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Oct 3, 2021

नवगीत- बौराहिन लछमिनिया

-शिवानन्द सिंह सहयोगी’ 

सूखे पत्तों पर सोते हैं 

धुँधले उजले दिन।


नई सुबह ने केवल बदला 

है अपना परिधान,

उसने पढ़ा नहीं है अब तक

गणित, जीवविज्ञान,

नहीं निकाल रही है सुविधा

चुभी पैर में पिन।

 

जहाँ गरीबी के पाँवों में

बँधी हुई है छान

और उठाकर ले जाती हैं 

सूदखोरियाँ धान,

ऐसी लचर व्यवस्था पर है,

लानत, छी-छी, घिन।

 

मौलिक अपने अधिकारों को 

नहीं सकी जो जान,

ऐसे साइलेंसर बोली की 

गई कहाँ है तान,  

हल्की जलन और पीड़ा का

लुप्त हुआ क्या छिन।

 

लोकतंत्र के सजग पहरुए,

नहीं सके यह सोच,

आम आदमी के जीवन में,

कहाँ- कहाँ है लोच,

बौराहिन लछमिनिया जीवित

दाना-दुनका बिन।

Feb 1, 2021

नवगीतः दिल्ली के उन राजपथों से


 -शिवानन्द सिंह सहयोगी’, मेरठ

शहरों में हैं,

पर शहरों की चकाचौंध से,

अभी अछूते हैं |

 

जिसका है घरबार न उसका

आसमान घर है,

मौसम की इस शीत लहर का

असमंजस, डर है,

मजदूरी के,

कई अभावों की छानी के

दर्द अकूते हैं |

 

दिल्ली के उन राजपथों से

मिलती पगडण्डी,

खपरैलों से छाई छत की

फटेहाल बंडी,

देखा भी है,

कई प्रेमचंदों के पग में,

फटहे जूते हैं |

 

गरमाहट के लिए न आते

किरणों के हीटर,

बिन बिजली उपभोग दौड़ते,

बिजली के मीटर,

घासफूस की,

झोंपड़ियों के छेद बूँद का

आँचल छूते हैं |

 

धुँधलेपन की इस बस्ती की

देह पियासी है.

रामराज्य के व्याकरणों की 

भूख उदासी है,

नई नीतियाँ

सब विकास की, कहाँ रुकी हैं?

किसके बूते हैं?

Dec 6, 2020

नवगीत- जागो! गाँव बहुत पिछड़े हैं

- शिवानन्द सिंह सहयोगी

बंसी बजती है विकास की?

कहो! आज तक इन गाँवों में,

जागो! गाँव बहुत पिछड़े हैं।

 

चकबंदी के पाँव गाँव की,

पगडण्डी को मिटा गए हैं,

नई लकीरों से खेतों को,

एक सीध में  लिटा गए हैं,

अभी तलक दुखियाके तन पर,

धोती वही पुरानी जर्जर,

झूल रहे मैले चिथड़े हैं ।

 

धुआँ चिमनियों का उठता है,

आसमान होता है काला,

कागज में सोया रहता है,

वर्तमान का नया उजाला,

पेड़ कटेफसलों की खेती,

ईंटों से ही भरी पड़ी है,

भदई से फागुन बिछड़े हैं ।

 

कुछ झोंपड़ियाँ सुप्त पड़ी हैं,

बस्ती में है गहन अँधेरा,

झाँका है प्रतिदिन पूरब से,

उगता सूरजनया सवेरा,

महलों में सीमेंट घुसा है,

लानों में दूबों की मस्ती,

डीहों पर लेटे चिपड़े हैं ।

 

शिक्षा की मंडी में केवल,

होती है अब कानाफूसी,

ठेके लेने देने में है,

तनिक नहीं कोई कंजूसी,

सूरा-सुराही के चक्कर में,

प्रचलन में बदलाव हुआ है,

शिष्टाचार बिकेबिगड़े हैं।


सम्पर्कः 'शिवाभाए-233 गंगानगर , मेरठ-250001 उ.प्र., दूरभाष- ९४१२२१२२५५