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Mar 1, 2026

कविताः किलकारी खामोश हो रही

 -  सतीश उपाध्याय 

मोबाइल में गुम हैं बच्चे 

 होली में निकलेंगे क्या।

 

पिचकारी से धार छोड़ने

उनके दिल मचलेंगे क्या।

 

किलकारी खामोश हो रही

समय कभी बदलेंगे क्या।

 

बचपन की बगिया सूखी

उन पर जल बरसेंगे क्या।

 

एआई के बढ़ते दानव

बचपन को कुचलेंगे क्या।

 

दिग्भ्रमित  है बच्चे  सारे

और अभी भटकेंगे क्या।

 

पग- पग में गहरी खाई है

गिर कर ही सम्हलेंगे क्या।

 

राहों में तो काई जमीं है 

और अभी फिसलेंगे क्या।

 

उड़ न पाए ,दूर गगन में 

शातिर पर कतरेंगे क्या।

 

मचल रहा , उड़ने खातिर

स्वप्न बड़े सतरंगे है क्या।

सम्पर्कः कृष्ण-कुटी, वार्ड नंबर - 10, अग्रवाल लाज के पास
मनेंद्रगढ़ जिला - एम.सी.बी, छत्तीसगढ़ - 9300091563
satishupadhyay36@gmail.com

Nov 2, 2025

दो नवगीतः

 सतीश उपाध्याय 

1. लहर यहाँ भी आएगी

राजहंस पाँखें फैलाओ,

लहर यहाँ भी आएगी 

नमी,जमीं पर  थिरक रही 

हरियल गीत सुनाएगी।


जरा मृदा की खिड़की खोलो 

गर्भ -नीर अकुलाते हैं 

भीतर की ठंडे कम्पन भी

 दहलीजों तक आते हैं ।

 

तुम मधुमासी भाव जगाना

 शीतलता मुस्काएगी 

राजहंस पाँखें फैलाओ 

लहर यहाँ भी आएगी ।

भीतर के भीगे पन्नों में 

बारिश के हस्ताक्षर हैं 

गर्भ में साँसें अभी हरी हैं 

 रिसते  पानी के स्वर हैं।

 

 नीलकंठ बन धीरे-धीरे 

हवा 'तपिश' पी जाएगी 

राजहंस पाँखें फैलाओ,

लहर यहाँ भी आएगी 

 

शापित सारे कालखंड 

जब टुकड़ों में बँट जाएँगे

नैसर्गिक सौंदर्य देख तब 

गीत परिंदे गाएँगे ।

 

निर्वाती फिर यही धरा

 तपोभूमि बन जाएगी

 राजहंस पाँखें फैलाओ 

लहर यहाँ भी आएगी ।

 

बिखरेगी फूलों की खुशबू 

और भ्रमर रसपान करेंगे 

पाषाणों को चूम चूम कर 

जल उसका गुणगान करेंगे।

 

 सारस, बगुले नीड़ बनाना 

मीन मीत बन जाएगी 

राजहंस पाँखें फैलाओ 

लहर यहाँ भी आएगी ।

2. समय करता है जाप

समय नदी की धारा

शोर मचाए

कभी बहे  चुपचाप।


नए परिधान पहन

फूटीं फिर कोपलें

अतीत है धुँधला

वर्तमान में चलें

गतिशील है सपने

उनमें प्रवाह है

उनींदी कलियों को

 सूरज की चाह है।।

 

कदमों की जारी

रहे पदचाप।।

 

झर रहे भीतर

मीठे- से झरने

वक्त चला आया

खालीपन भरने

कैनवास है थिर

रंग  ही बदले हैं

झाँक रहे उजियारे

जो भीतर पले हैं।

 

धड़कन है शीतल

और तन में है ताप।।

 

साँसों में लय है

मन में है ताल

राहों में बिखरे

कितने सवाल

उपवन से फूल का 

 ताज़ा अनुबंध

बाँटेगा दूर तक

 वो अपनी सुगंध।

 

जीवन फूँके शंख

समय करता है जाप।


Apr 1, 2024

. नवगीतः पानी की हर बूँद बचाने

  






-  सतीश उपाध्याय

भीतर की गूँज कह रही

 कोशिश  बारंबार करें 

पानी की हर बूँद बचाने 

खुद को हम तैयार करें ।

*

जल से ही रंगत रौनक है 

धरती की हरियाली 

उत्सव और उल्लास इसी से 

और ऋतुएँ मतवाली ।

*

तितली की है फुरगन इसमें

 बंद कली की शोख अदा

 रस, रंग, परिहास इसी से

 कोयल की है मधुर सदा।

*

 बूँद बद संचय करने की

 युक्ति सौ -सौ बार करें।।

*

नव पल्लव की रक्तिम आभा

बीजों की भी थिरकन है 

ऊँचे , पर्वत ,चट्टानों में

झीलों की भी सिहरन है।

*

हर क्यारी गुलजार इसी से

 खिले फूल में लाली है 

ये रखवाला रूप , गंध का 

हर बगिया का माली है।

*

बूँद तोड़ दे सारी जड़ता 

इन पर तो एतबार करें।।

सम्पर्कः स्वतंत्रता सेनानी कुटी, कृष्णा वार्ड, मनेंद्रगढ़ जिला एमसीबी, छत्तीसगढ़, 9300091563