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Sep 4, 2026

व्यंग्यः भेंट, एक लेखक से

  - गिरिराजशरण अग्रवाल

नित नए लोगों से भेंट करना और भेंट के दौरान उनकी छठी तक के दूध का हिसाब-किताब मालूम करना हम भारतवासियों की राष्ट्रीय हॉबी है। बिल्कुल इसी तरह जैसे दरिद्रता हमारा राष्ट्रीय गुण है और इस राष्ट्रीय गुण को स्थायी बनाए रखने के लिए विदेशी वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेना हमारे वित्तमंत्रियों की हॉबी है।

सो, उस दिन एक साहब से मुलाक़ात हुई. हमने आदत के अनुसार उनका नाम पूछा। नाम था पं. श्यामबिहारी लाल शर्मा। बताया गया ‘लेखक हैं।’ सच मानो, सुनकर बड़ी निराशा हुई. अगले सारे सवाल जैसे ‘वेतन कितना मिलता है?’ या ‘ऊपर की आमदनी कितनी हो जाती है?’ आदि मन-ही-मन में घुटकर रह गए. दरअसल, हम भारतीय पहली भेंटवार्ता में ही व्यक्ति के स्टेंडर्ड का पता लगा लेते हैं और क्षण-भर में यह निर्णय भी कर लेते हैं कि नवपरिचित सम्बंध बनाए रखने के योग्य है या नहीं! वैसे हम जानते हैं कि संपन्न व्यक्ति भी समय पड़ने पर चावल के चार दाने उधार देने से कतरा जाता है, पर आदमी को यह गर्व तो रहता ही है कि उसकी मित्रमंडली में नंगे-बूचे लोग ही नहीं हैं, खाते-पीते संपन्न लोग भी हैं। पराए पैसे पर इतराना हमारी दूसरी राष्ट्रीय हॉबी है।

‘लेखक हैं।’ यह सुनना था कि हम भुन-से गए।  क्रोध हमें इस बात पर था कि होश सँभालते ही लेखकों की जिस भीड़ ने हमारा घेराव शुरू किया था, उसका सिलसिला आज तक जारी है। प्राइमरी स्कूल से लेकर एम.ए. की पढ़ाई पूरी करने तक ये लेखक लोग हमारी छाती पर कुछ इस तरह सवार रहे, जैसे वह हमारी छाती न हो, उनका अपना बैडरूम हो। वैसे हमें शक है कि लेखकों के घर में बैडरूम नाम की कोई चीज़ होती होगी।

तो साहब, होश सँभालते ही हम विद्यार्थी बन गए या यूँ कहिए कि बना दिए गए. रात-रात भर लेखकों की जीवनियाँ रटते। कब पैदा हुए, कब वीरगति को प्राप्त हुए, कौन-कौनसी पुस्तकें लिखीं और क्या-क्या तीर मारे? उनकी रचनाओं का अर्थ याद करते। लेकिन सुबह होते ही लगता कि दिमाग़ का मैदान जो है, वह सारा साफ़ है। बहुत सोचते और बहुत देर तक सोचते लेकिन दिमाग़ में कुछ होता, तभी तो सामने आता। आख़िर सब्र करना हम भारतीयों की तीसरी हॉबी है।

परीक्षा होती तो प्रश्न-पत्र देखकर हमारा ख़ून खौल जाता। लिखा होता-नीचे लिखे गद्यांश का संदर्भ-सहित अर्थ लिखो और यह भी लिखो (या बताओ) कि लेखक द्वारा लिखी गई इन पंक्तियों से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है? अथवा निम्नलिखित पद्यांश का अर्थ अपने शब्दों में विस्तार से लिखो और यह भी बताओ कि इसका लेखक कौन है और यह अंश उसकी किस पुस्तक से लिया गया है? अथवा प्रेमचंद की जीवनी कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखो।

हद हो गई हमारा क्या लेना-देना इन व्यर्थ के सवालों से? यहाँ तो ‘करे कोई और भरे कोई’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यानी ‘करनेवाला कवि और भरनेवाला रवि’।

मरता क्या न करता! हम भी एक ही काइयाँ थे। लेखकों के चंगुल से बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ ही निकाला। वह नक़ल मारनी शुरू की कि बस इस कला में पूरे दक्ष हो गए।  छोटी-छोटी पर्चियाँ जेब में रखकर परीक्षा-कक्ष में जाते। यह अमुक लेखक की जीवनी है, यह अमुक की। यह अमुक पद्यांश का भावार्थ है, यह अमुक का। अब यह बात अलग है कि अक्सर एक लेखक की जीवनी दूसरे के और दूसरे की तीसरे के नाम लिखी जाती और सारा गुड़ गोबर हो जाता। वैसे गोबर करना भी तो हमारी राष्ट्रीय हॉबी है। है कि नहीं?

हाँ, तो हम बता रहे थे कि लेखकों ने बचपन से ही जो हमारी गुद्दी ऐंठनी शुरू की सो अब तक ऐंठ रहे हैं। परीक्षा-कक्ष में यह सोचकर ग़ुस्सा आता था कि अमुक लेखक की जीवनी लिखें और कम-से-कम एक हज़ार शब्दों में लिखें। क्या धाँधली है? यानी हम आम भी आपको खाने को दें और गुठलियाँ भी गिनें। सो, हम जब तक विद्यालय में रहे, आम भी खिलाते रहे और गुठलियाँ भी गिनते रहे।

विद्यालय-जीवन से निकलकर जब यथार्थ के जीवन में आए, तब भी क्रम टूटा नहीं, क्योंकि कान पकडक़र बैठकें लगाने के अलावा जीवन का और कोई अर्थ हमारे लिए है ही नहीं। लेकिन इस त्रासदी के पीछे भी हाथ भाँति-भाँति के लेखकों का ही है। न हम इनकी जीवनियाँ रटते, न मेहनत से काम करके खाने की आदत डालते और न इस हालत में पहुँचते। सीधे-सीधे हाज़ी मस्तान बनकर मौज़ उड़ाते। नोट कीजिए कि जनाब हाज़ी मस्तान को किसी भी छोटे-बड़े लेखक की जीवनी याद नहीं है, यह अलग बात है कि वह जीवित लेखकों के अब तक एक सौ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की अध्यक्षता कर चुके हैं। हाज़ी साहब इस रहस्य से परिचित हैं कि लेखक बनने से ज़्यादा लेखकों के सम्मेलन की अध्यक्षता करना सम्मानजनक होता है।


बात काफी दूर निकल गई।  हम पं. श्यामबिहारीलाल शर्मा की बात कर रहे थे। हमने उन्हें सिर से पाँव तक घूरकर देखा। कहीं-से-कहीं तक कोई निशानी ऐसी नहीं मिली, जिससे प्रमाणित होता कि वे लेखक हैं। सूटेड-बूटेड, मोटे-ताज़े, हँसते-खेलते। न तो उलझे हुए लंबे बाल, न बढ़ी हुई लंबी दाढ़ी। लेखक तो बेचारा समाज में इंकलाब लाने के लिए जीवन-भर क़लम घसीटता है, पर इंकलाब तो आता नहीं, लेखक का ‘जिंदाबाद’ अवश्य हो जाता है। लगता है, यह लेखक-वेखक कुछ नहीं है। यदि है तो डुप्लीकेट। लेखक तो मंटो था, घंटों उकडू बैठकर क़लम घिसता रहता था और जो समय बाकी रहता था उसमें एडि़याँ रगड़ता था, कभी फ़र्श पर तो कभी खाट पर। तब कहीं जाकर एक कहानी पूरी होती थी। कहानी पूरी होते ही मंटो भागता बाज़ार की ओर, जहाँ किसी प्रकाशक के हाथ घास के भाव कहानी बेचता और मंटो से एकदम ‘मंटो साहब’ हो जाता।

लेखक तो मुंशी प्रेमचंद थे। समाज उन्हें उस वक़्त तक यह याद दिलाता रहा, जब तक वे जीवित रहे कि लेखक होने की तुलना में मुंशी होना अधिक सम्मानसूचक है। इसलिए जीते-जी ही नहीं, वरन् मरने के बाद भी ‘मुंशी’ का शब्द उनके नाम का दुमछल्ला बना रहा। मरने के बाद सचमुच बहुत शोधकार्य हुआ मुंशी प्रेमचंद पर, पर शोध इस बात पर भी होनी चाहिए थी कि प्रेमचंद के व्यक्तित्व में लेखक अधिक था या मुंशी और यदि उनमें लेखक अधिक था तो मुंशी उपाधि उन्हें किस कारण दी गई?

गिनती के क्षणों में दर्जनों लेखकों के चेहरे हमारे मन-मस्तिष्क पर उभरे और ग़ायब हो गए, किंतु पं. श्यामबिहारी लाल शर्मा जैसे साफ़-सुथरा, चमकदार, ख़ुशहाल चेहरा उनमें से किसी का नहीं था। सारे के सारे फक्कड़, सारे घनचक्कर, सबके सब खल्लास। संदेह हुआ कि हम भारत में हैं या किसी और देश में। क्या सचमुच हमारे देश में लेखकों की कायापलट हो गई है? लेकिन विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि कल तक तो हमने अपने ही शहर में कई लेखकों को जूतियाँ चटखाते और सड़क नापते देखा था। हमने एक बार फिर अपनी पैनी दृष्टि उन पर डाली। फिर पूछा-’कितना कमा लेते हो भाई, लेखन-कार्य से?’

तुरंत उत्तर मिला- ‘कभी हज़ार, कभी पाँच सौ रुपये प्रतिदिन।’

प्रतिदिन शब्द आश्चर्य भरी चीख़ बनकर हमारे होंठों से फूट पड़ा। मन ही मन दुहराया-’हज़ार रुपये प्रतिदिन। यानी कि तीस हज़ार रुपये महीना। बाप रे बाप! दाता दे और बंदा ले। काश, हम भी लेखक होते और इसी टाइप के होते।’ मन-ही-मन सोचा कि ये या तो फिल्मी-जगत के लेखक हैं अथवा कवि-सम्मेलनों के चुटकुलेबाज़ कवि। वैसे लेखक तो हरगिज नहीं हो सकते, जैसे मुंशी प्रेमचंद जी थे, निराला जी थे या जैसे। हमने नामों की सूची आगे नहीं बढ़ाई. क्योंकि हमें ख़तरा था कि किसी एक नाम पर पहुँचते-पहुँचते हमारा हार्ट फेल हो जाने की नौबत आ सकती थी। हम स्वयं तो फेल हो जाने को हँसी-ख़ुशी सहन करने के आदी थे, किंतु हार्ट फ़ेल हो जाने की बात तो सोच भी नहीं सकते थे। असमंजस के गहरे सागर से अपना सिर उभारते हुए हमने पूछा-'क्यों लेखक जी, यह तो बताओ कि आप लिखते क्या हैं? प् ल्मिी कहानियाँ लिखते हैं आप? (यह बात नोट करने की है, हम उन्हें श्यामबिहारी लाल कहते-कहते एकदम ’लेखक जी’ कहने पर उतर आए थे। क्योंकि अच्छे पैसे वाला या अच्छे पैसे कमानेवाला हो तो हम जैसे टटपूँजिए पर उसका रुआब तो पड़ता ही है। सम्मान भी वह अपना हम जैसे लोगों से करवा ही लेता है।) लेखक साहब ने हमारा सवाल सुना तो तिरस्कार-भरे भाव से बोले- ‘नहीं साहब। फिल्मी-इल्मी कहानियों से क्या लेना-देना है हमें? हम कोई उल्लू या उसके पट्ठे नहीं है, जो रात-रात भर जाग कर फिल्मी कहानियाँ लिखें और बॉक्स ऑफिस पर उनके फ़्लाप होने का तमाशा भी देखें।’

भाई श्यामबिहारीलाल ने फिल्मी-लेखकों पर इतना लंबा लेक्चर दिया कि हम अपनी सुध-बुध भूल गए. हमें विश्वास
हो गया कि फिल्मी लेखकों से अधिक अस्वीकार्य प्राणी शायद ही दुनिया में हो। हमने साहस जुटाकर पूछा- ‘तो आप क्या गीतकार हैं?’

लेखक जी बोले- ‘नहीं जी’ और ‘जी’ पर उन्होंने इतनी दूर तक साँस खींची कि उनकी ‘जी’ हमारे जी का जंजाल बन गई. हमने फिर पूछा- ‘तो क्या आप कहानीकार हैं?’

इस बार उनकी त्योरी पर बल पड़ गए. झुँझलाकर बोले- ‘अरे साहब, कह तो दिया कि हम कहानीकार नहीं हैं और गीतकार भी नहीं हैं।’

‘हो न हो, आप अवश्य ही व्यंग्यकार होंगे।’ लेकिन लेखक जी ने इस 'कार' को भी अस्वीकार कर दिया और हम बेकार के संकट में पड़ गए. सोच रहे थे कि ये कैसे लेखक हैं, कहानी यह लिखते नहीं, कविता यह करते नहीं, व्यंग्य यह सुनते नहीं। तो क्या कोई और विधा प्रचलित हो गई है इन दिनों साहित्य के क्षेत्र में, जो हज़ार-पाँच सौ रुपये रोज़ ही रायल्टी दिला देती है। इच्छा हुई कि पूछें, ‘वह कौनसी विधा है, जिसमें आप लिखते हैं और इतनी मोटी रक़म लेते हैं।’

कुछ पल दोनों के बीच चुप का परदा तना रहा। हमारे मन में जिज्ञासा बिजली की तेज़ी से दौड़ रही थी और हम सोच रहे थे कि इस नई विधा का पता चले तो इस पर पुस्तक ही संपादित कर दें।

साहस करके पूछा-'भाई साहब, यह तो बताइए कि आप लिखते क्या हैं?'

लेखक साहब ने झट उत्तर दिया- ‘दस्तावेज़।’

सारी बात समझ में आ गई. रजिस्ट्री कार्यालय का नक़्शा आँखों में घूम गया। ज़मीन, मकानों के बयनामे कल्पना में उलट-पुलट होने लगे, ‘अमुक पुत्र, अमुक निवासी, अमुक स्थान का हूँ।’

जी चाहा, हास्य-व्यंग्य का यह पुलिंदा बगल में दबाए फिरने की जगह और कलम जेब में अटकाकर गली-गली घटनाओं की खोज में भटकने की बजाय काश हम ऐसे ही एक दस्तावेज़-लेखक होते और हज़ार पाँच सौ रुपये रोज़ ऐंठकर मौज़ की वंशी बजा रहे होते। हमारे मुँह से निकला-‘भारत का एक महान् लेखक श्यामबिहारी लाल दस्तावेज़ लेखक।’■

Aug 1, 2026

व्यंग्यः हम आजाद हैं

  -  विनोद साव

‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं।’ गाते हुए वे झूम रहे थे। सीना तानकर फूल रहे थे। सिर के बाल उनके दिलीप कुमार की तरह लहलहा रहे थे।

मैंने कहा कि ‘ये तो बहुत अच्छी बात है कि आप अपनी आजादी मिटाने लुटाने के लिए तैयार नहीं हैं.. लेकिन लोग आपकी आजादी लूटने के लिए तैयार बैठे हैं तब आप क्या करेंगे’ वे ट्रेजिडी किंग की तरह गमगीन हो गए। फिर फुसफुसाकर पूछे कि ‘ये लूटने वाले कहाँ से आ गए.’

‘लूटने वाले भी आपके आसपास हैं। आपके हुक्मरान हैं।‘ मैंने भी फुसफुसाते हुए कहा।

‘मेरा दिल कोई हिन्दुस्तान नहीं जिस पर हुकुमत की जाए।’ उन्होंने युसुफ मियाँ की तरह धाँसू डायलाग मारा। फिर थियेट्रिकल अन्दाज में वे लाउड हो गए ‘अरे आज गाने का दिन है तो कम से कम गा तो लेने दीजिये।’ मैंने कहा ‘गाइए .. गाइए और अपनी आजादी के जश्न मनाइये।’ मैं उन्हें गाता बजाता छोड़कर आगे बढ़ चला।

चारों तरफ आजादी का शोर है और अपनी आजादी पर जोर है। वे कुदाल फावड़ा लेकर सड़क पर आ गए थे। मैंने कहा कि ‘आजादी का कुदाल फावड़े से कोई सम्बंध है! ऐसा लग रहा है जैसे किसी दूसरे की आजादी पर हमले की तैयारी है।‘

‘दूसरों पर हमले की नहीं बल्कि अपनी आजादी की रक्षा करने के लिए कुदाल फावड़ा जरूरी है।‘ वे सड़क से लगे बीच चौराहे पर खुदाई करने लगे।

मैंने कहा ‘क्या बीच चौराहे पर आप आजादी का झण्डा फहराएँगे!' 

‘झण्डा नहीं फहराएँगे। बल्कि उनकी मूर्ति लगाएँगे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने को कुर्बान किया था।’

‘पर जो कुर्बान हुए वे सब देशप्रेम की भावना से भरे हुए थे। उन्होंने नाम कमाने और अपनी पूजा कराने के लिए अपनी कुर्बानी नहीं दी थी। वे व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे। अगर वे आज जीवित होते और कहीं लोगों को ऐसा करते देखते तो उनकी आत्मा दुखी होती।’

‘पर इससे हमारी आत्मा सुखी होगी। क्योंकि सरकार उन्हीं लोगों पर रहम करती है जिनके बाप दादों की मूर्ति लगी है। जिनकी महिमा के ग्रन्थ छपाये जा रहे हैं। शिलान्यास के पत्थर ही देशप्रेम की गवाही देते हैं। उन्हीं में हमारे पूर्वजों का यशगान और आजादी की दास्तान है।‘ वे सड़क किनारे खुदाई में तल्लीन हो गए।   

शहर भक्ति भाव से भरा है और कर्णधारों के भीतर भक्ति रस की ज्वाला फूट रही है। सौन्दर्य विकास की कई योजनाएँ  हैं। कहीं कमजोरों के अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं तो शक्तिवानों द्वारा अतिक्रमण किए जा रहे हैं। माथे पर तिलक लगाकर और पीताम्बर धारण किए हुए वे मिल गए, कहा - ‘समाज में पाप और अनाचार बढ़ते जा रहे हैं। मनुष्य पतित मार्ग पर विचरण कर रहे हैं। ऐसे लोगों को हमारी महान संस्कृति के द्वार पर लाना जरूरी है।’ वे आश्रम के प्रवेश द्वार का निर्माण करवाते हुए अपने शिष्यों के बीच खड़े थे।

‘गुरुदेव आपका आश्रम बड़ा मनोहारी बन पड़ा है। यहाँ किसम- किसम के फल फूल भरे पड़े हैं। आश्रम के खेतों में फसलें भी जमकर लहलहा रही हैं। गौ शालाओं में उन्नत नस्ल के पशुओं से दूध निकाले जा रहे हैं। आपका आश्रम एक सुन्दर उपवन जान पड़ रहा है। लग रहा है हम अपने शहर में नहीं वृन्दावन में खड़े हैं।’ मैंने भी उनकी राग में राग मिलाया।

वे विहँसे ‘हाँ .. वातावरण बनाने के लिए इतना तो आवश्यक है। फिर इसमें अपना क्या है .. सब ऊपर वाले की कृपा है। जो सेवा करेगा वह मेवा पाएगा। आश्रम के सेवाभावियों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा तो ऊपर वाले की सेवा में भी कोई कमी नहीं होगी।’ मैं उन्हें सत्ता और प्रभुता से मिली उनकी आजादी उनके पास छोड़कर वहाँ से चलता बना।

‘मीलों दूर तक दुपाहिया, तिपहिया, चौपहिया और दस पहिया वाहनों की कतार है। वित्त योजनाओं का चमत्कार रेलवे फाटकों पर मौजूद है। लगता है जैसे सारी वैश्विक योजनाएँ मोटर गाड़ी बनाने और हवाई जहाज उड़ाने में ही झोंक दी गई है। विश्व बन्धुत्व कायम करने की स्पर्धा फाटक के सामने है। फाटक पार करने के लिए शूरवीरों में होड़ मची है। वाहन चालन के बहाने सौन्दर्य दर्शन की धूम है। अब तो ट्रेन आने से पहले फाटक उठाकर भागने के लिए फाटकों की उँचाई भी बढ़ गई है। दोनों ही तरफ जन समूह में वही बेताबी है जैसे 'कैद में है बुल बुल सैय्याद मुस्कराये - रहा भी न जाए कुछ कहा भी न जाए।’ मैंने सर पर कफन बांधकर निकले नौजवान से कहा ‘रुक जाइये.. ट्रेन आ रही है।’

‘रुकने का टाइम कहा है अंकल। ट्रेनों का क्या भरोसा वो तो कभी भी लेट हो सकती हैं।’  वे अपनी बाइक बीच में घुसेड़ते हुए बोले। मैंने कहा- ‘आपने लड़कियों की तरह सिर में पट्टी क्यों बाँध ली है। क्या आपको भी धूप में जल जाने का खतरा है.’ 

‘ये पट्टी तो पिछली बार बंद होते रेलवे फाटक को पार करने का नतीजा है।’ वे किसी फौजी की तरह जुझारूपन के साथ आगे बढ़ गए। उनके साथ पुलिस वालों की एक टोली भी लाइन अटैच हो गई। कुछ भद्र महिलाएँ भी अभद्र तरीके से पार कर गई।  तब किसी ज्ञानी जन के ज्ञान चक्षु खुल गए जनता बड़ी आजाद खयाल की होती है। उसका भी अपना मनोविज्ञान है। उसे भीड़ और शोर पसंद है। हम भीड़ और शोर से घबराते हैं तब वे इसी भीड़ और शोर में आनंद उठाते हैं।  

यह रेलवे फाटक पर आनंद लेने की उनकी आज़ादी थी। सबकी अपनी- अपनी आजादी।

०००

मो. 9009884014


Jul 1, 2026

व्यंग्यः प्रपंच

  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ईमानदारी और पद! भला ईमानदारी और पद का क्या रिश्ता है? हाँ जी है! बड़े पद पर आसीन बड़े-बड़े घपले कर सकता है; क्योंकि यह उसका जन्मसिद्ध नहीं, पदसिद्ध अधिकार है। एक गरीब और भूखा आदमी रोटी चुराए, तो चोर कहलाएगा। बड़े पद पर बैठा व्यक्ति दूसरों का धन चुराए, लेखन चुराए, गबन करे, तो कर सकता है। इससे उसकी इज़्जत पर बट्टा नहीं लगता है। चोर के समर्थन में न्याय और शास्त्रों की दुहाई देने वाले उसके धत् कर्म की निन्दा न करके, जिसका माल चुराया है, उसे मामले को ठण्डे बस्ते में डालने की नसीहत देने लगेंगे। वह छाती ठोंककर चोरी स्वीकार कर लेगा। मामला खत्म! फेसबुक से लेकर विश्वविद्यालयों के भीतर तक बड़े पद पर बैठे छोटे कद वाले लोग कीचड़ में सने मिलेंगे। कोई उनको छेड़ेगा, तो वे उसके ऊपर कीचड़ उछालने से बाज नहीं आएँगे।

बहुत सारे शब्दों का इस दौर में घोर अवमूल्यन हुआ है। उनमें दो शब्द प्रमुख हैं- इण्टरनेशनल और विश्व। गली मुहल्ले के स्कूल भी इण्टरनेशनल नाम रखकर मोटी फीस वसूलकर गर्व से सीना फुलाए हुए हैं और शिक्षा के नाम पर जाने कितने नौनिहालों का भविष्य चौपट कर रहे हैं। जेबी संस्थान के साथ विश्व शब्द का दुरुपयोग करके कितने ही ऐसे लोग रातों-रात अन्तरराष्ट्रीय होने का मुगालता पाले हुए हैं। इनके संस्थान में कुछ दीजिए और बदले में आपको एक प्रमाणपत्र मिल जाएगा। आप बिना कुछ किए धरे अन्तरराष्ट्रीय हो जाएँगे। इनके मंच पर आने के पैसे, मंच पर लंच के पैसे, प्रमाण-पत्र के पैसे। कितना अच्छा है कि कोई भी अनाम गली से निकलकर इनके हाथों सम्मानित होकर रातों-रात अन्तरराष्ट्रीय हो जाएगा। सौदा एकदम सस्ता है।

शैतान की आँत की तरह लम्बी कविता, कहानी कुछ भी लिखिए, बस रिकार्ड आपके नाम दर्ज हो जाएगा। श्रीमान् बुभुक्षित हर वर्ष कुछ महीनों के लिए देश- विदेश के दौरे पर निकलते हैं। वे कभी खाली हाथ नहीं लौटते। कुक्कुरमुत्ता की तरह फैली संस्थाओं के कई प्रमाण-पत्र उनके हाथों में होंते हैं।

प्रचार की भूख आदमी का विवेक छीन लेती है। किसी मंच पर बुलाकर अगर उनको दुलत्ती भी मार दी जाए, तो अगले दिन अखबार में छपा मिलेगा कि उनको अमुक संस्था ने सम्मानित किया है। किसी ने उनको गलती से अपना बैग भी थमा दिया, तो वे सम्मानित महसूस करेंगे। वह भी अखबार में जाकर सम्मान की खबर बन जाएगी। एक ऐसी ही खबर पर मैने श्री बेहया जी को टोका, तो गुर्रा उठे, ‘‘आप मुझसे जलते हैं। आपको धेले की अक्ल नहीं। मुझे कवि गोष्ठी में तहसीलदार साहब ने सम्मानपूर्वक बुलाया था, तो क्या यह मेरा सम्मान नहीं था? क्या मैं उनके बुलाने से सम्मानित नहीं हुआ?’’ 

'सम्मान' शब्द के अर्थ-अपकर्ष की जानकारी मिलने से मेरा ज्ञान बढ़ा। निरुत्तर होने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं था।

आह और वाह का अंतर! मंच पर कुछ अच्छे कवियों के बीच में वानर की तरह उछलकूद करने वाले कवि हर कहीं मिल जाएँगे। ये सड़े हुए चुटकुले सुनाकर काव्य की दुर्गति करने में कभी पीछे नहीं रहते। ताली बजाने की भीख माँगते ये कवि मंच के प्रपंच को भली प्रकार समझते हैं। पत्नी से लेकर मुहल्ले वाली और साली का, यहाँ तक कि किसी दिव्यांग की असमर्थता का उपहास करने में भी नहीं चूकते। चुटकुले को भी कविता का दर्जा देने का अभियान भी ये जोरों से चलाए हुए हैं। गम्भीर श्रोताओं पर भी ये अपनी ऊल-जलूल तुकबन्दी का ढेला फेंकने से बाज नहीं आते। 'वाह-वाह' न सुनें तो इनका चेहरा दयनीय हो जाता है, जबकि अच्छी कविता को सुनकर 'वाह-वाह' नहीं, बल्कि रसविभोर होकर 'आह!' निकलती है कि क्या खूब कहा है! ये वानर कवि मंच से बाद में उतरते हैं, इनकी कविता उससे भी पहले कला-कवलित हो जाती है।

चलते-चलते एक बात और कि किसी का लिखा पढ़ने की बजाय कुछ की रुचि केवल अपना पढ़वाने तक सीमित है। आप उनका लिखा सब पढ़िए, उन पर लिखिए. वे न आपका लिखा कुछ पढ़ेंगे, न आपके बारे में कुछ लिखेंगे; लेकिन सावधान! आप उनको अनपढ़ न कह देना! वे बड़े लेखक हो गए हैं।

Jun 1, 2026

व्यंग्यः शासक हाथी और शोषित कुत्ता

  - डॉ. जेन्नी शबनम

एक कहावत है- ''हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार’’। इसका अर्थ है आलोचना, निन्दा, द्वेष या बुराई की परवाह किए बिना अच्छे कार्य करते रहना या सही राह पर चलते रहना। इसका सन्देश अत्यन्त सकारात्मक है, जो हर किसी के लिए उचित, सार्थक एवं अनुकरणीय है। हम सभी के जीवन में ऐसा होता है जब आप सही हों फिर भी आपकी अत्यधिक आलोचना होती है। अक्सर आलोचना से घबराकर या डरकर कुछ लोग निष्क्रिय हो जाते हैं या चुप बैठ जाते हैं। कुछ लोग अनुचित राह पकड़ लेते हैं और ‘हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार’ कहावत को चरितार्थ करते हैं। वे बिना किसी परवाह के अनुचित कार्य करते रहेंगे, न अपने सम्मान की चिन्ता न दूसरे की असुविधा की फ़िक्र। बस अपना हित साधना है, पूरी दुनिया जाए भाड़ में।   

वर्तमान परिपेक्ष्य में देखें तो राजनीतिक परिस्थितियों पर यह कहावत नकारात्मक रूप से सटीक बैठती है। कुछ नेता स्वयं को हाथी मानकर अति मनमानी करते हैं, अति निर्लज्जता से सारे ग़लत काम करते हैं, असंवेदनशीलता की सारी हदें लाँघ जाते हैं, बेशर्मी से दाँव-पेंच लगाकर बाज़ी चलते हैं। उन्हें न अपनी आलोचना की फ़िक्र है, न अपने कुकृत्यों पर शर्मिन्दगी। पद, पैसा और लालच के सामने उन्हें किसी चीज़ की परवाह नहीं। 

इस सन्दर्भ में सोचें, तो हम आम जनता कुत्ते की तरह हैं, जो हर अनुचित पर लगातार भौंक रहे हैं और सदियों से भौंकते जा रहे हैं। न किसी को हमारी परवाह है, न कोई हमारी बात सुनता है; फिर भी हम भौंकते रहते हैं। ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद करते रहते हैं। हमारे अधिनायक, बादशाह, शासक, नेता, आका, सत्ताधीश बिगड़ैल हाथी की तरह सत्ता हथियाने के लिए भाग रहे हैं और हम जैसे भौंकते कुत्तों को रौंदते जा रहे हैं। वे हाथी हैं, अपने हाथी होने पर उन्हें घमण्ड है और इस अभिमान में पाँव के नीचे आने वाले कुत्तों को रौंदना उनका कर्त्तव्य; क्योंकि ऐसे कुत्ते उनकी राह में बाधा डालने के लिए खड़े हैं।  

भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अन्याय, अत्याचार, तानाशाही, निरंकुशता आदि के ख़िलाफ़ हम कितना भी भौंके, कोई सुनवाई नहीं है। नेताओं को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उन्हें अपने फ़ायदे के लिए जो सही लगता है वे करते हैं; वे हाथी जो ठहरे। आम जनता तो कुत्ता है, भौंके, भौंकता रहे। जिधर रोटी मिलेगी दुम हिलाते हुए कुछ कुत्ता हाथी के पीछे चला जाएगा। कुछ कुत्ता हमेशा की तरह भौंक-भौंककर जनता को जगाएगा, ताकि वे अपना अधिकार जानें और सही के लिए भौंकने में साथ दें। 

जब-जब चुनाव आएगा तब-तब हाथी होश में आएगा और गिरगिट-सा रंग बदलते हुए अपनी चाल थोड़ी धीमी करेगा। बाज़ार से गुज़रते हुए रोटी का टुकड़ा फेंकता जाएगा, थोड़ा पुचकारेगा, थोड़ा दया दिखाएगा; जो झाँसे में न आया उसे पाँव तले कुचल देगा। यों भी पेट और वोट का रिश्ता बहुत पुराना है। पाँच साल जनता कुत्ते की तरह भौंकता है और नेता हाथी की तरह मदमस्त चलता रहता है।

समाज में हर तरह के लोग होते हैं, जो हर कार्य का आकलन, अवलोकन और निष्पादन अपने सोच-विचार से करते हैं। हमारी सोच को शिक्षा, धर्म और संस्कृति सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है। जाने कब आएगा वह दिन जब न कोई शासक होग़ा न कोई शोषित। सभी की सोच पर से धर्म और जाति का पर्दा उठेगा और जनहित को ध्यान में रखकर इंसानियत वाले समाज का निर्माण होगा।  

शासक हाथी और शोषित कुत्ता, खेल जारी है... हाथी अपने मद में चूर जा रहा है और कुत्ते भौंक रहे हैं। हाथी सदा सही होता है और कुत्ता सदा बेवकूफ़! सन्दर्भ भले उलट गया पर कहावत सही है- ‘ हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार।’’

May 1, 2026

व्यंग्यः प्लास्टर वाली टांग

  - डॉ. मुकेश 'असीमित '

आप चाहते हैं कि आप हमेशा दुनिया की नजरों में बने रहें, सबकी निगाहें आप पर टिकी रहें। जिस गली से गुजरें, लोग आपको देखकर रुक जाएँ, हाल-चाल पूछें, आपको याद करें। बस, आप आ जाइए हमारे पास, लगवा लीजिए एक प्लास्टर... सच में, हर जगह आपकी पूछ होगी। जो आपको जानते हैं, जो नहीं जानते, सब आपको रास्ते में रोक सकते हैं। अगर आपके हाथ में प्लास्टर लगा हुआ है, तो आप इस शहर के लिए एक चलता-फिरता अजूबा बन सकते हैं। लोग आपको ऐसे देखने लगेंगे जैसे चिड़ियाघर से कोई प्राणी सड़क पर आ गया हो।

और अगर आपकी टाँग  में प्लास्टर लगा हुआ है और आप घर में कैद हैं, तो लोग आपके घर तक भी आ सकते हैं। पुराने दोस्त, रिश्तेदार, मोहल्ले वाले, जो कभी आपका हाल तक नहीं पूछते, वे भी बिना रोक-टोक आपके दरवाजे पर आ जाएँगे। कसम से, रातों-रात आपको लगेगा कि पूरी दुनिया आपकी टाँग  की चिंता में कितनी बेचैन हो गई है। आपने भले ही कभी किसी के काम में टाँग न फँसाई हो, पर जब आपकी टाँग टूटेगी, तो लोग आपकी टाँग का हाल जानने दौड़े चले आएँगे। इतनी हसरत से आपकी टाँग को देखेंगे जैसे उन्हें लग रहा हो कि यह अवसर उनको क्यों नहीं मिला, काश उनके भी प्लास्टर लगा होता... आज उनके घर पर भी पूछने वालों का जमावड़ा लगा होता।

शर्मा जी के कान दरवाजे पर लगी कॉल बेल पर हैं। जैसे ही कॉल बेल बजती है, शर्मा जी अपनी टाँग को तकिये पर रख देते हैं। सामने वाले को, जिस पर शोक प्रकट करना है, वह सामने रहेगी तो आने वाले को धक्का- सा नहीं लगेगा 'की यार प्लास्टर वाली टाँग कहाँ है ,’कहीं हम ठगा तो नहीं गए ,खबर तो पक्की है न ? कहीं हमारे समाचार लेने से पहले ही प्लास्टर कट गया हो..दस वहम जी..। मुख पर दुःख और वेदना के भाव ले आते हैं, चेहरा थोड़ा लटका लेते हैं। इधर, श्रीमती जी किचन में चाय का पानी चढ़ा देती हैं, बेटा बाहर दूध की थैली और चाय की पत्ती लेने को भागता है।

प्लास्टर वाली टाँग तकिये पर रखी है। लोग आ रहे हैं... मातमपुरसी का पूरा माहौल है। आहें भरी जा रही हैं, टाँग को पकड़-पकड़ कर हिलाकर देखा जा रहा है, "जिंदा है न?" शर्मा जी को थोड़ी उँगली चलाने को कहा जाता है। शर्मा जी उँगली चलाते हैं, हाँ... ठीक है, मन को तसल्ली। टाँग जिंदा है।

डॉक्टर ने भी कहा है, हर एक घंटे में उँगली चलाते रहें, तसल्ली रहेगी कि टाँग जिंदा है।

क्या शर्मा जी, क्या मिश्रा जी, क्या गुप्ता जी—जिनकी टाँग टूटी है और प्लास्टर लगा है, सबकी एक ही राम कहानी है। अब आप तैयार हो जाइए, इस पूरी कहानी के भूत, भविष्य और वर्तमान को सुनाने के लिए। कोई भी बात छूटनी नहीं चाहिए। सबसे पहले तो यह बताएँ  कि चोट कैसे लगी, कितना दर्द हुआ, आवाज आई थी क्या टाँग टूटने की? जब टाँग टूटी, कैसा महसूस हुआ—अच्छा या बुरा? अब कैसा महसूस हो रहा है?

फिर समाचार लेने वाला कोशिश करेगा आपको सांत्वना देने की, " अरे भाई साहब ,आपकी क्या टाँग टूटी है पिद्दी- सी .... ! ये भी कोई टाँग   टूटना होता है? टाँग   तो हमारे साले साहब की टूटी थी... भाई साहब, कैसी टाँग   टूटी थी उनकी, सच में!"

शर्मा जी सोचेंगे कि कितनों को सुना चुके हैं, अब क्या सुनाएँ बार-बार वही कहानी। यह भी कोई बात हुई... जो साहब समाचार लेने आए हैं, उन्हें तो सुनाना ही पड़ेगा, वरना वे ही आपको सुना देंगे, "बताइए, हम समाचार लेने आए और इन्हें इतनी भी तमीज़ नहीं कि हमें बता दें कि हुआ कैसे?" घटनास्थल का आँखों-देखा हाल तो आपको ही बताना पड़ेगा। या तो एक कैसेट रिकॉर्ड कर लीजिए और प्ले कर दीजिए या अपनी कहानी किसी नौकर को रटा दीजिए और उसे इस काम पर लगा दीजिए।

समाचार लेने वाला व्यक्ति अपनी सांत्वना देने से पहले पूरी घटना की गंभीरता के अनुसार अपनी सांत्वना की पोटली खोलेगा। फिर आपको कुछ सबूत भी पेश करने पड़ेंगे कि वास्तव में टाँग  टूटी है या यूँ ही मजाक कर रहे हैं, क्या पता आपका ..नकली प्लास्टर लगाकर बैठे हों । अब सबूत में आप डॉक्टर की पर्ची, एक्स-रे फिल्म, प्लास्टर का बिल, या फिर टूटने के समय की कोई वीडियो रिकॉर्डिंग, या टूटने की आवाज की ऑडियो रिकॉर्डिंग, या कोई चश्मदीद गवाह प्रस्तुत कर सकते हैं। अब यह साबित तो आपको ही करना पड़ेगा न, आखिर टाँग   भी तो आपकी ही टूटी है।

कई समाचार  लेने वाले निराश भी होंगे...” अरे क्या शर्मा  साहब, हम समाचार  लेने आये हैं यह सोचकर की कोई ढंग की टाँग  टूटी होगी...ये क्या मामूली सा फ्रैक्चर ..बताओ काम धाम छोड़कर एक तो इनके समाचार  लेने आओ और एक ये हैं महाशय हैं की , ढंग से टाँग  भी नहीं तुड्वाते “ 

शर्मा जी ग्लानी से मरे जा रहे हैं..’अगली बार शिकायत का मौका नहीं देंगे ऐसा प्रण लिए हैं’ 

"शर्मा साहब, आप तो इतने संभलकर चलते हैं, गाड़ी भी धीरे चलाते हैं, कई बार देखा हमने।" ऐसे लोग तो शर्मा जी से जलन रखते हैं कि "शर्मा साहब इतना धीरे क्यों चलते हैं, कभी टाँग  -वांग क्यों नहीं तुड्वाते ताकि हमें भी समाचार लेने का मौका मिले।" बहुत दिनों से सोच रहे थे कि शर्मा जी से मिलने का मौका कब मिलेगा, असल में उन्हें अपने बेटे की नई जॉइनिंग के बारे में सलाह लेनी थी। और देखो, आज मौका मिल गया। एक पंथ दो काज ।

शर्मा जी शुरू करते हैं, लेकिन समाचार लेने वालों का ध्यान नाश्ते में परोसे गए समोसों पर चला जाता है। सोचते हैं, "सुनाएँ या नहीं?" लेकिन मन को तसल्ली देते हैं, "अरे समोसे तो मुँह से खा रहे हैं न, कान थोड़े ही व्यस्त हैं, सुन तो रहे हैं न।"

लो, उन्होंने समोसा आधा खत्म करके प्लेट में रख दिया, अब पूछ भी रहे हैं, "तो शर्मा जी, कैसे हुआ एक्सीडेंट?"

शर्मा जी कहने वाले होते हैं, "बहुत दिनों से टाँग में खुजली चल रही थी, एक्सीडेंट से मिलने की खुजली ।रोजाना रास्ते में एक्सीडेंट मिलता ..पूछता ‘शर्मा जी अब तो हो जाने दो न..देखो आपकी टाँग  भी मिलना चाह रहे है मुझ से .. ‘फिर एक दिन, तरस खाकर मैंने कह दिया - हो जाओ भाई । बस हो गया।"

 जब वे आएँगे और प्लास्टर को देखेंगे तो कहेंगे, "अरे शर्मा जी, कितने दिन का कहा है डॉक्टर ने?"  

आप कहेंगे, "जी, 20 दिन का।"  

तुरंत कोई बोलेगा, "नहीं-नहीं, कम से कम 6 हफ्ते रखवाइए शर्मा जी। डॉक्टर को कहिए 20 दिन के बाद और 20 दिन बढ़ा दे। अब टाँग   बार-बार तो टूटती नहीं, आराम दीजिए टाँग   को।"

कुछ लोग सलाह देंगे, "यार, आपको डॉ. रस्तोगी को दिखाना चाहिए था, वो सही में टाँग  जोड़ते हैं। हमारे साले  साहब की टाँग   जोड़ दी थी और जुड़ने के बाद लगा ही नहीं कि पहले टूटी थी।" स्साला एक्सीडेंट  भी कन्फुज ..यार ये टाँग   अभी तक टूटी क्यों नहीं..नया माल लग रहा है बिलकुल..फ्रेश।

 शर्मा जी सोचेंगे, "अगली बार जब टूटेगी तो डॉ. रस्तोगी को भी अजमा लेंगे।" 

फिर कोई पूछेगा, "वैसे हुआ क्या था?"  

आप कहेंगे, "जी, टाँग   टूट गई है।"  

"किसने बताया?"  

"डॉक्टर ने।"  

"अरे किस डॉक्टर को दिखाया?"  

"डॉ. गर्ग साहब को।"

ये वो लोग है जो बाल की खाल निकलने को आतुर..इन्हें लगता है ये सब सहानुभूति बटोरने के बहाने हैं, हम समाचार लेने वालों को नाहक परेशान  किया जा रहा है..अब कुछ लोग अप्र्त्यक्ष्य रूप से आपके मोटिवे को जानने के लिए अपनी कहानियाँ सुनाने लगेंगे, "वो अपने वर्मा जी हैं न, चुनाव में ड्यूटी लगी थी, छुट्टी नहीं मिल रही थी, तो डॉ. गर्ग ने एक पर्ची बना दी,एक नकली प्लास्टर लगवा दिया  और छुट्टी मिल गई।"

शर्मा जी क्या करें, कहेंगे, "अरे, मेरी तो सच में टूटी है। आप प्रमाण चाहते हैं? ये लीजिए एक्स-रे।" और एक्स-रे उल्टा पकड़कर देखने वाले कहेंगे, "अरे डॉक्टर ने फ्रैक्चर कहाँ से निकाल दिया? हमें तो कहीं कोई फ्रैक्चर नजर नहीं आ रहा। "

तब शर्मा जी अपनी आखिरी गवाही के लिए अपनी पत्नी को बुलाएँगे, "जरा बताओ न, कैसे हुआ?" पत्नी कहेंगी, "भाई साहब! स्कूटी पर जा रहे थे, गड्ढे तो आपको पता ही हैं सड़कों पर। दोनों गिरे और टाँग  नीचे आ गई स्कूटी के।"

फिर प्लास्टर के रंग-रूप और शेप का मुआयना करेंगे। सलाह देंगे, "फाइबर लगवाते, महंगा है पर अच्छा दिखता है।" कुछ लोग अपने पेन-पेंसिल से आपके प्लास्टर पर शुभकामनाएँ लिखकर या अपने ऑटोग्राफ देकर भी जाएँगे, जैसे यह अतिथि बुक हो और वो अजायबघर में आये हैं,आपकी प्लास्टर वाली टाँग   को देखने । 

कुछ सलाहकार देसी इलाज़ भी सुझाएँगे। कोई गाय का मूत्र, कोई बकरी का दूध, तो कोई सूअर का घी, और कहेंगे कि लगाओ, फायदा होगा। शर्मा जी को ऐसा लगने लगेगा कि टाँग   पर जितना प्लास्टर का चूना  नहीं लगा, उससे ज्यादा सलाह का चूना  चढ़ रहा है।

रिश्तेदार सब्जी-फल भी लेकर आएँगे, "भाई साहब, क्या हो गया महंगाई को ..सेब देखो तो 200 रुपए किलो हैं और वो भी सड़े हुए, मजबूरी में केले लेकर आ गए।" 

शर्मा जी उनके केले की थैली के बोझ टेतले दबे जा रहे हैं..अरे इसकी क्या जरूरत थी भाईसाहब... इस भार को थोडा हल्का करने के लिए शर्मा जी कहेंगे , "सुनो, चाय बना दो न। 

रिश्तेदार...”हें हें ..अरे भावी जी को क्यों परेशान करते हैं..चलो बना ही रहे हैं तो फीकी ही बनाना, तुम्हें पता है डायबिटीज हो गई है,अरे हाँ आपको सुगर तो नहीं है ?" 

शर्मा जी कहेंगे, "चेक नहीं कराई।" 

इस पर एक और सुझाव मिलेगा, "अब तो शुगर चेक करवानी पड़ेगी। कई के पैर सड़ गए हैं प्लास्टर के बाद।"फिर उनके पास किस्सों की भरमार है ,प्लास्टर की बीभत्स रस से भरी हुई स्टोरी के..किसी का प्लास्टर टाइट होने से,किसी के सुगर होने से न जाने कितनी टाँगे सडकर कट चुकी हैं ।

शर्मा जी प्लास्टर प्रकरण  की इन डरावनी कहानियों को सुनकर थरथर काँप रहे हैं 

कुछ लोग तो यही चाहेंगे कि जल्दी ठीक न हों। "भाई साहब, प्लास्टर खुलने के बाद भी हल्के काम करना, और दूसरी टाँग  का भी ख्याल रखना। ये एक बार टूटे तो दूसरी को जलन होने लगती है।" कुछ लोग बार-बार आएँगे, क्योंकि आप मजबूर हैं, टूटी टाँग  के साथ पड़े हैं। अब आप बहाना भी नहीं कर सकते कि घर पर नहीं हैं, आखिर टाँग  टूटी है, कोई मजाक थोड़े ही।


रचनाकार के बारे मेंः निवासः  गंगापुर सिटी, राजस्थान , पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ, लेखन रुचि: कविताएँ, संस्मरण, लेख, व्यंग्य, देश विदेश के दैनिकी,साप्ताहिक पत्र- पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएँ प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तक "नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक" (किताबगंज प्रकाशन से ), प्रकाशनाधीन -गिरने में क्या हर्ज है  -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) Mail ID –drmukeshaseemit@gmail.com

Apr 1, 2026

व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर

 - गिरीश पंकज

मूर्ख दिवस के दिन सर्वाधिक खुशी होती है नेता छदामीराम को और अपनेराम को यानी मुझको। सुबह से ही हम दोनों प्रसन्न होकर सब को चित करने में लगे रहते हैं । एक तो पहली अप्रैल और उस पर अपना जन्मदिन । लोग भी खूब मजा लेते हैं । उन्हें फोन - पर - फोन करते हैं।  वाट्सएप के जरिए संदेश देते हैं । लगभग सब यही लिखते हैं, "बधाई हो, आज आपका जन्मदिन है।"

लोगों को अनजाने में ही एक ऐसा दिन मिल गया, जिस दिन वह अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। "आज आपका दिन है", कहकर लोग यही व्यक्त करना चाहते हैं कि बनाए जाओ हमको उल्लू । हम तो मूरख है ही जनम के। आज आपका ही दिन है।

छदामीराम रोज की तरह एक अप्रैल को भी बहुत खुश रहते हैं । वह अपने भाग्य को सराहते हैं कि  धुप्पल में ही वह मनुष्य योनि में आ गए। थैंक्स गॉड!! अगर लोमड़ी का शरीर मिलता, तो जंगल में ही भटकते रहते । बचे-खुचे मांस को खाकर गुजारा करना पड़ता ; लेकिन मनुष्य-योनि में क्या आए, अब तो आनंद - ही - आनंद है। परमानन्द कहना सही होगा।

छदामीराम ने सीधे-साधे लोगों को ठगने की जो कला बाप-दादाओं से सीखी, वह निरंतर काम आ रही है । हर बार चुनाव में खड़े होते हैं और जीत जाते हैं। हाथ जोड़ना,  लोगों के पैर छूना,  पैसे बाँटना, दारू बँटवाना आदि-आदि सुकर्मों  के सहारे वह हमेशा चुनाव जीते हैं। विनम्र भाव कुछ ऐसा दिखाते हैं कि ससुरी विनम्रता भी लाज के मारे जल-जल हो जाती है। वैसे छदामीराम की विनम्रता मतदान के दिन तक ही रहती है।  उसके बाद तो वे गधे के सिर से सींग की तरह,  भ्रष्ट अफसर के जीवन से नैतिकता की तरह, गरीब के घर से खुशहाली की तरह, भुखमरे के चेहरे से लाली की तरह गायब हो जाते हैं। उसके बाद लोग बस एक ही विज्ञापन दोहराते हैं: छदामीराम को …। ढूँढते ही रह जाओगे।

मोबाइल जब भी लगाओ, वह नहीं उठाते । उनका पीए उठाएगा और अक्सर दो - तीन बातें कहेगा। जैसे, "साहब बाथरूम में है । निकलते ही बात कराता हूँ ।" या फिर कहेगा,  "कार्यक्रम में बैठे हैं। लौटके आएँगे तो बात कराता हूँ ।" कभी कहेगा,  "वो तो आराम फरमा रहे हैं ।" … कभी कहेगा, "साहब बीमार  पड़े हुए हैं।"

जब भी फोन करो, छदामीराम से बात नहीं होती।  कोई न कोई बहाना हाजिर।  जिन लोगों के नंबर फीड है, और जिनसे उनकी लेन-देन की  सेटिंग है,  उनसे तो वे लपककर बात करते हैं। घंटी बजी और जैसे ही नाम दिखा, उपायीराम, तो फौरन बात शुरू कर देते हैं,

"और सुनाओ उपायीराम, जयश्रीराम!

कैसा चल रहा है तुम्हारा काम ?

बहुत दिन से रात को

हमने  नहीं टकराया आपसे में जाम।

कब आ रहे हो प्यारे,

तुम हमारे द्वारे?"

मोबाइल में जिनके नाम सेव हैं, अकसर उनसे बढ़िया बात करते हैं;  लेकिन जिनके नाम सेव नहीं है, उनसे बात करते हुए  महोदय लगभग गुर्राते हैं । पहले तो पीए ही गुर्राता है; लेकिन जब सामने वाला अधिक गुर्राने लगता है, तो पीए मोबाइल छदामीराम को दे देता है । फिर छदमीराम गुर्राते हैं; लेकिन मूर्ख दिवस के दिन छदामीराम गुर्राना भूलकर मिमियाना शुरू कर देते हैं। जितने भी फोन आते हैं, उन सबसे बात करके 'थैंक यू …थैंक यू'  कहते हैं; क्योंकि इनकी अंतरात्मा कहती है- "बेटे, चुनाव के समय और जन्मदिन के दिन तो मनुष्य जैसा बन जाना ठीक रहता है।"

छदामीराम अपनी आत्मा का कहना अकसर मान लेते हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ काम करवाने के एवज में उनको रिश्वत की रकम भेंट करता है, तब भी छदामीराम सीधे अपनी आत्मा से ही बातचीत करते हैं।  सामने से मिल रही राशि के बारे में आत्मा  से पूछते हैं कि फलाना इतने लाख दे रहा है । क्या इस काम के एवज में इतनी रकम उचित है?

जब आत्मा कह देती है, "हाँ रे, ठीक है । ले ले", तो छदामीराम रिश्वत को बड़े ही श्रद्धा- भाव के साथ ग्रहण करते हैं।  लेकिन जब कभी अगर आत्मा ने कहा, "नहीं, यह रकम तुम्हारे स्टैंडर्ड के अनुरूप नहीं है", तो छदामीराम साफ इनकार कर देते हैं। जब तक उन्हें मनमाफिक रकम नहीं मिल जाती, वे रिश्वत ग्रहण ही नहीं करते। पर्याप्त दहेज न मिलने के कारण उन्होंने तो पाणिग्रहण से भी इंकार कर दिया था। जीवन  में कुछ सिद्धांत तो होने ही चाहिए साहेब।  तो ऐसे हैं हमारे  छदामीराम।

मूर्ख दिवस पर उनको लख-लख बधाइयाँ।

आप तो  दे ही चुके होंगे न। उस दिन अपने पर ही एक कुण्डलिया लिख मारी। देखें,

मूर्खों के सिरमौर हम, है इसमें  ही सन्न।

लगा रहे सब चून ही, हो कर के परसन्न।

हो कर के परसन्न, समझते हम चालाकी।

कैसे निबटे कोय,  निकालें सबकी झाँकी।

कह पंकज कविराय, करना है खुद पे गौर।

कब तक आखिर हम रहें, मूर्खों के सिरमौर।

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Mar 1, 2026

व्यंग्यः रचना - पाठ का कुरता

  - यशवंत कोठारी

जिन्दगी में पहली  बार व्यंग्य– पाठ करने का निमंत्रण आया , सो सोचा एक अदद कुरता तो पाठ करने के लिए होना ही चाहिए। कवि सम्मेलनों में मुशायरों में मैं कई ख्यातनाम शायरों कवियों को महंगे शानदार कुर्तों , शेरबानियों में मंच पर देख चुका था। अचकनों का शानदार समय अब नहीं रहा । मेरा अध्ययन यह भी रहा कि शृंगार का कवि अलग और महँगा कुरता पहनकर आता है, जबकि वीर रस का कवि अपने कुरते में ही आग लगा देने की हिम्मत रखता है, हास्य व्यंग्य का कवि हरे या  लाल रंग के कुरते में जमता है, ऐसा भी महसूस किया। कवयित्रियों के क्या कहने। वे हर मंच को गरबा डांस का मंच समझती भी है और बना भी देती हैं। उनके पहनावे पर कुछ  लिखना  सूर्य को दीपक दिखाना है । अंध भक्त कवि नारंगी कुरते में जमता है, यदि लेडीज दुपट्टा भी गले  में हो तो क्या कहना! क्रान्तिकारी कवि का कुरता समय के अनुसार रंग बदलता रहता है । सत्ता के साथ चलने के  तरीके  कोई मंचीय कवि से पूछे । वैसे जींस पर कम लम्बा कुरता, भारी चश्मा और महँगे जूते हों, तो क्या कहने। कभी राजेश खन्ना ने कुर्तों को फैशन में ला दिया था, बेल बॉटम पर छोटा कुरता खूब चला ।

संचालक का कुरता मज़बूत कपड़े का होना चाहिए  क्योंकि उसकी जेब हर कोई फाड़ने को उतावला रहता है । सम्मलेन की अध्यक्षता कर रहे कवि का कुरता हमेशा शाल से ढका रहना चाहिए । आयोजक को कुरते  के ऊपर जिरह बख्तर पहनना चाहिए ,ऐसा सयानों का कहना है । प्रगतिशील व जनवादी अपने कुरते से ही पहचान पा जाते हैं ।

लेकिन बात अपने लिए कुरते की है, खादी का कुरता आज कल कौन पहनता है ?और अब खादी भंडार वाले भी वैसे नहीं रहे जैसे  गाँधी जी के ज़माने में थे ।

मैंने पुराने वीडियो देखे , परसाई जी बंद गले के कोट में जमते थे। गोपाल प्रसाद व्यास भी कुरता धारण करते थे । शरद जोशी ने हमेशा पेंट बुशर्ट पहनकर ही व्यंग्य पढ़ा और कवियों से भारी लिफाफा प्राप्त किया। के पी भाई ने भी कुरते के बजाय रचना पर ध्यान दिया। कभी कभी सूट टाई भी लगा ली ।  नया कोई अन्य गद्य पढ़ने वाला याद नहीं आ रहा ।

कुर्तों के अध्ययन में यह भी पता चला कि कुरते पूरी बाह का, आधी बाह का, बाह पर बटन वाला  ऊँची कालर वाला  या केवल चौड़ी पट्टी  वाले हो सकते हैं । कुर्तों का रंग मौसम और राजनीति के मिजाज़ के अनुसार बदल सकते हैं। सब से बड़ी बात यह कि आप के श्रोता  और दर्शकों को कुरता चाहिए या अच्छा व्यंग्य , वैसे हिंदी में सब चल जाता है । एक मित्र से सलाह ली – उसने कहा आजकल लम्बे कुर्तों का फैशन है। तुम लम्बा कुरता  सिलवा लो। उसने आगे राय  दी- व्यंग्य छोटा पढ़ना नहीं तो हूट हो जाओगे, कुरता लम्बा चल सकता है; व्यंग्य लम्बा नहीं चलता । मुझे उसकी बात जम गई। वैसे कुरते में जेब होने से  दर्शकों से प्राप्त अंडे टमाटरों को भी रखा जा सकता है ।  

नयी पीढ़ी की एक कवयित्री से पूछा तो बोली –‘‘बूढी घोड़ी लाल लगाम, आप कुछ भी पहन लो। महफ़िल तो मैं ही लूटूँगी।“” और वास्तव में उनके लटके झटकों के सामने  हम सब फीके।  

जैसा की रिवाज़ है आदमी अंत में अपनी घरवाली से भी अनुमति लेता है, उसने लम्बे कुरते की ही  ताईद की, यह भी कहा कि उसके नीचे एक ठो पाजामा भी होना चाहिए , ताकि आप की इज्ज़त ढकी रहे । घरवाली की बात भी सही थी मेरे व कुरते के कारण  व्यंग्य  की इज्ज़त ख़राब न हो, इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए ।  सस्ते से सस्ता कुरता भी भाई साब चार अंकों की कीमत  में था और व्यंग्य पाठ निःशुल्क था। समझ में यह आया कि कुरते के स्थान पर पुराने  पेंट कमीज़ से ही काम चलाया जाए।  वैसे भी व्यंग्यकार के कुरते में नहीं व्यंग्य में दम होना चाहिए ।

सम्पर्कः 701, SB-5 , GOLDEN FORTUNE भवानी सिंह  रोड ,बापू नगर ,जयपुर -302015  मो. -94144612 07


व्यंग्यः पाला बदलने की कला

  - डॉ. हरि जोशी

मेरे गाँव से उठकर दुनिया भर में कबड्डी खेल पाँव पसार चुका है। पाला बदलना दुनिया का दुनिया का सबसे लाभदायी खेल हो गया है। कबड्डी से ही पाला बदलने वाली सीख दुनिया भर में ली गई है। इधर उखड़ रहे हों तो पाला बदला कर उधर जम जाएँ।

कबड्डी भारत के गाँवों से चलकर विश्व स्तरीय खेल कैसे बना, और क्यों ? इस एक खेल में अनेक खेल जो निहित रहते हैं? टंगड़ी मार सकते हैं, इकलंगा या कैंची भी लगा सकते हैं।

थोड़ी बहुत राजनीति सीखकर प्रत्येक खिलाड़ी येन केन प्रकारेण पाला मारना सीख ही लेता है। मेरे गांव में फसलों को अधिक ठण्ड पड़े तब ही पाला मारता है। नै नै

नैतिकता की, स्वस्थ समाज की, अनुशासन की फसल, भले ही चौपट हो जाए, राजनीति के खिलाड़ियों को क्यों चिंता करना,वे तो धन की गर्मी सहित गर्म रहते हैं, उन्हें तो पाला मारना है ।

देश भी बेचारा क्या करे, ऐसे ही लोगों से उसका पाला पड़ता है।

  कबड्डी में आधे खेल के बाद एक बार पाला बदलना अनिवार्य होता है । इसमें एक दो खिलाड़ी सदस्य नहीं, पूरी की पूरी टीम पाला बदलती है। आजकल जो घाघ खिलाड़ी होता है वह टीम से छिटककर खुद या एक दो को साथ लेकर पाला बदलता है। इस तरह बार- बार पाला बदलने का रिवाज़ शुरू हो गया है । जिधर मलाई दिखी उधर का पल्ला पकड़ा। तब टीम का कोई चतुर से चतुर खिलाड़ी भी, बीच में, दल बदलकर इधर से उधर नहीं जाता था। अब शिक्षा बढ़ गई है, मेरी एक कविता है, “पहली से दूसरी योजना में शिक्षा बढ़ी , हम सब की लूटने खसोटने की इच्छा बढ़ी।”

साहित्य के अनेक खिलाड़ी भी पाला मारने में उस्ताद हैं, बिना कुछ काम किए बड़े- बड़े सम्मान हस्तगत कर पुरस्कृत होते रहते हैं।

पाला बदलकर अच्छे अच्छों को खो कर देने की कला में कई विश्व स्तरीय घाघ  निपुण हैं।

आज कई खिलाड़ी या कलाकार विश्वास में लेकर अपने हितैषी को ही टंगड़ी मार देते हैं ? अच्छा अवसर देखते ही इधर से उधर कूद जाते, पाला बदल लेते हैं । सही  कलाकार या सचमुच के खिलाड़ी, उसी टीम में घुसते हैं जो हमेशा जीतती ही है। विजयी टीम के खिलाड़ी होने में जिस गर्व की अनुभूति होती है, वह पराजित टीम में रहने से कहाँ? कुछ भी करना पड़े, जीतना ही है? विजयी टीम को सम्मान, पद, पैसा, मलाई सब उपलब्ध जो रहते हैं।

रमानाथ अवस्थी की पंक्तियाँ जीवन में क्यों उतारें “हार जीत तो जीवन भर के साथ है, इसमें रोने धोने की क्या बात है?”

यह सोच चिंतन या साहित्य का हो सकता है, राजनीति के खिलाड़ी को तो येन केन प्रकारेण हमेशा जीतना ही है। कुछ भी ऊला- ढाला करना पड़े, पाला बदलना पड़े, जीतकर ही मानेंगे । एक संसद से पूछा गया- आप सत्ताधारी दल में क्यों आए? उन्होंने उत्तर दिया- चुनाव होने वाला था, जिस पुराने दल में था उसके जीतने की सम्भावना नहीं थी; इसलिए मैं इस दल में आ गया, और देखिए मेरा निर्णय ठीक रहा, मैं संसद सदस्य हूँ। हर खेल में राजनीति, हर राजनीति में खेल। राजनीतिज्ञ कभी हार नहीं मानते । लफंगई करें, लट्ठ चलाए, मतदाता को रिश्वत बाँटें पर हमेशा जीती हुई टीम का पल्लू पकड़े रहेंगे। जिधर बम उधर हम, क्यों पालें नैतिकता का वहम ?

Feb 1, 2026

व्यंग्यः नेताओं का शृंगार हैं चमचे

 - रेखा शाह आरबी

आजकल अपने देश में हर किसी को चमचे की आदत पड़ चुकी है । किसी भी घर में चले जाइए, चमचे दिख ही जाते हैं। गरीब से गरीब आदमी के घर में भी अब तो चमचों ने अपना स्थान बना लिया है। चमचे रखने का  अलग बर्तन रहता है । इन्हें सभी बर्तनों के साथ नहीं रखा जा सकता है; क्योंकि जरुरत के वक्त मिल नहीं पाते हैं; इसीलिए इनको अलग रखा जाता है कि जब जैसी जिसकी जरूरत पड़ी, निकालकर इस्तेमाल कर लिया।

लेकिन चमचे अपने देश का कल्चर नहीं है । यहाँ  पर तो हम सब पहले अपने हाथों से ही खाने के आदि थे ।उसके लिए चमचों वगैरा का सहारा नहीं लेना पड़ता था। हाथ से खाना सेहत के लिए अच्छा भी था, साफ- सुथरा था।  और सबका अपना- अपना हाथ रहता था। सब आत्मनिर्भर थे।

 पर यह करमजले अंग्रेज आए और काँटे, छुरी, चमचे की परंपरा लेकर आए और चमचों की आदत लगा गए।  कुछ अमीर नकलचियों ने अंग्रेजों की नकल करके काँटे- चमचे- छुरी से खाना प्रारंभ कर दिया। उनकी देखा- देखी अब क्या अमीर और क्या गरीब, सब अपने हाथों से खाना छोड़कर काँटे, छुरी, चमचे से खाने के लिए ही मरे जा रहे हैं। इस तरह चमचे हर घर का हिस्सा बन गए।

चमचों की खपत केवल घरों में  ही नहीं होती है; बल्कि चमचों की सबसे ज्यादा खपत राजनीति में होती है। जितनी राजनीति में चमचों की खपत होती है, उतनी शायद ही किसी और क्षेत्र में होती हो। जैसे दुल्हन के सोलह सिंगार होते हैं, वैसे ही चमचा नेता का शृंगार होता है। नेता का पहला और आखिरी शृंगार  चमचा ही होता है। नेता बिना चमचों के कांतिहीन और तेजहीन लगने लगते हैं। तो इस तरह  कह सकते हैं कि नेता का लाली लिपस्टिक, पाउडर, आई लाइनर, मस्कारा, फाउंडेशन सब कुछ चमचे ही होते हैं। वही उसको चमकाते हैं।

और यदि किसी नेता ने यह शृंगार करने से मना किया, तो जनता उन्हें नेता मानने से मना कर देती है। जनता विश्वास ही नहीं कर पाती है कि भला व्यक्ति एक सम्मानित नेता है, जब तक नेता की गाड़ी के पीछे  चमचों की 8 -10 गाड़ियाँ न हों। चाहे या अनचाहे अब जरूरत भी है और जरूरी भी है। चमचे को मना नहीं किया जा सकता है।

 नेता चाहे जितना भी जमीन से जुड़ा हुआ हो, ईमानदार हो, चाहे बेईमान हो।  पावर में हो या बिना पावर के हो, चमचा तो उसके पास रहता ही है। जिस तरह समोसा बिना आलू का नहीं हो सकता है, उसी तरह नेता भी बिना चमचे का नहीं हो सकता है। नेता यदि राजनीति के दुकान का मालिक है, तो उसके चमचे उसकी दुकान के सेल्समेन है। भला कोई भी दुकान बिना सेल्समेन के कैसे चल सकती हैं। चमचा जनता और नेता के बीच का पुल होता है।

 राजनीति में तो चमचे का इतना महत्त्व है कि नेता यदि फटे हुए कपड़े पहन ले; लेकिन उसके आसपास चमचों का मेला लगा हुआ है, तो वह अपने आप को सबसे बेहतर सुन्दर मानता है। चमचे ही तो नेताजी को बताते हैं कि वे कितने महान हैं। वे जनता के भगवान हैं। यह बात नेता और जनता  दोनों को चमचे ही बताते हैं। अगर वे न बताएँ,  तो जनता को पता ही नहीं चले कि कौन सा नेता, कितना महान है। जनता की तो बात छोड़िए खुद नेता को भी पता नहीं चले। अतः नेताजी खुद कितने अच्छे हैं- यह बात जानने के लिए वह चमचों पर निर्भर रहते हैं। और चमचे बाकायदा सुबह- शाम उन्हें इस बात से अवगत कराते रहते हैं। 

कभी-कभी चमचे जिस बर्तन में रहते हैं, उसी को खाली कर देते हैं। यह उनके साथ बहुत बड़ी समस्या है।  कूड़े का स्वभाव होता है कि जिधर की हवा बहती है वह उधर ही उड़ता है। चमचों का भी यही स्वभाव होता है। जिधर की हवा बहती है, वे उधर के हो जाते है; इसीलिए चमचों का चुनाव भी बहुत होशियारी से करना पड़ता है। वरना लेने के देने नेताजी को पड़ना तय है।

 चमचा दुधारी तलवार है। वह जिस बर्तन में रहता है, उसको खाली भी कर सकता है, उसको भर तक भी सकता है।  जब चमचे का चुनाव करें, तो बहुत सोच समझ कर करें;  क्योंकि चमचे का कभी कुछ बिगड़ता नहीं है। वह जिस भी बर्तन में रहता है उसी बर्तन का सगा बन जाता है। बर्तन को यह सोचना है कि उसमें रखा हुआ चमचा उसका कितना सगा है; क्योंकि पावर में कोई भी रहे, चमचों की हमेशा चाँदी रहती है। राज तो यही करते हैं।

अतः चमचों के महत्व को देखते हुए नेता जन को कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-

चमचे का चुनाव करते समय नेताओं को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे- चमचा इतना तेज तर्रार होना नेता जी के बयान देने से पहले ही चमचा ताली बजा दे और तालियाँ बजवा दे। और मूर्ख इतना होना चाहिए कि नेताजी गड्ढे में कूदें, तो वह उनके साथ ही गड्ढे में कूद जाए। अपने कपड़ों की बिना परवाह किए हुए।

चमचा इतना स्वामी भक्त होना चाहिए कि जैसे सैटेलाइट अपने ग्रह के ही चारों ओर चक्कर लगाती हैं,वैसे ही वह सिर्फ उनकी ही परिक्रमा करता रहे। अगर किसी और की परिक्रमा करने लगे, तो अपनी कक्षा से बाहर फेंकने में नेता को देर नहीं करनी चाहिए ।

नेताजी चाहे कुकुरासन में हो, शवासन में हो या जिस भी आसन में हो- चमचे को अपनी वाक कुशलता से जनता को यह उनकी खूबी बताने का ढंग आना चाहिए, तभी उनका साम्राज्य सलामत रह सकता है।

राजनीति की दुकान दो ही चीजों से चलती है एक तो वादों के और दूसरे चमचों के इरादों से, तो अपने चमचों के इरादों पर भरपूर नज़र रखनी चाहिए और उन्हें खिलाते- पिलाते रहना चाहिए, ताकि वह पलटू राम न बन सके। 

चमचों का इतिहास है कि जहाँ  कुर्सी है, वहीं पर चमचा-समूह रहता है; इसीलिए चमचों को बाँधकर रखना बहुत ही मुश्किल है । उन्हें बस फायदे की मजबूत डोर से ही बाँधकर रखा जा सकता है । नेता को सिर्फ अपने फायदे के बारे में नहीं चमचों के फायदे के बारे में भी भरपूर सोचना चाहिए।

अगर ये सुझाव अमल में लाए जाएँ, तो नेता के नेतागिरी की दुकान कभी भी बंद होने की नौबत नहीं आएगी।

-नेता हित में जारी। ■

सम्पर्कः गिरिजा इलेक्ट्रॉनिक्स/ काशीपुर/ बलिया-बैरिया राजमार्ग/ जिला+पोस्ट - बलिया (उत्तरप्रदेश )- 277001

Jan 1, 2026

व्यंग्यः नये साल में लालबुझक्कड़ फिर मिल गए


 - गिरीश पंकज

पिछले साल भी उनके दर्शन हुए थे। इस बार फिर हो गए। मुझे देखते ही वह यादों में खो गए। मुस्कुराते हुए बोले, "हम पिछली बार मिले थे भोले और हमने कहा था, ये करेंगे, वो करेंगे। दुनिया से हम नहीं डरेंगे, तो इस बार भी हम दुनिया से नहीं डरेंगे और जबरदस्त काम करेंगे।"

हम खुश हुए कि नाकारा लोगों की जमात के कुख्यात  सदस्य लालबुझक्कड़ जी इस वर्ष कुछ-न-कुछ तो गुल ज़रूर खिलाएँगे।

हमने पूछ लिया, "क्या करेंगे, इसका खुलासा तो करो!"

वह बोले, "हम प्यार में पड़ गए हैं इस वर्ष। तो बस यही करेंगे।"

मैंने चौंकते हुए कहा, "अरे, यह अचानक लवेरिया कैसे हो गया?। पिछले दिनों तुमको मलेरिया हुआ था। उससे उबरे तो लवेरिया हो गया?"

वह बोले, "मलेरिया के कारण ही लवेरिया हुआ है। बीमार पड़े थे और फेसबुक पर नज़रें गड़ाए हुए थे। तभी एक बुजुर्ग टाइप की जवान महिला ने मेरे इनबॉक्स में आकर कह दिया –‘आई लव यू’, तो हमने भी कह दिया- ‘आई लव यू’…और बस, प्रेम की गाड़ी चल पड़ी।"

मैंने पूछा, "वह रहती कहाँ है ", तो लालबुझक्कड़ जी ने कहा, " झुमरी तलैया में रहती है। उससे मिलने भी अब जाना है। मुझको बुला रही है।"

मैंने हँसते हुए कहा, " बंधु! यह फेसबुक वाली लव स्टोरी अकसर बड़ी फर्जी निकल जाती है, इसीलिए होशियार रहो…सावधान रहो…सतर्क रहो, वरना बेड़ा गर्क हो जाएगा। लाखों रुपये का चूना लगेगा और जीवन नरक हो जाएगा। आजकल बहुत से शातिर पुरुष स्त्री बनकर सोशल मीडिया के जरिए ठगी का कारोबार करते रहते हैं। कहीं यह भी कोई ठग न हो। सावधान रहना।"

मेरी बात सुनकर लालबुझक्कड़ भड़क गए और कहने लगे, "लगता है, आप मेरी लव स्टोरी से जल रहे हैं। आप तो सूखे बरगद हैं; लेकिन हम तो अभी तक हरे-भरे पेड़ हैं। इसमें मोहब्बत के फल लगेंगे-ही-लगेंगे। उसके चक्कर में जब-जब बोलती है, कुछ पैसे भेजते जाता हूँ।"

मैंने कहा, "लेकिन पिछले साल तुम्हारा किसी रामकली से चक्कर चल रहा था, मगर इस बार झुमरीतलैया की कथकली के साथ चक्कर चला रहे हो। यह कौन-सा गुल खिला रहे हो? असलियत तो पता कर लो कि वो लड़की है या लड़का। फर्जी आईडी बनाकर लोग साइबर क्राइम भी कर रहे हैं। बचके रहना रे बाबा, बचके रहना!"

लालबुझकक्ड कुछ सोचने लगे और बोले, "आपने तो  मुझे कन्फुजिया दिया। मुझे संकट में डाल दिया। मैं सोच रहा था कि इस साल एक नया रिश्ता परवान चढ़ेगा। मौजाँ-ही- मौजाँ- होग:, लेकिन अब तो लगता है, इस परवान से सावधान रहना होगा।"

मैंने कहा, "कभी झुमरीतलैया वाली से फोन पर बात हुई क्या?"

लालबुझक्कड़ बोले, "बात तो नहीं हुई, बस संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता है।"

मैंने हँसकर कहा, "एक बार फोन से बात करके तो देखो। आवाज लड़की की निकल रही है या लड़के की। तब स्पष्ट हो जाएगा।"

लालबुझक्कड़ ने मुंडी हिलाई और चैट बॉक्स से ही फोन कर दिया। घंटी जाती रही। किसी ने फोन नहीं उठाया।  लालबुझकक्ड को शक होने लगा कि मामला फर्जी है। जिसे अति उत्साह में अपनी प्रेयसी समझ रहे थे, वह तो कोई बड़ा वाला ठग है।

 लालबुझक्कड़ ने मैसेज किया कि रूपसी, अपनी तस्वीर तो भेजो। लेकिन रूपसी (या रूपसा…?) ने अपनी तस्वीर नहीं भेजी। अब तो लाल बुझक्कड़ को कंफर्म हो गया इन बॉक्स में टपकने वाला कोई फर्जी आदमी है। जो अब तक उसे जम कर चूना लगाता रहा।

उसकी असलियत जानकर लालबुझक्कड़ तनाव में आ गए और कहने लगे, "मेरी लव स्टोरी का तो द ऐंड हो गया है। अब यह साल कैसे बीतेगा? मेरी राशि में तो नए साल में सुंदर-सुंदर घटनाओं का योग लिखा था।"

  मैंने उसे सांत्वना देते हुए कहा – ‘‘बच्चू, पिछले साल भी तुमने कुछ खास नहीं किया; लेकिन इस साल तो  कुछ ऐसा करके दिखाओ कि तुम्हारे घर वाले तुम पर गर्व करें। लवेरिया का चक्कर छोड़ो, वरना चूना लगता रहेगा। इसलिए बेहतर है कि बेरोजगार संघ के पदाधिकारी बने रहने के बजाय छोटा-मोटा कोई काम कर लो। हमारे प्रधानमंत्री की सीख मान लो और पकौड़ा बेचने का काम ही करने लग जाओ। साथ में चाय-ठेला लगा लो। जब से चाय वाला प्रधानमंत्री बना है, चाय वाले अपने आप को किसी प्रधानमंत्री से कम नहीं समझते।"

लालबुझक्कड ने कहा, "यह आपने बिल्कुल सही फरमाया। अब हम किसी से चोंच लड़ाने के पहले उससे मोबाइल में  गोठिया लेंगे। उसका चेहरा भी देख लेंगे। कहीं कोई बुढ़िया, जवान होने का नाटक करके हमको गेम तो नहीं दे रही।"

"मतलब यह कि तुम सुधरोगे नहीं।" हम भी हँसकर बोले, "अब तू नहीं और सही और नहीं और सही का फार्मूला अपना रहे हो? लगे रहो मुन्ना भाई! तुम होगे कामयाब एक दिन! लेकिन कुछ काम तो करो!"

लाल बुझक्कड़ ने कान खुजाते हुए कहा, "कुछ सोच तो रहा हूँ कि कुछ करूँ; लेकिन क्या करूँ, कैसे करूँ, यह समझ नहीं आ रहा है।"

इतना बोलकर वह  खुद ही जोर-से हँसे। हम समझ गए कि ये महोदय इस साल में कुछऊ ना करेंगे। हमने लाल बुझक्कड़ को नमस्ते किया और अपनी राह चल पड़े।

व्यंग्यः शुभकामनाओं की दहशत

 - विनोद साव

सर्दी की सुबह की नर्म धूप, चाय की चुस्की और अख़बार- तीनों की ‘कॉकटेल’ बनाकर रसास्वादन करते हुए मैं अपने आँगन में खड़ा ही हुआ कि थोड़ी देर में ‘हैप्पी न्यू-इयर’ की हुंकार सुनाई दी। मैं चौंक गया। सिर उठाकर जब सामने देखा तो पड़ोसी साहू जी को पाया। वे अपने अहाते से हाथ उठाकर मुझे नए साल की शुभकामना का सिग्नल दे रहे थे- तब याद आया कि आज नए साल का पहला दिन है।

ओह! नया साल फिर आ गया। अभी-अभी तो पिछले साल को झेला है और पेला है। कल रात ही उसे टरकाया है। अब फिर एक नया साल फिर कोई नया झमेला होगा। फिर नई समस्याओं की शुरुआत होगी। मुझे याद आ गए बीते पिछले कुछ साल जो हर साल कुछ नहीं तो नई सरकार लेते आए थे। हर साल एक नई सरकार और साल के जाते-जाते सरकार भी चली जाती- फिर नया साल आता और अपने साथ नई सरकार लाता। टीवी में दिखाए जाने वाले किसी चमचमाते साबुन के विज्ञापन की तरह ‘अब लक्स नहीं... न्यू-लक्स’। वैसे ही आने वाला नया साल कहता- ‘अपनें चाहने वालों के लिए पुरानी नहीं... नई सरकार... नए साल का नया उपहार।।। हमारी न्यू-सुपर सरकार। जनता की दरकार पर नई सरकार। नई सरकार की नई पेशकश- सौ दिनों में महँगाई हटाए... बेजा कब्जे पर पट्टा दिलवाए... पब्लिक सेक्टर को प्राइवेट बनवाए। ऋण माफ़ी कराए, लगान माफ़ी कराए और सबकी जन्म-शताब्दी मनाए। इस तरह हर साल के शुरू होने के साथ ही नए आश्वासन, नई घोषणाएँ, नई परियोजनाएँ के वे सब्ज बाग दिखाते, देशप्रेम की बात करते। ऐसा लगाता कि ‘राम राज आ रहा है पर हमें रावण राज भी नसीब नहीं हुआ। कहते हैं- रावण की लंका सोने की थी।’ रावण की प्रजा सुखी थी पर यहाँ तो हर साल राष्ट्र के नाम संदेशों में वे देश की जनता को अपनी प्यार भरी शुभकामनाएँ देते और साथ में साल भर हमें- बढ़ती बेरोजगारी चढ़ती महँगाई, गरीबी-भूखमरी और दंगों की सौगात देते। अब हर शुभकामना संदेशों के बाद मन में दहशत समाने लगता है... किसी अज्ञात आशंका से मन काँपने लगता है।

आजकल शुभकामनाओं से मैं परहेज करने लगा हूँ। इनसे मुझे अपच सी होने लगी है। आज फिर एक नए साल का पहला दिन है। दिन भर नए साल की मुबारकबाद देने वालों का तांता लगा रहेगा। हैप्पी न्यू इयर की रट लगाने वालों का हमला होगा। यह सोचकर मैं ऊपर से नीचे तक सिहर उठा। मन शुभकामनाओं के खौफ से भर उठा। इस पड़ोसी साहू के बच्चे ने भी सबेरे- सबेरे मूड-ऑफ कर दिया। अगल-  बगल वालों का चैन-सुख छीनकर आखिर उसने अपना पड़ोसी धर्म निभा ही दिया।

जिस दिन भी कोई मेरे सुखद जीवन या उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी शुभकामनाएँ देता है मैं घबरा उठता हूँ। ऐसा लगता है जरूर कहीं पर कुछ गड़बड़ होने वाला है। मुझे किसी साजिश का अन्देशा होता है। शुभकामना देने वाला किसी षड्यंत्रकारी सा लगता है। मेरे खिलाफ चलाए जाने वाले किसी कुचक्र का भान होता है। मुझे चाणक्य सूत्र याद आने लगता है - ‘यदि कोई अति-सौजन्य दिखा रहा तो या अतिशय औपचारिकता पूरी कर रहा हो तो वह संदेह जनक है।’ जरूर उसके पीछे कोई राज है। इनसे बचने का प्रयास करें।’ मैं इन थोपी गई शुभकामनाओं पर चिंतन करने लग जाता हूँ कि क्या जरूरत है किसी की बेरोक- टोक शुभकामनाओं की। मैं अच्छा खासा और भला- चंगा हूँ। हर रोज बिना वजह अपनी ड्यूटी पर चला जाता हूँ। जिसके एवज में सरकार से भरी- पूरी तनख्वाह वसूल लेता हूँ। बीवी-बच्चों की तरफ से सब खैर है। ऑफिस वाले सहकर्मियों की भी मेहरबानी है जो मुझ जैसे साहित्यानुरागी को झेल रहे हैं। बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद, इष्ट-मित्रों की कृपा और महिलाओं की दया- मया भी मेरे कंधों पर है। स्थिति भले ही थोड़ी तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है इसलिए मैं किसी की मुबारकबाद का मोहताज नहीं हूँ। ऐसे में किसी पड़ोसी द्वारा सवेरे-सवेरे मेरे अहाते में शुभकामना संदेश फेंक देना मुझे ‘काग-दोष’ देखने जैसा जान पड़ता है। सब ठीक- ठाक चल रहा था कि उनकी शुभकामनाओं की बिल्ली ने रास्ता आड़ काट दिया। ये शुभकामनाएँ मुझे वैसे ही कचोटती हैं, जैसे देश की जनता को राष्ट्र के नाम संदेश।

पता नहीं इन शुभकामनाओं का ग्रह-नक्षत्र मेरे साथ ठीक क्यों नहीं बैठता है? जब भी कोई देता है तो बस कहीं न कहीं कोई अनिष्ट हुआ समझो, फिर वह पूरा दिन मुझे हर सम्भावित अनिष्ट को नाकाम करने की कोशिश में बिताना पड़ता है। मैं हर महत्त्वपूर्ण दिन में लोगों से मिलने- जुलने में कतराने लगा हूँ। पता नहीं किसके मुँह में क्या निकल जाए। किसी की ग्रीटिंग कोई गारंटी-कार्ड तो है नहीं फिर आजकल गारंटी- वारंटी देने वाले कौन से पक्के हैं। ये कम्बख्त डाक वाले भी मेरी रचना की स्वीकृति तो लाते नहीं। यदि कहीं छप भी गई तो भेजी गई पत्रिका को गोलगप्पड़ कर जाते हैं और ये ग्रीटिंग कार्ड फेंक जाते हैं।

दिमाग में उठे ख्यालात और दिन में बनी ग्रंथियाँ तजुर्बों से ही पक्के होते हैं। मैंने कई बार ये पाया है कि ‘टैम- कुटैम’ जब भी हमारे तथाकथित कृपालुओं ने लोगों को शुभकामनाएँ दी तो उसका ‘रिएक्शन’ ही होता है। वे निरपेक्षता की बात करते तो इधर सापेक्षता का घनत्व अपने उफान पर होता है। वे सत्य-अहिंसा- परमोधर्म: का उपदेश देकर यह जताते हैं कि ‘उपदेश सदैव सुनने वालों के लिए होते हैं। कहने वालों के लिए नहीं।’ इधर हिंदी-चीनी भाय- भाय की गुहार लगाते और उधर बॉर्डर पर लोग गोलियों की धाँय- धाँय सुनाते। हिन्दू- मुस्लिम-सिक्ख- ईसाई आपस में है भाई-भाई के नारे ‘आपस में हैं सब दंगाई’ में तब्दील हो जाते हैं। राम की मंगलकामना, रहीम की मुबारकबाद और रजिंदर का नया-साल दी मुबारक सब कुछ धरा का धरा रह जाता है। अंतरात्मा की आवाज हवा हो जाती है। तब वे नए सिरे से शुभकामना देने के प्रयास में लग जाते हैं। नए प्रयोग काम में लाते हैं। उन पर शुभकामना देने का फितूर सवार होता है। वे कौमी-एकता, क्रॉस-कंट्री-रेस, एकता पर्व और सर्वधर्म सम्मलेन मनाकर शुभकामना देने के नए-नए हथकंडे तलाशते हैं और देश रसताल की ओर जाता हुआ यह साबित कर देता है कि केवल कोरे नारों व खोखली दुआओं के भरोसे स्थायित्व का आ पाना संभव नहीं है।

देश की और मेरी दशा एक समान है। देश के शुभचिंतकों ने जैसी देश की दशा बनाई वैसे ही मेरे हितैषी मुझे नहीं बख्शते हैं। अब तो इनके भय से अपने बच्चों का जन्मदिन और अपनी शादी की सालगिरह मनाने की हिम्मत नहीं होती। ऐसे मौके पर किसी एक इष्ट का हम सुमिरन करते हैं तो पूरे इष्ट मित्रों का कुनबा हमारे दरवाजे पधारता है। कभी इम्तिहान के दिनों में भी उनके ‘विश यू आल द बेस्ट’ के नारे मेरे मार्क्स घटाते रहे और मेरी उत्तर-पुस्तिका का तापमान कभी- कभी शून्य तक भी उतर जाता। प्रैक्टिकल में मिलने वाले मार्क्स मुझे अक्सर इम्प्रेक्टिकल करार करते रहे। बेरोजगारी का ये आलम होता कि कभी- कभार कोई इंटरव्यू कॉल मिल भी जाता तो इन्टरव्यू दिलाने वाले मेरे दूसरे साथी अपनी शुभकामना मुझे दे देते और बदले में मेरी नौकरी वे ले लेते। ले-दे के आज मेरे सारे जीवन की पूंजी एक अदद नौकरी मुझे मिल गई है तो यहाँ भी मुझसे ज्यादा प्रैक्टिकल मेरे शुभकामना दाता मेरी प्रमोशन खुद हड़प लेते हैं।

ऐसी कई कड़वी घुटों को पीने के बाद अपने शुभचिन्तकों से किनारा करने लगा हूँ।

“आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?” की मेरी वामायी आवाज ने मेरी चिंतन प्रक्रिया को भंग किया तो देखा कि इस नए साल के पहले ही दिन मैं ऑफिस के लिए लेट हो चुका हूँ। इस लेट लतीफी के कारण बॉस की शुभकामना अब रूखे स्वर में सुननी पड़ेगी। आज सबेरे पड़ोस में मिलने वाली शुभकामना की दहशत से मन भर गया। सोचा कि इस पड़ोसी को पकड़कर दो-चार शुभकामनाएँ  मैं भी जमा दूँ ; लेकिन ‘दिल के अरमां आँसुओं में बह गए।’ और उधर वे चिल्ला- चिल्लाकर मुझे सुना रहे हैं ‘साल नया अब आया हो, जियो मेरे राजा।’

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491 001, मो. 9009884014 

Dec 3, 2025

आँखों देखा हालः भारत और अमेरिका के कुत्ते

 - डॉ. हरि जोशी , लॉस एंजेलिस से

जब भारत में कोई व्यक्ति इधर की बात उधर करता है, तो कहावत की चपेट में आ जाता है , ‘कूकर- सा सूँघत फिरे इते उते की बात।’ यह कहावत यद्यपि भारतीय परिवेश पर ही लागू हो सकती है,अमेरिकी परिवेश पर नहीं।

 मैं इन दिनों अमेरिका में  देख रहा हूँ ,यहाँ सुअर तो देखने को भी नहीं मिलते; क्योंकि अधिकतर तो स्थानीय नागरिकों के उदरस्थ हो जाते हैं। अमेरिका में घर- घर कुत्ते होते हैं, किन्तु सड़क पर एक भी उद्दंड नहीं मिलेगा । यहाँ एक भी कुत्ता अकेले और आवारा घूमते हुए नहीं पाया जाता।

सारी अमेरिकी महिलाएँ ,पालतू को पदोन्नत कर उसे बेटा ही बुलाती हैं- ‘माय सन’। उनका आग्रह होता है उसे कुत्ता कदापि न कहें, उसे या तो नाम से बुलाएँ, अथवा बेटा कहें। कुत्ता कहकर कदापि अपमानित न करें।

अब जरा यहाँ की हरियाली पर आ जाएँ। अमेरिका में प्रत्येक घर के सामने भरपूर हरियाली रहती है। मुझे आश्चर्य होता है यह हरियाली कहाँ से आती है ? उस हरियाली का श्रेय मैं उन पेट्स को देता हूँ, जो ड्रिप इरीगेशन (बूँद- बूँद सिंचाई) करते रहते हैं। यह विशेष गुण इस प्राणी में देखा जाता है- शरीर का सारा का सारा जल, एक ही पौधे पर खर्च नहीं करता, बचा- बचाकर अनेक पौधों की सिचाई करता चलता है। अमेरिका में जो इतनी हरियाली और स्वच्छता दिखाई देती है वह इन ‘कुत्तों’, सॉरी बेटों के कारण ही रहती है।

प्रत्येक पेट को, दिन में दो, या तीन बार भी घुमाने ले जाया जाता है। पेट्स में वह विशेष गुण है, जिसके कारण एक पेट अनेक पौधों की सिंचाई करता है। प्रत्येक यात्रा में अनेक पौधों पर जलाभिषेक करता चलता है। सारा जल एक ही पौधे या वृक्ष पर नहीं डालता। शासन द्वारा इस प्रकार जल- विसर्जन की तो अनुमति है; क्योंकि उससे हरियाली बढ़ती है; किन्तु पेट के मल विसर्जन की नहीं। यदि एक बार भी पेट ने मल विसर्जन खुले में किया और उसे नहीं उठाया गया, तो कुत्ते का मालिक तो पकड़ में आ ही जाएगा, तब कूकर स्वामी को 75 डॉलर का दंड भुगतना होगा । एक दो बार लापरवाही बरती कि मालिक को 500 डॉलर तक जुर्माना भरना होगा। जिस प्रकार घर में छोटे बेटे की पॉटी का ध्यान रखा जाता है, ठीक उसी प्रकार बाहर चहलकदमी करते हुए पेट, की पॉटी का। यहाँ यदि कोई अपरिचित कुत्ता भी आमने सामने आ जाए, तो उनका परस्पर मिलन भौंककर नहीं होता, प्रेमालाप के साथ होता है।

कुत्तों का पग प्रक्षालन

“इन आँखों का यही विशेष, वह भी देखा यह भी देख।”

मैंने अपनी ग्रामीण संस्कृति में संतों के पग प्रक्षालन होते देखे हैं। जब कोई साधु संत गाँव में आ जाते थे, तो भावुक भक्त उनके पग प्रक्षालन करते थे, यानी पाँव पर स्वच्छ जल डालते और अपने हाथों से परात में मल- मलकर उनके चरण धोते थे।

जब बारात आती थी, तब भी वधू पक्ष के वरिष्ठ लोगों द्वारा, वर पक्ष के बड़े बूढ़ों के पग प्रक्षालन करने की परंपरा थी । सन 1949 से पहले हम भी अपने गाँव में सुबह- सुबह लोटा लेकर गाँव के बाहर निवृत्त होने जाते थे; क्योंकि नंगे पाँव जाते थे; इसलिए लोटे को तथा हाथ – पाँव को भी मिट्टी या राख से रगड़कर  धोते थे।

भारतीयों को यह जानकारी नहीं, कल्पना भी नहीं, अमेरिका में कुत्तों का भी दिन में दो बार पग प्रक्षालन होता है।

भारत हो या अमेरिका, कुत्तों को दो बार यानी सुबह और शाम, साथ ले जाकर घुमाना आवश्यक रहता है, हाँ घर में घुसते ही पग प्रक्षालन करना पड़ता है। कई बार मनुष्य तो बस एक बार सुबह या शाम पेट साफ़ करता है, अमेरिका में श्वान की शान यह है कि दो बार उसे शौच के बहाने घुमाने ले जाना अत्यावश्यक होता है। कुत्ते रखने वालों को मजबूरी में दो बार पदयात्रा करनी ही पड़ती है। निस्संदेह इससे मनुष्यों का स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।

Nov 2, 2025

व्यंग्यःअफ़सरनामा

 - डॉ मुकेश असीमित 

अफ़सर नाम का प्राणी वह है, जो दफ्तरों में पाया जाता है। वैसे तो सरकारी, अर्ध-सरकारी, और गैर-सरकारी सभी दफ्तरों में यह पाया जाता है। कुछ अर्जित, कुछ जबरन, कुछ जुगाड़ू, और कुछ कबाड़ी - हर प्रकार के अफ़सर होते हैं। अफ़सर काम नहीं करते, काम की चिंता करते हैं। गधे की तरह जिम्मेदारियों का बोझ ढोते हैं- जिम्मेदारी काम करवाने की और साथ में काम की चिंता का बोझ उठाने की।

इनका कोई समय नहीं होता; ये समय और स्थान से परे, ब्रह्मस्वरूप होते हैं। ये ऑफिस के कण-कण और जड़-चेतन में विराजमान रहते हैं। इसलिए कुर्सी पर दिख सकते हैं, नहीं भी दिख सकते हैं, या दिखते हुए भी नहीं दिख सकते हैं और नहीं दिखते हुए भी दिख सकते हैं।

अफ़सर को कभी भी नौकर मत समझिए। इनके चाल-ढाल और रंग-ढंग सब अलग और जुदा-जुदा होते हैं। ये तो सारी जनता को अपना नौकर समझते हैं। नौकर के साथ चाकर जुड़ा होता है, लेकिन अफ़सर के साथ क्लब, विदेशी दौरे, महँगी शराब, और अनगिनत मीटिंग्स जुड़ी होती हैं।

अफ़सर का मुख्य भोजन रिश्वत है। ये सर्वाहारी होते हैं। वैसे तो रिश्वत में विविधता की परवाह नहीं करते, जो भी मिले खा सकते हैं। कुर्सी, टेबल, फाइल, पेन, पेंसिल, कूड़ा-कचरा, यहाँ तक कि सड़कें और पुल तक निगल सकते हैं। इनका पेट बहुत बड़ा होता है। इनके जूते भी बड़े आकार के होते हैं, जो हर समय इनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर चलते रहते हैं। ये जूते कभी थकते नहीं, कभी रुकते नहीं।

ये सोचते बहुत हैं- दफ्तर के बारे में, काम के बारे में। सोचते-सोचते इन्हें अक्सर झपकी लेनी पड़ती है। बिना झपकी के, इनके ख्याल बेलगाम हो जाते हैं। पलकों में ख्यालों को बंद कर लेते हैं और फिर ख्यालों की 'वोमिट' करने के लिए मीटिंग बुलाते हैं। दफ्तरों में, फाइलों के ढेर के पीछे, आपको ये अक्सर झपकी लेते हुए मिलेंगे।

इनका मुख्य काम मीटिंग करना है। हर समस्या का हल मीटिंग ही होती है। किसी भी काम को टालने का, और कोई उपाय न हो तो मीटिंग; न करने का कोई और बहाना न हो तो मीटिंग। ये कोई भी काम अपने कंधे पर नहीं लेते और क्रेडिट से कोसों दूर रहते हैं। किसी भी निर्णय से पहले ये मीटिंग जरूर करते हैं, ताकि किसी भी असफलता का ठीकरा दूसरों के माथे पर फोड़ा जा सके।

अगर मीटिंग से समय मिले,  तो ये दौरे पर निकल जाते हैं। दौरे कई प्रकार के होते हैं, जो ज्यादातर मौसम के अनुसार तय किए जाते हैं। गर्मी हो, तो किसी ठंडे स्थान पर और सर्दी हो, तो किसी गर्म स्थान पर।

इनको ऑटोग्राफ देने का कोई शौक नहीं होता; फाइलों में इनके ऑटोग्राफ माँगे जाते हैं। ये शान से कहते हैं, जैसे दीवार फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कहा था—"जाओ, पहले उसके ऑटोग्राफ लाओ, फिर उसके, फिर उसके... तब मेरे पास आना तुम... आखिर में मेरे ऑटोग्राफ!"

बड़े अफ़सर बड़े दौरे पर होते हैं, कभी-कभी विदेश तक चले जाते हैं। सेमिनार, जिमखाना, डाक बंगला और रेस्ट हाउस में इन्हें बहुतायत से देखा जा सकता है। अफ़सर को सबसे ज़्यादा डर यूनियन वालों से लगता है। इन्हें मालूम है कि इनसे बड़ा अफ़सर इनका तबादला कराए न कराए, यूनियन का अध्यक्ष ज़रूर करवा सकता है। डर इस कदर है कि अगर यूनियन अध्यक्ष की सलामी का भी जवाब नहीं दिया, तो इन्हें डर है कि यूनियन हड़ताल पर जा सकती है।

हर अफ़सर के ऊपर एक अफ़सर होता है, जो उसे हड़काता है। यह इस हड़कन को अपने पास नहीं रखते, तुरंत निर्लिप्त भाव से नीचे वाले को ट्रांसफर कर देते हैं। नीचे वाला बाबू को, और बाबू उसे अपनी जेब में रखकर हाथों से मसल देता है, जैसे चींटी को मसल रहा हो।

हर अफ़सर के ऊपर एक जासूस होता है, और वो इसकी बीवी के सिवा कोई दूसरा नहीं होता। और हर अफ़सर के नीचे दो-चार जासूस होते हैं, जो दिन भर ऑफिस की सभी जायज़-नाजायज़ गतिविधियों की गंध इन्हें सुँघाते रहते हैं।

अफ़सर को घर जेल लगता है और दफ्तर एक पिकनिक स्पॉट। अफ़सर के दफ्तर में घड़ी भी अफ़सर के हिसाब से चलती है। सर्दियों में धूप में मूँगफली खाते हुए दिखेंगे, और गर्मियों में ए.सी. की ठंडी हवा खाते हुए। अफ़सर जहाँ होता है, वहीं दफ्तर लग जाता है, बिल्कुल शहंशाह की तरह। जब तनाव होता है, तो मीटिंग होती है। मूड फ्रेश हो, तो मीटिंग होती है। कुछ नहीं हो रहा हो, तब एक मीटिंग तो ज़रूर आयोजित करनी होती है, सिर्फ इसलिए कि पता करें कि आज कुछ क्यों नहीं हो रहा दफ्तर में।

बाबू से पूछते रहते हैं, "अच्छा, बताओ, आज मैं कैसा लग रहा हूँ?" बाबू कहते हैं, "साहब जी, इस बात पर तो एक मीटिंग आयोजित कर ली जाए। सबकी सर्वसम्मति से पता भी लग जाएगा कि आप कैसे लग रहे हैं। अब मैं अकेला कहूँगा, जनाब, तो छोटे मुँह बड़ी बात होगी।" बस, इसी बात पर एक मीटिंग आयोजित करनी पड़ती है।

अफ़सर की नई टाई की प्रशंसा के लिए भी एक मीटिंग आयोजित की जाती है। नीचे ओहदे वाले दफ्तर में किसी कर्मचारी की खुशी बाँटने को पार्टी करते हैं, तो अफ़सर उस खुशी को काफूर करने के लिए मीटिंग करते हैं। अफ़सर होना मतलब कुर्सी और उस पर टँगा उनका कोट। कोट के अंदर अफ़सर का होना ज़रूरी नहीं है। जैसे भरत ने अयोध्या का राज्य चलाने के लिए राम जी की खड़ाऊँ ली थी, वैसे ही इनका कोट दफ्तर का राज्य चलाता है। इससे बढ़िया रामराज्य आपको देखने को नहीं मिलेगा।

ये कहीं भी जाएँ, अपना कोट कुर्सी पर टाँग देना नहीं भूलते। अगर बड़ा अफ़सर भी आ जाए, तो कोट देखकर कोई भी कह सकता है - "अफ़सर तो हैं; लेकिन किसी ऑफ़िशियल काम से इधर-उधर गए होंगे।" 

सम्पर्कः गर्ग हॉस्पिटल ,स्टेशन रोड गंगापुर सिटी राजस्थान 322201 mail ID drmukeshaseemit@gmail.com

Oct 1, 2025

व्यंग्यः अमीर बचाइए, सिस्टम बचेगा

  - जवाहर चौधरी  

एक न एक दिन मरना तो सबको पड़ता है । आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर । कोई विकल्प तो है नहीं।  अस्पताल चलें हम । अस्पताल में आदमी कायदे से मरता है। अस्पताल के पास सुपर स्पेशलिटी होती है। वे अपना काम जानते हैं और करने में दक्ष होते हैं। घरों में लोगों को नहीं मालूम होता हैं कि कब क्या करना चाहिए। मरीज की सांस उखड़ने लगती है तो दौड़कर बुआ जी को फोन करते हैं कि जल्दी आ जाओ बाबूजी की साँस उखड़ रही है। जो भी होना है बुआजी के सामने हो तो अच्छा होता है वरना बाद में केस बिगड़ सकता है। अस्पताल में ऐसा नहीं है। 

जब किसी की सांस उखड़ने लगती है , तो वह डिपॉजिट की रकम बढ़ाकर जमा करवा लेते हैं। इससे जमा बॉडी के जिन्दा रहने की उम्मीद बढ़ जाती है। लोगों को लगता है कि इतना रुपया जमा करवा रहे हैं तो अच्छा इलाज करेंगे। मरीज यानी जमा बॉडी को इतना आराम हो जाता है कि उसकी तरफ से साँस भी मशीन लेती है। इधर आत्मा यमराज के दरबार में पेश हो चुकती है, उसके करम चेक हो चुकते हैं, स्वर्ग या नरक में उसको खोली मिल चुकती है और बंदा अस्पताल में बाकायदा साँसें ले रहा होता है। अब इसे भी आप चमत्कार नहीं कहोगे तो मरो घर पे।

   हम एक खाँटी लोकतांत्रिक देश हैं और सिस्टम उसे जिंदा मानता है जो वोट दे देता है। मजबूरी है, क्या किया जा सकता है। अमीर आदमी का रुतबा अलग है वह वोट नहीं देता फिर भी बकायदा जिंदा माना जाता है। इसका रहस्य है कि वह चंदा देता है। राजनीतिक दल चंदे से जिंदा रहते हैं। अमीर लोग राजनीतिक दलों के ऑक्सीजन सिलेंडर होते हैं। सत्ता की साँसें अमीरों की तिजोरी में होती है। अमीर ना हों तो ऊपर बैठे मालिक का कारोबार भी ठीक से नहीं चले। आप समझ गए होंगे कि अमीर की इच्छा ही सिस्टम की जान होती है। इसलिए अमीरों को बचाना सिस्टम को बचाना है।  बड़े और समझदार आदमी हर काम कायदे से करते हैं; इसलिए अमीरों के अस्पताल अलग और गरीबों के अलग होते हैं । कायदे चाहे अस्पताल के हों, न्यायालय के हों या फिर धरम के हों, कोई भी कायदा गरीब अफोर्ड नहीं कर पाता है। वो अक्सर अच्छे अस्पताल और इलाज की कामना करते हुए मर जाता है। वैसे कामना का क्या है, लोग हूरों की भी करते ही हैं । गालिब ने कहा है कि ‘दिल को बहलाने के लिए खयाल अच्छा है।’ बहुत से कार्ड वाले गरीब अस्पताल के दरवाजे तक पहुँचकर कैसे तो भी मर लेते हैं। दरअसल अपने गरीब को भ्रम होता है कि वे जिंदा है। अस्सी करोड़ को सरकार से मुफ़्त राशन और पेड़ों से मुफ़्त ऑक्सीजन मिल रही  है । कुल मिल कर साँस चल रही हो तो लोग भी मान लेते हैं कि आदमी जिंदा है। 

सरकारें अस्पताल बनवाती हैं, ताकि आदमी जिंदा रहे और गरीबी भी । गरीबों के अस्पताल भी खासे गरीब होते हैं। गरीब से गरीब की मेचिंग होती है और ये संबंध बुरा नहीं  लगता है । यहाँ कोई ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए नहीं दौड़ता, ताबीज और भभूत के लिए पेरेरल दौड़ता दिखता है । गरीब अस्पताल में जब तब रोने चीखने की आवाज गूँजती है, तो जमीन पर पड़े मरीज के घर वाले खुश होते हैं कि शायद अब बेड मिल जाएगा। हूरों वाली कामना आखरी में आ कर एक बेड पर सिमट जाती है । बेड पर मरने को मिले तो गरीब की मुक्ति हो गई मानी जाती है। 

सम्पर्कः BH 26 सुखलिया, भारतमाता मंदिर के पास, इंदौर- 4520 10 , मो.  940 670 1 670          

Sep 1, 2025

व्यंग्यः हर व्यक्ति अब महाज्ञानी !..

  - गिरीश पंकज

सुबह- सुबह जैसे ही लिखने का मूड बनाया, तभी पांडुरंगम का फोन आ गया - "मैंने एक वीडियो व्हाट्सएप किया है।  कुछ ही देर का है, उसको जरूर देखें, बहुत अच्छा लगेगा।" 

मैंने मन-ही-मन में चिढ़ते हुए कहा, ''जरूर। इसी काम के लिए तो हम इस धरा पर अवतरित हुए हैं।"

लेकिन प्रकट में कहा, ''भेज दीजिए ! मेरे पास तो फालतू समय है।"

 उन्होंने मेरे व्यंग्य-बाण की अनदेखी करते हुए धन्यवाद कहा और फोन रख दिया। मैंने सोचा, चलो, अब लेख पूरा कर लूँ, फिर पांडुरंग का वीडियो देख लूँगा। मगर लैपटॉप खोला ही था कि रंगास्वामी का फोन आ गया ;

" बंधुवर !! अभी मैंने विश्व की एक बड़ी समस्या पर बहुत बड़ा लेख लिखा है। अपने ब्लॉग में डाला है। उसे समय निकालकर पढ़ें, तो आनंद आ जाएगा। देर न करें ।फौरन पढ़ें।"

रंगास्वामी पुराने मित्र थे।

मैंने कहा, "जरूर देख लूँगा। कुछ समय दो।"

लेकिन मैं चक्कर में पड़ गया। पहले पांडुरंगम का फोन, अब रंगास्वामी का । देखना और पढ़ना ही पड़ेगा, वरना फिर इनका फोन आ जाएगा।  मैंने पहले पांडुरंगम का वीडियो देखा। पन्द्रह-बीस मिनट उसमें निकल गए, तो रंगास्वामी का फोन आ गया। "बंधु !आपने अब तक नहीं पढ़ा क्या?.. यह तो गलत बात है !"

मैंने कहा," पढ़ते ही वाला हूँ। अभी पांडुरंगम का वीडियो देख रहा था।"

रंगास्वामी ने चिढ़ते हुए कहा, "अरे,पांडुरंगम कुछ भी बनाता है। उसे देखना बेकार है। मैं दमदार लिखता हूँ। मेरा लेख पढ़ो और बताओ कैसा लिखा है। फोन करना। मैं इंतजार करूँगा।"

हद हो गई! अब तो पढ़ना ही पड़ेगा। मैंने उसका लेख पढ़ना शुरू किया। इतना लंबा लेख कि पढ़ते-पढ़ते ऊब गया। बीस मिनट लग गए। खोपड़िया ही घूम गई । समझ में नहीं आया कि बंदा लेख में कहना क्या चाहता है। तनाव से मुक्ति के लिए मैंने पानी का गिलास उठाया और गटागट पी गया। तभी रंगास्वामी का दुबारा फोन आ गया।

ज़नाब हँसते हुए पूछ रहे थे, "आपने मेरा लेख पढ़ लिया न? मैं व्हाट्सएप में आपका स्टेटस देख रहा था.. मुझे समझ में आ रहा था कि आप मेरा लेख पढ़ रहे हैं.. हाँ... हाँ... हाँ... कैसा लगा लेख?"

मन तो हुआ कह दूँ कि बेहद घटिया था; लेकिन पुराने संबंधों का लिहाज करते हुए कहा, ‘‘कमाल कर दिया। आपने जो मुद्दे अपने उठाए हैं, उन मुद्दों पर मैंने गंभीरतापूर्वक विचार किया है।"

यह अच्छा हुआ कि रंगास्वामी ने यह पूछा नहीं कि मैंने कौन-से मुद्दे उठाए हैं। अगर वह पूछ लेते तो मैं ठीक से बता नहीं पाता। पकड़ा जाता। मेरी बात सुनकर रंगास्वामी बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे, "आप बहुत अच्छे आदमी हैं। कल भी आपको एक लेख भेजूँगा। परसों भी भेजूँगा।"

मैंने कहा, "स्वागत है, आपका !" 

मन-ही-मन कहा, प्राण ले लो हमारे! फिर सोच लिया कि अब इस बंदे को ब्लॉक करना पड़ेगा।  इस वार्तालाप से मुक्त हुआ ही था कि  घुसपैठ कुमार का फोन आ गया, "भाई साहब ! आपको मैंने व्हाट्सएप किया है। बड़ा ही धाँसू लेख मिला है। आपको फॉरवर्ड किया है। आप इसे पढ़िए और कुछ सोचिए। हम ईंट-से-ईंट बजा देंगे।"

मैंने कहा, " ज़रूर। ईंट-से-ईंट बजा लेंगे, लेकिन पहले पढ़ तो लूँ। फिर वहीं टिप्पणी करता हूँ।"

घुसपैठ कुमार ने कहा, ''टिप्पणी से काम नहीं चलेगा। इस पर अपन चर्चा करेंगे कि हम आगे क्या कर सकते हैं। देश को हम कहाँ ले जा सकते हैं।"

मैंने सिर पीट लिया। सोचने लगा, पढ़ो भी और इनसे चर्चा भी करो। खैर,  मैंने उनका लेख पढ़ा और कुछ टिप्पणी भी कर दी, तो मुक्ति का एहसास हुआ। अब मैं विचार करने लगा कि मुझे किस विषय पर लेख लिखना था।  कुछ समझ ही नहीं आया। जो लिखना चाहता था, वह विषय आउट ऑफ माइंड हो गया।  कुछ देर सोचने के बाद अचानक विषय कौंधा : अरे हाँ, मैं तो समय पकाऊ लोगों पर लिखने वाला था। ऐसे लोगों पर जो आपका समय खा जाते हैं। मैंने अपनी डायरी में लिख लिया, 'समयखोरों से त्रस्त लेखक'।  फिर लिखना शुरू ही  किया था, तभी लपेटोराम का फोन आ गया। मैं जानता था कि यह बंदा भी बहुत बड़ा वाला पकाऊ है। फिर भी दुनिया में हम आए हैं, तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा, यही सोच कर फोन उठाना पड़ा। उन्होंने हैलो भी नहीं कहा और शुरू हो गए:

"बंधुवर! एक भयंकर धाँसू लेख आपको व्हाट्सएप किया है। बहुत बड़ा नहीं है। दो-तीन घंटा नहीं लगेगा। आधे घंटे में पढ़ लेंगे। आधे घंटे बाद में आपको फोन करूँगा।"

मेरा दिमाग भन्ना रहा था। कड़े शब्दों में बोल तो सकता था; लेकिन सिधवा मनुष्य की जो छवि बनी हुई है, उसे तोड़ना नहीं चाहता था; इसलिए विनम्र-भाव से कहा, "ज़रूर.. ज़रूर! स्वागत है।" फिर मैंने उनका लेख पढ़ना शुरू किया। उनका अपना नहीं था। आज से पचास साल पहले किसी लेखक ने कुछ भविष्यवाणी की थी। पढ़ते-पढ़ते एक घंटा हो गया। लेख खत्म नहीं हुआ, तो मैंने पढ़ना बंद कर दिया। पूरे एक डेढ़ घंटे बाद पकाऊराम जी का फोन आ गया।

"अरे, लेख पढ़ा ?.. कैसा लगा?.. मजा आ गया न?.. देखो, क्या भविष्यवाणी की थी अगले ने.. बिल्कुल सही उतर रही है.. ऐसे ग्रेट लोग हो चुके हैं दुनिया में..  कमाल है,धन्य है.. इसे कुछ और लोगों को फॉरवर्ड कर देना भाई। मज़ा आ जाएगा।"

अपनी ओर से वे नॉन स्टॉप बोलते रहे।  मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया। अंत में उन्होंने कहा,"अच्छा, फोन रखता हूँ।"

और सचमुच उन्होंने फोन रख भी दिया। वरना उनकी पुरानी आदत है; रखता हूँ, तो कहते हैं मगर फिर लगातार बात करते रहते हैं।  मैं समझ गया कि आज मैं कुछ लिख-पढ़ नहीं पाऊँगा। आज सिर्फ मुझे पढ़ना है और देखना है। लिखना स्थगित! और मैंने यह आजमाया भी। गुस्से में सोच लिया कि आज कुछ लिखना ही नहीं है। आज सिर्फ व्हाट्सएप से ही नज़रें चार करनी हैं। और एक-एक का व्हाट्सएप स्टेटस देखना शुरू। देखते-ही-देखते दोपहर के एक बज गए। भोजन किया और लौट करके आने के बाद फिर व्हाट्सएप देखने लगा। रामलाल का, श्यामलाल का, लल्लू का, कल्लू का। बस, शाम हो गई। चाय-नाश्ता करने के बाद फिर बचे हुए व्हाट्सएप संदेशों को देखना शुरू किया। आज हर व्यक्ति मुझे ज्ञानी लगा। ज्ञान के भंडार से भरपूर। रात को नौ बजे के बाद भूख लगी तो भोजन कर लिया। तभी पकाऊ राम का फिर फोन आ गया :

" भाई साहब! फिर एक लेख मैंने भेजा है। जरूर पढ़ना। आपके ज्ञान-चक्षु खुल जाएँगे।"

मेरा दिमाग बुरी तरह से भन्ना गया था। मन तो हुआ कि मैं उनसे कहूँ कि पहले आप अपने ज्ञान-चक्षु खोलिए। किसी को इतना भी परेशान मत कीजिए कि वह तनाव में आ जाए; लेकिन शिष्टाचार के मारे कुछ कहा नहीं। फिर मन में आया कि व्हाट्सएप ही स्थायी रूप से बंद कर दूँ। चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद यह जो मनुष्य योनि मिली है, उसे सुख-चैन से जी लूँ, यही बहुत है। व्हाट्सएप के कारण जीना कठिन हो रहा है। पहले सोचा कि व्हाट्सएप बंद ही कर दूँ। फिर विचार किया कि मुझे भी तो अपना लेख लिखना है। अब तो मैं भी बदले की कार्रवाई करूँगा और जो-जो लोग मुझे अपना-अपना ज्ञान व्हाट्सएप करते हैं, उन सबको अपने ज्ञान का भी ओवरडोज जरूर दूँगा। हाँ नहीं तो!! इतना सोच कर मैं मुस्कुराया। अब मेरा तनाव धीरे-धीरे दूर होने लगा। फिर यूट्यूब में देशभक्ति वाले पुराने गाने सुनने लगा। फिर कुछ देर बाद तनावमुक्त हुआ तो नींद आने लगी और मैं निंदिया रानी की गोद में चैन से सो गया। ■

सम्पर्कः सेक़्टर -3, एचआईजी - 2 , घर नंबर- 2 , दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010, मोबाइल : 9425212720,  ई मेल - girishpankaj1@gmail।com


Aug 1, 2025

व्यंग्यःश्रद्धांजलि की बढ़ती सभाएँ

  - अख़्तर अली 

यह बहुत चिंता की बात है कि इन दिनों छुट्टी, जन्मदिन और शादी के इतने कार्यक्रम नहीं हो रहे हैं जितनी श्रद्धांजलि सभाएँ आयोजित हो रही हैं । शोक संदेशों की सुनामी आई हुई है । एक दिन में एक आदमी जितनी श्रद्धांजलि सभा में जा रहा है, उससे दुगनी सभाओं में नहीं जा पा रहा है; क्योंकि एक व्यक्ति एक ही समय में तीन चार स्थानों पर तो नहीं पहुँच सकता ।

श्रद्धांजलि सभा की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए परिवार के एक सदस्य को इसी काम के लिए नियुक्त कर दिया गया है । वह व्यक्ति दुकान, गोदाम, वसूली, टेंडर, ख़रीदी जैसे किसी काम में नहीं जाता । वह सिर्फ और सिर्फ श्रद्धांजलि सभा में शामिल होकर वहाँ अपने परिवार का नेतृत्व करता है । यही उसकी ड्यूटी है । परिवार में यही वह व्यक्ति है, जो सबसे पहले काम पर निकलता है और सबसे अंत में घर लौटता है । सब से अधिक वर्क लोड इसी पर है । परिवार में सब से अधिक यही व्यक्ति खटता और थकता है ।

पहले लोग थियेटर, होटल, गार्डन, मॉल जाते थे, अब जिसे देखो वह श्रद्धांजलि सभा में जा रहा है । लोगों का रेला का रेला एक ही दिशा की ओर बढ़ रहा है । अब तो कोई किसी से पूछता भी नहीं कि कहाँ जा रहे हो ? लोगों को जाता देख समझ जाते हैं- हम सब की मंज़िल एक है ।

एक श्रद्धांजलि सभा के बाद उसी स्थान पर एक समान्य सभा रखी गई, जिसका एजेंडा था- शोक सभाओं से बिगड़ते बजट पर कैसे नियंत्रण करे ? सामान्य सभा में इस बात पर चर्चा हुई कि अब तो यह रोज़ का काम हो गया है । हम अपनी - अपनी गाड़ी में एक ही स्थान से चलकर एक ही स्थान पर आते हैं और यहाँ से एक ही स्थान पर जाते हैं । जरा सोचिए, हम पेट्रोल पर कितना अनावश्यक पैसा खर्च कर रहे हैं । क्यों न हम सब मिलकर दिन भर की गाड़ी बुक करा ले । दोपहर और रात का खाना किसी ढाबे में खाकर देर रात तक घर पहुँचेंगे । सबने प्रस्ताव का समर्थन किया और श्रद्धांजलि को इंजाय किया जाने लगा । जब लोग रात को घर पहुँचते, तो उन्हें अगले दिन की सूची थमा दी जाती।

इन लोगों ने अपना व्हाट्सएप ग्रुप भी बना लिया है । श्रद्धांजलि संबंधित सभी सूचनाएँ इसी ग्रुप में डाली जाती हैं । जिस दिन श्रद्धांजलि की कोई सभा नहीं होगी, उस दिन भी हम एकत्रित होंगे और मस्ती करेंगे, ऐसा तय किया था; लेकिन ऐसा कोई दिन इन्हें नसीब नहीं हुआ । समूह में एक ऐसा भी प्रस्ताव आया था कि अलग - अलग श्रद्धांजलि देने के बजाय क्यों न संयुक्त रूप से सामूहिक श्रद्धांजलि दे दी जाए । इसका सभी ने एक स्वर में यह कहते हुए विरोध किया कि इससे तो मज़ा किरकिरा हो जाएगा । अतः यह प्रस्ताव ध्वस्त हो गया ।

श्रद्धांजलि के बढ़ते अवसर को भाँपते हुए अब लोग कपड़े भी इसी के अनुसार सिलवाने लगे हैं। इन्होंने श्रद्धांजलि को इतना आत्मसात् कर लिया है कि पत्नी से प्रेम की बाते भी दुःख भरे स्वर में करने लगे हैं । सब्जी मार्केट में सब्जी का भाव इस तरह पूछते हैं, मानो शोक प्रगट कर रहे हैं । शादी में जाते हैं, तो दूल्हे से कहते हैं - होनी को कौन टाल सकता है, जो होना था वह हो गया, सब ऊपर वाले की इच्छा अनुसार होता है, हिम्मत से काम लेना ।

अब वो इस काम के कुशल कारीगर माने जाते हैं, जो अक्सर युवाओं को समझाते हैं कि यह एक सरल क्रिया है, इसे जटिल मत बनाओ श्रद्धांजलि की बढ़ती हुई संख्या के चलते अब यह धीरे धीरे महज औपचारिकता का रूप लेती जा रही है, इसमें से वेदना और संवेदना के भाव लुप्त होते जा रहे है । मृत्यु की संख्या इतनी अधिक होती जा रही है कि जीवन सहम गया है । फिर भी कोई प्रश्न नही कर रहा है, सवाल खड़ा नहीं कर रहा है कि मृत्यु पर रोकथाम क्यों नहीं हो रही है ? कभी कोई मृत्यु मुखर हो जाती है, तब वह जीवित लोगों की ज़ुबान से बात करती है । जागरूक लोगों के ज़हन में लाशों ने ट्रैफ़िक जाम कर दिया, तो बात उठी ।

जो कभी नहीं होता, वह भी एक दिन होता है। तो एक दिन श्रद्धांजलि सभा से लौटते हुए समूह में यह बात उठाई गई कि मृत्यु की इस बढ़ती संख्या पर कोई चिंता ही नहीं कर रहा है । स्वाभाविक मौत तो स्वीकार है; लेकिन दुर्घटना में लोग लगातार मर रहे है, हत्या आम बात हो गई है। इन मौतों को तो रोका जा सकता है । चिंतन - मनन के बाद यह बात सामने आई कि चालाक राजनीतिज्ञ और होशियार अफ़सरों के साथ अब हमें एक सद्गुरु की सख्त ज़रूरत है, जो शासन, प्रशासन और आम जन को सही मार्ग दिखायेगा ।

सम्पर्कः निकट मेडी हेल्थ हाँस्पिटल, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़) 492010, मो. 9826126781