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May 16, 2014

आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में बाल साहित्य

बच्चों के लिए क्या लिखें?

डॉ. हरिकृष्ण देवसरे
 बाल पत्रिका पराग के पूर्व संपादक डॉ. हरिकृष्ण देवसरे जी द्वारा आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन 2007 में बाल साहित्य विषय पर पढ़े गए इस वक्तव्य को अनकही के स्थान पर ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं। उन्होंने बाल साहित्य को लेकर जो चिंता जाहिर की थी वह आज भी उतनी ही चिन्तनीय और प्रासंगिक है। देवसरे जी 14 नवम्बर 2013 को हम सब को छोड़ गए। उन्होंने बच्चो के लिए तीन सौ से अधिक बाल पुस्तकें प्रकाशित कीं। हिन्दी बाल साहित्य पर प्रथम शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत किया है। हिन्दी बाल साहित्य: एक अध्ययन और बाल साहित्य: रचना और समीक्षा देवसरे जी के मानक ग्रंथ माने जाते हैं। दूरदर्शन के लिए अनेक धारावाहिकों, वृत्तचित्रों तथा टेलीफिल्मों का लेखन, निर्देशन एवं निर्माण किया। सन् 1984 से 1991 तक लोकप्रिय बाल पत्रिका 'पराग' का संपादन किया। विभिन्न राज्य सरकारों, केंद्र सरकार, अकादमियों एवं साहित्य- संस्थानों से बीस से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित देवसरे जी को नमन...

आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में बाल साहित्य विषय पर विशेष सत्र के आयोजन नेहिन्दी के आलोचकों द्वारा प्रचारित उस मिथक को तोड़ा है कि हिन्दी बाल साहित्य है ही कहाँदरअसल हिन्दी में बाल साहित्य कितना समृद्ध है इसे जानने-पढ़ने का प्रयास हुआ ही नहींजबकि मैं इस विश्व हिन्दी मंच पर यह बताना चाहता हूँ कि हिन्दी का बाल साहित्यभारत की सभी भाषाओं की तुलना में कही ज्यादा समृद्ध हैं। हिन्दी के बाल साहित्य में स्वतन्त्रता के बाद लगभग सभी विधाओं में न केवल पर्याप्त और श्रेष्ठ बाल साहित्य लिखा गया ; बल्कि बाल साहित्य लेखन की सार्थकता और अपने समय के बच्चों से उसके सम्बन्धों को लेकर बहसें भी हुई। राजा-रानी की सामंती प्रवृत्ति को पोषक कहानियोंपरियों के झूठे हिंडोले पर झुलाने वाली परी कथाओं आदि सभी की सार्थकता पर हिन्दी में जो बहस चली वह आगे जाकर मराठीगुजराती आदि भाषाओं में भी स्वीकार हुई। दरअसलविगत शताब्दी के सातवें दशक से हिन्दी बाल साहित्य लेखन की चिन्तनधारा में बहुत आया और उसे आधुनिक युग के बच्चों की आवश्यकता और उनकी सोच के अनुरूप लिखे जाने पर बल दिया गया। इस मुहिम में धर्मयुगपरागसाप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि पत्रिकाओं ने उल्लेखनीय योगदान किया। मैं यहाँ यह भी रेखांकित करना चाहता हूँ कि बाल साहित्य आलोचना सम्बन्धी सर्वाधिक पुस्तकें आज केवल हिन्दी में उपलब्ध हैं। अब तक बाल साहित्य के विविध विषयों पर सत्तर-अस्सी शोध-प्रबन्ध विभिन्न विश्वविद्यालयों की पी.एच.डी.एम-फिल आदि के लिए लिखे जा चुके हैं। इस समय हिन्दी क्षेत्र के चालीस से अधिक विश्वविद्यालयों में बाल साहित्य पर शोधकार्य चल रहा है।

हिन्दी बालसाहित्य के लिए यद्यपि यह बड़ी चिन्तनीय बात है कि बच्चों के लिए कुछ गिनी-चुनी पत्रिकाएँ ही उपलब्ध है जबकि हिन्दी के विशाल क्षेत्र में बालपाठकों का बहुत बड़ा समूह उपलब्ध है। फिर भी इस बात का संतोष है कि पराग ने जिस आधुनिकताबोध के बाल साहित्य के प्रकाशन की परम्परा 1951 में शुरू की थी उसे भारत सरकार की पत्रिका बाल भारती और हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन की पत्रिका नंदन भी अब आगे बढ़ा रही हैं। ग्रामोफोन में रिकॉर्ड में फँसी सुई से निकलकर नंदन इन दिनों आधुनिक बच्चों की रुचि के अधिक अनुकूल प्रकाशित हो रही है।
आज जब हिन्दी बाल साहित्य की बात वैश्विक मंच पर की जाती है तो हमें नहीं भूलना चाहिए कि सत्तर के दशक में अम चित्रकथाओं ने धूम मचा दी थी; क्योंकि उस समय प्रवासी भारतीय चाहते थे कि उनके बच्चे भारतीय इतिहाससंस्कृतिसाहित्य आदि से जुड़े रहें। लेकिनधीरे-धीरे स्थिति में बदलाव आया। प्रवासी भारतीय बच्चों में हिन्दी की पुस्तकों के प्रति कमी आई। यह कमी स्कूलों में हिन्दी पढ़नेवाले बच्चों में भी परिलक्षित हुई। अपने एक लेख में कमलेश्वर जी नेविदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रथम मध्य-पूर्व क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन का जिक्र करते हुए उस सम्मेलन में अलधु्रवा ओमान के इंडियन स्कूल के श्याम बिहारी द्विवेदी के कथन को उद्धृत करते हुए कहा- कक्षा नौ और दस में शत-प्रतिशत अंक पाने की होड़ में छात्रों ने द्वितीय भाषा के रूप में हिन्दी के स्थान पर अब फ्रेंच या अरबी पढऩा शुरू कर दिया है... क्योंकि हिन्दी मेंमुश्किल हिन्दी साहित्य पढ़ाया जाता है। कक्षा नौ की पाठ्य-पुस्तक का पहला पाठ है श्री प्रतापनारायण मिश्र जैसे विख्यात साहित्यकार की व्यंग्य रचना-दाँत जो संस्कृत के कठिन शब्दों और उद्धरणों से भरी पड़ी है। बच्चों की इसमें रुचि नहीं है।
इस उदाहरण से स्पष्ट है कि हमारे पाठ्य-पुस्तक निर्माता आज के बच्चों की सोच से बहुत दूर हैं और वे आज भी हिन्दी के पुराने से पुराने लेखकों और कवियों की घिसी-पिटी साहित्य सामग्री ही बच्चों को पढ़वाकर काम चलाना चाहते हैं। कारण स्पष्ट है कि उन्हें न ये पता है कि बच्चों के लिए नया और श्रेष्ठ क्या लिखा जा रहा है न ये पता है कि बच्चों को भाषा का ज्ञान कराने के लिए नया क्या कुछ पढ़ाए जाने की आवश्यकता है जब कि सच्चाई यह है कि हर आयु के लिए हिन्दी में श्रेष्ठ बाल कविताएँकहानियाँउपन्यासनाटक विज्ञान कथाएँ-सभी कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जो आज के बच्चों  की रुचि एवं मनोविज्ञान के अनुरूप लिखी गई हैं। आवश्यकता है तो केवल उस पुल की जो ऐसे बाल साहित्य को बच्चों तक पहुँचाने का माध्यम बने। जाहिर है ऐसे पुल का पहला स्तम्भ वे लोग हैं जो बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों के लिए सामग्री का चयन करते हैं। यह गम्भीर प्रश्न है कि जो लोग इस काम के लिए किसी भी संस्था से जुड़े हैं उनके पास श्रेष्ठ बालसाहित्य की सामग्री विशेष रूप से आज के बच्चों के लिए लिखी गई रचनाओं का मूल्यांकन करने और उन्हें एकत्र करने का आधार एवं साधन क्या हैंइसी तरह प्रवासी बच्चों के लिए जो लोग पाठ्य सामग्री तैयार करते हैं वे वास्तव में उनकी भाषायी समस्या और उनके जिज्ञासापूर्ण संसार से वे कितना परिचित हैं, इस पर विचार किया जाना अपेक्षित है। पुल का दूसरा स्तंभ वे प्रकाशक हैं ;जो हिन्दी बाल साहित्य को अब तक केवल थोक बिक्री का साधन मानते रहे हैं। उनका कहना यह है कि हिन्दी में बालसाहित्य का काउंटर सेल ना के बराबर है और वे बालसाहित्य इसलिए छापते हैं कि किसी भी सरकारी खरीद में वह खप जा और उन्हें मुनाफा मिल जाए। यह चिन्ता की बात है कि हिन्दी बाल साहित्य की पुस्तकें पुस्तक विक्रेताओं या उपहार की दुकानों पर उपलब्ध नहीं होता है जबकि अंग्रेजी की पुस्तकें आसानी से मिल जाती हैं। यह भी विचारणीय है कि साठ वर्ष हो जाने के बाद आज तक हिन्दी प्रदेश में जन्म दिवस या दीवाली-दशहरा जैसे त्योहारों पर कीमती खिलौनों के बजाय बाल साहित्य भेंट में देने की कोई परम्परा नहीं बन पाई। तीसरा स्तंभ हैबाल साहित्य समीक्षा का न प्रकाशित होना। हिन्दी के दैनिक अखबारसाप्ताहिक पत्रिकाएँ और मासिक पत्रिकाएँ हिन्दी की विविध विधाओं की पुस्तकों की तो लम्बी-लम्बी समीक्षा छापते हैं किन्तु बालसाहित्य में जो श्रेष्ठ लिखा जा रहा है और बाल साहित्य आलोचना सम्बन्धी जो पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं उनका कहीं कोई जिक्र तक नहीं होता। आज यदि माता-पिता अध्यापक और अभिभावक यह जानना चाहें कि हम अपने बच्चों को कौन-सी श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ने को दें तो उन्हें इस प्रश्न के उत्तर में निराशा ही हाथ लगती है। मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं है कि हिन्दी बालसाहित्य की समीक्षा करने में हुई उपेक्षा के फलस्वरूप विगत साठ वर्षो में हमने हिन्दी साहित्य के पाठक खोएँ है। पिछले साठ वर्षो की जो पीढ़िया बड़ी हुई हैं उन्होंने हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों के अलावा पाठ्येतर साहित्य बहुत कम पढ़ा है और उसके परिणामस्वरूप बड़े होने पर साहित्य के प्रति अनुराग उनमें कम हुआ है। इन सभी कमियों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करने का उद्देश्य यह है कि हम हिन्दी को कहीं उसकी जड़ में कमजोर बना रहे हैं क्योंकि कमलेश्वर जी के शब्दों में अगर कहूँ तो हिन्दी के पाठक हमें श्रेष्ठ बालसाहित्य के आँवे में पककर ही मिलते हैं। और बाल साहित्य की उपेक्षा करके हमने बच्चों को साहित्य से दूर किया है जिसके परिणामस्वरूप उनमें संवेदनशीलता और मानवीय सम्बन्धों की मधुरता कम हुई है। इसलिए हिन्दी बाल साहित्य को यदि आज विश्वमंच पर प्रस्तुत होने का अवसर मिला है तो हमें उसकी समस्याओं के साथ-साथ श्रेष्ठतम के चयन की प्रक्रिया की परिकल्पना भी निर्धारित करनी होगी।
बच्चों की बदलती मानसिकताऔद्योगिकता का उन पर प्रभाव और फिर नई सामाजिक संरचना ने जब अस्सी के दशक में यह अनिवार्य बना दिया कि घिसी-पिटी कहानियोंकविताओं आदि से मुक्त करके बच्चों को आधुनिकताबोध की रचनाएँ दी जाएँ तो लोगों को भय लगा कि हम कहीं अपने इतिहास संस्कृति या भारतीयता से उखड़ न जाएँ। लेकिन यह सोच बड़ी नकारात्मक सोच थी क्योंकि यह भी तो उचित न था कि दुनिया आगे निकल जाए और हम कूपमंडूक बने बैठे रहें। बाल साहित्य में आधुनिकता बोध की जब चर्चा की गई तो उसका तात्पर्य जहाँ वर्तमान सामाजिक संरचना और परिवेश से रहा है वहीं उस भविष्य के संदर्भ में देखती है- उस भविष्य के पार जो बेहद चुनौतियों भरा हैजिसमें संस्कृतियों  और परम्पराओं के लिए चुनौतियाँ हैं जिसमें नई मान्यताएँ और जीवन-शैली पल्लवित होगी और जिसमें मानवता का स्वरूप क्या होगा इस बारे में विद्वानों और चिन्तकों में तरह-तरह की शंकाएँ हैं। हम जो भविष्य बच्चों को देनेवाले हैंवह कैसा होगाउसमें क्या मानवता जीवित बचेगी या दम तोड़ देगीये और ऐसे ही अनेक प्रश्न आज केवल भारतीय संदर्भ में ही हमारे बाल साहित्य की चिन्ता का विषय नहीं है बल्कि विश्व के संदर्भ में भी बाल साहित्य लेखकों की यह चिन्ता उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त हो रही है क्या हिन्दी के बाल साहित्य को इन समसामयिक सरोकारों से नहीं जुडऩा चाहिएमुझे लगता है कि इस परिप्रेक्ष्य में जब आधुनिकताबोध के बाल साहित्य  की रचना की पहल की गई तो उस समय से आज तक जिस बाल साहित्यकारों ने इस वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ बालसाहित्य लिखा उनके ही प्रयत्नों का फल है बच्चों की मानसिकता में निरन्तर बदलाव आया है और हर पीढ़ी ने बड़े होकर अपनी भावी पीढ़ी को वह सोच और वैज्ञानिक विरासत दी है जिस आधुनिकताबोध का बाल साहित्य कहा गया।
आज के बाल साहित्य की रचना से यह उपेक्षा की जाती है कि वह आज की नई संस्कृतिवैज्ञानिक दुनिया और सूचना प्रौद्योगिकी के युग में भारतीय मूल्यों की रक्षा करते हुए उन्हें उनकी आज की भाषा में उपलब्ध हो। उनकी विषय-वस्तु और कथानाक ऐसे हो जो उसे अपने में बाँध लें। इसलिए बाल साहित्य लेखकों को बच्चों के उस भविष्य को पहचानना होगा जो उन्हें चुनौतियों के रूप में मिलने वाला है। आज बालसाहित्य लेखक के चिन्तन का फलक इतना विस्तृत होना चाहिए कि वह राष्ट्रीयता और देश की सीमाओं के पार सुदूर अन्तरिक्ष तक फैला हो। आज छोटे-छोटे बच्चे अन्तरिक्ष में उड़ान की बात करते हैं विज्ञान की कथाओं में भविष्य मॉडल बनाते हैं तब हम उन्हें संस्कृतनिष्ठ शब्दों से युक्त प्रतापनारायण मिश्र का व्यंग्य निबन्ध दाँत पढ़ाकर क्या बताना चाहते हैहमारी परम्पराहमारा इतिहास हमें प्रेरणा दे सकता हैमूल्यों की रक्षा करना सिखा सकता हैं। किन्तु यदि वह भविष्य में अग्रसर होने की भावना को कुंठित बनाने लगे तो वह घातक हो सकता हैं क्योंकि हमें नहीं भूलना है कि आज बच्चे इतना सक्षम हैं कि वे आपको स्वयं नकार देंगे। आपकी और अपनी व्यवस्थाओं को रिजेक्ट कर देंगेक्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें क्या चाहिए। मैं यहाँ अंग्रेजी के एक बालसाहित्य आलोचक की उक्ति कहना चाहता हूँ कि आप बच्चों को कोई भी पुस्तक पढऩे के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं और यह भी जरूरी नहीं है कि उनके लिए लिखी गई बाल साहित्य की हर पुस्तक वे स्वीकार ही कर लें। बालसाहित्य तो वहीं है  ,जिसे बच्चे पढऩा पसन्द करेंफिर चाहे वह बुनियादी तौर पर बड़ों के लिए ही क्यों न लिखा गया हो। आज विश्व बालसाहित्य के क्लेसिक्स-गुलीवर्स टेल्सराबिसन्न क्रूसोडेविड कॉपरफील्डटॉमसायर आदि बच्चों के लिए नहीं लिखे गये थेलेकिन बच्चो ने उन्हें अपना लिया। इसलिए हिन्दी में बाल साहित्य लेखन को इस सोच से बाहर निकालना होगा कि उन्होंने जो लिखा वह ही सही बाल साहित्य है।
भारत आज विश्व के देशों के लिए एक बड़ा औज़ार बन गया है और हर दिशा में उपभोक्तावादी संस्कृति का आक्रमण हो रहा है- उसके केन्द्र में बच्चे पहले नम्बर पर है और दूसरे नम्बर पर महिलाएँ हैं। जो लोग आज की उपभोक्तावादी संस्कृति से परिचित हैवे यह जानते हैं कि इसके दूरगामी परिणाम हमारे लिए कितने घातक सिद्ध होने वाले हैं। वे हमें अपने आदर्शोमूल्यों और अपनी मीन से काटकर अलग कर देने वाले हैं। मुझे लगता है कि आज बाल साहित्यकार का दायित्व बच्चों के चारों ओर पल रही उपभोक्तावाद की विषैली अमरबेल के खतरों के प्रति सावधान करना है। आज के बाल साहित्य में युगानुरूप बदलाव अनिवार्य है। उसेअमरबेल के खतरों के प्रति सावधान करना है। आज के बाल साहित्य में युगानुरूप बदलाव अनिवार्य है।
उसेउपभोक्तावादी संस्कृति के मायाजाल और चमकदमक में फँसे रहे बच्चों को उससे सावधान करना है। बच्चों को आज के जीवनसमाज और संस्कृतिराजनीतिअपराध आदि वातावरण से अपरिचित न समझें। वे दरअसल आज के इस विषैले माहौल से बचने के रास्ते तलाश कर रहे हैं। उनहें तलाश है ऐसे शस्त्रों की जिनके बल पर वे भविष्य मेंसमाज की विकृतियों और विषैलेपन का विनाश कर सकें। कौन देगा उन्हें ये शस्त्रयह बालसाहित्यकार ही है जो अपनी सशक्त रचनाओं से बच्चों में नई चेतनानई स्फूर्ति ला सकता है और सूचना प्रौद्योगिकी एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के विषैले दुष्प्रयोग के प्रति सावधान कर सकता है। हिन्दी बाल साहित्य के समक्ष आज ये चुनौतियाँ केवल भारत के स्तर पर ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी हमारी चिन्ता का विषय होना चाहिए।
विश्व मंच पर हिन्दी बाल साहित्य की लोकप्रियता की स्थिति भविष्य से ज्यादा गम्भीर हो सकती है ; क्योंकि धीरे-धीरे सूचना प्रौद्योगिकी का जो विकास हो रहा है वह किताब को और भी गैर-जरूरी बनाने की कोशिश कर रहा है विदेशों में नई पिढ़ी यों भी प्रौद्योगिकी की नवनीतन खोजों के प्रति आकृष्ट हो रही है और जहाँ हिन्दी में ब्लॉगिंग लेखन को विकसित किया जा रहा हैवहीं भाषायी टैक्नोलॉजी को भी बढ़ावा देने की कोशिशें हो रही है ताकि बहुद्देशीय कम्पनियों और भारत के बीच सहयोग में बढ़ोत्तरी हो सके। यों भी भाषा पढऩा विशेष रूप से साहित्यिक भाषा पढऩा और भी कम होता जा रहा है। तब हिन्दी पढऩे वालों और स्वयं हिन्दी का विदेशों में क्या हश्र होगा?
इसलिए यदि प्रवासी भारतीय बच्चों को बचपन से ही अपनी जड़ों से जोड़े रखना हैतो यह केवल बाल साहित्य के द्वारा ही संभव है और उसकी अहमियत को समझकर हिन्दी के विकास से जोड़ना होगा कि विश्वमंच पर उसकी जरूरत की पैरवी की जा सके। बाल साहित्य ही बच्चों को भारतीय भाषासंस्कृतिइतिहासभूगोलत्योहाररिश्तों से जोड़े रखने के संस्कार दे सकता है। बच्चों को यह सरल और रोचक ग्राह्य भाषा में मिलेगा तो वे  उसे हृदयंगम कर लेंगे और तब वे अपनी जड़ों से भी दूर नहीं होंगे। इसी पर निर्भर करेगा- हिन्दी का भविष्यहिन्दी समाजहिन्दी संस्कृति और साहित्य का भविष्य।

सम्पर्क:  102 एच.आई.जी.ब्रजविहार पोस्ट- चन्द्रनगरगाजियाबाद- 201011 (उत्तर प्रदेश)

कहानी सुनाने की कला

विश्व की सर्वश्रेष्ठ किस्सागो थी वह बुढिय़ा

हरिकृष्ण देवसरे
 अपनी बात शुरू करने से पहले एक छोटा-सा किस्सा सुनाता हूँ। अकबर के दरबार में एक बार बीरबल विलम्ब से पहुँचे। अकबर ने बीरबल से विलम्ब का कारण पूछा तो बीरबल ने कहाहुजूरमेरे घर में एक छोटा बच्चा रूठ गया था। उसे मनाने में देर लग गई ।

क्या कहते हो बीरबल। भला बच्चे को मनाना कोई मुश्किल काम हैजो तुम्हे इतनी देर लगी। अकबर ने कहा।
यकीन कीजिए हुजूर बच्चों को मनाना बड़ा मुश्किल काम है। बीरबल ने कहा।
हम नहीं मानते। अकबर ने कहा। तब बीरबल बोलेहुजूर हाथ कंगन को आरसी क्यामैं बच्चा बन जाता हूँ आप मुझे मनाकर देखिए।
बादशाह अकबर सहमत हो गए। बीरबल ने बच्चा बनकर रोना शुरू किया।
अकबर ने पूछाक्यों रोता है?
मुझे गन्ना चाहिए। बीरबल ने कहा।
ठीक है गन्ना पेश किया जाये। अकबर ने आदेश दिया।
गन्ना आया तो बीरबल ने कहाइसकी गंडेरिया काट दो। तुरंत गन्ना छीलकर उसकी गंडेरिया काट दी गईंलेकिन बीरबल फिर रोने लगे।
‘’अब क्या चाहिए?’’- अकबर ने पूछा
इन गंडेरियों को जोड़ दो। बीरबल के यह कहने पर अकबर सचमुच चकरा गए और बोलेमान गए बीरबलतुम ठीक कहते थे। लेकिन अब हम असली बच्चे का मज़ा देखना चाहते हैं।
बीरबल ने तुरंत अपने नाती को बुलवा भेजा। नाती आया तो आते ही मचल गया।
अरे बच्चेक्या चाहिए। अकबर ने पूछा।
एक गिलास पानी चाहिए। बच्चे ने कहा।
तुरन्त पानी पेश किया गया। पानी आने पर बोलाअब नहीं पीना पानी। और रोने लगा।
तो क्या चाहिएबीरबल ने पूछा।
मुझे हाथी चाहिए!
अकबर बोलेबेटे इतना बड़ा हाथीहमारे दरबार में यहाँ कैसे आ सकता हैलेकिन बच्चे ने तो हाथी के लिए जिद पकड़ ली थी। वह रोने लगा।
बीरबल ने कहाहुजूर परेशान न हों। मैं कुछ उपाय करता हूँ। और बीरबल ने छोटा-सा हाथी का खिलौना मँगा दिया,
लेकिन बच्चा फिर रोने लगा। बोलाहाथी को पानी के गिलास में डाल दो।
लो डाल दिया! बीरबल ने कहा।
अब हाथी पर बादशाह को बिठा दो। बच्चे ने जैसे ही यह कहा तो सारे दरबार में हँसी का फौव्वारा छूट पड़ा।
अकबर ने कहाबीरबलहम बिल्कुल मान गए। बच्चे को मनाना बहुत मुश्किल काम है।
बच्चों की रुचि को समझनाउन्हें मनाना और प्रसन्न रखना सरल काम नहीं है। बच्चों को मनाने का पारम्परिक उपाय उन्हें तरह-तरह की कहानियाँ सुनाना भी रहा है। बड़ी उम्र के बच्चों को रात में आराम की नींद सुलाने में भी कहानियों की बड़ी  महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। कहानियाँ बच्चों को सपने में वास्तविकता का आनंद देती हैं। अपने कल्पना-जगत् में उन कहानियों के नायक वे स्वयं बनकर उनके सुख-दुख को अनुभव करते हैं। बच्चों को उन्हीं कहानियों को सुनने में आन्न्द आताजिन पात्रों से उनका तादात्म्य स्थापित हो जाता है। बच्चों को कहानियाँ सुनाने वाले दादा-दादी या नाना-नानी जानते हैं कि ऐसी कहानियों का चयन करना कितना मुश्किल काम है। बच्चों को वे जैसे ही कहानी सुनाना शुरू करते हैं कि बच्चे कह देते हैंये कहानी तो हम पहले सुन चुके हैं। तब हर दादा-दादी  या नाना-नानी के लिए रोज एक नई कहानी सुनाना भी मुश्किल हो जाता हैलेकिन तब भी वो कुछ न कुछ सोचकरकोई न कोई कहानी सुनाते ही हैं। मैंने ऐसे कई लोगों को देखा हैजो पुस्तकालयों में बैठकर कहानियों की किताबें पढ़ते हैं और फिर जाकर अपने पोते-पोतियों को कहानियाँ सुनाते है। लेकिन ऐसे भी लोग मैंने देखे हैंजिनके पास कहानियों का अटूट भंडार हुआ करता था। वे लोककथाओंपंचतंत्रकथा सरित्सागरअरेबियन नाइट्स आदि के अलावा अपने जीवन के अनुभवों के विपुल भंडार हुआ करते थे। ऐसे लोगों से कहानियाँ सुनने वाले बच्चे कभी ऊबते नहीं थेक्योंकि उन्हें उनसे हर बार नई  कहानी ही सुनने को मलती थी।
कहानियों के विपुल भंडार वाले ऐसे दादा-दादी या नाना-नानी की जो श्रोता बाल-मंडली होती थीउसकी स्थिति उल्टी होती थी। उन्हें जो कहानी बहुत पसंद होती थीउसे वे बार-बार सुनने की फरमाइश किया करते थे। उन सुनाने वालों की परेशानी यह होती थी कि उन्हें एक कहानी को कई बार सुनाने में ऊब अनुभव होने लगती थी। फिर भीबच्चों की फरमाइश के सामने उन्हें झुकना पड़ता था। अलीबाबा चालीस चोरसिंदबाद जहाजी के किस्सेकिस्सा चहार दरवेश आदि कुछ ऐसी ही कहानियाँ थीं। इसके अलावा वे सभी कहानियाँ भी बहुत अच्छी लगती थींजिनमें रहस्य-रोमांच होता थाजिनमें कौतूहल होता थाजैसे किस्सा गुलबकावली आदि।
बड़ों द्वारा बच्चों को कहानियाँ सुनाने की इस परम्परा का एक  सबसे बड़ा लाभ यह होता था कि उनसे बच्चों को अपने समाजइतिहासदेशधर्म और संस्कृति की बहुत-सी बातें जानने को मिलती थीं। आज के आधुनिक समाज मेंछोटे परिवारों मेंनौकरी के कारण माता-पिता से दूर रहकर जीवन जीने के लिए विवश परिवारों में यह परम्परा खत्म होती जा रही है। और पठन-पाठन में कम होती हुई रुचि के कारण भविष्य में दादा-दादी बनने वाली आज की पीढ़ी में तो कहानी सुनाने की इस कला का बिल्कुल लोप हो जाएगा। आज कुछ परिवार भले ही मिल जाएँजिनमें बुजुर्ग लोग अपनी भावी पीढ़ी को किस्से-कहानियाँ सुना देते होंलेकिन भविष्य के प्रति आज आशान्वित होना सम्भव नहीं दिखता।
बड़ों द्वारा बच्चों को कहानी सुनाने के कई उद्देश्य होते थे और  उन कहानियों से वे इन निश्चित लक्ष्यों को भी प्राप्त कर लेते थेजिन्हें वे उन कहानियों के माध्यम से पाने का प्रयास करते थे। उनकी लोककथाओं में जीवन के अनुभव हुआ करते थे- समाज व्यवस्थालोकव्यवहारआचार-विचार के साथ-साथ जीवन और समाज के कुछ ऐसे शाश्वत-मूल्यों को वे बच्चों में संप्रेषित करने में सफल होते थेजिन्हें उपदेश देकर समझाना कठिन था। ये शाश्वत- मूल्यउनमें सत्यन्यायईमानदारीआत्म-सम्मानबड़ों का आदर आदि अनेक सद्गुणों के बीच स्वत: ही अंकुरित करा देते थे। सर्दी की लम्बी रात हो या गर्मी की दोपहरऐसे बुजुर्ग लोगअपनी कहानियों के अक्षय भंडार से बच्चों को बाँध लेते थे। इतिहास की कथाओं में जहाँ प्राचीन ऐतिहासिक पात्रों की शूरवीरता की कहानियाँ होती थींवहीं उनमें अपने देश और गौरव की भावना भी जागृत होती थी। रामायणमहाभारतपुराणों की  कहानियाँ उनमें भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता लाती थीं। इसके अलावा उनके अपने जीवन की अनेक ऐसी घटनाएँ होती थींजिनसे जीवन के प्रति बच्चों को ऐसे निर्देश मिलते थेजिन्हें वे शायद सहज प्राप्त न कर सकें।

दादा-दादी या नाना-नानी से कहानियाँ सुनने के लिएबच्चों में आकर्षण का एक अन्य कारण भी था। वह थी- उनकी कहानी सुनाने की आकर्षक कला। हमारे यहाँ एक जमाने में किस्सागो हुआ करते थे। ये तो पेशेवर किस्सा सुनानेवाले होते थे। लेकिन घर के दादा-दादी भी कहानी सुनाने की कला में कुछ कम माहिर न हुआ करते थे। वास्तव में कहानी के साथ-साथउसे सुनाने की कलासोने में सुहागे का काम किया करती थी। वे उन कहानियों को बड़े ही नाटकीय और प्रभावशाली अन्दाज में सुनाते थे और बच्चे उन्हें सुनते हुए अपनी कल्पना में उन्हें चित्ररूप में देखने लगते थे। ऐसी कहानियों का संकलन करते हुए एक बार ग्रिम-बन्धु एक गाँव में पहुँचेजहाँ एक बुढिय़ा रहती थी और उसके पास कहानियों का भंडार था। ग्रिम बन्धु उसके पास पहुँचे और उन्होंने उससे कहानियाँ सुनाने का आग्रह किया। उस बुढिय़ा ने एक शर्त रखी कि मेरे सामने कोई श्रोता-बालक होगातभी मैं कहानियाँ सुनाऊँगी। ग्रिम बन्धुओं को भी बात ठीक लगी कि श्रोता  होना ही चाहिए। वे तुरंत गाँव के कुछ मित्रों के पास गएऔर उनके बच्चों को वहाँ ले जाने की बात कहीकिन्तु उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहाजब उन मित्रों ने अपने बच्चों को उस  बुढिय़ा के पास भेजने से साफ इनकार कर दिया। उन लोगों ने कहाजानते होवह बुढिय़ा-जादूगरनी हैडायन हैचुड़ैल है... बच्चों पर ऐसा जादू करती है कि वे रात में डरावने सपने देखकर चीखते-चिल्लाते हैंना बाबाहम ऐसी जादूगरनी के पास अपने बच्चे नहीं भेज सकते। तब ग्रिम- बन्धु दूर किसी गाँव में गए। वहाँ से किसी मित्र के बच्चे को लेकर आए। ग्रिम- बन्धु अपने उस अनुभव में लिखते हैं कि हमने उस बुढिय़ा के सामने बच्चे को बिठा दिया और हम दोनों दूसरे कमरे के द्वार पर पर्दे के पीछे बैठ गए। बुढिय़ा कहानी सुनाने लगी और हम कहानियाँ लिखने लगे। वह बुढिय़ा जब कहानी सुनाने लगी तो हमने अनुभव किया कि वह शायद कहानी-सुनाने की कला में माहिर विश्व की सर्वश्रेष्ठ किस्सागो थी। वह कहानी सुनाने के दौरान आवश्यकतानुसार चिडिय़ों की आवाज निकालती या शेर की तरह गुर्राती। कहने का मतलब यह कि वो वर्षाआँधीजानवरोंचीड़िय़ों आदि के ध्वनि प्रभाव अपने मुँह से पैदा करती और कहानी को अत्यधिक प्रभावशाली बना देती। इसी कहानी-कला का प्रभाव वह जादू थाजो बच्चों के मस्तिष्क पर छा जाता थाऔर उसी के प्रभाव के कारण वे सपनों में उन चित्रों को साकार देखकर डर जाते थे। लोग इस राज को जानते न थे और कहानी-सुनाने की कला में श्रेष्ठता-प्राप्त उस बेचारी बुढिय़ा को जादूगरनी या डायन कहकरउसका तिरस्कार करते थे।

हमारे यहाँ कहानी सुनाने की कला तो लुप्त हो ही गई  हैकहानी सुनाने की परम्परा भी मिटती जा रही है। एक तरफ दादा-दादी के पास कहानियों का अभाव दूसरी ओर जनसंचार माध्यमों का प्रसार और छपाई की सुविधाओं का प्रसार होने से लोग बच्चों को कहानियाँ सुनाने से कतराने लगे और आज दशा ये हो गई  है कि बच्चे शायद यह भी नहीं जानते कि दादा-दादी या नाना-नानी के पास जाने या बैठने का एक अर्थ यह भी हुआ करता था कि उनसे बढिय़ा रोमांचक कहानियाँ सुनने को मिला करती थीं।