मोबाइल में गुम हैं बच्चे
होली में निकलेंगे क्या।
पिचकारी से धार छोड़ने
उनके दिल मचलेंगे क्या।
किलकारी खामोश हो रही
समय कभी बदलेंगे क्या।
बचपन की बगिया सूखी
उन पर जल बरसेंगे क्या।
एआई के बढ़ते दानव
बचपन को कुचलेंगे क्या।
दिग्भ्रमित है बच्चे सारे
और अभी भटकेंगे क्या।
पग- पग में गहरी खाई है
गिर कर ही सम्हलेंगे क्या।
राहों में तो काई जमीं है
और अभी फिसलेंगे क्या।
उड़ न पाए ,दूर गगन में
शातिर पर कतरेंगे क्या।
मचल रहा , उड़ने खातिर
स्वप्न बड़े सतरंगे है क्या।



