससे पहले पिछले दशक में सबसे अधिक तापमान 32.7°C (2024) और 31.9°C (2016) रहा था। चिंताजनक बात यह है कि श्रीनगर का मई माह का दीर्घकालिक औसत अधिकतम तापमान (24.7°C) से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है।

श्रीनगर के निवासी व वरिष्‍ठ पत्रकार वाहिद भट्ट ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि आम तौर पर इतनी गर्मी जून के मध्‍य में पड़ती है। यहाँ के लोगों को इतनी गर्मी सहने की आदत नहीं है इसलिए लोग परेशान हैं। बीते एक सप्ताह में तो केवल दिन नहीं बल्कि रातें भी गर्म थीं। कल बहुत अधिक गर्मी के बाद जब बारिश हुई तो अचानक ह्यूमिडिटी बढ़ गई और पसीने वाली गर्मी शुरू हो गई। 

घाटी के अन्य शहरों में भी बढ़ा पारा

मौसम विभाग के अनुसार जब किसी पहाड़ी क्षेत्र का तापमान 30 डिग्री के पार पहुँच जाता है तब वहाँ हीटवेव दर्ज कर ली जाती है। श्रीनगर क्षेत्र के अन्य केंद्रों की बात करें तो काज़ीगुंड (अनंतनाग जिले में मौसम का स्टेशन) और पुलवामा जिले में स्थित कोनीबल में पारा 30 डिग्री के पार जा चुका है। वहीं कुपवाड़ा (28.3) और कोकेरनाग (29.2) हीटवेव के करीब पहुँच चुके हैं। कोकेरनाग अनंतनाग जिले में स्थित एक स्टेशन है।  

वहीं जम्मू संभाग में सभी केंद्र हीटवेव की न्यूनतम सीमा को पार कर चुके हैं। जम्मू में 42 डिग्री, बनिहाल (रामबन) में 31, बटोटे में 30.6, रियासी जिले के कटरा में 39 डिग्री, भदरवाह में 30.4 और कठुआ में 43.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ।   

 2016 से 2025 में अधिकतम और न्यूनतम तापमान 

यदि पिछले दस वर्षों के आँकड़ों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कश्मीर घाटी के अधिकांश स्टेशनों में मई के अधिकतम तापमान 30°C से ऊपर पहुँचने लगे हैं। अधिकांश जगहों का तापमान सामान्य से 5 डिग्री अधिक है। पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले क्षेत्रों, जैसे पहलगाम, गुलमर्ग और बनिहाल में भी तापमान लगातार ऊँचे स्तर छू रहा है। कई स्थानों पर तापमान अपने सर्वकालिक रिकॉर्ड के करीब पहुँच चुका है। सामान्य अधिकतम तापमान और वास्तविक तापमान के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है।

जम्मू-कश्‍मीर में बढ़ती गर्मी के संभावित प्रभाव

जलवायु वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। जम्मू-कश्मीर के हालिया तापमान आँकड़े इसके स्पष्‍ट सबूत हैं। इनके प्रभाव इस प्रकार हैं- 

• ग्लेशियरों और हिमनदों पर दबाव बर्फ के तेजी से पिघलने की संभावना बढ़ेगी। शुरुआती महीनों में नदियों में अधिक जल प्रवाह और बाद में जल उपलब्धता में कमी आ सकती है। 

• बढ़ते तापमान की वजह से झेलम और चिनाब बेसिन के जल चक्र पर असर पड़ सकता है।

• बागवानी और कृषि की बात करें तो सेब, चेरी, अखरोट और खुबानी जैसी फसलों को आवश्यक "चिलिंग आवर्स" कम मिल सकते हैं। फलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

• समय से पहले फूल आने और बाद में मौसम की मार से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

• झरनों और छोटे जल स्रोतों का प्रवाह घट सकता है। ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट बढ़ सकता है। भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है।

• ऊँचाई वाले क्षेत्रों की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के आवास बदल सकते हैं। कुछ प्रजातियों को और ऊँचे इलाकों की ओर पलायन करना पड़ सकता है।

झरनों और पेयजल स्रोतों पर बढ़ता संकट

जम्मू-कश्मीर में 6,553 गाँव हैं जहाँ 3,300 से अधिक मीठे पानी के झरने व जलधाराएँ हैं। अधिकांश गाँव पीने के पानी के लिए इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन बीते दो दशकों में आधी से अधिक जलधाराएँ या तो सूख चुकी हैं या फिर छोटी हो गई हैं। 

इस बारे में वाहिद भट्ट ने बताया कि दूर-दराज़ के गाँवों में जलधाराएँ तेजी से प्रभावित हो रही हैं। श्रीनगर के मनगुंड गाँव का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा, “मैं हाल ही में मनगुंड गाँव गया था। वहाँ लोगों से बातचीत में पता चला कि तीन स्प्रिंग ऐक्टिव थे, अब एक ही एक्टिव है। इसमें भी पानी बहुत कम है। जो धाराएँ सूख भी जाती थीं, वहाँ पहले अप्रैल के मध्‍य में पानी आना शुरू हो जाता था; लेकिन अब मई में भी पानी नहीं है।”

रीचार्ज नहीं हो पा रहे भूजल के स्रोत 

जम्मू-कश्मीर में हजारों गाँवों की पेयजल व्यवस्था प्राकृतिक झरनों पर निर्भर है। पिछले कुछ वर्षों में कई झरनों के जल प्रवाह में कमी दर्ज की गई है। बढ़ता तापमान इस समस्या को और गंभीर बना सकता है। सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में तेज बर्फ पिघलने से भूजल पुनर्भरण यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज प्रभावित होता है।

ऊँचे तापमान के कारण मिट्टी से वाष्पीकरण बढ़ता है, जिससे झरनों को पोषित करने वाली भूमिगत नमी कम हो जाती है। कई मौसमी झरने समय से पहले सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट गहरा सकता है। डायलॉग अर्थ में प्रकाशित एक अध्‍ययन के अनुसार कश्‍मीर निरंतर गर्म हो रहा है, जिसकी वजह से यहाँ के जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं। 1980 से लेकर अब तक राज्य के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 के बाद से गर्मी के दिन पहले से अधिक गर्म हुए हैं। 

अध्‍ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है और बीते दो दशकों में  ग्लेशियर 15 प्रतिशत तक सिकुड़ गए हैं। इस वजह से गर्मी का मौसम आते ही प्राकृतिक झरने तेज़ गति से सूख जाते हैं।

हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कैसे पड़ रहा है बढ़ते तापमान का असर?

लखनऊ के जय नारायण पीजी कॉलेज में प्रोफेसर व इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी के काउंसिलर डॉ. चांटिया ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि चूँकि सभी नदियों का प्रमुख स्रोत भूजल होता है और तापमान बढ़ने की वजह से भूजल रिचार्ज धीमा पड़ जाता है और इसके कारण आने वाले समय में हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों का प्रवाह कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जब- जब नदियों के प्रवाह में कमी आती है, तब- तब उसका असर उसके तटों पर बसी मानव सभ्‍यता पर पड़ता है। 

जम्मू-कश्‍मीर में रह रहे लोगों पर कैसे होगा बढ़ते तापमान का असर?

डॉ. आलोक चांटिया एक मानवशास्त्री हैं। उन्होंने बताया कि तापमान का सीधा असर मनुष्‍य के शरीरिक और मा‍नसिक व्यवहार पर भी पड़ता है। आम तौर पर जो लोग मैदानी इलाकों में रहते हैं, उनका शरीर अधिक तापमान को कुछ हद तक झेलने में सक्षम होता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 30 से 40 डिग्री का तापमान असहनीय हो जाता है। शरीर का अंतरिक तापमान जो 37 डिग्री सेल्सियस रहता है वे शरीर की थर्मोस्‍टेट के कारण संतुलित रहता है, लेकिन हीटवेव के कारण जो गलन ऊष्‍म बढ़ती है उसकी तपिश के कारण डीहाइड्रेशन की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है जिससे शरीर में पानी की न्यूनतम क्षमता को पूरा करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में स्‍वास्थ्‍य संबंधी परेशानियाँ बढ़ सकती हैं। (इंडिया वाटर पोर्टल)

Apr 1, 2026

मौसमः भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियाँ


 -  अजय मोहन

प्रशांत और हिंद महासागर से जुड़ा है मौसम का बदलता पैटर्न

फरवरी मध्‍यम में गर्मी की दस्तक के बाद मार्च में ही हीटवेव का आना गंभीर संकेत है। इसके पीछे क्या कारण हैं, जानिए इस रिपोर्ट में जो हाल ही में वैज्ञानिकों ने तैयार की है।

भारत में मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सामान्यतः ला नीना जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र वैश्विक तापमान को कुछ हद तक ठंडा करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के असर को कमजोर कर दिया है। इसका परिणाम यह है कि भारत में सर्दियाँ  छोटी होती जा रही हैं और गर्मी पहले से कहीं जल्दी दस्तक दे रही है। और वर्तमान में चल रहे मार्च के महीना में ऐसा देखने को भी मिल रहा है। 

एक समय था जब मार्च के मध्‍य तक उत्तर भारत में लोग कम से कम हाफ स्वेटर पहन कर रहते थे। दिन में भले ही थोड़ी गर्मी हो, लेकिन रातें ठंडी रहती थीं। ओर जब बात हीट वेव की आती थी, तब मार्च में लोग केवल यह सोच कर रहत में रहते थे कि अभी मई-जून दूर है। लेकिन अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा है। 

क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष भी भारत में फरवरी के पहले पखवाड़े में ही सर्दी लगभग समाप्त हो गई और कई क्षेत्रों में असामान्य रूप से जल्दी गर्मी शुरू हो गई। यह बदलाव केवल तापमान का नहीं है, बल्कि इससे जल संकट, कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

फरवरी से ही बढ़ने लगी गर्मी

मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी के दूसरे पखवाड़े से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। कई स्थानों पर तापमान हीटवेव की सीमा तक पहुंचने लगा।

तीन प्रमुख स्थान जहाँ हीटवेव जैसा महसूस हुआ वो हैं:

1. मुंबई : जहाँ 10 मार्च को तापमान 40°C दर्ज हुआ, जो सामान्य से 7.6°C अधिक था और इसे गंभीर हीटवेव की श्रेणी में रखा गया।

2. दिल्ली-एनसीआर : यहाँ अधिकतम तापमान लगभग 35°C रहा, जो सामान्य से 5–7°C अधिक है।

3. हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र: पहाड़ होने के बावजूद यहाँ सामान्य से 5.1°C से 8°C अधिक तापमान दर्ज किया गया।

मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मार्च से मई के बीच देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक हीटवेव वाले दिन देखने को मिल सकते हैं।

क्या होता है हीटवेव?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) हीट वेव को इस प्रकार परिभाषित करता है- जब तापमान सामान्य से काफी अधिक हो या वास्तविक तापमान एक निश्चित सीमा पार कर जाए तब उस क्षेत्र में हीट वेव घोषित की जाती है। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार तापमान का पैमाना इस प्रकार है- 

• मैदानी क्षेत्रों में: जब अधिकतम तापमान 40°C या उससे अधिक हो

• पहाड़ी क्षेत्रों में: जब तापमान 30°C या उससे अधिक हो

• तटीय क्षेत्रों में: जब तापमान 37°C या उससे अधिक हो

यदि यह स्थिति लगातार दो दिन तक बनी रहती है और एक से अधिक मौसम केंद्रों पर दर्ज होती है, तब इसे आधिकारिक रूप से हीटवेव घोषित किया जाता है।

हीटवेव को विस्तार से समझिए इस टेबल में -

 क्षेत्रआधार मानदंडहीटवेव (Heatwave)गंभीर हीटवेव (Severe Heatwave)
 मैदानी क्षेत्र   (Plains)जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 40°C या उससे अधिक होसामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 45°Cसामान्य से 6.4°C से अधिक या वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 47°C
 पहाड़ी क्षेत्र   (Hills)जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 30°C या उससे अधिक होसामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिकसामान्य से 6.4°C से अधिक
 तटीय क्षेत्र  (Coastal)जब किसी मौसम केंद्र का अधिकतम तापमान कम से कम 37°C या उससे अधिक होसामान्य से 4.5°C या उससे अधिक—

सर्दियाँ  क्यों हो रही हैं छोटी?

रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष उत्तर भारत में दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई।

• फरवरी में 81% वर्षा की कमी दर्ज की गई।

• सामान्यतः फरवरी में लगभग 22.7 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल 4.2 मिमी बारिश हुई।

इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) सामान्य से अधिक आए, लेकिन अधिकांश कमजोर रहे और पर्याप्त बारिश नहीं कर सके। कम बारिश और बादलों की कमी के कारण तापमान तेजी से बढ़ने लगा और सर्दी जल्दी समाप्त हो गई।

ला नीना भी नहीं रोक पा रहा गर्मी का बढ़ना

आमतौर पर ला नीना प्रशांत महासागर में ठंडे समुद्री तापमान से जुड़ा एक जलवायु चक्र है, जो वैश्विक तापमान को कुछ हद तक कम करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह पैटर्न बदलता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025, ला नीना की स्थिति के बावजूद 1901 के बाद आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। पिछले 11 वर्षों में से सभी 11 वर्ष रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ गया है कि अब प्राकृतिक शीतलन प्रभाव भी पर्याप्त नहीं रह गया।

बढ़ती आर्द्रता और ‘वेट बल्ब तापमान’ का खतरा

तटीय क्षेत्रों में केवल तापमान ही नहीं, बल्कि नमी भी तेजी से बढ़ रही है। इससे वेट बल्ब तापमान बढ़ता है। यानी वह तापमान जिसे शरीर महसूस करता है। जब नमी अधिक होती है तो शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इससे हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ने के साथ-साथ अन्‍य कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी

वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंद महासागर का तेजी से गर्म होना भी मौसम के असंतुलन का बड़ा कारण है।

• 1950 से 2020 के बीच हिंद महासागर का तापमान लगभग 1.2°C प्रति शताब्दी की दर से बढ़ा।

• भविष्य के मॉडल बताते हैं कि 2000 से 2100 के बीच यह वृद्धि 1.7°C से 3.8°C प्रति शताब्दी तक हो सकती है।

यह समुद्री गर्मी मानसून, वर्षा और चक्रवातों के पैटर्न को भी प्रभावित कर सकती है। समुद्र का तापमान जितना अधिक होगा मॉनसून में आने वाले चक्रवात उतने अधिक विनाशकारी होंगे। बीते वर्षों में बुलबुल, फानी, मोचा, सितरंग, आदि कितने भयावह थे, यह भारत व पड़ोसी देशों के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अच्‍छी तरह जानते हैं।   

उत्तर भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

उत्तर भारत विशेषकर इंडो-गंगेटिक मैदान, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली पहले से ही गर्मी की लहरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र हैं। यहाँ पर मई-जून में लू चलना आम बात है। हीट-वेव के दिन बढ़ने के कारण गर्म हवाएँ और अधिक गर्म हो सकती हैं। 

इससे इन राज्यों में निम्नलिखित जोखिम बढ़ सकते हैं:

1. लंबी हीटवेव से ज्यादा समय तक गर्म हवाएँ

2. रात्रि के तापमान में वृद्धि 

3. पेट संबंधी बीमारियों का खतरा 

4. जल संकट और भूजल पर दबाव

5. गेहूं जैसी रबी फसलों पर असर

6. शहरी क्षेत्रों में हीट आइलैंड प्रभाव

7. श्रम उत्पादकता में गिरावट 

भारत में मौसम के पैटर्न के बदलने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान बढ़ने के कारण जो सरकार ने बताए 

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्‍न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्‍तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार: 

भारत में तापमान में परिवर्तन

1901 से 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी का परिणाम है, हालांकि मानव गतिविधियों से उत्पन्न एरोसोल तथा भूमि उपयोग और भूमि आवरण (LULC) में बदलाव इसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। पिछले तीन दशकों (1986–2015) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस और सबसे ठंडी रात का तापमान लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।

समुद्र के स्तर में वृद्धि

वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण महाद्वीपीय हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्री जल का तापीय प्रसार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते दुनिया भर में समुद्र का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है। उत्तरी हिंद महासागर (NIO) में 1874 से 2004 के बीच समुद्र स्तर में वृद्धि की दर लगभग 1.06 से 1.75 मिमी प्रति वर्ष रही, जो पिछले लगभग ढाई दशकों (1993–2017) में बढ़कर करीब 3.3 मिमी प्रति वर्ष तक पहुँच गई है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात

बीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर 1951–2018 के बीच उत्तरी हिंद महासागर बेसिन में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की कुल वार्षिक संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इसके विपरीत, मानसून के बाद के मौसम में आने वाले बहुत गंभीर चक्रवाती तूफानों (Very Severe Cyclonic Storms - VSCS) की आवृत्ति पिछले दो दशकों (2000–2018) में स्पष्ट रूप से बढ़ी है, जिसमें औसतन प्रति दशक लगभग एक अतिरिक्त घटना दर्ज की गई है।

हिमालय में परिवर्तन

हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में 1951 से 2014 के बीच औसत तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के दशकों में इस क्षेत्र के कई हिस्सों में हिमपात में कमी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रवृत्ति देखी गई है। हालांकि इसके विपरीत, उच्च ऊंचाई वाले काराकोरम हिमालय में सर्दियों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक हिमपात हुआ है, जिसके कारण यहाँ के ग्लेशियर अन्य क्षेत्रों की तुलना में सिकुड़ने से काफी हद तक बचे हुए हैं।

भारी वर्षा और सूखा

1950 से 2015 के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं—यानी एक दिन में 150 मिमी से अधिक बारिश—की आवृत्ति में लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, 1951 से 2015 के दौरान भारत में सूखे की घटनाओं की संख्या और उनका भौगोलिक विस्तार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।

आगे क्या करना होगा?

रिपोर्ट के माध्‍यम से विशेषज्ञों ने कहा है कि बदलते मौसम से निपटने के लिए केवल चेतावनी र्याप्त नहीं होगी। इसके लिए कई स्तरों पर कदम जरूरी हैं:

• शहरों में हीट एक्शन प्लान लागू करना

• जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना

• जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना

• शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र और जल निकायों का संरक्षण

कुल मिलाकर भारत में मौसम के पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सर्दियों का छोटा होना और गर्मी का जल्दी आना अब अपवाद नहीं बल्कि नया सामान्य बनता जा रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन रणनीतियाँ  नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव, जल संकट और मौसम की अनिश्चितता भारत के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है। ( indiawaterportal) ■