मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।
Showing posts with label आभा सिंह. Show all posts
Showing posts with label आभा सिंह. Show all posts

Mar 24, 2018

देह मोगरा हो गई

देह मोगरा हो गई 
- आभा सिंह
1
चौखट थामे झाँकता, सँवल सलोना रूप,
होठों पर निखरी रही,मदिर फागुनी धूप।
2
आँखों में जब खिल उठे, भीगे टेसू रंग,
मान भूल अभिमान को, लगा नेह के अंग।
3
पाती लेकर आ गई, फागुन का संदेश,
शेष दिनों को लाँघ मन, पहुँचा पी के देश।
4
पीला टेसू महकता, आँखों बरसे नेह,
इंद्रधनुष सा झर पड़ा, रंगबिरंगा मेह।
5
धीमे पाँव गुज़र गया, ओढ़ रज़ाई शीत,
फूला टेसू गा उठा, रंग -बिरंगे गीत।
6
फागुन आने की खबर, पहुँची नीबू द्वार,
घोले मिसरी गंध में, वंदन को तैयार।
7
फूलों से अंजलि भरे, होठों पर मधु हास,
शुभकामना बोल रहे, कब से खड़े पलास।

Jul 25, 2017

काग़ज़ की ये कश्तियाँ

 काग़ज़ की ये कश्तियाँ 
- आभा सिंह

छरर छरर रेले बहें, भीत झरे दिन रात,
धूल भरे दुखड़े धुले, उजले निखरे पात।

बरखा की आहट सुनें, लेटे आँखें मूँद,
भावों की उमड़न झड़े, छलकी ढलकी बूँद।

धुले- धुले पादप हुए, बरखा झूमी सींच,
जैसे माँ धो-पोंछ शिशु, गोदी भर ले भींच।

बादल जी भर शगुन के, बजा रहा है थाल,
ये तो है उद्घोषणा, सुन रे, भाग अकाल।

भादों की बदली घिरी, बरखा बनी बहार,
आँगन चुल्लू भर रहे, छज्जे ढोलें धार।

नंग -धड़ंग नहा रहे, उछल-कूद भरपूर,
मुखड़े पर उल्लास का, चमक रहा है नूर।

कागज़ की ये कश्तियाँ, सपने लिये हज़ार,
बच्चों की नज़रें लदी, जाना सागर पार।

नभ दमामे कड़कते, चपला तमके पार,
पलक झपक अँधियार है, पलक झपक उजियार।

बिना समय की बारिशें, फिर ओलों की मार,
किसान बेबस घूँटता, दैवी दुख का भार।

गहरी- गहरी बदलियाँ, ख़ूब थपेड़े ढोल,
प्यासी आँखों उमगती, बुँदियों की कल्लोल।


सम्पर्क: 80/173, Mansarovar, Jaipur
(Raj) 302020, abhasingh1944@gmail.com, 08829059234