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Apr 1, 2022

यात्रा संस्मरणः नेतरहाट- बाँस के जंगल या चीड़ वन

- रश्मि शर्मा
बचपन से सुना है नेतरहाट के बारे में। एक तो वहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्‍त, दूसरा नेतरहाट वि‍द्यालय, जो अपनी शि‍क्षा के कारण बेहद प्रसि‍द्ध है। बि‍हार बोर्ड की परीक्षाओं में माना जाता था कि‍ प्रथम दस तक का स्‍थान नेतरहाट आवासीय वि‍द्यालय के बच्‍चे ही प्राप्‍त करते थे।

यह संयोग ही रहा कि‍ देश के अनेक जगहों में जाना हुआ; मगर अपने ही झारखंड के इस सुरम्‍य वादि‍यों में जा नहीं पाई। शायद मन में यह भाव था कि‍ यह तो अपने घर के पास ही है। जब चाहे जाया जा सकता है। हुआ भी ऐसा ही। आनन-फानन में नेतरहाट जाने की योजना बनी और 2 घंटे के अंदर परि‍वार के कुछ लोगों के साथ नि‍कल पड़ी।

रांची से नेतरहाट की दूरी करीब 155 कि‍लोमीटर है। यह क्षेत्र लातेहार जि‍ले में पड़ता है। कुड़ू के बाद लोहरदगा, फि‍र घाघरा से दाहि‍नी ओर मुड़ना पड़ा नेतरहाट के लि‍ए। रास्‍ता अच्‍छा और जाना पहचाना था, सो आराम से चल दि‍ए। घर से नि‍कलते ही दोपहर हो गई थी। समय बचाने के लि‍ए खाना घर ही से पैक कर नि‍कले थे। लोहरदगा के पहले एक जगह रास्‍ते में रुककर हमलोगों ने भोजन कि‍या और आगे नि‍कले।

गर्मी के दि‍न.. दोपहर की धूप मगर पूरे रास्‍ते हरि‍याली। आम से लदे पेड़ और नीचे बच्‍चों का जमावड़ा। कोई पत्‍थर चलाकर आम तोड़ रहा है,  तो कोई गुलेल से नि‍शाना साध पके आम जमीन पर गि‍रा रहा है। लड़कि‍याँ भी कम नहीं थी। खूब ढेला चलाती दि‍खीं। कुछ बच्‍चि‍यों ने अपने फ्राक में आम समेट रखे थे और कुछ तुरंत गि‍रे आमों का स्‍वाद ले रहे थे।

सच कहूँ..तो अपना बचपन याद आ गया। आम चुनने के चक्‍कर में कभी गर्मी का अहसास हुआ ही नहीं। सारी दोपहर आम के बगीचे में बीतता था। पूरे रास्‍ते इन पेड़ों और बच्‍चों को देखकर लगा कि‍ वाकई फलदार पेड़ लगाना परोपकार का कार्य है। मेरे जैसा कोई भी पथि‍क अपनी इच्‍छा पूरी कर सकता है अपने ही हाथों आम तोड़कर खाने की।

खैर ..इन्‍हीं नज़ारों के बीच झारखंड के सुंदर गाँवों को पार करते हम पहुँचे बनारी गाँव। इसके बाद सड़क ऊपर की तरफ जाने लगी। गोल-गोल चक्‍कर खाती सड़कें। ऐसा लगा कि‍ हम कि‍सी पहाड़ पर चढ़ रहे। पि‍छले वर्ष डलहौजी गए, तो ऐसा ही लगा था बि‍ल्‍कुल। नेतरहाट समुद्रतल से 3622 फीट की  ऊँचाई पर है। हम जरा आगे बढ़े तो सड़क कि‍नारे बंदर नजर आए, जैसा कि‍ हर पहाड़ी स्‍थल पर दि‍खता है।

चक्‍कर खाते ऊपर की ओर जा रहे थे। सड़क के दोनों तरफ बाँस का जंगल था। हमने पहली बार बाँस का जंगल देखा। अब जाकर नेतरहाट के नाम का अर्थ भी समझ आया। नेतरहाट नाम इस लि‍ए पड़ा कि‍ नेतुर का अर्थ (बाँस) होता है और हातु यानी‍ (हाट)। इन दोनों को मि‍लाकर बना नेतरहाट। बहरहाल, हम बाँस के जंगल के बीच से गुजर रहे थे। बीच-बीच में कचनार के पेड़ भी नज़र आ रहे थे। कचनार के फूल बेहद खूबसूरत होते हैं। यहाँ आदि‍वासी जनजीवन में कचनार के कोमल पत्‍ति‍यों का साग खाया जाता है। बहुत स्‍वादि‍ष्‍ट होता है यह साग। और फूलों की सुंदरता से तो सभी परि‍चि‍त ही हैं।

हम जंगल की सुंदरता नि‍हारते हुए आगे चलते गए। मन में डर भी था कि‍ कहीं सूर्यास्‍त रास्‍ते में ही न हो जाए। बीच जंगल में जाने की इच्‍छा होते हुए भी समय का ख्‍याल रखते हुए हम नहीं रुके। अब जंगल का दृश्‍य बदलने लगा था। बाँस का जंगल साल के ऊँचे लंबे पेड़ और चीड़ के दरख्‍तों के जंगल में बदल चुका था। हम खुशी और आश्‍चर्य से चीख ही पड़े....हमारे झारखंड में चीड़ के जंगल..हमें आजतक पता ही नहीं। दिये तले  अँधेरा इसीलि‍ए कहा जाता है। यहाँ ऊँचे यूकोलि‍प्‍टस( नीलगिरी) के पेड़ भी हमारा स्‍वागत कर रहे थे।

हम मुग्‍ध भाव से आसपास देखते आगे बढ़ चले। शाम 5 बजे हम नेतरहाट में थे। पूछने पर पता लगा कि‍ सनसेट प्‍वांट यहाँ से करीब दस कि‍लोमीटर की दूरी पर है। अब वक्‍त नहीं था कुछ देखने-सुनने का। हम सीधे पहुँचे सूर्य डूबने का नज़ारा देखने। रास्‍ते में एक खूबसूरत बड़ा- सा तालाब दि‍खा, जो कि‍सी झील की तरह लग रहा था।

जब हम सनसेट प्‍वांइट पहुँचे तो सूर्य अस्‍तचलगामी था। एक बछड़ा अपनी माँ का दूध पी रहा था। अवि‍ ने रुककर गौर से देखा। तस्‍वीर भी ली। आगे बढ़े तो लोगों की भीड़भाड़ थी। सरकार ने सौंदर्यीकरण करा दि‍या है। बैठने के लि‍ए शेड की व्‍यवस्‍था है, तो ऊपर से नज़ारा देखने का जगह भी। मतलब ऐसी जगह जहाँ शाम प्राकृति‍क नज़ारे देखकर बि‍ता सके।

जैसे ही बढ़े..सड़क पर भूरे रंग के फूल बि‍छे थे, जैसे हमारा स्‍वागत कर रहे हो। ऊपर नज़रें उठाकर देखा तो साल के पेड़ फूलों से लदे थे। ऊपर नीले आकाश में आधा चाँद दमक रहा था। पश्‍चि‍म में आकाश पीला था। दो तीन पहाड़ि‍याँ नजर आ रही थीं। मुझे डलहौजी की पहाड़ि‍याँ याद आईं। ऐसा ही खूबसूरत लगता था वहाँ भी। नेतरहाट पठार के नि‍कट की पहाड़ि‍याँ सात पाट कहलाती हैं। आँखों को ऐसा आभास हुआ कि‍ सातों पहाड़ दि‍ख रहे हैं सूरज की पीली रौशनी में चमकते हुए।

सखुआ के जंगल के बीच है यह स्‍थल। आसपास की मि‍ट्टी का रंग लाल था और बैरि‍केटिंग के बाद एक सुंदर स्‍त्री-पुरुष की प्रति‍मा भी थी। लड़की के हाथ में बास्‍केट और लड़के के हाथ में बाँसुरी। स्‍वभावि‍क है, जि‍ज्ञासा ठाठें मारने लगी कि‍ प्रति‍मा क्‍यों बनाई गई यहाँ।

पता चला,  लड़की का नाम मैग्‍नोलि‍या था। मैग्‍नोलि‍या एक अंग्रेज अधि‍कारी की बेटी थी। गाँव में एक चरवाहा रहता था। वह प्रति‍दि‍न अपने मवेशि‍यों को लेकर जंगल में एक स्‍थान पर जाता, जहाँ से खूबसूरत आसमान से देखते-देखते घाटि‍यों में छुपता था सूरज। वह बहुत मधुर बाँसुरी बजाता था।  मैग्‍नोलि‍या को इसी आदि‍वासी चरवाहे से प्‍यार हो गया। वह रोज चरवाहे की बाँसुरी सुनने के लि‍ए वहाँ जाती।

जब अंग्रेज अधि‍कारी को इसका पता लगा, तो बहुत नाराज़ हुआ। उसने चरवाहे को समझाने की कोशि‍श की। जब नहीं माना, तो उसने चरवाहे को मरवा दि‍या। मैग्‍नोलि‍या को जब इसका पता लगा, तब वि‍रह से व्‍याकुल होकर इसी स्‍थान पर आई और अपने घोड़े सहि‍त यहाँ से नीचे घाटी में कूदकर अपना जीवन समाप्‍त कर लि‍या। उसी की याद में बना है यह सनसेट प्‍वांइट, जि‍से नाम दि‍या गया ‘मैग्‍नोलि‍या प्‍वांइट’। आज भी वह पत्‍थर मौजूद है, जि‍स पर बैठकर वो चरवाहा बाँसुरी बजाया करता था। जाने कथा सच्‍ची है या गढ़ी हुई, मगर लोगों को आकर्षि‍त करती है।

अब लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। कुछ लोग हमारी तरह कैमरा हाथ में पकड़े पश्‍चि‍म की ओर टकटकी बाँधे बैठे थे। धूप से पत्तियाँ चमक रही थी। सखुआ के फूल जमीन पर थे और खुशबू हवाओं में। परि‍सर में एक चाय की दुकान थी। वहाँ लोगों की भीड़ लगी हुई थी। गरमागरम पकौड़ियाँ नि‍कल रही थी। लोग चाय-पकौड़ी के साथ शाम का आनंद ले रहे थे। सूखे पेड़ के ठीक बगल में सूर्यास्‍त का नजारा सबसे सुंदर लगेगा, इस अहसास के साथ मैं वहीं खड़ी रही।

शाम का रंग बदलने लगा था। सूरज के आसपास नारंगी रंग फैला था। एक के बाद एक पहाड़ दूर तक नज़र आ रहे थे। लोगों का ध्‍यान सब तरफ से हटकर सूरज की ओर था। आसमान साफ था, सो हम आराम से देख पा रहे थे कि‍ कैसे सूरज के आसपास लालि‍मा बढ़ती जा रही है और गहरे होते आसमान में सूरज बहुत खूबसूरत लगने लगा।

धीरे-धीरे सूरज डूब गया। अब हल्‍का उजाला ही बाकी था। लोग वापस  जाने लगे। पर अब हम वहाँ आराम से बैठे थे। चाय के साथ आलू की पकौड़ी बनवाई;  क्‍योंकि‍ दुकान में प्‍याज खत्‍म हो गई थी। आसपास एक दो घर थे। कुछ गाँववाले ही थे। पर्यटक सारे जा चुके थे।

आसमान में चाँद चमक रहा था। सखुआ के फूल चुनने लगे हमलोग। वादि‍याँ और मनमोहक लगने लगीं। शांत वातावरण में ऐसा लगा, जैसे कोई बाँसुरी बजा रहा हो। जरूर वह चरवाहा मधुर बाँसुरी बजाता होगा, जि‍सके आकर्षण में बंधकर मैग्‍नोलि‍या को प्‍यार हो गया होगा उससे। अद्भुत है जगह..जहाँ एक प्रेम कहानी जिंदा है। वहाँ चरवाहे और मैग्‍नोलि‍या के प्रेम की तस्‍वीरें उकेरी हुई हैं। उस घोड़े की भी प्रति‍मा है, जि‍सके साथ वह लड़की कूद गई थी घाटि‍यों में। एक प्रेम कहानी को मन में गुनते हुए वहाँ से वापस आए।

वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में ठहरना था हमे। रास्‍ते में प्रसि‍द्ध नेतरहाट वि‍द्यालय मि‍ला। कुछ देर वहाँ रुककर देखा। कैंपस के अंदर नहीं गए;  क्‍योंकि‍ शाम ढल गई थी। नेतरहाट वि‍द्यालय की स्‍थापना 15 नवंबर 1954 में हुई थी। 24 जुलाई 1953 को इस वि‍द्यालय की स्‍थापना का निर्णय लि‍या गया था। इसका श्रेय जाता है सर पि‍यर्स को, जि‍नके प्रयास से एक ऐसे आवासीय वि‍द्यालय की स्‍थापना हुई, जि‍सके छात्रों ने अनेकानेक क्षेत्रों में अपने नाम की कीर्ति फैलाई। भारतीय शि‍क्षा जगत में सर पि‍यर्स का अतुलनीय योगदान है। अंग्रेज होने पर भी उन्‍होंने भारत को अपनी कर्मभूमि‍ मान लि‍या था। नेतरहाट का चयन इसलि‍ए कि‍या गया ; क्‍योंकि‍ ग्रामीण परि‍वेश और वहाँ की जलवायु उत्तम थी।

 दरअसल इस तरह के आवासीय वि‍द्यालय की माँग तत्‍कालीन बि‍हार के धनी वर्ग की थी, जो अपने बच्‍चों को सिंधि‍या, दून आदि‍ दूर के स्‍कूलों में भेजने के बजाय पास ही कोई वैसा स्‍कूल चाहते थे, जि‍समें वैसी सुवि‍धाएँ हों।  वि‍द्यालय में शि‍क्षा का माध्‍यम हिंदी है और नामांकन परीक्षा के आधार पर होता है। हालाँकि‍ अब पहले सी उज्ज्वल छवि‍ नहीं, कई और स्‍कूलों का परीक्षाफल भी अच्‍छा होने लगा है पर एक वक्‍त था जब इसी वि‍द्यालय का डंका बजता था।

 इस सुरम्‍य स्‍थल को सामने लाने का श्रेय सर एडवर्ट गेट तत्‍कालीन लेफ्टि‍नेंट बंगाल, बि‍हार एवं उड़ीसा को  जाता है। उन्‍हें यहाँ की प्राकृति‍क सुंदरता से प्रेम था। उन्‍होंने ही अपने आवास राजभवन शैले हाउस का नि‍र्माण के  साथ-साथ अन्‍य बुनि‍यादी संरचनाएँ भी स्‍थापि‍त की। शैले लकड़ी की एक भव्‍य इमारत है। नेतरहाट वि‍द्यालय  के प्रथम सत्र के छात्रों इसी इमारत में पढ़ना शुरू किया था।

अब हम अपने पड़ाव की ओर अग्रसर थे। वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में जाकर आराम करना था। बहुत मोहक और खूबसूरत बना हुआ है रेस्‍ट हाउस। शाम की दूसरी चाय यहीं पी हमने और ढेर सारी बातें भी की। बच्‍चे बैडमिंटन खेलने में लग गए।  कुछ देर बाद जब चाँदनी रात में टहलने नि‍कले, तो चीड़ के दरख्‍त और यूकोलि‍प्‍टस की गगन छूते पेड़ देखकर हमें रोमांच हो आया। रातरानी की खूशबू से परि‍सर महक रहा था।

मगर यहाँ नेटवर्क की समस्‍या थी। न रि‍लाइंस का फोन कार्य कर रहा था, न जि‍यो न वोडाफोन। बस ऐयरटेल का एक नंबर चालू था। दूसरी दि‍क्‍कत यह कि‍ बहुत छोटी जगह है। खाने-पीने के सामान मि‍लने में भी परेशानी होती है। स्‍थानीय बाजार साप्‍ताहि‍क है, इसलि‍ए सब्‍जि‍यों की भी आमद कम है। होटल भी कम ही हैं और ऐसे दुकान भी, जहाँ से सामान लि‍या जा सके। हालाँकि‍ कुछ घर ऐसे नजर आए हमें, जिन्हें देखकर लगा कि‍ उन लोगों ने अपने घर को गेस्‍ट हाउस में तब्‍दील कर दि‍या है। यह देखकर वाकई बहुत दुख होता है कि‍ इतनी खूबसूरत जगह को सरकार तरीके से डेवलप करे, तो कि‍तने लोग आएँगे यहाँ। नेतरहाट को यूँ ही 'छोटानागपुर की रानी' नहीं कहा जाता। वाकई बहुत खूबसूरत वादि‍याँ हैं मगर उपेक्षा की शि‍कार।

हमारा खाना यहीं रेस्‍ट हाउस में बना। कुछ लोग जगह की तलाश में आए वहाँ, मगर बि‍ना बुकिंग के संभव नहीं था ठहरना। खाने के बाद सब लोग एक बार फि‍र टहलने नि‍कले। गर्मी कम थी। राँची का मौसम तो अब बहुत बदल गया है। बि‍ना एसी के काम नहीं चलता। मगर बाहर तो ठंडी हवा थी और रात कमरे में एक पंखे से काम चल गया। हमें सूर्योदय के लि‍ए सुबह उठना था , मगर सोने को कोई तैयार ही नहीं था। मुश्‍कि‍ल से दो-तीन घंटे की नींद ले पाए। सुबह चार बजे सारे लोग उठकर तैयार।

सूर्योदय के लि‍ए पता लगा कि‍ राज्‍य पर्यटन वि‍भाग का होटल है प्रभात वि‍हार होटल, वहीं जाना होगा। हम सब तुरंत वहाँ के लि‍ए नि‍कले। पहुँचे तो पता लगा कि‍ होटल और आसपास बन रहे बि‍ल्‍ड़ि‍ग के ऊपर चढ़कर लोग देखते हैं सूरज का नि‍कलना। महसूस हुआ कि‍ इससे कहीं बेहतर है अपने रेस्‍ट हाउस के उस प्‍वाइंट से देखना जो खास इसके लि‍ए बनाया गया है। वहाँ के कर्मचारी ने कहा भी था कि‍ यहाँ से बहुत अच्‍छा दि‍खता है, आप देख सकते हैं।

अब वापस रेस्‍ट हाउस। उजाला फैलना शुरू ही हुआ था। सूरज नि‍कलने में देर थी। बच्‍चे आनंद लेने लगे। सामने घना जंगल। परतों में पहाड़ दि‍ख रहा था। आसपास चीड़ के पेड़ थे। गुलमोहर के फूल ज़मीन पर गि‍रे थे। बच्‍चे चीड़ के फल जमा करने लगे तो कभी ट्री हाउस पर चढ़कर सूरज को आवाज लगाने लगे। पूरब की तरफ पहाड़ों के ऊपर, चीड़ की पत्तियों के पीछे से सूरज नि‍कलने लगा। हल्‍की धुंध के पीछे से नि‍कलता सूरज सबको रोमांचि‍त कर रहा था। वैसे भी शहरों में लोग कहाँ देख पाते हैं सूर्योदय। सूरज की पहली कि‍रण का स्‍पर्श कि‍तना सुखकर हो सकता है..यह देर से बि‍स्‍तर छोड़ने वालों को क्‍या पता।

कुछ देर बात सूर्य की रश्‍मि‍याँ फैल गईं सब ओर। हम भी बि‍खर गए अपनी-अपनी पसंद की जगह देखने के लि‍ए। फोटोग्राफी के लि‍ए सबसे अच्‍छा वक्‍त होता है सुबह का।

 मैं कैमरा लि‍ए नि‍कल गई वहीं। देखा, दूर जंगल में लोग पानी की बोतल थामे चले जा रहे है। अब लोटे का रि‍वाज खत्‍म हुआ न.....सरकार का नारा अभी हर जगह स्‍वीकार्य नहीं। शायद वो ‘सोच नहीं सो शौचालय भी नहीं’। नजरें घुमाकर देखा.. फूलों का रंग और चटख था। यूकोलि‍प्‍टस के सफेद , चि‍कने तने और गगनचुंबी डालि‍यों ने हैरत में डाला हमें। बेगनबोलि‍या की सफेद, गुलाबी फूल मन मोह रहे थे तो तरह-तरह के फूलों से जमीन पटी हुई थी। पेड़ से गि‍रे भूरे पत्ते और पेड़ों पर लगे हरे पत्‍ते मि‍लकर अद्भुत दृश्‍य बना रहे थे। हमने खूब तस्‍वीरें ली।

सूरज की गर्मी महसूस होने लगी। हमें वापस जाना था आज ही ; क्‍योंकि‍ अचानक प्‍लान बना कर आए थे। गर्मी देखकर ये लगा कि‍ दि‍न में कहीं घूमना संभव नहीं होगा। इसलि‍ए बेहतर है एक बार और घूमने के लि‍ए जाड़ों में आए जाए। यहाँ आसपास कई फॉल है। ऊपरी घाघरा झरना नेतरहाट से चार कि‍लोमीटर की दूरी पर है और नि‍चली घाघरा झरना 10 कि‍लोमीटर की दूरी पर। हालाँकि‍ पता चला कि‍ गर्मी के कारण पानी कम है अभी, इसलि‍ए जाने का कोई फायदा नहीं।

हमारा मन लोध झरना जाने का ज़रूर था। इसे झारखंड का सबसे ऊँचा झरना माना जाता है। कहते हैं कि‍ झरने के गि‍रने की आवाज आस-पास 10 कि‍लोमीटर तक सुनाई पड़ता है। यह नेतरहाट से 60 कि‍लोमीटर की दूरी पर बुरहा नदी के पास है।  मगर सभी लोग जाने के लि‍ए तैयार नहीं हुए। सुबह के चार बजे उठने की आदत नहीं कि‍सी की सो सब अलसाए लगे। हमने तय कि‍या कि‍ कुछ दि‍नों बाद फि‍र आएँगे यहाँ।

हमने सामान समेटा और नि‍कल गए। थोड़ी दूर पर नाशपाती का बाग मि‍ला। फल लदे थे, मगर कच्‍चे थे अभी। अब वापसी में वही सब नज़ारा। घने दरख्‍त, कोईनार या कचनार के पेड़..चीड़ के ऊँचे पेड़ और बाँस के घने जंगल से आती सरसराहट की आवाज। रास्‍ते में नदी मि‍ली जि‍सका पानी कम था।

हाँ, इस वक्‍त आम के पेड़ के नीचे बच्‍चे कम थे मगर सड़कों पर लकड़ी ले जाते कई लोग मि‍ले, खासकर औरतें। सड़क पर जगह-जगह कुछ सूखने के लि‍ए कटहल के बीज पड़े थे। जब कटहल पक जाते हैं तो उनके बीज नि‍कालकर सब्‍जी बनाई जाती है।

मैंने अक्‍सर देखा है-गाँव में पक्‍की सड़क पर कभी धान सूखने डाला होता है तो कभी महुआ। आज कटहल के बीज देखे, वो भी बहुत सारे। धूप सर पर थी। सड़कों में सन्‍नाटा। बच्‍चे सो गए थे। हमें भी नींद आ रही थी। लगभग चार घंटे का सफ़र था और उसके बाद हम अपने घर में। जल्‍दी ही दोबारा आने के वादे के साथ।

सम्पर्कः रमा नर्सिंग होम, मेन रोड, राँची, झारखंड- 834001, मो. 9204055686, email- ashmiarashmi@gmail.com

Jan 1, 2021

संस्मरण- सोहराई पेंटिंग का जादू

सोहराई पेंटिंग का जादू 
-रश्‍मि‍ शर्मा

कुछ वर्ष पहले एनएच 33 पर राँची से रामगढ़ जाने वाली सड़क से गुज़री तो देखा, ओरमांझी बिरसा जैविक उद्यान के पास दीवारों पर बड़ी खूबसूरत पेंटिंग उकेरी गई है। इतनी खूबसूरत कि  नि‍गाहें फिर-फिर देखने को वि‍वश हो जाएँ। सोहराई पर्व तो जानती थी; मगर पेण्टिंग की तरह इसे दीवारों पर उकेरा हुआ पहली बार देखा था।

उसी क्षण इच्‍छा हुई कि  इन दीवारों पर कूची चलाकर खूबसूरत बनाने वालों से मि‍लूँ और प्रत्यक्ष देखूँ कि  कैसे सधे हाथों से दीवारों पर रंग-बि‍रंगी आकृति उकेरी जाती है।

हमारे झारखण्ड में सोहराई पर्व दीपावली के दूसरे दि‍न मनाया जाता है। बचपन की याद है कि  दीपावली की दूसरी सुबह... यानी सोहराई के दिन जानवरों को सजाकर उन्मुक्त विचरने के लिए छोड़ दिया जाता था।

उस वक़्त सोहराई पेण्टिंग तो नहीं जानती थी; मगर आसपास के घरों में दूधी मि‍ट्टी से दीवारों पर आकृति‍याँ बनाते देखा था घरों में। कई घरों में भिंडी के डंठल वाला हि‍स्‍सा काटकर उसे रंग में डूबोकर दीवार पर फूल-पत्तियाँ उकेरी जातीं। कई दीवारों पर तो उँगलियों से ही इतनी सजीव चि‍त्रकारी होती थी कि  मिट्टी के घर खिल उठते थे।

बचपन की यादों को ताज़ा करने के लिए शहर के विभिन्न हिस्सों समेत रेलवे स्टेशन में भी सोहराई पेंटि‍ग नज़र आने लगी। सरकार स्थानीय कला को बढ़ावा दे रही, यह सोचकर बहुत अच्छा लगा।

कुछ लोगों से पता कि या तो जानकारी मिली कि  दीपावली के आसपास हजारीबाग के कुछ गाँवों में जाने पर वहाँ की दीवारों पर रंग उकेरते कलाकार मि‍ल जाएँगे।

देखने की जि‍ज्ञासा तो जबरदस्‍त थी, इसलिए दीपावली के दूसरे दि‍न कुछ साथि‍यों के साथ एकदम सुबह नि‍कल पड़ी राँची से हजारीबाग की ओर। हजारीबाग से करीब 35 कि लोमीटर दूरी पर स्‍थि‍त है भेलवाड़ा गाँव, जहाँ की पार्वती देवी सोहराई की मँजी हुई कलाकार है।

हमारे एक साथी पहले भेलवाड़ा जा चुके थे, इसलिए सुबह करीब ग्‍यारह बजे हम लोग भेलवाड़ा गाँव में पार्वती देवी के घर के सामने खड़े थे। मैं तो उनके घर के बाहरी दीवार की ख़ूबसूरत कलाकृति देखकर ही पागल हुई जा रही थी।

वि‍भि‍न्‍न प्रकार के फूल-पत्तों के साथ जानवरों की आकृति से पूरी दीवार रंगी हुई थी। सफ़ेद, काला, हल्‍का पीला और कत्‍थई या मि‍ट्टी के रंग का प्रयोग कर सभी आकृति‍याँ बनाई गई थीं। आकृति‍यों में स्‍पष्‍ट नज़र आ रहा था घोड़ा, साँप, मछली और कई अनचीन्‍हे-से जानवर एवं फूल-पत्तियाँ।

हमारे साथ गये लोग पार्वती देवी को तलाशने लगे और मैं रंगों और पेंटिंग की दुनि‍या में खो गई। फटाफट कई एंगल से तस्‍वीरें नि‍कालने लगी।

पार्वती देवी अपनी गाय-बकरि‍यों को लेकर चराने गई थी। पड़ोस के एक आदमी को कहकर उनको अपने आने की ख़बर भि‍जवाई और हमलोग सोहराई पेंटिंग देखने में डूब-से गए। कहना न होगा, कि  खपरैल घर भी इन रंगों और आकृति‍यों से इस क़दर खूबसूरत लग रहा था कि  आज के टेक्‍सचर भी इसके आगे कुछ नहीं।

कुछ देर में ही पार्वती देवी आ गईं और उन्‍होंने घर के अंदर का दरवाज़ा खोला। हालाँकि  बाहरी कमरा खुला था, जि‍स पर एक खाट बिछी हुई थी। बुलाए जाने से पहले उनका पड़ोसी इतनी मेहमानवाज़ी नि‍भा गया कि  हमें घर के अंदर बि‍ठा दि‍या था। यह सम्मान भी गाँवों में ही मिलता है। शहर में अनजान लोगों को कोई घर के कमरे में नहीं बिठाता।

मगर हम लोगों को बैठना कहाँ था? हमें तो पेंटि‍ग की बारीकी देखनी और समझनी थी। यह सब बि‍ना पार्वती देवी के आए संभव नहीं था। उनके आने तक मैंने आसपास के जमा हुए लोगों से इतनी जानकारी प्राप्‍त कर ली कि  गाँव की आबादी करीब दौ सौ की है, जि‍नमें कुछ घर करमाली और अधिकतर कुर्मी महतो के हैं। यह भी देश के सामान्‍य गाँव की ही तरह है मगर अब इस गाँव की पहचान सोहराई आर्ट बन गया है। गाँव के अधिकतर घरों में सोहराई पेंटिंग होती है, मगर पार्वती देवी ने सोहराई को अंतरराष्‍ट्रीय पहचान दी है।

अब हमलोग पार्वती देवी के आँगन में पहुँच गए। चारों तरफ़ की दीवार पर पेंटिंग की हुई थी। सामने गोहाल था, जि‍समें बकरी और गाय बँधी थी। लि‍पाई कर मि‍ट्टी की दीवारों को चि‍कना कर दि‍या गया था और उसके ऊपर कलाकारी की गई थी।

'कि न रंगों का प्रयोग कर आकृति‍याँ उकेरती हैं आप?' इस सवाल पर जवाब में पार्वती देवी ने बताया कि 

केवल प्राकृति‍क रंगों का ही इस्‍तेमाल करती हैं वह।

पेंटिंग करने की प्रक्रिया में दीवारों को पहले गोबर से लीपा जाता है। इसके बाद नागरी मि‍ट्टी से उसकी पुताई कर एक तरह से कैनवास बना दि‍या जाता है। फि‍र हाथों के इस्‍तेमाल से वि‍भि‍न्‍न आकृति‍याँ बनाने लगती हैं दीवारों पर।

यह हुनर उन्‍हें वि‍रासत में मिला है। कहती हैं कि  जब वे बारह साल की थी, तभी अपनी माँ से यह सब कुछ सीखा था। सोहराई पेंट करके वह घोड़ा, खरगोश, कदंब के पेड़ और फूल-पत्तियाँ उकेरती हैं दीवार पर।

मैंने सोहराई पेंटिंग में हाथी, साँप, मोर और हरि‍ण की भी आकृति देखी थी, मगर पार्वती देवी ये सब आकृति‍याँ नहीं बनातीं। क्‍यों, पूछने पर कोई स्पष्ट कारण नहीं बता पाईं। बस इतना कहा कि  हमें शुरू से ही मना कि या गया है, इसलि‍ए नहीं बनाते। कई कलाकार दूसरे रंगों का भी इस्‍तेमाल कर लेते हैं; मगर हम केवल प्राकृति‍क रंग का ही उपयोग करते हैं।

जाहिर है, मन में उठा सवाल होंठो पर आ गया-'रंग कहाँ से लाती हैं?'

'अलग-अलग रंगों की मि‍ट्टी होती है, जि‍से चरही से दस कि लोमीटर दूर सदरा गाँव से लाया जाता है। काली, पीली और गेरूआ मि‍ट्टी को पीसकर पहले चलनी से चालकर फुलाने के लिए छोड़ दि‍या जाता है। उसके बाद उस मि‍श्रण में गोंद मि‍लाकर रंग तैयार कि या जाता है।'

सोहराई कला का इति‍हास तलाशने की कोशि‍श की, तो पता चला कि  इस क्षेत्र के इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखे जा सकते हैं। इसका प्रचलन हजारीबाग जिले के बादम क्षेत्र में आज से कई वर्ष पूर्व शुरू हुआ था, जि‍से बादम राजाओं ने काफ़ी प्रोत्साहित कि या।

आदिवासी संस्कृति में इस कला का महत्त्व जीवन में उन्नति से लगाया गया था, तभी इसका उपयोग दीपावली और शादी-विवाह जैसे अवसरों पर कि या जाता था, जिससे कि  धन और वंश दोनों की वृद्धि हो सके।

पार्वती देवी के बताने से याद आया कि  'कोहबर' की प्रथा अब भी कई परि‍वारों में है, जहाँ शादी के बाद दूल्हा–दुल्‍हन को एक कमरे में ले जाया जाता है।

कमरे की दीवार पर रंगों से कुछ आकृति‍याँ बनाई जाती थीं, जि‍समें फूल-पत्ते, जानवर और कई बार दुल्‍हन की डोली लि‍ये कहार की आकृति भी होती थी। मैंने कई शादि‍यों में देखा है इस प्रथा को निभाते। कोहबर के आगे दूल्हा-दुल्‍हन बैठकर अँगूठी छुपाने-ढूँढने का खेल खेलते हैं और दुल्‍हन की सहेलि‍याँ दूल्हे के साथ चुहल करती है।

पता लगा कि  बादम राज में जब कि सी युवराज का विवाह होता था और जिस कमरे में युवराज अपनी नवविवाहिता से पहली बार मिलता था, उस कमरे की दीवारों पर उस दिन को यादगार बनाने के लिए कुछ चिह्न अंकि त कि ए जाते थे और कि सी लिपि का भी इस्तेमाल कि या जाता था जिसे वृद्धि मंत्र कहते थे।

बाद के दिनों में इस लिपि की जगह कलाकृतियों ने ले ली और फूल, पत्तियाँ एवं प्रकृति से जुड़ी चीजें उकेरी जाने लगीं। कालांतर में इन चिह्नों को सोहराई या कोहबर कला के रूप में जाना जाने लगा। धीरे-धीरे यह कला राजाओं के घरों से निकलकर पूरे समाज में फैल गई। राजाओं ने भी इस कला को घर-घर तक पहुँचाने में काफ़ी मदद की।

कहा जाता है कि  यह-यह कला हड़प्‍पा संस्‍कृति‍ की समकालीन है। इसका प्रयोग वि‍वाह के बाद वंश वृद्धि और दीपावली के बाद फ़सल वृद्धि के लि‍ए इस्‍तेमाल करते हैं। मान्‍यता है कि  जि‍स घर के दीवार पर कोहबर और सोहराई की पेंटिंग होती हैं, उनके घर में वंश और फ़सल की बढ़त होती है।

पार्वती देवी बताती हैं कि  इस कला के बदौलत वह वि‍देश घूम आई और इन सबके पीछे बुलू इमाम का हाथ है, जो तीन दशकों से ज़्यादा वक़्त से इस कला को मुकाम देने की कोशिश में जुटे हैं।

पार्वती की आँखों में वि‍देश में कला प्रदर्शन कर लौटने की चमक तो है, मगर नि‍यमि‍त आमदनी नहीं होने का मलाल भी है। कहती हैं–'नाम तो मि‍ला हमें, मगर रोजगार नहीं। अगर सरकार इस कला को सहेजती है, तो परंपरा जीवि‍त रहेगी, वरना खत्‍म हो जाएगी।'

बात करते-करते हम बाहर नि‍कल आए। साथ में कुछ तस्‍वीरे ले ही रहे थी कि  दूर से एक झक सफेद कपड़ों में झुकी कमर को लाठी का सहारा देकर हमारी ओर आती एक स्‍त्री दि‍खी। वह पार्वती की 80 वर्षीया माँथी। पास आने पर बताया कि  नदी में नहाने गईं थी और वहीं से लोटे में पानी भरकर ला रही हैं।

बातचीत में वह तनिक रुष्‍ट लगीं। 'सबलोग आते हैं देखने मगर कोई पैसा देने नहीं आता। कैसे चलेगा हमारा काम।'

हमने उनकी कुछ मदद तो की, मगर इस तरह की थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद से काम नहीं चलेगा उनका, हम जानते थे; परंतु ज़्यादा कुछ तुरन्त कर पाना हमारे लिए भी संभव नहीं था।

पार्वती देवी वहा से उठाकर हमें घर के दूसरे हि‍स्‍से पर ले गईं। वहाँ देखा कि  सोहराई कला को कपड़े पर उतारा जा रहा है। कपड़े की तह लगाकर रंगीन मोटे धागे से सि‍लाई कर वैसी ही आकृति‍ उकेरी जा रही है, जैसी दीवारों में है। इसे इधर 'लेदरा' कहते है, जि‍से बि‍छाने या ओढ़ने के काम में लि‍या जाता है। समझि‍ए कि  दोहर का ही एक रूप है।

पार्वती ने बताया कि  इसकी माँग है; इसलि‍ए हमलोग लेदरा में पेंटि‍ग करने लगे हैं। इससे कुछ पैसे की आमदनी हो जाती है। एक तरह से काथा स्‍टि‍च जैसा ही लग रहा था देखने में और सुंदर भी।

देर हो चुकी थी और हमलोगों को राँची वापस भी आना था। हमें लौटने का उपक्रम करते देख पार्वती ने थोड़ी उदासी के साथ कहा-'हमलोग तो एक बार में ही पूरी आकृति‍ दीवार पर उकेर देते हैं, मगर आने वाली पीढ़ी पता नहीं इसे सहेज पाएगी कि  नहीं? अब तो घर भी पक्‍के बनने लगे हैं। कहाँ उकेरेंगे इसे और सीखेगा कौन?'

फिर धीमे स्‍वर में कहा–'अबकी आइएगा तो पुराने कपड़े लेते आइएगा। हमारे लेदरा बनाने के काम आएगा।'

जाने दोबारा कब जाना हो, मगर एक कसक लिये हम लौटे कि  इतनी सुंदर कला कहीं गुम न हो जाए। यह ठीक है कि  इन दि‍नों रेलवे स्‍टेशन, शहर की कई दीवारों और एयरपोर्ट पर हमें सोहराई पेंटि‍ग दि‍ख रहा है, जो नजरों को खूबसूरत तो लगता ही है और देश-वि‍देश में भी ख्‍यात हो गया है। मगर जब तक इसे रोज़गार से नहीं जोड़ा जाएगा, युवा पीढ़ी इसे अपनाएगी नहीं। वॉल पेंटि‍ग से नि‍कालकर सोहराई को कैनवास और कपड़ों पर उतारने के प्रयास में ज़्यादा ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है, ताकि  मिथिला पेंटिंग की तरह इसका बाज़ार बन सके।

राँची, झारखंड, rashmirashmi@gmail. com

Dec 6, 2020

क्षणिकाएँ- स्मृतियाँ

- रश्मि शर्मा

जंगल में खिला है पलाश

स्मृतियाँ हैं तुम्हारी

है बैंजनी आकाश

और

सूखे पत्तों से घिरा मधुमास।

*********

स्मृतियों में है

कोई सुगन्ध, कुछ रंग

गुजऱ कर भी कहाँ

गुजरता है सब कुछ जीवन से..।

***********

स्मृतियों में बसी होती है

गोधूली बेला

और

गोधूली बेला में

स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचता....। 

 

सम्पर्क: राँची, झारखंड

Oct 5, 2020

क्षणिकाएँः स्मृतियाँ

-रश्मि शर्मा
जंगल में खिला है पलाश
स्मृतियाँ हैं तुम्‍हारी 
है बैंजनी आकाश
और
सूखे पत्‍तों से घिरा मधुमास। 
*********
स्मृतियों में है 
कोई सुगन्ध, कुछ रंग 
गुज़र कर भी कहाँ 
गुजरता है सब कुछ जीवन से..।
***********
स्मृतियों में बसी होती है
गोधूली बेला
और
गोधूली बेला में
स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचता....।  

राँची, झारखंड

Jul 12, 2018

मानसून पाखी / आषाढ़ का चाँद

1. मानसून पाखी
 - रश्मि शर्मा

ओ मेरे मानसून पाखी
हर दिन भोर में
आँख खुलते ही
सुनती हूँ तेरी पिउ-पिउ
और जानती हूँ
प्यास की समाप्ति? का
मौसम है ये
तू साथ अपने
बूँदे लेकर आया है
मेघों को संग लाया है
तेरी पिउ-पिउ सुन
मेरा भी जी भर आया है
ओ मेरे मानसून पाखी
स्वाति? बूँद की आस
तुझे भी है मुझे भी
तू बुझा ले
अपने मौसमों की प्यास
मुझे भी मिलेगा चैन
मिटेगी, जन्मों की प्यास
जब होगा मिलन पिया से 
इन्हीं ख्वाहिशों में
इस बरस बारिशों में
ओ मेरे मानसून पाखी
जब तेरे पंखों में
घुल जाए पावस के रंग
तब उड़ जाना तू
दूर पिया के देस
उन तक ले जाना तू
मेरी बरसती आँखों के संदेस।


1. आषाढ़ का चाँद


दुनिया के चितेरे ने
कूची से अपने
रंग दिया
आसमान को
कहीं गाढ़ा नीला
तो कहीं है
बदरंग-सा धब्बा

उस नीले आसमान की
छाती पर
टँका है आज
पीला उदास चाँद
अपनी मरियल
रौशनी के साथ

आषाढ़ की बूँदों को तो
निगल लिया
सूरज के प्रखर
ताप ने
अब ढलती रात को
काले बादलों का ग्रास
बन गया है पीला चाँद

क्या अबकी सावन
बरसेगा झमाझम
ऐ पीले चाँद
तुम न आना आज
आसमान पर
कहीं ऐसा न हो कि?
सावन रूठ जाए...।

सम्पर्क: रांची, झारखंड, E-mail- rashmiarashmi@gmail.com